"ये तो शाही प्रेत लगते हैं!" बोले शर्मा जी,
"असर-ओ-रसूख़मंद!" कहा मैंने,
"और मौक़ा भी तो बारात का है!" बोले शर्मा जी,
"हाँ! ये भी बात है!" कहा कमल जी ने,
"कमल जी?'' बोले शर्मा जी,
"जी?'' चौंके कमल जी,
"सही हो न?" पूछा शर्मा जी ने,
"बिलकुल!" बोले वो,
बाहर कुछ आहट हुई, कुछ आवाज़ें आयीं, शायद कोई और आ रहा था उस पहले वाले के साथ, हम उठ कर, खड़े हो गए तभी!
हमें उठते हुए देख लिए था उसने, जो आया था साथ में उस पहले वाले के, मुस्कुराया, कोर्निश हुआ और सामने आया!
"बैठे रहें!" बोला वो,
हम बैठ गए जी फिर से वहीँ! उसने भी अपनी जूतियां खोलीं और सामने आ बैठा! पीछे से कुछ उठाया, ये एक डिबिया सी थी, हाथी-दांत से बनी हुई! चांदी के तारों से काम हुआ, हुआ था उस पर, बीच बीच में चमकदार, चौकोर और गोल गोल शीशे जड़े हुए थे उसमे!
"शम्भा?'' बोला वो,
"जी आ रहा है!" आई आवाज़ बाहर से एक,
और तभी, हाथों में तश्तरी लिए, चांदी के गिलास रखे, शम्भा आ गया था, झुका, तश्तरी आगे की,
"जल!" बोला वो,
हमने उठा लिए गिलास जल के,
पिया पानी, पानी में, गुलाब के इत्र की ख़ुश्बू और गुलकंद का सा हल्का सा स्वाद! गुलकंद की त'आसीर ठंडी हुआ करती है, सर्दी में गुलाब-जल या अर्क से इसके ये त'आसीर उलट हो जाया करती है! है न कमाल! गुलाब की दो दो अलग अलग त'आसीरें!
तो हमने जल पी लीया, दे दिए गिलास वापिस, उसने तश्तरी में रखे और चला गया, कमर दिखाकर नहीं, पीछे होते हुए! ये सबसे बड़ी अदब हुआ करती थी, अब कहाँ बची है ऐसी अदब! पहले, सिर्फ जंग पर और लम्बे वक़्त तक जाने पर ही ऐसा किया जाता था, कि पता नहीं, जंग से लौटें या नहीं, रुख़सती के बाद, लौटना हो भी पाये या नहीं! अब ये रिवाज आदि सब खतम हो चले हैं! अंग्रेजी-रवाईयत ने सबकुछ बदल के रख दिया! लेकिन हैरत ये, कि न हम अंग्रेजी तौर-तरीक़े ही सीख पाये और न अपने रिवाज ही छोड़ सके! त्रिशंकु बन सब गुड्ड-मुड्ड हो गया है! इस से अवाम में कई हिस्से बन गए! अपने अपने ढर्रे सभी को अच्छे लगने लगे! और आज, आज हाल देख लो! इंसानियत और आदमियत हम पढ़ते लिखते तो ज़रूर हैं, लेकिन जी नहीं पाते! आने वाला रोज क्या होगा, ऊपरवाला ही जाने!
खैर साहब, ये सब महज़ दुनियावी बातें हैं! असल में कुछ और पर्दे में कुछ! मुंह में राम और बग़ल में छुरी, तू जहाँ खड़ा वो गड्ढा, जहां मैं खड़ा वो धुरी!
हाँ, तो अब वहां वो, नया जो आया था, वो था, बाहर, एक दरबान था शायद, शायद, वो पहले वाला, और हम तीन! शामियाना बड़ा ही ज़रीख(मज़बूत, छिद्र-रहित) था! हवा के क़तरे का भी क़तरा न घुस पा रहा था अंदर!
"बताया गया कि आप लोग, परदेसी हैं?'' बोला वो,
"जी!" कहा मैंने,
"कहाँ से आये हैं?" पूछा उसने,
"देहली से!" कहा मैंने,
"बहुत खूब!" बोला वो,
"शुक्रिया!" कहा मैंने,
"तो आज आप हमारे मेहमान हैं! बारात का मौक़ा है, आप भी चलें!" बोला वो,
"बहुत बहुत शक्रिया!" कहा मैंने,
"मैं अपने बारे में बता देता हूँ कुछ, मैं हरदेव सिसौदिया हूँ! एक अदना सा सरकारी मुलाज़िम हूँ!" बोला वो,
"जी!" बोला मैं,
"और ये बारात, ज़ारुम-ए-ख़ारज़ा, बिशन सिंह खाखोड़ के बड़े बेटे वचन सिंह खाखोड़ की है! जिसके आप मेहमान हैं आज!" बोला वो!
ज़ारुम-ए-ख़ारज़ा! खाद्य एवं सम्भरण का उच्चाधिकारी!
क्या मौक़ा था!
सच में! ये तो शानदार मौक़ा था हमारे लिए! एक बारात! वो भी एक उच्चाधिकारी के बेटे की! इतिहास दोहरा रहा था अपने आप को! भले ही पर्दे के पीछे!
"आएं?" वो खड़े होते हुए बोला!
हम सब, झट से खड़े हुए! सभी के सभी!
बाहर भले ही सर्दी थी, लेकिन शामियाने में, उन अलावों की गर्मी जैसे क़ैद हो कर रह गयी थी! और फिर, उनकी पोशाकों को देखकर ये जायज़ा नहीं लग पा रहा था कि उस वक़्त सर्दी रही होगी या फिर गर्मी! और फिर उन लोगों की देह ही ऐसी थी कि सर्दी क्या बिगाड़ लेती उनका! ऐसा ही उनका खाना-पीना, ऐसा ही दौड़ना-भागना और ऐसा ही उनका दैनिक-जीवन! सर्दी तो हम जैसों को सताती है! कभी नाक चली, कभी छाती! तो हमारी क्या बिसात उनके सामने! कभी घुड़सवारी करके देखिये, पथरीली और मिट्टी वाली जगह पर, देह में कितनी जान है, हाड़ का पिंजर, क्या दमखम रखता है, पता चल जाता है! आराम से कहीं बैठा नहीं जाता! कमर में ऐसा दर्द कि पूछिए मत! घोड़ा भी जान लेता है उसके सवार का मिजाज़! वैसे ही चलता-दौड़ता है फिर!
