वर्ष २०१४, भैलवा के...
 
Notifications
Clear all

वर्ष २०१४, भैलवा के सरभंग!

63 Posts
2 Users
4 Likes
1,218 Views
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

अब हालू आगे चला, एक चिता के पास आया और नीचे झुका, सामने रखी सामग्री उठायी, दोनों हाथों से, और एक मंत्र सा पढ़ते हुए, उस चिता में झोंक दिया! जैसे ही उसने झोंका, वे सभी सरभंग, सभी के सभी, उन चारों चिताओं की परिक्रमा करने के लिए उठ गए, हम भी उठ गए, चूंकि हम काफी पीछे थे, परन्तु, उत्तर से आते हुए टोले के आगे हो गए! चुपचाप परिक्रमा करने लगे, कोई कुछ कहता तो समझ नहीं आता, शोर बहुत था, सम्मा, दोनों हाथ बजता कुछ बड़बड़ाता हमारे साथ ही चल रहा था, हमने एक परिक्रमा-चक्र पूर्ण किया, उधर हालू, उन चिताओं में सामाग्री झोंके जा रहा था, सामग्री में से, जो गंध उठ रही थी, उसमे से एक अजीब सी गंध थी, जैसे किसी तेज़ाब में होती है या खट्टेपन की सी, मैं देख लेता था हालू को एक आद नज़र से! वो आदमी कम ही और बिजार सा ज़्यादा लगता था! दाढ़ी, पकी हुई थी, दाढ़ी में सफेद सी खड़िया मल रखी थी, सर पे एक बाल नहीं, सर पर भी खड़िया खींच रखी थी, उसने शायद माथे पर जो, त्रिपुण्ड सा खींचा था, उसे माथे से लेकर, सर तक, पीछे गर्दन तक ले गया था, आदिवासी सी लगता था!
फिर उसने ताली सी पीटी और जो जहां था वहीं रुक गया! वो बैठ गया नीचे, और तब चार नग्न कन्याएं आयीं, बड़ी ही हैरत हुई मुझे, वे सभी की सभी मुझे देखने में अवयस्क सी लगीं, जैसे सोलह या हद से हद सत्रह ही उम्र रही हो उनकी, वो आयीं उधर और एक एक चिता के सामने, करीब पंद्रह फ़ीट पर जाकर, लेट गयीं, हां, एक बात और बताऊं, औघड़ लोग, कम उम्र, अवयस्क कन्या आदि क्रिया में नहीं लाया करते, मात्र दो ही ऐसी कन्यायें हैं जब वो माह से होती हैं, तब भैरवी-सम्भाषण में उनका प्रयोग किया जाता है! उसमे भी यदि कन्या के अंग-प्रत्यंग पुष्ट न हों, पुरुष-गमन के योग्य न हों, तो त्याजित हैं, भले ही क्रिया ही न हो!
यहां जो कन्याएं थीं, वो देह से भी अवयस्क ही लगती थीं, स्तन के नाम पर, बस कुछ उभार ही थे, अस्थियां पसलियों की दृश्यमान थीं, उन्हें तो देखने से भी कोई भी पुरुष, पाप ग्रहण कर ले, लेकिन यहां हमारा कोई बस नहीं था, हम तो मात्र दर्शक मात्र ही थे!
तभी दो सरभंग, जो कि नग्न थे, उनके लिंगों में कड़ाव था, उत्तेजित थे, सामने आये और उनके हाथों में दो पात्र थे, उन्होंने उस पात्र से, रक्त की कुछ छींटें उन कन्यायों पर छिड़क दीं और नीचे बैठ गए! दो कन्या बैठी ही रहीं और दो, उन नग्न सरभंगों की गोद में जा चढ़ीं, लिंगों का प्रवेश हुआ और अट्ठहास आरम्भ हो गया उन सरभंगों का! उन दोनों ही सरभंगों ने, उन कन्यायों का मर्दन आरम्भ कर दिया, और तब, शेष सरभंग फिर से चिलाते हुए, हंसते हुए परिक्रमा करने लगे!
अचानक ही उन दोनों ने उन कन्यायों को छोड़ दिया, कन्यायों ने हाथ का अंजुल बनाया और उनका स्खलित वीर्य अब अपने हाथों में एकत्रित करने लगीं, ये सब बड़ा ही वीभत्स सा था, स्खलन के समय, वे सरभंग उन कन्यायों को मार रहे थे, पीट रहे थे, उनके बालों को पकड़ पकड़ गाली-गलौज सी कर रहे थे! वीर्य एकत्रित कर उन कन्यायों ने, वीर्य-पान किया और खड़ी हो गयीं, नाचने लगीं, उछलने लगीं, वे सरभंग वहां से हट गए, अब जैसे कमान उन कन्यायों के हाथ में थी! वो वहां खड़े सरभंगों के पास जातीं और वे सरभंग झुक कर जैसे उनको नमन करते! सम्भवतः, किसी शक्ति का आगमन हुआ था उन पर! जिस समय वो नाच रही थीं सभी बैठ गए, उकडू! हम भी उकडू बैठ गए, सामने देखते हुए! और थोड़ा पीछे आ गए, खिसक खिसक कर!
"इसीलिए ये गुप्त रखते हैं!" बोले वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"बड़ा ही अजीब सा है?" बोले वो,
"बहुत ही!" कहा मैंने,
तभी वे नाचने वाली रुकीं और बैठ गयीं, बैठे ही उछलीं हवा में और दूर जा गिरीं! हालू उठा, गला फाड़कर चिल्लाया!
तब दो और सरभंग आये, और फिर से, वही सब दोहराया गया! वे भी उछलीं और दूर जा गिरीं!
"कोई शक्ति, शायद?" बोले वो,
"यही!" कहा मैंने,
"ओफ़्फ़्फ़!" बोले वो,
अभी सब शांत था, कि दो सरभंग वहाँ आये, वो एक मुर्दा ले आये थे, मुर्दा शायद सड़ा हुआ था, बदबू ऐसी उठी कि आंतों में गांठ पड़ जाए! पूरा मुर्दा, सड़ कर सफेद पड़ा था!
ले लिया गया फरसा और उस मुर्दे की चीड़-फाड़ मचा दी! बदबू ही बदबू! चीयर-फाड़ के बाद, उसके हिस्से उन चिताओं में झोंक दिए गए! चटाक-चटाक की सी आवाज़ हुई! हां, जो सर था, काट कर, उस हालू के पास रख दिया गया था, उस मुर्दे की आंखें बाहर ही निकल आयी थीं, दांतों का जबड़ा ऊपर वाला बाहर निकल आया था, नाक पिचक गयी थी, और उसके सर पर उस सफेद से द्रव्य की, गोंद सी इकट्ठी हो गयी थी, ये जीव-द्रव्य होता है!
उस हालू ने एक पांव ज़मीन पर और एक उस सर के ऊपर रखा था! अभी तक यही सब चल रहा था, उन चिताओं में सामग्री ही झोंकी जा रही थी!
"थू!" बोले वो, और थूक दिया!
मैंने भी थूका उन सभी की नज़रें बचा कर!
"ये भी कोई इंसान है?" बोले वो,
"देख लो!" कहा मैंने,
"आदमी एक दिन में ही मर जाए!" बोले वो,
"एक दिन भी कहां?" कहा मैंने,
"कितने भयानक हैं!" बोले वो,
"बेहद!" बोला मैं,
अचानक ही हालू खड़ा हुआ और कुछ अटपटा सा बोला, मुझे तो समझ नहीं आया! मैंने सम्मा को देखा!
"चुप रहना!" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"एक एक कर जाएंगे उधर!" बोला वो,
"किधर?" पूछा मैंने,
"उस हालू के पास!" बोला वो,
"वो क्यों?" पूछा मैंने,
"आशीष!" बोला वो,
आशीष! उस जल्लाद से आशीष!
"उधर जाना!" बोला वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"अपने सर उसके पांव से लगाना!" बोला वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"वो स्पर्श करेगा!" बोला वो,
"और फिर?" पूछा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"फिर?'' बोला वो, इस बार थोड़ा खीझ कर!
"हां, फिर?'' कहा मैंने,
"जब सब पूरा हो जाए तो देख लेना!" बोला वो,
"क्या पूरा हो जाए?" पूछा मैंने,
"बैठे रहो यार?" बोला वो,
"बैठे रहो?" कहा मैंने,
"देखते जाओ!" बोला वो,
"देख ही रहा हूं!" कहा मैंने,
"कुछ देर और!" बोला वो,
"अरे फिर?" पूछा शहरयार ने,
"फिर जब ये चरण पूरा होगा तब दादू को बुलाया जाएगा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"इसीलिए, बैठे रहो!" बोला वो,
अब बात हाथ से निकले जा रही थी, कहीं ऐसा न हो, हम हालू के पास जाएं, कोई बातचीत हो, और हम पकड़े जाएं, अंजाम क्या होता ये तो साफ़ ही था, मरते नहीं तो कम से कम हाथ-पांव ज़रूर उखाड़ देते ये जानवर!
वहां एक एक करके, सभी चलते चले गए, मैंने देखा, कोई कोई कंधे की तरफ से झुकता था, बाएं या दाएं, इस मुद्रा में चेहरा सामने नहीं होता!
"सुनो?" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा उन्होंने,
"ऐसे झुकना!" कहा मैंने,
"कैसे?" बोले वो,
"उधर देखो?" कहा मैंने,
फिर मैंने इंतज़ार किया, और तभी...
"ये! ऐसे!" कहा मैंने,
"कंधे से?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"ठीक!" बोले वो,
कुछ देर और लगी..
"आओ!" बोला सम्मा,
"चल!" कहा मैंने,
और हम उसके पीछे चलते बने, वहां तक पहुंचे, सम्मा तो साला पूरा ही झुक गया, जैसे कुछ बातें कर रहा हो! वो हटा तो मैं गया, कंधे की तरफ से झुका और चेहरा अलग रखा! उठ गया, उसने स्पर्श कर दिया, वो कटा सर लुढ़का और एक तरफ टिक गया!
फिर हम सभी ने एक एक कर के उसका 'आशीष' ले लिया और चलते बने! एक फाटक तो पार हुआ, चलो!
"इधर!" बोला सम्मा!
"चलो!" कहा मैंने,
"बच गए!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
और तभी, उस हालू ने सर घुमाया, मुझे देखा, मैंने नज़रें बचा ली, कुछ देर बाद उसे देखा, वो अब नहीं देख रहा था हमें!
"सम्मा?" कहा मैंने,
"हां?" बोला वो,
"यहां से कहीं और चल!" कहा मैंने,
"क्या हुआ?" बोला वो,
"चल भाई?" कहा मैंने,
और तभी, फिर से हालू ने हम पर नज़र डाली, इस बार हाथों की तक ले, हमें अच्छी तरह से घूरा!
"उठ?" कहा मैंने,
''चलो!" बोला वो,
और हम निकले वहां से!
"कुछ हुआ क्या?" पूछा गजनाथ ने,
"शायद शक हुआ!" कहा मैंने,
"हालू को?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
''अब?" बोला वो,
"रुके रहो ज़रा!" कहा मैंने,
"कोई शक नहीं!" बोला सम्मा,
"लगता है!" कहा मैंने,
"अब तक तो आवाज़ दे देता!" बोला वो,
और वही हुआ!
सम्मा? सम्मा?
दी उसे आवाज़ उधर, हालू के पास खड़े एक आदमी ने, वो भी सरभंग ही था!
"आया!" बोला सम्मा,
और चल पड़ा आगे, इशारा कर दिया उसने, कि वहीं रहें!
सम्मा आगे गया और हालू के सामने हाथ जोड़ खड़ा हो गया! उस सरभंग ने कुछ बातें कीं उस से, कोई दो मिनट और सम्मा लौट आया!
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"पूछा!" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"आपके बारे में!" बोला वो,
"क्या बताया?" बोला मैं,
"यही कि कल चले जाएंगे!" बोला वो,
"कहाँ से आये, ये नहीं?" पूछा मैंने,
"जानता है!" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"यहां सिर्फ एक ही जगह से कोई आ सकता है!" बोला वो,
"भेतिया से?" बोला मैं,
"हां!" बोला वो,
''चलो शक मिटा!" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"सम्मा?" बोला गजनाथ,
"हां?" बोला वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

