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अब हम चले पूरब की और,यहां इसी के समानंतर में, वो बरगद का पेड़ था!तभी घोड़े की टाप सुनाई दी हमको,कोई आ रहा था घोड़े पर,हम रुक गए, सामने टोर्च मारी,आ रहा थ...
खून पर पलने वाले कीड़े आने लगे थे उसकी गंध से,हमें हटना पड़ा, कुछ उड़ने वाले भी थी, वे भी झपटने लगे थे,हम पीछे हटे, एक जगह कुछ पेड़ लगे थे, वहाँ टोर्च की ...
पीछे आवाज़ हुई हमारे!था तो कुछ नहीं उधर!शायद जंगली जानवर होंगे,सियार या बिज्जू आदि,वे ही रात्रिचर जीव हैं यहां,हम आगे बढ़े,एक टीला आया,उस पर चढ़ कर ही जा...
जैसे सफेद चादर में लिपट,पीठ के बल लेटे थे! क्या औरत और क्या मर्द!पानी की सतह के नीचे!आँखों की जगह गोल गोल काले गड्ढे थे!नाक के दो छिद्र,और मुंह का एक ...
और ग्यारह बजे से कोई थोड़ा देर में,हम निकल पड़े उस ठावणी के लिए!रास्ता खराब हो गया था आज तो,कोई ट्रेक्टर गुजरा था वहाँ से,उसके दांतों ने, गड्ढे से बना द...
और उनको जवाब देते गए हम!आज हम सामान लेते आये थे साथ में अपना,सलाद कटवा लिया था मोहन से उन्होंने,हौदी से ठंडा पानी लाया गया,और हमने की शुरू ज़रा अपनी हु...
हम उनके पीछे भागे!एक जगह जा, रुक गयी वो,हम आ गए उन तक,वे नीचे बैठ गयीं दोनों,ऐसे डरने लगीं जैसे, हम उन्हें अभी पीटने वाले हों,"डरो नहीं! खड़ी हो जाओ!" ...
"कौन सा माल?" पूछा मैंने,"वो, धीमणा का" बोली वो,"तुम हो कौन?" पूछा मैंने,"माल?" बोली वो,सीधी थी बेचारी वो,बात करने में डर रही थी,हाथ जोड़ कर, बोलती थी,...
फिलहाल में तो कोई दिक्कत नहीं हुई थी!वो शाम, ठावणी की शाम थी, कि मोहन आया भागता भागता!सांस बनाई और बताया कि उन पपीतों के पेड़ों के पास कोई है!मैं और शर...
किशन जी ने फिर से सामान बाँध दिया था,अब यहां सत्रह दिन के बाद आना था वापिस!हम आ गए थे अपने स्थान पर,कुछ और काम निबटाए,मिले-मिलाये लोगों से,और इस तरह प...
तो हमारे ही गोडे टूटते दीखै" बोले वो,अब शर्मा जी ने समझाया उन्हें!और हम, पहुँच गए खेत पर!उतरे गाड़ी से, तब आवाज़ दी उन्होंने मोहन को, उनका मज़दूर था वो,आ...
लोग सोने को सिक्कों में गढ़ लिया करते थे!ये सिक्का वजन में साढ़े बारह ग्राम का है,आज भी है मेरे पास,खैर,वे चले गए थे,दूर से, फिर से घोड़े की हिनहिनाहट आ ...
एक ने उठाया, और फेंक के मारा मुझे वापिस,मैंने फिर उठा लिया सिक्का,"तुम गलत समझ रही हो!" कहा मैंने,"कैसे?" बोली वो, अपने बाल खींचते हुए, अनुभव क्र. ९...
जैसे ही आये हम वापिस,उस पोखर में, कतार लगाये,वे प्रेत खड़े थे! कम से कम पच्चीस रहे होंगे!सभी हमें ही घूर रहे थे, बड़ यही भयावह सा नज़ारा था!"अरे बाप रे!"...
"वापिस नहीं जाना!" कहा मैंने,"सही कह रहा हूँ!" बोला वो,"जाऊँगा तो नहीं! वैसे तुम कौन हो?" बोला मैं,"मैं सतभान हूँ, बैजला!" बोला वो,"किसके बैजला?" पूछा...