तो हम चले बाहर तब!
सामने, एक बग्घी खड़ी थी! शानदार थी वो बग्घी! चार पहिये लगे थे उसमे! पहिये में जो लकड़ियाँ लगी थीं, उन को भी सजाया गया था! चमकीली फुलेर लगाई गयीं थीं उनमे! बड़ी बड़ी सी लालटेन दो कोनों में रखी थीं! मुझे तो ब्रितान्वी-विक्टोरिया सी लगी थी वो बग्घी!
तभी हरदेव के पास कुछ लोग आये, उन्होंने हमें भी देखा, हाथ जोड़, नमस्कार हुई, हरदेव ने उनसे कुछ बातें कीं, साफ़ लगता था कि कुछ समझाया गया था उन्हें! फिर हरदेव, हमारे पास आने को मुड़ा, सतह में, बग्घी हांकने वाला था शायद! वो भी पहलवान था! हाथ में सांटा था उसके, पीतल से मढ़ा था वो सांटा!
"आएं!" बोला वो पहलवान!
और खोल दिया एक दरवाज़ा!
मैं चढ़ा पहले! फिर शर्मा जी! फिर कमल जी!
अब क्या बताऊँ आपको!
वो गद्दी, ऐसी चौड़ी कि मैं और शर्मा जी सो सकते थे, अगल-बग़ल में एक दूसरे के! बैठो, तो कमर न लगे उसमे, और कमर लगाओ, तो लेटने की कोशिश की हो, ऐसा लगे! अब न बैठे बने और न लेटे ही बने!
हरदेव ने फिर से उस पहलवान, उस हांकने वाले से कुछ बातें कीं! मशगूल से हुए दोनों ही, बार बार पीछे देखें वो, शायद कोई आ रहा था, जो शायद, संग ही चलता हमारे!
"ये गद्दी है?'' बोले शर्मा जी,
"हाँ जी!" बोला मैं,
"मेरे दीवान के बराबर है!" बोले वो,
मैं हंस पड़ा! उनके दीवान के बराबर!
घोड़े हिनहिना जाएँ बार बार! बग्घी आगे-पीछे हो! हमें झटके लगें! एक दूसरे को थामें हम! हम तीनों ही, पीछे वाली गद्दी पर बैठे थे, कस कर, नहीं तो किसी धचकी में, आगे वाली गद्दी पर ही उछल के जा पड़ते! बग्गी देखीं तो बहुत, चढ़े, तब ही, सवारी आज हो ही जानी थी! बग्घी वैसे, बेहद शानदार हुआ करती थीं अपने ज़माने में! बड़ा ही शानदार इतिहास रहा है उनका! रसूखदारों की पहचान थी बग्घियां उस ज़माने में!
तभी मेरा हाथ, बग्घी की बायीं तरफ गया! वहां कुछ मोटी मोटी कीलें सी दिखीं मुझे, छू कर देखा, तो वो कीलें लोहे की नहीं थीं, मुझे पहले ऐसा ही लगा था, जैसे लोहे की रिपिट हों, जो ठोंकी गयी हों! लेकिन ऐसा नहीं था, वो लकड़ी से बनी कीलें थीं, रंग उनका लाल बल्कि अब तो चमकदार काला सा पड़ गया था! साफ़ था, वो उस बग्घी को मज़बूती देने के लिए ठोंकी गयी थीं और वो लकड़ी जिसकी कीलें बनाई गयी थीं, वो बेशक़, कीकर की रही होंगी! अब कीकर की कीलों को ठोंका गया, अब जिसमे ठोंका गया वो कड़ी भी मज़बूत ही रही होगी, जब मैंने उस लकड़ी को देखा वो वो मुझे सागवान या शीशम की सी लगी! शीशम की लकड़ी में परत हुआ करती है, एक एक ऊपर एक, उसमे थीं तो, लेकिन कम थीं, इसीलिए सागवान या सागौन की रही होगी! पीतल या लोहे का तो कहीं भी कोई काम नहीं था! न ही उस बग्घी के दरवाज़ों पर, उस दरवाज़े के क़ब्ज़े भी, लकड़ी के थे और वो, मुख्य लकड़ी जिसका वो स्तम्भ सा बनता था, उसमे घुस जाते थे! ऐसी कारीगरी तो आज कोई भी नहीं कर सकता! कम से कम मैंने कहीं नहीं देखा ऐसा! जो गद्दी थी, उस पर एक मुलायम सा कपड़ा चढ़ा था, वो मखमल नहीं था, मखमल में सर्वतेन नहीं पड़तीं, उसमे पड़ रही थीं, सिका मतलब, वो या तो अरबी ज़ाज़रीन था या फिर शनील! ज़ाज़रीन को हिंदुस्तान में क्या कहा जाता है, ये नहीं मालूम मुझे, हाँ, कुछ कुछ चमकदार और मज़बूत सा मार्कीन कहा जा सकता है, कुछ मायनों में और कुछ हद तक!
तभी हरदेव लौटा हमारे पास, कमल जी से मुखातिब हुआ, खांस कर गला साफ़ किया और अपने एक साथी को इशारा किया, वो साथी, अंदर शामियाने में गया और कुछ लाया हाथों में, दिया हरदेव को उसने, हरदेव ने वो हमारी तरफ बढ़ाया!
मैंने देखा तो ये वही डिबिया थी, हाथी-दांत वाली, सफेद रंग की, अंदर ही रह गयी थी वो, और अब मंगवा ली थी!
