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वर्ष २०१४, फैज़ाबाद, उ.प्र. की एक घटना!

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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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"ऐ?" चीख कर बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"क्या करने आया है?" पूछा उसने,
"तेरी खबर लेने!" बोला मैं,
"कैसी खबर?'' पूछा उसने!
"महारानी कैसी हैं!" कहा मैंने,
"हराम**!" बोली वो,
"गुस्सा न कर!" कहा मैंने,
"तेरी इतनी हिम्मत?" बोली वो,
"क्यों?" कहा मैंने,
"तेरी औक़ात क्या?" बोली वो,
मैं हंसा! एक प्रेत ऐसे ही डराया करता है! यही ताक़त है उसकी!
"हँसता है कमीने?' चीख के बोली वो,
और पास रखा, स्टील का वो गिलास, फेंक के मारा मेरी तरफ! गिलास, मेरी कोहनी से टकराया, क्योंकि मैंने कोहनी आगे कर दी थी, नहीं तो सीधा निशाना मेरे चेहरे पर था उसका, खट्ट से टकराया था, हालांकि दर्द तो नहीं हुआ था, लेकिन कोहनी न टकराता या आगे न करता, तो मेरे चेहरे पर चोट ज़रूर करता! जब ये देखा, उसके पिता ने, तो चले लताड़ने उसे, मैंने रोक दिया! क्योंकि मैं चाहता था वो और भड़के, भड़केगी जितना अधिक, तो पता भी उतना ही अधिक चलेगा, अर्थात, जितना भड़केगी, पर्दा उतना ही फटेगा!
"अब बता?" पूछा उसने,
"क्या?" पूछा मैंने,
"किसलिए आया है?' बोली वो,
"तेरे से मिलने!" बोला मैं,
वो हुई खड़ी, रखे कमर पर दोनों हाथ, आँखें कीं चौड़ी और नथुने फुला लिए!
"कुत्ते? ओ कुत्ते? ऐसे बात करते हैं? ये क्या तू-तू लगाई है, तमीज़ सीख कर आ पहले, समझा?" चीख के बोली वो,
"इतना गुस्सा?" बोला मैं,
"तमीज़ से बात कर?" बोली वो,
"अच्छा, ठीक है, जी!" बोला मैं,
"हाँ!" बोली वो,
और बैठ गयी!
"क्या करने आया है?" पूछा मैंने,
"बताया न, मिलने, आप से?" कहा मैंने,
"किसलिए?'' पूछा उसने,
"तबीयत पूछने!" कहा मैंने,
"ठीक हूँ, दफ़ा हो अब!" बोली वो,
"इतना गुस्सा न करो जी आप!" कहा मैंने,
"हम्म! आ गयी अक़्ल?" बोली वो,
"हाँ जी!" कहा मैंने,
अपने पाँव मोड़, पलंग पर बैठ गयी!
"वैसे, गुस्सा बहुत करती हो आप!" कहा मैंने,
"हम्म!" बोली वो,
"जैसे कहीं की महारानी हों आप!" बोला मैं,
"तेरी ** **! फिर से ज़ुबान निकाली बाहर?'' गुस्से से बोली,
"गलती हो गयी जी!" बोला मैं,
"समझ गया?" बोली वो,
"हाँ जी, समझ गया!" कहा मैंने,
"अच्छा किया!" बोली वो,
"जी!" बोला मैं,
"लेकिन ये नहीं समझ र्ढे, तीन तीन ढेण्डा भेज दिए! मैंने ऐसी खबर ली, की अब औरत के लायक़ न रहे, अब उनकी औरतें, लहैण्डों के पाँव में लोटेंगी!" बोली वो,
ढेण्डा! लहैण्डों! ये शब्द, इस लड़की के तो थे नहीं, ये लड़की, चौबीस साल की थी, वो भला क्या जाने ऐसे शब्द? मैं बड़ा हैरान हुआ!
"बेकार कर दिए?" बोला मैं,
"और क्या!" बोली वो,
"अच्छा नहीं किया!" कहा मैंने,
"अब तू मुझे बताएगा? कुत्ते, ओ कुत्ते?" बोली वो,
"गाली तो न दें?" मैंने कहा,
"सच कहा, नहीं तो क्या करेगा तू?" बोली वो,
"जी कुछ नहीं!" बोला मैं,
"हाँ, नहीं तो चौथा भी तैयार!" बोली वो,
"जी, मेहरबानी आपकी!" कहा मैंने,
"हाथ जोड़ कर बोल रे?" बोली वो,
"हाँ, जी, मेहरबानी!" मैंने हाथ जोड़ कर कही!
वो हंस पड़ी! ज़ोर ज़ोर से!
"तू आदमी बढ़िया है वैसे, कहना मान लेता है, गलती मान लेता है! अच्छा आदमी है तू! चल, माफ़ किया तुझे मैंने!" बोली वो, इतरा कर!
"जी, मेरा सौभाग्य!" कहा मैंने,
"वो तो है है, नहीं तो भोगणा से बचा है कोई?" बोली वो,
भोगणा? यही सुना न मैंने? भोगणा? अब मेरे दिमाग में घिरनी घूमी! गरारियां घूमने लगीं! चकर-चकर की आयीं आवाज़!
"और ये देख!" बोली वो,
"क्या जी?" पूछा मैंने,
"ये, ये सलकारु बोलता है, वो बाप है मेरा!" बोली वो, अपने पिता की तरफ इशारा करते हुए!
सलकारु? ये क्या सुना? सलकारु? यही बोला था न उसने?
"सलकारु?" कहा मैंने,
"हाँ, ये, हराम का गोना, सलकारु!" बोली वो,
गोना? ये क्या कहे जा रही है? ये शब्द तो अब कोई नहीं कहता? और ये सलकारु, सलकारु होता है एक सेवक, जो खड़ाऊं उठाया करते थे, रखते थे, अब कोई खड़ाऊं पहनता नहीं तो सलकारु भी नहीं हैं! ये बात कोई सौ साल पुरानी होगी, कम से कम!
"अच्छा, सुन?" बोली वो,
"हाँ जी?" कहा मैंने,
"इधर आ?" बोली वो,
मैं उठा, और चला उसके पास,
"कान इधर कर?" बोली वो,
मैंने कान किया उधर,
"इन्हें भेज यहां से?" फुसफुसाई वो,
"सभी को?" मैंने भी उसके कान में फुसफुसा के कहा,
"हाँ, सभी को!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
और मैंने फिर, सभी को बाहर जाने को कहा, वे जाने लगे एक एक करके, शर्मा जी भी उठ गए थे,
"ओ सलकारु? दरवाज़ा भेड़ दियो?" बोली वो,
खैर, दरवाज़ा मैंने ही भेड़ा,
"सांकल चढ़ा दे!" बोली वो,
मैंने कुण्डी लगा दी!
"इधर आ तू अब!" बोली वो,
मैं गया उसके पास,
"यहां बैठ!" बोली वो,
मैं बैठ गया!
"देख, तू आदमी बढ़िया है, विश्वास वाला है!" बोली मेरे सर पर हाथ रखते हुए!
"जी!" कहा मैंने,
"ऐसे ही बैठा रह!" बोली वो,
हुई खड़ी, और अपने सूट को उठाया उसने आगे से, मुंह में दबाया, और खोलने लगी सलवार, मैं तो झट से उठ गया, उसने आँखों से डरा कर, मुझे बैठने को कहा, दो बार, फिर हाथ से, मेरे सर को दबा कर, बिठा दिया, मैं बैठ गया,
"ये देख? क्या है यहां?" पूछा उसने,
उसने, अंतःवस्त्र नीचे कर लिया था, और योनि दिखा रही थी, मैंने जैसे ही देखा, दंग रह गया! योनि, काली पड़ी थी बिलकुल, सूजन थी, और भगपुंक, सूजा हुआ था, भग खुला हुआ था, मैंने ऐसा कभी नहीं देखा था पहले,
"क्या है?" पूछा उसने,
"काला पड़ा है पूरा भाग, सूजन है, ऐसा लगता है!" कहा मैंने,
"हाँ, तभी दर्द है मुझे!" बोली वो,
पीछे घूमी, और अपने नितम्ब दिखाए, दोनों ही नितम्बों पर, दो चिन्ह थे, एक जैसे, जैसे गोदने में होते हैं, कोई संख्या, कोई भाषायी-चिन्ह अथवा कोई फूल आदि से लगे मुझे,
"यहां क्या है?" पूछा उसने,
"चिन्ह हैं, जैसे गोदा गया हो, जैसे दागा गया हो!" कहा मैंने,
"अच्छा?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"और यहां?" पूछा उसने,
कमर से सूट हटा लिया था उसने, वहाँ भी ऐसा ही एक चिन्ह था, अब चिन्ह देखा, तो ये मुझे, एक शंख सा लगा, ऐसी ही आकृति थी उसकी, शंख जो उत्तर-मुखी रूप में थी!
"क्या है?'' पूछा उसने,
"वैसा ही चिन्ह है!" कहा मैंने,
"अच्छा?'' बोली वो,
अब कपड़े ठीक किये, सलवार बाँधी, और बैठ गयी,
"जलन बहुत है, किस से कहूँ?" बोली वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"हाँ, सही बात है!" कहा मैंने,
"वो ढेण्डा जो आये थे न?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"खोटे आदमी थे वो तीनों!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"बदनीयत वाले, कमीने!" बोली वो,
"अच्छा किया!" कहा मैंने,
"हाँ, ऐसे गंदे आदमी, किस काम के भला?" बोली वो,
"सही कहा!" कहा मैंने,
"सुन?" बोली वो,
"बोलो?" कहा मैंने,
"चल पानी पिला!" बोली वो,
"अभी लो!" कहा मैंने,
उठा मैं, गया फ्रिज तक, निकाली एक बोतल, उठाया गिलास, और चला उसकी तरफ, रुका, बोतल का ढक्क्न खोला, डाला गिलास में पानी!
"ये लो!" बोला मैं,
"ला!" बोली वो,
ले लिया गिलास, मुंह नहीं लगाया उसने, ओख बनाई हाथ की और उस से पिया! बड़े बड़े घूँट भरती थी वो!
"और दे!" बोली वो,
"लो!" कहा मैंने,
और गिलास भर दिया,
उसने फिर से पिया, और किया गिलास खाली,
"ला, ये बचा हुआ भी दे दे!" बोली वो,
"लो!" कहा मैंने,
गिलास भरा, और उसने पिया फिर!
"ले, रख दे, तू भला आदमी है! भोगणा सबसे पानी नहीं पीती!" बोली वो, मुंह कपड़े से पोंछते हुए!
"तुम भी तो अच्छी हो!" कहा मैंने, गिलास और बोतल रखते हुए,
"क्या कहा तूने?" बोली वो,
"मैंने कहाँ तुम भी तो अच्छी हो भोगणा!" कहा मैंने,
"इधर आ! इधर आ! अरे आ न?" बोली वो, मेरा हाथ पकड़ते हुए,
"इधर बैठ तो ज़रा?" बोली वो,
मैं बैठ गया!
"फिर से बोल?" बोली वो,
"मैंने कहा तुम भी तो अच्छी हो!" कहा मैंने,
मेरा चेहरा थाम लिया अपने दोनों हाथों में, कभी बायीं आँख में देखे, कभी दायीं आंख में!
"मैं अच्छी हूँ?" पूछा उसने,
"हाँ, बहुत अच्छी!" कहा मैंने,
"सावणि को कोई ठौर नाहिं!" बोली वो,
मैं नहीं समझ सका इसका मतलब!
"क्या भोगणा? मैं समझा नहीं?" बोला मैं,
"अरे! तड़िता कहाँ चमके, कहाँ गिरे, कुछ पता है क्या?" बोली वो,
"नहीं, कुछ नहीं पता!" बोला मैं,
उसने मेरा सर, अपने कंधे पर रख लिया!
अब मैं कुछ समझ नहीं सका! मैं तो यहां इसीलिए आया था कि होगा कोई प्रेत, या होगी कोई प्रेत-माया, होगा कोई ताक़तवर प्रेत, जो काबू नहीं आ रहा, मामूली सा प्रेत, ये मामूली नहीं थी! न उसकी बातें मामूली थीं!
मैं उठा धीरे से, उसको देखा, आँखों में मोटे मोटे आंसू आये हुए थे, कुछ हद फलांग चुके थे, कुछ किनारी के बाँध पर, अटके हुए थे, कांपती हुई किनारियों में, झिलमिला रहे थे! लेकिन मैं अचरज में था, ऐसा क्या हुआ कि वो विवश हो गयी, कुछ न कुछ रहस्य तो है! लेकिन क्या?
"भोगणा?'' बोला मैं,
"न! न! कुछ न बोल!" बोली वो, और मेरे होंठों पर हाथ रख दिया, मुझे, उबटन की तेज गंध आई मेरे नथुनों में! उसने कोई उबटन नहीं लगाया था हालांकि! चंदन की तेज महक थी उसमे! अब मैं सकते में था!
उसने हाथ हटाया अपना, धीरे से, मुझे देखते हुए, एक सुबकी ली, और आंसू पोंछे!
"भोगणा?" बोला मैं,
"हूँ?" बोली वो,
"क्या हुआ?' पूछा मैंने,
"क्या हुआ?" पूछा उसने,
"तुम क्यों रोने लगीं?" पूछा मैंने,
"जानना चाहता है?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"भोगणा बहुत अच्छी थी, बहुत अच्छी, लेकिन जाना कोई नहीं!" बोली वो,
ओह! अब समझा!
"एक बात पूछूँ?" पूछा मैंने,
"हूँ!" बोली वो,
"डाँटोगी तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"गुस्सा तो नहीं करोगी?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"तुम............कौन हो?" पूछा मैंने,
"भोगणा! शतीला भोगणा!" बोली वो,
और जैसे ही मैंने सुना, मैं एक झटके से उठ खड़ा हुआ! शतीला! ये मैंने क्या सुना! सौ जोगनों की जोगन  शतीला! एक मठ जैसे आश्रम की प्रधान जोगन! मेरे तो पाँव काँप गए! हाथों में पसीना आ गया! मैंने शतीला के विषय में पढ़ा है, सुना है, लेकिन देखा कभी नहीं, ऐसी कुछ शाखाएं, लुप्त हो चुकी हैं! ये भोगणा, उन्हीं में से एक थी शायद!