तभी कुछ शोर सा मचा! वहीं नज़र चली गयी! ये तो एक टोला सा था, नंग-धड़ंग सरभंग औरतों का, ये कम से कम पच्चीस या तीस होंगीं, सभी की सभी बड़ी ही अजीब सी, सफेद सी खड़िया मले हुए, गले में हड्डियों की मालाएं धारण किये, केश खुले हुए, उनको देख तो लगता था कि जैसे किसी ने शाकिनि-आह्वान किया हो! शाकिनि का सा स्वरुप बनाये हुए थीं वो! कई सरभंग औरतों ने, गले में मुंड लटकाये थे, उलटे, ये एक नया तरीक़ा देखा मैंने, औघड़ लोग मुंड को सीधा रखते हैं, अर्थात, सर ऊपर और जबड़ा नीचे, इन्होने कपाल-कटोरा सा लटकाया था, जबड़ा ऊपर और सर नीचे, कुछ हड्डियां भी थीं जो कि कमर पर पीछे की तरफ बांध रखी थीं! कोई पहले-पहल देख लो तो गश खा गिर जाए या प्राणों पर बन आये उसके तो! भयानक ऐसीं कि शहरी श्वान तो उन्हें देख भौंकें भी नहीं, बस दुम दबा भाग जाएं!
''सम्मा?" कहा मैंने,
"हां?" बोला वो,
"ये कौन हैं?" पूछा मैंने,
"लोमा!" बोला वो,
लोम? लोमा? नाम सुना सा लगा मुझे, शायद किसी सरभंग से द्वन्द में इस शक्ति का आह्वान हुआ था या फिर नाम ही रहा होगा! मुझे ठीक उस वक़्त, याद नहीं आया!
"इनका स्थान?" पूछा मैंने,
"इनका स्थान समकक्ष ही है!" बोला वो,
"अर्थात पुरुष-सरभंग समकक्ष?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
अचानक से उन लोमा ने हड्डियां खड़खड़ायीं, वे पुरुष सरभंग उठ खड़े हुए, और वे स्त्रियां रास्ता बनाते हुए आगे चली गयीं! एक परिवर्तन सा हुआ, स्त्रियां एक तरफ और अब पुरुष एक तरफ, जा बैठे, ये कोई सामाजिक सी परम्परा थी उनकी! मुझे कुछ कुछ याद पड़ता था, मैंने इस प्रकार की लोमा देखी थीं, पुराने किसी समय के स्थलों में! इस प्रकार की लोमा, आज भी हैं, प्रेतावस्था में, जो या तो श्रापित हैं या फिर, समस्य-भोग में लिप्त हैं!
हालू खड़ा हुआ, सभी ने हाथ जोड़े और कुछ बोला वो, कोई मंत्र था या कुछ और पता नहीं लग पाया, हम एक तरफ, एक खपंचे की हया में जगह ले कर, बना कर खड़े हुए थे, यहां, इधर बिना गौर किये, कोई न तो आ ही सकता था न देख ही सकता था, भले ही नज़रें दो बार भरे!
"हालू!" बोला सम्मा,
"हां!" कहा मैंने,
"देखते रहो!" बोला वो,
''अच्छा!" कहा मैंने,
हालू बैठा और वे सब खड़े हुए, और तब आरम्भ हुआ, उनका नाच! नट-नाच! वे सब नाच रहे थे कटोरे हाथों में लिए!
"ये क्या?" पूछा मैंने,
"बुलावा!" बोला वो,
"किसका?" पूछा मैंने,
"दादू का!" बोला वो,
"अब दादू आएगा?" पूछा मैंने,
"कुछ ही देर में!
एक जगह नज़र गयी, एक सरभंग ने मूत्र-त्याग किया एक कटोरे में, और दूसरे ने वो मूत्र पी लिया! घिन्न भर उठी! कैसे कैसे निःकृष्ट कार्य करते हैं ये, शायद इसीलिए गुप्त भी रखते हैं अपने आप को!
अब तो क्या औरतें और क्या मर्द, कोई मूत्र-त्याग करे तो दूसरा कटोरे में ले, पी जाए! इसे ही सरभंग-कर्भक्ष कहा जाता है! कोई भी जैव-वस्तु, त्याज्य नहीं, ये सिद्धांत यहां गोचर हो रहा था!
"अब हटो यहां से!" बोला वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"यहां मार-काट हो जायेगी!" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"हो सकती है!" बताया उसने,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"दर्शन के लिए!" बोला वो,
"क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"इन सभी में!" बोला वो,
"लेकिन क्यों?" पूछा मैंने,
"दादू किसी को तिमाही तक, नियुक्त करेंगे!" बोला वो,
"कैसी नियुक्ति?" पूछा मैंने,
"आओ पहले!" बोला वो,
"चलो!" कहा मैंने,
हम उसी रास्ते से फिर वापिस हुए, विष्ठा-मूत्र की तीव्र गंध उठ रही थी, सम्भल कर चलना पड़ रहा था, नीचे देख कर, ये पता नहीं कैसा घृणित सा स्थल था, मारे घिन्न के कब उलटी नाक और मुंह से बाहर आ जाए, पता नहीं!
किसी तरह से वहां से आये, एक पेड़ के नीचे आ रुके, बदन में खारिश सी उठने लगी मेरे तो!
"बताओ?" कहा मैंने,
"हर तीन महीने के लिए, यहां एक मुक्तक नियुक्त किया जाता है!" बोला वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"वर्चस्व न रहे!" बोला वो,
"किसी एक का?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"ये हालू?" पूछा मैंने,
"आज हट जायेगा!" बोला वो,
"व्यवस्था!" बोले वो,
"हां, व्यवस्था!" बोला वो,
"दादू से ऊपर कोई नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"उसका वर्चस्व?" पूछा मैंने,
"वो इन सभी से अलग रहते हैं!" बोला वो,
"अलग?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"वो महाप्रबल हैं!" बोला वो,
तभी बाहर खटपट सी हुई, हम सभी चौंके और................!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

