नित्य की भांति संध्या आ कर चली गयी थी, दिन में रहने वाली चहल-पहल अब घरों के अंदर जा बैठी थी! बाहर कुछ थे तो कुछ सामान लाते या कहीं दूर से आते जाते ही लोग! छोटा सा गांव था, दिनमे अक्सर लोग बाहर रहते हैं और संध्या समय अपने घरों में सिमट जाते हैं, घरों में से जलते चूल्हों का धुआं और प्रकाश ही आता है! गांव में से ऐसा ही एक घर था, घर था, बिजपाल का, बिजपाल का पूरा परिवार यहीं इसी गांव में पुश्तों से रहता आ रहा था, बिजपाल के एक बड़े भाई भी थे जो इस घर में, पीछे की तरफ रहते थे, उनकी कोई संतान न हो सकी थी, लिहाजा, बिजपाल की संतान ही उनकी अपनी संतान थी! बिजपाल के घर में उनकी पत्नी, एक लड़की राधा और एक बड़ा लड़का वासु था! घर की खेती थी, तो बिजपाल, उनके बड़े भाई और वासु, खेती ही किया करते थे! गांव बहुत ही सुंदर था उनका, हरा-भरा और एक छोटी सी नदी बहती थी गांव से थोड़ा दूर ही, जलापूर्ति या तो यहां से या फिर गांव के कुएं से ही हुआ करती थी!
फूंकनी की आवाज़ गूंज रही थी, चूल्हे में जलता उपला, उस हवा को पा और निखर जाता था, पीछे दीवार में बने आले में एक बड़ा सा दीया जल रहा था, कोई कोई कीट आता, उसके चक्कर लगाता, घायल होता और नीचे गिर, प्राण गंवा, इस कीट-योनि से मुक्ति प्राप्त कर लेता था!
मां ने थाली में, कुछ सब्जी रखी, रोटियां और कुछ मिर्च, अचार आदि और राधा को पकड़ाईं, राधा थाली ले अपने पिता जी को दे आयी! राधा, रूप-यौवन में खिली हुई थी, रूप ऐसा कि बांधा न जाए और यौवन ऐसा कि छिपाया न जाए! उसको देख देख, मां-बाप का जिगर सूखता था!
"तू यहीं बैठेगी?" पूछा मां ने,
"हां मां!" बोली वो,
"बैठ फिर, बरतन निकाल ले!" बोली मां,
उसने पास रखे बर्तनों में से एक थाली निकाल ली और मां के पास सरका दी, उसने देखा, कि उपले के नीचे से, एक मंझीरा निकला, वो उपला उठाया गया तब तो, और दूसरे उपले के नीचे चला गया, छिप रहा था, साथ कोई संगी-साथी नहीं था, आज शायद घर के सदस्यों से अनबन हो गयी थी तो छिटक आया था, राधा ने लकड़ी से दूसरा उपला भी सरका दिया, वो बेचारा, फिर से भागा और तीसरे के नीचे छिप गया, राधा ने, उसे भी हटा दिया, तब वो अपनी जान की खैर मना, दूर अंधेरे में ही दौड़ता-भागता चला गया! अब समझ आया था उसे कि संगी-साथी, घर का होना, बहुत अहम् होता है! अकेला रह तो ले, लेकिन जान को सौ मुसीबत, एक एक मुसीबत के सौ सौ फ़साने!
"वासु नहीं आया?" पूछा मां ने,
"आता होगा?" बोली वो,
"इतनी देर?" बोली मां,
"मिल गया होगा कोई मित्र!" बोली वो,
"या फिर भीड़ भी हो?" बोली मां,
"हां!" कहा उसने,
"परसों ही तो है? अब आया?" बोली मां,
"हां, परसों!" बोली तो चिंहुक उठी राधा!
परसों नागपंचमी का मेला था! मंदिर गया था वासु कुछ सामान देने, अब जो बन पड़ता, लोग दे ही आते थे!
''अरे? सुन?" बोली मां,
"हां?" कहा राधा ने,
"वो लड़की तुझे पसंद नहीं आयी?" पूछा मां ने,
"नहीं!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मां ने,
और थाली में सब्जी रखी, रोटियां और कुछ भी, दे दीं राधा को, राधा ने मारी चौकड़ी और रख ली थाली अपने घंटों पर!
"नाक चपटी है!" बोली वो,
"नहीं तो?" बोली मां,
"छोटी भी!" बोली राधा अब गस्सा खाते हुए,
"तेरी बड़ी है?" बोली मां,
तो हंस पड़ी राधा!
"अब घर तो बसना ही है राधा, वासु का!" बोली मां,
"बहुत मिलेंगी!" बोली वो,
''तू ढूंढेगी?" पूछा मां ने,
''ढूंढ दूंगी!" बोली वो,
"कब?" बोली मां,
"जब मिलेगी?" बोली वो,
"तब तक तो पक जाएगा वासु!" बोली मां,
"नहीं मां!" बोली राधा,
तभी बाहर का कपाट, खड़खड़ाया और वासु अंदर चला आया, अपना गमछा वहीँ बंधी रस्सी पर रखा और चला हाथ-मुंह धोने अपने!
वासु आ कर बैठ गया था, उसने भी चौकड़ी मार ली, माँ ने थाली तैयार कर रखी थी, सो ही परोस दी उसके आगे! वासु ने एक छोटा सा टुकड़ा रोटी से तोड़ा और उसे सब्जी से लगा, एक तरफ रख दिया! ऐसा करना घर के देवता को सम्मान देना होता है, उसका मान-सम्मान और भोग देना!
"आज देर कैसे हुई?" पूछा माँ ने,
"कहां देर माँ?" बोला वो,
"देर से नहीं आया तू?" पूछा माँ ने,
"अरे नहीं!" बोला वो,
"बता तो?" बोली माँ,
"तैयारी है न?'' बोला वो,
"तेरी माया तू जाने!" बोली माँ,
"मिल गए होंगे दोस्त!" बोली राधा,
राधा को एक मुस्कुराती हुई नज़र से भर के देखा उसने!
"है न?" बोली वो,
"तेरी तरह हूं?" बोला वो,
"मेरी तरह? कैसे?" बोली वो,
"और क्या? सहेलियों के संग जाती है, और आती कब है?" बोला वो,
"लो! सही वक़्त पर तो?" बोली वो,
"जानता हूं!" बोला वो,
"क्या जानते हो?" पूछा उसने,
"तू खाना खा!" बोला वो,
"नहीं? जवाब दे?" बोली वो,
"माँ?" बोला वो,
"हां?" बोली माँ,
"इसे बोल कि चुपचाप खाना खाये!" बोला वो, मुस्कुराते हुए,
"तुम हो गए शुरू फिर?" बोली माँ,
"ये बोल रहा है!" बोली वो,
"बच्चे नहीं हो!" बोली माँ,
और दूसरी रोटी, राधा की थाली में रख दी!
"इसे सब्जी दे माँ!" बोला वो,
"हां!" कहा माँ ने,
और छोटी देग से सब्जी निकाल, दे दी उसे!
"कैसी है तैयारी?" पूछा माँ ने,
"सब बढ़िया!" बोला वो,
"गरुआ(सपेरे) आये?" बोली माँ,
"हां, हुई बात!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा माँ ने,
"उनके लिए कुछ ले आया?" बोली राधा,
"हां है, ले आया!" बोला वो,
"क्या?" पूछा उसने,
"कुरता-धोती!" बोला वो,
"चल ठीक!" बोली माँ,
'और मेरे लिए?" बोली राधा,
"जानता था!" बोला वो,
"क्या?" पूछा राधा ने,
"यही पूछेगी!" बोला वो,
"गलत पूछा?" बोली वो,
"नहीं तो?" बोला वो,
"क्या लाया?" बोली वो,
"उधर रखा है!" बोला वो,
"सच में?" बोली वो,
"झूठ नहीं बोल रहा!" बोला वो,
"मेरा भाई!" बोली वो,
"मेरी बहन!" बोला हंसते हुए!
"क्या लाया?" पूछा माँ ने,
"तू देखना माँ!" बोला वो,
"क्या?'' बोली माँ,
"जब पहनेगी तो, राधा ही राधा दिखेगी!" बोला वो,
झेंप गयी राधा! और माँ हुई खुश!
"लाखों में एक है मेरी बेटी!" बोली माँ और उतार ली नज़र, चिमटे में उपले का जलता टुकड़ा उठा, घुमाते हुए राधा के ऊपर से!
"और माँ?" बोला वो,
"हां?" कहा माँ ने,
"हो सकता है, कोई पसंद ही कर ले!" बोला वो,
और खिलखिलाकर हंसने लगा! माँ भी हंसने लगी! और राधा, शरमा के रह गयी!
मित्रगण!
