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२०११ पोखरा नेपाल की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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उसकी लाश तीन हिस्सों में कटी पड़ी थी! पहले गर्दन काटी गयी थी, फिर उसका पेट और फिर उसको घुटनों के नीचे से काटा गया था, बदन पर कोई कपडा नहीं था और ये लाश किसी बीस या बाइस उम्र की किसी गोरी लड़की की थी, आँतों में द्रव्य अभी तक मौजूद था, और घुटनों की हड्डियां अभी भी लाल थी, लाश फूली नहीं थी और न ही सड़ी थी, लाश से बदबू भी नहीं आ रही थी, और ये लाश पोखरा (नेपाल) की एक बरसाती नदी में मिली थी, लाश को पहले एक बोरे में भरा गया था, उसको सीला गया था फिर ऊपर से एक चादर में लपेटा गया था, लाश से जो दुर्गन्ध आ रही थी वो नमक की दुर्गन्ध थी,कहीं कहीं कटे हुए जख्म पर सफेदी चढ़ गयी थी, लाश किनारे आ लगी थी उस नदी के!

उस दिन भी घनघोर बरसात हो रही थी, कभी थम जाती और कभी फिर से तेज हो जाती थी, सुबह के उस समय कोई छह बजे बरसात थम गयी थी! मै शर्मा जी के साथ पोखरा से साठ किलोमीटर दक्षिण में एक औघड़ दीक्षानाथ के पास आया हुआ था, दो रात पहले हमने वहाँ घाड़-साधना पूर्ण की थी और अब मै और शर्मा जी, तीन दिनों का विश्राम कर वहाँ से जाने ही वाले थे, उस सुबह हम जंगल-मैदान होने गए थे, सुबह कोई सवा छह बजे जब हम उस नदी के पास आये तो मैंने ही वो गठरी देखी थी, गठरी किनारे लग चुकी थी, गठरी पर खून के निशान थे तो समझते ही देर न लगी कि किसी की लाश की दुर्गति हो रही है!

हम वापिस आये और दो चार सेवकों को वहाँ बुलवाया, उन्होंने वो गठरी वहाँ से निकाल कर बाहर खींच ली और फिर स्थानीय-पुलिस को खबर दे दी गयी, पुलिस वहाँ पहुंची और उन्होंने जांच आरम्भ की, मैंने उनको जो देखा था वही बता दिया, गठरी को खोला गया, तब वो लाश सामने आई थी! अब चूंकि लाश के बदन पर कोई वस्त्र न था और चेहरा खून से लथपथ था, इसीलिए चेहरा सही न दिख सका, उसकी आंतें बिखर गयीं थीं और बाहर पानी के संपर्क में आकर फूल सी गयीं थी, खैर, पुलिस ने पंचनामा भरा और उसको लाद के ले गयी!

हम भी वापिस अपने डेरे पर आ गए!

डेरे पर आके शर्मा जी ने पूछा, “गुरु जी, न जाने बेचारी कौन है वो,किसकी बेटी है, किसकी माँ है और न जाने किसकी बीवी है?”

“शर्मा जी, हम कल यहाँ से जाने वाले हैं, ध्यान रखिये आप!” मैंने कहा,

“वो तो पता है, लेकिन क्या आपने उसे सर को देखा?” वो बोले,

“हाँ, आपको कुछ ख़ास दिखा?” मैंने भी सवाल किया,


   
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श्रीशः उपदंडक
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“हाँ! उसकी आँखें खुली थीं” वो बोले,

“तो?” मैंने कहा,

“इसका मतलब ये कि उसने अपने कातिल को अवश्य देखा होगा” उन्होंने कहा,

“हो सकता है, लेकिन लाश पीनी में थी, ये भी हो सकता है ना?” मैंने कहा,

“नहीं गुरु जी, लाश का ना तो पेट फूला था, ना आतें” वो बोले,

“हाँ, तो?” मैंने हैरत से पूछा,

“और ना कीड़े ही थे उसमे, ना नदी का भाव तेज था और ना लाश सड़ी ही थी” उन्होंने कहा,

बात में दम था!