अजीब सी खटपट थी वो, एक अलग सी ही आवाज़, हम रुक गए थे जहां के तहां, दरअसल, सम्मा भी न समझ पाया था वो आवाज़ें, उसने हमें इशारा किया अपने होंठों पर उंगली रखते हुए, और खुद उस दरवाज़े की तरफ बढ़ा!
बिना दरवाज़ा खोले उसने, उसकी झिरी से बाहर देखने की कोशिश की, सर दो तीन बार घुमाया, लेकिन उस समझ नहीं आया, तब मैं आगे गया और बाहर झांका, कोई भी नहीं था वहां पर, और अब आवाज़ें भी आनी बंद हो गयी थीं, तभी कुछ दिखा मुझे, गौर से देखा, अब देखा तो लगा की शायद वो कोई हाथ-ठेली सी है!
"क्या है?" पूछा उन्होंने,
"शायद कोई ठेली है!" कहा मैंने,
"अरे हां! होगी!" बोलै सम्मा,
"ठेली?" पूछा मैंने,
"हां!" बोलै वो,
"सामान?" पूछा मैंने,
''हां!" बताया उसने,
"अच्छा!" बोले शहरयार!
"कुछ देर रुकते हैं और चलते हैं फिर!" बोला वो,
"दादू?" पूछा मैंने,
''सामान आया है तो आ गए होंगे!" बोला वो,
"सम्मा?" पूछा मैंने,
"हां?" बोला वो,
"ये दादू कहां का है?" पूछा मैंने,
"रक्सौल जिला!" बोला वो,
"उम्र?" पूछा मैंने,
"सत्तर?" बोला वो,
"कब से यहां है?" पूछा मैंने,
"आठ या दस साल से!" बोला वो,
''पहले कहां था?" पूछा मैंने,
"नेपाल" बोला वो,
"नेपाल?" पूछा मैंने,
"हां! वहां बहुत पकड़ है दादू बाबा की!" बोला वो,
"पकड़ मायने?" पूछा मैंने,
"रुतबा!" बोला वो,
"समझा, सरंक्षण!" कहा मैंने,
"हां, बहुत!" बोला वो,
"समझा!" कहा मैंने,
"यहां भी!" बोला वो,
"हां, नेता लोग?" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"सो तो है ही!" बोला मैं,
"बिन संबंध हुए कैसे सम्भव ये सब!" बोले शहरयार!
"वही तो!" कहा मैंने,
"तो तुम्हारा दाह-स्थल?" बोले वो,
"यहीं" बोला वो,
"और संस्कार?" पूछा मैंने,
"कोई नहीं!" बोला वो,
"तो ये सच है!" कहा मैंने,
"क्या?" बोला वो,
"कि सरभंगों का संस्कार नहीं होता!" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"या तो गाड़ दो या फिर, यहीं फूंक दो!" कहा मैंने,
"जी, यही!" कहा मैंने,
"सामान क्या क्या आया होगा?" पूछा मैंने,
"मांस, लेड़ी, पूजन का सामान!" बोला वो,
"लेड़ी?" पूछा मैंने,
''माला!" बोला वो,
"कैसी?" पूछा मैंने,
"हड्डी की ही!" बताया उसने,
"आदमी की?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"ये कौन बनाता है?" पूछा मैंने,
''आती हैं!" बोला वो,
"सुना है, खाये हुए की ही हों?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"कोई और नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"तो जो ये खाते हैं, पेट भरते हैं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"कोई टोक नहीं, जितना खाओ!" बोला वो,
"कैसे पकाते हैं?" पूछा मैंने,
"पकता नहीं, भुनता है!" बोला वो,
"चिता पर!" कहा मैंने,
"हां!" कहा मैंने,
तभी बाहर से कुछ आवाज़ें आने लगीं!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

अब बाहर फिर से झांका तो दो सरभंग थे, कुछ सामान ले जा रहे थे, आपस में बतियाते हुए!
"यहां कोई भंडारगृह है कोई?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोला वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"यहां रखा होगा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"यहीं से ले जा रहे हैं!" बोला वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
वे सामान ले गए थे, और कुछ देर बाद ही हम भी तैयार हो गए थे, उसके अनुसार जैसे ही नाद हो, हमें वहां सम्मिलित हो जाना था!
"लो!" कहा मैंने,
और सिगरेट उनको दी,
"लाओ!" बोले वो,
"शराब का तो पता ही नहीं चला?'' बोला मैं,
"बिलकुल!" बोले वो,
"दिनेश?" बोले वो,
"हां?" बोला वो,
"कुछ पड़ा है?" पूछा उन्होंने,
"है! पानी नहीं है!" बोला वो,
"नहीं, फिर नहीं!" बोले वो,
"ले लो?" कहा मैंने,
"अरे नहीं!" बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"आप लोगे?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"नंगी?" बोले वो,
"तो क्या?" कहा मैंने,
औघड़ी बोलचाल में नंगी मतलब, नीट, बिना पानी मिली हुई शराब! जिसमे खालिस शराब ही हो, और कुछ भी नहीं!
"है अप्सरा ही?" बोला वो,
"कोई बात नहीं!" बोले वो,
उसने झोला ढूंढा और दे दी निकाल कर हमें बोतल, खोली और बड़े बड़े से घूंट भरे मैंने और फिर उन्होंने, रही सही उन्होंने चाट ली!
और फिर एक नाद हुआ! बड़ा ही तेज!
"आओ जी!" बोला वो,
''आओ!" कहा मैंने,
और हम बाहर निकले! चलते बने!
"ये कैसी बदबू है?" बोले थूकते हुए वो,
"सड़े मांस की सी!" कहा मैंने,
"बहन** क्या सड़ा मारा?" बोले वो,
"धीरे!" बोला सम्मा,
"सम्मा?" बोले वो,
"हां?" बोला वो,
"वहां से मत चल!" बोले वो,
रुक गया वो,
"फिर?" पूछ लिया उसने,
"दूसरे रास्ते से चल?" बोले वो,
"लोग मिलेंगे?" बोला वो,
"देखी जायेगी!" बोले वो,
''चलो फिर!" बोला वो,
और वहीँ से बाएं हो लिया, अब हम रास्ते पर चले आये, यहां इक्का-दुक्का लोग मिल रहे थे, उनसे अहोम बोलते, हम आगे बढ़ते गए!
"वहां तो लाश उठ जाती!" बोले वो,
"बदबू बहुत है!" कहा मैंने,
इनके लिए ख़ुश्बू!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"मर जाओ बहन के **!" बोले वो,
"गाली नहीं यार!" कहा मैंने,
"क्या करूं?" बोले वो,
''कुछ देर और बस!" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
और तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा, मैंने पीछे देखा ये एक सरभंग था, करीब पैंतालीस  साल का! मैं रुक गया!
"अहोम!" बोला वो,
"अहोम!" कहा मैंने,
"कहां से?" पूछा उसने,
"भेतिया से!" बोला मैं,
"कब आये?" बोला वो,
''आज ही!" बताया मैंने,
"कब चला?" बोला वो,
"कल!" कहा मैंने,
"कल?" बोला वो,
और आसपास देखा उसने, फिर हम सभी को एक एक कर घूरने लगा! फिर आया मेरे पास, मुझे घूरा!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