अब की बात नहीं है, अब तो ज़माना ही बदल गया है! पहले, पुराने समय में, तीज-त्यौहार अपनी अलग ही रौनक रखते थे! मेले, खरीदारी का इंतज़ार! साजोसामान, ज़रूरत की वस्तुएं! दंगल आदि, सब होता था, सब देसी था, खालिस देसी! अब नहीं लौटेगा वो समय! कभी नहीं! जो बीत गया सो बीत गया!
तो यहां गांव में, उस दिन से एक दिन बाद नाग-पंचमी का त्यौहार था, नागों का, सर्पों का भारतीय संस्कृति में एक अलग ही स्थान है! वे देवता हैं! पूजन होता है उनका! ऐसा ही पूजन था उस दिन गांव में, मंदिर में तैयारियां चल रही थीं! भोज होना था, लोगों को भोजन देना था, दान-दक्षिणा, और सपेरों को, सभी आवश्यक, दैनिक वस्तुएं! कपड़ा, वस्त्र, अन्न आदि आदि! जिस से जैसा बन पड़े, वो वैसा देता!
"हां वासु! अपने घर की हो जाए राधा तो मैं तो गंगा जी नहा जाऊं!" बोली माँ,
"मुझे भी ले जाना! कम से कम, इसकी नोंक-झोंक से तो बचना होगा!" बोला वो वो!
अगला दिन व्यस्तता में बीता! आज खेती के लिए पूरा समय नहीं था, अतः कोई नहीं गया था! गांव के पुरुषों ने, भट्टी, ईंधन के लिए लकड़ी, उबले और फूस सबका प्रबंध कर दिया था! मंदिर को खूब सजाया गया था, भोले बाबा तो आज चमक ही रहे थे, उनका स्थान विशेष रूप से सजाया गया था! गांव की महिलाओं और लड़कियों ने, झाड़ू-बुहारी की, जंगल, बाग़-बगीचे से लाये फूलों से मंदिर को सजाया था, खूबसूरत, रंगोलियां सजा दी गयी थीं! आज की रात मंदिर में विशेष पूजन था इसीलिए! राधा और वासु ने भी जी लगाकर हाथ बंटाया! रात को पूजन हुआ और थके हारे से कुछ लोग लौट आये और कुछ लोग वहीँ ठहर गए!
अगले दिन प्रातः से ही पूजन आरम्भ हुआ, और सभी ने हाथ बंटाया! मंदिर से थोड़ा आगे के मैदान में, मेला भरा जा रहा था, बच्चे व्याकुल हो रहे थे वहां जाने के लिए!
और फिर आये सपेरे, नाग दिखाए गए, भिन्न भिन्न प्रकार के, नए नए क़िस्म के सांप आज उस गांव के मेहमान बने थे! उन्हें दूध पिलाया गया! पूजा की गयी! दोपहर से कुछ पहले वो घर लौटी, स्नान किया भाई का लाया हुआ नया वस्त्र पहना! उसमे गोटे लगे थे, कांच के टुकड़े लगे थे, जब रौशनी पड़ती उन पर, तो झिलमिला जाते! आज अपने नसीब पर फूला न समा रहे थे वो! और राधा! वो तो आज सच में ही कोई नाग-कन्या सी लग रही थी! जिसने देखा, बस देखता ही रह गया! झिलमिलाते कांच की चमक जब चेहरे पर पड़ती तब, बदली से निकले सूरज की सी चौंध चेहरे पर जा झिलमिलाती! आंखों में पड़ती तो आंखों की सुंदरता और निखर आती!
मेले में जाने के लिए, वो अपनी तीन सहेलियों के संग निकली! माँ ने कुछ पैसे दिए थे, रख लिए थे बांध कर! मंदिर के समीप से गुजरी तो...
"बेटी?" आवाज़ आयी उसे,
रुक गयी, पलट के देखा,
"बेटी?" बोला वो,
एक बूढ़ा सपेरा था वो! कम से कम अस्सी बरस का, सूखा सा, झुकी कमर लिए, गला फूला हुआ था, बीन बजा बजा गले ने अब छुट्टी ले ली थी उसके!
"हां बाबा?" बोली वो,
"इधर आ?" बोला वो,
थोड़ा सा सकपका गयी, तीन वहीँ खड़ी रहीं और वो, बाबा के पास चली!
"हां बाबा?" बोली वो,
"किस की लड़की है तू?" पूछा उसने,
"बिजपाल की!" बोली वो,
"मानेगी?" बोला वो,
"क्या बाबा?" बोली वो,
"मेरा कहा?" बोला वो,
"क्या बाबा?" बोली वो,
उत्सुकता अब रंग पर थी!
"मेले में जा रही है?" पूछा उसने,
"हां!" बोली वो,
"लौट जा!" बोला वो,
"क्या?" चौंकी वो,
"हां!" बोला वो,
"क्या बाबा?" दोबारा पूछा,
"लौट जा!" बोला वो,
"घर?" बोली वो,
"हां!" बोला वो,
"क्यों बाबा?" पूछा उसने,
"नहीं मानेगी?" बोला वो,
"बताओ तो?" बोली वो,
"क्या करेगी?" बोला वो,
"आप बताओ?'' बोली वो,
"फूल को मत ढक!" बोला वो,
"क्या?" बोली वो,
"हां!" कहा उसने,
"फूल?" बोली वो,
"तू!" बोला बाबा,
"मत ढक?" बोली वो,
"हां!" कहा उसने,
"मुझे नहीं समझ आया?" बोली वो,
"कभी समझ नहीं आएगा!" बोला वो,
"क्या बाबा?" बोली वो,
"मत ढक!" कहा उसने,
"क्या?" पूछा उसने,
"लौट जा!" बोला वो,
अब राधा, सहेलियों को देखे कभी, कभी आते जाते लोगों को, कभी मेले से उठते शोर को सुने!
"मान जा!" बोला बाबा,
"लेकिन?" बोली वो,
"लौट जा!" बोला वो,
वो पीछे हटी!
"मान जा लड़की!" बोला बाबा,
"नहीं बाबा!" बोली वो,
बाबा हंसा, जब तक खांसी ने हंसी न रोक दी!
"जा?" बोला वो,
''नहीं!" कहा राधा ने,
"फिर रात न हटेगी!" बोला वो,
"रात?" बोली वो,
"हां! रात, लड़की!" बोला बाबा!
"मान जा लड़की!" बोला बाबा,
उसकी सहेलियां धीरे से आगे बढ़ीं, उसने बढ़ना चाहा, वो वृद्ध था, उसने जीवन के एक एक मनके को छुआ था, माला भी अब पूर्ण ही हो जाए कुछ पता नहीं, क्या करे? सुने? या आगे चली जाए? दुविधा में फंस के रह गयी राधा!
"ये रूप, ये यौवन, खट्टा हो लेगा!" बोला बाबा,
"क्या?" मन ही मन में सोचा उसने,
"हां, मनों दूध में दही की एक बून्द भी पड़े, तो खट्टा हो जाता है, क्यों अपने इस रूप और एवं से खेलती है? मानती क्यों नहीं?" बोला बाबा,
नहीं समझ आया राधा को अभी भी!
"तेरे लिए तो सीढ़ी से उतर कर देव आ जाएंगे लड़की! तेरा यौवन, रूप अनोखा है!" बोला बाबा,
"क्या बाबा?'' बोली वो,
"अनजान न बन?" बोला वो,
"नहीं!" बोली वो,
"याद करेगी!" बोला वो,
अब कुछ न बोली वो!
"मत जा! जो आगे जाए, सब गंवाय, जो पीछे जाय, सब ही पाय!" बोला सपेरा!
"नहीं बाबा!" बोली वो,
"तो सुन?" बोला बाबा,
"हां?" कहा अब मन ही मन में,
"तूने चुन लिया दुर्भाग्य! जा! अब भुगत! मैं कौन रोकने वाला! ढूंढेगी तो भी नहीं मिलूंगा, मिला तो भी अनजान रहूंगा, जा अब! समझाना था, समझा दिया, मानना तुझ पर था, तूने दुर्भाग्य चुना! ठीक! चला अब बाबा अपनी राह!" बोला बाबा,
लौटा पीछे, झुका, अपना झोला उठाया, फिर एक नज़र भी न देखा, आगे चला, मंदिर के प्रांगण में चला गया और फिर न लौटा!
"राधा?" बोली एक सहेली,
बिन कहे कुछ देखा राधा ने उसे,
"चल?" बोली वो,
चल पड़ी! सम्भवतः, उसने समझा ही नहीं!
"चल! बहुत मिलते हैं ऐसे बाबा, अब तेरा रूप ही ऐसा है!" बोली सहेली, एक चिकोटी सी काटते हुए!
