तपता रेगिस्तान! भूड़ जैसा वो स्थान! दूर दूर तक कोई नहीं! बस कुछ कीकर के पेड़ और, अपने घमंड में फूली हुईं वो नागफ़नियाँ! दो तरह की थीं वो, एक, चौड़े फाल वाली और एक, डंडे जैसी! कहीं कहीं तो इतनी बड़ी थीं, कि चार आदमी छिप जाओ उनके पीछे! कोई कीड़ा नहीं और कोई काँटा नहीं! सब, उस दोपहरी में, अपने अपने बसेरे में आराम कर रहे थे! जब रात होती है, तो ये जीव बाहर निकला करते हैं बाहर, तब रेत ठंडी हो जाती है, और तब शिकार करने का और शिकार बनने का समय होता है! ऐसे ही एक मिट्टी के टीले के करीब ही, और उसकी आड़ लिए, हम खड़े थे, सामने एक जगह, नज़रें गड़ाए! धूप और उसकी तपन, सरों पर नाच रही थी हमारे! हम सभी ने, अपने अपने तौलिये डाल रखे थे सर पर! हम तीन थे, मैं, शर्मा जी और वो भूपेश जी! लू चल रही थीं! वो भयानक लू, हमारे शरीर की नमी खाने को आतुर थी, इसीलिए, हम साथ लाये पानी को, बार बार गले में उतारते जा रहे थे!
"दो बज गए हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, बस कुछ देर और!" बोले भूपेश!
"कितनी देर?" पूछा मैंने,
"पांच-दस मिनट बस!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
पसीना सर से छलक कर, माथे पर और माथे से नीचे को ढुलक रहा था! मैं उसी तौलिये से, उसको बार बार पोंछ लेता था!
"आज का तापमान कुछ ज़्यादा ही है!" कहा मैंने,
"हाँ, बयालीस या चवालीस तो होगा!" बोले शर्मा जी,
"फुरफुरी दौड़ रही है बदन में!" कहा मैंने,
"ये लू हैं, इस से ही होता है ऐसा!" कहा भूपेश जी ने,
मैंने ऊपर देखा, तपते हुए सूरज को, उन्होंने जैसे मुझे चिढ़ाया हो, ऐसा लगा! सर्वत्र उनका ही राज था आज तो! ऐसा ताप, ऐसा ताप उनका, कि पूरा मंजर तबाहकुन कर रखा था उन्होंने! रेत पर, दूर दूर, हर जगह, मरीचिका बन रही थीं! ऐसे ताप उठता था कि जैसे, पिघला हुआ कांच, ऊपर से नीचे गिर रहा हो!
"दो बीस हो गए हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, और देख लो थोड़ा!" बोले वो,
थोड़ा देखते देखते, बज गए तीन!
"कुछ नहीं है!" कहा मैंने, और हट गया उस आड़ से! शर्मा जी भी हट गए, और फिर भूपेश जी भी! तौलिया खोला सर से, और पोंछें मुंह! चेहरे लाल हो उठे थे उस तपन से! पानी मारा चेहरे पर, वो भी गरम हो चला था!
''आओ, चलें!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले शर्मा जी,
"आज नहीं आई वो!" बोले भूपेश!
"कोई बात नहीं, कल देख लेंगे!" कहा मैंने,
अब कीकर के पेड़ के नीचे रखीं, दो मोटरसाइकिल उठायीं, सीट ऐसी गर्म उनकी, कि बैठते ही, जान निकल जाए! गीले तौलिये से, उनको थोड़ा ठंडा किया, और फिर, उनको स्टार्ट कर, चल पड़े भूपेश जी के गाँव वापिस!
भूपेश जी, भूपेश जी, वन्य-विभाग में सरकारी कर्मचारी हैं, अक्सर जंगलों में और ऐसे बीहड़ों में ही घूमने का काम है उनका, उनके सामने, आज से दो माह पहले एक वाक़या पेश आया था! बताता हूँ कि क्या!
वो शाम का वक़्त था, गर्मी ने जैसे तबाही मचाने की सोच रखी थी, वो अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो, अपनी ससुराल जा रहे थे, अकेले ही थे कुछ काम था, इसीलिए साँझ का समय चुना था, उस दिन इतवार भी था, छुट्टी का दिन भी था! वो उसी रास्ते से हो कर गुजर रहे थे, जहां हम आज दोपहर में, उस नागफनी के पीछे छिपे थे! वो जब वहाँ से गुजरे, तो रास्ते में उन्हें एक लड़की दिखाई पड़ी! उस बीहड़ में लड़की? वो भी अकेली? उस लड़की ने, सर पर एक पोटली रखी हुई थी और बगल में, एक छोटी सी संदूकची सी थी! उनकी मोटरसाइकिल की आवाज़ हुई, तो उस लड़की ने, उनको, पीछे पलट कर देखा, वो धीरे हुए, और उस लड़की को देखा, रोकी मोटरसाइकिल, वो लड़की, आई उनके पास!
"धरणा का कौन सा रास्ता है?" पूछा लड़की ने,
धरणा? ये नाम तो कभी नहीं सुना उन्होंने!
डाला दिमाग पर ज़ोर! लेकिन बात नहीं बनी! सुना ही नहीं था!
"ऐसा तो कोई गाँव नहीं?" बोले भूपेश जी,
"है तो सही?" बोली वो लड़की,
"न, कोई गाँव नहीं ऐसा!" बोले वो,
"कोई और रास्ता?" पूछा उस लड़की ने,
"एक ये है, यहां से, दो किलोमीटर बाद, एक पक्का रास्ता पड़ेगा, वहाँ से दो रास्ते हो जाते हैं, लेकिन वो भी धरणा नहीं जाते!" बोले भूपेश जी!
लड़की पशोपेश में पड़ी!
चेहरे के भाव बदल गए!
परेशान है, साफ़ दीखता था!
"खाम मूढ़न को जानते हो?" पूछा लड़की ने,
खाम मूढ़न? ये क्या है? कोई नाम या जगह?
"कौन है ये?" पूछा भूपेश जी ने,
अब लड़की चुप! बेचारी से, थूक ही न निगला जाए, वो प्यासी है, यही सोचा उन्होंने, और अपनी बोतल निकाल ली पानी की,
"पानी पियो पहले" बोले वो,
लड़की शायद पानी ही पीना चाहती थी, ओख बना ली उसने, थोड़ा झूली, और पीने लगी पानी, आधी बोतल पानी पी गयी वो, बहुत प्यासी थी वो लड़की!
"तुम कौन से गाँव की हो?" पूछा भूपेश जी ने,
"मुलतरा की" बोली वो,
मुलतरा? अब ये कौन सा गाँव है? क्या कह रही है ये लड़की? कहीं दिमाग तो नहीं चल गया? देखने में तो किसी अच्छे परिवार से लगती है! फिर, ये कौन सा गाँव आ गया अब? कहीं किसी परदेस से तो नहीं आई बेचारी?
"पिछली बार, यहीं से गयी थी मैं" बोली वो, सामने, एक बंजर जगह की तरफ इशारा करते हुए,
भूपेश जी ने देखा उधर!
बियाबान! उजाड़! भूड़! बीहड़!
"कब आई थी?" पूछा भूपेश जी ने,
"बसौटा पर" बोली वो,
अच्छा! किसी मेले में! शायद, ऊंटगाड़ी पर आई हो, अब रास्ता भूल गयी है!
"कोई साथ नहीं है तुम्हारे?" पूछा भूपेश जी ने,
"न" बोली वो, आँखें नीचे किये हुए,
"एक काम करो, वापिस लौट जाओ, वहाँ तो दूर दूर तक कोई गाँव नहीं है!" बोले वो,
बेचारी ने सामने देखा, वहीँ नज़रें गड़ा, देखती रही!
"सुन रही हो? चलो, सवारी तक छोड़ दूंगा, अकेले ऐसे घूमना ठीक नहीं है!" बोले वो,
अब शरीफ आदमी थे, उनको तो, वो अपनी छोटी बहन तरियां ही लगी! इसीलिए कह बैठे थे!
"मुझे धरणा का पता बता दो?" बोली वो,
"यहां कोई धरणा नहीं है बहन!" बोले वो,
"है, यही रास्ता है!" बोली वो,
"देख बहन, साँझ ढलने को है, थोड़ी देर में, रात घिर आएगी, चल, तुझे सवारी तक छोड़ देता हूँ, वापिस चली जा अपने घर!" बोले भूपेश जी,
लड़की ने, भूपेश जी को देखा, थूक गटका, थोड़ी परेशानी सी हुई उसे,
"ले, पानी पी ले!" बोले वो, हाथ में पकड़ी बोतल देते हुए,
उसने बोतल न ली, ओख बना ली हाथ की! अब बोतल खोली भूपेश जी ने, और पिला दिया पानी उसे! इस बार फिर से काफी पानी पिया उसने!
'चल बैठ जा! छोड़ दूँ तुझे!" बोले वो,
"मैं धरणा जाउंगी" बोली वो,
"धरणा ना है यहां बावली!" बोले वो,
"यहीं है!" बोली वो,
और चल पड़ी उसी रास्ते पर!
भूपेश जी, उसको जाते देखते रहे! क्या करते! लड़की ने ज़िद पकड़ी थी! उसको धरणा ही जाना था! अब पता नहीं कौन सा गाँव था ये धरणा! गाँव था या कोई क़स्बा! कहीं बोल में कोई फ़र्क़ न हो उस लड़की के! रखी बोतल उन्होंने, स्टार्ट की मोटरसाइकिल, और बढ़ चले, अपनी ससुराल की तरफ!
वो चलते चले गए, लेकिन उनके कानों में अभी तक वो शब्द, वो जगहों के नाम गूंजते रहे! धरणा, खाम मूढ़न आदि, ये नाम तो उन्होंने अपने बाप दादाओं के मुंह से भी न सुने थे! अब पता नहीं कहाँ की थी वो लड़की, कद-काठी से तो बहुत बढ़िया था, रंग-रूप और नैन-नक्श भी अच्छे थे! पता नहीं, कौन से प्रदेश से आई थी और न जाने, कहाँ को जा रही थी! चलो छोडो! कोई परदेसन होगी, लेकिन अकेली? इस बियाबान में? बड़ी हिम्मतवाली लड़की है, उम्र भी कोई अठारह या उन्नीस ही रही होगी उसकी! जेवर भी पहन रखे थे और जेवर थे भी भारी भारी! चलो जाने दो, हो सकता है, कोई गाँव ही हो आसपास, नाम में फेर हो! हो सकता है! ऐसी ही ख़याल मन में लिए, उनकी मोटरसाइकिल, दौड़ती चली गयी! साँझ के बाद, रात से पहले, वो अपनी सुराल जा पहुंचे, स्वागत हुआ उनका, खबर तो पहले से ही दे दी गयी थी उन्हें! जो बात करनी थी, वो बात की उन्होंने, खाना-पीना हुआ, और फिर लम्बी तान!
सुबह, वहीँ से ही, खाना-पीना खा, अपने कार्यालय चले गए वो, सारा दिन वहीँ रहे, आज बड़े साहब के साथ, लूनी नदी का मुआयना किया था, तो वापिस आते आते, शाम ढल गयी थी उन्हें, करीब छह साढ़े छह बजे, वो घर के लिए वापिस हुए! वो उसी रास्ते से वापिस आ रहे थे, गुनगुनाते हुए कुछ, आज सारा दिन साहब की गाड़ी में एक ही गाना बजता रहा था, गोगा पीर का एक गण, वही गुनगुनाते आ रहे थे! तभी अचानक से उन्होंने ब्रेक लगाए! रुक गए वो, सामने देखा! वही लड़की! वैसी ही पोटली उठाये और वही एक, छोटी सी संदूकची बगल में दबाये! वो लड़की धीमी चाल से, चले जा रही थी! उन्होंने मोटरसाइकिल स्टार्ट की, और चले ज़रा उसके करीब! अब मोटरसाइकिल की आवाज़ आई, तो लड़की ने पीछे मुड़कर देखा, एक नज़र और फिर से आगे कर लिया मुंह! अब वे करीब आये उसके!
"रुको?" बोले वो,
वो लड़की रुक गयी!
ऊपर से नीचे तक देखा उन्होंने उसे! क्या रात भर, ये यहीं भटकती रही? ऐसा कैसे सम्भव है? भूखी-प्यासी? ऐसी गर्मी में? कैसे सम्भव है ये?
"तू वही है न?" पूछा उन्होंने,
"कौन?" पूछा लड़की ने,
"कल वाली?" बोले वो,
"हाँ" बोली वो,
"तू धरणा ना गयी?" पूछा उन्होंने,
"मिल ही नहीं रहा रास्ता" बोली बेचारी, मायूस सी हो कर,
"तो रात भर कहाँ रही?" पूछा उन्होंने,
"रात?..........." कुछ सोचने लगी वो इतना कह कर,
"भूखी-प्यासी, कहाँ रही तू?" पूछा उन्होंने,
अब लड़की से जवाब न बन पड़ा कोई!
"ले, पानी पी पहले!" बोले वो, बोतल निकाल कर,
लड़की ने ओख बना ली, और भूपेश जी ने, पानी पिलाया उसे फिर, इस बार, आधी बोतल से ज़्यादा पानी पी गयी वो!
पोंछा मुंह उसने, संभाला अपना सामान!
"सच सच बता, तेरा गाँव कौन सा है?" पूछा भूपेश जी ने,
"मुलतरा" बोली वो,
"कहाँ पड़ता है?" पूछा उन्होंने,
इशारा किया उसने हाथ से, दक्षिण दिशा में!
"जिला?" पूछा उन्होंने,
न बता पायी वो!
"तहसील?" पूछा उन्होंने,
न समझ पायी, तो बोल न सकी!
भूपेश जी भी हैरान हो गए! अब वो क्या करें, इस सोच में डूबे!
"अच्छा, किस काम से जा रही है?" पूछा उन्होंने,
"मिलने" बोली वो,
"किस से?" पूछा उन्होंने,
"चंदन से" बोली, इस बार ज़रा, धीरे से बोलते हुए!
"कौन है ये चंदन?" पूछा उन्होंने,
अब न बोली वो! कुछ न बोली, नज़रें, नीचे कर लीं अपनी!
"अच्छा, एक बात बता, मैं क्या कर सकता हूँ, तुझ जैसी लड़की, ऐसे बियाबान में भटके, वो भी जेवर पहने, ये अच्छा नहीं तेरे लिए, बता, मैं क्या करूँ? तुझे घर छोड़ना हो, तो घर छोड़ दूँ, तुझे कहीं रिश्तेदारी में जाना हो, तो वहां छोड़ दूँ, बता बहन?" बोले वो,
कुछ देर, चुप रही वो, उसी रास्ते को देखा, उचक कर, पोटली ठीक की, संदूकची को, गिरफ्त में जकड़ा उसने!
"बता, बता?" पूछा उन्होंने,
अब देखा भूपेश को उसने,
कुछ देर, अपलक, एकटक!
"ये" बोली वो,
वो बोतल! पानी चाहिए थे उसे!
"ले, पानी तो पी ले तू जितना मर्ज़ी, और भी है!" बोले वो, खोलते हुए, पानी की बोतल!
लड़की ने बनायी हाथ से ओख, और डाला पानी भूपेश जी ने! उस लड़की पर, बहुत दया आ रही थी उन्हें! कौन है, कहाँ से आ रही है, क्या वजह है, कहाँ जायेगी, कुछ न बता रही थी, और जो बता रही थी, उन जगहों का नाम भी न सुना था उन्होंने!
पी लिया पानी उसने! पोंछ लिया मुंह!
बोतल रख ली उन्होंने, ढक्क्न लगा कर!
"हाँ, अब बता, कहाँ जायेगी?" पूछा उन्होंने,
"धरणा!" बोली वो,
फिर से धरणा?
कच की आवाज़ निकाली उन्होंने मुंह से, और चेहरे पर, मुस्कुराहट आ गयी उनके!
''अरे बच्चे! मेरी बहना! यहां कोई जगह नहीं धरणा नाम की! यहां तो क्या, आसपास भी नहीं है!" बोले वो,
"है, मैं आई थी बसौटा पर!" बोली वो,
"कब आई थी?" पूछा उन्होंने,
अब ये न बता पायी वो!
"तू बताती भी तो आधा है?" बोले माथे पर हाथ मारते हुए वो!
कुछ सोचा उन्होंने! कुछ देर!
"अच्छा, किसके संग?" पूछा उन्होंने,
"चंदन के!" अब ज़रा शरमा के बोली वो,
"कैसे?" पूछा उन्होंने,
नहीं समझ पायी वो!
"मेरा मतलब, ऊंटगाड़ी पर?" पूछा उन्होंने,
"घोड़े पर!" बोली वो,
घोड़े पर? अब कौन दौड़ाता है यहां घोड़ा? अब तो, ऊँट ही ऊँट हैं!
"तूने तो मेरा दिमाग चला दिया!" बोले वो,
इतने में ही, वो लड़की, उन्हें छोड़, चल पड़ी उसी रास्ते पर!
"अरे सुन? सुन तो सही?" बोले वो,
वो न सुने! चलती जाए!
"सुन? रुक जा?" बोले वो,
न रुकी, चलती रही सीधा!
अब की मोटरसाइकिल स्टार्ट उन्होंने, और ले चले उसकी तरफ!
"सुन जा? अरे? रुक तो सही?" बोले वो,
न रुकी! चलती ही जाए!
अब उन्हें ही रुकना पड़ा!
देखते रहे सामने! उसको जाते हुए!
और अचानक ही, वो आँखों से ओझल हो गयी! आसपास देखा उसे, ढूँढा बहुत! और मोटरसाइकिल ले, चल पड़े आगे उसको ढूंढने! कहीं किसी टीले या नागफनी की ओट में न हो वो!
उस रेत में, मोटरसाइकिल के टायर जवाब देने लगे थे, तो वहीँ खड़ी कर दी उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल, और पैदल ही चल पड़े ढूंढने उसे! पैदल तो, चला ही न जा रहा था उनसे! पाँव ही न उठ रहे थे! वे रुक गए, आसपास देखा, कोई भी न था! बियाबान! उजाड़ जगह थी वो! वो लड़की, उतना सारा सामान उठाये, जा कैसे सकती थी इतनी जल्दी? अब तो कोई नागफनी भी इतनी बड़ी नहीं यहां, तो छिपा ले उसे? कहाँ गयी वो? ऐसे कैसे जा सकती है वो?
कहीं कोई हवा-हुवा का चक्कर तो नहीं? अगर हवा ही होती, तो उसके पाँव तो सीधे ही थे? साफ़ देखा था उसके पांवों को उन्होंने तो? जूतियां पहने हुई थी वो लड़की! और फिर पानी भी तो पिया था उसने? कोई हवा पानी थोड़े ही पियेगी? कहाँ गयी वो?
सोच में डूबे, सवालों में उक्झे, हुए वापिस वो! स्टार्ट की मोटरसाइकिल उन्होंने, और चले अपने गाँव की तरफ! आज तो कमाल ही हो गया था! वो लड़की, आँखों के सामने ही ओझल हो गयी! बड़ी हैरत की बात है! वो यही सोचते रहे रात भर!
अगले दिन, ठीक उसी समय पर, वो दुबारा पहुंचे, उस दिन, न मिली वो! वो लौट पड़े, और इस तरह दस-बारह दिन गुजर गए, वो लड़की, अब न मिली उन्हें! शायद अपने घर चली गयी होगी या भी, क्या नाम था वो? हाँ! धरणा, वहाँ पहुँच गयी होगी! चलो, बेचारी पहुंची तो सही! आजकल का माहौल वैसे भी अब ठीक कहाँ है? एक तो जवान लड़की, जेवर पहने, चलो, कोई अनहोनी न हुई हो उसके साथ!
