वर्ष २०१४ बागपत जिल...
 
Notifications
Clear all

वर्ष २०१४ बागपत जिला, तहसील खेकड़ा की दुल्हन!

38 Posts
4 Users
2 Likes
641 Views
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उसने जैसे ही गिरेबान पकड़ा कि उस आदमी ने एक हाथ से उसका टेंटुआ पकड़, उठा लिया हवा में! तमंचे से गोली निकली और बेकार! पहलवान का ये हाल देख, दूसरा भी आया मदद को, उसको भी दूसरे हाथ से थाम लिया! और फिर जो लट्ठ-पिटाई की कि जब तक बेहोश नहीं हो गए, लठैत ने छोड़ा ही नहीं!
अस्पताल से खबर मिली कि दोनों की ज़ुबान हलक़ से खींच दी गयी थी, उखाड़ दी गयी थी! बच पाना बड़ा ही मुश्किल था उनका, बेहोश थे अभी तक, क्या हुआ था, क्या नहीं ये तो वो ही बताते!
खैर, जब खबर उड़ी तो भय सा छाया, ऐसा कौन सा पहलवान आ गया कि दोनों जवान लड़कों को, इतनी बेरहमी से पीटा गया? एक नहीं होगा, कोई टोली होगी, और जुबां खींच दी गयी थी, काटी नहीं थी, इसका क्या मतलब हुआ?
"चाचा?" बोला मुकेश,
"हां?" बोले वो,
"ये वो ही राखा है?" बोला वो,
"लगता है!" बोले वो,
"बड़ा बुरी तरह से पीटा!" बोला वो,
"सालों ने ज़रूर बदतमीज़ी की होगी?" बोले वो,
"हां, वो पहलवान तो ऐसा ही है!" बोला मुकेश,
"अब सुन?" बोले वो,
"हां?" बोला वो,
"मुझे तो कल जाना है वापिस!" बोले वो,
"अच्छा!" बोला वो,
"तू रात-बेरात वहां न जाना!" बोले वो,
"ना!" बोला वो,
"और किसी को बताने की ज़रूरत नहीं, भली?" बोले वो,
"हां!" कहा उसने,
"ठीक है!" बोले वो,
"चाचा, नाज बंधा दिया है, बालकन को कूकड़ी रखवा दी हैं, गन्ने तो हैं ही!" बोला मुकेश,
"ठीक है!" बोले वो,
और अगले दिन, घरवालों से विदा ले, वापिस हो लिए वे रामपाल! उस रास्ते से गुजरे, रुकवाई गाड़ी और वो मंदिर देखा!
"राखा!" बोले वो,
मुकेश ने उन्हें देखा!
"जा रहा हूं!" बोले वो,
और गाड़ी आगे बढ़ गयी!
"चाचा?" बोला वो,
''हां?" बोले वो,
"अब न भूलो आप?" बोले वो,
"ना!" बोले वो,
"कर भी क्या सकते हैं!" बोला वो,
''देखता हूं!" बोले वो,
"क्या करोगे?" बोला वो,
"मुक्ति!" बोले वो,
"इनकी?" बोला वो,
"हां!" कहा उन्होंने,
"यक़ीन करेगा कोई?" बोला वो,
"करेगा!" बोले वो,
"कैसे?" पूछा उसने,
"खुद देख कर!" बोले वो,
"कोई आएगा?'' बोला वो,
"हां!" बोले वो,
"किसी को जानो हो?" बोला वो,
"ना!" बोले वो,
''फिर?" पूछा उसने,
"बेटे!" बोले वो,
"जी?" बोला वो,
"जब यहां तक कड़ियां जुड़ गयीं, तो आगे भी जुड़ेंगी!" बोले वो,
"हां!" कहा उसने,
"मैं फ़ोन करूंगा!" बोले वो,
''हां, इंतज़ार करूंगा!" बोला मुकेश,
"ख़याल रखियो!" बोले वो,
''चिंता न करो!" बोला वो,
और इस तरह रामपाल, पहुंच गए स्टेशन, गाड़ी यहीं से चलनी थी तो देर न होनी थी! मुकेश ने सारा सामान रखवा दिया था!
"परांठे रखवा दिए हैं!" बोला वो,
''अच्छा!" बोले वो,
"कोई चिंता नहीं करना!" बोला वो,
"नहीं और अपना ख्याल रखियो मुकेश!" बोले वो,
"जी चाचा!" बोला वो,
और पांच छू लिए चाचा की१ चाचा ने गले लगा लिया उसे!
"रुक?" बोले वो,
"हां?" बोला वो,
"ले! ये रख ले, अपने लिए!" बोले उसे हज़ार रु देते हुए!
"हैं मेरे पास!" बोला वो,
''रख ले चुपचाप!" बोले वो,
"अच्छा चाचा!" बोला वो, और रख लिए पैसे! गाड़ी ने सीटी मारी, और झंडी फहराई जाने के लिए तैयार हो गयी! मुकेश ने मुस्कुरा के विदा किया चाचा को अपने! बैठ गए थे रामपाल...


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

गाड़ी चल पड़ी थी, एक शहर से दूसरे शहर और दूसरे से तीसरे, लेकिन जो विचार होते हैं, उनमे पड़ाव नहीं होते! वो एक ही धागे में बांध निरंतर, गोल-गोल से घूमते चले जाते हैं, जब आगे हों और पीछे हों, तब चिंताएं बना करती हैं! कहने को ये कोई चिंता नहीं थी, राखा कौन? भोजा कौन? दुल्हन कौन? इस से भला क्या फ़र्क़ पड़ता था किसी को? पता नहीं कब से भटक रहे हैं और न जाने कब तक भटकेंगे! इस से हमें क्या? भटकना हे तो भटकें! इसे तो हम नियति का ही खेल कह, कुआं ढक देंगे! लेकिन, कई हृदय ऐसे होते हैं, जिनमे उस बनाने वाले ने, वो मिट्टी बनाई ही नहीं जिस से वो कुआं ढका जा सके! चाह कर भी नहीं! और रामपाल का हृदय भी कुछ ऐसी मिट्टी से अलग ही बनाया था! रास्ते भर उनका शरीर गाड़ी में रहा, लेकिन मन, विचार और सोच, वहीं उस मंदिर, उस राखा, उस भोजा, वो गांव, वो साधू, वो परिवार आदि उनमे ही अटका रहा! उस उपरवाले ने जो खेल खेला था, अब अपने परिणाम की और अग्रसर था, और उपरवाले को, कुछ ऐसे किरदार तो चाहिए ही होते हैं जिन्हें वो सरलता से 'मूर्ख' बना ले! जो कोई प्रश्न ही न करें, सोचें ही नहीं इस बारे में, पागल सा ही रहें, वो ही तो पहुंचता है उस तक! तो रामपाल ऐसे ही किरदार थे जो चुन लिए गए थे, मुकेश की सहभागिता थी!
मित्रगण! हफ्ता बीता, मुकेश से बातें होती रहीं, कोई और घटना नहीं हुई थी फिलहाल तक, रामपाल जी का मन नहीं लगता था, न भूख और न प्यास, न घर और न बाहर, न उठता ही बने न बैठे ही बने! आखिर उनकी पत्नी ने इस सब का कारण पूछा, उन्होंने बतानी तो न चाही, लेकिन उस से छिपाने का भी क्या लाभ होता?
"आप बल्लभ से कुछ क्यों नहीं बताते?" बोली वो,
"क्या बताऊं?" बोले वो,
"यही सब?" बोली वो,
"यक़ीन नहीं करेगा!" कहा उन्होंने,
"मैं कह दूंगी!" बोली वो,
"तब कर लेगा?" पूछा उन्होंने,
"करना पड़ेगा!" बोली वो,
"न करे तो?" बोले वो,
"कोई रास्ता बताएगा?" बोली वो,
"करो बात?" बोले वो,
उसी समय बात की, कमाल ये, कि बल्लभ भी मान गया, बल्लभ, दिल्ली के पास ही रहता था, कहने को एक छोटी सी दुकान थी उसकी, लेकिन दिन भर लोग समस्याएं ले कर आते थे उसके पास! इसी से कुछ पैसा आता था घर में! मतलब, छोटा-मोटा गुनिया ही समझो उसे, रामपाल की पत्नी के गांव का ही था और घर कुनबे में, ताऊ का लड़का लगता था!