राधा चली तो गयी, लेकिन मन में दुविधा पाल ली, सोचने लगी, वो अनजान सा बाबा, क्या क्या कहे जा रहा था? क्या अर्थ था उसका? इसी दुविधा में पड़े पड़े कब मेला आ गया, पता न चला, अनमने से मन से घूमने लगी सहेलियों के संग! जब दुविधा में मन फंस जाता है, तब, तन भी उसका साथ देने लगता है, थकावट, घबराहट, बेचैनी, व्यर्थ के विचार, सब के सब काले चेहरे वाले ये बंधु-बांधव, बांध्वियां आदि, कलुषित-परिवार के ये अदृश्य लोग, उत्सव सा मनाने लगते हैं, सो ही हुआ!
"तुम घूमो, मैं उधर हूं!" बोली राधा अपनी सहेलियों से,
"क्या हुआ?'' पूछा एक ने,
"कुछ नहीं!" बोली वो,
"भूख लगी है क्या?'' पूछा दूसरी ने,
"नहीं, ऐसे ही बस!" बोली वो,
"तो उस पेड़ के नीचे रहना?" बोली वो,
"हां, वहीँ हूं!" बोली राधा,
और चल पड़ी! रास्ते में रंग-बिरंगे से वस्त्र टंगे थे, स्त्रियों के श्रृंगार की वस्तुएं, बालकों के वस्त्रादि! कोई खिलौने बेक रहा था माटी और काठ के, कोई कुछ बेक रहा था और कोई कुछ!
पीछे कोई सपेरा खेल दिखा रहा था, बीन बज रही थी, लोगबाग घेर के खड़े थे उसे, उसके साथ ही नट लोग बैठे थे, कि कब सपेरा निबटे तो वे भी अपनी कला दिखाएं! एक जगह, कुछ माटी के बर्तन बिक रहे थे, एक वृद्धा सारा हिसाब-किताब रख रही थी, उसकी बहू, लोगों को सामान दिखा रही थी, वो आगे चली तो एक लुहार बैठा था, लोहा पीट रहा था, आज उसकी चांदी होनी थी, फसल के लिए औजार नए करने थे, कुछ खरीदे भी जाने थे! उस लुहार के बच्चे भी, राख से ही खेल रहे थे, पास में बैठे नंदी महोदय, जिनका आज श्रृंगार किया गया था, पूजन के लिए, आराम से जुगाली कर रहे थे, लोग अपने छोटे बालकों को उसके माथे से लगाते और कुछ एक आद पैसा, दे देते थे उसके मालिक को!
"आह?" अचानक से उसके मुंह से निकला!
उसने झुक कर देखा, सीधे पांव की एड़ी में कोई कांटा घुस गया था, उंगली फेर के देखी तो महसूस हुआ नहीं, आगे चली तो जैसे कांटा ऊपर क चढ़े, पल भर में ही चाल टेढ़ी सी हो गयी!
आसपास देखा, वो पेड़ था, वहीँ बैठ आराम से कांटा निकाल लिया जाए तो एड़ी उचकाते हुए वो पेड़ तक पहुंची, पेड़ की एक मोटी जड़ पर जा बैठी, एक घुटने पर दूसरा पांव रखा, खून निकलने लगा था, पता नहीं कांटा था या कोई लोहे का टुकड़ा, वो थी भी तो उस लुहार के सामने ही!
खूब तो कोशिश कि, न दिखा ही और न मिला ही, हां, सांसों के साथ खून ने दोस्ती गांठी, और हर सांस पर देह से बाहर निकल ताज़ा हवा खाने लगता! क्या करे? कोई सहेली भी तो नहीं? बड़ी बुरी ही गुजर रही थी!
कुछ पल, कुछ टटोलती रही...
"पीड़ा नहीं हो रही आपको?" आयी एक आवाज़,
उसने आसपास देखा, तो बाएं उसके उठे हुए पांव की तरफ एक नवयुवक खड़ा था, मज़बूत सा,गोरा-चिट्टा, ऊंची कद-काठी वाला, लाल था चेहरा उसका! मूंछें भारी थीं, चेहरा चौकोर सा, मज़बूत जबड़े वाला! देखने में कोई सपेरा जान पड़ता था! राधा ने झट से पांव नीचे रख लिया, लेकिन एड़ी नहीं टिकाई गयी तो पंजे पर पांव साध लिया!
"आपको पीड़ा हो रही है न?" पूछा उसने,
कोई जवाब नहीं दिया, मुंह फेर लिया राधा न, अनजान लोगों से इस तरह, मेले में बातें नहीं करनी चाहियें, ऐसा माँ ने चलने से पहले भी समझाया था, इसीलिए, बात नहीं की उसने!
"लहू बह रहा है!" बोला वो,
फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया, एक तो पीड़ा, ऊपर से ये और!
"कोई है आपके साथ?" बोला वो,
अब भी कोई उत्तर नहीं!
"कोई हो तो बुला लाऊं?'' बोला वो,
उसने मुंह फेर उसे देखा, वो सच में ही गंभीर सा दीखता था!
"बताइये? कोई है यहां? मैं बुला लाता हूं! कांटा निकल जाएगा, आप पीड़ा से मुक्त हो जाएंगी, बताइये?" बोला वो,
"कोई नहीं है!" बोली धीरे से,
"तब, क्या मैं निकाल दूं?" पूछा उसने,
"निकल जाएगा!" बोलीghraa वो,
"सूजन आ जायेगी, चला नहीं जाएगा!" बोला वो,
"आपको इतनी चिंता क्यों? आप अपने मार्ग पर बढ़िए?" बोली वो,
"मार्ग पर ही था, लहू देखा नहीं जाता, इसीलिए, रुक गया!" बोला वो,
कुछ भी कहो, उस युवक की बातों में न तो कोई तेजी ही थी, न कोई छिपा सा अर्थ, न ही कोई उपहास और न ही मर्यादा से अलग था वो!
"तो जाइये आप!" बोली वो,
"एक क्षण लगेगा!" बोला वो,
"कोई आवश्यकता नहीं!" बोली वो,
"आवश्यकता तो है!" बोला वो,
"तो?" बोली वो,
"मुझे कहिये, मैं निकाल दूंगा!" बोला वो,
"नहीं!" बोली वो,
"मान जाइये, मुझे लहू देखना अच्छा नहीं लगता!" बोला वो,
राधा ने उसको ऊपर से नीचे तक देखा, वो अच्छे घराने से लगता था, मेला देखने आया था शायद!
"एक क्षण?" बोली वो,
"हां, मात्र एक!" बोला वो,
"नहीं निकला तो?" बोली वो,
"तब आपके समक्ष ही नहीं आता!" बोला वो,
"समक्ष?" बोली वो,
"अब कहें? निकाल दूं?" बोला वो,
"बस एक ही क्षण? यही कहा न?" बोली वो,
"हां! विश्वास कीजिये!" बोला वो,
"ठीक है!" बोली वो,
उसके हां बोलते ही, युवक आगे बढ़ा, नीचे झुका और यदि पर दो उंगलियां फिराईं, और, आधा ही पल में वो कांटा बाहर निकाल दिया!
"ये देखिये! ये था, खजूर का कांटा!" बोला वो,
"आपका धन्यवाद!" बोली वो,
"कोई बात नहीं!" कहा उसने,
और पीछे हटा, और चला गया अपने मार्ग पर आगे, उसकी पीठ पीछे से! राधा ने अपनी एड़ी देखी, रक्त का कोई निशान नहीं, पीड़ा नहीं! ऐसे, जैसे कोई कांटा लगा ही नहीं! उसने झट से पीछे गर्दन घुमाई, वो कहीं नहीं था, चला गया था! वो उठी, और मुंह कर उधर, देखने लगी, कोई नहीं था, बस, कुछ गाय या अश्व आदि ही घास चर रहे थे! वो जैसे आया था, वैसे ही चला भी गया था!
वो अचरज में पड़ गयी! भला कौन था वो भद्र? कौन? क्या बोल रहा था कि लहू नहीं देखा जाता? कमाल है! लेकिन गया कहां?
अब मित्रगण! मन यदि प्रश्न करे और खूब मनो-विवाद के पश्चात, मन ही उसका उत्तर दे, तो समझ जाओ, किसी शंका का जन्म हो गया है! तो यहां भी शंका का जन्म हो गया, शंका पैदा हुई, मन में वास हुआ!
"तू कुछ नहीं लेगी?" आयी आवाज़ उसकी सहेली की!
"हां! अब लूंगी न!" बोली वो,
और बातें करते करते, वो वापिस चली, कुछ खरीदा भी, और अचानक से एक जगह उसे लगा, कि वो ही युवक एक अश्व पर सवार है, उधर ही आ रहा है, उसने चाल धीमे की अपनी, और जब वो युवक, अश्व वाला, वहां से गुजरा तो वो कोई और ही था, वो कांटे वाला नहीं!