और इस तरह, एक महीना और बीत गया,
एक शाम, भूपेश जी, आ रहे थे वापिस, गुनगुनाते हुए, जब उसी जगह आये, तो दूर, सामने, वही लड़की दिखी उन्हें, पोटली सर पर रखे, हाथ में संदूकची लिए! अब ये उन्हें पक्का यक़ीन हो गया, कि वो सच में एक हवा ही यही, जो इस रेगिस्तान में, भटक रही है! उस से बात करें वो, हिम्मत जवाब दे गयी! मोटरसाइकिल बंद कर दी, और एक नागफनी के पीछे जा छिपे वो!
और लग दीं अपनी नज़रें, उस लड़की पर, वो लड़की, उस रास्ते तक जाती, आसपास देखती, रुक जाती, कभी सन्दूकश्चि नीचे रख उस पर बैठ जाती, हाथों के आड़ ले, उस रास्ते को देखती! कभी उस पोटली को देखती, ऐसा डेढ़ घंटे चला, उसके बाद, वो लड़की उठी और उसी रास्ते चली गयी! अब निकले बाहर वो, उस रास्ते को देखा, स्टार्ट की मोटरसाइकिल अपनी, चले उस तरफ, रेत पर, उसके पांवों के निशान अभी तक नुमाया थे!
"बेचारी........" निकल उनके मुंह से,
और चल पड़े, थोड़े से परेशान से हो कर!
चार-पांच दिन, वो उसी असमंजस में पड़े रहे, और तब उन्होंने भरतपुर में रहने वाले अपने एक संबंधी से बात की, वो शर्मा जी के परिचित थे, बात हम तक आई, जो मैंने सुना, तो सच में अजीब था, कोई लड़की, भटक रही थी उस रेगिस्तान में! इसमें कोई शक़-ओ-शुबह बाकी न था, भूपेश जी, एक ज़िम्मेवार इंसान हैं, सरकारी मुलाज़िम हैं, उन्होंने कही-सुनी बातों पर यक़ीन नहीं किया था, बल्कि उन्होंने दो बार उस लड़की से मुलाक़ात की थी, अब किसी भी शक़ की, कोई गुंजाइश न थी!
हमने कार्यक्रम बनाया, और ठीक पांचवें दिन, जा पहुंचे हम वहां! भूपेश जी हमें स्वयं लेने आये थे, वहां से, फिर सवारी में सवार हो, उनके गाँव पहुंचे! गाँव पहुँच कर, रात को उनसे तफ़्सील से बातें हुईं!
"उसकी उम्र क्या होगी?" पूछा मैंने,
"यही कोई, अठारह या उन्नीस!" बोले वो,
"कैसे घराने की लगती है?" पूछा मैंने,
"अच्छा घराना लगता है उसका!" बोले वो,
"क्या परिवेश है?" पूछा मैंने,
"संतरी रंग का घाघरा पहनती है, पांवों में लाल जूतियां हैं!" बोले वो,
"और ऊपर?" पूछा मैंने,
"संतरी रंग की ही, पूरी बाजू की कमीज़ सी है वो!" बोले वो,
"रंग-रूप?" पूछा मैंने,
"उजला, और सुंदर बहुत है!" बोले वो,
"कद-काठी?" पूछा मैंने,
"मेरे बराबर है, मजबूत जिस्म है उसका, मेरी कलाई से चौड़ी है उसकी कलाई!" बोले वो,
इसका अर्थ था, कि वो पांच फ़ीट और दस इंच या छह फ़ीट की रही होगी! और इसका साफ़ साफ़ मतलब ये था कि वो किसी पुराने वक़्त में ज़िंदा रही होगी, शायद, दो साल या अधिक पहले उस से! तब के इंसानों की देह और कद-काठी, ठीक ऐसी ही रहती थी! सामान्य भी!
कमाल की बात थी!
वो अब जागी थी! अब तक कहाँ थी?
या अब तक भी वही थी और भूपेश जी पहले इंसान थे जो उस से मिले थे! अब इन सवालात का जवाब, उस लड़की से मिल कर ही पता चल सकता था! सबसे पहले तो, उसको देखना ज़रूरी था! तो हमने इसकी तैयारी कर ली, हमने दो दिन, दोपहर में, सन्नाटे भरे उस बीहड़ में, नज़रें गड़ा दी थीं! लेकिन वो नज़र नहीं आई थी! इसी तरह, चार बार शाम को, वहां गए थे, वहां भी कुछ नहीं दिखा था!
वो कहाँ चली जाती थी?
वापिस? अँधेरे में?
और फिर लौट आती थी! उधर, उस बीहड़ में!
उस शाम, हम कुछ पहले ही चले गए, करीब पांच बजे, एक जगह हमने चुन ली थी, ये छायादार भी थी, और छिपने की जगह भी अच्छी थी! उस शाम, हमने नज़रें गड़ा दी थीं!
करीब आधा घंटा बीता!
और शर्मा जी का हाथ उठा, किया इशारा एक तरफ! वहाँ देखा हमने! कोई आ रहा था! साफ़ दीख रहा था, वो एक महिला है! सर पर एक पोटली रखे, और बाजू में कुछ दबाये हुए थे!
"वही है!" बोले भूपेश जी!
लड़की तो काफी लम्बी-ठाड़ी थी वो!
"श्ह्ह्ह्ह्ह!" बोला मैं,
वो आती जा रही थी, और आते हुए एक जगह रुकी! संदूकची रखी नीचे, और बैठ गयी उस पर!
"बोतल दो ज़रा!" कहा मैंने,
शर्मा जी ने, पानी से भरी बोतल दे दी मुझे!
"यहीं रहना!" कहा मैंने,
"ठीक" बोले दोनों.
और मैं, चल पड़ा बोतल लेकर!
मुझसे कोई डेढ़ सौ फ़ीट दूर थी वो!
दूर देखे जा रही थी, उसकी पीठ मेरी तरफ थी! मैंने पहुंचा वहां, तेज क़दमों से! आवाज़ हुई, तो उसने देखा मुझे, सर का कपड़ा ठीक किया उसने, खड़ी हो गयी, और चलने लगी एक तरफ!
"रुको!" कहा मैंने,
रुक गयी वो! देखा मुझे, दांतों में, चुनरी दबाये हुए!
मैं करीब गया उसके पास!
पहुंचा, करीब छह फ़ीट दूर पर रुका!
उसको, ऊपर से नीचे तक देखा! वो तो मुझ से भी लम्बी थी! बदन भरा हुआ था उसका, और बेहद मज़बूत जिस्म था उसका! रंग-रूप उजला था, आँखें बड़ी बड़ी और बहुत सुंदर थीं! सुतवां सी नाक थी उसकी, नाक में, बायीं तरफ, एक छल्ला पड़ा था सोने का, और वो छल्ला, एक सोने की पतली सी डोर से, कान तक चला गया था! उसने जेवर पहने थे सोने के, चांदी के, भारी-भारी! उसके केशों की चोटी, नीचे, उसकी जाँघों तक लटक रही थी, चोटी में, जगह जगह, गांठें लगी थीं! वो एक अच्छे घराने से तालुक़्क़ात रखती थी, ये तो साबित हो चुका था!
मैं थोड़ा आगे बढ़ा,
वो थोड़ा सा ठिठकी, नज़रें नीचे कर लीं!
"कौन हो तुम? क्या नाम है तुम्हारा?" पूछा मैंने,
न बोली कुछ भी,
वो चुनरी, चबाती रही दांतों से, कभी देखती, कभी नीचे कर लेती अपने पलकें!
"डरो नहीं, बताओ?" पूछा मैंने,
"वेदल" बोली धीरे से,
"वेदल, ये नाम है तुम्हारा?" पूछा मैंने,
सर हिलाया हाँ में उसने, बोली नहीं कुछ भी,
"कहीं जा रही हो?" पूछा मैंने,
हाँ में सर हिलाया उसने, बोली नहीं इस बार भी कुछ!
उसके हाथ बेहद सुंदर थे, मेहँदी लगी थी उन पर, हाथों की तीन तीन उँगलियों में, अंगूठियां पहने हुए थी वो! सच में मित्रगण! उसको देख कर, दया का ही भाव आता था मन में! पता नहीं क्या वजह थी, कि वो उस बीहड़ में, पता नहीं कब से भटक रही थी! उसकी उस पोटली में क्या था? और उस संदूकची में? क्या लिए जा रही थी वो अपने साथ? क्या वो अकेली ही थी? कोई साथी नहीं था उसका? कि सहेली या रिश्तेदार? ये सभी सवाल बेहद ज़रूरी थे जानने, उनके जवाब संग!
"कहाँ जा रही हो?" पूछा मैंने,
"उधर!" बोली ऊँगली से इशारा करते हुए!
"क्या है उधर?" पूछा मैंने,
"धरणा!" बोली वो,
"धरणा? कोई गाँव है?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"कौन है धरणा में?" पूछा मैंने,
"चंदन!" बोलकर, शरमा सी गयी वो, आँखें नीचे कर लीं अपनी!
"कौन है चंदन तुम्हारा?" पूछा मैंने,
नहीं दिया जवाब उसने! संकोच कर गयी थी वो!
"तुम्हारा गाँव कौन सा है?" पूछा मैंने,
"मुलतरा" बोली वो,
"कौन कौन हैं? मेरा मतलब, घर में तुम्हारे कौन कौन हैं?" पूछा मैंने,
एक बहन, दो भाई, दो चाचा, पिता जी, माता जी, यही बताया उसने!
"कब चली थीं तुम घर से अपने?" पूछा मैंने,
"कल शाम" बोली वो,
"कहाँ के लिए?" पूछा मैंने,
"धरणा के लिए" बोली वो,
"अकेली?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"चंदन नहीं आया तुम्हें लेने?" पूछा मैंने,
"उसे नी पता!" बोली वो,
ओह! चंदन को नहीं पता कि उस से मिलने, ये वेदल आ रही है! नहीं तो वो खुद आ जाता लेने के लिए उसे! ये नहीं पहुँच पायी होगी चंदन के पास, बेचारी............आज तक, चंदन से मिलने की आशा में, रेगिस्तान की खाक छान रही है, अपने मौत के बाद भी! बहुत अफ़सोस हुआ मुझे वो सुनकर......
"चंदन क्या करता है वेदल?" पूछा मैंने,
उसने जो बताया, कि वो एक सैनिक है, और वहीँ रहता है!
"ये, ये!" बोली वो, बोतल देख कर,
प्यास लगी थी उसे, अब तो जानती थी कि बोतल में पानी ही है!
"हाँ हाँ! क्यों नहीं, लो, पियो!" कहा मैंने,
ढक्कन खोला मैंने, उसने हाथ से ओख बनाई, और मैंने पानी पिलाया उसे, उसने इस बार भी आधी बोतल से ज़्यादा पानी पिया, एक लीटर कम से कम! सर हिलाया कि बस, और मैंने बोतल हटा ली, खुद ही थोड़ा पानी पिया और ढक्कन लगा, रख ली बगल में!
"अब यहां से, धरणा जाओगी?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"इस पोटली में क्या है?" पूछा मैंने,
उसने वो पोटली, जो घुटनों पर रखी थी, मुझे पकड़ा दी! मैंने पोटली उठायी, उसमे वजन तो नहीं था, ज़रा कपड़ा हटा कर देखा, तो उसमे कुछ कपड़े, और कुछ डिब्बी सी थीं, शायद, श्रृंगारदानी हों वो! और एक कपड़े में, कुछ पत्ते से लिपटे थे, वो पता नहीं क्या था! मैंने दे दी वापिस!
बहुत सीधी लगी मुझे वो, इतनी जल्दी कैसे विश्वास कर सकती थी वो, हम कुटिल इंसानों पर? आखिर इसके साथ हुआ क्या था?
"और इस संदूकची में?" पूछा मैंने,
"चंदन का सामान!" बोली वो, थोड़ा शरमा कर!
जब भी चंदन का नाम आता था, उसके भाव बदल जाते थे! वो संकोची सी और अपने आप में सिमटने लगती थी! शायद, चंदन उसका प्रेमी रहा होगा!
फिर वो उठी, उठायी संदूकची, रखी सर पर पोटली, और चल पड़ी उस बीहड़ रास्ते पर! मैं कुछ न कर सका, बस जाते हुए देखता ही रहा उसको!
वो हो गयी ओझल, और मैं पलटा पीछे, चला उस नागफनी तक, और बता दिया सबकुछ! पानी पिया, और एक जगह आ बैठे हम तीनों!
"पकड़ना ही पड़ेगा इसको!" बोला मैं,
"जब कोई चारा ही नहीं तो पकड़ लो?" बोले शर्मा जी,
"हाँ, कोई चारा नहीं!" कहा मैंने,
"पता नहीं, क्या हादसा पेश हुआ इस अभागी के साथ!" बोले शर्मा जी,
"हम्म, और सीधी भी बहुत है, तेजी नहीं है ज़रा भी!" कहा मैंने,
"हाँ, सीधी तो है!" बोले भूपेश जी!
"चलो, देखते हैं" कहा मैंने,
और एक बार उसी रास्ते को, रास्ता कहाँ, उस बीहड़ हो देखा, जहां भटक रही थी वो वेदल! जिसका पैतृक गाँव मुलतरा था और उसका अगला मुक़ाम, वो धरणा, जहां वो, कभी न पहुँच सकी! अपनी मौत के बाद भी, इन्हीं बीहड़ों में, सदा के लिए, जैसे क़ैद हो कर रह गयी!
"चलो" बोले भूपेश जी,
"चलिए" कहा मैंने,
और हम चल पड़े वापिस! गाँव पहुंचे, लेकिन अभी तक वेदल का चेहरा, आवाज़ मुझे रह रह कर याद आ रही थी! क्या हुआ था उसके साथ?
ये सवाल, बार बार मेरे ज़हन में उठता, काँटा चुभोता और घायल करता!
और अब मैं क्या करूँ?
इबु से पकड़वा दूँ?
ये किसी महाप्रेत से?
क्या सोचेगी वो?
खैर, उसको मुक्त करना है, तो कड़वा होना ही पड़ेगा! और कोई चारा नहीं!
वो रात, मैंने करवट बदल बदल काटी!
सुबह उठा, तो वेदल ही याद आई!
कहाँ होगी?
कहाँ भटक रही होगी?
चंदन का क्या सामान है उसके पास?
मित्रगण!
तीन दिन बीते, वो न नज़र आई!
चौथे दिन, हल्की सी बारिश हुई, न आई नज़र!
दिन में, तीन तीन बार, हम नज़रें गड़ाते उधर! वो न नज़र आई!
इस तरह सात दिन गुजर गए!
और ठीक आठवें दिन,
साँझ का वक़्त,
उस रोज, हवा बहुत ज़ोर से चल रही थी!
कमीज़ फड़फड़ करने लगती थी!
रेत, झाड़ियों के टुकड़े, गोल गोल घूम, आ टकराते! कांटे चुभते! हम उसी नागफनी की ओट लिए खड़े थे! हवा, कभी शांत होती और कभी जैसे चक्की चल पड़ती!
खड़ा होना मुश्किल हो गया हमारा!
तौलियों से मुंह ढकना पड़ा!
अब तौलिया ही, उड़ उड़कर, थप्पड़ से मारे!
आखिर में, हम उस पेड़ के पास आ बैठे! ओट लेकर! लगता था, अब कोई रेतीला तूफ़ान आने को है! दूर तक, धूल ही धूल! हवा ने जीना दूभर कर दिया! सांस न ली जाए!
"लगता है आज कोई तूफ़ान आएगा!" बोला मै, तौलिया पकड़ते हुए! हवा ऐसी ज़ोरदार कि, खड़े खड़े को, पीछे को फेंके! सांय-सांय की आवाज़ हो! वो धूल-धक्कड़ और वो तूफ़ान, उत्तर से दक्षिण की ओर बह रहा था! अगर वो कीकर का पेड़ न होता पकड़ने के लिए, तो सच में पाँव उखाड़ देता वो हमारे! सर ढकें, तो चांटे से पड़ें और न ढकें तो मुंह में घुसे वो रेत!
"आज तो बहुत बुरा हाल है साहब!" बोले भूपेश जी!
उन्होंने तो बुक्कल मार ली थी!
मैंने भी तौलिया को, बाँधा और मार ली बुक्कल! धूल तो अब वैसे घुस नहीं रही थी, लेकिन बदन पर कोड़े से ज़रूर पड़ रहे थे!
"बुरे फंसे! न यहां के रहे, न वहाँ के!" बोले शर्मा जी!
हम सब, उस पेड़ के आसपास आ गए थे! जैसे ही गिरने को होते, वो पेड़ पकड़ लेते! उस पेड़ के सारे पत्ते झड़ गए थे उस तेज हवा में! उसकी शाखें, ऐसे झूम रही थीं, उन्हें, पागलपन का दौरा सा पड़ गया हो! मोटरसाइकिल से टकराती हुईं वो झाड़ियाँ, खनन-खनन की आवाज़ें करें!
"बैठ जाओ!" बोले भूपेश जी!
और हम सभी, बैठ गए! अब बैठे, तो कई बार पीछे को धकियाए गए! गिरते गिरते बचें हम!
"साल के इस वक़्त ऐसा ही होता है यहां!" बोले भूपेश जी!
"अच्छा!" कहा मैंने,
हर तरफ बस हवा का ही हा-हाकार था! धूलम-धालम मची थी, हर तरफ! और तब तो, दस फ़ीट दूर तक देखना भी दूभर हो गया था!
"कब तक चलेगा ऐसा?" पूछा मैंने,
"हो जाएगा अभी बंद!" बोले वो,
और कुछ देर बाद, कमर पर, बूँदें गिरीं! पहले गरम लगीं, और फिर ठंडी! बरसात होने को थी!
"ये बढ़िया हुआ!" कहा मैंने,
"हाँ, इस धूल-धक्क्ड़ से तो बच जाएंगे!" बोले शर्मा जी!
बरसात पड़ने लगी फिर ज़ोर से! हम भीगने लगे! लेकिन अब वो धूल बैठने लगी थी! अब देखा जा सकता था दूर तक! लेकिन हवा जा कभी कभी ऐसा झोंका आता, कि हिलाकर छोड़ जाता! और फिर बरसात पड़ी ज़ोर से! वहाँ का बियाबान तो जैसे बावरा हो उठा! जैसे उन सूखी झाड़ियों, उन नागफ़नियों और पेड़ों में, जान सी आ गयी हो! इस से एक फायदा हुआ! अब धूलम-धाल नहीं था! बारिश ने शांत कर दिया था उसे! लेकिन बरसात के तेवर अभी बाग़ी ही थे! वो नहीं डाल रही थी अपने हथियार! पानी ऐसे गिर रहा था, जैसे ऊपर से कोई, बादलों पर बैठ कर, बिखेर रहा हो! आसमान में, लहरें बन गयी थीं!
"वो, वहाँ देखो?" बोले भूपेश!
हमने झट से उधर देखा!
वो ही लड़की, सर पर पोटली रखे, संदूकची उठाये, चली जा रही थी सामने की तरफ! ये नहीं पता चल रहा था कि वो भीग भी रही है या नहीं? प्रेत यदि विचरण करे, ये जानकार, कि वो प्रेत है, तो वो नहीं भीगेगा! यदि ज्ञात न हो, तो उसकी नैसर्गिकता उसके भिगो देगी! वो दूर चले जा रही थी, अकेली! भटकती हुई! उस धरणा की ओर जाते रास्ते पर! अब मात्र यही तो बचा था उसके पास, बस भटकना! भटकना, और धरणा वाला रास्ता ढूंढना!
