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वर्ष २०१६, कॉटेज नंबर नौ....एक अजीब घटना!

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श्रीशः उपदंडक
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हमारी गाड़ी मंदमंद रफ्तार से आगे बढ़े जा रही थी, बारिश पड़ रही थी, और गाड़ी के वाईपर लगातार अपना काम कर रहे थे, वक़्त भी करीब नौ का हो चुका था, सड़क पर यातायात काफी था, उनकी टेल-लाइट्स चमक रही थीं! एक दो जगह रुकने की कोशिश की थी लेकिन वहां भीड़ इतनी थी कि पता नहीं कब तो प्लेट सजे और कब खाना मिले! दोपहर से चले थे और अभी भी कम से कम तीन घंटे तो लग ही जाते! मैं गाड़ी की सुस्त सी रफ्तार में पीछे वाली सीट पर सो लिया था, सोया क्या, उनिंदा सा था! हमारे साथ एक नीरज साहब थे, नीरज साहब, अपना ज़मीन का कारोबार किया करते थे, एक ज़मीन खरीदी थी उन्होंने, वही दिखाने ले गए थे हमें, मौसम तो खैर तब भी खराब ही था, लेकिन बारिश ने ज़ोर चार बजे के बाद ही पकड़ा था, गाड़ी भी उनकी ही थी, बड़ी गाड़ी थी, इन्नोवा और हम आराम से वापिस हो रहे थे वहां से!
"गुरु जी?" बोले नीरज,
"हां?'' कहा मैंने,
"इस इतवार खाली हो क्या?" पूछा उन्होंने,
"कहां जाना है?" पूछा मैंने,
"धारू-हेड़ा के पास ही!" बोले वो,
"काम है कुछ?" पूछा मैंने,
"एक दफ्तर लिया है न?" बोले वो,
"ओहो! तो दावत!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"कितने बजे?" पूछा मैंने,
"जब आप कहो?" बोले वो,
"शाम को ठीक?" कहा मैंने,
"ठीक! क्यों जी?'' बोले वो, शहरयार जी से,
"हम तो साहब जहां कहोगे, चल लेंगे!" बोले वो,
"अच्छा जी?" कहा मैंने,
"और क्या?" बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"अब क्या बताएं!" बोले वो,
"बताने लायक भी है?" कहा मैंने,
"क्यों गिरेबान फाड़ो हो!" बोले वो,
हम हंस पड़े दोनों ही फिर!
और गाड़ी एक होटल के पास रोक ली गयी!
"कुछ लेना है?" बोले नीरज,
"है तो?" कहा मैंने,
"एक ही?" बोले वो,
"और क्या?'' कहा मैंने,
"ले आऊं!" बोले वो,
"तिहारी राजी!" बोले शहरयार जी,
"वैसे रंगीन मिज़ाज हैं ये!" पूछा मैंने,
"बिलकुल! इंद्रधनुष!" बोले वो,
"चल रहा है पता!" कहा मैंने,
"आ जाओ?" बोले वो,
और हम, उतर कर दौड़ते हुए अंदर चल पड़े! अंदर एक जगह देखी, और बैठ गए, मसालेदार वाला होटल था, तो ले लिया साथ में बढ़िया सा शोरबेदार सामान!
"बनाओ?" बोले वो,
''आप?" कहा उन्होंने,
"मैं बनाऊं?" कहा मैंने,
"बनाओ!" बोले वो,
और मैंने तीन गिलास में वो 'हसीना' उड़ेल दी!
"बारिश हो!" बोले नीरज,
"मौसम ऐसा हो!" बोले शहरयार,
"साथ में ये!" बोले गिलास उठाते हुए,
"और ये!" बोले शहरयार जी, एक खीरे का टुकड़ा उठाते हुए,
"तब क्या कहने!" बोले नीरज!
"वो देखो!" बोले नीरज,
हमने उधर ही देखा, वो दो कपल थे!
"तो क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"बारिश के मारे रुके हैं!" बोले शहरयार!
"पागल है साले!" बोले नीरज,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"अब साथ में मशाल, तो बारिश की क्या मज़ाल!" बोले वो,
"और जो मशाल बुझ ली हो?" बोले शहरयार!
"तब ठीक!" बोले वो,
"तो बुझ ली!" बोले वो,
और हम हंस पड़े तीनों ही!
"गुरु जी?" बोले नीरज,
"हां?" कहा मैंने,
"कुछ शौक़ रखते हो?" बोले वो,
"कैसा?" पूछा मैंने,
"चादरी! इनका मतलब!" बोले वो,
"अरे ना भाई!" कहा मैंने,
"सच्ची?" बोले वो,
"क्या ज़रूरत!" कहा मैंने,
"और आप?" पूछा शहरयार जी से,
"ना!" बोले वो,
"डर के मारे ना?" बोले वो,
"सच में ना!" बोले वो,
"रहने दो!" बोले वो,
"क्यों भाई?" बोले वो,
"लगता तो नहीं?" बोले वो,
"तो क्या जेब में 'गुब्बारा' लिए घूमता हूं मैं?" बोले वो,
मेरी हंसी छूटी!
"गुब्बारा?"" बोले नीरज.
"बाद में समझा दूंगा!" कहा उन्होंने,
"बनाओ जी!" बोले वो, और मैंने फिर से गिलास भर दिया!


   
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श्रीशः उपदंडक
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बाहर बिजली कड़की और अंदर 'हसीना' भड़की! मैंने पैग बना दिए थे, सिगरेट ली और धुआं छोड़ने लगा! सिगरेट भी नमी का शिकार होने लगी थी, उसकी जवानी की कड़कता को, मौसम की ठंडक पिघलाने लगी थी! लेकिन नमी वाली, ऐसी सिगरेट धुआं बड़ा ही अच्छा, गाढ़ा दिया करती है, वही हो रहा था!
"आज नहीं थमे ये!" बोले शहरयार जी,
"आप पहले गुब्बारा दिखाओ?" बोले वो,
"गुब्बारा?" बोले वो,
"हां, अभी तो बोले?" बोले वो,
मुझे हंसी आ गयी! मैं मंद मंद मुस्कुराने लगा!
"बाहर केमिस्ट से मिल जाएगा गुब्बारा!" बोले वो,
"ऐसा कौन सा गुब्बारा है जो केमिस्ट रखता है?" बोले वो,
"बस उसे बोलना गुब्बारा दे दो!" बोले वो,
"अब तो बता ही दो!" बोले वो,
और मैंने उन्हें बता दिया! सुनते ही अपनी सीट से ही उठ बैठे, ज़ोर से हंसी निकल गयी उनकी! शहरयार जी ने उन्हें इशारा किया बैठने का!
"भई क्या नाम रखा है!" बोले वो,
"ऐसे ही नाम हैं!" बोले वो,
"मजा आ गया!" बोले वो,
"हमारे साथ रहोगे तो मजा न आय?" बोले वो,
"चेला बना लो जी!" बोले वो,
"माफ़ करो!" बोले वो,
"क्यों?" बोले वो,
"चेला ही न बनावै बस!" बोले वो,
"हम ऐसे ना हैं!" बोले वो,
"चल जागी पता!" बोले वो,
"चलो जी!" बोले वो,
हमने खा-पी लिया, बारिश ने करवट न बदली बस!
"चलते हैं!" बोले वो,
"चलो!" बोले हम!
आये और गाड़ी में बैठ गए, मैंने रुमाल से सर पोंछ लिया! और फिर गाड़ी बढ़ने लगी आगे ही!
"इतवार आ जाओ बस!" बोले वो,
"आ जाएंगे!" बोले वो,
"बस फिर क्या!" बोले वो,
तो बातें करते हुए, मेरी आंख लग गयी, मैं तो लम्बा हो सो गया! और इस तरह करीब एक बजे हम घर जा पहुंचे!
इतवार भी आ लिया! और हम इतवार को गुड़गांव जा पहुंचे, यहां से हमारे साथ हो लिए नीरज जी! सामान इस बार दिल्ली से लिया था उन्होंने, ये ठीक किया था, और हम अब बढ़ चले आगे!
तो धारू-हेड़ा से पहले ही, कुछ अपार्टमेंट्स बने हैं, यहीं उन्होंने लिया है अपना ऑफिस, तो वहीं चल पड़े! पहुंच गए! सारा कमरा, केबिन्स, और 'नो डिस्टर्ब रूम' भी दिखा दिया! हम यहीं बैठे थे, टीवी आदि सभी का इंतज़ाम था!