बल्लभ ने बुलाया था कि एक बार आ कर पूरी बात बताएं तो कुछ हो सकेगा तो किया जाएगा!
और वो दिन भी आ गया, राखी आने वाली थी, तो घर जाते समय, वे मिले बल्लभ से, जब बल्लभ ने सुनी तो साफ़ ही था कि वो कन्नी काट गया था! इतने पुराने प्रेतों से सामना इतना सरल भी नहीं! तो बल्लभ ने कुछ समय मांगा, किया तो कुछ जा सकता था नहीं मान ही गए!
उस दिन वे दिल्ली में ही थे, जब मेरे पास, ये खबर पहुंची! खबर पहुंचाने वाले मेरे एक जानकार ही थे, बैठे बैठे बात चली, बल्लभ ने बात कह सुनाई, उन्होंने जोश में मुझे ही फ़ोन कर दिया! मैंने रामपाल जी से मिलने की कही! और तीन दिन बाद का समय मुक़र्रर हो गया मिलने का! यहां बात प्रेतों की नहीं थी, यहां बात, पुराने समय के प्रेतों की थी, जो कम से कम सत्तर-अस्सी बरसों से लगातार भटक रहे थे, अपने 'अन्ध्वास' से अभी निकले थे और वो ही सब जी रहे थे, जहां से छूटे थे!
तो मेरी मुलाक़ात रामपाल जी से हुई! वे सरल हृदय, बनावट से दूर रहने वाले, ठेठ  देहाती और पक्की समझ के इंसान थे!
"आप जितना जानते हैं, बताया है?'' बोला मैं,
"जी सब!" बोले वो,
"इसमें कुछ अलग तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"कुछ लिया-दिया तो नहीं?" पूछा मैंने,
"बस परांठे ही!" बोले वो,
मैं मुस्कुरा गया!
"मुकेश ठीक है?" पूछा मैंने,
"जी!" बोले वो,
'तो आप चाहते हैं कि वे सब मुक्त हो जाएं!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"कुछ खर्चा?" पूछा मैंने,
"जो बन सकेगा!" बोले वो,
"मेरा नहीं! इन सब पर!" कहा मैंने,
"कोई चिंता नहीं!" बोले वो,
"तो मैं आपको...दो दिन बाद बताता हूं!" कहा मैंने,
"जी, मुझे इंतज़ार रहेगा!" बोले वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

मैंने जो कुछ सुना था उनके मुंह से, वो पर्याप्त नहीं था, कई नाम थे, कई किरदार, किया क्या किरदार था, ये भी अच्छे से पता नहीं था, एक बात तो समझ आती थी, कि राखा किसी दुल्हन के बारे में बता रहा था, जिसके साथ कोई उसकी सखी भी थी! लेकिन सवाल तो बहुत थे, राखा था कौन? दुल्हन को कैसे जानता था, जो मारे गए, वो कौन थे? जिसने मारा उन्हें, वो सब कौन थे? उस मंदिर के पास, ये कुल तीन थे, राखा और दुल्हन, और उसकी एक सहेली! चलो ये भी समझ आता था कि वो चाहता था कि कोई लिवाल आ जाए और उस दुल्हन को ले जाए, कौन था वो लिवाल? कौन आने वाला था? ये कुछ सवाल थे जिनका उत्तर जाने बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता था!
मैंने अगले दिन शहरयार जी से सम्पर्क साधा, वे किसी ब्याह में गए थे, उसी दिन आ गए थे, मैंने उन्हें कम शब्दों में ही बताया कि हमें बागपत जाना होगा, वो सहर्ष ही तैयार हो गए थे!
अगले दिन वो मुझ से मिले, नमस्कार हुई, हाल-चाल पूछा गया और फिर सीधे ही हम इस मामले पर आ गए, अब तक मैंने उन्हें वे सभी बातें बता दी थीं जो मुझे पता चली थीं!
"गांव गौना?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"भोजा?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"समझ आया!" बोले वो,
"और ये राखा, वो लठैत!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"अब यहां चक्कर है!" बोले वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"मान लिया जाए कि वे अपने अन्ध्वास से अभी जागे हैं, ठीक, तो जगह वो ही है?'' बोले वो,
"हां, जगह तो वो ही है!" कहा मैंने,
"राखा के मुताबिक़ वहां से आगे एक चौकी है?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"सुलेमान चौकीदार है वहां मुस्तैद!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"अब यहां एक सवाल!" बोले वो,
"क्या?' पूछा मैंने,
"बकौल राखा, मुखबरी हुई, मुखबरी की भोजा की लुगाई ने!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"इसका मतलब क्या हुआ?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"मतलब, भोजा और उसकी लुगाई के दोयमदरज़ा क़िस्म के लोगों से ताल्लुक़ात रहे होंगे!" बोले वो,
"लाजमी है!" कहा मैंने,
"नशा-फंकी का काम भी करता था!" बोले वो,
"हां!" बोला मैं,
"वैसे ठठेरा था!" बोले वो,
"हां, गांव गांव घूमता था!" कहा मैंने,
"अपनी लुगाई को ले!" बोले वो,
"हां, लगता है!" कहा मैंने,
"तो इसका मतलब, बरात कहीं पूरब में जा रही होगी?" बोले वो,
"लगता है!" बोला मैं,
"लूट हुई, दूल्हा शायद मार दिया गया, राखा ने मदद की उस दुल्हन की, तो साफ़ है, उसने उस दुल्हन को छिपाया होगा!" बोले वो,
"यही बात है!" कहा मैंने,
"मामला पेचीदा है!" बोले वो,
"बहुत!" कहा मैंने,
"अब हमें और ज़्यादा पता नहीं!" बोले वो,
"पता करना पड़ेगा!" कहा मैंने,
"राखा से!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"मोम का धागा है साहब!" बोले वो,
''सो तो है ही!" कहा मैंने,
"खैर, जो होगा देखेंगे!" बोले वो,
"हां, यही कहा मैंने!" कहा मैंने,
''सामान बताइये?' बोले वो,
"लिखवा देता हूं!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उसी शाम हमने सामान ले लिया था, ये आवश्यक पड़ता है, समय पर कोई सामना नहीं मिले तो दिक्कत हो पड़ती है, विकल्प का कोई स्थान नहीं इस विद्या के संचारण में! सामान लिया और रामपाल जी को खबर कर दी, वे प्रसन्न हो उठे! उनके पास अवकाश था अतः वो दिन भी तय हो गया! हमें दिन शुक्रवार को निकलना था और आज बुधवार था, उस रोज त्रियोदशी थी, पूर्णिमा आने ही वाली थी! तो दिन तय हुआ और मैंने अब तैयारी आरम्भ करनी थी, आज्ञा लेनी थी, कुछ मंत्रादि, तंत्राभूषणादि भी नव-संचारित करने थे! सुजान और इबु को भी तत्पर ही रखना था, और अंत में तातार को भोग भी देना था, तातार कम ही आता है और उसका आना सच में ही हेरफेर कर देता है!
"इसका मतलब और कोई नहीं बचा!" बोले शहरयार,
"प्रतीत होता है!" कहा मैंने,
उन्होंने मुर्गे की भुनी हुई बोटियां निकाल ली थीं उस फॉयल-व्रैप से और रख दी थी, प्लास्टिक के दोनों में चटनी, प्याज और मूली भी रख दी थीं, साथ में टिक्के भी ले आये थे, उनके एक जानकार हैं, उनसे ही लाते हैं अपनी मर्ज़ी से ही बनवाते हैं, देसी घी घर से ले आते हैं और घर का ही दही भी इस्तेमाल किया करते हैं!
''वो पन्नी कैसे रह गयी?" पूछा मैंने,
"अरे हां! फ्राइड-आलू हैं!" बोले वो,
"तो निकाल लो!" कहा मैंने,
"अभी लो!" बोले वो,
और मेरी तरफ सिगरेट का पैकेट बढ़ा दिया मैंने लिया और रख दिया और उन्होंने आलू निकाल लिए! तब प्लास्टिक के गिलास में थोड़ा सा पानी डाल, नमक से मांज दिया, इस से प्लास्टिक की गंध अल्कोहल में नहीं आती और ये विषाक्त शेष नहीं रह जाता! अन्यथा, प्लास्टिक स्वयं ही ज़हरीला तत्व है! आप भी ऐसा ही किया करें यदि शौक़ीन मिजाज़ हैं तो!