"अब जान गया?" पूछा उसने,
"ह..हाँ!" कहा मैंने,
"आ, बैठ!" बोली वो,
मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी, कहाँ वो इतनी ऊंची जोगन और कहाँ मैं गंगू तेली का सेवक! नहीं हो पा रही थी हिम्मत!
"बैठ!" बोली वो,
मैं चला आगे!
मेरा हाथ पकड़, झिड़क दिया उसने,
"बैठ?" गुस्से से बोली वो,
"क्या हुआ तुझे?" पूछा उसने,
"कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"तू भला आदमी है, शतीला सब जानती है!" बोली वो,
अब, मेरे मन में, हज़ारों सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे! ये कहाँ से हैं? क्यों है? किसलिए है? इस लड़की, सरिता में कैसे आई? किसी तांत्रिक की तो हिम्मत नहीं पकड़ने की उसे, और कहीं भेजने की, एक ही फूंक में सारी विद्याएँ जड़ हो जाएंगी! असहाय सा गिर पड़ेगा ज़मीन पर! महासाधिका है ये! लेकिन, ऐसा हुआ कैसे?
"सुन रे?" बोली वो,
"जी?" कहा मैंने,
"तूने, मेरे बारे में कैसे सुना?'' पूछा उसने,
"सलकारु ने बताया!" कहा मैंने,
"हम्म!" बोली वो,
"अच्छा सुन, खेचकी के बीज मिल जाएंगे?" बोली वो,
"मिल जाएंगे!" कहा मैंने,
"कब?" पूछा उसने,
"आज शाम तक!" कहा मैंने,
"कहाँ से लाएगा?" बोली वो,
"जंगल से!" कहा मैंने,
"हाँ, वहीँ मिलेंगे!" बोली वो,
"क्या करोगी?" पूछा मैंने,
"जलन मिटानी है!" बोली वो,
"अच्छा, अभी जाऊं?" बोला मैं,
"न!" बोली वो,
वो झुकी, और मेरे कंधे पर सर रख लिया उसने! बाजू से, पकड़ लिया कस कर! ये सरिता नहीं, भोगणा थी!
"तू विश्वास वाला है!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"मान गया?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मान गया तो ठीक, नहीं तो मनवाना पड़ता!" बोली वो, और एक नटखट सी हंसी, हंसी उसने!
"डांटा मत करो इतना!" बोला मैं,
"तू भला है, जवाब नहीं देता, इसीलिए!" बोली वो,
मित्रगण! उसका मानसिक संतुलन, अत्यंत ही संतुलित था! एक एक शब्द ऐसा, जैसे घिस घिस के पिरोया हो वाक्य की डोर में!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सुन?" बोली वो, सर अभी तक, मेरे कंधे पर ही रखा था उसने,
"हाँ?" बोला मैं,
"भोजन किया तूने?" पूछा उसने,
ओह.......सच कहता हूँ, उसका वो लहजा, ये पूछने का, मेरे सीने को बींधता चला गया! जैसे मेरा कोई अपना ही हो वो! जिसे अपनी पीड़ा नहीं, मेरी भूख की चिंता हो!
"हाँ, कर लिया!" बोला मैं,
"झूठ बोलता है?" बोली वो,
"क्यों बोलूंगा?" बोला मैं,
"मैं भोगणा हूँ, समझा?" बोली और एक हल्का सा घूँसा मारा मेरी पीठ में उसने, फिर, सहलाने भी लगी!
"हाँ, समझ गया!" बोला मैं,
"तो सलकारु से बोल, भोजन बनावे! खिलावे!" बोली वो,
"कह दूंगा!" कहा मैंने,
"कब?'' पूछा उसने,
"बस अभी!" कहा मैंने,
"जा फिर, भोजन कर, और आ!" बोली वो,
"तुम नहीं खाओगी?" पूछा मैंने,
"तू खिलायेगा?" बोली वो,
"हाँ, खिला दूंगा!" बोला मैं,
"तो ले आ!" बोली वो,
मैं उठा, और चला, पीछे मुड़कर देखा, अपना चेहरा दोनों हाथों में लिए, मुस्कुराते हुए, देख रही थी वो! वो तो सरिता की देह सुगठित थी, अन्यथा भोगणा का बोझ किसी को भी मार डालता!
"अब जा न?" बोली वो,
मैंने मुस्कुराया और चला बाहर, दरवाज़ा बंद कर दिया, आया बाहर, तो सभी मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे, मैंने शर्मा जो को, और सरिता के पिता श्रीमान रघुराम जी को बुलाया, ले गया एक जगह, और सारी कहानी कह सुनाई! रघुराम जी जहां चौंके, वहीँ दुखी भी हुए, सवाल ये कि ऐसा उनकी बेटी के साथ ही क्यों? उनकी बड़ी बेटी का ब्याह हो चुका था, वो लखनऊ में ब्याही थी, फिर ये थी सरिता, ये भी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थी, रहा छोटा भाई, तो वो अपने पिता के साथ, व्यापार में हाथ बँटा रहा था, घर में, रघुराम जी की माता जी, और पत्नी हैं, दो बड़े भाई, वहीँ रहते हैं, अपने अपने घरों में! वे सभी रिश्तेदार भी आये हुए थे वहाँ!
भोजन बन ही गया था, मैं दो थाली लेकर, चला अंदर कमरे में, वो टहल रही थी, मैं अंदर आया तो एक थाली पकड़ ली उसने! रख दी पलंग पर, मेरी वाली भी ले ली और रख दी, मैंने फ्रिज से बोतल निकाल ली, और दो गिलास भी!
"आ, बैठ!" बोली वो,
मैं बैठ गया!
"चल, खा!" बोली वो,
मैंने चावलों में, दाल मिलायी, चम्मच से उसको मिलाया, उसने देखा, चम्मच हटा दी पकड़ कर, और अपने हाथ से मिला दिए चावल और दाल!
"ऐसे खा!" बोली वो,
एक गस्सा खाते हुए, उसने कहा! मैं वैसे ही खाने लगा!
"गरौरा जानता है?" बोली वो,
''हाँ!" कहा मैंने, खाते हुए, चावल,
"उसकी चटनी होती है इसके साथ!" बोली वो,
गरौरा! एक छोटी सी कचरी, जो खट्टी होती है, अक्सर मक्की के खेत में पैदा हो जाती है! उसकी चटनी बनती है, सिल पर, बहुत स्वादिष्ट होती है!
"तू पहले नहीं मिला!" बोली वो,
"पहले?" बोला मैं,
"सुन लिया कर, बात मत काटा कर, समझा?" बोली गुस्सा खाते हुए!
"अच्छा!" कहा मैंने धीरे से,
"हाँ, पहले मिलता, तो खिलाती तुझे भोजन!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
कितना भोलापन उसमे!
कितना साफ़ दिल उसका!
कितनी साधारण सी वो भोगणा!
कितने सीधे और सटीक शब्द उसके!
"ला! पानी पिला!" बोली वो,
उसने कर लिया था भोजन, हाथ धोये पहले, थाली में, और फिर पानी पिया उसने, इस बार भी, पूरी बोतल ही!
"चल, अब खा ले!" बोली वो,
मैंने खतम किया खाना अपना! हाथ धोये, और फ्रिज से बोतल निकाल, पानी भी पी लिया! उसने, बर्तन एक तरफ रख दिए!
"अरे, मैं रख देता?" कहा मैंने,
"कोई बात नहीं!" बोली वो,
"बात कैसे नहीं?" कहा मैंने,
"छोड़, यहां बैठ!" बोली वो,
मैं बैठ गया, उसने फिर से अपनी योनि पर हाथ रखा,
"बहुत दर्द है?" पूछा मैंने,
"हाँ, बहुत!" बोली वो,
"मैं लाता हूँ बीज!" बोला मैं,
"ले आना, रुक जा!" बोली वो,
"एक बात बताओ?" पूछा मैंने,
"क्या?" बोली वो,
"ये पीड़ा कैसे हुई तुम्हें?" पूछा मैंने,
"रहने दे!" बोली वो,
"नहीं बताना चाहतीं?" कहा मैंने,
"रहने दे!" बोली वो,
"अच्छा, मैं दवा अलता हूँ, ठीक?" बोला मैं,
"है दवा?" पूछा उसने,
"हाँ है!" बोला मैं,
"जा, ले आ!" बोली वो,
मेरे बैग में एक दवा थी, एक मरहम, दर्द निवारक मरहम था वो, अच्छा है, काम करता है तेजी से, मैं बाहर आया, अपना बैग खोला, समझाया शर्मा जी को, और वापिस हुआ, आ गया कमरे में,
"लो!" कहा मैंने,
"मैं कैसे लगाऊं?" बोली वो,
"ऐसे?" मैंने इशारे से बताया,
"तू लगा! चल, लगा!" बोली वो,
"ठीक है!" कहा मैंने,
और तब, मैंने दवा लगाई उसके, तो उसको ठंडक सी पहुंची, उसने बताया कि उसको शीतलता महसूस हुई है, उसके जहां जहां पीड़ा थी, वहां वहाँ दवा लगा दी थी मैंने, कपड़े सही से पहनवा दिए थे, और आराम से बिठा भी दिया था!
"तू भला आदमी है!" बोली वो,
"अच्छा!" मैं मरहम की डिबिया बंद करते हुए बोला,
"हाँ!" बोली वो,
"अभी आया!" कहा मैंने,
और चला बाहर, मरहम वापिस रखा, और हाथ धो लिए, वापिस हुआ तब कमरे में!
"आ, इधर बैठ!" बोली वो,
मैं बैठ गया, उसने अपनी टांगें, मेरे घुटनों पर रख दीं, उसको आराम पड़े, यही चाहता था मैं, अभी बहुत काम बाकी था! बहुत काम!
"नींद आ रही है?" पूछा मैंने,
"नींद?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"नींद?" पूछा उसने,
"हाँ, नींद!" कहा मैंने,
"नहीं, नींद नहीं आ रही, मैं सोती नहीं, अब!" बोली वो,
अब? इसका क्या मतलब?
"अब? इसका क्या मतलब हुआ?" पूछा मैंने,
उसने, कोहनी हटाई आँखों से, और देखा मुझे, धीरे से उठी वो, मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे सर पर हाथ रखा,
"हाँ, अब नहीं सोती मैं!" बोली मुस्कुरा कर,
"भोगणा?" कहा मैंने,
"बोल?" बोली वो,
"मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम कुछ छिपा रही हो मुझसे?" पूछा मैंने,
"छिपा रही हूँ? हाँ! हाँ!" बोली वो,
"क्या भोगणा?" पूछा मैंने,
"तू जानना चाहता है?" पूछा उसने,
"हाँ भोगणा! जानना चाहता हूँ!" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सच में जानना चाहता है तू?" बोली वो,
"हाँ, सच में!" कहा मैंने,
"विश्वास कर लेगा?" पूछा उसने,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"अरे पागल! अरे पागल!" बोली वो,
"पागल ही सही भोगणा!" कहा मैंने,
"अरे पागल है तू!" बोली वो,
"पागल ही सही!" बोला मैं,
"तू तो मुझे जानता भी नहीं!" बोली वो, आँखों में आंसू भरते हुए!
"नहीं भोगणा! रोओ नहीं! ना!" कहा मैंने,
मैंने ऐसा कहा और उसने मुझे अपनी बाजुओं में भरा! फफक फफक के रोने लगी वो! शायद, बरसों बाद किसी से कुछ कहने का मन हुआ था उसका! एक आह, जो बरसो तक दफ़न थी वक़्त की मिट्टी में, आज बाहर आ निकली थी!
"तू मुझे नहीं जानता! नहीं जानता पगले!" बोली वो,
मैं हटा उस से, उसके आंसू पोंछे,
"इसीलिए तो कह रहा हूँ मैं भोगणा!" बोला मैं,
"मेरा नाम जानता है?" बोली वो,
"नहीं, बताओ?" बोला मैं,
"नयना!" बोली वो,
नयना! खूबसूरत नाम था! बेहद बढ़िया! नयना! नैना नहीं, नयना, ज्योति, रौशनी! अच्छा नाम था! जीवन-संज्ञक! रचना-संज्ञक!
"महासाधिका नयना! है ना?" बोला मैं,
"हाँ, महासाधिका नयना!" बोली वो, अपनी छाती पर, हाथ मारते हुए!
और तब नयना ने बोलना शुरू किया! एक भूली-बिसरी कहानी! जो आज, दबी है, हरदोई जिले के कुछ एक, खंडहरों में, मंदिर जैसे खंडहरों में! ये कहानी, आज से एक सौ बीस बरस पुरानी है! मैं, भावशून्य सा हो चला था उस कहानी को सुनते ही, मुझे उस समय, उस कोल्या की याद आ गयी थी! कुछ ऐसी ही कहानी थी ये! अब मैं, अपने शब्दों में उसको लिखूंगा! इसमें ने नए किरदार आएंगे, प्रयास करूंगा, की आपको उस समय में ले जाऊं, उस समय जब नयना का अस्तित्व था!
मित्रगण!
सच में हमारा देश अनोखा है, विचित्र है! इसका ऐसा कोई शहर नहीं, जिसका कोई पुराना इतिहास ना हो! इतिहास, इतिहास से ही वर्तमान की और फिर भविष्य की नींव रखी जाती है! आज विश्व में, भारत की साख है! मात्र इसके सुनहरे इतिहास के कारण! इसके इतिहास में, ज्ञान के हीरे, जहां तहाँ बिखरे पड़े हैं! परन्तु अफ़सोस, हमारी नयी पीढ़िया, कुछ नहीं जानतीं इसके बारे में, वे पाश्चात्यता की तरफ भागे जा रहे हैं! ना यहीं के रहते और ना वहाँ के बन पाते!