उन्होंने फ़ोन किया, फ़ोन एक होटल वाले ने उठाया, उस से पहले ही कुछ सेटिंग कर रखी थी उन्होंने, वो सामान ले कर चल पड़ा था थोड़ी देर में ही!
"कोई लड़का नहीं है?' बोले शहरयार!
"आज छुट्टी है!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा उन्होंने,
"हां कहो तो बुला लूं?" बोले वो,
"लड़के को?" बोले वो,
"अरे ना!" बोले वो,
"फिर?" बोले वो,
"न समझे?" बोले वो,
"ओ भाई?" बोले शहरयार जी,
"क्या हुआ?'' बोले वो,
"क्यों यार दाग़ लगवाते हो इस उम्र में!" बोले वो,
"लो जी!" बोले वो,
"मान जाओ?" मैंने भी हवा दी,
"क़तई न!" बोले वो,
"हम भी कुछ सीख लें?" बोले नीरज जी,
"सीख लें?" बोले वो,
"हां?" बोले वो,
"बहन** और क्या सीखोगे? मुझे और बिगाड़ोगे!" बोले वो,
हंसने लगे हम तीनों ही!
"कैसे बिगाड़ेंगे?" पूछा उन्होंने,
"ज़ायक़ा!" बोले वो,
मैं चुप हो गया! अब ज़रूर ही कुछ फटने वाला था!
"ज़ायक़ा?" बोले नीरज जी,
"हां, और! और! तो मैं कहां से लाऊंगा?" बोले वो,
"बड़ी चिंता करी!" बोले वो,
"करनी पड़ै है!" बोले वो,
"हम मर गए क्या?" बोले वो,
"जो वक़्त पर न मिले?" बोले वो,
"मिलेंगे क्यों नहीं!" बोले वो,
"एक बात बताओ?" बोले वो,
"क्या?'' पूछा उन्होंने,
तभी बैल बजी, दरवाज़ा खुला ही था!
"आ जाओ?" बोले वो,
एक लड़का चला आया, सामान लाया था, एक पर्ची, आगे रख दी!
सामान एक तरफ रखा, और हज़ार का नोट दे दिया उस लड़के को! अलग से, एक सौ का नोट उसे पकड़ा दिया! लड़का खुश! और चला गया!
"कांच के गिलास हैं?" बोले वो,
"सब है, कांच भी है!" बोले नीरज,
मेरी हंसी छूटो फिर से!
"तुम सम्भालो कांच!" बोले वो,
"अरे हां, क्या कह रहे थे?'' बोले वो,
"अब क्या अब तो हवा बंद और झंडा डाउन!" बोले शहरयार जी!


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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"हैं? अभी से झंडा डाउन?" बोले वो,
"और क्या!" बोले वो,
"ये तो कोई बात न हुई?" बोले वो,
"आज़ादी मिल गयी, वन्दे मातरम्!" बोले वो,
"वन्दे मातरम् साहब!" कहा मैंने,
तभी नीरज जी का फ़ोन बजा! उन्होंने उठाया फोन! जैसे ही बात की कि हमें देखा! मैं समझ गया इस इस गुफ्तगू में हम भी मुब्तिला हैं या होंगे!
"मैरी!" बोले वो,
"लगाऊं?" बोले शहरयार जी,
"हां!" कहा मैंने,
"हां ठीक! आ जाओ!" बोले नीरज!
"कौन आ रहा है?" पूछा शहरयार ने!
"मैरी!" बोले वो,
"मैरी?" बोले वो,
"हां!" कहा उन्होंने,
"कौन साहिबा हैं और इस वक़्त कैसे आ रही हैं?" बोले वो,
"अपनी पार्टनर है!" बोले वो,
''अच्छा!" कहा मैंने,
"क्रिस्तान है क्या?" पूछा शहरयार ने,
"अरे नहीं!" बोले वो,
"तो इतने बजे?" कहा मैंने,
"समझ जाओ गुरु जी!" बोले वो,
"गुरु जी समझें न समझें! मैं समझ गया!" बोले शहरयार जी, धुआं उड़ाते हुए!
"क्या?'' कहा मैंने,
"साथ बैठेंगे?'' बोले वो,
"हां, थोड़ी देर!" बोले वो,
"फॉर्मल ही मीटिंग है क्या?" पूछा मैंने,
"दरअसल, मैरी को ही काम है, गुरु जी आपसे!" बोले वो,
"क्या काम?" पूछा मैंने,
"बता रही थी कुछ अजीब सा है उसके और परिवार के साथ!" बोले वो,
"क्या अजीब?'' पूछा मैंने,
"खुल के तो वो ही बताये!" बोले वो,
"शादी-शुदा हैं?" पूछा शहरयार ने,
"नहीं!" बोले वो,
"अरे? बड़ी तरक्की?" कहा मैंने,
"हां! अपने पिता के कारण!" बोले वो,
"तब शादी नहीं की!" कहा मैंने,
"अब वो जाने क्यों नहीं की!" बोले वो,
"आपकी पार्टनर ही हैं न?'' बोले शहरयार जी,
"हां, फाइनेंस भी करती हैं!" बोले वो,
"ओहो! पार्टी है!" बोले वो,
"समझ ही लो आप!" कहा उन्होंने,
"रहती कहां हैं?" पूछा मैंने,
"यही, गुड़गांव!" बोले वो,
"तब तो कुछ ही देर बस?" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"तब तक लपेट लो! क्यों नीरज? लपेट दें एक आद पैग?" बोले शहरयार जी,
"कमाल है साहब! हम तो आपके हुक्म के कारिंदे हैं!" बोले वो,
"बनाओ!" कहा मैंने,
"ये क्या मंगवाया?" बोले शहरयार,
"लॉलीपॉप चिकन की!" बोले वो,
"बढ़िया!" कहा मैंने,
"और लाओ, निकालूं!" बोले वो,
और सामान निकाल दिया उन्होंने! चिकन-सलामी, मटन-सलामी, फ्राइड और कबाब-टिक्के! प्याज और पेशावरी दही की चटनी, प्याज के लच्छे! नीम्बू और हरी चटनी! कुल मिलाकर, शानदार!
घंटी बजी फ़ोन की नीरज की, उन्होंने देखा और उठे!
"आया मैं!" बोले वो,
नैपकिन से हाथ साफ़ कर, चल दिए बाहर, शायद मैरी आ गयी थी, तो लेने गए थे उसको!
"गुरु जी! ये बड़े आदमियों के चोचले हैं! ये मैरी-चैरी! हम ठहरे फेरी वाले! ऐसे ही बनता है नोट! हमारी तरह नहीं, कि भाई, तेरा पर्स गिर गया, उठा ले!" बोले वो,
मैं हंस के रह गया!
और तब, सामने का दरवाज़ा खुला, नीरज जी, एक महिला के साथ अंदर आये, महिला ने, जींस, और लम्बा सा, बड़े बटनों वाला कोट पहना था! बाल छोटे से, कानों में, छल्ले ही छल्ले! आंखों में मोटा-मोटा लाइनर था शायद और लिपस्टिक ऐसी, कि अमावस की रात में भी चमक उठे!
"हैल्लो!" बोली वो सर को झटका देते हुए,
"नमस्कार!" कहा मैंने,
"बैठिये!" बोले नीरज,
और एक गिलास आगे कर दिया मैरी के, मैरी ने गिलास के ऊपर हाथ रखा और उंगली सरका ली उसमे, शफ़्फ़ाफ़ से कांच में उसकी उंगली इतरा उठी, और लम्बे से नाख़ून से गिलास की दीवार को खुरचने लगी!
"आज मौसम ठीक रहा!" बोली वो,
"हां, आप हो आये?" बोले नीरज,
"हां, शाम को ही!" बोली वो,
"और सब ठीक?" बोले वो,
''आल इज़ वेल! एज़ शुड बी!" बोली वो,
"परफेक्ट!" बोले वो,
"गुरु जी?" बोले वो,
"जी?" कहा मैंने,
"इनसे परिचय तो हो गया, अब ज़रा इनकी कुछ समस्या है, ज़रा देख लें?" बोले वो,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
"हां, बताएं?" कहा मैंने,
"नीरज?" बोली धीरे से,
"हां?" बोला वो,
और फिर


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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मैरी ने धीमे से कुछ कहा नीरज से, कुछ ज़्यादा ही धीमे से बोलै था, आवाज़ ज़रा सी भी इधर-उधर नहीं गयी! खैर, होगी कोई तिजारती बात, अब सौ बातें होती हे, कुछ तफ़सील की और कुछ फौरी तौर की! और फिर..