"राखा ने खिवैय्ये कहा था?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"इसका मतलब?" बोले वो,
"मतलंब उस समय नदी शायद नावों से पार होती होगी!" कहा मैंने,
''अरे हां!" बोले वो,
"तब नाव ही साधन रहा होगा!" कहा मैंने,
''समझ गया!" बोले वो,
"तो उस जगह से यमुना आपस ही होगी?" बोले वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"होगी शायद!" बोले वो,
"तब नदियां चौड़ी थीं!" कहा मैंने,
"हां, कहते हैं बीच बीच में टापू भी थे!" बोले वो,
"रहे होंगे!" कहा मैंने,
"बागपत का अर्थ?" बोले वो,
"ये दरअसल, व्याघ्रपथ है!" कहा मैंने,
''महाभारत वाला?" बोले वो,
"हां! यहां कहते हैं उस समय बाघ रहते थे! बहुतायत में!" बोला मैं,
"हां, होंगे!" बोले वो,
"और वार्णाव्रत सुना है?" पूछा मैंने,
"जहां लाक्षागृह था?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
''आज?" बोले वो,
"बरनावा!" कहा मैंने,
"बड़ी पुरानी जगह है!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"शायद ये गांव पांडवों में मांगा था, वही न?'' बोले वो,
"हां! वही!" कहा मैंने,
"सब भूल-भाल गए लोग आज!" बोले वो,
और गिलास भर कर आगे कर दिया, मैंने उसमे से छह बूंदें भूमि-भोग दीं और दो ऊपर, फिर खींच गया!
"पुराने गांव भी अब ख़तम ही हैं!" बोले वो,
"सही कहा!" कहा मैंने,
"नहीं तो जगह जगह का इतिहास है!" बोले वो,
''हां!" कहा मैंने,
"ये रामपाल? कैसे आदमी हैं?" बोले वो,
"बड़े सरल!" कहा मैंने,
"फिर ठीक!" बोले वो,
"हां कही तभी तो!" कहा मैंने,
"सही किया!" बोले वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"हां, ईमानदार आदमी हैं!" कहा मैंने,
''जी! अब बात उन बाणा और उसके छोटे भाई काणा की!" बोले वो,
"हां?" कहा मैंने,
"ये डाकू थे, ये ही बताया था न?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"इसका मतलब, काफी नृशंष रहे होंगे!" बोले वो,
"ये तो है ही!" कहा मैंने,
"लेकिन वो राजस्थान से थे?" बोले वो,
"होंगे, तब हरियाणा नहीं था!" कहा मैंने,
"ये बात!" बोले वो,
''तब यहीं से रास्ता रहा होगा?" कहा मैंने,
"बिलकुल!" बोले वो,
"तब ये जगह बिलकुल ही अलग रही होगी!" बोला मैं,
''हां!" कहा उन्होंने,
"राजनैतिक उथल-पुथल मची होगी, आज़ाद का संघर्ष ज़ारी होगा!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"कैसा वक़्त होगा!" कहा मैंने,
"हां! वैसे एक बात समझ आती है!" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"रामपाल जी के लिए कड़ियां जोड़ दी गयी हैं!" बोले वो,
"मुझे भी लगता है!" कहा मैंने,
"तभी, भोजा के गांव तक जाना हुआ!" बोले वो,
"हां, और वो साधू भी मिला!" कहा मैंने,
"हां उसने ही बताया था रास्ता!" बोले वो,
"तब शायद वो ही रास्ता चलन में रहा हो?" कहा मैंने,
"ये मुमक़िन है!" बोले वो,
"वे दो लड़के, जो पीटे गए!" कहा मैंने,
"उनके साथ तो बहुत अच्छा हुआ!" बोले वो,
"फल मिल गया!" कहा मैंने,
"तुरंत ही!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
''अब इस से ये पता चलता है कि राखा का चरित्र कैसा होगा!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"तो अब मंज़िल है वो रास्ता!" बोले वो,
"वो मंदिर!" कहा मैंने,
"वो लठैत!" कहा उन्होंने,
"हां!" कहा मैंने,
"यहीं से आगे रास्ता खुलेगा!" कहा उन्होंने,
"हां!" बोला मैं,
"राखा ने कहा था कि कोई लौटता नहीं?" बोले वो,
''शायद किसी से कहा हो?" बोला मैं,
"किस से? इस बाबत कोई खबर नहीं?" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"हो सकता है वो उस समय की बात कर रहा हो?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"एक बात पर गौर किया?" बोले वो,
"किया!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"मैं यही पूछने वाला था!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"जब उस राखा ने दुल्हन को छिपाया होगा, तब, दुल्हन और उसकी सहेली अवश्य ही ज़िंदा रहे होंगे!" कहा मैंने,
"बिलकुल!" बोले वो,
''और वो राखा भी स्वयं!" बोला मैं,
"तो इसका मतलब कोई और भी लौटा?" बोले वो,
"या तलाशी?" कहा मैंने,
"हो सकता है!" बोले वो,
"तब राखा हलाक़ हुआ होगा!" कहा मैंने,
"और ये दोनों भी!" बोले वो,
"यहीं से है वो रास्ता!" कहा मैंने,
"पक्का!" बोले वो,
''तो अब राखा ही सबसे पहला किरदार है जिस से हमें मिलना होगा!" कहा मैंने,
"बिलकुल!" बोले वो,
और दूसरा गिलास भी अंदर!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"कुछ बताया कि वो मंदिर, कितनी दूर है उनके घर से?" बोले वो,
"नहीं बताया!" बोला मैं,
"आसपास सब खाली है?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"बीहड़ मतलब!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"तो ये दास्तान इस बीहड़ की है!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"आलू कहां से लाये?" पूछा मैंने,
''वहीँ था एक!" बोले वो,
"बढ़िया फ्राई किये हैं!" कहा मैंने,
"पुदीने की चटनी लगवाई!" बोले वो,
"तभी ज़बरदस्त हैं!" कहा मैंने,
और एक टुकड़ा और चबा लिया!
तो हम देर रात तक खाते-पीते रहे, फिर हल्का-फुल्का भोजन किया और सो गए, शहरयार जी का आज काम नहीं था तो संग ही रहे!
एक दिन के बाद, हम तैयार थे, सामान तैयार और मैंने सारी आवश्यक ज़रूरतें निबटा ली थीं! उन्हें उनके तंत्राभूषण पकड़ा दिए थे एक बैग में और अपने अलग रख लिए थे, अब हमारी मंज़िल थी बागपत! हमने रामपाल जी को फ़ोन कर दिया था, वे हमें एक जगह मिलने वाले थे, वहां से उन्हें लेना था और फिर चल पड़ना था आगे!
करीब तीन बजे वे मिल गए, आपसी बातें हुईं, उन्होंने कुछ सामान आदि के लिए पूछा, सामान हम ले ही आये थे, एक जगह चाय पी और फिर निकल पड़े!
"राखा की रास कैसी होगी?" बोले शहरयार,
"कम से कम सवा छह फ़ीट!" बोले वो,
"भारी-भरकम?" पूछा उन्होंने,
"नहीं पहलवान सा, कसा हुआ, सुतवां देह है!" बोले वो,
"अच्छा!" बोले वो,
"छोटी दाढ़ी है, मूंछें बड़ी हैं, उम्र में करीब चालीस के आसपास या कुछ ज़्यादा का हो!" बोले वो,
"दुल्हन देखी?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
'''क्यों?" पूछा उन्होंने,
''अरे डर के मारे बस पे** छूटने को था!" बोले वो,
"समझा!" बोले वो,
''पर बाद में आदमी भला लगा!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"बातचीत में भी सही और व्यवहार में भी!" बोले वो,
"मतलब समझदार!" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले रामपाल,
"घबराया हुआ था?" पूछा मैंने,
"ना!" बोले वो,
"मतलब विश्वास था उसे!" कहा मैंने,
"कैसा?" बोले वो,
"कि कोई आएगा ज़रूर!" बोला मैं,
"हां, बार बार कहता था!" बोले वो,
"गांव के बाहर कोई खंडहर है?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"थोड़ा दूर?" पूछा मैंने,
"जंगल में हो तो हो!" बोले वो,
"शायद चौकी वहीँ हो?" कहा मैंने,
"हो सकता है!" बोले शहरयार!