''किसके साथ आया?" पूछा उसने, 
''सम्मा के?" कहा मैंने,
"कौन सम्मा?" पूछा उसने,
"ये!" कहा मैंने,
"सम्मा?" बोला वो,
शायद पहचान गया था उसको!
"हां!" बोला वो,
"कब लाया तू?" पूछा उसने,
"कल, कल सुबह" बोला वो,
"किस से पूछ कर?" पूछा उसने,
अब मैं जानता था कि ये हुई गड़बड़! पता नहीं अब वो कैसे संभालता, उसने तो एक आवाज़ देनी थी कि वहां सभी इकट्ठे हो जाते!
"बैजा से पूछी थी!" बोला वो,
"बैजा?" बोला वो,
"हां?'' बोला वो,
"कहां है बैजा?" पूछा उसने,
"अंदर होगा?" बोला वो,
"बैजा छोड़ गया!" बोला वो,
छोड़ गया? ये बात नहीं मालूम थी इस सम्मा को? बैठे बिठाये मुसीबत गले पड़ जाने वाली बात थी वो!
"हां, उसी ने कहा था कि चला जाए, एक रात की तो बात है?" बोला वो,
"चुप्प?" बोला ज़ोर से!
"कहां जाएगा?" पूछा उसने,
"वापिस" कहा मैंने,
"वापिस?" बोला वो,
"हां" कहा मैंने,
"क्यों?" बोला वो,
"काम था आज, निबटा लिया!" बोला मैं,
"किस से काम था?" बोला वो,
"अहोम श्री गंगा राम जी से!" कहा मैंने,
"गंगा से?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"मिल आया?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
चुप हो गया वो! और फिर थोड़ा पीछे हुआ!
"सुन, सम्मा?" बोला वो,
"हां?" बोला वो,
"जाए तो मिलना मुझ से!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा उसने,
"तू मैदान जा रहा है?" बोला वो,
ओह..!! मुसीबत टल गयी! गंगा जी के पल के परली पार जो आश्रम सा बना था वहां सरभंग श्री गंगा राम जी का स्थान था, वही याद रहा मुझे सो बोल दिया, इसकी बातों से पता लगा कि अभी भी गंगा राम सरभंग ज़िंदा ही है!
"तो आ फिर?" बोला वो,
"आता हूं!" बोला वो,
"आ जा!" बोला वो,
"बस अभी!" कहा उसने,
"और सुन?" बोला मुझ से,
"हां?" कहा मैंने,
"किसे जानता है तू वहां?" बोला वो,
"सभी को तो नहीं?" कहा मैंने,
"फिर भी?" बोला वो,
"मलंग जी आदि!" बोला मैं,
"मलंग? या मंगल?" बोला वो,
"जी मंगल!" कहा मैंने,
''अच्छा! यहीं से गया है वो!" बोला वो,
स्थूल-बुद्धि!
"आओ फिर!" बोला कंधे पर हाथ रखते हुए,
"आ रहा हूं!" बोला मैं,
"सामान?" बोला वो,
"वो ही आ रहा है!" बोला मैं,
"अच्छा, ठीक, आ जाओ!" बोला वो,
और मुड़कर, चल पड़ा, मैदान के लिए!
"कमाल कर दिया गुरु जी आपने! सच में ही कमाल!" बोले शहरयार!
"मैं बस उसके भाव पढ़ता रहा!" कहा मैंने,
"इस माँ के, बहन के, मुसिया ** ने तो मरवा ही दिया था!" बोले वो, गुस्से से,
"घबरा गया था मैं!" बोला वो,
"कौन है ये?" पूछा मैंने,
"पुराना आदमी है यहां का!" बोला वो,
"क्या नाम? " पूछा मैंने,
"रघराम!" बोला वो,
"चलो, जान बची!" बोला गजनाथ,
"आओ अब!" बोला वो,
"चलो!" कहा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

वैसे एक बात कहूं? कह देता हूं! जब आप इस प्रकार के विरोधी मतावलम्बियों के बीच में हों तब भय तो ग्रसित करेगा ही! देखिये, यहां साधन नहीं, कोई क्रिया का स्थल नहीं, अपनी रीत की सामग्री नहीं, कोई अलख भी नहीं, और तो और अपना मुवक़्क़िल बादशाह इबु भी न हाज़िर हो सके! न ही तातार ही! तब क्या कीजै? तब या तो आपके पास उन्नत हथियार हों, यहां, वो भी नहीं, कोई कट्टा भी नहीं, कोई तलवार, चाक़ू या अपना त्रिशूल भी नहीं! चलो, मान लो, आन ही पड़े जान बचाने की, तो रास्ता क्या हो? अब या तो हलाक़ कर दो और हलाक़ हो जाओ संग! लेकिन वैसे स्थिति में भी मैंने कुछ ठान ही रखी थी! ड्राइवर बाहर खड़ा था, बस सोया न हो!
उस समय समय करीब एक का हो रहा होगा, मेरी नज़र सामने एक आसन पर पड़ी, आसन पर एक वृद्ध सा, झुका हुआ सा सरभंग बैठा था, यही दादू था, इन सरभंगों का बाबा या राजा!
"सम्मा?" बोला मैं,
"हां?" कहा उसने,
"क्या यही दादू है?" बोला वो,
"हां, दादू बाबा!" बोला वो,
"हालू कहां गया?" पूछा मैंने,
"सामान लेने!" बोला वो,
हम सभी पीछे बैठे थे, मैंने मिट्टी सामने की फांक ली थी, कि वहां कुछ साफ़ न दिखाई दे!
और तब वहां वो हाथ ठेली आ पहुंची! उस पर सामान नहीं था, उस पर तीन लाशें थीं, जैसे उनकी हत्याएं की गयी हों, उन्होंने कहां से जुटाई थीं, ये तो नहीं पता लेकिन उस लाशों में एक औरत और दो मर्द थे, एक बालक भी था, करीब दस बरस का रहा होगा!
सहसा ही दादू खड़ा हुआ, और ये देख वो सब खड़े हो गए!
"अहोम!" गूंजा एक नाद!
और दादू, हिलता सा आगे चला, एक एक कर,अपने पांव से उन लाशों के चेहरे देखे, इशारा किया और उस औरत की लास्क को अलग कर दिया, वे मर्दों की लाशें एक साथ बिछा दी गयीं! और वो खुद, वापिस, पीछे जा बैठा, जहां बैठा हुआ था!
तब, उसने कुछ बोला, और एक पच्चीस बार्स का लड़का सा सामने आया, दादू के घुटनों में सर रखा और हुआ पीछे, दादू ने कुछ इशारा सा किया, दो औरतें आगे आयीं, उस औरत की लाश से कपड़े उतारने लगीं और जब उतार लिए, तब उस औरत को उन लाशों पर लिटा दिया, कुछ इस प्रकार कि उस औरत की योनि कुछ उठ गयी, अब उस युवक ने, उन लाशों की परिक्रमा सी की, बार बार दादू को प्रणाम करता जाता, अंतिम आज्ञा प्राप्त कर, उसने अपनी लंगोट खोल दी और उस औरत के ऊपर लेट गया, सरभंगों में जैसे कोई उल्ल्हास सा हुआ, सभी ने चीख चीख कर नटेश्वर का भोर-नाद सा किया!
काम-क्रीड़ा उस मृत-देह संग बड़ी ही वीभत्स थी, उस स्त्री के मुख से झाग निकलती जाती थी, अब समझ आया ये स्त्री, इन्हें कहीं नदी से मिली होगी, शायद डूबने से मृत्यु हुई थी! उसके मुख से हवा सी निकलती थी, और वो युवक, तन्मयता से, चिल्ला चिल्ला कर काम-मग्न था!
"ये सब?" बोला मैं,
"** ** हैं सब के सब ये!" बोले वो,
"ओफ्फफ्फ्फ़!" कहा मैंने,
"उन सभी को देखो?" बोले वो,
और अचानक से उस युवक का वीर्यपात हुआ, वीर्यपात होते ही, वो वहां से दौड़ निकला, हद की बात तो ये, कि वो अंत तक कहीं नज़र भी नहीं आया!
उन औरतों ने तब उस औरत को हटा दिया वहां से, उठाया और जलती हुई चिता में फेंक दिया! उसकी लाश नरम पड़ने लगी लेकिन हाथ और पांव छोड़ते चले गए! पेट अचानक से फूला, धुंआ सा उठा और पेट फट पड़ा! उसके लीथड़े और चीथड़े उड़ पड़े हवा में, यहां तक तो नहीं पहुंचे लेकिन हमने अपनी मुद्रा संभाल ली थी, कि कहीं वो सड़े हुए से अवयव हम पर ही न गिर पड़ें!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