खैर,
भारत देश, भारत का एक शहर हरदोई, ये जिला भी है, इसमें और कई क़स्बे आदि आते हैं, हाँ तो तो हरदोई! इसका प्राचीन नाम था, हरिद्रोही, अर्थात, ईश्वर-विरोधी! वो क्यों? वो इसलिए, की इस स्थान पर, हरिण्यकश्यपु राज किया करता था! उसने अपने आपको ही ईश्वर घोषित कर रखा था! ये नगर, उस समय, उसकी राजधानी थी! ये है पहला मत! अब दूसरा मत, कई विद्वान मानते हैं, की इसका प्राचीन नाम, हरिद्वै था! अर्थात यहां पर श्री विष्णु जी को दो अवतार लेने पड़े थे! पहला, वामन-अवतार और दूसरा नरसिंह-अवतार! दोनों ही मत, सटीक लगते हैं! तो इस वजह से, ये नगर, अपना विशेष महत्व रखता है!
आज से बीस साल पहले, इसी नगर से, करीब चालीस किलोमीटर पश्चिम में, एक स्थान था, एक छोटा सा गाँव था वो, और उस गाँव में, एक बड़ा सा मंदिर था! ये मंदिर, प्राचीन था, उसके भग्नावशेष पुष्टि करते हैं इसकी! इसी मंदिर में, माँ श्री महा काली की पूजा हुआ करती थी! उस समय, यहां एक महासाधक रहा करते थे, अरूणवेश नाम के! अरूणवेश की एक ही कन्या थी, ये नयना! वही थी उनकी उत्तराधिकारी! उस समय, नयना, एक चपल, नटखट कन्या थी! मंदिर में कम और सखियों में अधिक ध्यान रहता था उसका, आयु, सोलह पार कर चुकी थी!
लेकिन इसके साथ साथ, उसके पिता उसको दीक्षित करते भी रहे, उसका अध्यापन भी संग संग चलता रहा! स्वभाव से, नयना उग्र स्वभाव की थी! उसकी चचेरी बहनें भी थीं, लेकिन वो चलने ना देती किसी की भी! उसके चचेरे भाई भी थे, वे भी चुप रहते उसके सामने! ना सुनने की तो आदत ही ना थी!
उन्हीं दो भाइयों में से एक था, सामू! सामू से अधिक पटती थी उसकी, कोई अगर उसको टॉक सकता था तो बस सामू! पिता की लाड़ली थी, माँ की अल्हड़ बिटिया थी तो वहाँ से कोई बंधन नहीं था उसके ऊपर, किसी भी तरह का!
रूप-रंग में, चन्द्र-सरित सी थी वो! देह सुगठित और ऊँची कद-काठी की थी! जो देखता, उलझ के रह जाता उसके दैहिक-आकर्षण में!
समय आगे बढ़ता रहा! समय रोके नहीं रुकता! अठारह पार कर, उन्नीस में आई वो, तो देह से और आकर्षण-सरित का प्रस्फुटन हुआ! अब माँ-बाप को हुई चिंता! दूसरे हितैषी भी कहते की उसका ब्याह कर देना चाहिए! पिता को चिंता तो थी, परन्तु, वो उसको प्रवीण करना चाहते थे,
हर विद्या में, हर विधान में, ताकि उसका मान-सम्मान बना रहे!
निवास उन सबहि का, मंदिर के पीछे था, कुछ कच्चे घर बने थे, वहीँ रहा करते थे वे सब! मवेशी थे, अन्न आ ही जाया करता था, पूजा आदि से कुछ आवश्यक धन भी मिल ही जाया करता था, वस्त्रादि की कोई कमी ना थी!
एक दोपहर,
पिता ने बुलाया नयना को अपने पास, पिता एक पेड़ के नीचे बैठे थे, नयना आई वहां, पिता ने बिठा लिया,
"बेटी?" बोले वो,
"जी?" कहा उसने,
"कल से, एक अनुष्ठान है, मैं चाहता हूँ कि तू भी आ उसमे, ये नौ रात्रि का अनुष्ठान होगा, और भी कई लोग आ रहे हैं!" बोले वो,
अब पिता का कहना था, कैसे मना करती!
सर हिला दिया हाँ में!
"बाकी मैं तेरी माँ को समझा चुका हूँ, जा, पूछ ले!" बोले वो,
"जी!" बोली वो,
उठी और चली माँ के पास,
माँ उस समय अपने कक्ष में ही थी,
"आ बेटी!" बोली माँ,
बैठ गयी वहाँ वो!
बताई पिता जी वाली बात!
तो माँ ने सब समझा दिया!
वो उठी, और लग गयी सभी तैयारियों में, अनुष्ठान के लिए, दैहिक और मानसिक रूप से तैयार रहना पड़ता है, उसी की तैयारियों में लगी थी वो! जो करना था, माँ बताती रहती थी!
उस रात, पूजन किया उसने, संकल्प लिया, माँ और पिता से आशीर्वाद लिया, माँ और पिता जी को बहुत गर्व होता था उस पर! किसी भी तौर पर, नयना, कम ना थी किसी पुरुष से!
अगला दिन,
मंदिर में तैयारियां शुरू हुईं!
नयना की तैयारियों ने ज़ोर पकड़ा!
दोपहर बीती, संध्या आई और फिर आई, रात! अमावस की वो रात!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उस रात, अमावस की रात, पूरा वो स्थान जगमगा रहा था! जगह जगह अलाव जल रहे थे, मंदिर की दीवारों में बने पत्थर के कुंदों में, मशालें लगाई गयी थीं! मंदिर के अंदर, लोहे के बड़े बड़े तसलों में, अलाव जलाये गए थे! फूलों के ढेर लगे थे! अनुष्ठान-स्थल सजा हुआ था! उस स्थल के पीछे, श्री महा काली अपना खप्पर थामे, आँखें बाहर निकाले, अपनी लाल-रक्तिम जिव्हा को बाहर तक निकाले, हाथ में खड्ग लिए, मुंड-माल धारण किये हुए, उन वस्त्रों की प्रदीप्ति, देखते ही बनती थी! इस अनुष्ठान को आरम्भ करने वाले थे अरूणवेश! पिता श्री, उस नयना के! नयना, वैसे तो अनुष्ठानों में बैठती थी, लेकिन इस तरह का ये महानुष्ठान, उसके लिए पहला था!
आया वो समय!
जब उसके पिता जी, अपने चौदह सहयोगियों के संग उस स्थल पर आये! उनके संग, नयना भी थी! लाल रंग के वस्त्रों में, ये कोई तेजस-रूपिणी यक्षणी का आगमन हुआ हो! सभी उसको देख, चकित थे! नज़रें हटती ही ना थीं उस से! नितम्बों से नीचे लटकते सुंदर, चमकीले केश! जिसमे, लाल रंग के पुष्प गुंथे थे! गले में धारण विभिन्न मालाएं! उदर तक लटकता एक अस्थि-माल! साक्षात शक्ति-स्वरूपा लग रही थी वो!
उसके दैहिक-आकर्षण में लिप्त, एक व्यक्ति भी उसको निहार रहा था! सर्वेश नाम था उसका, वो बस्ती जिले के ही एक स्थान से, यहां आया था, वो भी साधक था! रूप-रंग में वो, पूर्ण पुरुष था! चेहरे से ही पौरुष छलकता था उसके!
और फिर सभी ने स्थान ग्रहण किया अपना अपना! वो सर्वेश, सामने की, दूसरी कतार में बैठा था, सभी के सामने सामग्री-पात्र रखा था!
एक महानाद किया अरूणवेश ने! और उनके पीछे, सभी ने उस महानाद को दोहराया! और इस प्रकार पूजन आरम्भ हुआ! सर्वेश तो बस उसी को निहारे जाए! कुछ बोले नहीं, बस उसी पर दृष्टि जमाये रखे!
उस रात का पूजन समाप्त हुआ, ये पूजन रात्रि ग्यारह से, तीन बजे तक चला था, सभी उठ कर चल पड़े थे , जिसका जहाँ रुकने-ठहरने का प्रबंध किया गया था! सबसे अंत में, वो गया! धीरे धीरे! और तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा! वो चौंक पड़ा! पीछे पलटा एक झटके से!
"अरे सामू?" बोला सर्वेश,
"हाँ!" बोला वो,
"मैंने सोचा पता नहीं कौन है!" बोला सर्वेश!
"यहां ऐसा और कौन होगा?" बोला सामू,
"हाँ, ये तो है!" बोला वो,
"चलना नहीं है क्या?" पूछा सामू ने,
"चलता हूँ अभी!" बोला वो,
और सीढ़ी पर बैठ गया! सर लटका कर!
"क्या बात है?" पूछा सामू ने, झुक कर,
"कुछ नहीं!" बोला सर्वेश,
"कुछ तो है!" बोला सामू!
"हाँ, ये भी है!" बोला सर्वेश,
"तो बता ना? मित्र को नहीं बताएगा?" बोला सामू, बैठते हुए!
सर्वेश, कुछ पल, सामने जलते अलाव को देखता रहा, वो अलाव, वैसे भी अब दम तोड़ने ही वाला था!
"अरे बता ना?" बोला सामू,
"तेरह दिन बस!" बोला वो,
"तेरह दिन?" बोला सामू, हैरत में पड़ते हुए,
"हाँ मित्र! तेरह दिन मात्र!" बोला सर्वेश,
"क्या होने वाला है उसके बाद?" पूछा सामू ने,
"पता नहीं, यही तो नहीं पता!" बोला वो,
"कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो मित्र? बताओ तो?" बोला सामू,
"मैं खुद बहक गया हूँ सामू!" बोला वो,
"कैसे बहक गए?" पूछा सामू ने,
"पता नहीं!" बोला वो,
"और किसने बहका दिया?" पूछा सामू ने,
"बताऊँ?" बोला सर्वेश,
"हाँ! क्यों नहीं!" बोला सामू,
"एक बात बताओ सामू?" बोला सर्वेश,
"पूछो?" बोला वो,
"आज अनुष्ठान में, वो साधिका कौन थी?" पूछा सर्वेश ने,
अब समझ गया कि किसने बहकाया है उसको! नयना ने!
"मेरी बहन है वो! मेरी चचेरी बहन!" बोला वो,
अब चौंका सर्वेश!
पलटी नौका उसकी चलते चलते!
"ओ....ओ....क्षमा करना सामू!" बोला सर्वेश, थोड़ा झेंपते हुए,
"कैसी क्षमा!" बोला वो,
"कि मैंने ऐसा कुछ कहा!" बोला वो,
"अरे नहीं!" बोला वो,
नाव, सीधी हो गयी सर्वेश की! ऐसा लगा उसको!
"अब चलता हूँ!" बोला सर्वेश, और उठा! चल पड़ा, सामू, मुस्कुराते हुए देखता रहा उसे! सर्वेश में कोई कमी नहीं थी! वो एक योग्य वर था! चतुर था, व्यवहार-कुशल था! और फिर, एक महासाधक का पुत्र भी था!
अब चल पड़ा सामू, जा पहुंचा अपने निवास पर!
अगला दिन!
सामू और सर्वेश मिले, सर्वेश नज़रें ही ना मिलाये उस से! सामू, बहुत प्रयास करे! लेकिन ना! वो ना मिलाये नज़र!
"सर्वेश?" बोला सामू,
"हाँ?" दिया जवाब,
"क्या मैं बात करूँ?" बोला सामू,
"क्या? किस से?" घबरा कर, उठ ही गया सर्वेश!
"अरे बैठो तो सही!" बोला सामू,
बैठ गया सर्वेश, चकित और परेशान सा!
"क्या नयना तुम्हें पसंद है?" पूछा सामू ने,
"कौन नयना?" पूछा सर्वेश ने,
"वही, साधिका, कल वाली!" बोला वो,
अब झेंपा वो! नज़रें, फिर से नीचे!
"बताओ?" पूछा सामू ने,
चुप वो!
"बताओ? बात करूँ चाचा जी से?" बोला वो,
"तुम कैसे बात करोगे?" पूछा सर्वेश ने,
"मैं अपने पिता जी को कहूँगा!" बोला वो,
तब तो बात बन सकती थी!
"अब बताओ? पसंद है?" पूछा सामू ने,
"हाँ सामू! हाँ!" बोला सर्वेश!
"तो मैं आज ही बात करूंगा पिता जी से!" बोला सामू,
सर्वेश, ऐसा खुश! ऐसा खुश कि मानो जैसे, स्वर्ग-द्वार खुले!


   
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श्रीशः उपदंडक
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इतना बताते बताते, उसकी रुलाई फूट पड़ी, मैं जानता था, उसने सीने में दर्द पाल रखा है, दर्द, एक ऐसा दर्द जिसका कोई ईलाज मुहैय्या न हो सका था, ये बेचारी नयना, अभी तक दर्द संभाले , इस दीन-ओ-दुनिया में बरक़रार बने हुए थी! उसके भी अपने ही निज़ाम हैं! कब कयता करे, क्या न करे, वो ही जाने! हम तो वही जानते हैं, जो दीखता है आँखों से! खैर,
"नयना?" बोला मैं,
उसके कांपते होंठ, मुझे अंदर तक छील गए, वो सरिता नहीं थी, वो नयना थी उस वक़्त, अलफ़ाज़ न निकले मुंह से, उस दर्द ने, अपनी असलियत छिपाने के लिए, ज़ुबान को सील दिया था! यही एक वजह रही थी!
"नयना?" मैं फिर से बोला,
उसके हाथ उठे, और मेरी गरदन को लिया गिरफ़्त में, सर नीचे और उसके बदन में जुम्बिश दौड़ी! ये जुम्बिश, रोने की थी! कैसा वक़्त होता है ये, वो कैसा लम्हा, कि, जी चाहता है अपना सबकुछ बताने को, अपने राज, जो पोशीदा हैं, खोलने को, लेकिन महज़ एक सोच, या वो जज़्बा, कैसे रोक लेता है उस वक़्त! ठीक वैसा ही हो रहा था नयना के संग!