"ये लीजिये! मुआफ़ी चाहूंगा, जल्दबाजी में ख्याल ही न रहा!" मुस्कुराते हुए कहा उसने,
कमल जी ने डिबिया ली, और शर्मा जी को दी, शर्मा जी ने उस डिबिया को देखा, और मुझे दे दी, हरदेव आगे बढ़ गया था, उसी हांकने वाले के पास!
"ये खुलेगी कैसे?'' पूछा शर्मा जी ने,
"अभी देखता हूँ!" कहा मैंने,
मैंने भी देखा उसे, उसमे कोई कुण्डी, काँटा कुछ भी न था! कमाल था! कैसे खुलती है वो! तब मैंने उंगलियां फिरायीं उस पर! और एक जगह, कुछ उभरा सा दिखा, अब उसको देखा, वो एक गोल सा बटन सा था! उसको दबाया तो आवाज़ हुई एक हल्की सी, 'कचक' की और डिबिया का मुंह खुल गया! मैंने एक हाथ से पूरा खोला उसे तब!
वो खुल गयी! और ज़ाफ़रान की एक तेज ख़ुश्बू हमारे नथुनों में जा समायी! ये तो पान थे! सोने के वर्क़ में लिपटे हुए! बेहतरीन ख़ुश्बू आ रही थी! मैंने एक बीड़ा उठाया, उसका पत्ता देखा, मगई पान का पत्ता था वो, कई पत्ते एक साथ लगाये हुए थे उसमे, मगई पान का पत्ता अमूमन छोटा ही होता है, मुंह में रखने से ही घुलता हुआ सा लगता है!
"लो कमल जी!" कहा मैंने,
एक पान बढ़ाया उनकी तरफ, उन्होंने ले लिया!
"ये लो आप!" कहा मैंने शर्मा जी से,
उन्हें भी दे दिया, उन्होंने लिया और मुंह में सरका लिया!
"अरे वाह! वाह!" बोले शर्मा जी,
पान के पुराने शौक़ीन रहे हैं शर्मा जी, स्वाद जान गए थे वो, पान मुंह में रखते ही!
अब मैंने
अब मैंने भी मुंह में सरकाया पान का बीड़ा! मैं पड़ा हैरत में! क्या लाजवाब पान था वो! क्या ख़ुश्बू! क्या स्वाद और क्या ज़ायक़ा!
"मैंने नहीं खाया आज तक ऐसा पान!" बोले कमल जी!
"वाक़ई में!" कहा मैंने,
"लाजवाब! लाजवाब!" बोले शर्मा जी,
पान का स्वाद, बेहद ही लज़ीज़ था! ज़ाफ़रान की क़िस्म अव्वल थी, इसमें कोई शक नहीं था, किमाम ऐसा शानदार था कि ज़ुबान से जैसे चिपक गया हो!
पान, मुग़ल लाये थे हिन्दुस्तान में! उस वक़्त पान की बात ही अलग हुआ करती थी! अव्वल क़िस्म का पान हिन्दुस्तान में पैदा होता था! राजा बीरबल, स्वयं पान और तम्बाकू के शौक़ीन थे! राजा बीरबल ने ही पान की खेती को बढ़ावा भी दिया था!
तभी हरदेव लौटा हमारे पास!
"जी, चलने का वक़्त है अब!" बॉल वो,
"तो चलिए!" कहा मैंने,
"जी!" बोला वो,
और हांकने वाले ने खोला दरवाज़ा! बैठा हरदेव उसमे, सामने हमारे और दरवाज़ा बंद किया उस हांकने वाले ने! मतलब, हम चार ही जाने वाले थे आगे बारात में!
तभी पीछे घोड़ों के नथुने बजाने की आवाज़ आई! पीछे पीछे एक टुकड़ी सी आ गयी थी, कुल बीस लोग रहे होंगे उसमे, सभी एक क़तार में खड़े थे!
और तब, बग्घी बढ़ी आगे!
हांकने वाले ने मुंह से कुछ अलफ़ाज़ निकाले! शायद घोड़ों के लिए थे वो अलफ़ाज़! घोड़े बढ़ चले आगे! पीछे पीछे वो टुकड़ी, घोड़ों की टापों केसाथ आगे आगे बढ़ती चली आ रही थी, हमसे बस कुछ ही फांसला बनाये हुए!
"बस यहां से आगे ही जाना है!" बोला हरदेव!
बग्घी चलते चलते, बायीं ओर मुड़ी! हम भी मुड़े एक साथ ही, और वो टुकड़ी भी! हम करीब आधा घंटा चले, और एक जगह, रुक गए! सामने एक इमारत बनी थी, जगमगा रही थी! मशाल लगी हुई थीं! आसपास बड़ी ही रौनक थी वहां!
"जी, यहां उतरना है!" बोला हरदेव!
"अच्छा! आ गए हम?" पूछा मैंने,
"जगह तो आगे है, यहां कुछ लोग मिलने हैं!" बोला वो,
"तो आप मिल लीजिये?' कहा मैंने,
"आप भी आएं!" बोला वो,
मैंने कुछ सोचा,
"चलिए!" कहा मैंने,
और तब, दरवाज़ा खुला, हम सभी उतर लिए!
"आप ज़रा ठहरें!" बोला वो,
और चल दिया अंदर की तरफ!
"बारात यहां से आगे बढ़ेगी!" बोले कमल जी,
"हाँ!" कहा मैंने,
"यहां कुछ और लोग होंगे?'; बोले शर्मा जी,
"हाँ!" कहा मैंने,
तभी हरदेव लौटा, एप संग एक नौजवान को लिए हुए! उसने कोर्निश की, दोनों हाथ जोड़, नमस्कार की!
"ये हैं अज़मत साहब!" बोला हरदेव!
"अच्छा लगा आपसे मिलकर!" कहा मैंने,
"आइये!" बोला अज़मत!
"हाँ! इत्मीनान से जाएँ साथ इनके! मुझे काम है, मैं लौट-फेर करता हूँ बस!" बोला हरदेव!
"ठीक!" कहा मैंने,
"आएं!" बोला अज़मत!