"जा रहे हो?" पूछा भूपेश ने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"क्यों?" बोले वो,
"अभी देख रहा हूँ, आती है वापिस या नहीं?" बोला मै,
"अच्छा जी!" बोले वो,
वो ओझल हो गयी! चली गयी, और नहीं लौटी फिर!
अब तलक, बारिश हल्की हो चुकी थी, और हम, पूरे भीग चुके थे उसमे, वो नहीं लौटी, तो हमें लौटना था, और हम लौट आये! बारिश देर रात तक पड़ी, स्नान आदि कर ही लिया था, भोजन कर, सो गए थे हम उसके बाद!
सुबह उठे, फारिग हुए, चाय-नाश्ता कर लिया, उस दिन छुट्टी थी भूपेश जी की, तो मैंने उनसे कह दिया था, कि आज, हम निकलेंगे उस रास्ते पर, जहाँ वो जाया करती है, वे मान गए थे! एक मोटरसाइकिल और ले ली गयी, और हम करीब नौ बजे, निकल पड़े, आकाश में कुछ बादल तो थे, लेकिन बारिश पड़ेगी, ऐसा नहीं लगता था, कम से कम दोपहर तक तो कोई आसार नहीं थे बारिश पड़ने के!
तो हम वहां तक आये, अब वहां से धीरे धीरे चल पड़े, गाड़ी चलाना बड़ा मुश्किल पड़ रहा था, कभी कभी तो पहिये ही धंस जाते थे! करीब दो किलोमीटर तक ऐसा रास्ता मिला, फिर ज़मीन, ठीक हो गयी, और हम आराम से चलते चले गए, बीच बीच में रुक कर, देखने भी लगते थे, कि कुछ है तो नहीं वहां!
हम काफी आगे जा पहुंचे थे, रुक गए, यहां थोड़ा आराम किया, अब तो सूरज महाराज भी प्रकोप दिखाने लगे थे! बाँध लिया कपड़ा सर पर, और फिर से आगे चले, धीरे धीरे!
"यहां से, एक रास्ता गया है, देखो वो, वहां से कोई दस किलोमीटर आगे, एक गाँव पड़ता है!" बोले वो,
"नाम क्या है गाँव का?" पूछा मैंने,
अब जो नाम उन्होंने बताया, बड़ा ही अजीब सा नाम था, लेकिन वो किसी भी प्रकार से, धरणा से नहीं मेल खाता था! हम आगे चलते गए और आगे! और तभी मेरी नज़र, वहां एक खंडहर पर पड़ी!
रुक गया मै!
"वो क्या है?" पूछा मैंने,
"ये तो पुराने खंडहर हैं जी, ऐसे आगे तक मिलंगे, सौइयों किलोमीटर तक!" बोले वो,
"आना ज़रा?" कहा मैंने,
"चलो" बोले वो, और हम चल पड़े,
पहुंचे वहाँ, बियाबान जंगल! दूर दूर तक कोई नहीं! और बीच में ये एक खंडहर! अब तो टूट चुका था पूरी तरह से, वक़्त की दीमक, बस उसकी बुनियाद नहीं चाट सकी थी, नहीं तो वो अब बस पत्थरों के झुण्ड के अलावा, और कुछ न था!
"ऐसे ही हैं वो सारे!" बोले वो,
अपने समय में, वो आबाद रहा होगा, कोई चौकी सी लगती थी वो! लेकिन आसपास किसी भी दीवार होने के कोई निशान न थे वहाँ! कुछ नहीं था वहाँ!
"आओ, आगे चलें!" बोला मै,
"चलो!" बोले वो,
हम करीब दो किलोमीटर और चले, फिर से वैसा ही एक खंडहर पड़ा, वो भी ठीक वैसा ही था, पहले जैसा! उस पर नज़र मारी, कुछ न था वहाँ!
हम और आगे चले,
कोई तीन किलोमीटर, और तब एक पहाड़ी टीला सा दिखा, उस पर एक छोटा सा किला बना था! किला, वैसे तो टूटा-फूटा था, आबादी से दूर था, लेकिन उसकी अपनी एक शान-ओ-शौक़त सी अभी भी बाकी थी!
"ये कौन सा किला है?" पूछा मैंने,
"पता नहीं जी, कोई नहीं जाता वहाँ!" बोले वो,
"चलते हैं!" बोला मै,
"चलो जी!" बोले वो,
और हम चल पड़े उधर के लिए! हम आगे बड़े, किला पास होता चला गया! उसकी स्थापत्य-कला, राजपूताना शैली की थी, ये किसी हिन्दू शासक का किला था! किसी समय में आबाद-ओ-ज़िंदा, गुल-ए-चमन से जाना जाता होगा! लेकिन अब, गुमनामी में रह रहा था, बूढ़ा हो गया था! उसके वारिस, पता नहीं अब कहाँ थे! अब कोई सुध नहीं लेता था उसकी! अपने आखिरी दिन गिन रहा था वो किला! लेकिन सच में, वो किला बेहद ही सुंदर है! शान से खड़ा है! हम उसके करीब तक पहुँच गए, बड़े बड़े पत्थर पड़े थे वहाँ! उसकी दीवारों में, अब छेद हो चुके थे! जंगली झाड़ियाँ, पेड़-पौधे सब लिपट पड़े थे उस से! अब उसमे, कुछ जंगली जानवर, कुछ परिंदे, कुछ चमगादड़ आदि का राज होगा!
"इसका मुंह किधर है?" पूछा मैंने,
"शायद, पीछे होगा!" बोले शर्मा जी,
"आओ, देखते हैं!" कहा मैंने,
मोटरसाइकिल खड़ी कर दीं वहीँ, और उस किले का मुंह देखने चल पड़े हम! कुछ देर बाद, दिखा हमें!
"वो रहा!" बोले भूपेश जी!
''आओ!" कहा मैंने,
किले के नीचे, खायी सी बनी थी, अब पानी न था उसमे!
"साँपों से बचना!" बोले भूपेश जी,
"हाँ, ज़रूर!" कहा मैंने,
और हम, उन पत्थरों के बीच से होते हुए, उस किले में दाखिल हो गए! बड़ा ही खूबसूरत नज़ारा था वो! उस किले ने, अपनी शान अभी तक क़ायम रखी थी! किसी वक़्त में, कोई यहां तक भी नहीं आ पाता होगा! बिना अनुमति के तो क़तई नहीं!
अंदर, एक और दरवाज़ा बना था, उस बड़े दरवाज़े पर, बीच में एक इबारत खुदी थी, लेकिन अब वो पढ़ी नहीं जा सकती थी, वक़्त के नोंकदार नाखूनों ने, उलीच फेंकी थी वो इबारत! अंदर, जंगली झाड़ लगे थे! दीवारों में, जगह जगह घोंसले बने थे!
"आओ!" कहा मैंने,
और मै आगे चला, जैसे ही अंदर आया, पानी की आवाज़ आई!
"सुनो?" बोला मै,
दोनों ने कान लगाये!
"पानी बह रहा है शायद!" बोले भूपेश जी!
"हाँ, आओ!" कहा मैंने,
और हम चले अब अंदर! रास्ता था अभी भी वहां!
"बड़ा किला है ये तो!" बोले शर्मा जी,
"हाँ, बाहर से ही छोटा लग रहा था!" कहा मैंने,
जब हम अंदर चले, तो एक जगह पानी बह रहा था! शायद, बरसात का पानी था, वो नीचे टपक रहा था अब!
"इसकी आवाज़ थी वो!" बोले भूपेश जी!
"हाँ, आओ, यहां बैठते हैं! कहा मैंने , और बैठ गया मै तो!
साथ में, वो दोनों भी बैठ गए! अंदर वहाँ, मरुस्थलीय पौधे लगे थे, उनका जीवट साफ़ दीखता था! पानी की अल्पता से कैसे निबटा जाए, उन्होंने दिखा दिया था! उनके पत्तों का रंग, गाढ़ा हरा न हो कर, हल्का हरा था! एक-दूसरे को जैसे सहारा दिया हो उन्होंने, और इस तरह, अपना वर्चस्व क़ायम कर लिया था! तभी पीछे से, एक अजीब सी आवाज़ आई, मैं पहचान गया था! वो आवाज़, सुनहरी और बड़े उल्लू के बच्चे की थी! वहाँ, उल्लूओं के घोंसले थे, दीवारों की कोटरों में बने हुए! उल्लू की आवाज़ अवश्य ही थोड़ा कर्कश हुआ करती है, लेकिन उसके बच्चों की आवाज़, मधुर होती है! मैंने गरदन घुमायी अपनी, पीछे देखा, नहीं दिखा, मैं उठा वो फिर चला पीछे! ठीक सामने, दो बड़े से पत्थरों के बीच, एक गड्ढा सा बना था, उसी में दो बच्चे थे उल्लू के! बहुत सुंदर लग रहे थे वो, उनकी माँ थी वहाँ, पिता कहाँ था, पता नहीं, शायद अंदर ही हो! वो ध्वनि का पीछा करते हैं दिन में, और धुंधला सा ही दीखता है उन्हें! वो मादा उल्लू, बहुत सुंदर थी! बड़ा सा मुंह, पीली, मोटी सी चोंच, घूमी हुई! लगता नहीं कि वो चोंच भी किसी काम आ सकती है! लेकिन उसकी ये चोंच ऐसी पैनी होती है, कि मोटे से मोटे चमड़े को भी भेद दे! ये सब प्रकृति का चमत्कार है! उसने सभी को, कुछ न कुछ विशेषता प्रदान की है!
"कैसे मोटे और खाते-पीते हैं ये बच्चे तो!" बोले शर्मा जी, वो चले आये थे वहां, मेरे पास!
"हाँ! यहां आहार की कोई कमी नहीं! चूहे, छछूंदर, सांप, सब पर्याप्त मात्र में होंगे!" कहा मैंने,
"तभी तो, उस उल्लू को ही देखो, तीन-चार किलो का तो होगा ही!" बोले वो,
"हाँ, मादा है वो, पूंछ छोटी है इसकी, नर उल्लू की पूंछ भारी हुआ करती है!" कहा मैंने,
"अच्छा!" बोले वो,
"उल्लू किसानों के मित्र हैं! ये चूहों, साँपों का शिकार करते हैं, उनकी आबादी को नियंत्रित करते हैं!" बताया मैंने,
"हाँ, ये तो है!" बोले वो,
कुछ देर, वहीँ देखते रहे हम, हर तरफ, बस वो जंगली पेड़ और पौधे!
"आओ, चलें!" कहा मैंने,
"चलिए" बोले वो,
और हम, भूपेश जी के पास आ गए, बैठ गए, पानी पिया थोड़ा, और चेहरा भी धो लिया!
"ऐसे और भी किले हैं?" पूछा मैंने,
"हाँ, आगे तक चले जाओ, कोई पहाड़ी ऐसी न होगी जिस पर कोई खंडहर न हो!" बोले वो,
"हाँ, देखा है मैंने, अक्सर, हर पहाड़ी पर, कोई न कोई खंडहर है ही!" कहा मैंने,
"हाँ जी, राजस्थान, छोटी-बड़ी रियासतें पालता रहा था, कोई कोई तो, दो-दो किलोमीटर की ही थीं!" बोले वो,
एक बहुत बड़ी बात कह गए थे वो!
शायद, धरणा भी कोई ऐसी ही रियासत रही हो? जो भले ही कुछ साल तक रही हो? ऐसी न जाने कितनी रियासतें आयीं और गयीं, कइयों के वारिस ही न रहे! सब युद्ध में खेत रहे!
शायद, वो वेदल, ऐसी ही किसी रियासत की ओर चली हो? सम्भव है! उसका प्रेमी, चंदन, ऐसी ही किसी रियासत में कोई सैनिक हो, सम्भव था!
"सही कहा आपने!" मैंने कहा,
''आगे, एक सराय भी है!" बोले वो,
"अच्छा! कहाँ?" पूछा मैंने,
"कोई किलोमीटर से पहले ही!" बोले वो,
''चलो, दिखाओ!" कहा मैंने,
"आइये!" बोले खड़े होते हुए, और कपड़े झाड़ते हुए!
निकल लिया हम बाहर के लिए, पीछे से आती हुई उल्लू के बच्चों की आवा कम और कम होती चली गयी, और हम, जिस रास्ते से आये थे, उसी रास्ते से बाहर आ गए!
स्टार्ट कीं अपनी मोटरसाइकिल, हुए सवार, रखा तौलिया सर पर, और चल पड़े, वो सराय देखने! दरअसल, सराय, अक्सर एक मंजिली और सम संख्याओं वाले कक्षों की ही रही हैं, जैसे एक छोटी सराय, आठ कमरों वाली, या सोलह, या बत्तीस वाली मिलती हैं, ये मुग़ल-कालीन हैं, बाद में रुहेलों ने, ये दो-मंजिला कर दी थी, इन सराय का नक्शा, अक्सर साधारण ही होता था, पहल एक दरवाज़ा या फाटक, और फिर से एक फाटक, जहां पर, आने-जाने वाले का हिसाब रखा जाता था, सभी तरह का खान-पान उपलब्ध था, तीन-वक़्त, आठों घंटों तक, मुलाज़िम काम किया करते थे, इसमें धोबी, रसोइये, घोड़ों को खरेड़ा करने वाले, गवैये आदि सब हुआ करते थे, औरतों को मनाही थी उसमे ठहरने की, कोई बांदी आदि भी नहीं प्रवेश कर सकती थी, वैद्य-हक़ीम आदि का कक्ष सदैव हुआ करता था उसमे! ऐसी कई सराय आज भी हैं, लेकिन अब बस खंडहर ही हैं!
तो हम आ गए थे ऐसी ही एक सराय पर, उसको देखते ही मालूम पड़ता था कि वो मुग़ल-कालीन है! वही, आलादार चौखटें! पूर्व में प्रवेश-द्वार, ताकि सूरज का उजाला रहे, ये सोलह कमरों वाली सराय रही होगी, आज बेचारी ना-आबाद है, लेकिन अपना इतिहास, मुँहज़बानी याद था उसको! जंगली पेड़-पौधों से अब उसकी मित्रता हो चली थी, उनको, अपने अकेलेपन में, इन्ही का, आपसी साथ मिलता था!
"ये है जी!" बोले वो,
"शानदार!" मेरे मुंह से निकला,
आगे चला मैं, एक इबारत खुदी थी, फ़ारसी में लिखा था उसमे, जो पढ़ पाया वो ये, कि ये किसी मंसूर अहमद तरेज़ी ने बनवायी थी, अब बनवायी थी या उसको तामीर करने में मदद-ओ-इमदाद की थी, ये नहीं पक्का पता था, उसने सोलह कमरे थे, और वो सराय, चुनिंदा तिजारतियों के लिए ही थी! इस कारण समझ आता था, उस वक़्त हिन्दुस्तान में, फारस, सिंध, अरब, पश्तून, तुर्क, अफ़ग़ान आदि से तिजारती आया करते थे, अब ये ख़ास किसके लिए थी, ये नहीं लिखा था! लेकिन इतना सब्र हुआ कि मैं उस वक़्त इतिहास के चिलमन में झाँक रहा था! इतिहास, अभी भी ज़िंदा था उस सराय में!
दीवारों में बने बड़े-बड़े आले, उस वक़्त की मशालों के लिए लगाये कुन्दे, जो कि पत्थरों में ही तराशे गए था, अभी तक गवाही दे रहे थे! वो बड़ा सा बारादरी में जाने वाला गलियारा आज भी ज़िंदा था, न जाने कितने क़दम वहां पड़े हों! कौन आया हो, पता नहीं!
"कमाल है!" बोले शर्मा जी,
"हाँ!" बोला मैं,
"दीवारों की चौड़ाई देखिये!" बोले वो,
"हाँ, जंग के समय, ये बारूद-ओ-असलहा के काम भी आया करती थीं! सेना के बड़े बड़े मुलाज़िम, यहीं रहा करते थे! ये बारूदखाना या तोपखाने का भी काम किया करती थीं, इसीलिए!" कहा मैंने,
"अब गोल कैसे बींधे इन्हें!" बोले वो, मुक्का मारते हुए उधर!
"हाँ, कम से कम पांच फ़ीट चौड़ी तो हैं ये!" कहा मैंने,
''अंदर चलते हैं!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
अंदर आये, तो जैसे किसी मैदान में आ गए!
"ये देखो, कमरे!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने देखते हुए!
''आज वीरान पड़े हैं!" बोले वो,
"सच में, अब यहां कोई नहीं!" कहा मैंने,
"कभी, कैसी रौनक रहती होगी!" बोले वो,
"हाँ, चहल-पहल!" कहा मैंने,
''वो, रसोई है?" बोले वो,
"आओ, देखें!" कहा मैंने,
पहुंचे वहां!
"हाँ, येदेखो, धुआं निकलने की जगह, बारिश न आये अंदर, किसी भी दिशा से, क्या नायाब तरीका अपनाया है!" बोला मैं,
"हाँ! ये है इंजीनियरिंग!" बोले वो,
ऊपर, छज्जे में से, कई परतनुमा छज्जे से बने थे! बारिश नहीं आ सकती थी अंदर! धुंआ बाहर ही जाता! ये तरीका आज कोई नहीं अपनाता, लेकिन कई पुराने किलों में, ऐसा देखा जा सकता है! इसी से पता चलता है कि वो एक रसोई है!
हम करीब एक घंटा वहां ठहरे! और फिर वापिस हुए! अब वापिस चले घर की तरफ, भूख भी लगने लगी थी, इसीलिए, अब लौट पड़े! वापिस थोड़ा जल्दी ही आ गए हम! हाथ-मुंह धोये और फिर थोड़ी देर में ही भोजन आ गया! ककड़ी की सब्जी थी, और राजस्थानी स्वाद! पेट भर के भोजन किया, और उसके बाद, आराम करने के लिए, कमरे में चले गए, बहुत ही जल्द नींद भी आ गयी!
शाम हुई, बजे छह, हम जागे हुए थे, चाय की चुस्कियां भर रहे थे! मैंने कुछ तैयारी कर ही ली थी, मक़सद यही था कि आज उस वेदल को क़ैद किया जाए, और किया जाए खुलासा, कि उसके साथ ऐसा हुआ क्या था? वो असल में थी कौन? कहाँ की रहने वाली थी, कहाँ से आई थी, और कहाँ को जाना था उसे? क्या थी मंजिल उसकी? चंदन से उसका लेना देना था क्या? और वो, पहुंची क्यों नहीं अपनी मंजिल पर? चंदन का क्या रहा? और फिर दूसरी बात, कहीं कोई सिरफिरा तांत्रिक, ओझा, गुनिया कहीं भिड़ गया इस वेदल से, तो पता नहीं क्या हश्र हो उसका! वो तो बेचारी वैसे ही अभागी थी, जिस यात्रा पर निकली थी, कुछ अरमान लिए, वो अरमान तो ज़िंदा हैं उसके, उसके ज़हन में, लेकिन उसकी यात्रा का अंत न हुआ! बस कुछ ऐसे ही सवालात ज़हन में उछाल मारते थे! इबु से पकड़वाना उचित न था, उसके सामने प्रेतों की शक्ति निचुड़ने लगती है, वो भय खा जाते हैं, और फिर इबु का व्यवहार भी उनके लिए एक-समान ही रहता है, कि प्रेत कैसा भी हो, हमेशा उसके लिए दुश्मन ही है! तो उसको मंत्रों द्वारा ही पकड़ना था! इसी की तैयारी मैंने की थी, और भस्म भी अभिमंत्रित कर ली थी!
उसी शाम हम, फिर से वहीँ जा पहुंचे, आज मौसम साफ़ था, हाँ, भाटा अपना ज़ोर दिखाने पर आमादा था, लेकिन हम भी डटे ही हुए थे! हम करीब पौने सात बजे वहाँ पहुंचे, और किया इंतज़ार! आठ बजे, फिर साढ़े आठ, वो नहीं आई! वापिस हुए हम, अब कल जाना था!