"फिर क्या हुआ नयना?" पूछा मैंने,
उसने एक लम्बी सुबकी ली, और अपनी नाक पोंछी, फिर मुझे देखा, मेरे सर पर हाथ रखा उसने! हल्का सा मुस्कुराई, मुझे बेहद सुक़ून महसूस हुआ उसे मुस्कुराते देख!
"पागल! ओ पागल!" बोली वो, मुझे हल्के से, चांटा मारते हुए!
"हाँ!" कहा मैंने,
"तू पागल है!" बोली वो,
"हाँ, पागल तो हूँ!" बोला मैं,
"मूढ़ भी है!" बोली वो,
"हाँ, वो भी हूँ!" बोला मैं,
अब वो हंसी! खिलखिलाकर!
मैं हैरान था!
हैरान! कोई सीने में दर्द पैबस्त किये, कैसे हंस सकता है ऐसे? फिर सोचा, जब दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाया करता है, तो हंसी में तब्दील हो जाता है! मुझे उस से और हमदर्दी पैदा हुए जा रही थी!
उसने अपने बाएं स्तन को छुआ, हल्का सा दबाया, और मुझे देखा,
"यहां भी दर्द है?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"दिखाओ?" कहा मैंने,
उसने कपड़ा उठाया और अपने अंतःवस्त्र से स्तन बाहर निकाला, स्तनाग्र काल पड़ा था, मुझे उसकी पीड़ा का अहसास हुआ, बेचारी, कैसा दर्द झेल रही थी,
"यहां भी दर्द है?" पूछा मैंने,
"जलन है!" बोली वो,
"मैं अभी जाता हूँ, खेचकी के बीज लाता हूँ!" कहा मैंने,
"ये देख!" बोली वो,
बायीं पसली पर, निशान थे, जैसे, किसी ने मारा-पीटा हो उसे, बहुत दुःख हुआ मुझे, बहुत दुःख,
"ये कैसे निशान हैं नयना?'' पूछा मैंने,
"बता दूँगी!" बोली वो,
कपड़े ठीक किये उसने, और मुझे देखा, मेरा हाथ पकड़ा,
"तू अगर होता उधर तो?" बोली वो,
"उधर?" पूछा मैंने,
"हाँ, कोई मुझे पीटे तो?" पूछा उसने,
"मेरे सामने?" पूछा मैंने,
"हां?" बोली वो,
"तो दो टुकड़े कर दूँ उसके!" बोला मैं,
"सच में?" बोली वो,
"हाँ, सच में!" कहा मैंने,
"तू भला आदमी है, पागल!" बोली वो,
फिर से, एक हल्की सी चपत लगाते हुए!
"अच्छा सुन!" बोली वो,
"जी!" कहा मैंने,
"जी! तू भला आदमी है, सही कहा मैंने!" बोली वो,
अब मैं चुप रहा! न बोला कुछ!
"सुन!" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"नयना नहाएगी अब!" बोली वो,
"अभी, अभी करवाता हूँ इंतज़ाम!" कहा मैंने,
"और सुन?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"तू बाहर ही रहना?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"जा, जल का प्रबंध कर!" बोली वो,
मित्रगण!
उसका आदेश ऐसा लगता था कि, मेरा परम कर्तव्य हो! मुझे अब कोई खीझ नहीं थी! कोई परेशानी नहीं!
"अभी करवाता हूँ!" कहा मैंने,
और मैं बाहर चला, पानी का इंतज़ाम करवा दिया, सारा इंतज़ाम! वापिस हुआ नयना के पास!
"अरे ओ?" बोली वो,
"हाँ जी?' बोला मैं,
"ये कपड़े उठा?'' बोली वो,
मैं गया, और उठा लिए कपड़े,
"चल, ले चल मुझे!" कहा उसने,
"आओ!" मैंने कहा,
और ले चला बाहर उसे, वो चली आई गुसलखाने तक, चली गयी अंदर, मुझे हुक्म देते हुए कि मैं बाहर ही बना रहूँ, जब तक वो लौटे नहीं! तो जी मैं, वहीँ खड़ा रहा! आधे घंटे के बाद वो आई, मुझे हाथ पकड़ाया अपना,
"चल अब!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
और उसका हाथ पकड़, ले आया कमरे में! वो बैठ गयी, पाँव ऊपर कर लिए अपने,
"आ, बैठ जा!" बोली वो,
मैं बैठ गया पास में ही!
"तू यहां आया न?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"अच्छा किया!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
"अच्छा!" बोला मैं,
"अब मैं क्या करूँ, बता?" बोली वो,
"क्या करना है?" पूछा मैंने,
"छोड़!" बोली वो,
"बताओ तो?" कहा मैंने,
"छोड़!" बोली वो,
"छोड़ दिया!" कहा मैंने,
खिलखिलाकर हंसी! बहुत तेज!
"कुछ खायेगा?'' पूछा उसने,
"नहीं तो!" कहा मैंने,
"खाना हो, तो बोल दिया, रुक्मण दे जायेगी!" बोली वो,
रुक्मण! उस समय होगी कोई!
"बता दूंगा!" कहा मैंने,
"और हाँ?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"जो आराम करण अहो, तो यहां, देख यहां, सो जाइयो! ठीक है?" बोली वो,
"हाँ, बता दूंगा!" बोला मैं,
"हाँ, और किस से कहेगा?" बोली वो,
"आपसे ही कहूँगा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"और सुन?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"कहीं जाना हो, तो बता के जाइयो!" बोली वो,
"हाँ जी!" कहा मैंने,
"अब पाँव ऊपर कर, लेट जा!" कहा उसने,
"अच्छा!" बोला मैं,
जूते खोले मैंने, और दीवार से, पीठ लगा ली!
"लेट जा?" बोली वो,
"लेट जाऊँगा!" कहा मैंने,
"तो लेट?" बोली वो,
"अभी नहीं!" बोला मैं,
"लेट?" चीख के बोली वो,
"जी!" कहा मैंने,
और मैं लेट गया! तब उसने, अपनी दोनों टांगें, मेरे ऊपर रख दीं! मैंने कुछ न कहा, न किया, उसको आराम मिल रहा था और इस से बेहतर और क्या!
"जाग रहा है?" बोली वो,
"हाँ जी!" बोला मैं,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"कब तक जागेगा, ओ पागल?" बोली वो,
"आपके सोने तक!" बोला मैे,
वो हंसी, खिलखिलाकर,
"मैं नहीं सोती, बताया था न?" बोली वो,
"हाँ, बताया था!" कहा मैंने,
"तू सो जा!" बोली वो,
"न, अभी नहीं!" कहा मैंने,
"सो जा पागल कहीं के!" बोली वो,
मेरी हंसी निकल गयी! ऐसी सरलता!
"आ, इधर आ!" बोली वो, हाथ देकर अपना!
मैंने हाथ पकड़ा दिया, खींचा उसने, और मैं लेट गया उसके साथ, कर लिया अपना चेहरा मेरी तरफ, मुझे देखा और मुस्करा गयी!
"ओ पगले! सो जा!" बोली मेरे सर पर थपकी देते हुए!
"नहीं नयना!" बोला मैं,
"तू सच में पागल है!" बोली वो,
मैं मुस्कुरा पड़ा उसे देख कर!
"तू भला आदमी है, बहुत भला!" बोली वो,
"नयना?" बोला मैं,
"हाँ?" पूछा उसने,
"मुझे जानती हो?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"कौन हूँ मैं?" पूछा मैंने,
"पागल!" बोली वो,
"कौन पागल?" कहा मैंने,
"है एक पागल!" बोली वो,
"कौन एक पागल?" पूछा मैंने,
"ये रहा वो पागल!" बोली मेरे बाल पकड़ कर!
मैं मुस्कुराया!
"अब सो जा!" बोली वो,
आँखें बंद कर लीं मैंने, उसी क्षण!
"सुन रे?" बोली वो,
"हाँ?" आँखें खोलीं मैंने,
"मुझे भूल जाएगा?'' पूछा उसने,
मैं मुस्कुराया! उसके माथे पर हाथ रखा,
"नहीं, कभी नहीं!" बोला मैं,
उसकी आँखों से, पानी उभरा और बह चला!
"नयना, नहीं!" कहा मैंने,
"रोने दे न?" बोली वो,
"नहीं नयना!" बोली वो,
और लिपट गयी मुझसे,
"तू बहुत देर से आया! पागल, पहले कहाँ था?" बोली, सिसक कर,
"यहीं तो था?" बोला मैं,
"नहीं था!" बोली वो,
ये कैसा बंधन?
क्या लगता था मैं उसका?
या, वो मेरी?
क्या? कुछ नहीं पता!
आंसू पोंछे मैंने उसके, होंठों से आंसू पोंछे!
"तू क्यों रख रहा है मेरा ख़याल?" बोली वो,
"पागल हूँ न!" कहा मैंने,
एक हल्का सा चांटा दिया उसने!
"नहीं, वो बस मैं कह सकती हूँ तुझे! समझा?" बोली वो,
"कोई और कहे तो?" बोला मैं,
"ज़िंदा नहीं बचे वो!" बोली गुस्से से,
मैं मुस्कुरा पड़ा!
"अच्छा सुनो?" कहा मैंने,
"क्या हुआ?" पूछा उसने,
"मैं बीज ले आऊँ?" बोला मैं,
"हाँ, ले आ!" बोली वो,
"ठीक है!" कहा मैंने,
अब मैं उठा, जूते पहने, और उसने, मेरी बाजू पकड़ ली, मुझे देखा,
"आएगा न?" पूछा उसने,
"हाँ, क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"सच में?" पूछा उसने,
"सच में!" कहा मैंने,
"जा फिर!" बोली वो, मेरी बाजू छोड़ते हुए!
मैं आया बहार, और पहुंचा उनके पास, लिया साथ में उनको और चल पड़े हम जंगल की तरफ, कोई घंटा भर लगा, खेचकी की झाड़ी मिल गयी, उस से फलियां तोड़ लीं, और फिर हुए वापिस, पहुंचा घर, और फिर से सरिता के कमरे में आ गया! तो टहल रही थी, मुझे देखा तो खुश हो गयी!
"मिल गए?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"ला?" बोली वो,
"लो, ये रहे!" कहा मैंने,
"पानी तो ला?" बोली वो,
"अभी लाया!" कहा मैंने,
उसने छीली वो फलियां, कुछ बीज लिए, चबा लिए, मैंने पानी दिया, तो पी लिया! फिर से, पूरी बोतल खाली कर दी!
"बैठ!" बोली वो,
मैं बैठ गया!
"वो ठंडक वाली दवा ला?" बोली वो,
"अभी लाया!" कहा मैंने,
मैं गया, और ले आया!
"ले, लगा दे!" बोली वो,
लेट गयी थी, मैंने लगा दी दवा, गरमी निकल रही थी उसके उन निशानों से,
"यहां भी लगा दे!" बोली वो,
मैंने उसके स्तनाग्रों पर भी लगा दी दवा!
"हाँ, ये दवा ठीक है!" बोली वो,
"यहां रख दी है!" कहा मैंने,
"तू ही लगाना?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"तू न आता, तो बुरी हालत होती!" बोली वो,
"आता कैसे नहीं!" बोला मैं,
"हाँ, अच्छा किया!" बोली वो,
"आना तो था ही!" बोला मैं,
"हाँ!" कहा उसने,
मैं हंसा तब!
"इधर आ?" बोली वो,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"तेरे सर में कुछ अटका है!" कहा उसने,
"अच्छा!" कहा मैंने,
उसने कुछ फूस के टुकड़े हटा दिए बालों में से!
"नयना?" बोला मैं,
"बोल?" बोली वो,
"उसके बाद क्या हुआ?'' पूछा मैंने,
"कब?" पूछा उसने,
"सर्वेश........" कहा मैंने,
वो खो गयी, खो गयी पुरानी यादों की भंवर में!
"नयना?'' बोला मैं,
"हूँ?" कहा उसने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसने पलट के मुझ को देखा, घूरा! संजीदा हो कर! मेरा हाथ पकड़ा, और अपने दोनों हाथों में, भर लिया! मेरे हाथ को देखा, मेरे हाथ में, उलटी तरफ, जो बाल थे, उनको अपनी ऊँगली से उलट-पलट किया! फिर मेरा हाथ, अपने कंधे पर रख लिया, सर टिका लिया उस पर! मैं आगे बढ़ा, और उसकी गरदन को, हाथ से, पकड़ा!
"नयना?" बोला मैं,
"हूँ?" बोली वो,
"बताओ?" कहा मैंने,
"क्यों जानना चाहता है तू?" बोली वो,
"मुझे जानना है!" कहा मैंने,
"हाँ, जानना है!" बोली मुंह बनाते हुए, चिढ़ाते हुए!
"बड़ी हो न, इसीलिए!" कहा मैंने,
"हाँ, मैं बड़ी हूँ, तू छोटा है!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तुझे एक चांटा मारूं?" बोली वो, हाथ दिखाते हुए,
"बड़ी हो, मार सकती हो!" कहा मैंने,
''और तू खा लेगा?'' पूछा उसने,
"इस से मेरा मान बढ़ेगा!" कहा मैंने,
"हट! पागल!" बोली वो,
और खींच लिया अपने पास मुझे! घूरा!
"तू खा ही ले!" बोली वो, और हंस पड़ी!
"तुम मार ही लो!" कहा मैंने, अपना गाल आगे करते हुए!
"ला फिर!" बोली वो,
और उसने, एक चपत लगाई, लेकिन बस, उँगलियों से!
"मेरे पागल! तुझे कैसे मारूं! हाथ नहीं उठता!" बोली वो,
मेरे पागल! कितने मार्मिक शब्द थे! वो कितना खुश हुई थी!
"बड़ी हो तो मार सकती हो!" कहा मैंने,
"जाने दे!" बोली वो,
"जाने दिया!" कहा मैंने,
हंस पड़ी खिलखिलाकर!
"सलकारु हुआ न मैं अब?" बोला मैं,
"हट्ट? पागल! ऐसा नहीं बोलते!" बोली वो,
कुछ पल, खामोशी ने चुरा लिए!