मेरा और शहरयार जी का तो जी उचट गया था, मन कर रहा था कि हाथ में एक बिजली वाला आरा हो और इन सरभंगों रख रख कर काट दिया जाए! जो हाथ जोड़े, उसको तो सबसे पहले! मृत देहों का ऐसा अपमान? मृत देह तो प्राण त्यागते ही, इस संसार की नहीं रहती, कोई भी धर्म हो, मज़हब हो, मृत देह से कोई शत्रुता नहीं रखता! वाल्मीकि रामायण में श्री राम जी का चरित्र इस का सबसे बड़ा उदाहरण है, जब मेघनाद ने तीन दिवस तक, वानर-सेना, श्री राम-सेना आदि का संहार किया, त्राहि-त्राहि मचा दी, देवताओं द्वारा प्रदत्त अस्त्र-शस्त्र विफल कर दिए, विद्याओं का विध्वंस कर दिया, राम-लक्ष्मण को, नाग-पाश में बांध, पीड़ित किया, गरुड़ की मदद लेनी पड़ी! लक्ष्मण जी को वीर-घातिनि शक्ति द्वारा मूर्छित कर दिया, हनुमान, सुग्रीव, नल-नील, अंगद आदि की शक्ति शून्य कर दी अपने वज्रास्त्र से, और युद्ध का मुख ही बदल दिया! एक पल को लगा, मेघनाद ने नियति को ही बदल कर रख दिया है और रावण की हार को, विजय में परिवर्तित कर दिया है तब, लक्ष्मण जी ने राम-आन मंत्र का प्रयोग कर, अस्त्र को अभिमंत्रित कर, उस अस्त्र का नाम पराशूंजय-अस्त्र कहा जाता है, से मेघनाद का वध किया! जब मेघनाद की देह और मस्तक भूमि पर गिरे, तब देवताओं ने उल्ल्हास मनाया! हर्षनाद गूंज उठा, तब जामवंत जी ने, श्री राम से कहा कि इस असुर कुमार ने तीन दिवस तक त्राहि-त्राहि मचा दी! अतः, इस असुर कुमार का शव क्षत-विक्षत कर लंका भेजा जाए! वानर सेना की यही इच्छा है! तब श्री राम ने कहा, कि मेघनाद, असुर कुमार ने वही किया जो एक पुत्र अपने पिता के लिए करता है, वही किया जो एक युवराज अपने राज्य के लिए करता है! वो परम बलशाली था, उस सा वीर न हुआ, न ही होगा, और शत्रुता, मात्र तभी तक रहती हैं जब तक शत्रु में शत्रुता निभाने की क्षमता होती है, घायल, अंग-भंग हुआ, युद्ध में, विक्षिप्त हुआ, क्षमा मांगता हुआ शत्रु, शत्रु नहीं शेष रह जाता! और यदि, युद्ध में ही शत्रु की मृत्यु हो जाए तो उसकी मृत-देह शत्रु नहीं रहती! उसक देह के साथ वही करना चाहिए, जो एक पुत्र अपने पिता के लिए, एक मित्र अपने मित्र के लिए और एक संस्कारी मनुष्य, संस्कार के कारण करता है!
खैर जी, वो युग और थे और अब युग और हैं! अब तो सोते हुए शत्रु को मार दें, दुर्घटना से मार दें, विष दे दें आदि आदि! आज की शत्रुता मान की कम और धन-धान्य, सम्पत्ति, सत्ता आदि की अधिक है! कब पुत्र ही प्रबल शत्रु हो जाए, क्या कहा जा सकता है! जिस ने अभी थाली में संग भोजन किया हो, कब थाली में छेदकर दे, क्या पता! समय पर्वत सा बलवान है और हम, धुंए से हल्के! लाख टकराएंगे, शेष न बचेंगे!
अब घटना....
चिताएं सुलग रही थीं, वे सभी सरभंग नाच-गा रहे थे! दादू सर को हिला रहा था और तब हालू आया वहां पर! बैठ गया नीचे ही! हाथ में पोटली थी उसके, पोटली खोली और उसमे से, कलेजे निकाले, ये कलेजे मनुष्यों के ही थे, बड़े और भूरे से रंग के, उन पर भस्म मली गयी, और एक टुकड़ा काट कर, सामने चिता में फेंक दिया गया! सभी सरभंग जैसे चौकस हो गए! उठा वो हालू!
और तब, एक एक कर वे सभी सरभंग वहां से गुजरे, गुजरते, टुकड़ा लेते और मुंह में डाल लेते, चबाते और छाती पर थाप दे, चिता को नमन कर आगे, फिर से बैठा जाते अपने स्थान पर!
"अब?" कहा मैंने,
सुना सम्मा ने,
"यही करो?" बोला वो,
"क्या?" बोला मैं,
"यही!" बोला वो और इशारा कर बताया कि लो, मुंह में डालो, भले ही चबाओ नहीं, निगल जाओ, बस!
ओहो! बदन में से खून जैसे चू जाए! और नमक उड़ कर उन छेदों से अंदर चला आये!
"मेरे बस में नहीं!" बोला मैं,
"और मेरे भी!" बोले वो,
"मेरे भी!" बोला दिनेश,
"मैं भी नहीं!" बोला गजनाथ!
सम्मा हंसने लगा!
"करना तो होगा!" बोला वो,
"न करूं तो?" बोला मैं,
"दंड!" बोला वो,
"कैसा दंड?" बोला मैं,
"ये मार देंगे!" बोला वो,
"इनकी तो ** * *** में **!" बोले वो, और खड़े हो गए!
"बैठो?" बोला मैं,
खींचा उन्हें और बिठा लिया!
"अभी समय है!" बोला मैं,
"जाना तो होगा?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"फिर?" बोले वो,
"एक मिनट!" बोला मैं,
और आसपास देखा अपने! कुछ आया दिमाग में!
"गजनाथ?" बोला मैं,
"हां?" बोला वो,
"पत्ते तोड़ ला वहां से!" कहा मैंने,
"पत्ते?" बोला वो,
"ला तो सही?" कहा मैंने,
"लाया!" बोला वो और....................!!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