"जी, चलिए!" कहा मैने,
और उसके साथ, हम आगे बढ़ चले, वो हमें, उस इमारत के बाएं ले जाने लगा, हम संग संग ही चल रहे थे!
हम उसके साथ साथ चले जा रहे थे, रौनक तो बेहतरीन थी! अज़ीम-ओ-तरीन लोगों ने शिरक़त की थी इस बारात में, साफ़ दीखता था! सबसे बड़ी बात, यहां अलग अलग महकमों के लोग आये हुए थे, वे अभी मशगूल थे अपने अपने हिसाब से, एक दूसरे के साथ! लेकिन सभी खुश थे! मौक़ा कुछ ख़ास ही था! सिसौदिया साहब का रसूख़ देखते ही बनता था! पता चलता था कि अवाम में उनका एक ख़ास ही मुक़ाम है!
"आएं, यहां आएं!" बोला अज़मत!
एक बारदारी सी पार की हमने! और फिर एक कमरा दिखा! वहीँ ले आया था हमें वो अज़मत! उस कमरे के पास, एक दरबान सा खड़ा था, जैसे पहरा दे रहा हो उधर! हमें तो पहरेदार सा ही लगा था, लम्बा सा कुरता और चुस्त सी पाजामी! उसने झुक कर सलाम किया था हम सभी से! मुस्कुराकर!
"आप ज़रा इंतजामात देखें!" बोला अज़मत उस दरबान से,
"जी!" बोला वो दरबान, चाबी दे दी उस कमरे की, दरवाज़ा खेल तब अज़मत ने!
"आइये!" बोला वो,
हम तब अंदर चले, हमने अपने जूते खोल दिए थे बाहर ही, और चौखट के एक तरफ रख दिए थे! ताकि आते जाते किसी से टकराएं नहीं!
"तशरीफ़ रखें साहिबान!" बोला वो, दोनों हाथ आगे करते हुए!
"मेहरबानी अज़मत साहब!" कहा मैंने,
"आज कोई साहब नहीं! सब खासम-ख़ास हैं!" हँसते हुए बोला वो!
हम बैठ गए आगे, उसने पीकदान, आबगीना और पान-दानी आगे बढ़ा दी! पान हम खा ही चुके थे, अब इच्छा थी नहीं, ज़ायक़ा अभी तक मौजूद था मुंह में उस ख़ास पान का!
"पानी या कुछ और?'' पूछा उसने,
"शुक्रिया!" कहा मैंने,
"मैं आता हूँ अभी!" बोला वो, और चला गया पीछे!
"क्या बात है!" बोले शर्मा जी, आसपास देखते हुए!
मैंने भी देखा आसपास!
क्या बहतरीन सजाया हुआ था कमरा सजाने वाले ने! कमरे में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी थीं! शायद उस वक़्त के रियासती लोगों की तस्वीरें होंगी वो! गुलदस्ते, फूलदान और बेशक़ीमती पर्दे! सब बेहतरीन था! चार लालटेन जल रही थीं, हैरत ये, कि उनमे से धुंआ नाम की कोई चीज़ न निकल रही थी! रौशनी ऐसी, कि ऐसी तेज, आप फर्श पर गिरी हुई सुईं भी ढूंढ लो! हम जिस जगह बैठे थे, उधर एक बड़ा सा कालीन बिछाया गया था! मैरून रंग की मसनदें पड़ी थीं, बड़े बड़े चौकोर तकिये रखे थे, तकियों का रंग नीला था, चटक नीला रंग! मसनदों की डोरियाँ सुनहरी थीं! गांठें ऐसी तरतीबें ब्यान करती थीं कि जैसे हम किसी जिन्निस्तान के मेहमान हो गए हों! नपी-तुली गांठें, एक में अगर कुछ फांसला था, चार इंच तो दूसरी में भी इतना ही था!
कालीन, संतरी रंग का था, बीच में काले रंग की कढ़ाई थी! बीच बीच में सफेद और झिलमिलाते से फूल बने थे! ऐसा कालीन तो मैंने सिर्फ जिन्नात के पास ही देखा था!
एक तरफ, कोने में, एक पटरी सी रखी थी, उसमे कांच लगा था, कांच के बीच में एक बड़ी सी किश्ती रखी थी! पाल वाली! देखने से ही पता चलता था कि ये कारीगरी भी उम्दा और अव्वल क़िस्म की ही है! किश्ती के नीचे नीले रंग के चमकदार पत्थर सजे थे, किश्ती, एक खम्भे से बंधी थी! खम्भा भी जैसे ज़िंदा हो उठा था!
"वो देखिये ज़रा!" बोले कमल जी,
"वो, शायद तेंदुएं की खाल है!" कहा मैंने,
"हाँ, शिकार किया हुआ!" बोले शर्मा जी,
एक खाल, लटकी हुई थी दीवार पर, सर नहीं था उसका बस! पहले रजवाड़ों का ये पसंदीदा शौक़ हुआ करता था, शिकार करना!
तभी दरवाज़े पर आवाज़ हुई!
हम सब, वहीँ देखने लगे! ये अज़मत था, साथ लाया था किसी को अपने! आया, मुस्कुराया और बैठ गया सामने, मसनद खींची और लगा ली टेक उस से, फिर उठा, कमर में खोंसा हुआ एक बड़ा सा खंजर जैसा कुछ रखा उसने एक तरफ!
"क्या वो खंजर है?" मैंने पूछ ही लिया, न चाहते हुए भी!
"नहीं साहब!" बोला वो,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"आप देख लीजिये!" बोला वो,
उठाया वो खंजर सा, दिया मुझे, मैंने खोला, तो खुले ही न! या तो ताक़त नहीं थी या कोई दूसरा ही तरीक़ा था उसका, खोलने का!
अज़मत समझ गया माजरा!
"लाइए, मुझे दिखाइए!" कहा उसने,
और त उसने, उस खंजर के मुहाने पर लगा एक पीतल का सा टुकड़ा खींचा, म्यान ढीली हो गयी एकदम ही उस से!