"सुनो जी?" बोले रामपाल,
"हां?" कहा मैंने,
"कुछा लेना-लाना हो तो बता दो?" बोले वो,
"है हमारे पास!" कहा मैंने,
"सच में?'' बोले वो,
"हां, है!" कहा मैंने,
"वैसे जी, उम्र काट गयी, कभी कुछ नहीं हुआ ऐसा!" बोले वो,
"समझो पर्दा अब उठा है!" कहा शहरयार ने,
''जी!" बोले वो,
बातें करते करते बस अब थोड़ी दूर ही रह गया था बागपत वहां से! एक क़स्बा आया, और उन्होंने गाड़ी रुकवा दी,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"सलाद-फलाद के लिए!" बोले वो,
"खीरे आदि?" बोले वो,
"हां, टमाटर, फल-फूल, निम्बू जैसे?" बोले वो,
"ले लो!" कहा मैंने,
वे चले गए, और सामने खरीदने लगे!
"भले आदमी हैं!" बोले वो,
"बेहद ही!" कहा मैंने,
तभी पीछे से हॉर्न बजा और...........!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

हॉर्न बजा, पीछे देखा, एक सरकारी गाड़ी थी, उसको जगह दी, वो निकली, और हम फिर से गाड़ी में ही बैठे रहे! आसपास लोगबाग, अपने कामकाज निबटा क़र, अब घरों की तरफ जाने वाले थे, कोई सवारी ऐसी नहीं थी जो खाली नज़र आये!
"अब तो हर जगह भीड़ ही भीड़ है!" बोले वो,
"हां जी!" कहा मैंने,
"क्या शहर, क्या क़स्बा!" बोले वो,
"बिलकुल सही कहा!" कहा मैंने,
तभी वे आ गए, झोला सा भर लाये थे, शायद घर के लिए भी सामान ले आये थे, आते ही बैठे और हम आगे बढ़े! करीब पौने घंटे में हम उस बड़ी सड़क पर आ गए! यहां रास्ता थोड़ा खुला सा मिला था, जल्दी चले और फिर उस गांव जाने वाली सड़क पर उतर आये!
"ये है वो रास्ता?'' पूछा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
"यहां आगे है वो जगह?" पूछा मैंने,
"हां, कोई दो किलोमीटर!" बोले वो,
"दिखाना ज़रा!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
आसपास काफी खुली सी जगह थी, ज़मीन बंजर ही थी, भूड़ थी, खेती आदि नहीं हो रही थी यहां, खेती दूसरी तरफ होती हो, तो होती हो! आसपास बड़े बड़े पेड़ लगे थे, पेड़ भी काफी बूढ़े थे, उस रास्ते की उम्र का पता बता रहे है अगर पूछो तो!
"रुको!" बोले वो,
गाड़ी में ब्रेक लगे, पहियों के नीचे की मिट्टी उछल सी गयी! हल्का सा झटका, और गाड़ी रुक गयी, इंजन ही बोले जा रहा था तब बस!
"वो देखिये!" बोले वो इशारा करते हुए,
"वो उधर, झुरमुट?'' कहा मैंने,
''हां जी!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वहीँ एक पुराना सा मंदिर है!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"और वहीँ हैं वे तीनों!" बोले वो,
उन्होंने कहा की वे तीनों, और इधर मुझे लगा कि झुरमुट में जैसे जान आ गयी! न जाने क्या राज़ दफन किये बैठा था वो झुरमुट अपने सीने में!
"ये मंदिर कब का है?" पूछा मैंने,
"कुछ नहीं पता जी!" बोले वो,
"मतलब होश से पहले का?" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
"देवी मां का है?" बोले शहरयार जी,
"जी, कहते तो यही हैं!" बोले वो,
"किसने बनवाया पता नहीं?" कहा मैंने,
"बंजारों का होगा!" बोले वो,
"बिलकुल सही!" कहा मैंने,
"हां!" बोले शहरयार!
तभी सामने से एक हॉर्न बजा, ये एक जीप थी, जीप हमारे सामने ही आ कर रुक गयी! वे ये देख उतर आये!
उधर से एक लड़का उतरा आते ही, पांव पड़े उनके! और उन्होंने गले से लगा लिया उसका!
"मुकेश!" कहा मैंने,
"वो ही होगा!" बोले वो,
रामपाल उस लड़के को संग ले आ गए हमारे पास, अब तक हम भी उतर चुके थे, लड़के ने नमस्कार की और हमारे पांव छुए!
"ये है मुकेश!" बोले वो,
"अंदाज़ा हो गया था!" कहा मैंने,
"तू कैसे आया?" पूछा चाचा ने,
"मन नहीं लगा, बहुत देर हो गयी थी!" बोला वो,
"और यहां चला आया?" बोले वो,
"हां!" बोला वो,
"ये नहीं रहता जी मेरे बिना!" बोले वो,
"समझ सकता हूं!" कहा मैंने,
"हाथों में पाला है!" बोले वो,
"तभी देखो!" कहा मैंने,
"आओ जी!" बोला वो,
"हां, चलो!" कहा मैंने,
"मई मुकेश के साथ जाऊं?" बोले रामपाल,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
वे बैठे और चल दिए गाड़ी मोड़! हम उनके पीछे चले!
"आज रात!" कहा मैंने,
"ठीक है!" बोले वो,
"जगह देख ही ली!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,


   
Jeet singh reacted
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

फिर हम उनके गांव पहुंचे, सीधे घर ही, गांव बड़ा ही खुला खुला सा है उनका! हम एक बड़े से घेर में चले आये और गाड़ी रोक दी वहां! अब चूंकि शाम हो ही चली थी, तो बालक-बच्चे तो सो ही गए थे, बाकी जो आता था, बैठता और राम राम जी ज़रूर कहता! गांव की एक अलग ही तहज़ीब हुआ करती है! इन्हीं गांवों ने शहर भी बसाये हैं, शहरों में रहने वालों की मूल जड़ें दरअसल गांव से ही जुडी हैं! गांवों में कुछ बुनियादी सुविधाएं हों, शिक्षा हो, रोजगार हो तो कोई इन शहरों में कभी आये ही नहीं!
तो जी एक चारपाई बिछा दी गयी, हमने हाथ-मुंह धोये, रामपाल जी एक बड़े भाई भी आये और उनसे भी मुलाक़ात हुई, वे भी सीधे से ही आदमी हैं, बनावट से कोसों दूर रहने वाले, कुछ ऐसे जो शहर में जा क़र अपने आपको कभी ढाल ही न पाएं!
मुकेश आया, हाथ में एक जग और दो बड़े से स्टील के गिलास लिए, रखे और एक गिलास दूध भर क़र, मुझे दिया, मेरे तो जी ने 'हरी ॐ' का नाद कर डाला! वो दूध भला पचे या नहीं! अब हमारे पेटों की गरारियां उस लायक नहीं बचीं कि ऐसा शुद्ध दूध पचा पाएं! चलो दूध पी भी लिया तो हज़म करना मुश्किल ही हो! ये लोग तो मेहनती है, इतना तो सोते भी नहीं जितनी मेहनत कर दिया करते हैं, यही होती है चूर हो कर ली गयी नींद, हामरी तरह से नहीं!
"लो जी!" बोला वो,
"अरे यार!" कहा मैंने,
"अब ले लो आप!" बोला वो,
मैंने ले लिया और फिर शहरयार जी ने भी ले लिया, अब एक कटोरी से, चम्मच से, मलाई निकाल ली और मिला दी दूध में! दूध बरोसी में औटाया गया था, इसकी तो ख़ुश्बू ही अलग होती है, शुद्ध मावे जैसी!
"ध्यान से!" कहा मैंने,
"हमें तो है!" बोले वो,
"जन सुबह क्या हो!" कहा मैंने,
"कुछ न हो!" बोले वो,
"कहीं पेट बोल पड़ा तो?" बोला मैं,
"नहीं जी!" बोले वो,
अब जैसे ही गिलास रीतता, झट से वो दूध डाल देता! मुझे तो डकार ही आ गयी! मैंने मना कर दिया और बात सुबह पर डाल दी, सुबह अगर सही रहा, पेट ने गलियां नहीं दीं तो बात अलग होती!