इस तरह चार दिन बीत गए, वो नहीं लौटी, पता नहीं क्या बात थी, अब तो दिल में भी घ्बारहट भरने लगी थी, कहाँ गयी? कहीं किसी ने पकड़ तो नहीं लिया? क्या हुआ उसका? ऐसे सवाल और दिमाग को झुंझला देते थे!
ठीक आठवें दिन, वो नज़र आई! उसी वेश-भूषा में! और समय था, सात बजे का, हाथ में संदूकची लिए, सर पर पोटली रखे! आये जा रही थी वेदल, उसी जगह के लिए! वो आती रही, हम देखते रहे उसे, वो आई, और एक जगह, रखी संदूकची, बैठ गयी उस पर, घुटनों के बीच रखी अपनी वो पोटली! मेरा दिल जोर जोर से उछला सीने में! आज इसकी यात्रा को विराम दे देना था, आज उसकी ये अंतहीन यात्रा, समाप्त हो जानी थी! और ऐसा ही हो, ऐसा सोच, मैं पानी की बोतल लिए, चल पड़ा उसकी तरफ! वो उस रास्ते को देख रही थी, जहां उसका वो मुक़ाम धरणा पड़ता था! दिल में कई भाव आये और गए! उसके लिए दया उमड़ पड़ी! साधे हुए क़दमों से, मैं बढ़ता रहा उसकी तरफ! दूरी कम होती चली गयी! क्षितिज पर लालिमा मौजूद थी, वहां की वो रेत, उस लालिमा में, लाल हो चली थी! मैं, जा पहुंचा वहाँ!
रेत पर, मेरे क़दमों की आवाज़ हुई, तो उसने सर घुमा कर मुझे देखा, देखते ही, सर का कपड़ा ठीक किया उसने, मैंने अपनी कमीज़ की जेब में, वो भस्म डाल रखी थी, आज उसे जाने नहीं देना था! यही सोच रखा था मैंने!
"वेदल?" बोला मैं,
उसने, एक आँख ढक रखी थी, दायीं वाली उस कपड़े से, बायीं से मुझे देखा, मैं एक बार को तो सिहर उठा, कैसे अजीब से भाव थे उसकी आँख में, मैं अंदर तक काँप उठा था!
"तुम गयीं नहीं धरणा?" पूछा मैंने,
"रास्ता नहीं पता" बोली वो,
ऐसे बोली, जैसे ठेठ देहाती हो, इस संसार से अनजान, इस संसार की कुटिलता के बारे में, जैसे न कुछ सुना हो, न कुछ जाना ही हो! मेरे तो मुंह में, ज़ुबान ही ठिर्रा गयी, जैसे शब्द, चिपक गए हों उस से! जो अंदर ही घुसना चाहें, बाहर जाने की बजाय!
"धरणा का रास्ता?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"किसी से पूछ ही लेतीं?" बोला मैं,
"कोई नहीं बताता" बोली वो,
"मैं बताऊँ?" बोला मैं,
उसने देखा मुझे चौंक कर! उठ खड़ी हुई! दोनों हाथ जोड़ लिए! पोटली नीचे रख दी थी! हुई मेरी तरफ! ओह! सच कहता हूँ, उस समय झूठ बोलकर मुझे क्या महसूस हुआ, कैसा ज़लील महसूस किया मैंने, झूठा, फरेबी, मक़्क़ार! मेरी अंतरात्मा ने, झकझोर दिया मुझे अंदर तक, मेरी रीढ़ की हड्डी में, सर्द सी लहर दौड़ पड़ी!
उसने बोलने की कोशिश की, लेकिन बोल न पायी! मैंने आँखें देखीं उसकी, आँखें डबडबा गयीं थी उसकी! कितने बरसों बाद, उसे कोई मिला था, उस धरणा का पता बताने वाला!
"जाना चाहती हो न धरणा?" बोला मैं,
उसने सर हिलाया हाँ में, कुछ कहना चाहा, न बोल सकी वो!
मैंने जेब में हाथ डाला, निकाल ली अभिमंत्रित भस्म, चार चौपुण्ड पर गिरानी थी, एक अपने पाँव के पास बिखेर दी, आगे बढ़ा, उसको पार किया, सामने देखा, दूसरी, वहाँ गिरा दी, उसके बाएं चला, तीसरी वहाँ गिरा दी, उसके दायें चला, चौथी, वहाँ गिरा दी! उसके लिए, स्थान-कीलन हो गया! अब वो न जा सकती थी वहां से, बस, लोप हो हो सकती थी, इसीलिए, अर्केश्वर-मंत्र पढ़ दिया! अब वो लोप भी न हो सकती थी, जब तक, मैं उसको देखता रहता!
"वो सामने देखो?" बोला मैं,
उसने उचक के देखा, सामने, कुछ था ही नहीं, वो देखती भी क्या!
"वो दीख रहा है?" पूछा मैंने,
"क्या?" उसने उचक कर देखा!
ये मैं क्या कर रहा था? मेरा मन, दो-फाड़ हो रहा था बार बार! लेकिन, करना पड़ रहा था मुझे! इसी में, उस वेदल की भलाई थी!
''वो पहाड़ी?" कहा मैंने,
"कहाँ है?" उसने पूछा,
मैं करीब गया उसके, और करीब! उसके सर पर हाथ रख दिया! वो झम्म से लोप हुई! मेरी क़ैद में आ गयी! उसकी वो पोटली और संदूकची, वहीँ रेत पर, धम्म से आ गिरीं!
मैं झुका, अर्केश्वर का एक बार और जाप किया, और फिर, व पोटली, संदूकची उठा लीं! ले चला उनको अपने साथ, मेरा जिस्म, बेहद भारी हो चला था, लगता था, वहीँ गिर पडूंगा मैं! मैं लड़खड़ाने लगा था! शर्मा जी आये दौड़े दौड़े, और उठा लिया वो सामान मेरे हाथों से, मैं संयत हुआ कुछ, और चल पड़ा उनके साथ ही! भूपेश जी ने स्टार्ट की मोटरसाइकिल, मैं बैठा उस पर, सामान, पकड़ लिया था मैंने, गाड़ी आगे बढ़ी, शर्मा जी ने, दूसरी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और हम अब तेजी से बढ़ने लगे घर की तरफ! जब घर पहुंचे, तब मैं संयत हुआ! सामान्य हुआ!
"हो गया काम?" पूछा भूपेश जी ने,
"हाँ, अब मेरे पास है!" कहा मैंने,
"चलो जी!" बोले वो,
वे बाहर गए, चाय बोलने के लिए, अंदर आये और दरवाज़ा बंद कर दिया, मैंने पोटली खोली उसकी, दो वस्त्र थे, एक काले रंग का, कमीज़ सा, एक घाघरा, काले रंग का, एक और छोटी पोटली थी उसमे, वो खोली, उसमे, कुछ सिक्के थे चांदी और सोने के, वो सिक्के, मुझे यक़ीन था, वो अठाहरवीं सदी के रहे होंगे, उन सिक्कों में, कुछ चांदी और सोने की छोटी छोटी गेंदें थीं, और एक सोने की माला! वपोटली बंद कर दी, और टटोला, तो लाल रंग का एक कपड़ा मिला, उसमे कुछ था, उसको खोला मैंने!
अंदर, एक भोज-पत्र सा था, पता नहीं क्या था वो, लेकिन था कोई पत्ता ही, उसके किनारे टूट रहे थे छूते ही, उस पत्ते में, कुछ लिखा था, लेकिन अब वो फीका हो चला था, जैसे पानी पड़ गया हो उस पर, क्या लिखा था, नहीं समझ आया, बस कुछ अक्षर, जैसे, र, म, ह, ट बस, मात्राएँ न समझ आयीं! बहुत पुराना हो चला था वो! रख दिया वापिस, संभाल कर,
और टटोला, तो कुछ नहीं, बस कुछ मिट्टी के ढेले, दो छोटी सी श्रृंगारदानियाँ और कुछ नहीं! अब बारी थी उस संदूकची की, वो एक छोटी सी संदूकची थी, आठ इंच चौड़ी और सोलह इंच लम्बी, उसमे लकड़ी को तराश कर एक चित्रण किया गया था! इसमें दो हाथी, आमने सामने बने थे! हाथियों को सजाया हुआ था! दो गोल गोल वृत्त थे, उसमे, शतरंज जैसे खाने बने थे! शेष भाग पर, चित्रण किया हुआ था! लाजवाब कारीगरी का नमूना था वो!
"इसमें कोई कुण्डी है?" पूछा शर्मा जी ने,
मैंने उलट-पलट के देखा,
"नहीं, नहीं है!" कहा मैंने,
"तो खुलेगी कैसे?" पूछा उन्होंने,
"अभी देखते हैं!" कहा मैंने,
मैंने खूब देखा, ऐसा कुछ न मिला! शर्मा जी ने भी देखा, कुछ नहीं! भूपेश जी ने भी देखा, कुछ नहीं!
"कमाल है!" बोले शर्मा जी,
अब मैंने निरीक्षण किया उसका, बारीकी से! हाथ फिरा के देखे! एक अजीब सी बात! अजीब सी बात आई पकड़ में! जहाँ वो वृत्त बने थे, वहाँ कुछ उभरा हुआ ज़रूर था! अब उसको देखा, तो एक छोटे से खाने में, उस उभरे हुए स्थान पर, एक छेद दिखा! ऐसा ही छेद, दूसरे वृत्त पर भी था!
"भूपेश जी?" बोला मैं,
"जी?" बोले वो,
''एक सुईं लाइए!" कहा मैंने,
"अभी लाता हूँ!" बोले वो,
वो सुईं भी लाये और चाय भी, चाय रखी, और सुईं मुझे दी,
अब मैंने उस छेद में डाली सुईं, और खींचा ऊपर, एक माचिस की तीली बराबर, कील सी निकली बाहर! और ऐसे ही दूसरी जगह से निकाली! ये थे उसके लॉक! कांटे! अब हल्का सा खोला, तो खुल गयी वो संदूकची! क्या ज़बरदस्त तरीका लगाया था बनाने वाले ने भी! हम तो हैरतज़दा ही रह गए सभी के सभी!
संदूकची खुली! पता नहीं कितने सालों के बाद! कितने सालों बंद रही वो! आज खुल रही थी! जैसे ही खुली, सभी की निगाहें उसी पर पड़ीं! अंदर काले रंग का एक कपड़ा बिछा था, और उसमे कई डिब्बियां रखी थीं! मई एक डिब्बी खोली, लकड़ी की थी, उसमे, कि चूर्ण सा था, अब वो, सूख गया था, चिपक गया था तले में ही, देखने में चंदन सा लगता था! दूसरी डिब्बी खोली, तो सिन्दूर निकला! उसमे भी अब पत्थर बन गए थे, छोटे छोटे, कंकड़ जैसे, तीसरी डिब्बी खोली, उसमे पता नहीं क्या था, पीले रंग का, सूख गया था वो भी! चौथी डिबिया खोली, उसमे दो हाथी-दांत की सी सिलाईयां निकली, पता नहीं किस काम आती होंगी वो! शायद, सुरमा या काजल लगाने के लिए! यही अनुमान लगाया था मैंने! पांचवीं डिब्बी खोली, उसमे से नथनी, कानों के बुँदे और चार अंगूठियां मिलीं! डिब्बियों में तो यही था बस, और उस संदूकची में, कुछ भी नहीं था! शायद, यही सामान लेकर निकली होगी वेदल अपने घर से!
"ये तो सारा साज-श्रृंगार है!" बोले शर्मा जी,
"हाँ, और कुछ नहीं है!" कहा मैंने,
"अब क्या करना है?" पूछा उन्होंने,
"कल चलते हैं वापिस, अब मालूम हो ही जायेगी असली कहानी!" बोला मैं,
"मैं चलूँ क्या?" बोले भूपेश जी,
''आप क्यों छुट्टी करते हैं, आपको खबर कर ही देंगे?" कहा मैंने,
"ठीक है!" बोले वो,
और इस तरह, अगले दिन, हम हुए वापिस, वो सामान ले ही लिया था साथ में, संभाल कर रखा था, किसी और की अमानत थी वो, इसीलिए! विदा ली हमने, भूपेश जी से, और उनका धन्यवाद किया!
हम आ गए वापिस, दो दिन बाद, मैंने उसकी कहानी जानने के लिए, उसको उस रात हाज़िर किया, वो घबराई हुई थी, रो ही पड़ी थी, मुझे उसने टुकड़ों में जो कुछ बताया वो किसी के भी दिल को चीर देने के लिए काफी है,
मैं आपको, अब अपने शब्दों में वो सब बताता हूँ.............
सन अठारह सौ चार,
राजस्थान का वो क्षेत्र, उस समय आमेर के क्षेत्र में आता था, महाराजा जगत सिंह सिंहासनारूढ़ थे उस समय, जो मैंने हिसाब लगाया उस हिसाब से, इतिहास भी पुष्टि करता है इसकी, और इसी कारण से ये कुछ नाम निकाले हैं मैंने,
मुलतरा, एक छोटा सा गाँव, आज ज़मीन और नक्शे सा हट चुका है वो, यहां धनाढ्य परिवार वास किया करते था, ये एक व्यापारिक गाँव हुआ करता था उस समय, वो गाँव, आज पूर्ण रूप से विलुप्त है, अब वहाँ, बस कुछ दीवारों के खंडहर हैं, उसी पुराने गाँव के करीब ही, एक नया गाँव बस चुका है! वहाँ के निवासियों को भी, अपने ही समीप में बसे उस गाँव के बारे में कोई ज्ञान नहीं! न ही कोई दस्तावेज़ इस बात की पुष्टि ही करता है!
मुलतरा में एक ऐसा ही धनाढ्य परिवार था, सेठ माम चंद का, माम चंद अपने समय के जाने-माने सेठ थे, उनका व्यवसाय, दूर दूर तक फैला था, उसनके तीन संतान थीं, दो बड़े लड़के, एक छत्रपाल और दूसरा भूपाल, सबसे छोटी, एक बेटी थी, ये वेदल, और उनकी पत्नी, परिवार, हंसी-ख़ुशी से रहता था उनका, दोनों ही पता, अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाते थे! माम चंद के दो बड़े भाई थे, वो भी संग ही रहा करते थे, व्यवसाय में सब साझा ही था, उनकी भी संतानें, माम चंद के बेटों के साथ ही, व्यवसाय संभाला करते थे! समय आराम से गुजर रहा था!
एक बार क्या हुआ कि, गाँव में एक बारात आई, बारात भी अच्छे धनाढ्य परिवार से आई थी तो बारात देखते ही बनती थी! खूब गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े! गवैय्ये, स्वांग भरने वाले सभी के सभी काम पर लगे थे अपने, कोई कसर नहीं छोड़ी थी बारात ने तो! ऐसे ही, घराती! घरातियों ने भी आवाभगत में, कोई कसर न छोड़ी! तब बारात हफ्ते हफ्ते ठहरा करती थी, तो वो बारात भी हफ्ते ही ठहरी!
तीसरे रोज की बात है, वेदल, घराती के घर गयी हुई थी, खूब शान-ओ-शौक़त बिखरी हुई थी! पूरे गाँव में, बड़ा ही खुशमिजाज़ माहौल था! उसी शाम, जब वेदल अपनी चचेरी बहन पूर्णा के साथ वापिस आ रही थी, तो एक जगह, एक सजीले, रण-बाँकुरे युवक से, उसकी नज़र उलझ बैठी! वेदल की नज़रों में जहां शोख़ी वाबस्ता थी, वहीँ उस सजीले नौजवान में, जवानी की उमंग थी! वो युवक, चौड़े कंधों वाला, साफ़ रंग का, तावदार मूंछ-दाढ़ी वाला, मजबूत कद काठी वाला था! जैसे ही नज़र टकराई दोनों की, दोनों ने, फ़ौरन उलझन काटी! मुंह फेर लिए अपने अपने! वो आ रहा था, और वो जा रही थी! आये भिड़ गए थे दोनों के! सम्मुख किसी ने न देखा! धड़कते दिल लिए, दोनों ही गुजर गए एक-दूसरे के साये काटते हुए! और जब देखा उन्होंने पीछे, मुड़कर, नज़रें फिर से उलझ गयीं! अब तीर तो चल चुके थे, हाँ, निशाने पर कब लग्न, ये नहीं मालूम था दोनों को! दोनों ही अपनी अपनी जगह आ पहुंचे! नज़रें तो अपनी जगह थीं, लेकिन वो अक्स, अब अपना कमाल दिखाने को थे! अक्स, जो एक-दूसरे के दिल पर, चस्पा हो चुके थे! अब बनाने वाले ने भी क्या बनायी हैं नज़रें! पहले दौड़ती हैं, फिर काटती हैं एक दूसरे को, उलझती हैं, और जब वापिस होती हैं, तो अक्स चुरा लाती हैं! और वो अक्स, ऐसा जी का जंजाल बन जाता है, कि हमेशा ही नज़र आता है आँखों में! न खाने ही दे, न पीने ही दे! न सोने ही दे और न जागने ही दे! न लेटे ही चैन और न बैठे ही चैन! न घर में आराम न बाहर ही आराम! न ज़मीन पर फुर्सत न आसमान में फुर्सत!
तो, नज़रें दौड़ी थीं! काटा एक दूसरे को! उलझीं भी, वापिस भी हुईं और, अक्स भी चुरा लाईं! यानि के, सारे ज़रूरी हथियार काम में लिए जा चुके थे! इधर वो नौजवन बेचैन, उधर, वो वेदल बेचैन! अब ये हालत, होती बड़ी अजीब है! खुद ही सवाल करो, और खुद ही जवाब भी दो! होंठ और आँखें, ये चोरी पकड़वा देते हैं! और ऐसी हालत में, ये तो जैसे बग़ावत पर उतर आते हैं, इन दोनों की यारी हो जाती है, एक दूसरे की गवाही देने लगती हैं!
ये घटना शाम को हुई थी, और मुश्किल-बा-मुश्किल घंटा ही बीता होगा, कि उनकी प्यास बढ़ती चली गयी! जैसे पता नहीं, कितने महीनों से, कितने बरसों से, तरस रहे हों एक दूसरे को देखने के लिए! हर एक करवट, बदन को बोझिल करती जाए! न आँखें ही बंद हों, न खुली ही रखी जाएँ! साँझ गयी, रात आई, रात का सन्नाटा पसरा, घरातियों के यहां से, कुछ स्वांग की आवाज़ें ही आये हवा के झोंकों के साथ! रात का पहला प्रहर, आँखों आँखों में गया, दूसरा आया, तो और जला गया, चिढ़ा गया! अब हालत ऐसी, कि किसी को बतायी भी ना जाए!
तो मित्रगण!
कैसी तरह से वो बैरन रात काटी!
बहुत तरसाया उस रात ने!
ज़िंदगी में ऐसी लम्बी, अकेली, बेचैन रात, कभी न देखी थी! न नींद ही आई, न जाग ही सके दोनों! दो दिल दूर बैठे, जैसे ताल मिला रहे थे एक दूसरे से! अब हुई बेचैनी शुरू! कब देखूं? कब जाऊं? क्या कल के ही वक़्त? न मिला या मिली तो?
चुप सी बैठ गयी वेदल! कहीं ऐसा तो नहीं, वो ही अकेली उड़ रही हो अपने ख्यालों में? अगर ऐसा ही हुआ तो? अब यहां बड़ा ही डर लगता है! जैसे, बरसों से तामीर की गयी अपनी ख्वाबगाह, सुबह की पहली किरण पड़ते ही, धूल-धसरित हो जाए!
लेकिन!