"ये लीजिये!" बोला वो,
और तब मैंने पकड़ा वो! खोला, तो पता चला! वो बघनखा था! चार-चार इंच के चार नाख़ून! बाघ के थे वो नाख़ून! बड़े बड़े, ख़ौफ़नाक और वजन में भारी! बघनखा अभी तक बाघ के केशों से सजा था! और वो बघनखा किसी को मार दिया जाए तो आंतें खींच लाये बाहर! एक झटके में ही! मैंने म्यान बंद की, वापिस डाला और दे दिया उसे!
"ये देखिये, आपने पढ़ा?" पूछा उसने,
उस बघनखे पर, उसकी म्यान पर लिखा था कुछ, ये उर्दू में कुरेदा गया था, मैंने पढ़ा तो ये शैख़ हारून हसन लिखा था!
"ये मेरे वालिद साहब का है, मुझे दो साल पहले दिया उन्होंने, वो सूबेदार थे उस वक़्त!" बोला वो,
"अच्छा! अच्छा!" कहा मैंने,
"चलिए, बातें तो होती रहेंगी, रात बाकी है तमाम! ज़रा बताएं, शौक़ फरमाते हैं आप?" पूछा उसने,
अब मैं अटका!
कौन सा शौक़?
ये किस शौक़ की बाबत पूछ रहे हैं?
क्या शराब या शबाब?
फिर भी!
जुटाई हिम्मत! अब कुछ ही हो, शराब हो, या शबाब हो! क्या फ़र्क़ पड़ता है!
"बताएं! इतनी गहरी सोच में डूब गए आप तो!" हँसते हुए बोला वो!
"हाँ! ज़रूर! क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"बैजन?" दी आवाज़ उसने!
और बाहर से, वही पहरेदार चला आया अंदर!
"इंतजामात हो गया?" पूछा अज़मत ने!
"जी, आपका हुक़म!" बोला वो,
"सजाएं फिर!" बोला वो,
सजाएं! क्या सजाएं! दिमाग़ गोल! सोच में झोल!
"तो आप देहली से हैं साहिबान?" पूछा उसने,
"जी हाँ!" कहा मैंने,
"बहुत खूब!" बोला वो,
"शुक्रिया!" कहा मैंने,
"होता है आना देहली भी हमारा!" बोला वो,
"अच्छा! बहुत खूब!" कहा मैंने, उसी के लहजे में! बस अब इंतज़ार, कि क्या सजेगा अब!
यही कुछ ख़ास वक़्त न हुआ था, बात सही थी, अभी तो रात अपनी कमसिनी में थी, जवान होने में अभी वक़्त बाक़ी था! बात अब शौक़ फरमाने की थी, देखना था की किस मायने का शौक़ है! बाहर लोगों की आवाजाही लगी हुई थी, कभी एकदम से शोर आता और कभी सन्नाटा सा पसर जाता था! दरअसल अभी वो बरात अपने दर-ओ-मुक़ाम पर पहुंची नहीं थी, ये तो एक ठहराव सा था, जहाँ कुछ मेहमान दूर से आ रहे थे, उनके रुकने का इंतज़ाम किया गया था यहां! अज़मत जैसे कई और मुलाज़िम अपने कन्धों पर ये जिम्मेवारियां लिए मुस्तैद थे वहां! ये जो इमारत थी, मुझे हिन्दू-मुस्लिम रवायत की सी लगती थी, मिली-जुली! जैसे कि टोंक का इतिहास भी बताता है, जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली के दोआबा इलाक़े की गंगा-जमनी तहज़ीब है, ठीक वैसी ही! यहां बस नाम में ही फ़र्क़ लगता था हिन्दू और मुसलमानों का, नहीं तो कोई लाख जतन भी करे, बता नहीं सकता था! एक जैसी ही पोशाक़, एक जैसी ही कद-काठी, एक जैसी ही बोली और एक जैसी ही तहज़ीब! एक जैसा ही रंग-रूप और एक दूसरे से मिलते जुलते इख़लाक़! हरदेव ने हमें अज़मत के संग भेज दिया था और हरदेव वापिस आने को कह गया था जल्दी ही, लेकिन अभी तलक तो आया नहीं था, हाँ, सामने चौखट पर कुछ चहलकदमी सी ज़रूर होने लगी थी!
और जो अंदर आये वो लोग थे, मुझे तो फिर से वो सैनिक जैसे ही लगे! मज़बूत और कसे हुए से, बड़े बड़े थाल पकड़े हुए, थालों में एक बड़ा सा सागर लिए हुए और कुछ चांदी के चमकदार गिलास लिए हुए! अब आ गया था समझ! कि शौक़ के मायने क्या थे अज़मत साहब के! थोड़ा सा पानी, अंगूर का, ख़ुमारी भरा!
"यहां, इधर रख दो!" बोला अज़मत!
जहां बताया था, वहां रख दिया गया उन्हें, और रख कर, फिर से वापिस हो लिए थे दोनों! अज़मत साहब गिलासों को सीधा कर रहे थे, वे उलटे रखे थे, गिलास चमकदार और शानदार थे, बड़े भी थे, एक गिलास पानी पिया जाए उनमे अगर तो डकार ही आ जाए! एक कपड़े से साफ़ कर दिए गए थे वो गिलास अब!
फिर से एक सैनिक सा आया, एक बड़ा सा डिब्बा लिए, उसने वो डिब्बा नीचे रख दिया, और फिर चला गया बाहर! अज़मत साहब ने वो डिब्बा खींचा, उसकी कुण्डियाँ खोलीं और बढ़ा दिया हमारे सामने!
हमारी नज़र गयी उस डिब्बे के अंदर, डिब्बे में, सीढ़ीदार सी क़तार में गोल-गोल कटोरियाँ सी रखी थीं, आजकल के कटोरे कहना सही रहेगा उन्हें! उन कटोरियों में, पिस्ते, बादाम, भुने हुए चिलगोजे, सूखी हुई खुरमैनी सूखे हुए सेब, बड़ी बड़ी दुरंगी सी किशमिश आदि रखी थीं! कुछ मेवे ऐसे, जिन्हें शायद मैंने आज तक नहीं देखा था, या उनका अब रूप बदल गया था!