इस सारीउहापोह में, उस सपेरे के शब्द कहीं खो गए! आवाज़ उस सपेरे की, उसके अक्स की तरह से धूमिल होती चली गयी! और इस तरह मेले से लौट आयी अपने घर वो राधा, सामान रखा, हाथ-मुंह धोये और अपने बिस्तर पर आराम करने चली, माँ घर पर थी नहीं, माँ और पिता जी, मंदिर गए थे, भाई भी मेले में ही गया था, वो घर में उस समय अकेले ही थी!
अचानक से उसे वो कांटा याद आया! कांटा याद आया तो वो युवक याद आया, युवक जो याद आया तो उसकी आवाज़ याद आयी!
"मुझे लहू देखना, अच्छा नहीं लगता!" ये शब्द भी याद आ गए! लेकिन सवाल! सवाल ये कि वो था कौन? वो मेले में बहुत देर तक रही, लेकिन वो गया कहां? कोई व्यापारी था तो नज़र आता, कोई बाहर का था, तो वापिस उसी रास्ते से जाता! वो गया भी नहीं? कौन था?
सहसा हाथ एड़ी पर गया! कोई पीड़ा नहीं! हाथ हटाया और करवट ली, करवट ली तो हाथ सामने आया, सामने आया तो एक भीनी सी सुगंध आयी! उसने सूंघ कर दो तीन बार देखा, सुंघा, लेकिन आ कहा से रही थी, इसका कोई पता नहीं! सुगंध थी भी बिलकुल अलग ही! ऐसा न तो फूल ही देखा था जिसमे ऐसी सुगंध हो, न ऐसा कोई द्रव्य ही! अचानक से पसीने की बून्द नथुने तक आयी, उसे जैसे ही पोंछा, सुगंध का कुछ सूत्र हाथ लगा! ये उसके हाथ से आ रही थी! दूसरा हाथ सूंघा, तो कोई सुगंध नहीं! बड़े ही कमाल की बात!
उसने एक बार नहीं, कई बार ऐसा करके देखा, लेकिन वो सुगंध बस उसके सीधे हाथ से ही आये! वो उठी और जा कर, खूब अच्छे से हाथ धोये, एड़ी धोयी, और पोंछ, वापिस कमरे में आ गयी! फिर से सूंघा, तो फिर वो ही सुगंध! जाने का नाम ही न ले! अब तो ये वहम ही हे, और कुछ नहीं, कह कर मन के प्रश्न को पुनः शंका में बदल दिया!
हुई शांम! पिता जी , माँ जी और थका-हारा वासु अब सभी घर लौट आये थे! दिन भर बड़ा ही व्यस्त बीता था सभी का! सपेरे खुश हो कर गए थे, ये सबसे अच्छी बात हुई थी!
शाम को राधा ने भोजन दिया पिता जी को और स्वयं भी खाने के लिए आ बैठी, वासु भी आ ही गया था! माँ ने भोजन परोसना आरम्भ किया, आज तो घर में दूध की रेज थी, तो दूध भी औट रहा था!
"चलो, सही निबट गया!" बोली माँ,
"हाँ माँ!" बोला वो,
"कोई भोजन भी कम नहीं पड़ा, सभी भर भर के अनाज ले गए!" बोली माँ,
"हाँ, ये अच्छा हुआ!" बोला वो,
"पंडित जी भी खुश?" पूछा माँ ने,
"हां! बहुत!" बोला वो,
"अरे राधा?" बोली माँ,
"हां माँ? बोली वो,
"तू कैसे चुप है?'' पूछा माँ ने,
"नहीं तो?" बोली वो,
"तबीयत तो भली?'' पूछा वासु ने,
"हां!" बोली वो,
"कहीं धूप खा गयी हो मेरी बहन!" बोला वो,
"नहीं!" बोली वो,
''चुपचुप सी क्यों है?" पूछा माँ ने,
अब उसने, माँ को उस बूढ़े सपेरे की बात बताई! दोनों ने ही जी से सुनी! माँ थोड़ा चिंतित तो हुई, लेकिन दिखाया नहीं, और वासु, उसने तो ध्यान ही नहीं दिया!
"हमें तो कोई नहीं मिला?'' बोला वो,
"कैसे बताई? बूढ़ा?" बोली माँ,
"हां!" बोली वो,
"कितनी उम्र होगी?'' पूछा माँ ने,
"कोई अस्सी?" बोली वो,
"ऐसा तो कोई नहीं था?" बोली माँ,
"हां?" बोला वासु भी!
"बाद में आया हो?" बोली वो,
"हो सकता है!" बोला वो,
तो खाना खाया सभी ने, वासु ने कोई ध्यान नहीं दिया था, इस कान सुनी, दूजे कान बाहर! हां, माँ ने कुछ ध्यान रखा! वो भी इसलिए की कोई भी बूढ़ा सपेरा, अब, इस बार तो नहीं आया था, तो राधा किसके बारे में बतला रही थी?
रात का वक़्त होगा...करीब एक बजे का, पूरा गांव थक-हार कर, नींद का आनंद ले रहा था! लेकिन आज नींद, कोसों दूर जा बैठी थी रूठ कर राधा से! उसकी एक वजह, अपने हाथ को बार बार सूंघना भी था, कमाल तो ये, कि वो सुगंध अभी तक गयी नहीं थी!
"वो कौन था?" मन ने प्रश्न किया,
"कोई व्यापरी होगा?" बोला मन,
अब मन के भी दो हिस्से होते हैं, एक पर विवेक मुस्तैद रहता है और दूसरे पर भावनाएं! अक्सर ही जीत भावनाओं की हो जाती है! क्या करें!
"व्यापारी था, तो नज़र क्यों नहीं आया फिर?'' मन ने सवाल किया,
"सम्भवतः सामान बिक गया होगा?" ये दलील सामने आयी दूसरे हिस्से की!
"परन्तु?" प्रश्न किया मन ने,
"क्या परन्तु? खुल के बोल?" झिंझोड़ा दूसरे हिस्से ने,
"रास्ता तो आने-जाने का एक ही है?'' बोला पहला हिस्सा,
"नज़र न पड़ी होगी?" बोला दूसरा हिस्सा,
"ऐसा नहीं हो सकता!" बोला पहला हिस्सा,
"फिर क्या हो सकता है?'' पूछा बचाव-पक्ष ने!
"वो कहीं बीच से निकला!" बोला दूसरा,
"अरे नहीं! एक तो सीधे मंदिर ही आता है?'' बोला पहला हिस्सा,
"तो वो ही होगा!" बोला दूसरा,
"नहीं!" बोला पहला,
"हां!" दूसरा बोला,
"कैसे मान लूं?" बोला पहला,
"न मानो तो भी क्या?" बोला दूसरा,
"इसका क्या अर्थ?" पूछा पहले ने,
"समझ नहीं आया?" दूसरा गर्रा के बोला,
"नहीं!" बोला पहला,
"सारी बातों का निचोड़ ये है, पगली! राधा! बावरी! कि तू क्यों सोच रही है उसके बारे में? होगा तो होगा? तेरा क्या मतलब उस से? कांटा लगा था, निकाल दिया, वो न होता तो कोई और निकालता! नहीं तो कोई और!" बोला दूसरा!
अब पहले हिस्से के मुंह में दही जमा! क्या बोले!
तो पलकें मूंद लीं, कुछ और हो तो किया भी जाए! आखिर किसी तरह खुद से ही लड़ लड़ कर नींद में जा ही डूबी! देर से सोई तो देर से जागी वो, पिता जी और वासु जा चुके थे खेतों पर!
दोपहर से कुछ समय पहले की बात है, कि उसकी दो सहेलियां उस से मिलने आयीं, आज मंदिर जाना था, मंदिर में कुछ काम भी था, तो स्नान-ध्यान कर वो मंदिर चली गयी, जो काम करना था कर लिया था, जल की इच्छा हुई और कुएं तक चली, पानी रखा था, पानी पी लिया, चेहरा धोया और देखा सामने फिर! सामने ही, एक खजूर का छोटा सा पेड़ था! वो चल पड़ी उधर के लिए, पेड़ को देखा, कांटा कहां होता है खजूर पर, देखने लगी, उसे तो कोई कांटा न दिखा, बस, सूखा सा तना और हरे से कड़े पत्ते ही!
"क्या देख रही है बेटी?" आवाज़ आयी,
पीछे देखा, मंदिर में रहने वाली जोगन थी वो, आते ही प्रसाद थमा दिया उसने राधा को,
"क्या देखती है?'' पूछा उसने,
"कांटा!" बोली वो,
"कांटा?'' बोली जोगन,
"हां?" कहा उसने,
''कौन सा कांटा?" जोगन ने पूछा!
खजूर पर कांटा कहां होता है, ये!" बोली वो,
"ओह! अच्छा!" बोली जोगन,
"जी!" कहा उसने,
"इधर आ!" बोली जोगन,
वो चली सके साथ थोड़ा आगे!
"ये देख!" बोली वो, एक बड़ा सा पत्ता दिखाते हुए!
"कहां?" बोली वो,
"इसका ये, ये रहा देख?" बोली जोगन!