“हाँ, सही कहा आपने!” मैंने कहा,

“तो इसका मतलब उसको कल रात ही मारा गया होगा!” वो बोले,

“हो सकता है!” मैंने कहा,

“आपको वो नमक की थैली याद है जो लाश के साठ थी?” वो बोले,

“हाँ याद है, तो?” मैंने पूछा,

“नमक की थैली का नमक पूरी तरह से गला भी नहीं था” उन्होंने कहा,

इस बात में भी दम था!

“हाँ बात तो सही है!” मैंने कहा,

“इसका मतलब ये लड़की यही कहीं आसपास की रहने वाली ही है” उन्होंने कहा,

“होगी, हमारा कोई मतलब नहीं शर्मा जी!” मैंने कहा,

“गुरु जी!” वो बोले,

“बोलिए?” मैंने कहा,

“मुझे साजिश की बू आ रही है” उन्होंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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“शर्मा जी, आप भी, छोडिये ना, पुलिस कर लेगी सारा काम, हम कल जा रहे हैं यहाँ से” मैंने बताया,

उसके बाद मेरी और उनकी काफी बातें हुईं इस विषय पर, उत्तर यही निकला, दरअसल, उत्तर था वो प्रश्न कि वो थी कौन? और क्या हुआ इसके साथ!

 

“तो शर्मा जी आप चाहते हैं कि इस लड़की की जांच की जाए, ताकि शिनाख्त हो जाए और उसको इन्साफ मिले, यही ना?” मैंने मुस्कुरा के पूछा,

“हाँ गुरु जी!” उन्होंने कहा,

“ठीक है, जैसा आप कहो, अब ना जाने कितने दिन लगेंगे!” मैंने बताया,

“कोई चिंता नहीं, किसी को इन्साफ मिलता है तो भले ही कितने दिन लग जाएँ!” उन्होंने कहा,

तो मित्रो! अब हुई उसकी तलाश शुरू! सबसे पहले तो ये जानना था कि वो बेचारी आखिर थी कौन? कहाँ रहती थी, क्या कारण था उसकी मौत का, और सबसे बड़ा सवाल, कि उसको मार किसने था?

उसके लिए हम उसी क्षण वही आये जहां से लाश बरामद हुई थी, उस स्थान से उस लाश का कोई अवयव, बाल अथवा रक्त, शारीरिक-द्रव्य मिल सकता था, वही चाहिए था, गहनता से जांच की तो एक जगह रक्त से सने कुछ बाल मिले, ये शायद उस लड़की कि ज़द्दोज़हद के कारण सर से टूटे हों, संभव था, मैंने वो बाल उठाकर एक पोलिथिन में भर लिए और फिर वापिस दीक्षानाथ के डेरे पर आ गया,

मैंने अपने कक्ष में जाकर, अपने तंत्राभूषण धारण किये, और भस्म-स्नान कर खोज-क्रिया आराम्ब्भ करने हेतु, बाड़े में से दो मुगे लाया, देसी लाल मुर्गे, उनको क्रिया स्थल पर ले गया, वहाँ जाकर, मैंने अलख उठायी, और फिर एक एक करके मुर्गे मंत्रोच्चार करके बलि कर दिए,

रक्त से अलख भोग दिया और अपने त्रिशूल को संवारा! फिर क्रिया आरम्भ की, सामने एक गड्ढा खोदा छोटा सा, और उसमे वो बाल पोलिथिन से निकाल कर रख दिए!अब मैंने द्वाल-महाप्रेत का आह्वान किया! करीब पंद्रह मिनट के बाद द्वाल प्रकट हुआ, भयानक महाप्रेत! ये प्रेत मूसलाधार बरसात में ही कार्य करता है! मैंने उसको एक मुर्गे की कलेजी और उसके सर का भोग दिया! भोग स्वीकार हुआ, अब मैंने उसको वो बाल दिखाए और उसको उसका उद्देश्य