"तू जानना चाहता है न?" बोली फिर वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"बताती हूँ!" बोली वो,
और उसने फिर आगे बताना शुरू किया, मैं चुपचाप सुनता रहा! अब लिखता हूँ उसके बारे में ही, अपने शब्दों में!
---------------------------------------------
अगले दिन ही, सामू ने बात कर ली थी अपने पिता जी से, पिता जी ने आश्वासन सिया की अनुष्ठान पश्चात वो अवश्य ही बात करेंगे अरूणवेश से! सामू का काम पूर्ण हुआ था, वो जा पहुंचा सर्वेश के पास! सर्वेश उसको देख, ऐसा हो जैसे किसी विषधर ने नाम पूछा हो उस से उसका!
"बात हुई?" पूछा सर्वेश ने,
"हाँ!" कहा सामू ने,
"क्या, क्या रहा?" पूछा उसने,
अब बता दिया सारा हाल!
सुनकर, सर्वेश के चेहरे पर आई काली बदली, छंट गयी! चैन मिला उसे बहुत! अपने मित्र को, बाजूओं में भर लिया उसी क्षण!
"वैसे तुम्हारे माता-पिता तो मान ही जाएंगे?'' पूछा सामू ने,
"क्यों नहीं!" बोला वो,
"तो कोई चिंता नहीं!" बोला सामू!
"हाँ सामू!" बोला वो,
"हमारी लाड़ली बहन को हमेशा खुश रखना!" बोला सामू,
"अपनी जान से ज़्यादा!" बोला सर्वेश,
और इस तरह मित्रगण!
वो तेरह दिवस भी बीत गए! अब जाना पड़ा सर्वेश को, उसने जितना, प्रेम-रस पिया था, क्षुधा उतनी ही तीव्रतम हो चली थी! अब न दिन का चैन था, न रात का आराम! वो रहता भी दूर ही था, एक दिन लगता था आने जाने में उस समय! बीच में जंगल पड़ता था, डकैतों के इलाक़े पड़ते थे! कुछ बरसाती नदी-नाले पड़ते थे! इधर, सामू के पिता जी ने बात की अरूणवेश से, अरूणवेश राजी हो गए! उन्होंने अपनी पत्नी से बात की, पत्नी राजी, उनकी पत्नी ने, बात की नयना से, अब नयना क्या बोलती? कुल मिला कर हाँ हुई, लेकिन समय रखा गया एक वर्ष!
एक वर्ष! सर्वेश के लिए ये एक वर्ष, एक सहस्त्र वर्ष लगे! लेकिन इस एक वर्ष में, नयना, महासाधिका बन चुकी थी! वो भी अति-प्रबल! उसके आसपास, कोई नहीं था! पिता ने, सर्वस्व प्रदान कर दिया था, उसके ताऊ जी ने, उसको पंच-मेघ विद्याओं में निपुण कर दिया था!
-------------------------------------------------
"अब समझा?" बोली वो,
"जी!" कहा मैंने,
"कौन हूँ मैं?" बोली वो,
"मेरे लिए तो नयना हो!" बोली वो,
हंसी वो! खिलखिला कर,
"हाँ, तेरा कोई क्यों कुछ बिगाड़ेगा!" बोली वो,
"और क्या, जब बड़ी बैठी हों, तो किसकी हिम्मत!" कहा मैंने,
''और क्या! मैं हूँ तेरे लिए, ओ पागल!" बोली, एक चपत लगाते हुए!
"आपके रहते क्या डर?" बोला मैं,
"हाँ, सच्ची!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"चल पानी पिला!" बोली वो,
"अभी लाया!" कहा मैंने,
मैं बाहर गया, और ले आया ठंडा पानी! डाला गिलास में,
"लो!" कहा मैंने,
उसने पानी पिया!
"तू नहीं पियेगा?" बोली वो,
"पी लूँगा!" कहा मैंने,
"तो पी?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
मैंने पानी पिया फिर! उसने ही पिलाया!
"पता नहीं, कहाँ मर रहा था!" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने, मुंह पोंछते हुए,
"तू? और कौन?" बोली गुस्से से,
"कहाँ मर रहा था?" पूछा मैंने,
"हाँ, तू होता न, तो कुछ न होता!" बोल गयी वो!
"नयना?" बोला मैं,
"हाँ?" कहा उसने,
"कब न होता?" पूछा मैंने,
"जब आग लगाई उसने?" बोली वो, बहुत गुस्से से,
"किसने नयना?" पूछा मैंने तेजी से,
"शंभू ने, हरामजादा! कुत्ता, कुल्लन का बीज!" चीख के बोली वो,
मैं गिरा उसके पांवों पर!
"कौन शंभू?" बोला मैं,
साँसें भरी उसने! तीज तेज! नथुने फूल गए! आँखें चौड़ी हो गयीं उसकी, गुस्से में लाल हो गयीं आँखें! मेरे बाल पकड़ लिए गुस्से में उसने, ऐंठ दिए!
"कहाँ था तू?" चीख के पूछा उसने,
"मैं यहीं था!" कहा मैंने,
"आया क्यों नहीं?" पूछा उसने,
"मुझे नहीं पता था!" कहा मैंने,
"तुझे नहीं छोडूंगी मैं!" बोली वो,
और कस के एक दिया चांटा मुझे!
फिर दूसरा, फिर तीसरा!
मैं चुप रहा! चुप! उखाड़ना चाहता था उसे!
"कहाँ था?" चीख के पूछा!
"यहीं था!" बोला मैं,
"तो मरा क्यों नहीं?" बोली वो,
"खबर नहीं थी!" कहा मैंने,
"तेरे सामने मुझे कोई हाथ लगा ले?" चीख के बोली वो!
"हाथ काट दूंगा उसके!" कहा मैंने,
"तब कहाँ था? कहाँ था? कहाँ था मेरे पगले?" बोली वो, और भर लिया मेरा सर अपने सीने में, चूमे, दुलारे, रोये! हाथ फिराए!
"मेरे पगले!" बोली वो,
मैं चुप!
"मेरे पगले?" बोली वो,
मेरे सर पर चूमे वो, बार बार!
''अरे मेरे मूरख पगले!" फिर से बोली,
मैं चुप!
"तू जो होता, काट देता! काट देता उसे!" बोली वो,
मुझे चूमे, बार बार! जहां चांटे मारे थे, वहन चूमे, हाथ फिराए, निशान तो नहीं बने, ये देखे! आंसू बहाये! बार बार भींचे मुझे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसके नाख़ून से, मेरे कान की झल(कान का निचला भाग), सीधे कान की झल पर, एक छोटी से खरोंच पड़ गयी थी, उसने देखा उसे! उसका खून हटाया! अपने हाथ से साफ़ किया!
"खून! तेरा खून! तेरा खून निकला? पगले?" बोली वो,
चिपका लिया सीने से मुझे उसने!
"क्या करूँ? मैं क्या करूँ?" रो कर बोली वो,
"नहीं नयना, कुछ नहीं है!" कहा मैंने,
"न! मैंने तेरा खून निकाला, मैंने!" बोली वो,
"नहीं नयना!" बोला मैं,
"मुझे माफ़ कर दे! माफ़ कर दे पागल, ओ पागल!" बोली रोते हुए!
"कोई बात नहीं नयना! बड़ी हो, तो मार भी सकती हो!" कहा मैंने,
"नहीं! नहीं!" बोली वो,
मुझे चूमे बार बार! बार बार, मेरे बालों में हाथ फेरे!
"पागल? तू सच में पागल है!" बोली वो,
"हाँ, हूँ मैं!" कहा मैंने,
"रुक जा! रुक जा!" बोली वो, और खड़ी हुई, फ्रिज तक गयी, खोला, पानी लायी, गिलास में डाला, और दिया मुझे,
"ले, ये पी ले! पीले!" बोली वो,
मैंने ले लिया गिलास, पाने लगा पानी ओख लगा कर! पी लिया!
"आ, आ!" बोली वो,
और अपने हाथ से, मुंह पोंछ दिया मेरा! कितना प्रेम था उसमे! जब जीती होगी, तब कैसा प्रेम होगा उसे हृदय में!
"माफ़ कर दिया न?" बोली वो,
"नयना? आप बड़ी नहीं हो?" पूछा मैंने,
"हूँ, लेकिन ऐसा नहीं करते!" बोली वो,
"कुछ नहीं हुआ!" बोला मैं,
"न! न! तू क्या जाने? तू, क्या जाने? इधर आ? आ इधर?" बोली वो,
और, मेरा चेहरा पकड़ कर, मेरा कान देखा, अब खून नहीं था!
"आ, बैठ इधर, बैठ?" बोली वो,
बैठ गया मैं!
"तू भला आदमी है!" बोली वो,
'अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोला मैं,
"एक काम कर?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"मुझे ले चल कहीं!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"अलग कहीं?" बोली वो,
"यहां भी तो अलग ही हैं?" बोला मैं,
"नहीं, अलग, एकांत में!" बोली वो,
"जैसे?" पूछा मैंने,
"उपवन, नदी के पास!" बोली वो,
अब वहाँ सरयू बहती है, वो थोड़ा दूर है वहां से, फिर सोचा, कहीं किसी उपवन में कैसा रहे? एकांत भी होगा?
"चलो!" बोला मैं,
वो हुई खड़ी,
"मेरे कपड़े बदल?" बोली वो,
"तुम बदल लो?" कहा मैंने,
"नहीं? जो बोला वो कर!" बोली झिड़कते हुए,
"अच्छा, गुस्सा मत करो!" बोला मैं,
अब अलमारी से निकाले कपड़े, और बदले उसके, पसीने से, अंतःवस्त्र भी गीले थे, वो भी बदल दिए थे,
"चलो!" कहा मैंने,
"अरे सुन?" बोली वो,
"हाँ?" बोला मैं,
"मेरे केश?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
और उसके केश भी काढ़ दिए, एक जूड़ा बना दिया!
आये बाहर, उसको देख, सभी चौंक पड़े, मैंने शर्मा जी को सब बता दिया, ली स्कूटी की चाबी और ले चला उसे, करीब आधा घंटे के बाद.......
"सुन?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"यहां रुक जा!" बोली वो,
"यहां?" बोला मैं,
"हाँ, नदी है न?'' बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
मैं रुक गया, लगा दी सूती एक जगह, ये एक एकांत सी जगह थी, पेड़ लगे थे, खुला क्षेत्र था, लोगबाग थे नहीं उधर, सामने, नदी बह ही थी!
"आ, चल?" बोली वो,
और दौड़ पड़ी आगे आगे! मैं भी चला साथ में!
"ये जगह ठीक है!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"बैठ जा!" बोली वो,
"अभी!" कहा मैंने,
और मैं बैठ गया उसके संग!
अचानक से, उसने मेरा हाथ पकड़ा, और मुझे घूरा! बहुत देर तक! मैं एक बार को, डर ही गया था!
"नयना?" बोला मैं,
कोई जवाब नहीं!
"नयना?" पूछा मैंने,
कोई जवाब नहीं!
"ए?" बोली वो,
"हाँ नयना?" कहा मैंने,
"मुझे देखेगा?" पूछा उसने,
"हाँ नयना!" कहा मैंने,
"भोगणा को या नयना को?" बोली वो,
"नयना को!" कहा मैंने,
"आ!" बोली वो,
मुझे, मेरा कंधा खींचते हुए कहा उसने!
"आ?'' बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
वो चलने लगी, नदी की तरफ, मुझे पकड़!
"बस! यहीं रुक!" बोली वो,
मैं रुक गया!
"बैठ जा!" बोली वो,
मैं बैठ गया उधर ही!
भी, उसने खायी पछाड़, मैंने पकड़ा उसे, लिटा दिया, पसीने से तरबतर थी सरिता! मैं समझ गया था, कि वो अब सरिता में नहीं है!
"ए?" आई आवाज़!
मैंने पीछे देखा मुड़कर!
और जो मैंने देखा, मेरी तो सांस ही रुक गयी!
कैसा लम्बा कद उसका!
कैसा उज्जवल रूप!
कैसे सुगठित काया!
कैसा दैहिक-आकर्षण!
कैसा यक्षिणी-समान रूप उसका!
कैसे, स्व-पुलकित अंग उसके!
कैसे श्याम केश!
कैसे रति-समान रूप उसका!
मैं, ठगा सा रहा गया! क्या यही है वो? यही?


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैं किस को देख रहा था?
कोई देवी?
या कोई यक्ष-कन्या?
ऐसा रूप? मनुष्य में तो हरगिज़ नहीं हो सकता! उज्जवल श्वेत-वस्त्र! उज्जवल-काया, दैदीप्यमान मुख-मंडल!
"ए? बोली वो,
मेरे हाथ जुड़े अपने आप! मैं हुआ खड़ा!
"आ? इधर आ?" बोली वो,
मैं मंत्रमुग्ध सा, चल पड़ा उसकी तरफ!
"देखा मुझे?'' पूछा उसने,
"हाँ!" सर हिलाते हुए कहा मैंने,
"हाथ क्यों जोड़े हैं?" पूछा उसने, और खोल दिए मेरे हाथ!
"सम्मान में!" बोला मैं,
वो एक खनकती हुई हंसी हंसी! सच कहता हूँ, उस समय, वहाँ का ज़र्रा ज़र्रा हंस पड़ा था! वो ऐसी खनकती हंसी थी!
"मैं नदी तक क्यों लायी?" पूछा उसने,
"नहीं पता!" कहा मैंने,
"स्नान! स्नान करना है मुझे!" बोली वो,
"अवश्य!" कहा मैंने,
"और सुन?" पूछा उसने,
"जी?" कहा मैंने,
"अब लौट जाना!" बोली वो,
क्या? लौट जाऊं? कहाँ?
"कहाँ लौट जाऊं?" पूछा मैंने,
"इस पुत्री के संग!" बोली वो, उस सरिता की तरफ इशारा करते हुए!