तभी रामपाल जी आ गये, उनके हाथ में भी दूध का गिलास था, बैठ गए, एक कटोरदान खोला, उसमे देसी घी ले लड्डू और पंजीरी थीं! मेरी तो सांस ही चढ़ गयी! 
"लो जी!" बोले वो,
मैंने एक ही लड्डू लिया, वो एक ही ऐसा बड़ा था कि पूछो ही मत! मैंने जब खाया तो सौंठ की सी महक आयी!
''सौंठ?" कहा मैंने,
"सौंठ, गोंद-कतीरा, मावा और घर का ही सबकुछ!" बोले वो,
"क्या बात है!" बोले शहरयार जी,
"मजा आया?" पूछा मैंने,
"न आवै क्या!" बोले वो,
"ये भी ले लो!" कहा मैंने,
अपना लड्डू उन्हें देते हुए!
"न! खाओ!" बोले वो,
"मुकेश?" बोले वो,
"जी?" कहा उसने,
"तैयार करवा दे?" बोले वो,
''सब तैय्यार है!" बोला वो,
"हां जी?" बोले वो,
''जी?" कहा मैंने,
"खाना?" बोले वो,
"खाना?" पूछा मैंने,
"हां?" बोले वो,
''अभी कहां?'' कहा मैंने,
"फिर?" बोले वो,
''अभी रुक जाओ!" कहा मैंने,
''रुक गए जी!" बोले वो,
दूध पिया, लड्डू खाया और फिर आराम किया, एक कोठरी में जा कर! शहरयार जी भी लेट गए!
"हां?" कहा मैंने,
"हूं?" बोले वो,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"नशा!" बोले वो,
"नशा?" पूछा मैंने,
"लड्डू का!" बोले वो,
"तभी तो मना कर रहा था!" कहा मैंने,
"वहां तो मिले नहीं?" बोले वो,
"वहां कहां!" कहा मैंने,
"तो बस!" बोले वो,
''तो लो मजे!" कहा मैंने,
"ले रहे हैं!" बोले वो,
"नींद आ रही है?" पूछा मैंने,
"हां, देह टूट सी रही है!" बोले वो,
मेरी हंसी निकल गयी ये सुन कर!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

अब जी, मैं भी झूठ क्यों बोलूं! घुटने, कोहनी तो मेरी भी बोलने लगे थे! खुलने को तैय्यार! तो बेहतर यही था कि कुछ देर छू ही, दुमई सांप की तरफ से मुंह छिपा के पड़ा ही रहा जाए! तो जी हम पड़े रहे!
नींद लग गयी थी, खुली करीब साढ़े आठ बजे करीब! मैं उठा और वे भी उठ गए, हाथ-मुंह साफ़ किये और फिर ज़रा बाहर चले आये, बाहर आये तो मुकेश दिखा, वो दौड़ा चला आया!
"कहां हैं चाचा तुम्हारे?" बोला मैं,
"बुलाऊं?" बोला वो,
"किसी काम में हैं?" पूछा मैंने,
"सलाद घिस रहे हैं!" बोला वो,
"घिस रहे हैं?" बोले शहरयार,
"मतलब, खीरा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"आओ जी!" बोला वो,
"चलो मुकेश!" कहा मैंने,
वो हमें लेकर, ऊपर छत पर चला आया, खेस बिछा कर पानी आदि सब तैयार था, एक बड़ी सी ऐश-ट्रे भी रखी थी और सिगरेट भी! एक कोने पर अखबार और तौलिया रखा गया था, एक टेबल-फैन चला हुआ था, उस से वो अखबार न उड़ जाए इसीलिए वो ऐश-ट्रे उसके ऊपर रखी थी!
"बैठिये!" बोला वो,
हम बैठ गए,
"आया!" बोला वो,
गया नीचे दौड़ता हुआ, और जल्दी ही चला आया, दो थाली सलाद ले आया था, खीरा, प्याज, हरी-मिर्च, नीम्बू, टमाटर, सेब, संतरा सब रखा गया था! मैंने एक टुकड़ा लिया सलाद का और चबाने लगा, ताज़ा खीरा था, ताज़ा की तो बात ही अलग होती है! और वे वे भी आ गए, गिलास लेकर, मुकेश ने ऊपर के कमरे से ही एक बड़े से बर्तन में बर्फ डाल रखी थी, सो रख दी!
''इतना सलाद?" बोले शहरयार,
"पता भी न चले!" बोले वो,
"पेट ही भर जाएगा!" बोले वो,
"खाली बचेगा!" बोले वो,
और मुकेश वहीँ बैठ मूली छीलने लगा, अब काला-नमक, भुना ज़ीरा और हींग बुरक दिया! ऐसी ख़ुश्बू उडी कि पेट में नगाड़ा बज गया!
और हम शुरू हो गए फिर!
"मुकेश?" बोले वो,
"जी?" बोला वो,
"कढ़ी ले आ!" बोले वो,
''लाया!" बोला वो और दौड़ कर नीचे चला!
"तो रामपाल जी?" बोले शहरयार,
"जी?" बोले वो,
"तब से पहले कुछ नहीं हुआ!" बोले वो,
"नहीं जी!" बोले वो,
"किसी के साथ भी?" बोले वो,
"नहीं जी!" बोले वो,
"ये पहली बार है?" बोले वो,
"मेरे होश में तो!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"पेड़ कौन से हैं वहां?" पूछा उन्होंने,
"पीपल है, बरगद-फरगद के हैं!" बोले वो,
"फरगद?" बोले वो,
वे मुस्कुरा पड़े, मैं भी!
"नीम है, मेहंदी है और जामुन भी है!" बोले वो,
"कोई जाता नहीं वहां?" पूछा मैंने,
'चरवाहे!" बोले वो,
"भेड़-बकरी, भैंस-भैंसा आदि?" पूछा मैंने,
"हां, मवेशी!" बोले वो,
"मतलब दिन में कुछ नहीं?" बोले वो,
"नहीं जी!" बोले वो,
"बंजारों का मंदिर है!" बोले वो,
"हां जी!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"सुनते थे कि कुआं होता था वहां कभी!" बोले वो,
"मंदिर का?" पूछा मैंने,
''वो ही होगा?" बोले वो,
"पूजन के लिए, पानी के लिए!" कहा मैंने,
"हां जी!" बोले वो,
"अब तो बंद होगा?" पूछा मैंने,
"अब कोई निशानी भी नहीं!" बोले वो,
''दब गया होगा!" बोले शहरयार,
"हां जी!" बोले वो,
"वक़्त हो गया!" कहा मैंने,
"सौइयों साल हो गए!" बोले वो,
"हुए होंगे!" कहा मैंने,
तभी मुकेश चढ़ आया उधर, कढ़ी ले आया था!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उसने कढ़ी, कटोरियों में डाल क़र दे दी, पकौड़ियां पड़ी हुई थीं, अब चूल्हे की कढ़ी हो तो उसका स्वाद? क्या कहने साहब! जिसने खायी हो, वो ही जाने! पहली चम्मच में ही तबीयत हरी हो गयी! हमने आहिस्ता से फिर अपना दौर आगे बढ़ाया, हमारा ये कार्यक्रम था कि करीब ग्यारह बजे हम उस जगह पर पहुंच जाएं, तक़दीर ने ज़ोर मारा तो हमें मिल ही जाता वो! बस एक बार मिलने की ही बात थी! फिर रास्ता अपने आप खुलने लग जाता!