   
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श्रीशः उपदंडक
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बता रवाना कर दिया खोज करने! द्वाल ‘शूम’ की आवाज़ करता वहाँ से कूच कर गया! कोई दस मिनट के बाद द्वाल वापिस आया, उसके हाथ में एक मुट्ठी राख भी थी, मनुष्य-भस्म! उसने वो राख अलख के सामने रख दी, अब मैंने उस से प्रश्न किये,

“ये बाल किसके हैं?” मैंने बाल उठाकर उस से पूछा,

“शूमी” वो गरजा,

“क्या उम्र?” मैंने पूछा,

“चौबीस” उसने कहा,

“जगह?” मैंने पूछा,

“रानीबन” उसने बताया,

“ये भस्म?” मैंने पूछा, जो उसने उस पोलिथिन पर गिराई थी,

“उसके आदमी की” उसने कहा,

“क्या नाम आदमी का?” मैंने पूछा,

“कलास” उसने बताया,

उसके बाद वो घूमा एक चक्कर लगाया और लोप हो गया!

आदमी? उसका आदमी? अर्थात वो शादी-शुदा थी, लेकिन उसका आदमी भी अब जीवित ना था,

बस, उस बरसात में वो इतनी जानकारी तो ले ही आया था, कि लड़की का नाम शूमी था, आदमी का नाम कलास या कैलाश होगा, रहने वाली थी वो लड़की रानीबन या उसके आसपास की, किसी पास के गाँव की हो होगी, इसका पता उस नदी के आने के मार्ग से पता चल सकता था, क्यूंकि हत्यारा अगर उसकी लाश को फेंकने नदी तक गया होगा तो सुने अपने पास का ही मार्ग चुना होगा, जिस से समय की बचत हो और लाश फेंक कर जल्दी उस से छुटकारा पा सके!

एक राह तो मिली थी, लेकिन जानकारी पुख्ता नहीं थी, केंद्र नहीं था हमारे पास, यूँ मानो कि जिला तो पता था राज्य का, लेकिन गाँव का पता नहीं चल रहा था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मै वहाँ से उठा, दूसरा मुर्गा उठाया और बाड़े में छोड़ दिया, शर्मा जी के पास पहुंचा, और उनको इस जानकारी से अवगत करवाया, अब शर्मा जी ने अपनी मातहत उस नदी के आसपास के गाँवों की सूची बनायी, यहाँ करीं नौ गाँव थे जो पूर्वी किनारे पर पड़ते थे और सात गाँव उसके पश्चिमी किनारे पर पड़ते थे, कुल मिला के सोलह गाँव! घास के ढेर में से सुईं ढूँढने जैसी बात थी ये! सोलह गाँवों में जा जा कर जानकारी जुटाना संभव ना था, अतः हमने सूर्य निकलने और मौसम के साफ़ होने तक का इंतज़ार करना ही उचित समझा!

“शर्मा जी, चलो कुछ तो पता चला ही” मैंने कहा,

“हाँ गुरु जी, एक दिशा तो मिली” उन्होंने कहा,

“शर्मा जी, दो हत्याएं हुई हैं, अब पता नहीं उसके आदमी की हत्या हुई है या स्वतः ही मृत्यु?” मैंने आशंका जताई,

“हाँ, अभी भी सब कुछ अँधेरे में ही है गुरु जी, परन्तु मुझे विश्वास है आप इस बारे में और भी अधिक जानकारी जुटा लेंगे!” उन्होंने कहा,

“मै पूरी कोशिश करूँगा” मैंने कहा,

“अवश्य गुरु जी” वो बोले,

और मित्रगण, वो बरसात अगले तीन दिन खराब कर गयी हमारे, रुकी ही नहीं, चौथे दिन सूर्य ने अपना मुख-मंडल दिखाया! आसमान साफ़ हुआ!

अब रात्रि का इंतज़ार था!