वो चला गया और कुछ ही देर में लौट आया, पत्ते भर कर हाथों में, मुझे दिए, मैंने ले लिए, ये पत्ते कट्ठे के थे! ठीक थे, जैसा सोचा था वैसे ही थे! मैंने कुछ पत्ते दिए शहरयार को, उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया!
"ये लो!" कहा मैंने,
"क्या करना है इनका?" बोले वो,
"जब आपको वहां जाना पड़ेगा, तब उस से पहले ये पत्ते मुख में रख लेना, कूंच कर!" कहा मैंने,
"बाकी समझ गया!" बोले वो,
"इस से बचाव हो जाएगा!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
तब वो दिनेश और गजनाथ भी समझ गए थे, अभी हमारा बुलावा नहीं आया था, कुछ समय लगा जाता!
"ये ऐसे ही खिलाते होंगे?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"तरीक़ा तो इनके हिसाब से ठीक है!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
वहां और भी सरभंग आते, चले जाते, औरतें आतीं और बैठ जातीं! और इस प्रकार आ गया हमारा बुलावा भी, उसने दूसरा कलेजा निकाल लिया था, ये कुछ गहरे से रंग का था! मैं उठा, पत्ते मुंह में कूंच ही लिए थे,  बढ़ने लगा उसकी तरफ, मुझे आते देख, हालू ने अजीब सी नज़रों से मुझे देखा, हाथ से इशारा कर आगे बुलाया! फिर गौर से देखा, और एक टुकड़ा, करीब एक इंच का, बढ़ा दिया मेरी तरफ! मैं सर झुकाया और वो टुकड़ा, कैसे भी करके मुख में रख लिया, और चल पड़ा वापिस, न जिव्हा ने छुआ था न ही मुख के तालू ने, आया मैं, तो दिनेश जा चुका था, मैंने झट से वो टुकड़ा निकाल भार फेंका, हाथ से और पीछे फेंक दिया, तभी हालू की नज़र  फिर से मेरी तरफ पड़ी, मैंने तब तक पत्ते भी फेंक दिए थे, उसने देखा तो मैंने कुछ चबा रहा होऊं ऐसा मुंह चलाया, तब उसने नज़रें हटा लीं!
और इस प्रकार हम ये पड़ाव भी पार कर गए, हालू वहीं खड़ा था अभी तक, लेकिन देख नहीं रहा था अब!
"बच गए!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"आपने बचा लिया!" बोले वो,
"युक्ति आयी दिमाग में!" कहा मैंने,
"तभी तो!" बोले वो,
मैंने पीछे देखा, अब कुछ नहीं था वहां, कोई टुकड़ा नहीं, शायद वहां के श्वान खा गए थे, बस किसी ने देखा ही न हो!
तभी दो सरभंग पास आये!
"उठो?" बोला वो,
मैं उठ गया,
"तुम भी?" बोला सभी से,
हम सभी उठ गए!
"आओ?" बोला वो,
"कहां?" पूछा मैंने,
"आ जा?" बोला मेरे बाल पकड़ते हुए वो,
"बता?" कहा मैंने,
और बाल छुड़ा लिए अपने!
"सामान लाना है!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
और हम सब चल पड़े, उसने दिनेश को, गजनाथ को वहीं रहने दिया, मुझे, शहरयार को और सम्मा को साथ ले लिया!
"नया आया है?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"कहां से?' बोला वो,
मैंने जगह का नाम बता दिया!
"सब ठीक है वहां?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"जगह बदल ली?" बोला वो,
"अभी नहीं!" कहा मैंने,
"उस पर तो कब्ज़ा हो गया था?" बोला वो,
"बात चल रही है!" कहा मैंने,
वो हंसने लगा!
"बात में ** लाएंगे!" बोला वो,
"और क्या?" कहा मैंने,
"यहां किसको जानता है?' बोला वो,
"सम्मा को!" कहा मैंने,
"भेजा किसने?" बोला वो,
"बैजा ने!" बोला वो,
"अभी वहीं है?" बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?' बोला वो,
"दूसरी जगह!" कहा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"दूसरी कौन सी जगह?" पूछा उसने,
अब मैं अटका! ये तो पता ही नहीं था! सम्मा भी जवाब न दे पाया!
"कौन सी?" बोला वो,
"कौन सी क्या?" बोला मैं,
"कौन सी मतलब, कंटी, पावनपुर?' बोला वो,
"कंटी बोला था!" बोला मैं,
"वहीं जाता!" बोला वो,
और हंसने लगा!
"पावनपुर जाता तो?" बोला मैं,
"कैसे जाता?" बोला वो,
"कैसे नहीं?" पूछा मैंने,
"पावनपुर में, जेत के होते कैसे?" बोला वो,
"अरे हां!" कहा मैंने, हां में हां मिला दी!
"वापिस कब जाएगा?" पूछा उसने,
"आज दोपहर!" बोला मैं,
"वापिस?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"सेठ से मिला?' बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"क्यों?" बोला वो,
"समय ही नहीं मिला!" कहा मैंने,
"कपड़े-लत्ते मिल जाते, थोड़ा धन भी?" बोला वो,
"बाद में देखूंगा!" कहा मैंने,
"तेरी मर्ज़ी!" बोला वो,
"जी!" कहा मैंने,
"आ, इधर?" बोला वो,
"तू भी?" बोला शहरयार से,
"हां?" बोले वो,
"तू अंदर देख ज़रा?" बोला वो,
"किसे?" बोले वो,
"सामान को?" बोला वो,
"सम्मा को ले जाऊं?" बोले वो,
"ये नहीं!" बोला वो,
"अच्छा!" बोले वो,
"सम्मा? तू बाहर ठेली निकाल?" बोला वो,
"हो!" बोला वो,
"जा? अंदर जा?" बोला ठेलता हुआ शहरयार को वो!
"अभी लो!" बोले वो,
और आगे चले गए! देखने लगे उधर ही! उधर भी पेट्रोमैक्स ही जला था, बिना शीशे का!
"तू खोखी निकाल?" बोला वो,
मुझे समझ नहीं आया!
"अरे?" बोला वो,
"जा?" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
मैं अंदर आया, वो भी, उसके साथ कोई नहीं था, मैं, शहरयार और वो सरभंग! वो एक तरफ खड़ा हो गया, कुछ ढूंढने सा लगा!
"खोखी वो रही, उठा?" बोला वो,
मैंने कुछ इशारा किया और शहरयार मुस्तैद हो गए! फिर वो सरभंग खड़ा हुआ, और मुस्कुराने लगा!
"खोखी नहीं जानता ना?'' बोला वो,
"नहीं जानता!" बोला मैं,
"तेरे पास ही क्यों आया मैं?" बोला वो,
"मुझे क्या पता!" कहा मैंने,
"क्योंकि न कंटी  में ही कोई है और न पावनपुर में ही! सच बता? कौन है तू? नहीं तो तेरे इतने टुकड़े होंगे कि तेरी आत्मा भी न गिन पाए! बता?" चीखा वो, और हटने लगा एक तरफ!
"अच्छा?" बोले शहरयार,
और पीछे से दबा लिया उसका गला! बाजू से घेर कर! मैं दौड़ा आया और आसपास देखा, वो गौं-गौं करने लगा था, तड़पने लगा था, जैसे ही गरदन झूली, नीचे छोड़ दिया उसको, तब उसकी नाक से श्वास देखी, अभी ज़िंदा था!
"इसे यहीं लगा दो!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
झटपट से, कुछ बोरियां सी लीं और उसको ढांक दिया, उठाकर, एक जगह पीछे डाल दिया!
"इस से पहले इसे होश आये, भाग लो!" कहा मैंने,
"हां, चलो, अब देर नहीं!" कहा उन्होंने,
हम जैसे ही हम बहार निकले, कि तीन सरभंग दिखाई दिए, हमें रोक लिया!
"इतनी देर क्यों?" बोला वो,
"इधर गए हैं!" बोला वो,
"किसलिए?" बोला एक,
"कोई बुला ले गया!" कहा मैंने,
उसने भद्दी सी गाली दी एक, उसको और वहीं खड़े हो गए! अब तक सम्मा ठेली ले आया था, मैं सम्मा के पास चला और खुसर-फुसर में बता दिया कि गजनाथ और दिनेश को यहां से फौरन निकालो, फौरन!
सम्मा के हाथ-पांव फूले! काँप ही उठा वो तो, लेकिन वो चलता बना, उसे आवाज़ तो दी एक ने, लेकिन रुका नहीं वो, मैंने इशारे से कह दिया था, कि मैं ले जाऊंगा ठेली!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

 