"वो गुरु जी?" बोले वो,
"हां?'' कहा मैंने,
"मैरी का पूछना है कि अभी बात बताएं या फिर कभी, किसी और रोज, हालांकि ये बात बेहद ज़रूरी है, जब भी आप कहो?" बोले वो,
"बेहतर है आप अभी बताएं मैरी?" कहा मैंने,
"ही, शुक्रिया!" बोली वो,
"कोई बात नहीं!" कहा मैंने,
और उधर, नीरज ने मेरा पैग बनाना शुरू कर दिया, मैरी का गिलास भी ले लिया और हम सभी के पैग बनने लगे!
"गुरु जी?" बोली वो,
"बताएं?" कहा मैंने,
"छोटे में ही बताती हूं!" बोली वो,
"जो ठीक लगे!" कहा मैंने,
"मेरे पिता जी, एक बड़े कारोबारी थे, करीब छह बरस पहले उनकी मृत्यु हुई, माता जी, जी अभी हैं और वो मेरे साथ ही रहती हैं!" बोली वो,
"अच्छा, और भाई आदि?" कहा मैंने,
"हां, एक भाई है, छोटा, राजन!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हम दिल्ली में ही पढ़े लिखे, अपने चाचा जी के घर पर ही, पिता जी का व्यवसाय काफी फैला हुआ था!" बोली वो,
"क्या व्यवसाय था?" पूछा मैंने,
"दवाओं का!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"खैर, हमें वसीयत मिली, वसीयत भी न कहें, मैंने तो ज़मीनी कारोबार में पैसा लगाया और सच में ही, अच्छा पैसा कमाया और कमा भी रही हूं!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"ये लीजिये!" बोले नीरज,
मैंने गिलास लिया, दो घूंट भरे और रख दिया!
"अब रहा भाई!" बोली वो,
"भाई शादीशुदा हैं?" पूछा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"यहीं रहते हैं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"उनका कारोबार अलग है?" पूछा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"अच्छा, तो समस्या किसके साथ है?" पूछा मैंने,
"भाई के साथ!" बोली वो,
"कैसी समस्या?" पूछा मैंने, 
"जी बताती हूं!" बोली वो,
और एक घूंट गिलास से लिया, रुमाल से गहरी लिपस्टिक बराबर की होंठों की फिर!
"भाई ने और मेरे चाचा जी के लड़के वरुण ने, लम्बी-चौड़ी ज़मीन ली है!" बोली वो,
"कहां?" पूछा मैंने,
"अल्मोड़ा के पास!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वहां उनका मन था कि कोई होटल आदि खोला जाए या रिसोर्ट आदि!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"दो साल पहले खोल भी लिया!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
"काम भी अच्छा चला!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वहां उन्होंने कॉटेज बनवा लिए!" बोली वो,
"सब अलग?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"हनी-मूनर्स के लिए!" बोले नीरज!
"कहते रहें!" कहा मैंने,
"बस! इसके बाद से मेरी भाभी शीना का जैसे मन ही बदल गया!" बोली वो,
"मन बदल गया?" पूछा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"समझाइये?" बोला मैं,
मतलब, शीना, या क्या कहूं कि एक सुशील महिला हैं, एक मध्यम-वर्गीय परिवार से संबंध रखती हैं!" बोली वो,
"क्या विवाह आपके भाई ने अपनी मर्ज़ी से किया था?" पूछा मैंने,
"जी, लव-मैरिज!" बोली वो,
"समझ आया!" कहा मैंने,
"अचानक से उनमे अजीब से बदलाव आने लगे हैं!" बोली वो,
"कैसे बदलाव?" पूछा मैंने,
"अपना कुछ ज़्यादा ही ख्याल रखना, शीशे के सामने बने रहना, अकेले ही गुनगुनाती रहती हैं!" बोली वो,
"कोई बाल-बच्चा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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बाल-बच्चा, ये मैंने जानबूझकर ही पूछा था, मुझे तो कोई समस्या नहीं लगती थी अभी तक, अक्सर ऐसा तो होता ही रहता है, कभी कभी व्यवहार में बदलाव आ ही जाता है, उसे हम कोई समस्या तो नहीं कह सकते!
"मैरी?" कहा मैंने,
"जी?" बोली वो,
"इसमें भला क्या समस्या?" पूछा मैंने,
"समस्या है सर!" बोली वो,
"अक्सर बदलाव, आज के ज़िंदगी में आ ही जाते हैं, अब सौ झमेले हैं जान को!" कहा मैंने,
"ठीक कहा जी!" बोले शहरयार जी,
"लेकिन समस्या एक के साथ हो तो समझ आती है न?" बोली वो,
अब मैं थोड़ा चौंका! 
"किसी और के साथ भी है?" पूछा मैंने,
"मैं अपनी ही कहती हूं!" बोली वो,
"आपके साथ समस्या?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"कैसी समस्या?" पूछा मैंने,
"गुरु जी?" बोली वो,
"कहिये?'' कहा मैंने,
"ये बात को डेढ़ साल पहले की होगी!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"नीरज जी?" बोली वो,
"हां! शहरयार जी? आइये ज़रा?" बोले वो,
"हां!" बोले वो और चल पड़े बाहर के लिए, अब मैं भांप गया कि ये समस्या कुछ अलग ही क़िस्म की रही है!
"बताएं?" कहा मैंने,
"गुरु जी, वो जगह बहुत शानदार है, जैसी कि अक्सर, पहाड़ों में हुआ करती है, प्रकृति का खूबसूरत नज़ारा और उस नज़ारे में बना ये, रिसोर्ट और रिसोर्ट में बने कुल बाइस कॉटेज!" बोली वो,
"बाइस कॉटेज?'' कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"इसका मतलब काफी लम्बा-चौड़ा है ये रिसोर्ट!" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"खैर, आगे बताएं?" बोला मैं,
"इन्हीं कॉटेज के बीच में एक कॉटेज है, कॉटेज नंबर नौ!" बोली वो,
"नौ?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"क्या ख़ास उसमे?" पूछा मैंने,
"एक ज़हर!" बोली वो,
"ज़हर?" मैं चौंका ये सुन!
"एक नशा!" बोली वो,
"कैसा नशा?" पूछा मैंने,
"एक आकर्षण!" बोली वो,
"ठीक, लेकिन कैसा?" पूछा मैंने,
"जो उस कॉटेज में एक रात गुजारता है, बार बार ये कॉटेज उसे, जैसे बुलाता है!" बोली वो,
"अच्छा?" कहा मैंने,
"हां!" बोली वो,
"ऐसे और कौन कौन हैं?" पूछा मैंने,
"मेरे अलावा, शीना, और शीना की छोटी बहन, लीना!" बोली वो,
"और भी?" कहा मैंने,
"हां!" कहा उसने,
"क्या औरतें ही?" पूछा मैंने,
"आदमी भी!" बोली वो,
"बड़ी अजीब सी बात है!" कहा मैंने,
''हां!" बोली वो,
"होता क्या है?" पूछा मैंने,
उसने एक अजीब सी निगाह से मुझे देखा, मुस्कुरा रही थी जब दूसरी तरफ देख रही थी, मेरी तरफ देखते ही गंभीर सी हो गयी!
"हां? क्या होता है?" पूछा मैंने,
नहीं बोली कुछ भी!