 

और फिर आई एक साफ़ रात! मै उस रात क्रिया में बैठा, सारा प्रबंध पहले ही कर दिया था, मैंने रात्रि एक बजे क्रिया आरम्भ की, मैंने अब अपना इबु-खबीस हाज़िर किया! हाज़िर होते ही भोग पर टूटा वो! भोग लेने के बाद मैंने उसको वो बाल दिखाए और वो भस्म भी, उसने उनको सूंघा और वहाँ से रवाना हो गया! मुझे इबु-खबीस ने कभी भी निराश नहीं किया था, कुछ विशेष परिस्थितियों में वो स्वयं-विवेक से भी कार्य कर लेता है! आप इबु-खबीस के बारे में जानने के लिए इफरित शब्द की खोज कर सकते हैं कि ये इबु-खबीस आखिर है क्या?

आधे घंटे के बाद इबु-खबीस वापिस आये! उसने मुझे ऐसी जानकारी दी कि मै अब अपना कार्य समुचित रूप से कर सकता था! मैंने जैसा कहा था कि इबु-खबीस कभी निराश नहीं करता! सबसे पहले इबु ने बताया कि उनके सेढ़े, अर्थात आत्माएं, कोठरी में बंद हैं सात दिनों से!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कोठरी का अर्थ हुआ मसान-मसानी के डेरे में पहुँच चुके हैं दोनों! ये तेरह और सत्ताईस दिनों में बनते हैं, यदि कोई सेडा मर्द का है तो उसको मसान-वीर के यहाँ तेरह दिन और मसानी के यहाँ सत्ताईस दिनों तक हाजिरी देनी होती है, और अगर कोई सेडा औरत है तो मसान-वीर के यहाँ सत्ताईस दिन और मसानी के यहाँ तेरह दिन हाजिरी भरनी पड़ती है, चालीस दिनों के बाद उनको ‘छाप’ लगा के छोड़ दिया जाता है, इसे मसान-न्याय कहते हैं! इबु के अनुसार उनके सेढ़े एक दुसरे के बाद पहुंचे थे कोठरी में, पहले कैलाश का और फिर शूमी का, मतलब कि कैलाश के मौत पहले हुई थी और शूमी की बाद में! कैलाश और शूमी पति-पत्नी थे, कैलाश की ये तीसरी शादी थी, उसकी पहली बीवी शादी के बाद दो महीने तक ही जिंदा रही थी, और बीमारी से उसकी मौत हो गयी थी, उसके बाद कैलाश ने दूसरी शादी की थी, और दूसरी बीवी से उसके दो लड़के और दो लड़कियां थीं! लेकिन किसी पारिवारिक विवाद पर दूसरी बीवी कैलाश से अलग ही रहा करती थी, काफी दिनों से, उसके लड़के-लड़की भी अपनी माँ से साथ ही रहते थे, तब कैलाश ने एक और शादी कर ली, ये थी शूमी! हैरान करने वाली बात ये थी कि शूमी की उम्र मात्र चौबीस साल थी और कैलाश की पचपन साल! शूमी विधवा थी, कम उम्र की विधवा, इसीलिए कैलाश ने उस से शादी की थी, लेकिन कोई संतान नहीं थी उसकी, और जिस गाँव में ये कैलाश और शूमी रहते थे उसका नाम था बेलछु! और उनको क़त्ल करवाने वाली है उसकी दूसरी बीवी और क़त्ल करने वाले हैं उसके खुद के लड़के!

अब कहानी खुल गयी थी! लेकिन परतें खोली जानी बाकी थीं! हमे कारण भी मालूम नहीं था, और उन लड़कों का नाम और गाँव भी पता नहीं था, क्यूंकि कोई निशानी नहीं थी! इसीलिए अब अगली रात की प्रतीक्षा करनी थी! कुछ और तांत्रिक-अनुसंधान करना था!

मैंने ये समस्त जानकारी शर्मा जी को दे दीं, वो काफी बेचैन हो उठे थे! उन्होंने सारी कड़ियाँ आपस में जोड़ने के लिए अथक प्रयास किया और कुछ प्रश्न भी!