"लीजिये, नौश फरमाइए!" कहा उसने,
मैंने एक चिलग़ोज़ा उठाया, वो भुना हुआ था, और आज के चिलगोजे से काफी बड़ा था, एक बड़े चीकू के बीज जैसा! छिला हुआ, मैंने जब उठाया था और आधा मुंह में रखा था, तो दांतों के दबने से, उसमे चिलगोजे का तेल रिस आया था! और स्वाद ऐसा, ऐसा कि मेरा तो दिमाग टटोलने लगा था वैसा स्वाद कि कहीं, कभी चखा हो! चिलग़ोज़ा अपने आप में एक बड़ी कारगर दवा है, खासतौर पर मर्दों के लिए! ये नामर्दी, सुस्ती आदि को दूर करता है, सांस बनाता है, अर्थात सांस फूलने नहीं देता, चिलगोजे के तेल की एक बूँद की मालिश से पुरुष-जननेंद्रि सशक्त हो जाती है! ऐसा कम से काम बीस दिन करना चाहिए, मैंने चिलग़ोज़ा पूरा खाया और एक खुरमैनी उठा ली, एक सूखा हुआ सा आड़ू कहूँ उसे तो कुछ गलत नहीं होगा! और वो खुरमैनी ऐसी मीठी, ऐसी मीठी कि शहद भी शरमा जाए!
"ये अफ़ग़ानी तोहफा है साहिबान!" बोला वो,
अफ़ग़ान! अफ़ग़ान का तो पुराना रिश्ता रहा है हिन्दुस्तान से, आज भी हिन्दुस्तानी तहज़ीब में इसकी मिसाल देखने को मिलती रहती है! यहाँ तक कि अंग्रेजों ने भी इसके बारे में अपने गैज़ेट में लिखा है कई बार! अफ़ग़ान से, उस वक़्त कई ज़िंदादिल इंसान हिन्दुस्तान में आते रहे, हिंदुस्तान की तारीख़ में अपना नाम दर्ज़ करवाते रहे! ऐसे बहुत से नाम हैं, बहुत से, शेर-ए-अफ़ग़ान फ़रीद खान शेर शाह सूरी उन नामों में आज भी दूर से रौशन दिखाई पड़ता है! अपने पांच सालों में, उसने वो काम किये, जिन्हें उस से पहले न किसी ने किया था, न कर पाया था, न बाद में ही किसी ने किया या कर पाया! दिल्ली में शेर शाह सूरी के बेटे, सलीम शाह सूरी का क़िला, सलीमगढ़ क़िला, इसका गवाह है! ये क़िला, अब भारतीय फ़ौज के पास है, लेकिन कुछ हिस्सा देखा जा सकता है! सलीमगढ़ का क़िला अपने अंदर बड़ा ही पुराना इतिहास रखे हुए है, अपने ज़हन में सुलाये हुए!
"बेहतरीन मेवे हैं अज़मत साहब!" बोले शर्मा जी,
एक बात और मित्रगण!
मुझे ये भी जानना था कि हम तीनों किस वक़्त के, किस हिस्से में उस वक़्त और कौन सी रौ-ए-वक़्त में मुब्तिला थे! कहने का मतलब हुआ कि, किस कालखण्ड में हम जा पहुंचे थे! वहां रियासत में, कौन क़ाबिज़ था, आसपास कौन सी रियासतें ज़िंदा थीं और अंग्रेज कहाँ थे! वैसे तो टोंक, अंग्रेजों के दखल से अलग ही रहा था, उनकी कोई दखलंदाज़ी, टोंक रियासत में नहीं थी, एक पुरानी संधि के तहत, लेकिन फिर भी, जानने को मिल जाए तो बहुत ही फ़ायदा होता!
मेवे! सच में, बेहतरीन मेवे थे वो! ताज़ा कहना चाहिए उन्हें! जानते हैं, आजकल ये सब बंद डिब्बों में मिला करते हैं, इस से इनके मौलिक-तत्व, कई खनिज और गुण ख़त्म हो जाया करते हैं! आजकल तो किशमिशों को, चीनी की चाशनी में भिगो कर सुखाया जाता है! खुरमैनी पर भी ऐसा किया जाता है, सेब के टुकड़ों पर भी ऐसा किया जाता है! तब ऐसा नहीं था, मेवे रखे तो जाते से संभाल कर, लेकिन उनके रखने के बर्तन, अगर हम आज देख लें तो यही सोचते रह जाएंगे कि आखिर इसका इस्तेमाल कैसे होता होगा! एक गोल बर्तन, बर्तन में छेद ही छेद, उन छेदों को ढकती कई जालियां, महीन जालियां, नहीं तो कपड़ा ऐसा और तब, तब उन्हें रखा जाता था, हवा लगती रहनी चाहिए, नहीं तो मेवे, मेवे ही नहीं रहेंगे! उनको खाना तब ठीक वैसा ही होगा जैसे किसी पत्ते को सूखा चबा जाना! हिन्दुस्तान में मेवे बहुत ही लम्बे वक़्त से इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं! अल्तमश, शम्सुद्दीन इल्तुतमिश या अल्तमश, दिल्ली के दूसरे सुलतान बने थे, क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ के बाद, अल्तमश, खीर खाने के बेहद शौक़ीन थे, ऐसा कोई मेवा न था जो उनकी खीर में परोसा नहीं जाता था! आज हम अगर वैसी ही खीर खा लें, बस कुछ ही चम्मच तो समझो पेट ऐसा चले, ऐसा चले कि अस्पताल की नौबत पेश हो जाए! अब क्या तो वो इंसान रहे होंगे और क्या वैसा खाना और ये मेवे! जो देह इनको पचा लेती, वो कम से कम पत्थर के मानिंद तो कही ही जा सकती थी!
"हुज़ूर!" आई आवाज़!