कुछ समय बीता, न कोई आना ही था, न ही कोई आया! वे हुए बेचैन से, एक चला आया मेरे पास!
"अरे कहां को गए थे?" पूछा उसने,
"उधर को!" कहा मैंने,
"उधर?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"अरे? जाकर देख तो?" बोला एक से,
हो! बोला वो, और चला गया उधर!
"सामान तो निकालो?'' बोला वो शहरयार और उस आदमी से,
"हां!" बोले वो,
"जाओ?" बोला वो,
वो उस आदमी के साथ चले गए, मैं बाहर ही रहा, कहीं इस आदमी को भी न चटका दें वहीं पर, शुक्र मना रहा था! कि तभी वो आदमी, एक बोरा लाता हुआ दिखाई दिया, वो बोरा गीला था, आते ही उस ठेली पर ला पटका उसने!
"रुक?" बोला वो,
"रुका हूं!" कहा मैंने,
"घूम ले?" बोला वो,
"अच्छा जी!" कहा मैंने,
और ठेली घुमा ली, इतने में जो आदमी आया था, वो वो ही था जो ढूंढने गया था, कोई नहीं मिला था उसे, अब भला मिलता भी तो कैसे?
"हां?" बोला वो,
"नहीं है कोई!" बोला वो,
"चल सामान डाल और चल!" बोला वो,
"हम?" बोले शहरयार,
"तुम उसको लेकर आना!" बोला वो,
दूसरा बोरा निकाला और रख दिया ठेली पर, और वो ठेलते हुए चले गए! जब चले गए तब मैं दौड़ कर उनके पास आया!
"ओह! जान बची!" कहा मैंने,
"अब निकलो यहां से?" बोले वो,
"गजनाथ तो आये?" बोला मैं,
"आता होगा!" बोले वो,
"अंदर कुछ डंडा आदि है?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"और वो मरा तो नहीं?" पूछा मैंने,
"पता नहीं!" बोले वो,
तभी वे आते दिखाई दिए, इस बार सम्मा नहीं था उनके साथ! मैं सारा माज़रा समझ गया, अब और मुश्किल होने वाली थी! सम्मा अपना नाम तो लेता नहीं, हां, हम ज़रूर फंसने वाले थे!
वे दोनों आ गए! घबराये हुए!
"क्या कर दिया?" कांपते हुए बोला गजनाथ,
"भागो यहां से!" कहा मैंने,
"चलो!" बोला वो,
हम चारों आसपास देखते हुए अब उसी संकरे रास्ते की तरफ बढ़ने लगे, कि एक भारी सा शोर सुनाई दिया! समझ आ गया, तलाश शुरू हो गयी! शोर पास आता जा रहा था, हम भी भागने लगे! अंधेरा! नज़र कुछ आये न, अंदाज़े से आगे बढ़ते चले गए, एक जगह पहुंचे, दीवार चार फ़ीट की होगी, रुक गए! शोर और नज़दीक आया!
"कूदो इसे!" कहा मैंने,
और हमने उस दीवार को कूदने के लिए जैसे ही पकड़ा, हम चारों के बोझ से दीवार भड़भड़ा कर गिर गयी! मेरी ठुड्डी में ईंट लगी, खून निकलने लगा, लेकिन किसे परवाह अब! हम भागे साथ साथ! गाड़ी दिखाई दी! फौरन लपके, गाडी तक आये और ड्राइवर सो रहा था! उसे जगाया!
"जल्दी! जल्दी!" कहा मैंने,
और हम घुसे उस गाड़ी में!
उसने जैसे ही गाड़ी स्टार्ट की, कि ईंट पत्थर पड़ने लगे, हमने आव देखा न ताव, स्टार्ट कर, दौड़ लिए! रास्ता खराब था, एक जगह गाड़ी रुक गयी! स्टार्ट भी हुई और पीछे देखा, कम से कम पचास सरभंग हाथों में हथियार लिए दौड़े चले आ रहे थे!
वे चिल्ला रहे थे, पत्थर फेंक रहे थे हम पर! हमने कोई कसर न छोड़ी और चलते रहे, गाड़ी पूरी कचकचा सी गयी! लेकिन वो इतनी तेज भाग रहे थे कि जैसे यहां खूब रेस लगाते रहे हों!
"शहरयार?" कहा मैंने,
"हां?" बोले वो,
"सब्बल, जैक कुछ मिले तो निकाल लो?" कहा मैंने,
ड्राइवर ने बताया और हमने निकाल लिए, कभी कभी कोई सरभंग पास तक आ जाता, गाड़ी को भगाते, गाड़ी का नियंत्रण खराब हो जाता!
"आ! आ तेरी दादी की **!" चिल्लाये शहरयार!
हमारी नज़रें पीछे ही थीं, कि ब्रेक लगे! सामने देखा, आठ या दस, किसी और रास्ते से वहां तक आ गए थे, गाड़ी की रौशनी में ऐसे लग रहे थे जैसे भूत!
"कुचल दे! कुचल दे!" चिलाये शहरयार!
और गाड़ी आगे बढ़ी! तेज! और तेज!

   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"हैं? घबरा कर बोला ड्राइवर,
"हां!" कहा मैंने,
"चल? चल?" चीखे शहरयार!
और गाड़ी बढ़ने लगी आगे! रफ्तार से, जैसे ही सामने आये वो, दो सामने टकराये, एक बाएं जा गिरा और एक शायद, अटक गया था पहिये में, बाकी इधर-उधर छिटक लिए थे!
"रुकना नहीं? बस?" कहा मैंने,
ड्राइवर को जैसे काठ मार गया! उसने शायद अभी तक किसी के ऊपर गाड़ी नहीं चढ़ाई थी, थर-थर कांपने लगा! पीछे देखा, गिरे हुए सरभंगों को कुछ उठा रहे थे और कुछ दौड़े चले आ रहे थे हमारी तरफ!
"चल?" बोले शहरयार,
अब न हिले ड्राइवर! मारे भय के वो तो पत्थर ही बन गया था! उतरे नीचे शहरयार! और उस ड्राइवर को पकड़, पीछे धकेला और खुद ने सीट संभाल ली! जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, गाड़ी में से फट-फट की आवाज़ आयी!
"जाना कहां है?" बोले वो,
''जहां रास्ता दिखे, खींच लो!" कहा मैंने,
एक पत्थर आ कर टकराया पीछे, शीशा टूट गया गाड़ी का! हम आगे बढ़े लेकिन यहां भी गाड़ी में से फट-फट की आवाज़ आये! आसपास देखा, खाली ही रास्ता सा था, कोई नहीं था वहां!
"मैं देखता हूं, रुको!" बोले वो,
"कोई दिक्क्त है क्या?" पूछा मैंने,
"डबलिंग कर रही है गाड़ी!" बोले वो,
और बाहर निकले, मैं भी बाहर आ गया, तस्सली से तो नहीं, जल्दी-जल्दी जांच की!
"ये देखो!" बोले वो,
"बाजू है?" बोला मैं,
"हां, कुचली हुई!" बोले वो,
"ये तो शायद लिपट गयी है!" कहा मैंने,
"सब्बल लाना?" बोले वो,
"लो!" दे दिया मैंने,
अब उन्होंने, मैंने, जूतों से दबा-दबा वो बाजू अलग की! हड्डी नज़र आ तो रही थीं, लेकिन हाथ का पंजा, अब गायब हो गया था!
"चलो!" कहा मैंने,
"चलो, जल्दी!" बोले वो,
और हमने फिर आगे बढ़ाई गाड़ी! सामने चले, तो गड्ढे से आ गए! यहां से तो नहीं आये थे हम!
"ये कौन सी जगह है?" बोले वो,
"पता नहीं?" कहा मैंने,
"घुमाता हूं!" बोले वो,
और घुमाने लगे!
"वो देखो!" कहा मैंने,
"अरे हां!" बोले वो,
और गाड़ी वहीं के लिए बढ़ा दी! अब दौड़ाई गाड़ी, मिट्टी में कभी गाड़ी इधर सरके, कभी उधर सरके!
आगे आये तो फिर से रुकना पड़ा! सामने तो कोई मैदान न हो, जंगल ही था, वहां कोई रास्ता नहीं था! अब जैसे हम फंस गए थे!
"बत्तियां बंद कर दो! जल्दी!" कहा मैंने,
"लो!" बोले वो,
बत्तियां बंद और घुप्प अंधेरा! हाथ को हाथ न सूझे!
"इन्हें शक कैसे हुए?" बोले वो,
"शायद कंटी नाम की कोई जगह ही नहीं!" कहा मैंने,
"या फिर पावनपुर!" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"शायद हालू को शक था!" कहा मैंने,
"कैसे हुआ?" पूछा उन्होंने,
"या तो हमने जगह बदली, या फिर उसने हमें वो कलेजा फेंकते देखा!" बोला मैं,
"हो सकता है!" बोले वो,
"एक काम करो?" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"निकलने का रास्ता देखो!" कहा मैंने,
"यहां तो कुछ दीख ही नहीं रहा?" बोले वो,
"गाड़ी पर खड़े हो जाओ!" कहा मैंने,
"ये ठीक है!" बोले वो,
वो गाड़ी पर चढ़े, आसपास देखा!
"है कुछ?" पूछा मैंने,
"कुछ नहीं!" बोले वो,
"आ जाओ!" बोला मैं,
उतर आये नीचे!
"साले यहां आ गए तो?" बोले वो,
"आएंगे तो ज़रूर!" बोले वो,
"ढुंढेर मची होगी!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"और कहीं वो मर गया होगा, तब तो वे भी तैय्यार ही होंगे!" बोले वो,
अचानक से, कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आने लगीं उधर! हम हो गए चौकस! सांसें थाम लीं अपनी!