“गुरु जी, शूमी मात्र चौबीस की और ये कैलाश पचपन का?” उन्होंने पूछा,

“हाँ, यही पता चला!” मैंने बताया,

“कमाल है! कैलाश अवश्य ही रंगीले किस्म का आदमी होगा फिर तो!” उन्होंने कहा,

“हो सकता है!” मैंने कहा,

“लेकिन ये ओ कोई ठोस कारण नहीं लगता हत्या करने का, वो भी दोनों की?” उन्होंने संशय जताया,

“हाँ, लगता तो नहीं है” मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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“अब एक की जांच तो हो गयी, गुरु जी, अब आप तनिक शूमी की जांच करो, कुछ अवश्य ही पता चलेगा” उन्होंने कहा,

“शूमी का इतिहास जानना चाहते हैं ना आप?” मैंने कहा,

“हाँ गुरु जी, कुछ कारण वहीँ से आएगा, मुझे ऐसा लग रहा है” उन्होंने कहा,

“ठीक है, मै सुजान को भेजूंगा आज” मैंने कहा,

“और फिर उसके बाद उसकी दूसरी बीवी की जांच भी कराइये” वो बोले,

“शर्मा जी, उसके लिए या तो मुझे कोई निशानी मिले उनकी, या फिर वो मेरी आँखों के सामने से निकलें, तो मै कर दूंगा!” मैंने बताया,

“अच्छा! हाँ!” उन्होंने कहा,

 

उसके बाद हमने सोचा कि चलो खुद ही कुछ मालूमात की जाए! हमने डेरे से एक नेपाली सेवक को लिया, इसका नाम बिरजू था, उम्र कोई तीस-बत्तीस वर्ष होगी उसकी, हमने बिरजू को लिया और एक वैन किराए पर ले ली, अब शर्मा जी ने बिरजू से पूछा, “बिरजू, ये गाँव बेल्छु कहाँ पड़ता है?”

तब बिरजू तो नहीं हाँ उस ड्राईवर ने ही कहा,”जी वो यहाँ से कोई दस-बारह किलोमीटर होगा”

“ठीक हा, वहीँ चलो” शर्मा जी ने कहा,

फिर ड्राईवर हमे उस गाँव की तरफ ले गया, हम कोई आधे घंटे में वहाँ पहुँच गए, गाँव कोई अधिक बड़ा नहीं था, गाँव के बाहर मानसरोवर के पौधे खड़े थे, बड़े बड़े! हम जैसे ही गाँव में घुसे दो आदमियों ने गाडी रुकवा ली, बिरजू ने उनसे नेपाली में बात की, फिर वो बाहर उतरा, और फिर ड्राईवर भी, दोनों वहीँ बातें करने लगे, देखते ही देखते वहाँ भीड़-भाड़ हो गयी! एक घंटा लग गया, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, मुझे तो कोई गड़बड़ लग रही थी, तभी बिरजू आया और बोला, “गुरु जी, ये कह रहे हैं कि यहाँ आप लोग नहीं आ सकते क्यूंकि माओ लोगों ने मना कर दिया है, हमे वापिस जाना पड़ेगा”

“कोई बात नहीं बिरजू, बुलाओ ड्राईवर को” शर्मा जी ने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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बिरजू ने ड्राईवर को बुलाया और फिर हम वापिस चल दिए वहाँ से, माओ समस्या से उन दिनों नेपाल ग्रस्त था, अतः हमको वहां से वापिस आना पड़ा, हाथ आया सूत्र हाथ से निकल गया!