"मैरी?" कहा मैंने,
''जी?" बोली वो,
"मैंने कुछ पूछा!" कहा मैंने,
"ओह! सॉरी!" बोली वो,
"बताइये?" पूछा मैंने,
"वहां...मन करता है कि आप, किसी के साथ......कुछ कर रहे हैं! आपको, आनंद मिल रहा है! ऐसा आनंद, जिसके लिए आपने हमेशा से ही कामना की है!" बोली वो,
"कामसुख?" बोला मैं,
"हां, यही!" बोली वो,
"लेकिन ये, आपके अपने विचार भी तो हो सकते हैं? आपकी अपनी ही अनुभूति?'' कहा मैंने,
"हां, सम्भव है, लेकिन वहां नहीं!" बोली वो,
"और वहां, कैसे नहीं?" पूछा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"चूंकि आप अभी मेरे समक्ष हैं, अतः आपसे प्रश्न करना उचित भी है और इस से मुझे भी मदद मिलेगी, उम्मीद है, आप बिन संकोच के मेरे प्रश्नों का उत्तर दोगी?'' कहा मैंने,
"क्यों नहीं सर! ज़रूर!" बोली वो,
"खैर, मेरा ये प्रश्न कुछ अलग सा या फूहड़ सा लगे तो आप मुझे वहीं टोक सकती हैं, मेरा प्रश्न ये है, कि आप शादीशुदा नहीं है, परन्तु क्या आपने पुरुष-गमन किया है?'' पूछा मैंने,
"हां, किया है!" बोली वो,
"शुक्रिया आपके स्पष्ट उत्तर के लिए, दूसरा प्रश्न, ये 'कामसुख' भिन्न भिन्न स्त्री पुरुषों में एक जैसी नहीं होती, अर्थात किसी को कुछ अच्छा लगता है और किसी को कुछ..." कहा मैंने,
"एक मिनट, मैं समझी नहीं?" बोली वो,
"अर्थ ये हुआ, कि यदि पुरुष स्त्री का चुंबन लेना चाहे और स्त्री उसे मना करे तब पुरुष का मन कुछ खिन्न सा हो जाएगा, वो समरसता नहीं निभा पायेगा, ऐसे ही स्त्री भी कुछ अपेक्षा रखती है!" कहा मैंने,
"हां, ये तो सच है!" बोली वो,
"तब क्या, ये 'कामसुख' उस कॉटेज में आपको, किसी पुरुष साथी के संग प्राप्त हुई थी?'' पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"तब?" पूछा मैंने,
"अकेले ही!" बोली वो,
"अकेले ही?'' कहा मैंने,
"हां!" बोली वो,
अब यहां कुछ घुमाव था इस घटना में!
"अकेले का अर्थ, मंद मंद आनंद?" कहा मैंने,
"हां!" बोली वो,
"या फिर विचार ही?" कहा मैंने,
"दोनों ही!" बोली वो,
"और ये आनंद कहां तक पहुंचता है?'' पूछा मैंने,
"चरम तक!" बोली वो,
"चरम को कैसे समझूं?" बोला मैं,
"ऑर्गज़्म तक!" बोली वो,
"क्या कहती है?" कहा मैंने, मैं तो अवाक था!
"सच में!" बोली वो,
"और यदि मैं पूछूं कि आप रात भर उस कॉटेज में रहीं तब ये चरम, अंत में होता है?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"कई बार!" बोली वो,
"बार बार?" पूछा मैंने,
"हां मल्टीप्ल टाइम्स!" बोली वो,
"और ऐसा सिर्फ उसी कॉटेज नंबर नौ में होता है?" कहा मैंने,
"हां!" बोली वो,
"ये कोई सेक्सुअल-डिसऑर्डर तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"सलाह ली?" पूछा मैंने,
"बिलकुल ली!" बोली वो,
''और वहां जो ही स्त्री ठहरती है या आती हैं, सभी के साथ होता है?" पूछा मैंने,
"हां!" बोली वो,
 ये तो अजीब ही बात थी! न ऐसा सुना और न ही जाना!
"कोई और अनुभव?" पूछा मैंने,
"मैं दो बार ठहरी!" बोली वो,
"दोनों बार ऐसा हुआ?" पूछा मैंने,
"हां!" बोली वो,
"फिर आप नहीं गयीं?'' पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"शायद, शर्म के कारण?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?'' कहा मैंने,
"आदत के कारण!" बोली वो,
"क्या आदत भी लग सकती है?" पूछा मैंने,
"हां!" कहा उसने,
"कमाल है!" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"कोई पुरुष साथी है जो गया हो आपके साथ?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"कोई और?'' पूछा मैंने,
"हां?" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"नीरज!" बोले वो,
"ये गए थे?'' पूछा मैंने,
"हां!" बोली वो,
"तब तो इन्हीं से पूछ लूंगा!" कहा मैंने,
"बता देंगे!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
"एक बात और!" बोली वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"आप ज़रा नीरज को भेज दें यहां, अगर बुरा न लगे तो?" कहा मैंने,
"बुरा कैसे सर, अभी लीजिये!" बोली वो,
और इठलाते हुए, अपने कपड़े ठीक करते हुए, चली गयी बाहर, बाहर एक गेस्ट-रूम था, वहीँ बैठे थे वे सभी!
मैं ज़रा हैरतज़दा था, भला ऐसा क्या हो सकता है? एक के साथ ही हो तो माना भी जाए, लेकिन यहां तो उसने कई नाम गिना दिए, उसने कुछ विशेष बात बतानी थी मुझे, मैं वो बाद में सुनता, पहले ज़रा नीरज से बात हो जाए!
तो अंदर चले आये नीरज!
"जी गुरु जी!" बोले वो,
"ये क्या बता रही हैं?" पूछा मैंने,
"एकदम सही!" बोले वो,
"क्या ऐसा हो रहा है?" पूछा मैंने,
"बिलकुल हो रहा है!" बोला वो,
"आपके साथ क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"वही सब, जो नहीं होना चाहिए!" बोला वो,
"क्या समझूं?" बोला मैं,
"रेस से पहले ही टायर पंक्चर!" बोले वो,
"साथ में कौन थी?" पूछा मैंने,
"ले गया था किसी को!" बोला वो,
"कुछ आपके साथ ही हुआ या फिर आपकी सहयोगी के साथ भी?" पूछा मैंने,
"जी, दोपहर में तो हमारे बीच बढ़िया रहा सब, रात को, अजीब सा ही हुआ था, मुझे याद है, मेरा मन कर भी रहा था और नहीं भी, और इसी बीच रस्सी टूट गयी, और उधर, जो मेरे साथ चली थी, उसका बुरा हाल हुआ, सुबह तक, चार बार उसको 'चोट' पहुंची!" बोले वो,
"चार बार?" बोला मैं,
"हां जी!" कहा उन्होंने,
"और आपको?" पूछा मैंने,
"क्या बताऊं?" बोला वो,
"बताइये?" कहा मैंने,
"यूं मानिये की बस अब चक्कर ही आना शेष हो!" बोले वो,
मेरी हंसी निकल गयी! वे भी हंस पड़े!
"ऐसी हालत?" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
"कुछ खाने-पीने से तो नहीं?" पूछा मैंने,
"कुछ नहीं खाया पिया जी!" बोला वो,
"कुछ पानी आदि वहां का?" पूछा मैंने,
"नहीं जी! और तो और?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"सुन्न! समझ गए न आप?" बोले वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"मंद मंद गुदगुदी सी, लगे अब हुआ कुछ और अब हुआ कुछ, बड़ा ही बुरा हाल, मैं तो फिर नहीं गया उधर!" बोला वो,
"लीना को देखा है आपने?" पूछा मैंने,
"हां?" बोले वो,
"वो वहीँ आती रहती है?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"और राजन के साथ उसका संबंध?" पूछा मैंने,
"सब ठीक ही है!" बोला वो,
"मेरा मतलब दैहिक?" कहा मैंने,
"ये तो राजन ही बताये!" बोला वो,
"कोई और?'' पूछा मैंने,
"और का पता नहीं!" बोला वो,
"वैसे आपकी क्या राय है?" पूछा मैंने,
"नहीं अंदाज़ा जी!" बोले वो,
"एक काम करें?" बोले वो,
"क्या?'' बोले वो,
"कोई जानकार लड़की है?" पूछा मैंने,
"बहुत!" बोले वो,
"अरे यार!" कहा मैंने,
"वहां?" पूछा मैंने,
"वहां?" बोले वो,
"हां?" कहा मैंने,
"ढूंढना होगा, मिल ही जायेगी, काम बताइये?" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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''कोई विश्वास वाली?" कहा मैंने,
"पूरी कोशिश!" बोले वो!
"ठीक!" कहा मैंने,
"भेजूं मैरी को?" बोला वो,
"अरे हां! कुछ बताने वाली थीं मुझे वो!" कहा मैंने,
"जी, अभी!" बोले वो और उठ कर, चल दिए,
तभी अंदर शहरयार जी आ गए, जल्दी जल्दी मेरा और अपना गिलास बनाया, दो चार सलामी के पीस उन्होंने लिए, मुझे दिए, गिलास गटका और निकल लिए! मुझे हंसी आ गयी! रंग में भंग पड़ गया था उनके! इसीलिए कुछ बोले नहीं!
तभी अंदर चली आयी मैरी! आयी और बैठ गयी! रुमाल से अपना चेहरा साफ़ किया, गर्दन भी, तेज परफ्यूम की महक नथुनों में घुस गयी, शायद अभी फिर से लगा कर आयी थी वो, ये परफ्यूम टी-रोज़ की महक जैसा ही था, बड़ी कड़वी सी महक थी उसकी!