"पत्ते का कोना!" बोली वो,
"हां, यही है कांटा!" बोली जोगन!
"क्या ज़रूरत पड़ी?" पूछा जोगन ने,
"कुछ नहीं!" बोली वो,
"ये कनाटा बड़ा ही तेज होता है, घुस जाए तो नसों में ऊपर की तरफ चढ़ता है, खून निकलता है, पांव सूज जाता है, उसमे मवाद भी पड़ सकता है यदि निकाला न जाए तो!" बताया जोगन ने!
"ये तो खतरनाक है?" बोली वो,
"बहुत!" बोली वो,
"अच्छा, अब चलती हूं!" बोली राधा,
"घर?'' पूछा उसने,
"हां!" बोली वो,
"फल ले जाने हों तो ले जा?" बोली वो,
"दे दो!" बोली राधा,
"आ!" कहा जोगन ने और ले चली!
"जो चाहे ले ले!" बोली जोगन!
उसने दो-चार फल उठा लिए और चल पड़ी वापिस घर! घर पहुंची तो हाथ-पांव धोये, फिर से लेट गयी!
"राधा?" माँ ने आवाज़ दी,
"हां माँ?" बोली वो,
"इधर आ?" बोली माँ,
"आयी!" बोली वो,
और चली माँ की तरफ!
"बैठ?" बोली माँ,
"हां?" बैठते हुए बोली वो!
"मैंने पंडित जी से बात की थी!" बोली माँ,
"किस बारे में?" पूछा उसने,
"यही कि एक बूढ़ा सपेरा मिला था राधा को!" बोली माँ,
"क्या बोले?'' बोली वो,
"बोले उड़ दिन कोई बूढ़ा सपेरा नहीं आया था, हो सकता है कोई हवा का चक्कर ही हो?" बोली माँ,
"क्या माँ?'' बोली वो,
"तुझे नहीं पता!" बोली माँ,
"तुझे पता है?" बोली राधा,
"ज़माना बीत गया बेटी!" बोली माँ,
"तो अब?" बोली वो,
"रात को जाना है!" बोली माँ,
"कहां?" पूछा उसने,
"मंदिर!" बोली वो,
"अकेली" बोली वो, उठते हुए,
"नहीं, मैं भी!" बोली माँ,
"अच्छा!" बोली वो,
"बता दूंगी तुझे!" कहा मैंने,
"ठीक है माँ!" बोली वो,
रात से पहले का ही वक़्त रहा होगा, माँ ने कुछ सामान लिया, राधा को संग ले, निकल पड़ी मंदिर जाने के लिए, इस वक़्त तक तो सभी घरों में दुबक ही जाया करते हैं, लेकिन वे दोनों, चुपके से, आहिस्ता से, मंदिर की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे! ऐसे मामलों के पंख हज़ार हुआ करते हैं, ज़रा सी चूक और फुर्र! फिर कभी इस डाल और कभी उस डाल! फिर कितने ही जाल डालो, न पकड़ा जाए! इसीलिए, रात का ये समय सही था, सही समय के लिए माँ ने ही पंडित जी से कहा था और ये समय मिल गया था!
पंडित जी को चूंकि भान था कि वे दोनों आएंगी, तो जागे थे, जोगन भी जागी थी, जोगन सुबह के लिए फूल संभाल रही थी, मालाएं जो बनानी थीं!
ठीक समय पर वे पहुंच गए, बिठाया गया उन्हें, जल की पूछी तो अनिच्छा ज़ाहिर कर दी, अब जल भी हलक़ से तभी उतरे जब सब सही हो!
तो राधा को सामने बिठाया उन्होंने, बीच में एक दीया रखवा दिया, जोगन बाहर चली गयी रह गए वे तीनों ही, पंडित जी ने कुछ मंत्रादि पढ़े, मोरपंखी निकाल ली और बातों का सिलसिला चल निकला!
''कितनी उम्र होगी उसकी?" पूछा पंडित जी ने,
"अस्सी!" बोली वो,
"सपेरा था?'' पूछा गया,
"हां!" बोली वो,
"पिटारी थी?" पूछा गया,
"हां!" बोली वो,
"तुमने देखीं?" पूछा गया,
''हां!" बोली वो,
"मिला कहां?" पूछा उन्होंने,
"मंदिर के बाहर ही!" बोली वो,
"बाहर ही?" पूछा उन्होंने,
"हां!" बोली वो,
"बैठा था?' पूछा उन्होंने,
"हां!" कहा उसने,
"सभी को दिखा?'' पूछा उन्होंने,
"हां!" बोली वो,
"डरा रहा था?'' पूछा,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?'' पूछा उन्होंने,
"चेता रहा था!" बोली वो,
"किस से?" पूछा उन्होंने,
तो सब बता दिया राधा ने!
"तुम चली गयीं?" बोला वो,
"हां!" बोली वो,
"मेले में?" पूछा उन्होंने,
"हां!" कहा उसने,
''वहां मिला?" पूछा उन्होंने,
"नहीं!" बोली वो,
"कोई और?'' पूछा उन्होंने,
अब सकपका गयी वो!
"नहीं!" बोली वो, और अंधेरे को करीब आने का संकेत मिला!
"कोई नहीं?" पूछा उन्होंने,
"नहीं!" बोली वो,
"साथ कौन था?" पूछा उन्होंने,
"सहेलियां!" बोली वो,
"वापिस कब आयीं?" बता दिया,
"आधे में!" बोली वो,
"तब दिखा?" पूछा उन्होंने,
"नहीं!" कहा उसने,
कुछ देर चुप हुए वो! और फिर माँ से बोले,
"कुछ नहीं लगता!" बोले वो,
अब सुकून मिला दोनों को!
"फिर वो?" बोली माँ,
"कोई होगा बावरा?" बोले वो,
"और ऐसी बात?" बोली माँ,
"सुनी होगी कहीं?" बोले वो,
"निश्चिन्त हो जाएं?" बोली माँ,
"हां!" कहा मैंने,
"कुछ और?" बोली माँ,
"नहीं!" कहा उन्होंने,
अब वे उठीं, और माँ ने घर से लाया हुआ कुछ सामान आगे किया, उन्होंने लिया, तब माँ ने बंद मुट्ठी में कुछ पैसे भी दे दीये!
"बस थोड़ा ख्याल रखना!" बोले वो,
"कैसा?" माँ ने पूछा,
"कभी दिखे, कहीं, तो बताना!" बोले वो,
"अवश्य ही!" बोले वो,
और प्रणाम कर, वे दोनों, बाहर चले आये.....
तो माँ बेटी लौट आयीं घर, घर आ कर, सोने की तैयारी की, माँ के कमरे में ही सोती थी, लेकिन आजकल, उसे नींद नहीं आती थी, नींद जैसे वो कांटा निकालने वाला अपने संग ले गया था, कहां वो ऐसे सोती थी की बिन टोके ही, सुबह ही नींद खुलती थी, कभी-कभी तो माँ ही हिला-डुला के उठाती थी! पता नहीं, क्या हो गया था उसे!
उस रात भी, उसने आंखें बंद कीं अपनी, पांव, दायां, हिलता था थोड़ा थोड़ा, इस से ये तो पता चल ही रहा था कि उसके दिमाग में कुछ न कुछ तो दौड़ ही रहा है! अचानक से क्या हुआ, की वो एकदम जैसे गहरी नींद में चली गयी! नींद में गयी तो उस, दिखाई दिया कुछ, दिखाई दिया वो ही मेला! सबसे पहले वो सपेरा दिखा, जो उस मेले में, एक जगह कोने पर, एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठा था, उस सपेरे ने पिटारी के ऊपर पिटारी रखी हुई थी, और उस पिटारी पर, एक काठ की मूर्ति सी रखी थी, वो बार बार उस मूर्ति से बतियाता था!
"मना किया था न?" बोला सपेरा,
और उस मूर्ति के सर पर हाथ रखा!
"कितना रोका था तुझे?" बोला वो,
और हंसने लगा!
"नहीं मानी न?" बोला वो,
और फिर, गंभीर हो गया!
"तेरा रूप, तेरा यौवन!" बोला वो,
उस मूर्ति की देह पर हाथ फिराते हुए,
"सब धरा रह गया न?" बोला वो,
और राधा, राधा वहीँ खड़ी थी, सुन रही थी, लेकिन न तो सपेरा ही उसे देख रहा था, न अन्य ही कोई और! जैसे, कठपुतली का खेल चल रहा हो, खिलाने वाला एक और देखने वाला भी एक!
"कहा था!" बोला वो,
और अपने पांव आगे किया, मोड़ा फिर,
"कहा था न? फूल को मत ढक?" बोला वो,
और हंसने लगा!
"नहीं मानी न?" बोला वो,
अउ उस मूर्ति को उठा लिया उसने अपने हाथ से,
"रात ऐसी आयी, जो ख़त्म ही न हुई!" बोला वो,
राधा, चुपचाप सुने!