खैर, हम मायूस नहीं हुए, मै अब शूमी के बारे में जानकारी लेना चाहता था, इसीलिए उसी रात मै क्रिया में बैठ गया, मेरे पास शूमी के बाल थे, मैंने तब अपना विश्वस्त कारिन्दा सुजान को हाज़िर किया, और उसको शूमी के घर की जानकारी के लिए भेज दिया, कारिन्दा उड़ा और फिर आधे घंटे के बाद वापिस आया, उसने बताया की शूमी का ना कोई बहन है और ना कोई भाई, उसका बाप है और माँ चल बसी है काफी समय पहले, शूमी का पहला पति भी चल बसा है, शूमी के बाप ने ही शूमी का ब्याह कैलाश से करवाया था, शूमी के गाँव का नाम भलपुर है! ये थी कमाल की जानकारी! शूमी के बाप के पास कुछ ज़मीन भी थी, शहर में, जो अब शूमी की हो जाने वाली थी उसके बाप की मौत के बाद! और शूमी से कैलाश को ही फायदा होने वाला था! मैंने सुजान का शुक्रिया किया! उसको भोग दिया और वापिस भेज दिया! अब मैंने ये सारी बातें बतायीं शर्मा जी को! ये सुनके उनके भी कान खड़े हो गए! बोले, “गुरु जी, अब कुछ समझ में आ रहा है मेरी!”

“क्या? जैसे?” मैंने पूछा,

“शूमी की वो ज़मीन!” उन्होंने कहा,

“हाँ, तो, इसका मतलब?” मैंने पूछा,

“मतलब ये कि कोई ना कोई कहानी इसी ज़मीन से जुडी है!” उन्होंने अंदेशा लगाया,

“बात में दम तो है, लेकिन अभी भी संदेह है” मैंने कहा,

“कैसा संदेह?” उन्होंने कहा,

“यही कि दोनों की मौत एक दूसरे के एक दिन बाद हुई है, अब कौन पहले मरा है, उसी से गुत्थी सुलझेगी शर्मा जी” मैंने कहा,

“गुरु जी, लाजमी है कि कैलाश की मौत पहले हुई है, क्यूंकि उसकी भस्म आई थी” उन्होंने कहा,

“लेकिन शर्मा जी, वो भस्म कहाँ से आई, कहाँ जलाया गया और कहाँ दाह किया गया उसका, ये नहीं मालूम चल रहा है मुझे!” मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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“आप यही बात मालूम कर लो कि वो भस्म कहाँ से लाया था वो, बस गुत्थी सुलझने लगेगी!” उन्होंने कहा,

“ठीक है, मै आज फिर रवाना करता हूँ उसको!” मैंने कहा,

“एक बात और मालूम कर लेना” वो बोले,

“क्या?” मैंने पूछा,

“कि जब कैलाश की मौत हुई तो शूमी कहाँ थी उस वक़्त?” वो बोले,

“अरे हाँ! मै समझ गया! सही जगह तीर मारा आपने, वाह!” मैंने कहा,

“इससे दो बातें और साबित हो जायेंगी, पहला कि शूमी को किसने बताया कि कैलाश की मौत हुई है, और दूसरा ये कि शूमी किसके साथ गयी थी वहाँ, अगर घर पर ही थी तो?” उन्होंने कहा,

बहुत दूर खेल खेला था शर्मा जी ने, एक तीर और दो शिकार!

 

मै उसी रात क्रिया में बैठ गया, मैंने फिर अपना खबीस हाज़िर किया, तातार-खबीस! और उसको उसका लक्ष्य बताया, उसको पहले कुछ सवाल बताये और फिर फिर उसको रवाना किया! तातार-खबीस उड़ चला! वो कोई आधे घंटे में वापिस आया, अपने साथ कमाल की जानकारी लेकर! अब उसने जो बताया वो सच में हैरान कर देने वाला ही था!

मित्रगण! हमने जो अभी तक अनुमान लगाया था, सच्चाई उस से भी परे थे! कैलाश की मौत अवश्य हुई थी, शूमी से पहले, कोई शक नहीं! लेकिन कैलाश की मौत एक दिन पहले नहीं, बल्कि तीन दिन पहले हुई थी, और वो भी उसकी मौत स्वाभाविक ही थी, प्राकृतिक मौत! किसी का कोई हाथ नहीं था उसमे! हाँ शर्मा जी का जो ये शक था कि क़त्ल का कारण ज़मीन ही है, ये सही था! क़त्ल का कारण वो ज़मीन ही थी! कहानी कुछ ऐसे थी,