"मैरी?" कहा मैंने,
"हां, मैं बता रही थी कुछ!" बोली वो,
"हां, कहा था आपने!" बोला मैं,
"हां, मैं आपको कुछ बता रही थी, अजीब सा, शायद, लीना का दिमाग चल गया है!" बोली वो,
"ऐसा क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"लेकिन गुरु जी?" बोली वो,
"हां?" कहा मैंने,
"जो कुछ लीना ने बताया, वो मेरी एक और दोस्त ने भी बताया था?" बोली वो,
"बताया क्या था?" पूछा मैंने,
"जो मेरी दोस्त है, अपने हस्बैंड के साथ, वहीँ ठहरी थी..!" बोली वो,
"कॉटेज नंबर नौ?" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"ग्यारह!" बोली वो,
"कितनी दूर दोनों एक दूसरे से?" पूछा मैंने,
"ज़्यादा नहीं कुछ दो सौ मीटर?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"उसने बताया कि रात का करीब ढाई बजा होगा! उसे अपने  कमरे में कुछ अलक़त सी महसूस हुई!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वो उठी, और उसने पानी पीने के लिए, जग उठाया!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
"तभी उसे लगा कि कोई गाड़ी, कार पीछे आ कर रुकी हो!" बोली वो,
"रिसोर्ट है, लोग तो कभी भी आ सकते हैं?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
और मैंने अपना गिलास खींच लिया एक झटके से ही!
"गाड़ी में से आवाज़ बड़ी तेज तेज आ रही थी!" बोली वो,
"कैसे आवाज़?" पूछा मैंने,
"इंजन की!" बोली वो,
"शायद बिगड़ गया होगा?" पूछा मैंने,
"तो वो यही देखने के लिए खिड़की तक पहुंची!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
''उसने बाहर झांका!" बोली वो,
"क्या दिखा?" पूछा मैंने,
"एक गाड़ी!" बोली वो,
"कैसी?" पूछा मैंने,
"सन सत्तर की सी, फ़िएट पद्मिनी जैसी!" बोली वो,
"जैसी या वही?" पूछा मैंने,
"वही, घीए रंग की!" बोली वो,
"होगी किसी शौक़िया इंसान की!" कहा मैंने,
"लेकिन एक अजीब बात!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"गाड़ी में से न कोई उतरा, न कोई चढ़ा!" बोली वो,
"तो पहले उतर या चढ़ गए होंगे?" कहा मैंने,
"नहीं पता!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"जब गाड़ी खड़ी थी, तो उसकी हेड-लाइट्स जली थीं, और पीछे की हल्की सी लाल रौशनी बता रही थीं कि बैक-लाइट्स भी जल रही होंगी!" बोली वो,
"हां, बेशक!" कहा मैंने,
"लेकिन गाड़ी के अंदर अंधेरा था!" बोली वो,
"तो क्या?" पूछा मैंने,
"कुछ देर बार, गाड़ी आगे गयी, और तेजी से घूम कर वापिस हुई! अभी करीब सौ मीटर ही चली होगी कि, आवाज़ बंद! कोई बत्ती नहीं, कोई शोर नहीं!" बोली वो,
"शायद कहीं मुड़ गयी हो?" पूछा मैंने,
"कोई रास्ता नहीं!" बोली वो,
"किसी कॉटेज के सामने रुकी हो?" कहा मैंने,
"सभी बंद रहते हैं!" बोली वो,
"मतलब, बंद? मतलब?" पूछा मैंने,
"हर एक कॉटेज, जहां कोई ठहरता है, वहां, एक गार्ड की ड्यूटी उस रात लगती है!" बोली वो,
"समझा! आपका मतलब...?" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"तो उस रात भी एक गार्ड ड्यूटी पर था!" बोली वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"हम आ जाएं?" बोले शहरयार!
"हां, आ जाइये!" कहा मैंने,
वे अब बैठ गए थे, मेरा दिमाग अभी भी कॉटेज में ही घूम रहा था! ये बात अभी तक मेरी समझ से बाहर ही थी! गाड़ी को तूल देना कोई समझदारी नहीं बनती थी अभी! वो महज़ एक गाड़ी भी हो सकती है, और फिर यहां कोई चश्मदीद इंसान भी नहीं था कि जिस से मालूमात चल सके!
"तो गुरु जी?" बोला नीरज,
"हां?" कहा मैंने,
"क्या लगता है?" बोला वो,
"कुछ नहीं कह सकता!" कहा मैंने,
"ऐसा न कहिये!" बोले वो,
"सच में ही!" कहा मैंने,
"गुरु जी?" बोली वो,
"हां?" कहा मैंने,
"जैसा भाई साहब को शुबह हुआ कुछ तब उन्होंने भी सलाह ली थी!" बोले वो,
"किस से?"
"जो भी, जिसने बताया?" बोली वो,
''आपका मतलब पूजा-पाठ?" कहा मैंने,
"हां!" कहा उसने,
"तो उस से कुछ हुआ?" पूछा मैंने,
"कहां होता है गुरु जी!" बोली वो,
"पंडित जी, लाख रूपये का बिल बना, ले गए!" बोली वो,
"सो तो है!" बोले अब शहरयार,
"क्या करें!" बोली वो,
"कोई दूसरी पूजा नहीं करवाई?" पूछा शहरयार जी ने,
"करवाई!" बोली वो,
"उस से लाभ?" बोला मैं,
"नहीं!" बोली वो,
"एक बात बताइये?" बोले शहरयार,
"जी?" बोली वो,
"जब ये ज़मीन खरीदी गयी, तब यहां क्या बना था?" पूछा उन्होंने,
"मुझे तो नहीं पता!" बोली वो,
"अब यही बात है न नीरज!" कहा उन्होंने,
"जी!" बोले वो,
"अब जब तक वहां न देख लें, नज़र न डाल लें, तब तक कैसे बताएं?" बोले वो,
"आदेश कीजिये?'' बोले नीरज,
"फिलहाल तो ये, कि आप एक बड़ा सा बजरंगी पैग बना दें!" बोले वो,
हंस पड़े हम सब!
"मेरा भी!" कहा मैंने,
"आप मोहतरमा?" पूछ शहरयार जी ने,
"ज़रूर!" बोली वो,
"बराबर ही?" बोले वो,
''जो आप चाहो!" बोली वो,
"अच्छा!" बोले वो,
और ऐसे पैग बनाये, कि अपुन बोतल में से थोड़ी ही रह गयी बोतल में! पैग खैर कड़वा तो होता, उसकी कड़वाहट खत्म करने के लिए, ज़रा सा नमक और मिर्च चाट लीजिये और गटक जाइये! या फिर आहिस्ता आहिस्ता धकेल लिए!
"ओ पहरवान बजरंगी पहरे लाल लंगोट, हलक़ उतरै, पानी बनै, करै पूरी चोट!" ये बोलते हुए, शहरयार जी ने तो पूरा गिलास गटक मारा!
"वाह जी!" कहा मैंने,
और मैंने भी हलक़ से नीचे उतार ली वो शोख़ हसीना!
"ये क्या मंत्र था?" बोले नीरज!
"था कुछ!" बोले वो,
"किसी और ने पी?" बोले वो,
"नहीं!" बोले वो,
"इतने में तो घुटने फेल मेरे!" बोले नीरज,
"हेवेन्स!" बोली मैरी!
"लो आप भी!" बोला मैं,
"ऐसे?" बोली वो,
"जैसे चाहो!" कहा मैंने,
उसने दो घूंट भरे, हल्के हल्के! शक्ल से पता चल गया कि गिलास में पड़ी हसीना उस से इक्कीस ही थी, मार गयी थी करंट!