"बता! मैंने तो फ़र्ज़ पूरा किया! बता! कोई और है यहां? जिसने मेरी बात न मानी?" बोला वो,
और तभी, उसे मूर्ति का सर, कंधे से घूमा आहिस्ता से, सीधा हाथ उठा और उंगली से इशारा कर दिया राधा की तरफ!
"बेटी?" बोला सपेरा,
और मूर्ति उसने पिटारी खोल, अंदर रख दी!
"बेटी?" बोला वो,
"हां बाबा?" बोली वो,
"तू भी नहीं मानी!" बोला वो,
"क्या बाबा?" पूछा उसने,
"फूल को मत ढक!" बोला वो,
"नहीं ढका बाबा?" बोला वो,
"रात घर आयी है!" बोला वो,
नहीं बोली कुछ वो!
"रात घिर आयी बेटी, अब सुबह न होगी!" बोला वो,
"सुबह न होगी?" बोली वो,
"हां!" कहा उसने,
"मैंने क्या किया बाबा?" पूछा उसने,
"मेरी बात न मानी न?" बोला वो,
"कब?" बोली वो,
"मुझे कब मिले आप?" बोली वो,
"कौन हो आप बाबा?" बोली वो,
"मुझे कैसे जानते हो?" बोली वो,
"मुझे बताओ?" एक साथ कई सवाल!
"मैं कौन हूं? मैं तेरा सच्चा साया हूं!" बोला वो,
"कब मिला? मेले में!" बोला वो,
"कैसे जानते हो? मैं हर जगह जाता हूं!" बोला वो,
"अब देर हो गयी बेटी!" बोला वो,
और मूर्ति फिर से निकाल ली बाहर!
"देर हो गयी बहुत!" बोला वो,
"कैसी देर बाबा?" पूछा उसने,
"देख!" बोला वो,
और किया उस मूर्ति का चेहरा उसकी तरफ! अब तक रही खूबसूरत मूर्ति, उसका चेहरा, अब कालिख समान था, कुरूप!
"ये क्या?" बोली वो घबरा कर,
"सत्य!" बोला वो,
"कैसा?" पूछा उसने,
"जीवन का!" बोला वो,
"किसका?" पूछा उसने,
"जिसने फूल को ढक लिया!" बोला वो,
"क्या कहना चाहते हो?" बोली वो,
''अब शेष कुछ नहीं!" बोला वो,
और वापिस उस मूर्ति को पिटारी में रख लिया!
"ये क्या हो रहा है मेरे साथ?" पूछा उसने,
"जो तूने चुना!" बोला वो,
"न चुनती तो?" बोला वो,
"तो न होता!" कहा उसने,
"कुछ और?" बोली वो,
"नहीं, अब चलता हूं!" बोला वो,
उठा, पोटलियां कंधों पर रख लीं पिटारी उनके अंदर और एक बार फिर से देखा उसने राधा को!
"देह से बड़े प्राण, प्राण से बड़ा मन!" बोला वो,
और चलता चला गया वो सपेरा वहां से! दूर, सीधा सीधा!
और अचानक! आंख खुल गयी उसकी! वक़्त का अंदाजा लगाया, अभी तो मध्य-रात्रि थी! हलक़ सूखा हुआ था उसका, पसीनों ने, गर्दन पर गिर गिर, ठंडक ग्रहण कर ली थी! वो उठी, और घड़े से पानी लिया, पानी पिया और सकोरा वहीँ रख दिया! बाहर झांका, घुप्प अंधेरी रात! झींगुर और मंझीरे अपने शाश्वत युद्ध-कला में निपुणता दिखा रहे थे! कोई गिलहर, आज ठीक से आराम नहीं कर पा रही थी, बार बार उसकी आवाज़ सुनाई देती थी, रात के पक्षी, टटाटेरी शोर मचाते हुए उड़ जाते थे, बाहर गनव के नदी थी, और ये रात के शिकारी पक्षी हैं!
अचानक से उसे लगा कि खिड़की के ठीक सामने कोई बड़ा सा पक्षी उतर आया है, कुछ पल शांत रही, और फिर बाहर झांक कर देखा! कोई नहीं था, हवा, हां, काफी तेज हो गयी थी, शायद, सुबह बारिश हो और ये आंधी उसका ही चिन्ह हो! खिड़की से ज़ोर से हवा अंदर आयी, दीये की बाती को धमकाया, बाती घबराई! फड़क गयी और दीवार से जा चिपकी!
"माँ?" बोली वो,
माँ जस की तस!
"माँ?" फिर से बोली वो,
न, कोई जवाब न!
"माँ? आंधी आ रही है?" बोली वो,
बाहर तभी, ढोरों के गोबर को उठाने वाली कनेकी जा गिरी! ढोर भी रम्भाने लगे! पेड़ हिलने लगे, पीपल के पत्ते कल-कल की आवाज़ करते हुए खड़कने ले! जामुन के पेड़ ने हिलोरा खाया और झूम उठा!
"माँ?" बोली वो,
नहीं हिली माँ!
तभी वो बाहर चली गयी, धुले हुए वस्त्र, रस्सी से उतारे और अंदर रख आयी, बाहर आयी तो सारा सामना हटाया उसने, जो सुबह की बारिश में खराब न हो, चूल्हे को एक बड़े से तसले से ढक दिया, और चली आयी अंदर!
"राधा?" माँ की आवाज़ आयी,
"हां माँ?" बोली वो,
"बाहर क्यों गयी?'' पूछा माँ ने,
"आंधी आयी है माँ?" बोली वो,
"आंधी?" बोली माँ, बाहर का शोर सुनते हुए,
"हां माँ, बहुत तेज!" बोली वो,
"कैसी आंधी?" पूछा माँ ने खड़े होते हुए,
"बाहर देखो?" बोली वो,
"आ ज़रा?'' बोली माँ,
"सामान तो रख दिया है मैंने, वस्त्र भी!" बोली राधा,
"आ तो ज़रा?" बोली माँ,
और बाहर चलीं दोनों! जैसे ही बाहर आयीं कि राधा का दिल, धक्क हो कर रह गया! ये क्या देख रही थी वो?
बाहर जैसे ही आ कर देखा! आंधी तो छोड़ो, हवा भी नहीं! नमी थी, गर्मी और उमस! आंधी कहां से आयी? वो जामुन का पेड़? वो तो हिल रहा था? और वो, पीपल के पेड़? उनके पत्तों की खड़खड़ाहट? वो कनेकी? वो भी अपनी ही जगह? ढोर रम्भा रहे थे? लेकिन? ये तो शांत से बैठे हैं?
"राधा?" बोली माँ,
"हां?" शब्द न निकला मुंह से, फिर भी कहा!
"कहां है आंधी?" बोली माँ,
"सच माँ?'' बोली वो,
"कोई आंधी नहीं!" माँ ने कहा,
"लेकिन मैंने देखी थी?" बोली वो,
"देखा था! सपना!" बोली वो,
"सपना?" बोली अपने मन में,
"समझी?" कहा माँ ने,
अब तो समझना ही था! आंधी तो क़तई न थी!
"चल? आधी रात हुई?" बोली माँ,
चुपचाप चली गयी राधा!
लेकिन ये क्या हुआ? क्या सपने ऐसे सच होते हैं? क्या यही होता है असल में कोई सपना? या ये फिर उसके मन का ही विचार है?
अरे हां! देह से बड़े प्राण और प्राण से बड़ा मन!
अब भला इसका क्या मतलब हुआ? देखा जाए तो एकदम सरल है! कोई उलझन नहीं समझने में! लेकिन इसका अर्थ? इसका अर्थ क्या हुआ?
इसी उहापोह में एक बार फिर से आंख लग गयी! और फिर से एक अजीब सा सपना आ या! उसने देखा कि वो एक नदी किनारे है! नदी किनारे, कुछ छपछप से आवाज़ें आ रही हैं, उसने उधर जा कर देखा, जब देखा तो उस नदी में, कुछ बहुत ही सुंदर और कामुक से स्त्रियां, जल-क्रीड़ा कर रही थीं! सफेद रग की, सुनहरे से रंग की मछलियां जैसे आनंद मना रही थीं! वो वहीँ खड़ी रही! सोचने में समय नहीं जाए तो पीछे हटी, जहां से, उसको, वे देख नहीं सकें और वो, उन पर दृष्टि बनाये! वो एक लता के झुरमुट के पास जा खड़ी हुई! चुपचाप सी! उसे लगा कि ये सम्भवतः, वन-कन्या का समूह है! इनको देखने भर से ही उत्तम भाग्य की प्राप्ति होती है!
"कौन?" एक मधुर सी आवाज़ आयी,
ये एक पुरुष की आवाज़ थी!
वो चौंक पड़ी, अपने आसपास देखा! कोई नहीं था वहां! कोई भी नहीं!