"और आप?" पूछा मैंने,
"बता दूँगी!" बोली वो,
"कब?" पूछा मैंने,
"जल्दी क्यों मचाता है?" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"यहीं रहना!" बोली वो,
"जी!" कहा मैंने,
उसके बाद, वो, उस बहती नदी में, उतरती चली गयी, मैं, एकटक उसको जल में अठखेलियां करते देखता रहा! वो गुनगुनाती जाती, गीत गाती जाती, और स्नान किये जाती, डुबकियां लगाती, अपने मुख-मंडल पर, जल छिड़कती! अपने केश हिलाती! जल की कुछ बूँदें, मेरी ओर भी आतीं! संध्या से थोड़ा सा पहले का समय था वो! पश्चिमी क्षितिज पर, सूर्य, लाल बादलों में, जैसे बाहर आने को छटपटा रहे थे! उनका प्रतिबिम्ब, जल पर पड़ता! जल, सुनहरा चमक पड़ता! और नयना, जल-क्रीड़ा में ऐसी मग्न, कि बस नज़र हटे ही नहीं उस से!
कम से कम एक घंटा! एक घंटा वो जल में रही! किनारे पर, जब वो आई, तो उसके पांवों के सुंदर पद-चिन्ह उभर आये रेत पर! पाँव, मांसल थे, भरे भरे, गोरे, बस ऐड़ी और पंजे के ही पद-चिन्ह बने!
वो आई, मुझे देखा, और मुस्कुराई! फिर, बैठ गयी संग मेरे!
"सुन रे?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"तूने ये नहीं पूछा कि मैं इस बेटी के पास कैसे आई?" बोली वो,
अपनी मोटी मोटी आँखों में, सवाल की शदीदगी लिए हुए, उसकी सुंदर आँखें ऐसी, कि कितने ही युग बीत जाएँ, उन आँखों की झील का तल ही न मिले!
"मुझे पता था!" कहा मैंने,
"क्या?" बोली वो,
"कि आप खुद ही बता दोगी!" बोला मैं,
"तू तो समझदार भी है, पागल!" मेरे सर पर, एक चपत जड़ते हुए कहा उसने!
"आपके संग हूँ न!" बोला मैं,
"हाँ, तब भी होता, तो कैसा अच्छा होता! है न?" बोली वो,
"कब?" पूछा मैंने,
"बता दूँगी!" बोली वो,
"सुन, एक रोज, कोई माह भर पहले, मैं इधर ही थी, ये बेटी है न? ये यहीं आई थी, ये मुझे, मेरे जैसी लगी, सोचा, ताप कम हो! चली आई! अच्छा हुआ न? तू कैसे मिलता फिर?" बोली वो,
"हाँ, सही कहा आपने!" बोला मैं,
"जा, इसके घाव देख तो?" बोली वो,
"अभी!" कहा मैंने,
और मैंने, क्षमा मांगते हुए, सरिता के अंग देखे, अब कोई चिन्ह न था! सब ठीक था! जैसे कुछ था ही नहीं कभी!
"अब नहीं हैं न?" बोली वो,
"हाँ, नहीं हैं!" कहा मैंने,
"एक काम कर!" बोली वो,
"बताइये?" बोला मैं,
"इसे घर छोड़ आ!" बोली वो,
"और आप?" कहा मैंने,
"अरे नहीं जा रही मैं कहीं!" बोली वो,
"सच में?'' पूछा मैंने,
"हाँ, सच में! तेरे से मिले बग़ैर नै जाउंगी कहीं!" बोली वो,
"ठीक है!" बोला मैं,
वो उठी, चली सरिता के पास, और कुछ बोली, हाथ लगाया सरिता को, आशीर्वाद दिया, और माथा चूमा उसका! जैसे एक माँ अपनी पुत्री को प्रेम करती है!
"ले, उठा इसे!" बोली वो,
"जी!" कहा मैंने,
"सरिता?" बोला मैं,
उसने आँखें खोलीं! चौंक पड़ी मुझ अनजान को देख! वो जगह, अनजान हुई उसके लिए!
"आओ!" कहा मैंने,
"कौन हैं आप?" पूछा उसने, डरते हुए, कपड़े ठीक करते हुए!
"अपना बड़ा भाई समझो!" कहा मैंने,
"कौन?" पूछा उसने,
"तुम्हारा बड़ा भाई!" बोला मैं,
"आओ, घर चलो, सब इंतज़ार कर रहे हैं!" कहा मैंने,
हैरतज़दा, डरी डरी, वो चली मेरे साथ! उसको समझाना पड़ा, नहीं तो रोना, चिल्लाना शुरू कर दिया था उसने! जब उसके माँ-बाप का नाम बताया, तब थोड़ा शांत हुई! और मैं, उसको ले, चल पड़ा घर की तरफ!
मित्रगण!
शर्मा जी के पास फोन आया था एक जानकार का, सरिता के विषय में ही बात हुई थी, सरिता पर प्रेत का साया है, ये पता चला, सृत पर जो प्रेत था, वो बेहद ताक़तवर था, जो तीन लोग आये थे, उन्होंने कोशिश बहुत की! उन्होंने, उस सरिता के साथ, नीच हरक़त करने की कोशिश भी की, जहां-तंहा हाथ भी लगाया, ईलाज के नामा पर, इसी से क्रोधित हो, महासाधिका नयना ने, उनको नपुंसक बना दिया था! ये मुझे बताया भी था नयना ने! अब जब गुआरिश हुई, और मामला एक कन्या से जुड़ा था, तब मैं आया था यहां! कारिंदा घुस नहीं पाया था! इबु लौट आया था! वहां कौन है? ये मेरे लिए, सबसे अहम मुद्दा बना और मुझे आना पड़ा!
तो मैं, घर पहुंचा,
घर पहुँचते ही, सरिता रोते हुए, भागी अंदर! माँ से मिली, पिता से, और भाई से, सभी रिश्तेदार खुश थे! एक माह बाद, सरिता ठीक हो गयी थी! उसने माँ-बाप तो पाँव पड़ने को हो गए, मैंने मना किया, और शर्मा जी से बात की, उनको सब बताया, और तब, वो मेरे साथ हो लिए, हमें कुछ काम है, इसीलिए हमने उन्हें बताया और हम दोनों दौड़ पड़े, उस स्थान की ओर! अब तक धुंधलका छा चुका था! रात्रि, बस आने को थी, अंतिम चरण का श्रृंगार शेष था बस! तदोपरांत, उसने आ ही जाना था! रास्ते भर, मैं शर्मा जी को बताता रहा उस नयना के साथ जो हुआ था अभी तक, वे भी दुखी हुए, ऐसी प्रबल साधिका, और ये हश्र? ऐसा हुआ कैसे? बस, अब यही जानना शेष था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैं स्कूटी रोकी उधर! शर्मा जी को ताक़ीद किया कि वो यहीं रहें, अँधेरा है काफी, यदि लौटना चाहें या घाट पर जाना चाहें, तो जा सकते हैं! वो वहीँ रुकेंगे, ऐसा कहा उन्होंने, और मैं दौड़ लिया किनारे की तरफ! मैं आया किनारे पर, पेड़ों से चमगादड़ उड़ उड़ जा रहे थे! उल्लू किरकिराने लगे थे, झींगुर, मंझीरे आदि, सब अपनी रात्रिकालीन क्रीड़ा में मग्न हो चले थे! लेकिन नयना? वो कहाँ थी?
मैंने चारों ओर देखा! कहीं नहीं दिख रही थी! मेरा दिल धड़क रहा था बहुत तेज! कहीं नहीं थी वो!
"नयना?" मैं चिल्लाया,
आगे भागा,
जल की आवाज़ आ रही थी! हल्की हल्की!
"कहाँ हो नयना?" बोला मैं,
कोई जवाब नहीं!
"तुमने वचन दिया था न नयना?" कहा मैंने,
कोई जवाब नहीं!
मैं बैठ गया रेत पर, आसपास देखा, नहीं थी वो! अनगिनत आशंकाएं घर कर गयीं दिल में, क्या हुआ? कहाँ गयी? कोई पकड़ तो नहीं ले गया? मेरी तो हालत खराब होने लगी! हाथ-पाँव कांपने लगे मेरे!
"नयना?" बोला मैं,
"हूँ?" आई आवाज़!
मैं उठा एक झटके से! आसपास देखा!
"कहाँ हो नयना?" बोला मैं,
"आँखें खोलो?" बोली वो,
"आँखें?" बोला मैं,
"हाँ? आँखें!" कहा मैंने,
मैंने आँखें बंद की, एक बार नाम लिया उसका, और खोल दी आँखें!
ठीक मेरे सामने थी वो! चमक ऐसी कि मैं देख नहीं पा रहा था! आँखें चुंधिया रही थीं! धीरे धीरे अभ्यस्त हुईं आँखें! और मैंने देखा उसे! पूर्ण श्रृंगार में! ऐसा श्रृंगार! ऐसा श्रृंगार! हाँ! इसे कहते हैं श्रृंगार! ये है षोडश-श्रृंगार! मेरे होंठों पर मुस्कान तैर गयी!
"कहाँ थीं तुम?" पूछा मैंने,
"यहीं!" बोली वो,
"लेकिन नहीं थीं तुम!" कहा मैंने,
"अच्छा चल, इधर आ!" बोली वो,
मैं बढ़ा उसके पास!
"तू याद रखेगा न मुझे?" पूछा उसने,
"दूसरी बार पूछा है ये तुमने!" बोला मैं,
"जवाब दे पहले?" बोली वो, गुस्से से,
"हाँ, हमेशा!" बोला मैं,
"तू जानता है?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"मैं अभागन हूँ?" ये बोलते हुए, हंसी ज़ोर से!
मैंने पहली बार! पहली बार छुआ उसे, उसके होंठों पर हाथ रख दिया! वो चुप हो गयी! मुझे देखा, लेकिन मेरा हाथ नहीं हटाया!
"नहीं! ऐसा नहीं कहना!" कहा मैंने,
अब हटाया मेरा हाथ उसने, लेकिन छोड़ा नहीं, आँखों से आंसू टपकने लगे!
"नयना?" कहा मैंने,
और आंसू पोंछे उसके,
"हाँ बोल!" बोली वो, अपने होंठ भींचते हुए!
"फिर क्या हुआ था?" पूछा मैंने,
उसने देखा मुझे, मेरा हाथ छोड़ा!
"तू जानना चाहता है न?" पूछा उसने,
"हाँ नयना!" कहा मैंने,
"बताती हूँ!" बोली वो,
मैं चुप खड़ा रहा!
"बैठ जा!" बोली वो,
और मेरा हाथ पकड़, बिठा लिया नीचे!
और उसने बताना शुरू किया आगे, अब मैं लिखता हूँ उसे.............
एक बार की बात है, हरदोई में आज जहां सिद्ध महाबली हनुमान जी का मंदिर है, उस स्थान पर, एक मेला लगा करता था! इस मेले में, खरीदारी आदि के लिए, अक्सर गाँवों से लोग आया करते थे! लोग, बड़ी संख्या में, इस मेले में आते! ऐसे ही एक मेले में, आना हुआ नयना का! अपने दोनों भाइयों और अपनी चार सखियों के संग! और उस मेले में ही, एक और व्यक्ति आया था, वो एक दूसरे गाँव का सरपंच था, नाम था सरताज, उस सरताज ने जब नयना को पहली बार देखा, तो ऐसा काम-पीड़ित हुआ, कि अब कुछ दीखे न उसे! हालांकि वो जानता था, कि नयना, एक महासाधिका है, उस जैसों को तो घास भी नहीं डालेगी! सीधे हिम्मत उसकी हुई नहीं! उसके संबंध, ज़रायमपेशा लोगों से भी थे! लेकिन अगर भनक लग गयी तो समझो, महासाधिका उनकी बोटी बोटी उखड़वा देती देह से उनके! अब उसने दौड़ाये घोड़े! की उसने मालूमात! उसे पता चला कि इस रूपवती का ब्याह, दूर की जगह से, किसी सर्वेश से होना तय हुआ है! अब तो छाती पर सांप लोटा उसकी! समय आने हो ही था! जल्दी में कुछ हो सकता नहीं था!
हाँ, एक काम किया जा सकता था! क्यों न समझाया जाए उस सर्वेश को, अगर न समझा, तो तूती तो बोलती ही थी सरपंच की! रास्ते से ही हटा देंगे! लाट साहब से संबंध अच्छे हैं ही! और कौन है रोकने वाला!
तो अंदर ही अंदर, साजिश की आग, सुलगने लगी! सरपंच ने, पूरा पता काढ़ लिया सर्वेश का, और भेज दिए अपने चार आदमी! वे आदमी, दौड़े और जा पहुंचे सर्वेश के पास! बुलाया उसे! पहले गाँवों में, कोई घुड़सवार आ जाया करता था, वो दरवाज़े बंद हो जाया करते थे! और ये तो बाक़ायदा, तलवारें लटकाये आये थे! इन्हीं में से एक था जोगराज!
"सर्वेश तू ही है?" पूछा उसने उस से,
"हाँ?" बोला वो,
"तुझे जीना है आगे?" पूछा जोगू ने!
सरासर धमकी दी थी! डर कोई था नहीं!
"मैंने क्या किया?" बोला सर्वेश,
"किया तो नहीं, करने जा रहा है!" बोला वो,
"क्या?" पूछा उसने,
"तू ब्याह करने वाला है?" पूछा उस से,
"हाँ?" बोला वो,
"किस से?" पूछा गया,
"आपको क्या मतलब?" बोला वो,
"यहीं गरदन उड़ा दूंगा, ले जाऊंग सर साथ अपने!" गिरेबान पकड़ कर बोला जोगू!
सर्वेश डरा नहीं!
अपने मज़बूत हाथ से, उसका हाथ पकड़, एक झटका दे, हटा दिया!
"समझ जा!" बोला जोगू!
"आज के बाद, यहां आने की हिम्मत न करना!" बोला वो,
"अच्छा?" बोला वो,
"हाँ, सुन ले, तू भी और ये भी!" बोला वो,
तब तक, उसके लोग आ ही चुके थे, अपने अपने लाठी, डंडे लिए! अब अगर सर्वेश को कुछ भी किया जाता, तो वो भी ज़िंदा नहीं जाने वाले थे वहां से!