दिल में बैठा चोर, जीने ही नहीं देता! लालच पर लालच बढ़ाने लगता है! बार बार अर्रा पड़ता है कि, जा! जा! कोई है जो राह देख रहा है तेरी! जा! देर न कर! न तड़पा उसे! और न खुद ही तड़प! ऐसा लड़ता है इंसान खुद अपने आप से! न हारे ही बने, न जीत ही दिखाई दे!
शाम!
वही वक़्त!
वही राह!
वही चाह!
चल पड़ी वेदल! अब अकेली नहीं थी वो, भले ही चचेरी बहन नहीं थी साथ में, लेकिन उसके साथ, उसकी उम्मीद थी! कुछ चाह थी! क़दम, ज़रा हल्के से पड़ने लगे थे! बदन जैसे हल्का हो चला था, रास्ता, जैसे लम्बा हो गया था! वो चले जा रही थी!
अचानक!
कोई दिखा उसे!
वही वही! जो कल था! जिस से नज़रें मिली थीं! उलझीं थीं! उसने तो, नज़र बिछाई हुई थी उसके लिए! उसके, वेदल के लिए!
दिल धड़के दोनों के!
क़दम थम गए वेदल के!
नज़रें, सामने ने खिंचे!
सर, उठाया न जाए!
वो फिर भी, चल पड़ी आगे! धीरे धीरे! कोई नज़रों में बसाये हुए था उसको! कोई खींच रहा था उसको अपनी तरफ! सर उठ गया अपने आप! और नज़र एक बार फिर से जा उलझी उस से! और वो, नौजवान! शांत, लेकिन डरा डरा सा, उसी को देख रहा था!
उस नौजवान ने, रास्ता छोड़ा! ताकि वेदल गुजर सके! गुजरी वेदल समीप में से! लेकिन, नज़र चुराते हुए! वो नौजवान, ज़रा हट गया था पीछे!
क्या हालत थी दोनों की!
एक दूसरे के लिए खड़े भी थे! और एक दूसरे से बच भी रहे थे! न चाहते हुए भी, नज़रें मोड़नी पड़ जातीं! पीछे रह गया था वो नौजवान! और वेदल, जा पहुंची थी आगे!
रुकी, पल भर के लिए पीछे देखा! वो नौजवान, वहीँ खड़ा था, देख रहा था उसे! और आई होंठों पर मुस्कुराहट उसके! वेदल ने देखा, सामने किया चेहरा और तेज क़दमों से, दौड़ पड़ी, घराती के घर जाने के लिए!
वेदल, दौड़कर, हांफती हुई, चढ़ी हुई साँसें लेकर, घुस गयी थी घर में! लेकिन जी तो बाहर ही रह गया था उसका! उसका जी तो, अभी तक उलझा था उस नौजवान में! वो जितनी देर घर में रही, वो, वेदल न थी, बस वेदल की देह थी! उसकी आत्मा तो, घर के बाहर ही थी! और जब कोई घंटा बीता और चली वो बाहर, घर की दहलीज से बाहर झाँका, जैसे ही झाँका, पीछे हो गयी! वो खड़ा था अभी तक! पूरा घंटा वो खड़ा था उसके इंतज़ार में! दिल ज़ोर से धड़का उसका!
अब कैसे जायेगी वो?
कैसे? कहीं दिल की तेज धड़कती हुईं धड़कनें उसके सुनाई दे गयीं तो?
उसे फिर से झाँका, और कोई, नज़रे बिछाये खड़ा था, साफ़ था, बस उसी के इंतज़ार में! जैसे चोरी करते पकड़ी गयी हो वो! ऐसे, सीना ऊपर नीचे हो रहा था उसका! हलक़, सूखने लगा था, गले में, जैसे कांटे से चुभने लगे थे! लेकिन जाना तो था ही! सम्भल कर, एक पाँव रखा बाहर, और फिर दूसरा! और एक एक क़दम, मुश्किल से उठाते हुए, बढ़ चली आगे, सर ढक लिया था अपना उसने! वो क्षण, प्रतिक्षण, उस के करीब हुए जा रही थी! उसने, उस झीने से कपड़े में से, उसको देखा, वो भी जैसे घबराया हुआ था, कभी देखता, कभी सर नीचे कर लेता, फिर देखता, फिर दूसरी तरफ देखता, फिर देखता, और उस परिंदे को ढूंढता, जो उस वक़्त बोल रहा होता! उस युवक ने, अपनी कमर में, कटार खोंस रही थी, लम्बा-चौड़ा, ठाड़ा वो युवक, अपने आप में ही सिमटे जा रहा था!
वो गुजरी उसके सामने से, और वो युवक पीछे हुए, रास्ता दे दिया, पेड़ के नीचे जा खड़ा हुआ, वेदल, अपना दिल संभाले, उसके बांधे हुए, तेज क़दमों से, बढ़ती चली गयी आगे, और एक नज़र, पीछे देखा, देखा तो नज़रें अटकीं! और अगले ही पल, मुड़ गयी वेदल! अब वो, पीछे रह गया था, पीछे उस गली में! वेदल ने, तीन-चार बार पीछे देखा, वो युवक नहीं आया था! अब दिल सामान्य हुआ उसका, वो तेज क़दमों से, चल पड़ी अपने घर की ओर!
घर पहुंची, अपने हतः-मुंह धोये, अपने कमरे में गयी, बिखरे हुए केश संभालने के लिए, दर्पण निकाला! और जब दर्पण में खुद से नज़रें मिलीं, तो देखा न जाए! चोर झांके उसमे से! अब तो दर्पण भी बैरी हो गया उसका! देखा ही न जाए, केश संवारे, तो चोर हँसे! हंस हंस उसको मुंह चिढ़ाये! इसी ज़द्दोज़हद में, आखिर उसकी मुस्कान ने ही सहारा दिया उसे! चोर जीत गया और वो हार गयी! अब हुआ था समझौता! भले ही उसके हक़ में न था, लेकिन इस से बात बन गयी थी!
अब बस, दो दिन तक बारात और ठहरती! बस दो दिन! उसके बाद, वो कहाँ और वो कहाँ! अब तो पर्दा पड़ने का वक़्त आ चला था, और ये दिल की अठखेलियां, कुछ सुहानी सी यादें बन कर रह जानी थीं! फिर कौन कहाँ मिलता है!
जब ऐसा ख़याल आया, तो जैसे, हालात ने, उस सुलगते हालात ने, फूंक मारी, छिपी हुई आग में! आग, जो दिल में ही कहीं जल रही थी दोनों के! आग तो थी, लेकिन जलावन नहीं था, वो कहाँ से आये? जलावन के लिए, दीदार ज़रूरी था! और दीदार के लिए, हिम्मत चाहिए थी! अब हिम्मत कौन करे? वो? वेदल? वो तो मर ही जाती ऐसा कुछ कह कर ही!
तो? अब क्या किया जाए? कौन करे वो हिम्मत? कौन जुटाए ऐसा साहस? साफ़ पूछो तो वेदल में तो था ही नहीं ऐसा साहस! तो कौन? कौन करे?
वो? वो करे?
अब कौन समझाये उसे? कौन समझाए!
दोनों के दिल मोम बने हुए थे, एक दूसरे से मिलने को, एकरूप होने को तैयार! लेकिन, ऐसा हो कैसे? कैसे बने बात?
उस रात, नींद आँखों की दहलीज पर ना आई! दूर ही रही! कोई आभास ही नहीं दिया! बाहर, घुप्प अँधेरा था, कोई आवाज़ भी देता, तो भी कोई फायदा नहीं था! आँखों में ही कुछ उजाला था! खूब करवटें बदली गयीं! कई बार उठा गया! कई बार पानी भी पिया गया, बिना प्यास के! लेकिन अंदरूनी प्यास का क्या? वो कैसे बुझे?
आधी रात का वक़्त!
तारों से सजा आसमान!
उनके बीच, राजा से सिंहासनारूढ़ श्री चन्द्र देव!
खिड़की से आता उनका प्रकाश शीतल तो था, लेकिन उस पल तो जैसे, देह को फूंक रहा था! देह में जैसे उबाल लाने को तैयार था! रात के क्षण भी एक एक करके क्षय हुए जा रहे थे! भोर, अपना रथ हांके हुए, पूर्वांचल की ओर बढ़े जा रही थी! सारथि अरुण, वो तो अब तक तैयार हो चुके थे! बस, सूर्यदेव की ही प्रतीक्षा थी, कब वो आएं, विराजें, और चलें खगोलावलोकन करने!
उस घड़ी, दहलीज लांघ आई नींद! पलकों में जब शीतलता आई तो नींद के प्रभाव से, देह शिथिल हो गयी! आ गयी नींद! अब नींद में भी चैन कहाँ! वही क्षण! वही रूप! वही स्थान! बार बार आएं! होंठों पर, मुस्कान अपने आप भर आये!
और जब वो उठी, उस समय तो सूर्यदेव, एक चौथाई करीब भ्रमण कर चुके थे! आनन-फानन में हुई तैयार! जो गृह-कार्य थे, निबटाए! भोजन भी कर ही लिया था! शेष दिन, अब काटे न कटे! साँझ पकड़ना ऐसा था, जैसे किसी नव-सदी की प्रतीक्षा!
किसी तरह से वो दिन काटा!
उस से ही पूछो! पूछो कि कितनी गुहार लगाई थी उस दिन सूर्यदेव से उसने! अंततः सूर्यदेव को भी चिंता हुई और की दया! इस प्रकार, साँझ हो गयी!
साँझ का समय!
वही समय!
वही मार्ग,
वही गंतव्य,
वही चाह,
वही आकांक्षा!
चल पड़ी वो! बस आज का दिन और कल का दिन, बस दो दिन, दो दिन ही ठहरना था बारात को! फिर विदाई! वो चल पड़ी! सर नीचे किये! जैसे ही, मुड़ी, वही खड़ा था! उसके देखते ही, संयत हो गया था! चलती रही धीरे धीरे! और जैसे ही गुजरी समीप से, तो कानों में एक आवाज़ पड़ी! एक मर्दाना आवाज़!
"कल मध्यान्ह पश्चात, लूनी माँ मंदिर!" आई थी आवाज़!
एक एक शब्द! एक एक शब्द! जैसे अंकीर्ण हो गया उसके मस्तिष्क-पटल पर! वो तेज दौड़ पड़ी! जा घुसी उस घर में! लेकिन आज कोई कम न हुआ उस से! हाथ ही न चलें! बैठा ही न जाए! खड़ा भी न हुआ जाए! अजीब सी हालत!
और हिम्मत! दिखा दी थी हिम्मत उस युवक ने! लेकिन, वेदल के शरीर का तो रक्त जमे! शीतल होए! साँसें, भारी हों! देह में, कम्पन्न सी जगे! आँखों में, फुलझड़ियाँ सी जलें! दिमाग में, शोर सा मचे! उस शोर में, उसके वही शब्द गूंजें!
न रुका गया उस से! और लौट पड़ी वापिस घर के लिए! वो वहीँ खड़ा था! इंतज़ार करता हुआ! हाँक सी लगी थी पांवों में! पाँव तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे! फर से, नज़रें मिलीं एक दूसरे से! दूँ ही, अजीब सी नज़रों में बंधे! युवक की आँखों में सवाल! और वो ढूंढें उस सवाल का जवाब! उधर वेदल, न दे सकी जवाब आँखों में! न दे सकी! युवक ने आँखें बंद कर ली, फेरा मुंह और चल दिया वापिस! धीरे धीरे!
मुड़ने से पहले देखा वेदल ने! वो युवक, चले जा रहा था, चले जा रहा था वापिस, न देख रहा था पीछे! शायद, सवाल का जो जवाब मिला था, वो समझ नहीं पाया था!
"आ वेदल?" आई आवाज़,
हुई तन्द्रा भंग!
ये चचेरी बहन थी उसकी!
"कहाँ से आ रही है?" पूछा उस से,
"वहाँ से" बोली वो,
"अच्छा, चल, अब घर ही जाना है न?" पूछा उस से,
"हाँ" बोली वो,
"तो चल!" बोली वो,
"चल!" दिया जवाब!
और चल पड़ी घर के लिए वेदल!
पहुंची घर!
और आवाज़ गूंजी!
लूनी माँ मंदिर!
गाँव से थोड़ा सा ही बाहर था वो मंदिर! परसों, विदाई से पहले, वहीँ पूजन होना था माँ का, उसने बाद, बारात चली जानी थी वापिस!
क्या करना है?
जायेगी?
कल मध्यान्ह पश्चात?
जायेगी क्या?
माँ लूनी के मंदिर!
दो धार! दो धार पर खड़ी हो गयी वेदल!
यहां भी कतना ही था, और वहाँ भी! अब? जायेगी क्या? उलझ गयी! उलझा लिया अपने आप को! ले ली किसी से उलफ़त मोल!
अगला दिन! बोझिल दिन! अँखियों में, नींद के डोरे तैर रहे थे! कजरा बह चला था अँखियों के किनारों से! लेकिन वेदल की आँखें, वो सुंदर आँखें अभी तक, कुछ ख्याल लिए, देख रही थीं, उस शून्य में भी बहुत कुछ! जब शून्य में घूरा जाए तो कल्पना साकार हो उठती है! भले ही कुछ पलों के लिए ही! लेकिन वो पल, एक ज़िंदगी जीने से भी ज़्यादा अनमोल हुआ करते हैं!
मध्यान्ह का वो समय!
और कानों में गूंजते वो शब्द!
जलरहित मीन सादृश्य उसका मन! क्या करे वो? जाए? या न जाए? मंथन! मंथन से छनता उसका विश्वास! विश्वास की डोर! डोर में लचक! क्या करे वो? जाए, या न जाए? मन कुछ और कहे, और मस्तिष्क कुछ और! मस्तिष्क के प्रश्न, एक एक कर, मन से दिए गए तर्कों के बीच झूलें!
जाए? या न जाए?
समय के क्षण, क्षय हों!
और लिया, खुद को मथते हुए निर्णय! वो जायेगी! चली वो स्नानागार, किया स्नान! पहने वस्त्र! किया श्रृंगार! माँ को बनाया कुछ बहाना! दोपहर के समय, वैसे भी आवाजाही कम ही होती है गाँव देहात में! कहत भी आसपास नहीं थे, जो किसान ही ऊँघ रहे हों!
तो, निकल पड़ी वो घर से! पीले रंग के वस्त्र पहने! लाल रंग की छींटें थीं उसमे! फब रहे थे वस्त्र उसके! फबते भी कैसे न! उसकी देह ही ऐसी थी! मांसल देह, उजला रंग! कौन सा वस्त्र न फबता उस पर! चल पड़ी वो! माँ लूनी के मंदिर के लिए! एक पुराना सा मंदिर है वो, आज तो खंडहर भी नही बचा उसका, बस कुछ पत्थर ही बचे हैं! उन पत्थरों ने, देखी थी वो मुलाक़ात! मूक पत्थर, तब मूक न थे! वो तो अपने कान लगाये थे, सुन रहे थे कुछ शब्द और दो दिलों की धड़कनें!
वो चली जा रही थी! जैसे माँ लूनी के मंदिर के लिए, उसके पांवों में चाबी भर दी हो! किसी खिलौने की तरह, वो बढ़े जा रही थी! कैसे कैसे ख़याल थे उसमे मन में! पुलिंदा बने जा रहा था उन ख्यालों का! दिल, वो ऐसे धड़क रहा था कि जैसे आज ही सारी बची धड़कनें खतम कर लेगा!
और दूर से, उसको दिखा वो मंदिर!
दूर, गाँव से बाहर की तरफ! पेड़ों से घिरा हुआ!
वहीँ तो जाना था उसे!
लू चल रही थीं! सांय सांय हवा का ज़ोर पड़ता बदन पर उसके! कभी घाघरा संभाले और कभी सर पर रखा कपड़ा! कभी मुंह में दबाये उसे, कभी छोड़ दे! आँखें, ठीक वहीँ लगी रहीं! सधे सधे से क़दम, अपने आप बढ़ते चले गए! वो मंदिर, आता गया पास! और पास! और पास!
और अचानक से, रुकी वो!
ये मैं क्या कर रही हूँ?
कहाँ जा रही हूँ मैं?
क्या हो गया उसे?
रुक! सोच ले ज़रा! अकेली है तू!
ये फाटक, मस्तिष्क का फाटक, अचानक से, मस्तिष्क ने लगा दिया था! लेकिन मन! मन ने खोल दिया वो फाटक! सांकल टूट गयी उसकी! और क़दम, आहिस्ता से आगे बढ़ चले! वो आ गयी मंदिर की हद में, चली अंदर! छाँव पड़ी पेड़ों की! हवा चली! वस्त्र संभाले अपने!
चली, ढूंढते हुए किसी को!
थोड़ा सा और चली! लहलहाती भूड़ की घास, जैसे स्वागत करने को दौड़ी उसका! कण्टा की झाड़ी में खिले छोटे छोटे पीले फूल, जैसे खुश हो उठे उसे देख कर! अमरलता की बेल, जो पेड़ों पर चढ़ी थी, वो भी देखने लगी उसे! वो आगे बढ़ी! थोड़ा सा.और!
और वो खड़ा था वहाँ!
उसी के इंतज़ार में!
खड़ा था, और देख रहा था रास्ता!
वो ठिठक गयी! आँखों के आगे, कर लिया कपड़ा! घास पर चलने की आवाज़ हुई! जूतियों के चर्र-चर्र आवाज़ आई! रुक गयी आवाज़, उसके सामने, थोड़ी दूर पर!
"मुझे आशा थी! पक्की आशा, तुम आओगी!" बोला वो,
वो बोला, और हर शब्द पर, उसकी आँखें बंद हों! वेदल की आँखें!
"बहुत घरा देखा मैंने, तुम सा सुंदर नहीं देखा, सौगंध उठा कहता हूँ!" बोला वो,
हवा चली! उसके वस्त्र उड़ चले! थामे उसने! लेकिन तब तक! आँखों से कपड़ा हट चुका था उसका! उसने खींच कर, ठीक किया कपड़ा!
"मेरा नाम चंदन है, मैं धरणा में रहता हूँ, रहने वाला, सांगानेर का हूँ, सैनिक हूँ!" बोला वो, अदब के लहजे से!
धरणा! नाम ही पहली बार सुना था उसने तो! पता नहीं, कितनी दूर होगा यहां से! सैनिक, तभी ऐसा सजीला और रौबदार रूप है चंदन का!
"तुम्हारा नाम क्या है? जान सकता हूँ मैं?" पूछा उसने,
न बोल सकी वो!
बोलना चाहती तो थी, लेकिन शब्द नहीं मिले!
"नहीं बताना चाहतीं?" पूछा उसने,
"वेदल!" बोल पड़ी वो!
कैसे बोल पड़ी? पता नहीं? कैसे निकल गया नाम मुंह से, यक-ब-यक!
"वेदल! सही नाम रखा है तुम्हारा! सच में वेदल हो तुम!" बोला वो,
(वेदल, वो कलश जिसमे अमृत रखा जाता है)
"पानी पियोगी वेदल? भाटे में चल के आई हो?" बोला वो, और कंधे से, उतारा कुछ! का था वो, वेदल को पता नहीं चल सका, वो दरअसल, एक मुश्क़ थी! अब सैनिक था वो, तो सेना की तरह से ही माल-ओ-असबाब रखना, किसी सैनिक के लिए, कोई नयी बात नहीं!
"पियोगी?" पूछा उसने,
कोई जवाब नहीं!
"वेदल, अब पानी से कैसी शरम!" बोला वो,
नहीं बोली कुछ भी!
"पी लो वेदल?" बोला वो,
आगे बढ़ा थोड़ा सा, जैसे ही बढ़ा, वेदल पीछे हटी! रुक गया वो, वहीँ के वहीँ!