"कौन हैं आप?" फिर से स्वर गूंजा! वो घबरा गयी और भाग ली वहां से! जहां आ कर रुकी, वहीँ से पीछे देखा! दृश्य बदल गया था! अब कोई नदी नहीं थी वहां! बस कुछ बड़े बड़े से पुराने पेड़, कुछ घिस चुके से बड़े बड़े पत्थर!
और तभी नींद खुल गयी! नींद लगी ही कहां थी! बस आंखें ही तो बंद हुई थीं! वो चौंक कर बैठ गयी! राधा के जिव ने, ऐसा पहले कभी न हुआ था! कभी महसूस नहीं किया था! ये अचानक से क्या होने लगा था उसे!
"राधा?" माँ की आवाज़ आयी,
"हां?" बोली वो,
"क्या बात है?" बोली माँ,
"नींद नहीं आ रही!" बताया उसने,
"लेट जा, आ जायेगी!" बोली माँ,
"लेट कर भी देख लिया!" बोली वो,
"लेट जा, ध्यान, ईश्वर में लगा!" बोली माँ,
"नहीं आ रही?" बोली वो,
तभी बाहर से खखारने की आवाज़ आयी! जाग गए थे अन्य लोग, तड़के से पहले ही, घर के!
"बैठ! यहां आ!" बोली माँ,
वो माँ के पास चली आयी! माँ ने उसके सर पर हाथ फेरा, बालों में हाथ फेरा!
"मेरी बेटी!" बोली वो,
कुछ न बोली वो,
"मेरी दुलारी!" बोली माँ,
"माँ?" बोली वो,
"हां बेटी?" बोली माँ,
"क्या सपने सच होते हैं?" पूछा उसने,
"तूने देखा क्या?'' पूछा माँ ने,
"बताओ न?" बोली राधा!
"कभी हां, कभी नहीं!" बोली माँ,
"सच कौन से?" पूछा माँ से,
"जिनमे अर्थ हो!" बोली माँ,
"अर्थ?" बोली राधा,
"सच्चाई!" बोली माँ,
"ओह! समझी!" बोली वो,
"अब तू ये बता..?" बोली माँ,
"क्या?" पूछा उसने,
"तू सोयेगी या काम करेगी?" बोली माँ,
"काम!" बोली वो,
"नींद नहीं आ रही?" पूछा माँ ने,
"नहीं!" बोली वो,
"कोई चिंता है?" पूछा माँ ने,
"नहीं माँ?" बोली वो,
"रात भर तू करवट बदल रही थी, देख रही थी मैं!" बोली माँ,
"ऐसे ही माँ!" बोली वो,
और फिर उसके बाद, दिन की शुरुआत आ गयी! आम देहाती जीवन था, सरल से नियमों से बंधा हुआ, रोज रोज का वही सब!
उसी दिन, करीब शाम से कुछ पहले, मंदिर में एक कुआं-पूजन था, पास ही की एक नव-विवाहिता मंदिर जाने वाली थी! तो वो भी साथ हो लीं! मंदिर पहुंचे, और फिर कुआं-पूजन आरम्भ हुआ, अन्न के दाने बिखेरे जाने लगे! राधा ने भी बिखेरे! तभी अचानक से उसे कोई दिखाई दिया! वो एक छोटी सी कन्या थी, गोरी सी, किसी प्यारी बच्ची सी! वो लगातार उसे ही देख रही थी, ऐसा लगता था, जैसे ही नज़रें मिलीं कि वो कन्या वहां से निकल भागी! राधा भी निकली और उस जगह का कर देखा! ये मंदिर का बगीचा था, उसने आसपास देखा तो कोई नहीं था!
"राधा?'' एक बच्ची आयी पीछे से,
"राधा?" बोली वो,
"हां?" बोली वो,
"तू मुझे जानती है?" बोली राधा,
"हां!" कहा उसने,
"कैसे?" पूछा उसने,
"मंदिर से!" बोली वो,
"मंदिर से?" बोली राधा,
"हां, मेले से!" बोली वो,
"मेले से?" चौंक कर पूछा उसने,
"हां, नाग-पंचमी से!" बोली लड़की!
"तू कहां रहती है?" पूछा उसने उस से,
"बताऊं?" बोली वो,
"हां, बता!" बोली राधा,
"पहले वो तोड़ के दो!" बोली बच्ची!
वो! उधर देखा, खट्टा सा करौंदा था, जो अब पक चुका था, राधा ने तोड़ा, अपने कपड़े से साफ़ किया और उसे दे दिया!
उस बच्ची ने मुंह से काटा उसे और थोड़ा सा खा लिया!
"अच्छा है!" बोली वो,
"अब बता?" बोली राधा,
"क्या राधा?'' बोली वो,
"कहां रहती है तू?" पूछा उसने,
"मैं?" बोली वो,
और, थोड़ा सा फिर खाया उस बच्ची ने!
"बता?" बोली राधा,
"उधर!" बोली वो, एड़ी उठा कर एक!
"उधर?" बोली राधा,
"हां?" कहा उसने,
और बचा हुआ करौंदा भी खा लिया!
"उधर किधर?" पूछा उसने,
"उधर, जंगल के पास!" बोली वो,
"जंगल के पास?" बोली राधा,
"हां!" कहा उसने,
"अच्छा! कभी गयी नहीं उधर!" बोली राधा,
"कभी जाओ!" बोली वो,
"मिलेगी तू?" बोली राधा,
"हां, करौंदा लाना!" बोली बच्ची!
"हां, ले आउंगी!" बोली राधा!
"तो एक और दो?" बोली बच्ची!
"हां!" बोली राधा,
और एक करौंदा और तोड़ के, साफ़ कर के, दे दिया उसे! उस लड़की ने झट से पकड़ लिया और काटा उसका टुकड़ा!
"तेरे यहां नहीं मिलते ये?" बोली राधा,
"नहीं!" बोली वो,
खाते हुए उसे!
"मेरे यहां ऐसा कुछ भी नहीं मिलता!" बोली बच्ची,
"क्यों?" पूछा उसने,
"पता नहीं?" बोली वो,
"इतनी सारी लड़कियों में से तूने मुझे ही पुकारा?" बोली राधा,
"हां?" बोली वो,
"क्यों?" पूछा उसने,
"तुम अच्छी लगीं!" बोली वो,
"अच्छी?" बोली राधा,
"बहुत अच्छी!" कहा उसने,
"अच्छा?" बोली राधा,
"हां!" बोली वो,
"अच्छा, एक बात बता!" बोली राधा,
"पूछो?" बोली वो,
"तेरे गांव का नाम क्या है?" पूछा राधा ने,
"किल्लौर!" बोली वो,
"किल्लौर?" बोली राधा,
"हां!" बोली वो,
"ये नाम तो कभी नहीं सुना?" बोली राधा,
"तुम बाहर गयी ही नहीं!" बोली बच्ची,
"हां, सही कहा!" बोली वो,
"जब जाओगी, तब देख लेना!" बोली वो,
"कब जाउंगी?" पूछा उसने,
"जब आओगी!" बोली बच्ची!
हंस पड़ी राधा उसकी हाज़िरजवाबी पर!
"बहुत तेज है तू!" बोली राधा,
"अच्छा?" बोली वो,
"हां!" कहा उसने,
"अब कब आओगी यहां?" पूछ बच्ची ने,
"जब भी तू कहे?" बोली वो,
"कल?" पूछा उसने,
"कल?" बोली राधा,
"नहीं आ सकतीं?" पूछा उसने,
"मैं तो आ जाउंगी, लेकिन तू? इतनी दूर से?" बोली राधा,
"मेरी चिंता मत करो!" बोली बच्ची!
"अरे? क्यों नहीं?" बोली राधा,
और उस बच्ची को उठा लिया! फूल सी बच्ची थी वो! बड़ी बड़ी आंखें, छोटी सी प्यारी नाक और चमचमाते हुए नेत्र!
"आओगी?" बोली बच्ची,
"हां!" कहा उसने,
"पक्का?" बोली वो,
"हां, पक्का!" कहा उसने,
"मानोगी?" बोली वो,
"क्या?" पूछ राधा ने,
"मेरा कहा?" बोली वो,
"और वो क्या?" पूछा उसने,
"तोड़ के रखना बहुत सारे ये करौंदे!" बोली हंसते हुए वो बच्ची!
"हां! ज़रूर!" कहा उसने,
उसने बच्ची को नीचे रखा, और उस छोटी सी बच्ची के माथे को चूम लिया!
"राधा?" बोली बच्ची,
"हां?" कहा उसने,
"नीचे झुको?" बोली वो,
राधा नीचे झुकी और तभी उसके माथे पर चूम लिया उस बच्ची ने! दोनों ही हंस पड़े खिलखिलाकर!
"चलोगी?" बोली राधा,
"कहां?" बोली बच्ची!
