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“वहाँ है! पक्का!” मीनाक्षी ने कहा! मूर्ख! महामूर्ख! ये लोग धन के पीछे पड़े हुए थे! असलियत कोई नहीं जानता था, या जानना नहीं चाहता था! ये लोग न...
अब आया मुझे कटकनाथ बाबा पर गुस्सा! झूठ बोला उन्होंने मुझसे! मैंने उनका मान-सम्मान किया था और उन्होंने ये तथ्य छिपाए मुझसे! “तो आप सभी को अब धन चाहिए...
अब मैं समझा! ये तो खिचड़ी नहीं खिच्चड़ था! “तो किसी ने ये नहीं कहा कि या मशविरा नहीं दिया कि उस बीजक को उखाड़ दिया जाए और नीचे खुदाई की जाए?” मैंने प...
अब कुर्सी से उठ कर मीनाक्षी हमारे बिस्तर पर आ बैठी थी, चौकड़ी मार! अब हम ऐसे बैठे थे जैसे चार जुआरी बैठा करते हैं! और वैसे वहाँ जुआ ही चल रहा था, जिसे ...
“मै वाराणसी गयी हुई थी, मेरे पति के गुरु जी का आश्रम है वहाँ, वहाँ मुझे एक औघड़ बाबा मिले थे, नाम था धौमन बाबा, उन्होंने मुझे इस बीजक के बारे में बताया...
“कोई औरत आ रही है मिलने” मैंने कहा, “ये साला धन का ही चक्कर है!” वे बोले, “पहले उस से बात कर लें, देखते हैं” मैंने कहा, हम नीचे आ गये कक्ष में! ...
एक दूसरे कागज़ पर अब विश्लेषण के लिए जगह सीमित कर ली, तीन सौ पैंसठ बिंदियाँ और छह में छेद, अर्थात? छह में छेद, क्या ऋतुएं? छह ऋतुएं? ठीक है, मान लिया छ...
“मै वाराणसी गयी हुई थी, मेरे पति के गुरु जी का आश्रम है वहाँ, वहाँ मुझे एक औघड़ बाबा मिले थे, नाम था धौमन बाबा, उन्होंने मुझे इस बीजक के बारे में बताया...
“कोई औरत आ रही है मिलने” मैंने कहा, “ये साला धन का ही चक्कर है!” वे बोले, “पहले उस से बात कर लें, देखते हैं” मैंने कहा, हम नीचे आ गये कक्ष में! ...
एक दूसरे कागज़ पर अब विश्लेषण के लिए जगह सीमित कर ली, तीन सौ पैंसठ बिंदियाँ और छह में छेद, अर्थात? छह में छेद, क्या ऋतुएं? छह ऋतुएं? ठीक है, मान लिया छ...
उठे तो चार बजे थे! “गुरु जी?” शर्मा जी ने टोका, “हाँ?” मैंने पूछा, “यहाँ कोई गड़बड़ चल रही है पक्का!” वे बोले, “लगता तो है” मैंने कहा, “आप कटक...
और वो बेपरवाह सा आगे आगे चलने लगा! और हम पीछे पीछे! बड़ी मुश्किल से रास्ता काटा! और गाड़ी में बैठ गए! पिंडलियों में खिंचाव सा आ गया! लगा जैसे पह...
“क्योंकि इसमें मोर हैं और बंजारों के बीजक में मोर नहीं होते, वहाँ हंस होते हैं” मैंने बता दिया! उसके चेहरे का रंग बदला! मैंने देखा! “और ये कुआँ?...
बीजक साफ़ सुथरा था! अब मैंने उसको देखना शुरू किया! सबसे ऊपर दोनों कोनों में दो मोर बने हुए थे! बीच में एक सांप फन फैलाये बैठा था! उस पत्थर के चारों...
अब हम चले पैदल पैदल! संकरा रास्ता, पथरीला, ऊबड़-खाबड़! किसी तरह से बचते बचाते चलते रहे! “सिद्धेश और जयेश यहीं आये थे?” मैंने पूछा, “हाँ जी” वो बोल...