"जो समझाना था, समझा दिया, नहीं होगा तेरा ब्याह उधर!" बोला वो,
"हिम्मत है तो रोक के दिखा!" बोला वो,
"समझ गया न?" बोला जोगू,
"अब चल, हो जा वापिस!" बोला सर्वेश!
और वे, चारों हो गए वापिस!
इस से पहले, कि सर्वेश इस विषय में सामू से बात करता, वो तीन दिन बाद ही, रहस्यमय ढंग से गायब हो गया, उसका, उसके बाद कोई पता न चल सका! ज़ाहिर था, ये काम जोगराज का ही होगा, उसने अपने आदमी तैनात कर दिए थे पहले ही! वो कहाँ गया? पता नहीं चल सका, उधर, सामू, और अरूणवेश बी उसके लौटने का इंतज़ार करते रहे!
तीन माह बाद, पेचिश से पीड़ित हो, अरूणवेश भी देह त्याग गए, समय तेजी से, आगे भागे जा रहा था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उधर सरपंच, रोज ही मिट्टी फांक रहा था, क्या किया जाए? कैसे किया जाए? सामने जाने की हिम्मत थी नहीं, बात बने तो बने कैसे! कोई पल न जाए जब नयना का रूप उसे कांटे न चुभाये! काम-पीड़ा से ग्रसित था वो, हालांकि उसकी एक पत्नी थी, उस से दो संतान भी थीं, फिर भी, कहते हैं न, मति मार जाना, ऐसी ही मति मारी गयी थी उसकी!
सरपंच की एक रखैल थी, बदरो, उसकी बहुत चलती थी, चूंकि, सरपंच से सीधा संबंध था उसका, ये सभी को पता था! सरपंच ने बुलाया उसको, और उस से की बात, बताया अपना दुखड़ा! सरपंच हर हाल में, नयना का रसास्वादन करने को लालायित था! बदरो की जान पहचान में, एक कुंजनी थी, ये कुंजनी है, डायन कही जाती हैं! कुंजनी भले ही कुछ न कर पाये, लेकिन वो बता तो सकती ही थी! ये पता चल जाए, तो फिर क्या था!
तो हुई बात कुंजनी से, कुंजनी ने जब सुना कि सामने शतीला महासाधिका है, पाँव तले ज़मीन खिसक गयी! कुंजनी के देह के अनगिनत टुकड़े कर सकती थी नयना! हाँ, उसने इतना ज़रूर बताया कि ये काम, बाबा बनवाल कर सकता है! रकम ज़रूर खर्च होगी, लेकिन बनवाल ये काम कर सकता है, वो टक्कर का है इस शतीला के!
अब, चला सरपंच लेकर बदरो को, उस बाबा बनवाल से मिलने! सुबह चले थे, मध्यान्ह में पहुंचे! बाबा बनवाल के तो ठाठ ही निराले थे! बातें तो ऐसी करता जैसे इस पूरे संसार में बस, वो ही एक अकेला है! और जब सुना उसने, शतीला के बारे में, तो पड़ी शिकनें माथे पर! टक्कर तो होती ही, परिणाम क्या होता, ये किसी को नहीं पता!
कुछ सोच-विचार किया उसने, और न कर दिया! कि वो उस महासाधिका से नहीं टकराएगा! वो नहीं चाहता कि मात्र काम-भाव के लिए, उस से बैर मोल लिया जाए! सरपंच के होश उड़े! करे तो क्या करे अब? बदरो, बाबा बनवाल की शैय्या तक पहुंचे को तैयार! न माना बाबा बनवाल! हाँ, उसने एक पता ज़रूर बताया, कि एक नंग बाबा है, शम्भू!
........................................................
शम्भू! और ढेर सारी गालियां दीं उस समय नयना ने उसे! हाथों में, मिट्टी उठा उठा सामने फेंके! गुस्सा चढ़ गया! चलाने लगी! छटपटाने लगी! मरने मारने को तैयार!
"सुनो! सुनो नयना!" कहा मैंने,
"वो, हराम का जना, शम्भू! वो कुत्ता, वो कुत्ता शम्भू!" बोली वो,
मैंने उसके हाथ पकड़ लिए थे! वो बार बार मेरे से हाथ छुड़ा लेती थी!
"नयना! नयना!" बोला मैं,
"चुप? चुप कर तू? समझा?" बोली वो,
मैं हो गया चुप!
मौके की नज़ाक़त को भांपा!
"अरे! दम था तो सीधे आता? सीधे? कायर?" चिल्लाई वो!
मैं उसका वो दुःख भांप गया था,
वही दुःख, जो सीने में, भाला बन, धंसा हुआ था, ज़ख्म रिसता था उसका, सालता था बार बार उसे!
फिर हंसने लगी वो!
बेतरतीब!
मुझे देखा, मेरे सर पर चपत जड़ी एक!
और हँसे! और हँसे!
और फिर, एकदम से चुप!
"सुन?" बोली रुंधे हुए गले से,
मैंने देखा उसे, उसकी क्षण,
उन सुंदर आँखों में, उस दर्द का, पानी छलक आया था!
मेरे सीने में दर्द उठा! गला सूख गया मेरा!
"सुन?" बोली वो,
"बोलो नयना?" बोला मैं,
"मैं अकेली हूँ?" पूछा उसने,
"नहीं नयना!" कहा मैंने,
"तू मेरे संग है न?" पूछा उसने,
"हाँ नयना, संग हूँ!" कहा मैंने,
"मैं बहुत घूमी हूँ अकेली, ओ पागल? सुन रहा है?" बोली वो, तड़पते हुए!
"मेरी माँ, मेरी माँ को मार दिया!" बोली वो,
ओ मैं चौंका!
"मेरे भाइयों को मार दिया!" बोली वो, अब रो रो कर!
भाइयों को?
"मैं अकेली रह गयी! अकेली!" बोली वो,
बहुत दुःख हुआ मुझे!
"अब नहीं मैं अकेली!" बोली वो,
"हाँ, अब नहीं हो!" कहा मैंने,
"तू है न संग?" पूछा उसने,
"हाँ, हूँ संग!" बोला मैं,
"ऊपर देख? देख ऊपर?" बोली वो, मेरा चेहरा ऊपर करते हुए!
"सुन रहा है न?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मुझे पार लगाएगा न?" पूछा उसने,
ओह!
अब निकले मेरी आँखों से आंसू!
"ए? ए?" मारा एक चांटा!
"तू? तू क्यों रोता है?" पूछा उसने,
कुछ नहीं बोल सका मैं!
एक शब्द भी नहीं!
"नहीं! नहीं! तू मत रोना! समझा? बोल?" बोली वो,
मैंने हाँ में सर हिलाया अपना!
"अब जवाब दे?" बोली वो,
"हाँ, लगाउँगा पार!" कहा मैंने,
रो पड़ी वो!
मुझे लगा लिया गले!
फफक फफक के रोई वो!
"मैं बहुत तड़पी हूँ! इतने साल!" बोली वो,
"अब वो समय समाप्त!" कहा मैंने,
"सच्ची?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तू कहाँ था अब तक?" बोली वो,
मेरे बाल खींचते हुए!
"प्रतीक्षा में था!" बोला मैं,
"अच्छा!" बोली वो,
फिर संतुलित हो गयी वो!
पानी को देखती रही!
कभी सर उठाकर, कभी सर नवा कर!
"खड़ा हो?" बोली वो,
मैं हुआ खड़ा!
"आ!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
"आ जा!" बोली और नदी की तरफ चली!
नदी में झुक, अंजुल बना दोनों हाथों से, लिया पानी!
"आ, इसे पी!" बोली वो,
मैंने पिया, और जैसे ही स्वाद लिया, वो मीठा था! गुलाबजल जैसा!
"और पियेगा?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
उसने फिर से पानी लिया, और पिलाया मुझे!
मेरी तो जैसे सारी थकावट, हरारत सब छू-मन्तर हो गयी!
"रुक, मैं पानी पी लूँ!" बोली वो,
"पी लो!" कहा मैंने,
मैं उस, नयना को, अपने नैनों में भर, देखता रहा! कितना भोलापन है इसमें! वो कौन कायर था? काश, मैं होता उस समय, तो फाड़ ही देता उसे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उधर सरपंच, रोज ही मिट्टी फांक रहा था, क्या किया जाए? कैसे किया जाए? सामने जाने की हिम्मत थी नहीं, बात बने तो बने कैसे! कोई पल न जाए जब नयना का रूप उसे कांटे न चुभाये! काम-पीड़ा से ग्रसित था वो, हालांकि उसकी एक पत्नी थी, उस से दो संतान भी थीं, फिर भी, कहते हैं न, मति मार जाना, ऐसी ही मति मारी गयी थी उसकी!
सरपंच की एक रखैल थी, बदरो, उसकी बहुत चलती थी, चूंकि, सरपंच से सीधा संबंध था उसका, ये सभी को पता था! सरपंच ने बुलाया उसको, और उस से की बात, बताया अपना दुखड़ा! सरपंच हर हाल में, नयना का रसास्वादन करने को लालायित था! बदरो की जान पहचान में, एक कुंजनी थी, ये कुंजनी है, डायन कही जाती हैं! कुंजनी भले ही कुछ न कर पाये, लेकिन वो बता तो सकती ही थी! ये पता चल जाए, तो फिर क्या था!
तो हुई बात कुंजनी से, कुंजनी ने जब सुना कि सामने शतीला महासाधिका है, पाँव तले ज़मीन खिसक गयी! कुंजनी के देह के अनगिनत टुकड़े कर सकती थी नयना! हाँ, उसने इतना ज़रूर बताया कि ये काम, बाबा बनवाल कर सकता है! रकम ज़रूर खर्च होगी, लेकिन बनवाल ये काम कर सकता है, वो टक्कर का है इस शतीला के!
अब, चला सरपंच लेकर बदरो को, उस बाबा बनवाल से मिलने! सुबह चले थे, मध्यान्ह में पहुंचे! बाबा बनवाल के तो ठाठ ही निराले थे! बातें तो ऐसी करता जैसे इस पूरे संसार में बस, वो ही एक अकेला है! और जब सुना उसने, शतीला के बारे में, तो पड़ी शिकनें माथे पर! टक्कर तो होती ही, परिणाम क्या होता, ये किसी को नहीं पता!
कुछ सोच-विचार किया उसने, और न कर दिया! कि वो उस महासाधिका से नहीं टकराएगा! वो नहीं चाहता कि मात्र काम-भाव के लिए, उस से बैर मोल लिया जाए! सरपंच के होश उड़े! करे तो क्या करे अब? बदरो, बाबा बनवाल की शैय्या तक पहुंचे को तैयार! न माना बाबा बनवाल! हाँ, उसने एक पता ज़रूर बताया, कि एक नंग बाबा है, शम्भू!
........................................................
शम्भू! और ढेर सारी गालियां दीं उस समय नयना ने उसे! हाथों में, मिट्टी उठा उठा सामने फेंके! गुस्सा चढ़ गया! चलाने लगी! छटपटाने लगी! मरने मारने को तैयार!
"सुनो! सुनो नयना!" कहा मैंने,
"वो, हराम का जना, शम्भू! वो कुत्ता, वो कुत्ता शम्भू!" बोली वो,
मैंने उसके हाथ पकड़ लिए थे! वो बार बार मेरे से हाथ छुड़ा लेती थी!
"नयना! नयना!" बोला मैं,
"चुप? चुप कर तू? समझा?" बोली वो,
मैं हो गया चुप!
मौके की नज़ाक़त को भांपा!
"अरे! दम था तो सीधे आता? सीधे? कायर?" चिल्लाई वो!
मैं उसका वो दुःख भांप गया था,
वही दुःख, जो सीने में, भाला बन, धंसा हुआ था, ज़ख्म रिसता था उसका, सालता था बार बार उसे!
फिर हंसने लगी वो!
बेतरतीब!
मुझे देखा, मेरे सर पर चपत जड़ी एक!
और हँसे! और हँसे!
और फिर, एकदम से चुप!
"सुन?" बोली रुंधे हुए गले से,
मैंने देखा उसे, उसकी क्षण,
उन सुंदर आँखों में, उस दर्द का, पानी छलक आया था!
मेरे सीने में दर्द उठा! गला सूख गया मेरा!
"सुन?" बोली वो,
"बोलो नयना?" बोला मैं,
"मैं अकेली हूँ?" पूछा उसने,
"नहीं नयना!" कहा मैंने,
"तू मेरे संग है न?" पूछा उसने,
"हाँ नयना, संग हूँ!" कहा मैंने,
"मैं बहुत घूमी हूँ अकेली, ओ पागल? सुन रहा है?" बोली वो, तड़पते हुए!
"मेरी माँ, मेरी माँ को मार दिया!" बोली वो,
ओ मैं चौंका!
"मेरे भाइयों को मार दिया!" बोली वो, अब रो रो कर!
भाइयों को?
"मैं अकेली रह गयी! अकेली!" बोली वो,
बहुत दुःख हुआ मुझे!
"अब नहीं मैं अकेली!" बोली वो,
"हाँ, अब नहीं हो!" कहा मैंने,
"तू है न संग?" पूछा उसने,
"हाँ, हूँ संग!" बोला मैं,
"ऊपर देख? देख ऊपर?" बोली वो, मेरा चेहरा ऊपर करते हुए!
"सुन रहा है न?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मुझे पार लगाएगा न?" पूछा उसने,
ओह!
अब निकले मेरी आँखों से आंसू!
"ए? ए?" मारा एक चांटा!
"तू? तू क्यों रोता है?" पूछा उसने,
कुछ नहीं बोल सका मैं!
एक शब्द भी नहीं!
"नहीं! नहीं! तू मत रोना! समझा? बोल?" बोली वो,
मैंने हाँ में सर हिलाया अपना!
"अब जवाब दे?" बोली वो,
"हाँ, लगाउँगा पार!" कहा मैंने,
रो पड़ी वो!