मैं दरअसल, छत पर लटकते हुए उस फानूस को देख रहा था, जिसकी डोर सुनहरी थी और उसमे से रौशनी बाहर झाँक रही थी! रौशनी भी कैसी! बिंदीदार! नीले रंग की, और तो और, वो फानूस ऐसे लगा था कि उसकी बिंदीदार नीली रौशनी, दीवारों पर न पड़, बस उस छत के करीब ही क़ैद थी! कमाल का फानूस था वो और उस से भी कमाल, उस फानूस को इज़ाद करने वाला! क्या सोच और क्या इस्तेमाल! आजकल कुछ ऐसा ही 'डिस्को-बॉल' किया करती है!
मैंने उस आवाज़ पर चौंका था! झट से देखा अज़मत साहब को! प्यालों में, लाल रंग की शराब परोस दी गयी थी! उसमे, आजकल की शराब की तरह की कोई हीक नहीं थी, न ही वो स्पिरिट की सी उठती हुई सी सड़ांध! बल्कि ये ख़ुशबूदार और ज़बरदस्त सी शराब लग रही थी!
"इस जानिब भी नज़र-ए-इनायत पेश हो हुज़ूर!" बोला अज़मत, मुस्कुराते हुए!
मैं भी मुस्कुरा पड़ा!
"लीजिये!" बोला वो, प्याला उठाते हुए, मुझे पकड़ाते हुए!
मैंने प्याला पकड़ा! पकड़ते ही मज़बूत जी जकड़ बनायी! प्याला भारी था! मेरी सोच से ज़्यादा भारी ही कुछ!
और मैंने प्याले से लगाया मुंह!
शराब टकराई होंठों से!
उसकी नज़ाक़त से मेरे होंठ भीगे!
मुंह खुला और शराब हलक़ में उतरी!
पहला घूँट, गले से नीचे!
ठंडी! ख़ुशबूदार! लज़्ज़त भरी!
जैसे, किसी आफ़रीना के लज़्ज़त भरे होंठों की नज़ाक़त!
एक घूँट और!
और जैसे, मैं, हम से जुदा!
तन्हा! तन्हा, खुद से भी खुद नहीं!
आफ़रीन! बस, दिल-ओ-दिमाग़ में हँसता-खेलता, सिर्फ ये लफ़्ज़!
मैंने प्याले का आखिरी घूँट खत्म किया, उतारा हलक़ के नीचे! चेहरे पर लाली छा गयी थी, मुझे पता चल रहा था, मुझे तपिश महसूस हो रही थी! ये ठीक वैसा ही था की कोई आफ़रीना ज़रीना आपको प्याला पिलाये और उसके हाथों की छुअन से आपके गाल लाल हो जाएँ! एक ताप सा भर जाए चेहरे पर! जिसे आप महसूस कर सकें! छुएं तो आपकी उँगलियों के पोर ठंडे महसूस हों! ठंडे जैसे आपने अपने जिगर को छू लिया हो! चेहरे की वो लाली, फिर उभरे और भर आये आँखों में! जब भर आये आँखों में, तो झाँकने भी लगे! जब झाँकने लगे तब आपकी आफ़रीना से कुछ छिपा न रहे! सोचिये, उस लम्हे का तस्सव्वुर कीजिये! क्या बीते! क्या बीते जब दिल का चोर ही पकड़ा जाए, सबकुछ क़ुबूलता हुआ! तो साहब, हमारे चोर ने कर लिया था इक़बाल-ए-ज़ुर्म! चेहरा वो चोर था और लाली, वो सुर्ख़ी, उस शराब का हुस्न! तो जी, हम पकड़े गए! रंगे हाथों! कैसा छिपाव! कैसा बचाव! पकड़े गए, तो साहब, पकड़े ही गए!
मैंने ख़त्म हुआ वो प्याला, नीचे, उस तश्तरी पर रखा! 'ठक; की एक प्यारी सी आवाज़ के साथ वो टिक गया उस तश्तरी पर! मैंने शर्मा जी को देखा! उनका भी आखिरी ही घूँट था! फिर मैंने कमल साहब को देखा, उनका भी आखिरी घूँट ही था, बस गिलास को पकड़, हिला रहे थे गोल गोल, जैसे उसको समेट रहे हों, ताकि एक बूँद भी ज़ाया न जाए! चिपकी न रहे उसके तले से! ठीक वैसे ही! और फिर, गरदन ऊपर कर, ख़त्म कर लिया अपना भी जाम! न हमने मुंह बिचकाया, न सिलवटें पड़ीं माथे पर, न नाक ही टेढ़ी-मेढ़ी की! ऐसी बेहतरीन शराब थी वो! ऐसी शराब का अब मिलना, शायद ही मुमक़िन हो पाये!
"बेहतरीन शराब!" बोले शर्मा जी,
"कोई शक़ नहीं!" बोले कमल जी,
"न कोई शुबह ही!" मैंने भी कह ही दिया!
"शुक्रिया!" बोला अज़मत!
और आगे कर दी वो कटोरी, जिसमे चिलगोजे भरे थे, मैंने उठा लिया एक! खाया आधा और चबाता रहा! मजा लेता रहा उस चिलगोजे के स्वाद का!
तभी बैजन के साथ आया कोई अंदर, हम पहचान गए उसे! वो हरदेव था! मुस्कुराया और बैठ गया साथ ही, अपनी तलवार एक तरफ रख दी, और अज़मत से कुछ ख़ुसूसी-गुफ़्तगु में मुब्तिला हो गया!
"अब शायद आगे चलें हम?'' बोले शर्मा जी,
"हाँ!" कहा मैंने,
"और लें हुज़ूर?" बोला अज़मत, यकबयक से मुख़ातिब हो कर हमसे!
"शुक्रिया! आप लें हरदेव साहब?" पूछा मैंने,
"जी, ज़रूर!" बोला वो,
और अपने प्याले में, परोस ली शराब!
ले लिए कुछ पिस्ते हाथों में, और फिर से मशगूल अज़मत के साथ!
फिर वे दोनों उठे, हमें देखा, उनके हथियार वहीँ रखे थे यही तक, वे नहीं उठाये थे उन्होंने,
"मुआफ़ी चाहेंगे, अभी लौटते हैं!" बोला अज़मत!