   
ReplyQuote
(@rajkaran)
Active Member
Joined: 2 years ago
Posts: 8
 
  1. @1008 दादा आगरे की शिगना गांव के बारे में कुछ जानकारी दें। 

   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उस बीहड़ से जंगल में, कुत्तों के भौंकने की आवाज़ गूंजे जा रही थी, हों वो भले ही कहीं भी, लेकिन गंध के सहारे या फिर, कैसे भी वे, खोज ही लेते हमें! तब तो भारी मुसीबत हो जाती! हमारे पास हथियार की कमी थी, एक-आद भी होता, तो आज सच में ही हम लाशें बना देते गिरा कर इन सरभंगों की! बहुत ही भारी भूल हो गयी थी, कम से कम गाड़ी में ही छिपा लाते!
शोर बंद हो गया उनका!
"लगता है, गए!" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उन्होंने,
"आसपास पहुंच गए हैं शायद!" बोला मैं,
"तो फिर कुत्ते?" बोले वो,
"वो और चौकस हो गए होंगे!" कहा मैंने,
"ओहो! अब?" बोले वो,
"ये गाड़ी न होती तो हम दौड़-भाग कर लेते, छिप भी सकते थे, लेकिन इस गाड़ी का क्या करें? ये देख ली तो इसमें आग लगा देंगे वो!" कहा मैंने,
"ये तो है!" बोले वो,
"अब हम हैं कहां ये भी तो पता नहीं?" कहा मैंने,
"इस गजनाथ से पूछता हूं!" बोले वो,
वे गए और डर के मारे, दुल्लर हुए उस गजनाथ को निकाल लिया बाहर!
"एक बात बता?'' बोले वो,
"क्या जी?" बोला वो,
"हम कहां हैं?" पूछा मैंने,
"भैलवा से बाहर, शायद?" बोला वो,
"कोई रास्ता पता है?'' पूछा उन्होंने,
"कभी नहीं आया इधर!" बोला वो,
"तू भी माँ ** अपनी, बहन के **!!" बोले उसे धक्का देते हुए, वो बस गिरा नहीं, तक लगा ली थी गाड़ी की!
"अब रात भर तो यहां रुक नहीं सकते?'' कहा मैंने,
"हां, आना ज़रा?" बोले वो,
"चलो?" कहा मैंने,
उन्होंने अपना लाइटर टटोला, पता चला वो तो है ही नहीं! फौरन अपने कपड़े निकाले, और मैंने भी पहन लिए, अब याद आये थे कपड़े भी! लाइटर जलाया तो आसपास, देखा, पीछे एक नदी सी थी, नीचे को जाती हुई, आगे कोई रास्ता नहीं! जहां हम खड़े थे, वहां जंगल था! पेड़ों के समूह में हम जा छिपे थे गाड़ी सहित!
"एक ही तरीका है!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"वापिस लो!" कहा मैंने,
"वापिस?" बोले वो,
"हां, रास्ता मिले कोई?" बोला मैं,
"ठीक! आओ!" बोले वो,
गाड़ी पीछे करने के लिए स्टार्ट की, लेकिन वो अब स्टार्ट ही न होये! थोड़ी मेहनत लगी और स्टार्ट हो गयी, जिस रास्ते पर हमारे पहियों के निशान बने थे, हम लौट पड़े! अभी तक तो कोई खतरा नहीं लग रहा था! ड्राइवर हैरान था, उसकी गाड़ी को नुक्सान तो पहुंचा था, लेकिन अभी तक ज़िंदा था, सो बदल मंज़ूर हो गया था उसे!
गाड़ी चल रही थी धीरे धीरे...
"रुको!" फुसफुसाया मैं,
"हां? कोई है क्या?" पूछा उन्होंने,
"नहीं, वो देखना?" कहा मैंने,
"कहां?" बोले वो,
"गाड़ी घुमाओ?" कहा मैंने,
उन्होंने गाड़ी घुमाई, एक रास्ता ऊपर की तरफ जा रहा था, शायद ये कहीं जा कर मिल जाए, मैंने तो उम्मीद की थी!
"रास्ता है?" बोले वो,
"देखते हैं!" कहा मैंने,
"चलूं?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
हम धीरे धीरे ऊपर की तरफ चल पड़े, चढ़ने से पहले रुक गए, मैं बाहर निकला,
"रुको, देखता हूं!" कहा मैंने,
मैं ऊपर आया, सामने देखा, एक रास्ता था, लेकिन कोई बत्ती आदि नहीं थी! मैं वापिस चला आया! बैठ गया!
"चलो!" कहा मैंने,
"है रास्ता?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"चलें?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
हम ऊपर आ गए, गाड़ी ने जान लगाई, पीछे से टकराई एक पत्थर से, लेकिन निकल आये, गड्ढे भरे रास्ते पर गाड़ी आगे बढ़ने लगी! आसपास कोई बसावट नहीं थी, पता नहीं कहां चले जा रहे थे हम, नदी कहां है? कुछ नहीं पता था, पता चल जाता तो शायद पुल का भी पता चल जाता!
"ये रास्ता ही है?" बोले वो,
"लगता तो है!" कहा मैंने,
और तभी उन्होंने गाड़ी में खींच के ब्रेक लगाए! बत्तियां बंद कर दीं उन्होंने, मैंने देखने से चूक गया था शायद, आसपास देखा तो एक जगह कुछ प्रकाश सा दिखाई दिया! मैं और वे उतर आये नीचे और..............!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

मैंने वहां के भूगोल का अंदाजा लगा और सर ही पीट लिया! ये क्या हुआ? जहां से चले थे वहीं लौट आये, बस फ़र्क़ इतना कि पहले पूर्व से आये थे, ये पश्चिम से आना हुआ! इसका मतलब ये हुआ, कि हम दक्षिण की तरफ भागे थे, और घूम कर फिर से यहीं वापिस आ गए! कुल पंद्रह या बीस किलोमीटर का फेर था!
"ये क्या?" बोले वो,
"अब क्या करें?" कहा मैंने,
"अब रास्ता भी यहीं से है!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"वहां गए तो कट गए समझो!" बोले वो,
"सो तो है!" कहा मैंने,
"पीछे कोई रास्ता नहीं!" बोले वो,
"नहीं है!" कहा मैंने,
"तो अब?" बोले वो,
"अब क्या हो?'' पूछा मैंने,
"काटो रात इधर ही?" बोले वो,
"वक़्त क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"तीन बीस!" बोले वो,
"सुबह भी तो वहीं से जाएंगे?" बोला मैं,
"ये तो है!" बोले वो,
"ये साले लाश बने बैठे हैं!" बोले वो,
"उनकी बुद्धि डगमगा गयी है!" कहा मैंने,
"वो कितना होगा?' पूछा मैंने,
"आधा किलोमीटर तो मानो?" बोले वो,
"इसका मतलब खोज ज़ारी होगी?" बोला मैं,
"होगी तो!" बोले वो,
कुछ देर हम शांत से बने रहे!
"इसका मतलब हम गलत मुड़ गए?'' कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"तब एक कमा करें?" बोला मैं,
"क्या?'' बोले वो,
"धीरे धीरे चलें?" बोला मैं,
"उस से क्या होगा?'' बोले वो,
"सामने कोई आएगा?" पूछा मैंने,
"आ सकता है!" बोले वो,
"और नहीं भी!" कहा मैंने,
"हां, नहीं भी!" बोले वो,
"एक तो गाड़ी छोटी है!" कहा मैंने,
"यही तो!" बोले वो,
"बड़ी होती तो कोई बात ही नहीं थी!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"कुचल तो मैं देता!" बोले वो,
"मैं भी!" कहा मैंने,
"तो आओ, समझ गया मैं!" बोले वो,
"समझे न?" बोला मैं,
"हां!" कहा मैंने,
"सुबह का इंतज़ार नहीं किया जा सकता!" कहा मैंने,
"ठीक!" बोले वो,
"उन्हें लगता होगा, हम भाग गए!" बोला मैं,
"हां!" बोले वो,
"उठाओ फायदा!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
"बत्ती बंद रखो!" कहा मैंने,
"इतना तो दीख ही रहा है!" बोले वो,
"पूनम की रात है!" कहा मैंने,
"ये रास्ता वहीं से जाएगा!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
हम फिर से गाड़ी में बैठ गए, अब जो होना था सो हो! सामने कोई भी आये, अब नहीं छोड़ना था, जैसे पहले कुचल दिए थे, ऐसे ही कुचल देना था, जान बचाने के लिए, जान लेनी पड़े तो कोई हर्ज़ा नहीं!
गाड़ी स्टार्ट की! इंजन ने अपनी आवाज़ शुरू की! हल्की सी किचर सी हुई आगे! शीशे पर सामने खून की बूंदें लगी थीं, अब तक मिट्टी जम चुकी थी उन पर!
"धीरे धीरे!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
और रुक गए!
"वो क्या है?'' बोले वो,
"कोई स्थान है शायद?" बोले वो,
"क्या बोलते हो?" बोले वो,
"अपने रास्ते चलो!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
हम चले बने उधर के लिए, धीरे धीरे आगे बढ़ते जाते, रुक जाते, जायज़ा लेते और फिर चल पड़ते! अभी फिलहाल तक तो कोई नहीं मिला था!
"वो होंगे?" बोले वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,


   
ReplyQuote
Page 4 / 5
Share:
error: Content is protected !!
Scroll to Top