"ठीक है, ये लो!" बोला वो,
रख दी मुश्क़ नीचे, और हट गया थोड़ा सा पीछे!
"लो, अब पी लो!" बोला वो,
अब तो सर हिला कर, मना कर दिया!
"नहीं पीना? नहीं पीना?" पूछा उसने,
सर हिलाकर, फिर से मना कर दिया!
"ठीक है!" बोला वो,
आगे आया, और उठायी मुश्क़! खोली डोरी उसके मुंह से, और ऊपर उठा, भरने लगा पानी के घूँट! कनखियों से देखा वेदल ने उसे! गले की पेशियाँ, ऊपर-नीचे हो रही थीं!
पी लिया था उसने पानी, मुश्क़ का मुंह बाँधा फिर डोरी से, और लटका ली, बगले में, कंधे पर फीत लटकाये!
"कल वापसी हो जायेगी वेदल हमारी, फिर पता नहीं, कब आना हो, काम से फुरसत ही नहीं मिलती" बोला वो,
ये क्या कह रहा था वो? अब नहीं मिल पायेगा?
"तुम्हारा गाँव बहुत अच्छा है!" बोला वो,
चुपचाप सुनती रही!
"कभी शहर गयी हो वेदल?" पूछा उसने,
कोई जवाब नहीं!
"गयी हो?" पूछा उसने,
कोई जवाब नहीं!
अब वो भी चुप हो गया! और क्या सवाल करता!
"तुम तो कुछ बोल ही नहीं रहीं!" बोला वो,
वो बोल नहीं रही थी! सुन रही थी!
"अच्छा, अब चलता हूँ, तुम भी जाओ अब!" बोला वो,
और झाड़ने लगा अपने कपड़े, ऊपर से पत्ते गिरते जा रहे थे नीचे, सूखे पत्ते!
"वेदल, पता नहीं कब मिले अवसर!" बोला वो,
सच बात की थी उसुने! पता नहीं कब मिले अवसर!
"तुम याद रहोगी मुझे, हमेशा!" बोला वो,
तभी एक बर्रा आया उनके बीच! अपने हाथ से, कर दिया एक तरफ!
"ठीक है वेदल! अब चलता हूँ!" बोला वो,
वो पलटा, घास पर चलने लगा, जूतियों की चर्र-चर्र गूंजती रही, कुछ देर तक, कुछ दूर तक! और वेदल, उसको जाते हुए देखती रही! देखती रही, जब तक वो एक झुरमुट के बीच से जाते हुए ओझल नहीं हुआ! और चंदन, उसने तो पीछे मुड़कर भी नहीं देखा था!
पत्थर सी बनी रही वो, कुछ देर तक, और उसके बाद.....................
अब नहीं था वो, चंदन वहाँ! चला गया था वो, और वेदल, जैसे होश क़ाबिज़ हुए उसके! उसे पता चला, वो कहाँ है! अकेली, उस मंदिर में! क़दम मुड़े उसके! और हुई वापिस! धीरे धीरे! एक एक शब्द, जैसे छप गया था मस्तिष्क-पटल पर! उसका सवाल पूछना! उसका अपने आप जवाब देना! उसका वो मुश्क़ रखना! सब याद था उसे! वो लौट रही थी! बहुत कुछ लिए! चंदन! एक सैनिक! धरणा में था वो! धरणा, कोई शहर होगा, तभी तो पूछा था उसने, कि कभी शहर गयी हो! अपने आप में उलझी हुई, चली आ रही थी वापिस! उसका घर, बस अब पास में ही था! चंदन! उसकी शख़्सियत, उसके ज़हन में बस गयी थी! और इस तरह, यादों में, कुछ लम्हे जोड़े, वो लौटी अपने घर! माँ, अनाज फटकार रही थी, एक नज़र देखा वेदल को, और वेदल, अनजान सी, चली गयी अपने कमरे में! कमरे में गयी, और लेट गयी! दोपहर की तपती दोपहरी में, कुछ पल, चुरा लायी थी चंदन के!
कल, लौट जायेगी बारात! और बारात में आया वो सैनिक, चंदन भी! फिर? फिर क्या होगा? क्या कभी.............मिल पाएगी वो?
इसी उधेड़-बुन में, लगी, फंसी हुई, अपने ही सवालों में घिरी हुई वेदल, लौट रही थी! नीचे देखते हुए, बेदम से क़दमों से आगे बढ़ती जा रही थी! सूरज चमक रहा था! उसका साया, उसे से आगे पड़, राह दिखा रहा था उसे! वो बढ़े जा रही थी अपने घर के लिए! आई गाँव की सरहद, और वो उस बड़े से पीपल के पेड़ के नीचे से निकली! हवा चली, और पीपल के पत्ते खनके! उन पत्तों की खनक उस समय, उसके दिल की धड़कनों से ताल सी बाँध गयी!
कुछ पल, रुकी वो, पीछे देखा, कुछ नहीं! बस, ताप की अगन और उस से बनती हुई वो मरीचिका! अब सामने देखा उसने, और रुके हुए क़दम आगे बढ़े! चल पड़ी, सवालों का लबादा ओढ़े हुए! धीरे धीरे क़दम, बोझिल होते गए! और इस तरह, अपने घर में दाखिल हो गयी वो! सीधा स्नानागार में गयी, हाथ-मुंह धोये, ठंडा पानी चेहरे को लगा तो जैसे होश में आई! पोंछे उसने हाथ-पाँव और चेहरा, लटकाया बाहर, वो कपड़ा, आई एक तरफ, दीवार में बने एक आले में पानी का घड़ा रखा था, पानी निकाला, और पिया पानी! प्यास लगी थी उसे बहुत! पानी पी, अपने कमरे में लौटी! कमरे में आई तो लेट गयी! झरोखे से, बाहर की हवा आई अंदर! कुछ खबर लाती थी वो हर बार! खबर ये, कि चंदन अभी तक, गाँव में ही है! बस, आज ही एक अवसर मिलेगा, उसे देखने का! उसके बाद, वो कहाँ और वो कहाँ! और यही सोच, वो कसमसा जाती थी, जैसे कोई कपड़ा, निचोड़ा जाए तो, कसमसाया करता है!
साँझ होने में अवेर थी अभी! तब तलक तो, जी से जान ही चली जाती! क्या करती बेचारी! भूख भी न लगी थी! माँ आई थी पूछने भोजन की, तो मना कर दिया था उसने! अब दिल की लगी को कोई कैसे समझाये! दोपहर, दोपहर तो जाने का नाम ही न ले! कितनी करवटें बदलीं उसने, याद नहीं! कभी सीधी लेटे तो कभी पेट के बल! जी करे कि अभी चली जाए वो दुबारा! और बैरन नींद तो आये ही नहीं! नींद तो उड़ ही गयी थी! बुरा हाल था उसका!
किसी तरह से साँझ ढलने के आसार हुए! और वो, चलने को तैयार हुई उस घर! उस घर, तो बहाना था! उसे तो, नज़र भर देखना था वो सैनिक! तो चली वो, धड़कते दिल से! मुड़ी उस गली में, तो लगा धक्का! वो नहीं था आज वहाँ! खूब देखा! ना! नहीं था वो आज वहाँ! चाल मंद पड़ी! और चली उस घर! जा पहुंची, जो काम करना था, हाथ बंटाना था, आधे मन से पूरा किया! और जब चलने का वक़्त हुआ, तो जैसे पांवों में लगे पहिये! दौड़ सी चली बाहर! देखा सामने, नहीं था वो!
क्यों?
क्या हुआ?
कहाँ है वो?
आया क्यों नहीं?
वो तो उसके कहने पर, मंदिर तक गयी थी?
फिर?
कहाँ है वो?
मन में, सैंकड़ों सवाल! जवाब, था ही नहीं किसी का! कहाँ है? क्या हुआ? उसने बात नहीं की थी, शायद, इसीलिए नहीं आया वो! हाँ, यही बात है! ओह! उसे क्या पता था, ऐसा भी होता है? काश, दोपहर फिर से आये! आज वाली दोपहर! वो बात करेगी! करनी ही होगी! वो तो कर ही रहा था न बात? चूक हो गयी उस से, नहीं! अब वो बात करेगी उस से!
लेकिन?
कल?
कल तो लौट जाएगा वो? वापिस? फिर? अब क्या करे वो? अब कैसे मिले उस से? कैसे बात हो? हाथों में, पांवों में, पसीना छूटने लगा! दिल, आशंकाओं से भर उठा! दबे हुए क़दमों से, लौट रही थी, और जैसे ही मुड़ी, वो खड़ा था!
"वेदल! कल सुबह मिलना, भोर के बाद, वहीँ!" बोला वो, और चलता गया सीधा!
कल सुबह! भोर के बाद! यही सुना उसने!
अब आई जान में जान! क़दमों में आई जान! पड़ा जी को चैन!
वो रात!
ऐसी लम्बी रात!
कभी न भोगी!
कैसी लम्बी रात! छोर ही न मिले!
और सुबह! भोर का समय! वो तो, तैयार ही थी! निकल पड़ी घर से, लूनी माँ के मंदिर! क़दम तेज पड़ रहे थे उसके! कभी भागती, कभी तेज चलती!
और पहुँच गयी!
चली उधर!
खड़ा था वो उधर!
चली उस तरफ! साँसें थामीं अपनी! रुकी! कपड़ा आँखों के आगे किया!
"वेदल!" बोला वो,
जब नाम लेता था वो, अपने मुंह से, तो रस सा घुल जाता था कानों में!
"आज चला जाऊँगा मैं वेदल!" बोला वो,
बस, ये चले जाना ही कड़वा था!
"वेदल, जी लगा है तुमसे, कैसे रहूँगा?" बोला वो,
अपने जी की तो कह दी थी उसने!
"वेदल? एक बार, अपना चेहरा दिखा दो!" बोला वो, एक गुहार सी थी उसके लहजे में!
ना! ना! ऐसा साहस कहाँ वेदल में!
"वेदल?" बोला वो,
ना! सम्भव नहीं!
"तुम्हारी इच्छा!" बोला वो,
कुछ पल, दोनों चुप!
एक दूसरे को, बस नज़रों में भरें!
"मैं पड़वा को आऊंगा, यहीं, तुम्हारे इंतज़ार में, आओगी न? दोपहर में?" पूछा उसने,
पड़वा! पड़वा आने में तो अभी चौदह दिन हैं!
"बताओ वेदल?" बोला वो,
कुछ न बोली वो! बोल ही न सकी!
"आओगी न?" पूछा फिर से,
ना बोली कुछ!
"वेदल, जवाब दो?" बोला वो,
नहीं बोली कुछ भी! नहीं बोली!
"मैं बहुत दूर से आऊंगा वेदल, तुम्हारे लिए, यहीं!" बोला वो,
इंतज़ार किया, जवाब का, वेदल के जवाब का!
"ठीक है, नहीं आना..........." बोला वो,
हटा पीछे!
"तुम्हारी मरज़ी, नहीं आना!" बोला वो, सर नीचे किये हुए!
"आओगी न?" पूछा फिर से! मज़बूर था! क्या करता!
कोई जवाब नहीं! कोई हाँ-ना नहीं!
"ठीक.........ठीक वेदल...........जैसी तुम्हारी मरज़ी........." बोला वो,
"ठीक है, ठीक है वेदल, मैंने इसिलए तुम्हें बुलाया था कि बता दूँ, पड़वा के रोज, दोपहर में, मैं यहां आऊंगा!" बोला चंदन,
चुपचाप सुने वेदल! बोले कुछ नहीं!
"अब चलूँगा, तुम भी लौट जाओ, मैं मिलूंगा पड़वा के रोज!" बोला वो, और हटा पीछे, मुड़ा और चलने लगा वापिस!
"सुनिए?" आई उसे आवाज़ पीछे से!
एक झटके से रुका वो! देखा वेदल को! लौट तेजी से!
"वेदल? तुमने पुकारा?" पूछा उसने,
सर हिला कर, हाँ कही वेदल ने!
"बोलो वेदल? बोलो!" बोला वो, गुहार सी भरी लहजे में!
"आउंगी मैं!" बोली वो,
जैसे बौछार पड़ी हो! जैसे तपते बदन पर, झुलसे बदन पर, रिमझिम सी बौछार पड़ी हो, ऐसे खुश हुआ वो चंदन! ऐसे खुश!
"जितनी तुम सुंदर हो, उतनी आवाज़ भी सुंदर है तुम्हारी!" बोला चंदन!
शरमा सी गयी! लेकिन, अपने होंठों पर आई, मुस्कान न छिप सकी उस से!
"वेदल?" बोला वो, इस बार थोड़ा समीप आया!
"अपना चेहरा दिखा दो? मैं कैसे रहूंगा बिन तुम्हारे?" बोला वो सैनिक!
कैसे दिखा दे वो चेहरा! कैसे! कहाँ से लाये वो हिम्मत!
"वेदल, ये एहसान और कर दो मुझ पर, एक बार, बस एक बार वेदल!" बोला वो,
पत्थर सी बनी रही! न ही हिले, न ही डुले!
वो आगे आया! थोड़ा सा आगे! उसके, कंधे तक आये वेदल! अपने हाथ बढ़ाये आगे! और आगे, पकड़ा वो सर का कपड़ा, और उठा दिया! पीछे हट गया!
और वेदल! उसकी आँखें बंद!
और चंदन, भौंरे सा, रसपान करे!
"बहुत सुंदर हो तुम वेदल! बहुत सुंदर!" बोला चंदन!
वो पीछे हट गया था!
और तभी, सर झुकाये, कर लिया कपड़ा आँखों पर वेदल ने!
"कैसे रहा जाएगा? कैसे? मैं कैसे रहूंगा?" बोला वो,
और यही सवाल, वेदल के दिल में कुलांच भर रहा था! कैसे? अब, कैसे?
"कुछ लाऊँ तुम्हारे लिए वेदल? शहर से?" पूछा उसने,
सर हिला कर, न कहा!
"चलो, वो मैं देख लूँगा!" बोला वो,
कुछ पल, ऐसे ही बंधे-बंधे से गुज़रे!
"ठीक है वेदल, अब जाऊँगा, तुम भी लौटो, अब, पड़वा के रोज मिलूंगा!" बोला वो,
और, पलट कर, लौट पड़ा! लम्बे लम्बे डिग भर, लौटने लगा, वेदल, उस झीने कपड़े में से, उसको जाते देखती रही! चंदन ने भी कई बार देखा उसे! रुक रुक कर!
चला गया था वो!
और वेदल, घर लौटी!
दोपहर में, नहीं गयी वो मंदिर! नहीं किया मन!
और बारात, दोपहर में, विदा हो गयी!
चला गया चंदन!
कुछ ले गया, और कुछ दे गया!
अब पड़वा!
पड़वा का इंतज़ार!
दो हफ्तों का इंतज़ार!
मत पूछो कि कैसे कटे वो दो हफ्ते!
कई बार जी किया, कि उड़ कर चली जाए वो! बन जाए चिड़िया! कह सुनाये अपना हाल! और चंदन, चंदन का भी वही हाल! देह वहां, मन यहां!
और आई पड़वा!
पड़वा की भोर!
एक सुकून भरे दिन की शुरुआत! बस! अब कैसे भी, दोपहर हो! कैसे भी!
और हुई दोपहर!
एक छोटे से गागर में, पानी भरे, चल पड़ी वो लूनी माँ के मंदिर की ओर! जन, कितनी दूर से आएगा वो! उस तपती दोपहरी में! इसीलिए, पानी भर ले गयी थी!
पहुंची मंदिर! रखा गागर एक साफ़ जगह! और जा बैठी उस बड़े से पीपल के पेड़ के नीचे! कान, हर तरफ लगे! नज़र, हर जगह बिछी! ढली दोपहर! और दूर से, किसी घोड़े की हिनहिनाहट गूंजी! वो उठी! देखा आसपास! उस रास्ते को, जहां से चंदन को आना था!
घोड़े की टाप आती गयी पास!
पहले तेज, फिर धीरे धीरे!
आई आवाज़ उसे! सूखी घास पर, कोई घुड़सवार, बढ़े चला आ रहा था! आया नज़र उसे! सफेद वस्त्र पहने, बुक्कल मारे, आ रहा था वो! घोड़े पर बैठा, पेड़ों की टहनियों को धकियाते, वो चला आ रहा था! दिल ज़ोर से धड़का उसका!
घोड़ा रुका!
उतरा वो, देखा वेदल को! हटाई बुक्कल! मुस्कुराता चेहरा! हटाई घोड़े की जीन उसने, तलवार, सही की अपनी, पीछे देखा, कुआं था, चला कुँए की तरफ! तो दौड़ पड़ी वेदल भी! झट से पानी का बरतन, डाला कुँए में! और खींचने लगी पानी!
"वेदल, रुको! रुको!" बोला वो,
और चला उसके पास, पहुंचा, देखा आँखों में वेदल के! ले ली रस्सी!
"कैसी हो वेदल?" पूछा उसने,
कुछ न बोली वेदल! आँखों से ही बात की, बता दिया कि अच्छी नहीं हूँ! बहुत इंतज़ार किया है उसने! बहुत ज़्यादा!
खींची बाल्टी कुँए से, चंदन ने, और भरा पानी एक हौज में! घोड़े ने, नथुने फड़काए! उसको पानी पीना था! प्यासा था बेचारा! लगा दिया मुंह अपना, उस हौज में!
अब पानी खींचे चंदन, और भरता जाए! कम से कम पंद्रह बाल्टी खींची होंगी उसने! घोड़े ने पानी पी, अपने आप को, तरोताज़ा कर लिया था!
"बहुत याद आती है तुम्हारी वेदल!" बोला वो,
वेदल, शरमाये! लरज जाए!
"ये लो!" बोला वो, निकाला था कुछ जेब से!
वेदल, उस थैली को देखे!
"लो?" बोला वो,
न ले वेदल!
"लो न वेदल? तुम्हारे लिए लाया हूँ!" बोला वो, थैली आगे बढ़ाते हुए!
अब ना ले वो! देखे जाए!
"ओहो! लो!" बोला वो,
जब नहीं ली, तो थैली खोल ली उसने! निकाले अंदर से उसने, दो कड़े! बेहद सुंदर! बेहद शानदार!
"लो! पहन लो! बहुत अच्छे लगेंगे तुम्हारे हाथों में!" बोला वो,
कैसे ले ले वो!
क्या कहेगी घर में वो सबसे?
कैसे बताएगी?
भांप गया वो, सैनिक था, भांप गया!
"कह देना, रास्ते में मिले थे!" बोला वो,
रास्ते में?
नहीं! कैसे कर दे वो अपमान उनका? नहीं! ऐसा नहीं कर सकती वो!
"जी न दुखाओ वेदल! ले लो!" बोला वो, वापिस थैली में डालते हुए उनको! बढ़ा दी थैली आगे! कर दिया अपना हाथ आगे, और ले ली वो थैली!
"आज, भोर होते ही, मैं चल पड़ा था!" बोला वो,
भोर होते ही? इतनी दूर है धरणा? आधा दिन चला वो? उस से मिलने के लिए? आँखों में, झाँका तभी वेदल ने उसकी!
"कितनी दूर है धरणा?" पूछा वेदल ने!
"कोई पचास कोस मान लो!" बोला वो,
"इतनी दूर?" पूछा वेदल ने!
"तुम्हारे लिए तो मैं कहीं भी पहुँच जाऊं वेदल!" बोला चंदन!
आ गयी मुस्कुराहट होंठों पर वेदल के!
"कितनी सुंदर लगती हो, जब मुस्कुराती हो वेदल!" बोला चंदन!
आँखें उलझ गयीं दोनों की!
"मेरी एक एक सांस क़ुरबान तुम्हारी एक एक मुस्कुराहट पर!" बोला चंदन!
झुका लिया सर वेदल ने!