"वैसे रामपाल जी?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
''आपने भी दया दिखाई!" कहा मैंने,
"देखा नहीं गया जी!" बोले वो,
"बात भी सही है!" कहा मैंने,
"यहाँ कोई अपना सुबह का गया सांझ को न लौटे तो कैसी हालत हो जाती है, और उधर देखो, न जाने कब से किसके इंतज़ार में हैं वे!" बोले वो,
"सही कहा आपने!" कहा मैंने,
"तो हो जाए इनका भी भला!" कहा उन्होंने,
"पूरी कोशिश है!" कहा मैंने,
"वैसे वो आदमी भला है!" कहा उन्होंने,
"हां!" कहा मैंने,
"नहीं तो वो दो लड़के, मरते मरते बचे!" बोले वो,
"खोट भांप लेते हैं ये!" कहा मैंने,
"बिलकुल जी!" बोले वो,
"आप में खोट नहीं तो कोई चोट नहीं!" कहा मैंने,
"क्या खोट करना साहब!" बोले वो,
"सही बात है!" कहा मैंने,
"क्या ले जाना है!" बोले वो,
"कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"किसी का भला होता हो, तो कर दो!" बोले वो,
"सही कहा आपने!" कहा मैंने,
"दिल दुःख के रह गया जी!" बोले वो,
"सो तो है!" कहा मैंने,
"और आप भी इसीलिए आये!" बोले वो,
"सच पूछो तो हां!" कहा मैंने,
तो हमारी बातें हुईं, और फिर हमने खाना भी खाया, मजा ही आ गया, चूल्हे की रोटियां और कढ़ी! साथ में पुराना अचार, जो चबाते हुए ऐसा लगे कि जैसे मक्खन! पेट भर के खाया!
और फिर बजे ग्यारह! हमने तैयारी कर ली, जो लेना था ले लिया, जो धारण करना था, कर लिया था!
"अब चलेंगे हम!" कहा मैंने,
"हम?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"हम नहीं?" बोले वो,
"चलो तो सामने नहीं पड़ना!" कहा मैंने,
"क्यों साहब?" बोले वो,
"बात पलट जायेगी!" कहा मैंने,
"सो कैसे?" बोले वो,
"सवाल करेगा!" बोला मैं,
"पहचान लेगा?" बोले वो,
"पल भर में ही!" कहा मैंने,
"फिर चौकी, चौकीदार सुलेमान!" कहा मैंने,
"चलो तो रुक जाना!" कहा मैंने,
"देख भी न सकें?" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कभी नहीं?" बोले वो,
''ऐसा नहीं?" कहा मैंने,
''फिर?" बोले वो,
"बाद में!" कहा मैंने,
"कब?" बोले वो,
"इंतज़ार करो!" अब बोले शहरयार!
"जैसी राजी!" बोले वो,
और फिर हम चल पड़े! उनकी जीप और हमारी गाड़ी! वे दोनों एक साथ और हम एक साथ, हम आगे और वो पीछे!
"जगह याद है?" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"एक रास्ता है पहले!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"ठीक!" बोले वो,
और गाड़ी आराम से चलाने लगे हम!
"आपने आभूषण धारण किये?" पूछा मैंने,
"हां!" बोले वो,
''ठीक किया!" कहा मैंने,
और फिर आ गया वो रास्ता!
"उतार दूं?" बोले वो,
"कहां?" पूछा मैंने,
"नीचे?'' बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

मैंने आती हुई जीप को रुकवा दिया और अपनी गाड़ी को भी, मैं उतरा नीचे, शहरयार भी गाड़ी बंद कर नीचे उतर आये, और हम दोनों तब जीप की तरफ चल दिए! वे भी उतर ही गए थे!
"ठीक है, आप यहीं रुकिए!" कहा मैंने,
"जैसा कहो!" बोले वो,
"वो जगह आगे है क्या?" पूछा मैंने,
"ज़्यादा नहीं!" बोला मुकेश,
"ठीक, अब आप यहीं रहना, हम आते हैं!" कहा मैंने,
और हम दोनों अब चल पड़े उस जगह के तरफ, आज अंधेरा इतना नहीं था, ज़मीन पर बिखरा शोरा चमक रहा था, जैसे रुई के फाहे पड़े हों उधर! मिट्टी काफी थी, हालांकि ज़मीन गीली नहीं थी!
"आप नहीं बोलना कुछ भी!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"जब तक मैं न कहूं!" कहा मैंने,
"ठीक है!" कहा उन्होंने,
हमारी दायीं तरफ वो मंदिर था, हम रुक गए, लेकिन वहां राखा नहीं था, कोई भी नहीं था, हां, कुछ जंगली बिलाव ज़रूर अपनी चमकदार आंखें दिखा जाते थे!
"कोई नहीं है?" बोले वो,
"आ जाए अभी?" कहा मैंने,
"ठीक!" बोले वो,
हमें करीब आधा घंटा हो गया, इस समय पौने बारह का समय रहा होगा, आकाश में चमक भरी थी तारों की, आकाशगंगा के स्तम्भ दीख रहे थे! ओरियन-तारासमूह तेज प्रकाश फैला रहा था, सप्तऋषि अपनी अलग ही आभा में चमक रहे थे, लेकिन ध्रुव तारा कुछ बदलियों में ढका था!
इस तरह आधा घंटा और बीत गया, कोई नहीं आया, अंधेरा भी अब करीब आने लगा था अधिक ही!
"क्या करें?" बोले वो,
"आओ!" कहा मैंने,
"आगे?" बोले वो,
"मंदिर!" कहा मैंने,
"ठीक होगा?" बोले वो,
"ये सोचने का समय नहीं!" कहा मैंने,
"जैसा कहो!" बोले वो,
और हम नीचे उतर गए, आगे चलते चले, झाड़ियां इतनी सघन नहीं थीं वहां, फिर से सम्भल कर पांव रखना पड़ता था!
"रुको?" आयी एक आवाज़,
हम ठहर गए वहीँ के वहीँ!
"कौन? इतनी रात गए?" पूछा मैंने,
"तुम कौन?" आयी आवाज़,
मैंने तभी पीछे देखा, एक लठैत खड़ा था, नीचे उतरने वाला था, देखते ही देखते नीचे उतर आया, वो एक टांग से लंगड़ाता था, एक कंधा झुक गया था उसका, वो आ रहा था!
लाठी की आवाज़ आयी, और वो करीब आ गया! अब मैंने देखा उसे, कम से कम साढ़े छह फ़ीट का रहा होगा! लम्बा सा सफेद सा कुरता पहने, कुर्ते की बायीं आस्तीन फट गयी थी! गले में एक धागा पड़ा था, और कानों में बालियां पहने था! मज़बूत, कसी हुई सी देह थी उसकी, फुर्तीला होगा, दीखता था! पांवों में कठिया-जूती पहने था, नीचे धोती पहन रखी थी, और कंधे पर एक झोला सा लटका था उसके, मूंछें बड़ी बड़ी थीं, अर्धचंद्र के घुमाव जैसी, हल्की सी दाढ़ी थी, आंखों के मध्य की हड्डी सुतवां थी, इसीलिए आवाज़ कड़क थी उसकी!
"कौन हो?" बोला वो,
"राम राम जी!" कहा मैंने हाथ जोड़ते हुए,
"राम राम जी!" बोला वो,
"गांव जा रहे हैं!" कहा मैंने,
"यहां रास्ता नहीं है!" बताया उसने,
''अंधेरा है, भूल गए रास्ता!" कहा मैंने,
"कौन गांव जाओगे?" पूछा उसने,
"किशनपुर!" कहा मैंने,
"किशनपुर?'' बोला वो,
''हां जी!" कहा मैंने,
"यहां तो कोई ना?" बोला वो,
"कहीं उधर?" बोला मैं,
''वहां भी नहीं?" बोला वो,
"गलत बता दिया जी किसी ने!" कहा मैंने,
"सीधे ही जाओगे?" बोला वो,
"हां जी!" कहा मैंने,
"मेरा एक कमा करोगे? जो सुनो तो?" बोला वो,
"बिलकुल जी, क्यों नहीं?" पूछा मैंने,
"आगे एक चौकी है!" बोला वो,
"अच्छा जी!" बोला वो,
''वहां सुलेमान चौकीदार तैनात होगा अभी!" बोला वो,
''अच्छा जी!" कहा मैंने,
"खबर दे दोगे?" बोला वो,
"कौन सी खबर?" पूछा मैंने,
"काट मची थी यहां!" बोला वो,
"अच्छा, फिर?" पूछा मैंने,
उसने हाथ उठाया और एक तरफ इशारा किया, और.......


