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और वो बीच वाला, पीला पिंड, जो अब भूमि तक आया था, कई जगह से मुड़-तुड गया था! जैसे, अक्सर धूपबत्ती या अगरबत्ती का ऊपर उठता हुआ धुआं, अक्सर किया करता है!...
और आत्मा आकाश-गमन कर जाती! सहसा ही, भूमि में फिर से कम्पन्न हुई! जैसे भूकम्प आया हो ऐसी कम्पन्न! फिर से मिट्टी झड़ने लगी उस गुफा की! और फिर से, ...
वे हंस रही थीं। हंसी-ठिठोली जैसी आवाजें थीं। वो हैं कहाँ? बाहर? या यहीं? अदृश्य रूप में? कहाँ हैं? अब डर लगने लगा था! सच में! पता नहीं, हमारे तंत्र...
है, फ़ैल गया था! चारों तरफ! हर तरफ! बस, उस गुफा के उस स्थान में नहीं, जहां ये आह्वान चल रहा था! हरा-पीला सा प्रकाश! सारा स्थान जैसे नह गया था उस प्रका...
धक कर, बवाल मचाये हए था! हाथ ठंडे हो चले थे हमारे! जाँघों में जैसे, कीड़े रेंग रहे हों, ऐसा लग रहा था! मित्रगण! तभी आकाश में प्रकाश कौंधा! चंदीला प...
प्रकाश! मदार के रेशे, चटर-चटर की आवाज़ कर, जलने लगे थे। तभी मेरी टोर्च ने फिर से अंगड़ाई ली! और बाबा ने वो दीया, वहीं बने एक चबूतरे पर रख दिया! अब,...
बोले बाबा! जान गए थे हम! कोई नयी बात नहीं! "और आज! आज फिर प्रकट होंगे वो तीनों!" बोले वो! बस! यही तो था मंतव्य! मैं हंस पड़ा! "जब शम्पायन नहीं रहे, तो...
"अरे नहीं! ये अवसर पुनः नहीं आएगा!" बोले वो, "जानता हूँ, और आये भी नहीं!" कहा मैंने! "अरे चलो!" बोले वो! "आप देख आओ" कहा मैंने, "क्यों?" बोले वो, "...
. . . . मेरा तो सर फटने को हुआ! क्या आ गए हम उधर? लेकिन गुफा में? "सुनो! अब बहुत करीब हैं!" बोले वो! जोश भर गया था उनमे अब! "आओ मेरे सा...
कुछ लिखा था उस पर! लेकिन समझ से परे! 'त्रुप्ल' अर्थ बनता था उसका, देवनागरी में तो! लेकिन था एक अजीब सा ही चिन्ह! पंचभुज था बना हआ, उसमे त्रुप्ल लिख...
और हम मुड़ लिए उस रास्ते के लिए! अब यहां आये तो छोटी सी पहाड़ी दिखी! पहाड़ी में एक गुफा दिखी! गुफा के मुंह पर, पेड़ों की दाढ़ियाँ, बेलें, जड़ें सब लगे...
वो अजीब ही था! समझ से परे! वहाँ तीन गोल चबूतरे बने थे! बीच में एक बड़ा सा! दायें एक, छोटा, और बाएं एक, छोटा! उन चबूतरों के आसपास, नालियां बनी थीं! जैस...
और हाँ, छत के मध्य एक बड़ा सा छेद था! गोल छेद! "ये कैसा कक्ष है?" बोले बाबा! "पता नहीं!" कहा मैंने, रौशनी मार रहा था मैं दीवारों पर, और जैसे ही छत ...
और ऐसे रुकी, जैसे हमें ही देख रही हो! नकुल और हीरा की तो किल्ली निकलते निकलते बची! मारे भय के, काँप उठे थे दोनों ही! और बाबा, तभी एक झटके से पीछे ह...
लगे थे,सफेद सफेद! यही से आ रही थी वो सुगंध! "कहीं किम्पुरुष लोक में तो नहीं आ गए?" बोले शर्मा जी, मैंने आकाश देखा! अँधेरा तो था ही। तारे भी निकल चुके ...
