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"हम कोई अहित नहीं करेंगे आपका! बस आपके दर्शन के अभिलाषी हैं!" मैंने कहा, अब कोई फुंकार नहीं! फिर कुछ पल, ऐसे ही बीते! अधर में लटके लटके! ...
मैं चुप हुआ! "हे नागराज!" मैंने कहा, और फिर से एक भयंकर फुंकार! मैं घबरा सा गया! पाँव तले जैसे ज़मीन खिसक गयी! मैंने हिम्मत टटोली अपनी! ...
फिर मैं आगे बढ़ा! सांप ऐसे ही बैठा रहा! मैं और आगे गया! कोई हरक़त नहीं की उसने! मैं और आगे बढ़ गया! बस, कोई एक मीटर की दूरी रह गयी! हमा...
जैसे दहक रहा था! प्रकाश, उसके कुंडली के मध्य से ऐसे आ रहा था, जैसे कोई टॉर्च भूमि में दबा दी हो! उस प्रकाश में, उसका फन साफ़ दिखायी दे र...
अभी पानी शेष था हमारे पास, तो मैंने, अब पानी पिया, और फिर से लेट गया! रात करीब ग्यारह बजे, फिर से प्रकाश सा चमका! अब ये दो रंग का था...
और अब चले वापिस! और फिर, लगायी आग! और भूने को रख दी! चटक चटक! भुनती रही! बाबा, मसाला और नमक लगाते रहे उसमे! और फिर पत्तों से बने ...
नींद ली अब! हम सभी ने! करीब तीन बजे, आँख खुली! और मैंने देखा, बाबा हरी सिंह और बाबा टेकचंद! तालाब पर खड़े थे! कांटे डाले हुए! म...
फिर वस्त्र पहने! और आ गया उस पेड़ के नीचे! तब, बाबा टेकचंद, और हरी सिंह, चले गए शिकार के लिए! और हम लेटे रहे! एक घंटे के बाद आये! ...
जैसे, निशापति ने अपनी चमक, स्थायी तौर से दे दी हो उसको! जैसे वे स्वयं समा गए हों उसमे! उसका, श्याम-नील वर्ण! कैसा अद्भुत! कैसा अद...
अपने हाथों से! कितना अनुपम रूप होता है उनका! अद्भुत! बहुत अद्भुत! करवटें बदलता रहा मैं! शर्मा जी, अपना हाथ अपने माथे पर रखे, सोचत...
न माने! अच्छा है! न माने! कम से कम, सुरक्षित तो हैं ही वो! ये तो, हमारे भारतीय अध्यात्म, संस्कृति, और सभ्यता की पहचान हैं! ...
उस रूप! चमक! देह! सब याद था! "देव!" शर्मा जी बोले, "हाँ! देव! कोई देव!" मैंने कहा, अभी तक हम वहीँ देख रहे थे! जहां वो ओझल हुआ था!...
और खड़ा हो गया! वो पीछे हटा! कुंडली खोली! और पीछे घूमा! और चल पड़ा पीछे! और हमारे देखते ही देखते! जंगल में चला गया! झाड़ियों से होता...
और पीछे! और पीछे! और मैं उठा! घुटनों पर बैठा! हाथ जोड़े हुए! वो पीछे हट गया था! और अब, कुंडली मार, हमे ही देख रहा था! गौर से...
भय तो था हमे! उसने एक दंश मारना था, और मैं सीधा मृत्युराज का अतिथि बन जाता! एक विशेष अतिथि! मैंने सर उठाया! उसको देखा, उसके भयानक ने...