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"रुको?" बोला वो,
"जी?" कहा मैंने,
"किसी ने भेजा तो नहीं?" बोला वो,
"नहीं जी!" कहा मैंने,
"तुम पर विश्वास कर सकता हूं?'' बोला वो,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"विश्वास करना मुश्किल है आजकल!" बोला वो,
"ये तो आपने सही कहा!" कहा मैंने,
"उधर?" बोला वो,
"क्या है उधर?" बोला मैं,
मेरा दिल ज़ोर से धड़का तभी!
"एक दुल्हन!" बोला वो,
"दुल्हन?" कहा मैंने,
"हां, उसकी सहेली भी!" बोला वो,
"वो भला यहां कहां से?" पूछा मैंने,
"काणा? नाम सुना है?" बोला वो,
"नहीं सुना!" कहा मैंने,
"वो, डकैत है!" बोला वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"और तुम?" पूछा मैंने,
"काणा ने काट मचाई!" बोला वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"लूट के लिए!" बोला वो,
"अच्छा? तो ये दुल्हन?'' पूछा मैंने,
"ये? खेकड़ा के सेठ की लड़की है!" बोला वो,
"खेकड़ा की? अच्छा!" कहा मैंने,
"भोजा! नाम सुना है?" बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"ठठेरा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"उसकी लुगाई ने मुखबरी करी!" बोला वो,
"तुम्हारा नाम?" पूछा मैंने,
"राखा!" बोला वो,
"राखा? तो ये दुल्हन यहां कैसे?" पूछा मैंने,
"मैं लाया!" बोला वो,
"तुम?" पूछा मैंने,
"हां, बचाकर!" बोला वो,
"काणा से?" बोला मैं,
"हां!" बोला वो,
"कोई रिश्तेदार हो इस दुल्हन के?" पूछा मैंने,
"मैं, मुलाज़िम हूं सेठ का!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"इसका दूल्हा?' पूछा मैंने,
"आ रहा होगा!" बोला वो,
"कहां से?" पूछा मैंने,
"पीछे गांव नहीं है? वो...मंसूरपुर?" बोला वो,
''हां! है!" कहा मैंने,
"वहां से!" बोला वो,
"दूल्हा वहां, दुल्हन यहां?" बोला मैं,
"मैं, मंसूरपुर से लाया बचा कर!" बोला वो,
"कहां ले जा रहे थे?" पूछा मैंने,
"चौकीदार के पास!" बोला वो,
"वो चौकीदार?" पूछा मैंने,
"हां, सुलेमान!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वो मदद करने वाला है, भला इंसान है!" बोला वो,
"समझा!" कहा मैंने,
"समझे न?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"मैंने औरों से भी कही, लेकिन लगता है, काणा यहीं है आसपास, जिनसे कही, वे नहीं लौटे, कोई नहीं लौटता, लौट पता!" बोला वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"मेरा ये काम कर दो?" बोला वो,
"क्या काम?" पूछा मैंने,
"चौकीदार सुलेमान को इत्तिला कर दो, वो आ जाएगा आदमी ले कर, ये दो जान, बच जाएंगी!" बोला वो,
"और तुम?" बोला मैं,
"मैं? इंतज़ार करूंगा!" कहा मैंने,
"किसका?'' पूछा मैंने,
"दूल्हे का!" बोला वो,
"क्या नाम है?" पूछा मैंने,
"राज सिंह!" बोला वो,
"क्या करता है?'' पूछा मैंने,
"कारोबार!" बोला वो,
"अच्छा!" बोला मैं,
"मेरा काम ख़त्म फिर!" बोला वो,
"फ़र्ज़?" कहा मैंने,
"हां, फ़र्ज़!" बोला वो,
कैसा फ़र्ज़ अदा कर रहा था राखा! जीते जी भी और अब मरने के बाद भी! अपने से ज़्यादा अपने मालिक, सेठ की लड़की की हिफाज़त कर रहा था! वो घायल था, लेकिन उफ्फ नहीं! चल नहीं पा रहा था, चल रहा था! 
"कर दोगे?" बोला वो,
"क्यों नहीं राखा!" कहा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"रुको?" बोला वो,
"जी?" कहा मैंने,
"किसी ने भेजा तो नहीं?" बोला वो,
"नहीं जी!" कहा मैंने,
"तुम पर विश्वास कर सकता हूं?'' बोला वो,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"विश्वास करना मुश्किल है आजकल!" बोला वो,
"ये तो आपने सही कहा!" कहा मैंने,
"उधर?" बोला वो,
"क्या है उधर?" बोला मैं,
मेरा दिल ज़ोर से धड़का तभी!
"एक दुल्हन!" बोला वो,
"दुल्हन?" कहा मैंने,
"हां, उसकी सहेली भी!" बोला वो,
"वो भला यहां कहां से?" पूछा मैंने,
"काणा? नाम सुना है?" बोला वो,
"नहीं सुना!" कहा मैंने,
"वो, डकैत है!" बोला वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"और तुम?" पूछा मैंने,
"काणा ने काट मचाई!" बोला वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"लूट के लिए!" बोला वो,
"अच्छा? तो ये दुल्हन?'' पूछा मैंने,
"ये? खेकड़ा के सेठ की लड़की है!" बोला वो,
"खेकड़ा की? अच्छा!" कहा मैंने,
"भोजा! नाम सुना है?" बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"ठठेरा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"उसकी लुगाई ने मुखबरी करी!" बोला वो,
"तुम्हारा नाम?" पूछा मैंने,
"राखा!" बोला वो,
"राखा? तो ये दुल्हन यहां कैसे?" पूछा मैंने,
"मैं लाया!" बोला वो,
"तुम?" पूछा मैंने,
"हां, बचाकर!" बोला वो,
"काणा से?" बोला मैं,
"हां!" बोला वो,
"कोई रिश्तेदार हो इस दुल्हन के?" पूछा मैंने,
"मैं, मुलाज़िम हूं सेठ का!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"इसका दूल्हा?' पूछा मैंने,
"आ रहा होगा!" बोला वो,
"कहां से?" पूछा मैंने,
"पीछे गांव नहीं है? वो...मंसूरपुर?" बोला वो,
''हां! है!" कहा मैंने,
"वहां से!" बोला वो,
"दूल्हा वहां, दुल्हन यहां?" बोला मैं,
"मैं, मंसूरपुर से लाया बचा कर!" बोला वो,
"कहां ले जा रहे थे?" पूछा मैंने,
"चौकीदार के पास!" बोला वो,
"वो चौकीदार?" पूछा मैंने,
"हां, सुलेमान!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वो मदद करने वाला है, भला इंसान है!" बोला वो,
"समझा!" कहा मैंने,
"समझे न?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"मैंने औरों से भी कही, लेकिन लगता है, काणा यहीं है आसपास, जिनसे कही, वे नहीं लौटे, कोई नहीं लौटता, लौट पता!" बोला वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"मेरा ये काम कर दो?" बोला वो,
"क्या काम?" पूछा मैंने,
"चौकीदार सुलेमान को इत्तिला कर दो, वो आ जाएगा आदमी ले कर, ये दो जान, बच जाएंगी!" बोला वो,
"और तुम?" बोला मैं,
"मैं? इंतज़ार करूंगा!" कहा मैंने,
"किसका?'' पूछा मैंने,
"दूल्हे का!" बोला वो,
"क्या नाम है?" पूछा मैंने,
"राज सिंह!" बोला वो,
"क्या करता है?'' पूछा मैंने,
"कारोबार!" बोला वो,
"अच्छा!" बोला मैं,
"मेरा काम ख़त्म फिर!" बोला वो,
"फ़र्ज़?" कहा मैंने,
"हां, फ़र्ज़!" बोला वो,
कैसा फ़र्ज़ अदा कर रहा था राखा! जीते जी भी और अब मरने के बाद भी! अपने से ज़्यादा अपने मालिक, सेठ की लड़की की हिफाज़त कर रहा था! वो घायल था, लेकिन उफ्फ नहीं! चल नहीं पा रहा था, चल रहा था! 