शूमी अपने परिवार में अकेली संतान थी, शूमी का चरित्र सही नहीं था, उसके कई और लोगों से भी अवैध सम्बन्ध थे, वो जहां काम करती थी वहाँ भी उसके अवैध सम्बन्ध थे, शूमी की पहली शादी तीन साल पहले हुई थी, वो ब्याह कर जब अपनी ससुराल गयी थी तब उसके पति का स्वास्थ्य खराब होना आरम्भ हुआ था, और कोई छह महीनों के बाद उसके पति का देहांत हो गया, ससुराल वालों ने इसका कारण शूमी को माना और उसको वापिस उसके घर भेज दिया, वहाँ शूमी के जाने के बाद शूमी के पिता की देखभाल उसके चाचा के लड़के शिवदत्त ही


   
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श्रीशः उपदंडक
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करता था, उद्देश्य केवल ज़मीन का अधिकारी होना ही था, शूमी का पिता अधिक जीने वाला नहीं था, हद से हद मात्र एक साल! शूमी वापिस आई तो उसका पिता अब अपने घर में ही शूमी का मोहताज हो गया, शिवदत्त ने जब ये देखा कि उसका ताऊ उसके हाथ से निकल रहा है तो उसको घबराहट सी हुई! ज़मीन उसके हाथ से निकल रही थी! वो अब शूमी के अधिकार में आने वाली थी, और शूमी जहां ब्याह करेगी, हो सकता है कि वो कि कल को शूमी उसके नाम ही न कर दे? अब क्या हो?

खैर, उसने फिर भी प्रतीक्षा करना उचित समझा,

थोडा समय बीता, करीब सात महीने, वहाँ कैलाश के सम्बन्ध शूमी से बने और शूमी ने भी इसको स्वीकार कर लिया! धीरे धीरे कैलास के और करीब आती गयी शूमी, वहाँ कैलाश को भी अपनी कमी पूरी करने का अवसर मिल गया, और एक दिन कैलाश ने शूमी से शादी ही कर ली, शूमी के पिता ने कोई विरोध नहीं किया इसका, वो करता भी कैसे? वो बेचारा मोहताज था चाकरी का, अब शिवदत्त को मौका मिला, और फिर एक दिन शिवदत्त ने ज़मीन अपने नाम करवा ही ली!

शूमी को इसका पता नहीं चल सका और शूमी वहाँ अपने पति के यहाँ खुश थी! कैलाश रंगीला आदमी था! शराब का शौकीन था! शूमी को पता लग गया था पहले ही कि शूमी के अतिरिक्त कैलाश की एक और बीवी भी है जो कहीं और रहती है अपने लड़कों के साथ, लेकिन उनका कोई सम्बन्ध नहीं है कैलाश से, सो अगर भविष्य में शूमी के संतान होती है तो उसके निर्वाह हेतु कैलाश को उसकी कहती की ज़मीन और घर उसके नाम करना ही होगा, ये बात शूमी ने कैलाश से कही और उसको ‘दूर’ रखने की कोशिश की, रंगीले कैलाश से ये सहा न जाता, आखिर उसने ये बात उसकी मान ही ली और वो खेत की ज़मीन और घर नाम करा दिए शूमी के! अपनी आदत से मजबूर हो गया था कैलाश! अब किस्मत की चाल देखिये, कैलाश का बड़ा लड़का सुदीप और शिवदत्त एक ही सीमेंट फैक्ट्री में काम करते थे! और अच्छे मित्र भी थी! एक दिन शूमी के बारे में पता चला सुदीप को इस शिवदत्त से, सुदीप ने ये बात बताई अपने घर में! सुदीप की भड़की! आखिर एक दिन वो अपने दोनों लड़कों के साथ आई कैलाश के यहाँ, और उस से पूछा, ज़मीन के बारे में और अपने बेटों के हक के बारे में, कैलाश ने सबकुछ बता दिया, अब सुदीप के लड़कों को काटो तो खून नहीं!