"बताइये?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"आप आदेश करें?" बोली वो,
"वहां का?" पूछा मैंने,
"हां?" बोली वो,
"ये बताएंगे!" कहा मैंने,
"अभी तो....." बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"जी?'' बोली वो,
"मेरा मतलब, अभी तो समय है नहीं!" बोले वो,
"बाद में कब?" बोले नीरज,
"हफ्ता तो दीजिये, फिर बताता हूं!" बोले वो,
"एक हफ्ता?" बोले वो,
"अरे? तो क्या? लोग आएंगे, चस्का पालेंगे, दोबारा आएंगे! काम तो बढ़िया चलेगा और, चल भी रहा है!" बोले वो,
"चल ही तो नहीं रहा!" बोली वो,
"क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"राजन घर से थोड़ा परेशान है!" बोली वो,
"तो?" पूछा मैंने,
"तो अब वहां शायद, कुछ गलत काम होने लगे हैं!" बोले नीरज,
"गलत?" बोला मैं,
"जी, जैसे गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड?'' बोले वो,
"अगर आप इसे, बिज़नेस के नज़रिये से देखो तो?" कहा मैंने,
"प्रशासन सख्त है!" बोले वो,
"कहीं ऊंच-नीच हुई तो बुरा हाल होगा!" बोले वो,
"और फिर, जब, राजनैतिक लोग घुसने लगें तब आप समझ ही सकते हैं!" बोली वो,
"हां, ये तो सही बात है!" बोला मैं,
"यही कुछ चिंता है!" बोली वो,
"क्या कहते हो?" बोला मैं शहरयार से,
"अभी नहीं!" बोले वो,
"गुंजाइश नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"तो कैसे हो?" बोला मैं,
"मैं बता दूंगा!" कहा उन्होंने,
"इनको बता देना!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"थोड़ा जल्दी, साहब?" बोले नीरज!
''जितना हो सकेगा!" बोले वो,
और बाहर तभी बिजली सी कड़की!
"ये क्या? लाइट गयी क्या?" पूछा मैंने,
"नहीं जी! बारिश!" बोले नीरज जी,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"तो मैं चलती हूं!" बोली वो,
"खाना ले लेतीं?" बोले नीरज जी,
"घर पर बना होगा!" बोली वो,
"जो मर्ज़ी!" बोले वो,
"अच्छा गुरु जी, आप को भी, बहुत अच्छा लगा आपसे मिल कर, वक़्त का पता ही नहीं चला!" बोली,
"हमें भी!" कहा मैंने,
"जल्दी मिलेंगे! नमस्कार!" बोली वो,
"नमस्कार!" कहा हमने,
और नीरज जी, चले गए बाहर छोड़ने उसे! अपना गिलास आधा ही छोड़ दिया था, लाजिम था, झिलता नहीं उन्हें!
और फिर नीरज जी आ बैठे!
"अबे नीरज?" बोले शहरयार,
"जी साहब!" बोले वो,
"तुम भी दे आये सलामी?" बोले वो,
"कैसी सलामी!" बोले वो,
"क्यों?" पूछा उन्होंने,
"आप दे कर देखो!" बोले वो,
"क्यों मरवाते हो यार!" बोले वो,
"तो हमसे न पूछो!" बोले वो,
"अच्छा, होता क्या है?" पूछा मैंने,
"जी, 'मंद मंद गुदगुदी' सी और फिर.....!!" बोले वो,
"पिचकारी?" बोले शहरयार!
"बिलकुल!" बोले वो,
"उसी वक़्त?" बोले वो,
"किस वक़्त?" पूछा उन्होंने,
"किसी के साथ?" बोले वो,
"अरे नहीं, अकेले भी!" बोले वो,
"अरे राम!" बोले शहरयार!
"बुरा हाल!" बोले वो,
"वैसे साथ में कौन थी?" पूछा उन्होंने,
"बताऊंगा तो हरामी बोलोगे!" बोले वो,
"ना, ठरकी!" बोले वो,
हंसी छूट गयी सभी की!
"थी कोई!" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"खैर, वहां जो कुछ भी है, उसकी कुछ न कुछ वजह तो है ही!" कहा मैंने,
"अब सो तो है ही?" बोले शहरयार जी,
"क्या वजह हो सकती है?" बोले नीरज,
"ये तो आप बेहतर बता सको हो, आनंद भी तो आप ही ने लिया!" बोले शहरयार!
"ऐसा आनंद किस काम का!" बोले वो,
"ऐसा न बोलो!" बोले वो,
"एक काम करो आप?" बोले नीरज,
"क्या?" बोले वो,
"एक बार आनंद लेके देखो!" बोले वो,
"अकेले?" बोले शहरयार,
"अकेले क्यों?" बोले वो,
"फिर?" पूछा उन्होंने,
"आप देख लेना बस!" बोले वो,
"क्या देख लेना?" पूछा उन्होंने,
"साथी!" बोले वो,
"बचाओ भाई!" बोले वो,
"कमाल है!" बोले नीरज,
"और क्या? ऐसा करते हो जैसे जंग में 'संग' गंवा दिया हो!" बोले नीरज!
हम हंस पड़े इसी बात पर सभी! और एक एक पैग और खींच लिया गया इसी बीच!
"कोई वजह दिखती है?" बोले नीरज,
"कई वजूहात हैं!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"उस कॉटेज के आसपास, क्या वनस्पति लगी है?" पूछा मैंने,
"इतना नहीं पता!" कहा मैंने,
"बहुत खूब पकड़ा!" बोले शहरयार!
"उस से ऐसा हो सकता है?" बोले वो,
"केवड़े के पानी को, केले के साथ, सेंधा नमक लगा के खा जाओ!" बोले शहरयार!
"उस से क्या होगा?" पूछा नीरज ने,
"खाओ और देखो?" बोले वो,
"होगा क्या?" पूछा उन्होंने,
"चिपकनी बंद ही न हो!" बोले वो,
"चिपकनी?" बोले नीरज,
"नहीं जानते?" बोले वो,
"ना?" बोले वो,
"चैन!" बोले वो,
"चेन?" बोले वो,
"हां! समझ गए? ये!" बोले इशारे से!
"सच्ची?" बोले वो,
"झूठ न बोलूं!" बोले वो,
"छोड़ो यार!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"नीरज?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"पानी कैसा है वहां का?" पूछा मैंने,
"मिनरल वाटर!" बोले वो,
"ओह! समझा!" कहा मैंने,
"सभी बोतल का ही पीते हैं!" बताया उन्होंने,
"हां! आजकल तो!" बोले शहरयार!
"तब तो जाकर ही पता चले?" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"अच्छा?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"लीना का क्या मामला है?" पूछा मैंने,
''अजीब सा!" बोले वो,
"क्यों?" कहा मैंने,
"वो तो जैसे पागल हो गयी!" बोले वो,
"हैं?" पूछा मैंने,
"हां?" बोले वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"कॉटेज! कॉटेज!" बोले वो,
"हमेशा?" कहा मैंने,
"बिलकुल!" कहा उन्होंने,
"लगता है कि ज़्यादा ही 'आनंद' मिल गया उसे!" बोले शहरयार!
"हो सकता है!" बोले नीरज,
"और जो साली है इन मैरी के भाई की?" पूछा मैंने,
"वही सब!" बताया उन्होंने,
"एक चीज़ और?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"वहां ये सब अचानक होता है?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उन्होंने,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"जब 'तनाव' की स्थिति हो!" बोले वो,
"और फिर...वही?" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"ये तो सच में ही समस्या  है!" बोला मैं,
"अरे गुरु जी?" कहा उन्होंने,
"जी?" कहा मैंने,
"चलो एक बार तो देखी जाए!" बोले वो,
और सलामी का टुकड़ा तोड़ा, चटनी से लगाया, कुछ बूंदे टपकीं चटनी की, दूसरे हाथ में लीं, सलामी खायी और वो बूंदें चाट लीं!
मैंने भी टुकड़ा उठाया, उसे तोड़ा, भिगोया चटनी में, प्याज का लच्छा लिया और सीधे मुंह में रख लिया!
और फिर शहरयार जी ने भी ऐसा ही किया!
"प्याज, अजवाइन दमदार डाली है!" बोले वो,
"सारा खेल है, अदरक और लहसुन का!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"बढ़िया है जी!" बोले नीरज,
"हां! दो तरह की अदरक होती हैं, एक डवांडी, जो रेशे वाली होती है, और दूसरी देसी, छोटी लेकिन तीखी और मज़ेदार!" कहा मैंने,
"हां जी, देखी हैं!" बोले नीरज,
"देसी अदरक बड़े कमाल की!" कहा मैंने,
"आप बता दिया करो!" बोले नीरज,
"पौरुष हेतु?" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले नीरज,
शहरयार जी ने चश्मे के कोने से उनको देखा! मुस्कुरा गए!
"देसी अदरक का एक टुकड़ा, आधा इंच भर, आक का दूध, एक बून्द, कच्ची खांड, एक चुटकी और कलौंजी, दो दाने, भुने हुए, सुबह सुबह देसी पान के पत्ते में रख कर चबाइए! और देख तमाशा फरक्खाबादी फिर, पंद्रह दिन में ही!" बोला मैं,
"सच?" बोले वो,
"बिलकुल!" बोले शहरयार!