"कर दोगे?" बोला वो,
"क्यों नहीं राखा!" कहा मैंने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"पहुंचा दो, तो एहसान होगा!" बोला वो,
"ज़रूर राखा!" कहा मैंने,
"रही बात भोजा की, तो उसे मैं देख लूंगा!" बोला वो,
"तुम्हारा गांव कौन सा है?" पूछा मैंने,
"खैला!" बोला वो,
"कामकाज, यहीं सेठ जी के पास?'' बोला मैं,
"हां जी!" बोला वो,
"यहां कितने लोग थे?" पूछा मैंने,
"साथ मेरे?" बोला वो,
"हां!" कहा मैंने,
"पच्चीस होंगे!" बोला वो,
"ओह...खूब लड़ाई हुई?'' पूछा मैंने,
"हां जी!" बोला वो,
"काणा के आदमी संग?" बोला मैं,
"हां!" कहा उसने,
"तुम्हें दुल्हन कहां से मिली?" पूछा मैंने,
"खेकड़ा से!" बोला वो,
"तो डकैती वहीँ पड़ी?" पूछा मैंने,
"हां जी!" बोला वो,
"काणा संग कितने थे?" पूछा मैंने,
"उसके तो थे ही, कुछ अपने भी टूट गए थे, ये मैं बाद में समझा!" बोला वो,
"ओह..गद्दारी?" कहा मैंने,
"जी!" बोला वो,
"तो काणा को मुखबरी की भोजा की लुगाई ने!" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"किस से?" पूछा मैंने,
"है एक, पालू!" बोला वो,
"ये पालू, काणा के लिए काम करता है?" पूछा मैंने,
"हां, उसका आदमी है!" बोला वो,
"तुम्हारे संग कौन रहा?" पूछा मैंने,
"सल्लन!" बोला वो,
"वो कहां है?" पूछा मैंने,
"खबर देने गया था!" बोला वो,
"तुमने भेजा?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"नहीं लौटा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"तुम यहां इस दुल्हन के कारण रुके हो? है न?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"नाम क्या है दुल्हन का?" पूछा मैंने,
"गौरा!" बोला वो,
"उसकी सहेली?" कहा मैंने,
"नाम नहीं पता!" बोला वो,
"वो उसके संग ही थी?" पूछा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"समझ गया मैं, जब डकैती पड़ी, तब तुम वहीँ थे, मामला बिगड़ा होगा, वे ज़्यादा होंगे, तुम इस दुल्हन को ले, वहां से सुरक्षित जगह के लिए निकल गए होंगे!" कहा मैंने,
"हां, लेकिन मेरा पीछा हुआ!" बोला वो,
"किसने किया?'' पूछा मैंने,
"रुम्मा ने!" बोला वो,
"ये रुम्मा कौन?" पूछा मैंने,
"काणा का साथी!" बोला वो,
"तब काणा कहां था?'' पूछा मैंने,
"उसने घेराबंदी डाली थी!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"न कोई जाए और न कोई आये!" बोला वो,
"तब तुम निकले होंगे?" कहा मैंने,
"हां!" कहा उसने,
"उनसे भिड़े होंगे?" कहा मैंने,
"नहीं, बाद में!" बोला वो,
"नहीं?" पूछा मैंने,
"हां! मैं जंगल से दौड़ लिया था! मेरा पीछा हुआ, मुझे एक बल्लम लगी, यहां, इधर!" बोला वो,
उसने पांव दिखाते हुए कहा, उसकी वो लटकती टांग, कभी भी, कहीं भी हिलक कर अलग हो जाती, उसने अब उसकी एक कपड़े से बांध लिया था, उसे खींच कर चलता था!
"तो इस जगह रुके?" कहा मैंने,
"मैं रुका!" बोला वो,
"और साथी भी?" कहा मैंने,
"हां! देखो, वहां हैं!" बोला वो,
"सब?" बोला मैं,
"काट दिए गए!" बोला वो,
"किसने काटे?" पूछा मैंने,
"काणा ने!" बोला वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"काणा ने!" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"काणा को मुखबरी मिली!" कहा मैंने,
"रुम्मा को!" बोला वो,
"रुम्मा को!" कहा मैंने,
"हां, उस लुगाई से!" बोला वो,
"उसका कोई लालच था?" पूछा मैंने,
"हां, तभी तो!" बोला वो,
"क्या लालच?" पूछा मैंने,
"दौलत, सोना!" बोला वो,
"मिला उसे?" पूछा मैंने,
"नहीं पता!" बोला वो,
"चलो ठीक है राखा!" कहा मैंने,
"मदद करोगे मेरी?" बोला वो,
"करूंगा!" कहा मैंने,
"मेरे पास कुछ है!" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"ये!" बोला वो,
और अपनी जेब से कुछ सिक्के, निकाले, और किये मेरी तरफ, ये सिक्के नहीं थी, ये गिन्नियां थीं, कोई ढाई ग्राम की एक रही होगी, पतला सा पतरा सा, करीब सौ सा कुछ कम ग्राम रही हों!
"ये कहां से मिले?'' पूछा मैंने,
"इनाम!" बोला वो,
"इनाम?" पूछा मैंने,
"सेठ नंदू मल ने दिया था!" बोला वो,
"ब्याह का मेहनताना!" कहा मैंने,
"हां!" बोला वो,
"तब ये मेरा न हुआ!" कहा मैंने,
"क्यों?" चौंक कर पूछा उसने,
"मेहनत तुम्हारी, फ़र्ज़ तुम्हारा! सो, इनाम भी तुम्हारा!" कहा मैंने,
वो मुस्कुराया और वो गिन्नियां जेब में रख लीं!
"भले आदमी हो!" बोला वो,
''तुम भी!" कहा मैंने,
"सुनो?" बोला थोड़ा सा फुसफुसा के वो!
"हां?" कहा मैंने,
"पता नहीं कितना वक़्त है, कोई आ ही धमके!" बोला वो,
"तो?" कहा मैंने,
"वो फिर, किसी को नहीं छोड़ेगा, राखा के कंधे टूट गए हैं, टांग टूट गयी है, पसली, टूट गयी है, पता नहीं कितना वक़्त है मेरे पास!" बोला वो,
'ऐसा कुछ नहीं राखा!" कहा मैंने,
''बस खबर कर दो, सुलेमान को!" बोला वो,
"कर देंगे!" कहा मैंने,
"जीते जी तो हाथ नहीं लगाने दूं किसी को भी उस दुल्हन को, बेटी ही मानो मेरी!" कहा मैंने,
"राखा! वो अगर तुम्हारी बेटी है तो बहन ही हुई हमारी!" कहा मैंने,
"भली करें राम!" बोला वो,
 कानों को हाथ लगाते हुए!
''रास्ता बताऊं?" बोला वो,
"यहां से सीधे?" कहा मैंने,
"हां, एक तालाब पड़ेगा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वहां बाबा लोग मिलेंगे!" बोला वो,
"बाबा?" पूछा मैंने,
"सब के सब!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"कोई रोकेगा नहीं!" बोला वो,
"किसी ने रोका तो?" बोला मैं,
"कहना, सुलेमान के पास जाना है!" बोला वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
"मेरे पास घोड़ा होता तो मैं चला जाता, लेकिन, फिर, ये दुल्हन, वो लड़की, उन्हें भी नहीं छोड़ सकता!" बोला वो,
"बात सही है!" कहा मैंने,
''आप चले जाओगे?" बोला वो,
''हां!" कहा मैंने,
"मैं ज़िंदा रहा तो गांव आना, खैला खुर्द!" बोला वो,
"आएंगे!" कहा मैंने,
"जो मर गया, तो भी खबर गांव पहुंचा देना!" बोला वो,
"किसको?" पूछा मैंने,
"गांव में बोलना, राखा ने बताया था!" बोला वो,
''लेकिन ऐसा नहीं होगा! सुलेमान आएगा तुम्हें भी ले जाएगा, ईलाज हो जाएगा और ठीक हो जाओगे!" कहा मैंने,
"अब सफेद पड़ गीयी जीभ, खून बह गया, दर्द बढ़ता जा रहा है, बेहोश हो जाऊंगा, लगता है!" बोला वो,
"अब कुछ नहीं होगा!" कहा मैंने,
"मुझे उम्मीद है!" बोला वो,
और टांग उसकी, हिली दूसरी, गिरने को हुआ तो मैंने हाथ पकड़ लिया उसका, खून से भीगा था वो, जगह जगह! उसने जो बताया था, वैसा ही था, वो बुरी तरह से घायल था, बस घायल नहीं था तो उसका जज़्बा, उसका फ़र्ज़!


   
ReplyQuote
Page 2 / 3
Share:
error: Content is protected !!
Scroll to Top