राधा मुस्कुरायी तब और................!
"मेरे घर चलोगी?" पूछा राधा ने,
"किसलिए राधा?" बोली वो,
"माँ खुश होगी तुझे देख कर!" बोली राधा,
"राधा, वो देखो, लोग लौटने लगे, मुझे भी जाना है!" बोली वो,
"कौन है साथ तेरे?" बोली राधा,
"माँ है!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा राधा ने,
"अच्छा राधा, कल मिलूंगी!" बोली वो,
और दौड़ पड़ी वहां से वो बच्ची! उस बच्ची ने दो बार पीछे मुड़कर देखा राधा हो! राधा और वो बच्ची दोनों ही मुस्करायीं!
"फिर से?" आयी आवाज़,
"हां?" उसके मुंह से निकला,
"फिर से कांटा देखने आयी हो बेटी!" ये जोगन थी, उसने ही कहा था उस से ये!
"नहीं तो!" बोली वो,
"कब से अकेले खड़ी हो!" बोली जोगन,
"अकेले?" बोली राधा,
"हां!" कहा उसने,
"नहीं तो?" बोली राधा,
"क्या नहीं?" बोली जोगन,
"अभी वो बच्ची थी न इधर?" बोली राधा,
"बच्ची?" हैरानी से पूछा जोगन ने,
"हां!" बोली राधा,
"इधर आ?" बोली जोगन,
"क्या?" बोली राधा,
"कौन सी बच्ची?" बोली जोगन,
"प्यारी सी!" बोली वो,
"यहां?'' पूछा उसने,
"हां!" कहा राधा ने,
"क्या कर रही थी?" पूछा उसने,
"यहां लायी थी मुझे वो!" बोली राधा,
"कहां से लायी थी?" पूछा जोगन ने,
"कुआं-पूजन से?" बोली वो,
"किसी के साथ थी?" पूछा जोगन ने,
"हां!" बोली वो,
"किसके?" पूछा उसने,
"अपनी माँ के!" बोली राधा,
"तूने देखी?" बोली वो,
"कौन?" पूछा राधा ने,
"उसकी माँ को ले जाते हुए उसे?" पूछा उसने,
"नहीं!" बोली वो,
"राधा?" बोली जोगन,
"हां?" कहा उसने,
"तू ठीक नहीं लगती!" बोली वो,
"ठीक नहीं? कैसे?" बोली वो,
"जो तू बोल रही है, कि बच्ची, यहां कोई बच्ची नहीं आयी, कुआं-पूजन, घंटे भर पहले निबट लिया, बच्ची मैंने कोई नहीं देखी?" बोली जोगन!
"ये नहीं हो सकता?" बोली राधा,
"ये ही है बेटी!" बोली वो,
"मैं नहीं मानती!" बोली राधा,
"तेरे न मानने से कुछ नहीं बदलेगा!" बोली वो,
"तो क्या करूं?" बोली राधा,
"अपनी माँ को भेजना!" बोली वो,
"आये तो थे हम?" बोली वो,
"इस बार कोई और देखेगा!" बोली वो,
"देखेगा?" बोली वो,
"हां, तू ठीक नहीं!" बोली वो,
राधा ने बनाया मुंह अपना, और चल पड़ी वापिस अपने घर! घर आयी तो दो नए लोग आये हुए थे, वो बच-बचाकर, जल्दी से अपने कमरे की तरफ जा भागी! वहां माँ दिखाई दी! माँ दौड़ कर आयी उसके पास!
"कहां थी?" पूछा माँ ने,
"मंदिर!" बोली वो,
"लेकिन सभी वापिस आ गए घंटे भर पहले?" बोली वो,
"जोगन से बात हो रही थी!" कहा उसने,
"जा, कपड़े बदल?" बोली माँ,
"क्यों माँ?" बोली वो,
"कोई आ जायेगी इधर!" बोली वो,
"कौन कोई?" पूछा उसने,
"अरे तेरे लिए रिश्ता आया है!" बोली माँ,
"रिश्ता?" बोली वो,
"हां, चल?" बोली माँ!
"नहीं माँ!" बोली वो,
"क्या?" माँ ने अचरज से पूछा,
"हां!" बोली वो,
और वहीँ बैठ गयी!
"क्या कह रही है तू?" बोली माँ,
"हां, सच कह रही हूं!" बोली वो,
"बड़े घर का रिश्ता है?" बोली माँ,
"राजा के यहाँ से क्यों न हो?" बोली वो,
बड़ी हैरत! माँ के सामने कभी खिलाफत न करने वाली राधा में आज गज़ब का विद्रोह दिख रहा था! लेकिन इस विद्रोह की वजह क्या थी? कुछ तो होगी?
"क्या हो गया है तुझे?'' माँ ने पूछा,
"कुछ नहीं माँ!" बोली वो,
"मतलब हमारा अपमान करवाएगी तू?" बोली माँ,
"अपमान कैसा?" बोली वो,
"मना करके?" बोली वो,
"अपमान नहीं माँ, मैं तैयार ही नहीं ब्याह करने के लिए!" बोली वो,
"और क्यों तैय्यार नहीं भला?" बोली माँ,
तभी उस कमरे के बाहर आहट हुई, और एक अधेड़ सी महिला, और एक जवान से, बनी-ठनी सी अंदर चली आयीं! बनावटी हंसी बिखेरते हुए, अपना मान-सम्मान खुद ही जड़ लिया!
"ये है राधा!" बोली वो अधेड़ औरत,
"हां, मेरी बेटी है!" कहा माँ ने,
"सुंदर है!" बोली वो,
"बहुत!" बोली माँ,
"अच्छा मेल रहेगा, वर भी कम नहीं, बस मिलान हो जाए!" बोली वो,
"जी, जब आप चाहें!" बोली माँ,
"नहीं! साफ साफ बोलो न माँ?" बोली राधा,
अब ये तेवर देख, वे तीनों की तीनों अपने अपने हिसाब से पहाड़े पढ़ गयीं! वे दोनों तो खिसक लीं और माँ वहीँ रह गयी, ठगी सी!
"हे भगवान!" बोली माँ,
"क्या हुआ माँ?" बोली राधा,
"कोई माँ-बाप अपनी बेटी का घर, जल्दी से जल्दी बसे, देखना चाहता है राधा!" बोली माँ,
"लेकिन माँ? जब मैं अभी तैय्यार ही नहीं तो हां कैसे कह दूं?" बोली राधा,
"तेरे संग की ब्याहता हो गयीं, या इस बरस तक, रही हुई, भी हो जाएंगी!" बोली माँ.
"हो जाने दो!" बोली वो,
तभी करीब दस मिनट बाद ही, वासु अंदर आया! और मुस्कुराते हुए अपनी माँ को देखा!
"देख लिया तूने?'' बोली माँ,
"हां!" बोला वासु!
"इसने मना कर दी!" बोली माँ,
"अच्छा किया!" बोला वो,
"अच्छा?" बोली माँ,
"हां, मुझे वो घर ही पसंद नहीं था, करणी ज़बरन ले आयी उन्हें!" बोला वो,
"पसंद क्यों नहीं था?" पूछा माँ ने,
"लड़का सही नहीं!" बोला वो,
"कैसे पता?" पूछा माँ ने,
"अब ये रहने दो!" बोला वो,
"पता ही नहीं!" बोली माँ,
"और राधा? वाह मेरी बहना! तेरा क्या कहना!" बोला वो,
और गंभीर सी बनी राधा को, आखिर में हंसा ही दिया! बहन और भाई में बहुत ही अधिक प्रेम था, ये तो साफ़ था!
मित्रगण!
समय के पंख बेहद तेज चलते हैं! ये लगातार उड़ता चला जाता है! यहाँ भी उड़ ही चला, हां, कभी कभी रुक रुक कर देख लेता था!
हां, तो अगले दिन वो बगीचे गयी, उस बच्ची को तलाशने, कुछ बढ़िया पके से करौंदे उसने तोड़ कर रख लिए थे!
"राधा?" उसे हल्की सी आवाज़ आयी,
आसपास देखा उसने, कहीं नहीं थी!
"आगे!" आवाज़ आयी,
वो आगे चली!
तो सामने देखा एक झोंपड़ी के साथ वाले आम के पेड़ के नीचे खड़ी थी वो बच्ची! राधा ने गति पकड़ी और लपक कर गयी वहां!
"कैसे है?" राधा ने पूछा,
"पहले ये!" बोली वो,
और ले ली वो पोटली करौंदों की उस से!
"हां, मैं ठीक हूं!" बोली बच्ची,
"और मैं भी!" बोली राधा,
"जानती हूं!" बोली बच्ची,
"मेरे घर कब चलेगी?" पूछा राधा ने,
"आउंगी!" बोली वो,
"कब?" बोली राधा,
"जब समय होगा!" बोली वो,
"ये भी समय है?" बोली वो,