बहुत भारी से शब्द थे वो, उसके लिए!
"ऐसे ही हमेशा मुस्कुराते रहना वेदल!" बोला वो,
एक बार फिर से, मुस्कुरा पड़ी वो!
"पाने पियोगे?" पूछा वेदल ने,
"हाँ, लाया हूँ पानी!" बोला वो,
"मैं लायी हूँ, ताज़ा है!" बोली वो,
"चलो पिलाओ!" बोला वो,
उठी वेदल, और लायी गागर उठा कर,
"लो!" बोली वो,
हाथ की ओख बनाई उसने, और पीने लगा पानी, देखता रहा उसको! उसकी बड़ी बड़ी आँखों में!
"बस!" बोला वो,
"इसमें डाल लो ये पानी!" बोली वो,
"ये मुश्क़ है वेदल!" बोला वो,
"हाँ, वही!" बोली वो,
खोली उसने, मुश्क़, और भरा पानी उसमे! बाँध दिया मुंह उसका और लटका ली कंधे पर!
"घर में कौन कौन हैं?" पूछा वेदल ने,
"सब हैं, एक बहन, ब्याह हो गया उसका, एक बड़े भाई, ब्याह हो गया उनका भी, माँ है, पिता जी हैं, और मैं!" बोला वो,
"सेना में कब से हो?" पूछा उसने,
"चार साल हुए वेदल!" बोला वो,
"ब्याह नहीं किया?" पूछा वेदल ने,
"ना!" बोला वो,
"क्यों?" पूछा उसने,
"इंतज़ार था, अब पूरा हुआ!" बोला वो,
"कैसा इंतज़ार?" पूछा उसने,
"तुम्हारा इंतज़ार!" बोला वो,
और जब समझी वो, तो चेहरा लाल हो गया उसका!
"अब हुआ इंतज़ार खत्म! अब ब्याह भी हो जाएगा!" बोला वो,
शर्म की चादर कुछ ऐसी पड़ी, कि लालम-लाल हो गयी वो!
"बनोगी ने मेरी ब्याहता?" पूछा उसने,
अब तो लालम-लाल में सुर्खी चढ़ी! कई बार पूछा उसने! और वेदल! सर हिला कर, हाँ कह ही दिया! या, कहना ही पड़ा!
"वेदल, अब वक़्त हुआ, अब चलूँगा, तो रात तक पहुँच जाऊँगा!" बोला वो,
गुज़र गया वक़्त?
इतनी जल्दी? पता भी नहीं चला?
अभी तो आया था चंदन!
"उठो! अब जाओ, आऊंगा मैं, पड़वा को! यहीं, इसी वक़्त!" बोला वो,
उठी, अधमरी सी! जान ही ना बाकी देह में!
"जाओ वेदल! वक़्त हुआ!" बोला वो,
न जाए! वहीँ खड़ी रहे!
"जाना ही होगा वेदल, मज़बूरी है! लेकिन आऊंगा!" बोला वो,
न जाए! न बढ़ाये क़दम!
"जाओ, जब तुम चली जाओगी, तो जाऊँगा मैं!" बोला वो,
"नहीं, आप जाइए पहले!" बोली वो, बिन आँखें मिलाये!
"अच्छा! अब चलता हूँ, आऊंगा वेदल, अवश्य ही आऊंगा!" बोला वो,
और चला घोड़े की तरफ! लगाई जीन घोड़े पर! चढ़ा उस पर, लगाई हाँक! आया उसके पास!
"जा रहा हूँ वेदल, एक बार देखो!" बोला वो,
सर उठाया अपना वेदल ने, और आँखों में आंसू!
"ये क्या? वेदल? वेदल?" बेचैन सा हो गया वो, उतरने लगा घोड़े से, और वेदल, भाग छूटी! वो देखता रहा उसे! दिल धड़क उठा उसका! ले गया घोड़े को आगे! देखता रहा! जब तक, वो ओझल न हो गयी!
अब लगाई एड़, मारी बुक्कल और दौड़ पड़ा घोड़े की लग़ाम खेंच!
चला गया चंदन! वापिस! धरणा!
और वेदल!
ऐसे तड़पे! ऐसे तड़पे जैसे देह का खून पानी हुआ जाए!
किस से कहे!
किसको सुनाये दुखड़ा!
एक एक दिन कैसे कटे, वो ही जाने!
व्यवहार बदला, तो घरवालों को भी शंका हुई! उस से पूछा जाता तो कुछ न कहती! ज़्यादा पूछते, तो रो पड़ती! अब पिता की लाड़ली से कौन कुछ कहे!
सुलगन!
वो सुलगन, जिसे एक फूंक का इंतज़ार!
अंदर ही अंदर जले!
न दिन ही कटे न रात!
न दोपहर ही बीते और न साँझ!
तो इस तरह,
वो दिन भी काट दिए!
आया वो दिन! आई वो पड़वा! उस दिन तो चहक उठी वो! जैसे अल्हड़ पवन, किसी खलिहान को रौंदे! ऐसी खुश!
आई दोपहर!
मन खिले! तन खिले!
और चल पड़ी वो, गागर लेकर, उस मंदिर की ओर! जा पहुंची! गयी कुँए तक! खींचा पानी! भरी खोह! घोड़ा पानी पीता, इसीलिए भरा पानी!
आ बैठी एक जगह!
लड़ाई नज़र दूर!
आ रहा था! आ रहा था कोई, दूर से! धूल फांकता हुआ! उस तपती दोपहरी में, दौड़ता हुआ! वो हुई खड़ी! देखने लगी! वो आ रहा था! हुआ धीरे धीरे धीमा!
और, उसका घोड़ा, नथुने फड़कता हुआ, आ रहा था! धीरे धीरे! उसकी टाप, पास आती चली गयी! रुका घोड़ा! उतरा चंदन! खोली बुक्कल! खोली जीना, और घोड़ा, अपने आप चले, पानी पीने के लिए! आया चंदन, वेदल के पास!
देखा एक दूसरे को उन्होंने!
वेदल! न रोक सके अपने आप को! लिपट गयी चंदन के सीने से! चंदन को जैसे जी का सुकून मिला! भर लिया अपनी मजबूत भुजाओं में वेदल को! कुछ पल ऐसे ही! ऐसे ही!
"कैसी हो वेदल?" पूछा चंदन ने!
न बोले कुछ! कुछ भी न बोले! एक शब्द भी नहीं!
"वेदल? वेदल?" पूछा दो बार!
न आये कोई जवाब!
हटाया उसे, देखा चेहरा, आंसू बह रहे थे वेदल की आँखों से!
"नहीं वेदल! नहीं! जी फटता है मेरा, नहीं वेदल!" बोला वो, उसके आंसू पोंछते हुए!
और वेदल, उन चौदह दिनों का इकठ्ठा सैलाब, बहाने को आतुर! वो समझाये जाए, वो आंसू बहाये जाए!
"नहीं वेदल!" बोला वो,
बहुत समझाया, और तब, आंसू थमे उसके!
मुस्कुराया वो! उसका चेहरा उठाते हुए!
"प्यास लगी है! पानी, लायी हो?" पूछा उसने,
हटी! और चली एक तरफ! उठाया गागर उसने! लायी उसके पास!
"लो!" बोली वो,
उसने ओख बनाई हाथ से, और पी लिया पानी! पोंछा मुंह!
"ये लो, बाकी डाल लो इसमें!" बोली वो,
"ये मुश्क़ है!" बोला वो,
"हाँ, वही!" बोली वो!
भर ली मुश्क़ उसने! और बचा हुआ पानी, पी लिया! अपने चेहरे पर मारा और धो लीं आँखें!
"आओ वेदल! वहां बैठते हैं!" बोला वो,
और चल दिए वो उधर, उस पेड़ के नीचे, अपना कपड़ा बिछा दिया था चंदन ने!
"आ जाओ!" बोला वो,
और हाथ पकड़, बिठा लिया अपने पास वेदल को!
"बहुत याद आती है तुम्हारी वेदल, क्या करूँ, पक्षी होता, तो रोज चला आता!" बोला वो,
और वेदल किस से कहे?
"जानता हूँ, तुम्हें भी आती होगी! बस कुछ माह और!" बोला वो,
"कुछ माह?" पूछा वेदल ने!
"हाँ, उसके बाद, ले जाऊँगा ब्याह के तुम्हें!" बोला वो, सर पर हाथ रखते हुए, वेदल के!
शरम से चेहरा हुआ लाल उसका!
"मेरी बदली हो जायेगी, मैं और पास आ जाऊँगा, फिर तो दो तीन बार मिल सकता हूँ हफ्ते में!" बोला वो,
मन ही मन! हुई प्रसन्न! लूनी माँ से, मांगी दुआ!
"वेदल?" बोला वो अचानक से,
"हाँ?" चौंक कर पूछा वेदल ने,
"कड़े कहाँ हैं?" पूछा उसने,
"घर में!" बोली वो,
"पहने नहीं?" पूछा उसने,
"पहन लूंगी!" बोली वो,
"कब?" पूछा उसने,
"कुछ माह बाद!" बोली सर झुकाते हुए!
मुस्कुरा पड़ा चंदन उसके इस जवाब से!
"तब तो कोई कमी नहीं छोड़ूंगा! ढक दूंगा अपनी वेदल को!" बोला वो, अपनी बाजूओं में भरते हुए उसको!
और वेदल, मन ही मन फूले!
मित्रगण!
पता नहीं, प्रेमियों की ही क्यों परीक्षा लेती आई है होनी! या भगवान! पता नहीं क्यों!
चंदन और वेदल का प्रेम, परवान चढ़ता रहा!
छह महीने बीत चुके थे! चंदन, अपने वायदे के मुताबिक़, महीने में दो बार आता, मिलता उस से, प्रेम भरी बातें होतीं, खो जाते एक दूसरे में वो! वो आता और चला जाता! हमेशा, कुछ न कुछ लाता वो वेदल के लिए! कभी अंगूठी, कभी नथनी, कभी कड़े, कभी वस्त्र-प्रधान, श्रृंगार का साजो-सामान! बहुत सच्ची मुहब्बत करता था वेदल से चंदन!
कभी-कभार टोक दिया करती थी वेदल उसे!
"कुछ माह? कुछ और माह!" बोलती थी वो,
हँसता चंदन! उसे भी हंसाता! देता जवाब!
सातवें महीने में, उसकी बदली होनी थी, नहीं हो पायी! ये जब बताई वेदल को, तो थोड़ा परेशान तो हुई, लेकिन कोई बात नहीं! वो आता था, माह में दो बार!
आठवें माह,
वो पड़वा..........
बीत गयी, वो दोपहर, बीत गयी!
ऐसा पहले कभी न हुआ था! वो अपने वचन का पक्का था! जो कहा, सो किया, सो ही करता था, लेकिन उस दिन, नहीं आया वो! जाने क्या हुआ था!
वापिस हुई, गागर उठाये हुए वेदल,
पानी भी गरम हो चुका था गागर का,
नहीं आया उस दिन वो.............
खूब राह तक़ी,
खूब इंतज़ार किया,
खूब नज़रें पथरायीं,
नहीं आया था चंदन...........
हारी सी, थकी सी, टूटी सी वेदल, लौट चली घर..........
आशंकाओं ने, अट्ठहास लगाना शुरू किया!
सर फटने को हो!
जी फटे, दिल चिरे, कलेजा मुंह को आये!
क्या वजह हुई?
क्या कारण बना?
हुआ क्या?
क्यों नहीं आया चंदन?
क्या बात बनी?
सवाल, नाचें दिमाग में उसके!
ये कैसी पड़वा पड़ी? कैसी भारी?
धड़कनें काबू से बाहर हों! सोच सोच, मितली सी आवे!
रात आई, कैसे अँधेरी रात वो! कैसा सन्नाटा! कैसा गहन अंधियारा! लोग चैन की बंसी बजाएं और वो वो बेचारी, अकेली, अपने कमरे में, टिमटिमाती बाती को देखा, आंसू बहाये! क्या हुआ? कुशल से तो हैं न? कैसे खबर लगे? कैसे पता चले? और दूजी पड़वा? वो बहुत दूर है अभी..................
न रुकें आंसू, पोंछे ही नहीं, बहते ही रहें!
और रात!
जैसे घन-गहन कर, नाच करे! उसे डराए! उपहास उड़ाए!
अँखियों की किनारियों पर, रुके आंसुओं की बूंदों में, बस वो ही दिखाई दे! वो ही! बाती, झिलमिला जाए! फिर से वही सवाल!
क्या हुआ?
आज हुआ क्या?
वो आया क्यों नहीं?
क्या बात रही?
उठ बैठी! झरोखे से बाहर झाँका! चांदनी तो खिली थी, लेकिन आज शीतल नहीं थी, उसमे तो अंगार भरी थी उस रात!
"ओ चंदा! तू ही खबर दे दे?" निकले मुंह से बार बार!
चंदा, चंदा का स्वरुप, आँखों के आंसूओं में, झिलमिला जाए!
बावरी! प्रेम-बावरी!
अपने आप से बावरी!
देह यहां, प्राण कहाँ!
आधी रात बीती!
आधी जान गयी! पता नहीं, पड़वा तक, बचूं भी कि नहीं!
ऐसा हाल उसका!
और घर में,
आये अगले दिन कुछ मेहमान! मेहमान आये, तो खबर लाये! खबर ये, कि अब वेदल, ब्याह की उम्र में है! हो जाना चाहिए ब्याह! एक अच्छा रिश्ता है! लड़का बहुत सुसंकृत परिवार से है, जैसा घर चाहिए वेदल के लिए, ठीक वैसा है! और वेदल, जैसे राज करेगी वहाँ!
और वेदल हमारी! किसी से कुछ न बोली, गागर उठा, पानी भर, बेसुध सी, चल पड़ी, लूनी माँ के मंदिर! माँ ने पूछा, तो कह दिया कि मंदिर जा रही है, आ जायेगी जल्दी! चल पड़ी प्रेम-बावरी! नज़रें सामने गड़ाए हुए! उस रास्ते पर, जहां से आता था चंदन! कदम बहक जाते थे उसके, गागर छलक जाता था, छलकता, तो गीला कर देता था वेदल को! उस तपती दोपहरी में, चली जा रही थी वो उस मंदिर के लिए! हो सकता है, आज आ जाए वो? कहीं, दिन का फेर हो गया हो?
आ पहुंची मंदिर वो.............रख दिया गागर, एक जगह छाँव में, जा बैठी पेड़ के नीचे, और लगा दीं आँखें सामने! पक्षी चहचहा रहे थे, लेकिन शांत भी हो जाते थे, पेड़ हवा से, अपनी शाखें हिलाते तो धूप सेंध लगा देती ज़मीन पर आने को! वक़्त कब से क्या हो गया पता नहीं चला! अब तो आँखें भी पथरा चली थीं! नहीं आया था चंदन अभी तक! लेकिन उम्मीद की बाती अभी तक टिमटिमा रही थी!
दोपहर ढली, शाम की सरहद बढ़ी आगे!
"वेदल? ओ वेदल?" आई आवाज़ उसे!
देखा पीछे, तो ये पूर्णा थी, उसकी चचेरी बहन! आ गयी उसके पास!
"तू यहां क्यों बैठी है, अकेले?" पूछा उसने,
अकेली? कहाँ है वो अकेली? उसकी उम्मीद है न साथ?
नहीं दिया जवाब, देखा तक नहीं उसे!
अब बैठी साथ वो उसके, रखा कंधे पर हाथ उसके,
"क्या बात है?" पूछा पूर्णा ने,
न दिया जवाब कोई!
"किसी का इंतज़ार है?" पूछा पूर्णा ने,
अब देखा पूर्णा को उसने, और आँखों में, पानी झिलमिलाया!
"अरे? क्या बात है वेदल? बता? बता मुझे?" बोली पूर्णा, घबरा कर!
न बोली कुछ! बस, सुबक उठी!
"क्या बात है? बता न? देख, ताई आने वाली है, तुझे पूछ रहे थे, तब मुझे भेजा, बता? क्या बात है?" पूछा पूर्णा ने,
न बोली कुछ!
बस, हाथ बढ़ाया सामने, इशारा किया सामने की ओर!
"क्या है वहाँ?" पूछा पूर्णा ने,
कोई होता तो दीखता?
"कौन है?" पूछा पूर्णा ने,
कुछ न बोली, बस सुबके जाए!
"किसी की राह तक रही है? किसकी?" पूछा पूर्णा ने,
न बोली कुछ! सर झुका लिया और आंसू टपके!
पूर्णा को कुछ समझ न आया, कुछ भी! लगा लिया उसे छाती से!
"मुझे बता? बता मुझे?" पूछा पूर्णा ने,
लेकिन नहीं बताया! कुछ भी नहीं!
"पूजा कर ली न? अब चल वापिस, पानी लाती हूँ, मुंह धो ले, चल घर वापिस, नहीं तो आ जाएंगी ताई यहां, चल, खड़ी हो?" बोली पूर्णा, और लेने चली पानी, खींचा पानी, लायी उसके पास,
"ले, धो ले मुंह!" बोली पूर्णा,
उसका मुंह धुलवाया उसने, पोंछा भी,
"अब चल!" बोली वो,
चली एक तरफ, और उठा लिया गागर अपना, चल पड़ी! राह को फिर से देखा!
सूनी राह! कुछ नहीं! तपती ज़मीन! बंजर ज़मीन!
"चल अब, ला, मुझे दे ये!" बोली पूर्णा,
न दिया गागर उसे, चलती रही, अब घर के लिए चली!
पहुंची घर दोनों!
मेहमान, कमरे में थे दूसरे!
"क्या कर रही थी ये?" पूछा माँ ने, पूर्णा से,
"पूजा कर, बैठी थी!" बोली पूर्णा!
"कोई और भी था?" पूछा माँ ने,
"न" बोली वो,
"अकेली?" पूछा माँ ने,
"हाँ" बोली पूर्णा,
माँ मुड़ी, और चली कमरे की तरफ, वेदल के, वेदल, लेटी हुई थी, माँ आई, तो एक बार नज़र भर के देखा माँ को,
"वेदल?" बोली माँ, साथ में बैठते हुए,
कुछ न बोली!
"सुन रही है?" बोली माँ,
"हूँ" बोली वो,
"क्या कर रही थी वहां?" पूछा माँ ने,
न बोली कुछ भी!
माँ परेशान!
"बता?" पूछा माँ ने,
"बैठी थी" बोली वो,
"किसलिए बैठी थी अकेली?" पूछा माँ ने,
"कोई बैठ नहीं सकता क्या अकेला?" बोली वो, तपाक से!
माँ को लगा अजीब सा! ऐसी तो है नहीं ये? कोई बात तो है!
"सच सच बता?" बोली माँ,
"बता दिया, सच सच" कहा वेदल ने,
"कुछ छिपा रही है?" बोली माँ,
"ना" कहा उसने,
"कुछ तो है?" माँ ने भांपा!
"नहीं" बोली वेदल!
माँ चुप!
वेदल ने पलटी करवट!
माँ ने, खड़े हो, कुछ सोचा, और चली बाहर!
तो हुई साँझ, वेदल, सो गयी थी, हारी-थकी सी!
"वेदल?" आवाज़ दी माँ ने,
नहीं सुना उसने, सो रही थी!
"सुन? साँझ हो चली?" बोली माँ, हिलाते हुए उसे!
आहिस्ता आहिस्ता आँखें खोलीं उसने!
"चल उठ!" बोली माँ,
उठ गयी, बैठ गयी!