मुझे लगा लिया गले!
फफक फफक के रोई वो!
"मैं बहुत तड़पी हूँ! इतने साल!" बोली वो,
"अब वो समय समाप्त!" कहा मैंने,
"सच्ची?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तू कहाँ था अब तक?" बोली वो,
मेरे बाल खींचते हुए!
"प्रतीक्षा में था!" बोला मैं,
"अच्छा!" बोली वो,
फिर संतुलित हो गयी वो!
पानी को देखती रही!
कभी सर उठाकर, कभी सर नवा कर!
"खड़ा हो?" बोली वो,
मैं हुआ खड़ा!
"आ!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
"आ जा!" बोली और नदी की तरफ चली!
नदी में झुक, अंजुल बना दोनों हाथों से, लिया पानी!
"आ, इसे पी!" बोली वो,
मैंने पिया, और जैसे ही स्वाद लिया, वो मीठा था! गुलाबजल जैसा!
"और पियेगा?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
उसने फिर से पानी लिया, और पिलाया मुझे!
मेरी तो जैसे सारी थकावट, हरारत सब छू-मन्तर हो गयी!
"रुक, मैं पानी पी लूँ!" बोली वो,
"पी लो!" कहा मैंने,
मैं उस, नयना को, अपने नैनों में भर, देखता रहा! कितना भोलापन है इसमें! वो कौन कायर था? काश, मैं होता उस समय, तो फाड़ ही देता उसे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"क्या हुआ था शतीला उसके बाद?" पूछा मैंने,
वो चौंक पड़ी!
"क्या बोला? क्या बोला तू?" बोली तुनक कर,
"शतीला!" कहा मैंने,
"नहीं! तू मत बोल!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"ना! तू बेटा है न मेरा?" बोली वो,
"हाँ, हाँ हूँ!" कहा मैंने,
"मैं माँ हूँ न तेरी?" बोली वो,
"हाँ! माँ हो!" बोला मैं,
लगाया सीने से मुझे! चूमा माथे पर!
"तो तू न बोल ऐसा!" बोली वो,
"ठीक है, नहीं बोलूंगा!" कहा मैंने,
"इधर देख!" बोली वो,
पानी था वो! नदी का बहता पानी!
"देख, ये जल देख, अनवरत बहता है न?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"कहीं नहीं रुकता न?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"बस! मैं रुकना चाहती हूँ अब!" बोली वो,
मैं चुप हो गया.............गहरा मतलब था उसका.......
"तू रोकेगा न?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"आज उदय-बेला से पहले?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तू भला है! बहुत भला! और सुन, भला ही रहना!" बोली वो,
"हाँ, भला ही रहूंगा!" कहा मैंने,
"अपना कुछ जाए, और किसी में जान पड़े, तो क्या जाता है?" बोली वो,
"हाँ! कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"तो, भला करना!" बोली वो,
"हाँ, भला ही करूँगा!" कहा मैंने,
फिर थोड़ी देर की चुप्पी!
न वो कुछ बोले, न मैं!
"पूछा नहीं तूने?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"फिर क्या हुआ?" बोली वो,
"हाँ, क्या हुआ फिर?" पूछा मैंने,
"सुन, बताती हूँ!" बोली वो, और एक टांग मोड़, उस पर अपना सर रख लिय, घुटने पर! और फिर से सुनाना शुरू किया उसने, जो अब मैं लिख रहा हूँ!
-----------------------------------------------
दृश्य सरपंच और बाबा शम्भू के बीच का है-
"क्या? क्या नाम बताया?" बोला बाबा,
"नयना, शतीला!" बोला सरताज,
"वो बड़भूम वाले अरुणवेश वाली?" पूछा उसने,
"हाँ! हाँ!" बोला वो,
"हम्म्म! समझ गया!" बोला वो,
"अब कैसे होगी?" पूछा सरपंच ने,
"होगी! होगी! मेरा भी बैर है उस बड़भूम वाले से! मर गया, कोई बात नहीं, उसकी बेटी सही!" बोला वो,
सरपंच के जोड़ कसे!
मुंहमांगी मुराद मिली!
"एक बात बता?" बोला बाबा,
"जी?" बोला वो,
"क्या देगा बदल में?" पूछा बाबा ने,
"जो मांगो!" बोला वो,
"दे पायेगा?" पूछा बाबा ने, दाढ़ी सहलाते हुए!
"कहिये तो सही?" बोला सरपंच,
"देख, उसे उठा लाना, तू ठंडा हो जा, बाकी मेरी वो!" बोला बाबा,
"मंजूर!" बोला सरपंच!
हँसे पड़े दोनों ही!
कुटिल से कुटिल जो मिला था!
"और, इतना दाम!" बोला बाबा,
इशारा कर हाथ से!
"मंजूर!" बोला सरपंच,
"अब सुन, तैयार हो जा अब!" बोला बाबा,
"मैं तो कब से तैयार हूँ!" बोला अपना साफ़ा ठीक करते हुए!
"तो बस आया बकत!" बोला वो,
सरपंच खुश!
बाबा खुश!
रच गयी साजिश!
और कुछ बातें समझाईं सरपंच को! और ऐंठ ली कुछ रकम! और दिन हो गया तय!
"वैसे एक बात पूछूँ?" बोला सरपंच,
"हाँ, पूछ!" बोला बाबा,
"होगा कैसे?" पूछा सरपंच ने,
"वो मैंने जानी!" बोला वो,
सरपंच के दांत फ़टे!
तो सरपंच, चला आया वापिस!
और बाबा!
"श्योराज को भेजो!" बोला बाबा, अपने एक सहायक से,
कुछ ही देर में, आया श्योराज!
"सुन?" बोला बाबा,
"हाँ जी?" बोला वो,
"आदमी तैयार राख!" कहा बाबा ने,
"कब?" पूछा उसने,
"दो-एक रोज में ही!" बोला बाबा,
"ठीक!" बोला वो,
उठा और जैसे ही चला, रोक लिए बाबा ने!
"सुन जा?" बोला बाबा,
"हाँ?" कहा उसने,
"किसी को खबर न पड़े!" बोला बाबा,
"अजी नाह!" बोला वो,
और दौड़ पड़ा! साजिश को अंजाम दे दिया गया था! अब बस, उसका अंजाम क्या निकले, ये देखना था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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शम्भू जानता था! जानता था कि आमने-सामने पार नहीं पड़नी! वो शक्ति-साधिका थी! आमने-सामने में तो जहाँ छक्के छूटते वहीँ जान के लाले पड़ जाते! और अरुणवेश की ख्याति कुछ ऐसी थी, कि लोग और धनाढ्य लोग विशेषकर, उनके पास ही जाते थे! शम्भू के मन में, एक शत्रुता थी उनके लिए! अब अरुणवेश तो नहीं थे जीवित, परन्तु अपना सर्वस्व सौंप गए थे वो नयना को! नयना के पास, ऐसे लोगों का तांता लगा रहता था! मदद करते थे उसके भाई! शम्भू के पास बस एक ही रास्ता था! कि कायरता से अंदर घुसा जाए! और कर दिया जाए क़त्ल सभी का! और यही उसने अपनाया भी!
श्योराज ने, अपने आदमी मुस्तैद कर ही लिए थे, कुल मिलाकर, बीस आदमी, सभी कुशल हथियारबाज! पेशेवर थे, तो उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि कौन है सामने! जो मिला, बस काट दिया!
उधर, सरपंच ने भी आदमी अपने तैयार कर लिए थे! जोगराज अगुवानी कर रहा था उनकी! वो भी पेशेवर थे! कुल बीस थे वो भी!
और इस तरह, शम्भू ने एक दिन कर दिया मुक़र्रर! दिन था, जिस रात कोई क्रिया नहीं होती! उस समय, कोई नहीं करता क्रिया-विधान! ये रात थी, दूज की रात! जेठ माह की, सदी दूज!
वो रात का वक़्त था, सरपंच, अपने आदमियों के साथ मिला बाबा शम्भू को साथ ले, शम्भू की आवश्यकता इसलिए थी कि वो टकरा सकता था उस नयना से! नहीं तो किसी में साहस न था! रात ठीक ग्यारह बजे, काल के वो परकाले, बढ़ चले! पहुंचे वहाँ, घेर लिया वो स्थान, अब रात में कोई जागा था, तो बस इक्का-दुक्का औरतें! फाटक, उखाड़ दिया गया! और अब जो मिला सामने, उसका अंत होता गया! हो-हुल्ला हुआ, चीख-पुकार मची, सभी भागे! मंदिर के रखवाले, ले आये अपने अपने हथियार! और होने लगा वहाँ नर-संहार! खड्ग से खड्ग भिड़ा! तलवार से तलवार! कटार से कटार! कट कट गिरने लगे वो लोग! जोगराज और सरपंच, दौड़े ढूंढने उस नयना को! एक औरत से पूछा, उसने बताया और उसे भी काट डाला गया! क्या बालक, क्या बालिका, क्या बूढ़ा और क्या किशोर! दस-पंद्रह मिनट में ही, दोनों भाइयों को भी ले आया गया, और बींध दिए गए उनके शरीर भालों से! बेचारे! कुछ न हो सका!
उस सिंहनी को काबू न कर सके वे दोनों! खूब छकाया उसने उन्हें! उसकी खड्ग के आगे कोई न पड़े! तब, बाबा शम्भू ने, फन्दा डलवाया उस पर! और इस तरह, वो सिंहनी, निःशस्त्र हो गयी! उसको खींचा गया, पीटा गया, मारा गया, नीचे फेंका! सरपंच, आगे बढ़ा! जा कूदा उस पर! लेकिन वो सिंहनी कहाँ आने वाले थी काबू! वो उठी, दौड़ी, और निकाल ली एक मशाल! मशाल से लड़ने लगी, किसी का सर जला, किसी का मुंह और कोई झुलसता हुआ, चीख-पुकार मचाता हुआ दौड़ पड़ा! नयना की बूढी माँ, जो रतौंधी की शिकार थीं, आयीं चिल्लाते हुए, कोहराम मचा था वहां! बाबा शम्भू ने, एक ही वार में, सर के दो टुकड़े कर दिए उस वृद्धा के! शोकत्रस्त नयना भागी माँ की तरफ! तो सरपंच ने पकड़ा! गिरा दिया उसे! नीच हरकत करने को आमादा था वो!
मित्रगण!
न चली उसकी एक!
एक भी न चली!
चेहरा छील दिया उसका! तब, तलवार ले, वार किया उसकी जांघ पर, लड़खड़ाते हुए गिरी वो! फिर से कूदा उसके ऊपर! फिर भी एक न चली!
"पकड़ो इसे?" चिल्लाया सरपंच!
आदमी दौड़े! पकड़ा लिया उसे, वो नीचे तो गिरी ही हुई थी! नोंच डाले वस्त्र उसके!
"वैसे नहीं, वो ऐसे सही!" बोला सरपंच!
और लाया दौड़कर मशाल!
"तुझे किसी लायक नहीं छोड़ूंगा! मेरी नहीं तो किसी की नहीं, हरामज़ादी! कुलटा!!" चीखा वो, और उसके पेट में लातें बजा दीं!
"टांगें खोलो इस हरामज़ादी की!" चीखा शम्भू!
चौड़ा दी गयीं टांगें उसकी!
"जला दो साली की ** को!" चीखा शम्भू!
और फिर...................
दर्द से छटपटा पड़ी वो!
"दाग दो कुलटा को, जला दो इसके स्तन!" चीखा सरपंच!
अमानवीय कृत्य!
खुल कर हुआ उस रात!
उन कायरों का कार्य पूर्ण हो गया था! लूट-पाट की गयी, और फिर चले वो वापिस., जाने से पहले, जोगराज ने, सर पर वार किया भाले का उस नयना पर, भाला अंदर तक घुस गया, एक आखिरी चीख  उठी, और सब खत्म!
-------------------------------------
"कुत्ते! कुत्ते! कायर! सामने से आता! सामने से! तेरी माँ ने दूध पिलाया था अपना तो आता सामने से, असल बाप से था, तो आता सामने से? कायर?" चिल्ला पड़ी वो!
गुस्से में, इधर उधर भागे!
"नयना?" बोला मैं,
"चुप??" गुस्से से बोली वो,
मैं चुप हो गया!
"अरे! अरे मेरी बूढ़ी माँ को मारा! बच्चों को मारा! कुत्तो! तुम्हारे लिए ये भोगणा, अकेली ही काफी थी! अकेली!" चीख के बोली वो!
और फिर..............
रो पड़ी!
बैठ गयी नीचे!
रो पड़ी वो!
बहुत तेज! बहुत तेज!
"नयना?" बोला मैं,
और चला उसके पास!
"नयना?" बोला मैं,
वो तेज तेज रो रही थी, तेज!
मैं बैठा नीचे, उसके पास ही!
"सुना? सुना तूने?" बोली वो,
"हाँ, सबकुछ!" कहा मैंने,
"मैं क्या करूँ?" बोली वो, मेरे कंधे पर सर रखते हुए!
"कुछ नहीं!" बोला मैं,
वो हटी, मुझे देखा!
"हाँ, कुछ नहीं!" बोला मैं,
आँखों में सवाल!
"अब मैं करूंगा नयना!" बोला मैं,
"मेरा बेटा!" बोली वो,
लगा लिया सीने से!
"मेरा बेटा!" बोली वो, फिर से,
"हाँ! अब मैं करूंगा!" बोला मैं,
"मैंने तेरा इंतज़ार किया न?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तू आया न?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मैंने, बुला लिया न?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"लगा दे पार! बेटा! बेटा! लगा दे पार!" बोली वो, एक गुहार सी थी!
"नयना! गुहार न लगाओ! आज्ञा दो, हुक्म दो! भले ही इस पागल को पीट लो! चांटे मार लो! लेकिन गुहार न लगाओ! नहीं! मेरा जी फटता है!" बोला मैं,
झट से, मुझे भींच लिया! रख लिया सर मेरा, अपनी ठुड्डी के नीचे!


   
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