"और जो औरतों को कोई दोष हो, माहवारी का, तो अदरक का टुकड़ा, मधुमालती के चार फूलों के साथ, रात में चबाएं अगर तो कोई दोष ही न ठहरे!" कहा मैंने,
"भाई वाह!" बोले वो,
"खांड मिल जायेगी?" बोले वो,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"बस ठीक!" बोले वो,
"अरे तुम वहां की बताओ?" बोले शहरयार,
"मेरा एक दोस्त है!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वो भी गया था साथ!" बोले वो,
''वहीँ?" पूछा मैंने,
"कॉटेज नंबर नौ?" पूछा मैंने,
"ग्यारह!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"उसने भी किसी गाड़ी की आवाज़ तो सुनी थी!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"कोई ढाई बजे ही?" पूछा गया,
"हां, पुराने ज़माने के पी-पी-पौं-पौं हॉर्न!" बोले वो,
"देखा नहीं?" कहा मैंने,
"सोचा कोई टेम्पो होगा!" बोले वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"कोई आत्मा है क्या?" बोले नीरज,
"देखने से पता चले!" कहा मैंने,
"कोई ठरकी आत्मा!" बोले नीरज,
"कई कारण हैं!" कहा मैंने,
"लेकिन?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"साले मर्द क्यों वजन कम करते हैं?" बोले वो,
"यही तो बात है!" कहा मैंने,
"एक बात?" बोले शहरयार,
"जी?" बोले वो,
"कोई मर्द हुआ पागल?" पूछा उन्होंने,
"अच्छा सवाल है!" कहा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"ये है न कमाल!" बोला मैं,
"समझ ही नहीं आता!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
"जब कहो!" बोले वो,
"अरे अभी!" कहा मैंने,
"अभी?" बोले वो,
"मतलब घर चलें अब!" कहा मैंने,
"यहीं ठहरो?" बोले वो,
"अरे नहीं यार!" कहा मैंने,
"बातें होंगी!" बोले वो,
"क्या बोलते हो?" बोला मैं,
''आप देख लो?" बोले शहरयार,
"चलो फिर!" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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तो साहब, हम रात वहीँ रुक गए, खाना आदि भी हो गया था, अब नशे की झोंक थी तो अब सो जाना ही बेहतर था, बाहर बारिश अच्छी पड़ रही थी! खैर, हमारी बातचीत फिर भी रह रह कर, थोड़ी थोड़ी देर में होती ही रही! वैसे भी, नीरज जी ने अपनी ये ऐय्याशगाह बढ़िया ही बना रखी थी! अगर दौलत पास हो, खुल कर तब, तब ये एय्याशी, एय्याशी न हो आकर शौक़ हो जाती है! अक्सर दौलत और एय्याशी आपस में साथ साथ ही चलते हैं! दौलत की गर्मी जब चढ़ती है तब एय्याशी ही उसको कुछ राहत दिया करती है! एक ऐय्याश, अगर दौलतमंद हो, तो अपनी ऐय्याशगाह, हमेशा शानदार ही बनाता है, इतिहास इसका गवाह रहा है! और रही बात हमारे जैसों की, तो भैया, नंगा नहाये क्या, निचोड़े क्या, छिपाए क्या और छोड़े क्या!
"नीरज?" कहा मैंने,
"हां जी?" बोले वो,
"पागल होने से मैं क्या मतलब निकालूं?" कहा मैंने,
"सुध-बुध खोना!" बोले वो,
"बार बार कॉटेज नंबर नौ में आने की ज़िद करना?" पूछा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
"बस औरत ही?" पूछा मैंने,
"ज़्यादातर!" बोले वो,
"कमाल है!" बोले शहरयार!
सिगरेट की राख गिरायी और मुझे दे दी, मैंने सिगरेट ली, एक गहरा कश लिया, इतना गहरा कि रक्त-चाप ही बढ़ जाए!
"क्या कमाल?" पूछा मैंने,
"अगर कोई प्रेत ही है, कोई माया ही, तब सोचो जीते जी कैसी तबीयत वाला रहा होगा!" बोले वो,
"ये तो है ही!" कहा मैंने,
"एक बात समझ नहीं आयी?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"उस गाड़ी के बारे में मालूमात क्यों नहीं की?" पूछा उन्होंने,
"की होगी!" कहा मैंने,
"तो क्या निकला?" बोले वो,
"जा कर पता चले?" कहा मैंने,
"चलो, पांच-छह दिन रुको!" बोले वो,
"ठीक है!" कहा मैंने,
"तब तक तो पता नहीं कितने ही हल्के हो लेंगे!" बोले नीरज,
"तो होने दो!" कहा मैंने,
"लेने दो असीम आनंद!" बोले वो,
"आनंद की बताऊं अब?" बोले नीरज,
"बताओ?" कहा मैंने,
"ऐसा लगेगा कि जैसे 'तेज़ाब' सा भर दिया!" बोले वो,
"हैं?" बोले शहरयार!
"हां!" बोले वो,
"दर्द बेतहाशा!" बोले वो,
"ओह हो!" कहा मैंने,
"तो वो तो 'हद' से ज़्यादा होने पर ही ना?" बोले वो,
"हद अपने हाथ में हो, तब बात है न?" बोले वो,
"मतलब कि बे-रोक-टोक?" बोले वो,
"कभी भी!" बोले वो,
"ये तो बड़ी अजीब सी बात बताई?" कहा मैंने,
"एक बार गया था मैं, बस, हाथ रख लिए कान पर!" बोले वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"पांच-छह दिन तो ऐसा लगता है कि जैसे 'क्लोरोफॉर्म' ऐसी सूंघी कि बेहोशी ही न टूटे!" बोले नीरज जी!
"समझ गया!" कहा मैंने,
"अब घर पर देते रहो सफाई, खाते रहो सैंडोज़ दवा बता कर!" बोले वो,
मेरी हंसी छूटी! शहरयार ने एक हाथ की थाप लगाई कंधे पर उनके, हंसते हुए!
"सच बता रहा हूं!" बोले वो,
"समझ में आ गयी!" बोले शहरयार!
"बड़ा बुरा हाल होता है!" बोले वो,
"जब बता रहे हो तो होगा!" बोले वो,
"आप देखना खुद!" बोले वो,
"मैं?" बोले शहरयार!
"हां!" बोले वो,
"क्यों 'हरण' करवाते हो यार!" बोले वो,
"आजमाओगे नहीं?" बोले वो,
"आजमाएंगे!" कहा मैंने,
"ये?" बोले वो,
"बिलकुल!" कहा मैंने,
"तब गुरु जी आप पहले से ही इंतज़ाम रखना!" बोले वो,
"किस का?" पूछा मैंने,
"ग्लूकोन डी का, इलेक्टोरल का!" बोले वो,
"ऐसी भी क्या ज़रूरत?" बोले नीरज जी,
"जैसी बता रहे हो, उस हिसाब से तो ये भी कम है!" बोले वो,
"पैकेट दे देंगे!" बोले वो,
"किस काम का?" बोले वो,
उन्होंने त्यौरियां चढ़ाते हुए कुछ बताया! समझ आते ही हंसी के फव्वारे छूट पड़े! वे भी हंस पड़े!


   
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श्रीशः उपदंडक
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तो इस तरह हम बातें करते करते, नींद के आग़ोश में चले गए! फन्ना के सोये हम फिर! सुबह नींद खुली जल्दी ही, और नीरज जी को जगाया, हाथ-मुंह धोये, कुल्लादि कर वहां से निकल आये!
पांच-छह दिन कब गुजर गए, पता ही नहीं चल सका! सातवें दिन नीरज जी का फ़ोन आया तो तब तबीयत दुरुस्त हुई!
"अब कोई काम तो नहीं?" बोले शहरयार जी,
"नहीं!" कहा मैंने,
"वो नीरज का फ़ोन आया था!" बोले वो,
मेरी हंसी निकल आयी! वे समझ गए कि मेरे हंसने की वजह क्या है!