और फिर रची गयी एक भयानक साजिश! साजिश शूमी को मारने की, उसकी हत्या करने की! लेकिन कोई मौका हाथ नहीं मिला उन्हें, दिन और रात की नींद उड़ गयी उनकी! फिर एक बार रात के समय कैलाश की तबियत बिगड़ी, अतिसार हुआ उसे और पास में ही दाखिल करवाया गया उसको, लेकिन तीन दिनों के बाद कैलाश की मौत हो गयी, अपने बाप की मौत पर कैलाश


   
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श्रीशः उपदंडक
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के लड़के भी आये और बड़े लड़के ने सुदीप ने ही दाह-संस्कार किया उसका, शूमी अब फिर से अकेली थी, लेकिन अब वो कैलाश की सारी संपत्ति की स्वामिनी अवश्य बन गयी थी! ये बात कैलाश की पहली पत्नी को नागवार गुजर रही थी, वो जल्द से जल्द उस कार्य को अंजाम देना चाहते थे जिस से शूमी का पत्ता साफ़ हो और वो उसकी संपत्ति के वारिस हों!

मै वहाँ से उठा अब! दिमाग में धांय धांय मची थी! अनेकों प्रश्न उभर रहे थे! मै अब शर्मा जी से इस विषय पर चर्चा करना चाहता था! अतः मै उनके पास चला आया और सारे घटनाक्रम से अवगत करा दिया उनको!

सुनकर उन्होंने भी अपना सर पकड़ लिया!

 

ऐसे उनकी रस्म के अनुसार एक दिन शूमी अपने मैके गयी, ओर वहीँ रही कुछ दिन, इस बारे में कि शूमी अपने मैके आई हुई है, ये बात सुदीप को पता चली शिवदत्त से, उसकी आँखों में चमक आ गयी! ओर उसने मन ही मन एक भयानक निर्णय लिया ओर समय निश्चय कर लिया! जिस दिन शूमी अपने मैके से अपनी ससुराल के लिए निकली उसी दिन शूमी को सुदीप की योजना के अनुसार अगवा कर लिया गया! इसमें सुदीप, उसका छोटा भाई यदु ओर दो अन्य मित्र भी थे!ये सभी शूमी को अगवा कर के एक सुरक्षित जगह ले आये! उस के साथ दुर्व्यवहार भी हुआ ओर दुराचार भी, लेकिन शूमी न मानी मालिकाना हक छोड़ने के लिए, बस इसी बात पर सुदीप ने एक गंडासे से उसकी गर्दन काट दी ओर उसके टुकड़े कर दिए! ये टुकड़े उन्होंने एक बोरे में भरे फिर एक चादर में लपेटा ओर बरसाती नदी में फेंक दिया! जिस जगह उसको मारा गया था वो दीक्षानाथ के डेरे से केवल दो किलोमीटर ही दूर थी!

ये थी उस लाश की ओर उस लड़की शूमी की कहानी!

अब क्या किया जाए? पुलिस अपने पूरे जोर लगा रही होगी, कड़ियाँ जोड़ रही होगी! तब शर्मा जी ने सारी कहानी एक कागज़ पर लिख ली ओर अपने पास रख ली! हमने दीक्षानाथ से उस लाश के विषय में जानकारी लेने हेतु ओर रखने हेतु कह भी दिया ओर फिर उसके बाद हम अब वापिस भारत के लिए कूच कर गए अगले दिन! शर्मा जी ने एक बॉर्डर से पहले एक लिफाफा खरीदा ओर उसमे वो कागज़ डाल कर वहाँ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के लिए भेज दिया ओर हम लोग उसके बाद फिर अपने देश आ गए!

कोई दस दिनों बाद दीक्षानाथ का फ़ोन आया, सारे कातिल पकड़ लिए गए थे!

ये जानकार मुझे ओर शर्मा जी को बहुत संतोष हुआ! आखिर शूमी के हत्यारे अपनी सही जगह पहुँच ही गए थे!

ये थी उस लाश और उस लड़की शूमी की कहानी! !

---------------------साधुवाद! -----------------------

 

 


   
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