"पता है? मेहमान आये हैं?" पूछा माँ ने,
"पता नहीं" बोली वो,
"किसलिए आये हैं?" पूछा माँ ने,
"पता नहीं" बोली वो,
"पता नहीं?" पूछा माँ ने, अचरज से,
"नहीं पता" बोली वो,
"दो दिन बाद, लड़के वाले आ रहे हैं तुझे देखने!" बोली माँ, माथे पर हाथ फिराते हुए,
"लड़के वाले?" पूछा हैरानी से उसने,
"हाँ, इसी साल तेरे हाथ पीले करने हैं न!" बोली माँ,
ये क्या सुना उसने?
ये क्या कह रही हैं माँ?
मन में उठा बवंडर! और उस बवंडर में, प्रेम का वो बिटोरा उड़ चला! उजाड़ हो गयी वो ज़मीन तो! घबरा गयी वेदल!
"मुझे नहीं करना ब्याह" बोली वो,
"क्या?" माँ ने, हैरानी से पूछा!
"हाँ, नहीं करना ब्याह मुझे" बोली वो,
"दिमाग सही है तेरा?" बोली माँ,
"हाँ, नहीं करना!" बोली वो,
"नाक कटवाएगी हमारी? इसीलिए पाल-पोस के, इसलिए ही बड़ा किया है?" माँ ने कहा गुस्से से!
"मुझे नहीं पता, नहीं करना ब्याह मुझे, मैं मना कर दूँगी" बोली वो, खड़े होते हुए,
और माँ, आँखें फाड़, यक़ीन ही न करे, जो उसने सुना!
माँ से हुई अनबन! माँ यूँ परेशान कि आज तक, कभी पलट के जवाब नहीं दिया वेदल ने, और आज साफ़ ही मना कर दिया? अब हम क्यों चाहेंगे उसका बुरा? घर-बार अच्छा है, कारोबार अच्छा है, लड़का अच्छा है, खानदानी लोग हैं, लेकिन ये तो मान ही नहीं रही? इसे क्या हो गया है अचानक?
"सुन वेदल?" बोली माँ,
बोली तो कुछ नहीं, हाँ, देखने ज़रूर लगी!
"हम क्या तेरा बुरा चाहेंगे?" पूछा माँ ने,
कुछ न बोली!
"मान जा बेटी! ऐसा घर, फिर कभी मिले न मिले!" बोली माँ, समझाते हुए,
"मुझे नहीं करना ब्याह...." बोली धीरे से,
माँ को क्रोध तो आये, लेकिन जवान बेटी, क्या कहा जाए?
"अच्छा, इधर बैठ!" बोली माँ, बिठा लिया उसे, बैठ गयी वो,
भोली सी सूरत लिए, देखे माँ को!
"क्या बात है?" पूछा माँ ने,
"कोई बात नहीं" बोली वो,
"कुछ तो है?" पूछा माँ ने,
"नहीं माँ" बोली फिर से,
"देख, कितना दुःख होगा तेरे पिता को, देख कैसे दिन-रात भागते फिरते हैं इधर से उधर, कि उनकी बेटी अपने घर की हो जाए!" बोली माँ,
न बोली कुछ वो!
"मान जा बेटी!" बोली माँ, इस बार कुछ नरम लहजे में,
देखती रही माँ को! किसी अनजान सी निगाह से! उठी, वो चली गयी बाहर, बाहर, घर से भी, कहाँ, पता नहीं किसी को भी!
अब माँ को हुई चिंता! लड़के वाले, कल आने थे, क्या जवाब देंगे उन्हें? इसका तो व्यवहार ही उलट गया है? अब कैसे होगी? कट गयी न नाक? पहले ही बात करनी थी, अब होगा क्या?
रात को, अपनी शंकाएं, बतायीं वेदल के पिता जी को, पिता जी ने सुना, तो बेहद हैरान, देह से जान सी निकल गयी, साँसें उखड़ने लगीं, क्या किया जाए? सबसे पहले तो समझाया जाए उसे, और अगर कोई और कोई कारण हो, तो वो भी जाना जाए!
अगला दिन,
सुबह का वक़्त, स्नान-ध्यान से निवृत हो गयी थी वेदल, तभी, पिता जी, वेदल की माँ के साथ आये, चौखट के बाहर खड़े हो, आवाज़ दी!
"वेदल? बेटी?" बोले वो,
पिता जी की आवाज़ सुनी, तो खड़ी हो गयी,
"आई पिता जी!" बोली वो, और चली चौखट तक, ले आई पिता जी को अंदर, पिता ने, सर पर हाथ फेरा अपनी फूल सी बच्ची को!
"बेटी, तेरी माँ ने क्या सुनाया मुझे?" बोले पिता जी,
"हाँ पिता जी, मुझे ब्याह नहीं करना" बोली वो,
"क्यों बेटी?" पूछा पिता जी ने,
"नहीं पता" बोली वो,
मुस्कुरा पड़े पिता जी,
"बेटी, हर माँ-बाप का एक सपना होता है, की उनकी बेटी ब्याही जाए, वो अपने घर की हो!" बोले पिता जी,
"पता है" बोली, नज़रें बचाते हुए,
"तो तैयार हो जा बेटी!" बोले वो,
"नहीं पिता जी" बोली वो,
अब पिता जी को जैसे बेहोशी आने को हुई!
वेदल तो जैसे ठान ही बैठी थी!
"कोई कारण है?" पूछा पिता जी ने,
"नहीं" बोली वो,
"तो मन मत कर बेटी?" बोले पिता जी,
बहुत समझाया उसे! बहुत समझाया! न समझी वो, अड़ी ही रही!
"बेटी, मान ले अपने बाप की बात!" बोले पिता जी, हाथ जोड़ते हुए,
एक पिता, अब मज़बूर हो चुका था!
आंसू निकले पिता जी के,
तो उठी वेदल, और दौड़ पड़ी, नंगे ही पाँव घर से बाहर! माँ आवाज़ दे, पिता आवाज़ दे, लेकिन वेदल, न सुने, न सुने, भागी जाए! हाँफते-हाँफते, जा पहुंची लूनी माँ के मंदिर! साँसें जब काबू में आयीं, तो जा बैठी उस पेड़ के नीचे!
कुछ याद आया उसे,
आंसू, अब न रुक सके उसके!
वो सुबक सुबक के रोये!
सामने, राह देखते हुए, रोती जाए!
थोड़ी देर में, माँ आ गयी वहाँ! संग में, बड़े भाई को लिए, उन्हें देखा, तो उठी झटके से, और जा पहुंची कुँए पर! हो गयी खड़ी मुंडेर पर!
अब जब उसको देखा उन दोनों ने, तो होश उड़ गए उनके! माँ तो कांपने ही लगी!
"वेदल?..........बेटी? ये क्या कर रही है?" पूछा माँ ने,
कुछ न बोले वेदल, चुपचाप देखे उन्हें!
भाई पुकारे, आगे बढ़े, तो वेदल मना कर दे!
माँ आगे जाए, तो वेदल रोये! कूदने को होए!
आ पहुंचे पिता जी भी वहाँ,
जब देखा सारा हाल, तो होश उड़े!
बहुत समझाया वेदल को, बहुत समझाया!
न उसे समझना था, और न ही वो समझी!
"बेटी..........ऐसा मत कर........आ जा!" बोले पिता जी,
अब तो सभी ने लगाई गुहार!
जब सभी ने ये कहा, की नहीं करेंगे वो उसका ब्याह ज़बरदस्ती, तब जाकर उतरी वो, उतरी, और भाग ली वहाँ से! अब न किया किसी ने भी पीछा, वो घर ही गयी थी!
अपना सा मुंह ले, असमंजस में पड़े, सभी लोग लौटे घर!
घर आये, तो वेदल के कमरे का दरवाज़ा बंद.......
न खुलवाया किसी ने भी...........
अब ज़बरदस्ती ठीक नहीं थी,
माँ का माथा ठनका, पिता से कुछ कहा, वे कुछ समझे!
तो मित्रगण!
रिश्ते वाले आये!
उनसे माँ और पिता जी ने बात की, और कुछ समय ले लिया, मिल गया समय, तीन महीने का समय, तब तलक तो, वेदल का इलाज हो ही जाता!
अगले दिन,
पिता जी के साथ एक भोपा आया! उसकी आवाभगत हुई! उसको अब सब कुछ समझा दिया गया, वेदल का व्यवहार, वो कुँए वाली घटना, सब, सब बता दिया, भोपा ने जैसे ध्यान लगाया, और लड़की से मिलने की इच्छा बताई!
ले चले उसे उसके पास, आवाज़ दी उसे, दरवाज़ा खुला, भोपा ने लड़की को देखा, और तभी कह दिया, की उसके ऊपर कोई साहनो का चक्कर है, अर्थात, उस पर प्रेत-छाया है! माँ बाप तो भय खा गए! अब तो पाँव पकड़ लिए भोपा के!
और भोपा ने, इलाज करना शुरू कर दिया! घर में, तीन मिट्टी की छोटी छोटी गुड़िया रखवा दीं! हर दूसरे दिन आता, और एक एक गुड़िया को सिन्दूर से नहला जाता!
अब ऊपरी कुछ होता, तो पता भी चलता!
न व्यवहार ही बदला, और न वेदल का मंदिर जाना ही छूटा!
चौदह दिन बीत गए!
अब कल थी पड़वा!
पड़वा, इस बार, बहुत देर से आई थी!
उस रात, वेदल सो न सकी!
सारी रात्म बैठे बैठे ही काट दी!
कभी ऊँघे, कभी जाग जाए!
कभी, दीवार से कमर लगा, आँखें बन हो जाएँ उसकी!
और जब भी खुलें, तो झरोखे से बाहर झांके! भोर की राह तके
हुई भोर!
उस दिन, गज़ब की फुर्ती थी वेदल में!
स्नान किया और कुछ ध्यान भी!
आज भगवान से इच्छा ज़ाहिर की थी उसने!
खुश थी उस दिन वेदल!
मध्यान्ह का समय!
उसको कानों में, घोड़े की टाप सुनाई दे! बेचैन हो!
मध्यान्ह में ही, वो गागर में जल भर, चल पड़ी थी मंदिर के लिए! कह कर गयी थी कि वो मंदिर जा रही है और आ जायेगी वापिस, पूजा कर के! वहां जाते समय, बहुत खुश थी वेदल! बस कुछ ही देर में, चंदन, अपना घोड़ा दौड़ाता हुआ, आने ही वाला था! जैसी उस पर बीती, वैसी चंदन के साथ भी बीती होगी! ये सोच सोच, अल्हड़ता से आगे बढ़ती जा रही थी वो! न लू की ही चिंता, न धूल की ही चिंता! न उस ताप की ही चिंता! चिंता थी तो बस, उस चंदन की! जो आज भोर में चला होगा! भोर में ही चलता था चंदन! उसने बताया था उसे! वो कभी मुस्कुराती और कभी, पिछली यादों में खो जाती! कभी हंसने लगती और कभी संजीदा हो जाती! उसकी जूतियों में जाती मिट्टी, और उसके छोटे छोटे कण, तलवों में चुभन पैदा करते! वो न रूकती, ये चुभन, उसके जी की चुभन के सामने, कुछ भी न थी! ना, एक बूँद भी नहीं!
वो आ गयी उधर! एक साफ़-सुथरी जगह, एक छायादार जगह, रख दिया गागर! और खुद, एक जगह आ कर बैठ गयी, वहां से, सूखी घास, पत्ते, टहनियाँ आदि हटाने लगी! मित्रगण, कोई उसको, उसके हाव-भावों को, उसके बैठने के तरीके को, उसको वहां की सफाई करते देख ले कोई, तो सच में, गला रुंध जाए! रुलाई फूट जाए कब, पता नहीं! वो साफ़ कर रही थी, क्योंकि, चंदन बस आने ही वाला था! बस कुछ देर में ही! सफाई की, और बैठ गयी, नज़रें, बिछा दीं! कलेजा तो भारी था ही, अब चंदन आये तो सुकून मिले! तो जी में जान सी पड़े! वो चुपचाप बैठी थी, चुपचाप, लेकिन उस पर, कोई नज़रें बनाए हुए था, उसकी माँ, और वो भोपा! आज खुल जाना था रहस्य! सारा रहस्य! उसके बदले व्यवहार का रहस्य!
और अब, इस गाथा के सबसे भारी शब्द...................
मित्रगण..........
न चंदन को आना था, और ना ही वो आया, जिस पड़वा को वो वापिस गया था, उस से दो दिन बाद, उस सैनिक-टुकड़ी की मुठभेड़, कुछ राहजनी करने वाले लोगों से हुई, वे संख्या में अधिक थे, मुठभेड़ साँझ को हुई थी, और इस मुठभेड़ में, चंदन समेत, चार सैनिक अपनी जान से हाथ धो बैठे थे........
यही वजह थी कि चंदन, नहीं लौटा था, और बेचारी वेदल, वेदल को ऐसा कुछ भी भान नहीं था, वो तो अपने दिल में उस चंदन की सूरत लिए, उसकी आवाज़ याद रखे, उसके साथ गुजारे वो अनमोल पलों की याद लिए, इंतज़ार में बैठी थी, उस पड़वा........उस पेड़ के नीचे...............
इतना जानकार, मेरा खुद का कलेजा मुंह को आ गया था! वो भाव कैसे रहे होंगे, उस चंदन के, जब वो मुठभेड़ में खेत रहा होगा, अपने अंतिम क्षणों में, वेदल की सूरत होगी उसकी आँखों में........ओह........मैं इतने पत्थर दिल वाला इंसान नहीं हूँ, कि वो भाव किसी भी तरह, महज़ एक कहानी की तरह से, अपने दिल के कागज़ पर, सिर्फ अलफ़ाज़ कह कर ही जज़्ब कर सकूँ...........कैसे भाव रहे होंगे, कैसे किसी सपने का दर्पण दरकता है, कैसी आवाज़ होती है उस वक़्त......वो तो बस, वो चंदन ही जान सकता था, मैं तो अनुमान लगाने के योग्य भी नहीं...................
और यहां, यहां अब ये वेदल..............
इंतज़ार करती आँखें..........
नमी से भरी आँखें..........
किसी अक्स को सामने देखने की चाह...............
वो अक्स, एक घोड़ा और घोड़े पर सवार वो मजबूत देह वाला सैनिक, चंदन.............
पल पल धड़कता दिल!
मुंह को भागता कलेजा!
हवा चलती, तो सर से चुनरी खिसक जाती!
चुनरी खिसकती, तो अँखियों को ढक लेती.........
क़ैद!
क़ैद सी महसूस हो जाती वो घड़ी!
झट से, अँखियों से कपड़ा हटा लेती वो! सरका देती सर पर!
उसकी देह पर, पेड़ों के पत्तों से छनती धूप, कुछ बताना चाहती उसे, न बोल पाती!
मध्यान्ह बीता,
साँझ की हद का समय हुआ,
आँखें, ठीक सामने लगी रहीं!
नहीं आया!
नहीं आया वो आने वाला!
कैसे आता वो!
कैसे आता!
बैठे बैठे, ढाई घंटा गुज़र गया!
और अब, सीने में धधक उठा कुछ!
साँसों की गर्मी ने आग का रूप ले लिया!
लहर की तरह से कांपे उसके होंठ!
नथुनों में, स्पंदन सा होने लगा,
आँखों के नीचे की त्वचा, काँप उठी!
और फूट चला एक सैलाब आँखों के रास्ते से!
कौन देखा सकता था उसे?
कौन?
वो फूल, वो नाज़ुक सा फूल, कुचल दिया जा रहा था, उस लम्हे के बोझ तले!
आंसू अब न थमे!
हाथ, अब न उठे!
नहीं पोंछे जा सकते थे वो आंसू,
हाथों में जान नहीं थी उसके! हाथ उठ ही नहीं पा रहे थे!
मुंह से बस सिसकियाँ ही निकल रही थीं!
होश क़ाबिज़ न रह सके उसे! आँखों के सामने छाया अँधेरा और, गिर पड़ी पीछे! वो गिरी, तो माँ और वो भोपा, भाग कर पहुंचे वहां! बहुत पुकारा, खूब हिलाया-डुलाया, कुछ न हुआ, पानी छिड़का गया चेहरे पर, आँखें खुलीं, माँ को देखा, भोपा को देखा!
"वेदल? बेटी?" माँ ने कई बार पूछा,
वेदल की आवाज़, फिर कभी न निकली..............
कभी नहीं.........
बोलना भूल गयी थी...........
बस घूरती, जिसको भी देखती...........बस घूरती,
क्या से क्या कर लिया अपना हाल वेदल ने! ये तो प्रेम की पराकाष्ठा हो गयी! ऐसा प्रेम? कहाँ देखने-सुनने को मिलता है?
माँ बाप ने कई प्रश्न किये! कोई जवाब नहीं! वैद्य से इलाज करवाया गया, कोई लाभ नहीं! भोपा ने ऐड़ी-छोटी का ज़ोर लगा लिया, कोई फायदा नहीं!
वेदल ने तो जैसे, अब जीना ही छोड़ दिया था! न ख्याल ही रख पाती, न कुछ बोल ही पाती, माँ और उसकी चचेरी बहन, पूरा ध्यान रखतीं उसका!
रात कब आये, कब जाए, भोर कब आये, कब जाए! कुछ याद न पड़े!
और फिर, उस रात, अपने कमरे में, उसने, निकाली वो वस्तुएं, जो वो चंदन, लाया करता था! एक एक वस्तु उठाती, तो उस से वाबस्ता, बोल सुनाई देते उसे चंदन के! बस! इसी क्षण वो फिर से वेदल हो जाती! कड़े, श्रृंगारदानी, वस्त्र आदि आदि! एक एक को, सीने से लगाती, माथे से लगाती! कंधे पर धर, वो प्रेम-बावरी, बहुत खुश होती!
अगला दिन, पड़वा थी!
कुछ याद हो, या न याद हो, पड़वा ज़रूर याद रहती उसे! माँ बाप ध्यान तो रखते उसका, लेकिन उसकी हालत देख, मन मसोस के रह जाते, आँखों से आंसू बहाते दोनों! ऐसा क्या था? क्या था ऐसा जिस से उन्हें उनकी बेटी का सुख मिलता? क्या था ऐसा? कहाँ मिलेगा?
कहीं नहीं.........
अब तो, कहीं नहीं.....
हाँ,
तो पड़वा के दिन, उस दिन, उसने, श्रृंगार किया! चंदन के लाये हुए, जेवर पहने! वस्त्र पहने! गागर में पानी भरा! और चल पड़ी मंदिर की ओर! इस संसार से अनजान सी! किसी के इंतज़ार में, वक़्त गुजारने! उस पेड़ के नीचे, जो उनके मिलान का साक्षी था! जब उसके माँ-बाप ने वो वस्त्र देखे, जेवर देखे, तो और भय खा गए वो! कहाँ से आये? किसने दिए?
लेकिन ये सोचने का अब समय नहीं था! वेदल, साज-श्रृंगार कर, जाग में पानी भर, जा रही थी उस मंदिर! पीछे पीछे माँ और पिता जी उसके!
वो जा पहुंची वहां!
गागर रखा एक साफ़ जगह!
और फिर साफ़-सफाई!
घोड़े के लिए, पानी खींचा! बावरी! हंसती जाए! और शिकायत भी करती जाए चंदन से, जैसे, चंदन, पास में ही खड़ा हो उसके! उसने पानी भरा! और फिर आ बैठी!
दूर खड़े माँ बाप, खड़े खड़े कांपें!
ये क्या हुआ है उनकी बेटी को?
अरे कोई है? है कोई जो इलाज करे उसका?
नहीं देखा जाता उसका हाल!
नहीं देखा जाता!
माँ रोये, बाप चुप कराये, बाप रोये, माँ ढांढस बंधाये!
और वो बावरी!
नज़रें बिछा, राह तके! राह तके उसकी, उसकी जो अब आना ना था...............जो.........जा चुका था......बहुत दूर..........बहुत दूर..........कभी न लौटने के लिए...........उसकी राह तके!