"तो पहलवान?" कहा मैंने,
"पहलवान?" बोले वो,
"हां! तैयार हो?" कहा मैंने,
"आपका मतलब, ज़ोर-आजमाइश से?" बोले वो,
"हां, कॉटेज नंबर नौ!" कहा मैंने,
"एक बात कहूं?" बोले वो,
"संजीदा हो?" कहा मैंने,
"मान लो!" बोले वो,
"तब कहो!" कहा मैंने,
"एक बार ज़रा सोचिये, कुछ, 'फुलक-फुलक' हो गयी, तो कैसे होगी?" बोले वो,
"कौन जानेगा!" कहा मैंने,
"यानि मरना ही है?" बोले वो,
"मरें आपके दुश्मन!" कहा मैंने,
"चलो जी! जैसे भली करेंगे राम!" बोले वो,
"अभी तो काम!" कहा मैंने,
"अपनी नज़रों में बदनाम!" बोले वो,
"बदले में इनाम!" कहा मैंने,
"नीरज को दो ये इनाम!" बोले वो,
"ले चुके हैं वो तो?" कहा मैंने,
"एक बार और सही!" कहा उन्होंने,
"जी नहीं भरा होगा?" कहा मैंने,
"किसका भरै है!" बोले वो,
"तो देखो फिर, चलें हम भी!" कहा मैंने,
"कहता हूं!" बोले वो,
उन्होंने तभी बात की, नीरज तैयार थे, एक बड़ी गाड़ी ले जाते वो, और भी कुछ पूछी उन्होंने!
"बोल रहा है कि कुछ 'शाही-सामान' ले जाना है?'' बोले वो,
''आप देखो?" कहा मैंने,
"मुझे तो ना चाहिए!" बोले वो,
"ज़रूरत पड़ी तो?" कहा मैंने,
"तब आप देखना?" बोले वो,
"ठीक है, जब मुझे ही देखना है, तो भूनो फिर भुट्टे!" कहा मैंने,
"हम तो उसमे भी राजी!" बोले वो,
खैर, शाही-सामान के लिए तो मना कर दी, कौन बेकार में मुसीबत मोल ले! और इस तरह दो दिन बाद का कार्यक्रम बन गया!
दो दिन बाद....
"तैयारी?" बोले वो,
"सब कर ली!" कहा मैंने,
"कोई सेवा?" बोले वो,
"अब वहीं!" बोला मैं,
उसी दिन शाम....
"प्रणाम जी!" बोले नीरज,
"प्रणाम!" कहा मैंने,
"ये गाड़ी में?" बोले शहरयार,
"मैरी!" बोले वो,
"कर दिया सत्यानाश!" बोले वो,
"क्यों?'' बोले वो,
"समझते तो हो यार!" बोले वो,
"कोई बात ही नहीं!" बोले नीरज,
तो शाम सात बजे, हम निकल लिए वहां के लिए! आराम आराम से, धीरे धीरे चलते रहे! राजन को बता ही दिया गया था सबकुछ! अच्छी बात ये थी, कि राजन की पत्नी और साली, वहीं मिलते हमें!
करीब दस बजे हमने खाना भी खा लिया! थोड़ा बहुत 'कड़वा-पानी' भी पी लिया, नींद अच्छी आ जाती! ज़रूरत होती, तो कहीं रुक जाते, आराम करते और फिर निकल पड़ते!
"आप पीछे आ जाओ?" बोली मैरी,
"हां!" बोले शहरयार!
और गाड़ी एक जगह रोक कर, उनको पीछे ले लिया हमने! मैरी अब सीट पर जा बैठी थी, यहीं से ही, स्टेयरिंग भी संभाल लिया था उसने!
"जो नींद लग जाए तो उठाना मत नीरज!" बोले शहरयार!
"आराम से सो जाओ!" बोले वो,
"आराम तो खैर कहां!" बोले वो,
मैंने भी सर पीछे लगा लिया और आंखें कर लीं बंद!


   
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श्रीशः उपदंडक
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रात को, हम एक जगह रुके, थोड़ी देर, मुरादाबाद में, थोड़ा आराम किया और फिर से चल पड़े! अब जगह शांत थी, रात का अंधेरा छाया ही हुआ था, नींद भी आ गयी! गाड़ी बीच में जहां भी रूकती, नींद खुल जाती थी!
तो हम सुबह से कुछ पहले, नैनीताल तक आ गए! ज़्यादा तेज चलाई नहीं थी, फिर बीच बीच में रुक भी जाते थे, नीरज जी ने यहां पर एक जगह रुकने का सोचा और हम रुक गए उधर ही! बेहद ही शानदार जगह थी, जहां रुके थे, वो नीरज जी के जानकार ही थे! तो हम फारिग आदि भी वहीं हो लिए थे नहा-धोकर, चाय-नाश्ता भी कर लिया था, कुछ देर आराम किया, रात को बची नींद पूरी कर मारी यहां!
मैरी ने भाई को फ़ोन कर ही दिया था, तो उसके फ़ोन भी लगातार आ रहे थे, हम बताते गए कि बस अब आये और अब आये! यहां से अल्मोड़ा करीब तिरेसठ या चौंसठ किलोमीटर पड़ता है! लेकिन गति धीमी है, तीस की मिल जाए तो भी बढ़िया ही मानो! आसपास की प्राकृतिक छटा ही मन मोह लेती है! आसमान में गहरे सफेद बादल भी किसी चित्र में उजले रंग के से लगते हैं! हरियाली ही हरियाली! मनमोहक वातावरण! खुला हुआ आकाश और छोटे छोटे से घर, शानदार बने हुए! बड़े बड़े से ऊंचे पेड़! उनके बीच से निकलती पगडंडियां और कुछ रास्ते, आप चाह कर भी नज़र नहीं फेर सकते!
और फिर हम एक संकरे से रास्ते पर जा निकले, आसपास में कुछ छोटे छोटे से तालाब थे, परिंदे बैठे हुए थे वहां, परिंदे भी इस स्वर्ग में अपना महत्व जतला रहे थे! उनके चटख रंग ऐसे शानदार ऐसे शानदार कि देखते ही बने!
"ऊपर की तरफ?" पूछा मैंने,
"हां!" बोली मैरी,
"यहीं हैं वो कॉटेज?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले नीरज,
"फिर?" पूछा मैंने,
"घर!" बोले वो,
"राजन के?" पूछा मैंने,
"हां!" बोले वो,
आधे में ही गए, कि एक गाड़ी मिली, गाड़ी में से हाथ निकला, हिलाया किसी ने, और गाड़ी आगे चल दी, हम पीछे लग लिए उसके!
"जगह तो बड़ी शानदार है!" बोले शहरयार जी,
"हां!" कहा मैंने,
"यहां तो बूढ़ा भी जवान हो जाए!" बोले वो,
"और जवान बूढ़ा!" बोले नीरज हंसते हुए!
"क्यों भाई?" पूछा उन्होंने,
"कॉटेज जा कर!" बोले वो,
"अच्छा!" बोले वो,
"क्यों मैरी?" बोले नीरज,
"हम्म!" बोली वो,
"लेकिन मैरी तो हां ही कहेंगी!" बोले वो,
"भाई के लिए?'' पूछा मैंने,
"साफ़ है!" कहा मैंने,
"आप अब देख लेना!" बोली मैरी!
"हां!" कहा मैंने,
तभी सामने जाती गाड़ी दाएं मुड़ गयी और चल दी सीधी ही!
"बड़ी अच्छी जगह हाथ मारा है भाई ने!" बोले शहरयार!
"ये पिता जी ने ली थी!" बोली वो,
"दूरदर्शी थे!" बोले वो,
"जी बिलकुल!" बोली वो,
"यहां से बाहर का रास्ता एक ही है?" पूछा उन्होंने,
"दूसरी तरफ से भी है!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा उन्होंने,
"उधर गांव हैं!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"पहाड़ी गांवों का भी अपना ही मजा है!" बोले वो,
"बिलकुल!" कहा मैंने,
"मेहनती लोग हैं!" बोले नीरज,
"सो तो है!" बोले वो,
और तभी सामने वाली गाड़ी एक खुली सी जगह बने, एक बड़े से, बंगले के पास जा रुकी! बड़ा ही बढ़िया बनाया हुआ था वो तो!
"अरे वाह!" बोले शहरयार,
"क्या बात है!" कहा मैंने,
"जगह हो तो ऐसी!" बोले वो,
"बिलकुल!" कहा मैंने,
"ये भाई ने ही लिया!" बोली वो,
"बढ़िया किया!" कहा उन्होंने,
"काम अभी भी चल रहा है!" बोली वो,
"चलता है तो बढ़िया!" बोले वो,
"आइये!" बोला नीरज,
एक जगह गाड़ी रुक गयी!
"हां!" कहा मैंने,
"चलो जी!" बोले शहरयार!
और हम उतर गए गाड़ी से, आसपास देखा हमने!


   
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