"कोई बात नहीं, तक़्क़लुफ़ न करें!" कहा मैंने,
"आते हैं बस!" बोला हरदेव, मुस्कुराते हुए!
और वे चले गए बाहर, पर्दा, फिर से झूल कर, ठीक वहीँ आ गया, जहां पहले था! यही तो काम है पर्दे का! न जाने कितनी बार बे-आबरू हुआ करता है ये भी! जबकि, कितनी ही आबरुओं की निगेहबानी किया करता है! है न तरस का हक़दार! बताएं दोस्तों! है या नहीं!
"अब सौ काम होंगे?" बोले कमल जी,
"हाँ, बारात है न!" कहा मैंने,
"तमाम इंतजामात भी तो देखने हैं कि कहीं कोई चूक न हो जाए!" बोले शर्मा जी!
"सो तो है!" कहा मैंने,
"और आखिर, रसूखदार के बेटे का विवाह है!" बोले कमल जी!
कमल जी!
सच कहता हूँ! वो तो सच में ही, उन पलों में जीने लगे थे! जैसे, वही सबकुछ असल हो, और बाकी कुछ नहीं! उनके बतियाने का अंदाज़, चीज़ों को देखने का, समझने का, ठीक वैसा ही हो चला था जैसे वो खुद ही वाबस्ता हो उठे हों उस रात से! उस जगह से!
तभी बाहर से, आवाज़ आई!
उस आवाज़ से हमारे कान हुए खड़े!
ये आवाज़ तो पायजेब जैसी थी!
कोई बढ़ रहा था हमारे पास आने के लिए!
तो जी हम, सब हुए मुस्तैद! न जाने कौन है? कौन औरत है? किसलिए आई है? जनानखाना छोड़, इस कमरे में क्यों चली आ रही हैं? ऐसे पता नहीं कैसे कैसे ख़यालात दिमाग में उपजने लगे थे! नज़रें सामने ही बंध गयी थीं!
और!
पर्दा था! बीच में से पर्दा हटा!
घूंघट ढके, सुर्ख लाल कपड़ों में क़ैद, एक रौशनाई, चांदी सी रौशनाई या चांदनी खुद ही, जैसे क़ैद थी! मैंने उसके हाथ देखे थे, उसके साथ, दो और क़नीज़ें थीं, कमरे में छोड़ उसे, वे लौट गयी थीं! उसके कमरे में आते ही, कमरा इत्र की जानलेवा, हाँ जी! जानलेवा! उस जानलेवा महक से सराबोर हो उठा! उसका कद, मेरे से ऊंचा था, साफ़ दीखता था! देह, बलिष्ठ, कसी हुई और गठाव वाली थी! यूँ कहूँ कि उसके कपड़े किस लम्हे हार मान जाएँ सिलाई से, पता नहीं जी! चुस्त और गज़ब! कब वो रौशनाई क़ैद से आज़ाद हो जाए तो क़हर सा बन टूटे हमारे ऊपर तो!
उसने झुक कर, कोर्निश कर, आगे क़दम बढ़ाया! मेरी नज़र उसके पाँव पर पड़ी, मेहँदी से लाल हुए पाँव, माहवर से सजी सुंदर मांसल उंगलियां और अंगूठा जैसे गज़ाला हम पर ही बजने वाला हो बस कुछ ही लम्हात के बाद!
क़दम बढ़े उसके, और उसने अपने बदन को, ऐसे लरज के बाँधा, बैठते हुए कि कम दिखने वाले को भी दिखाई दे जाए! जड़ गयी थीं! उसने एक घाघरा सा पहना था, नीचे चुस्त पाजामी थी उसके, फिरोज़ी रंग की, ऊपर चमकदार सी एक छोटी सी जवाहिरी! जवाहर-कट जैसी मान लीजिये आप! जी तो किया, उठाऊं सागर, और भर लूँ प्याला!
और साहब!
जैसे कड़की हो बिजली!
उसने अपने सजीले हाथों से, घूंघट किया ऊपर!
उसने तो किया ऊपर, और हम तीनों झुके नीचे!
और जो चेहरा आया सामने, तो हम, बर्फ के मानिंद जम से गए! क्या बेपनाह हुस्न से नवाजा था उसको बनाने वाले ने! कहीं कमी न छोड़ी थी, जैसे नियाज़ और बढ़ता गया! और बढ़ता गया और तब ये बुत-ए-हुस्न, फ़लक़ में जड़ी गयी, और फिर ज़मीन पर उतारी गयी!
"इस जु'फ़-ए-क़ौसर को महरोज़ कहते हैं!" बोली वो,
महरोज़! खूब! जैसा नाम, वैसी ही खुद!
"ज़ाहिराना तौर पर, दिल कुछ और ही कहता है!" कहा मैंने,
"वो क्या! फरमाएं!" बोली वो,
अरे!! अरे!!
ये क्या कह गया मैं!
खुद ही फन्दा कस लिया अपने गले में!
"बताएं?" बोली वो,
"नहीं कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"ऐसे नासूर के मारे लाखों दिल हैं!" बोली वो,
"एक और सही!" कहा मैंने,
मुस्कुरा पड़ी वो!
कमल जी भी मुस्कुरा पड़े उसे देखकर!
"प्याला?'' पूछा उसने,
"लेकिन? हम तो पी रहे हैं?'; बोला मैं!
"इस साक़ी की गुज़ारिश भी तो क़ुबूल फ़रमायें!" बोली वो,
ओह्ह!
तो ये साक़ी हैं!
ये दिमाग भी न जाने कहाँ कहाँ कैसे कैसे ख़याल उढ़ा देता है सोच पर! हुए न खुद से ही शर्मसार! मैं भी, और वो दोनों भी! और बाजी मार ले गयी वो साक़ी!
और फिर ऐसा साक़ी?
तो फिर.........बाकी?
छोड़िये साहब!
जाम लीजिये! प्याला बनवाइए! ऐसे मौक़े कहाँ मिलते हैं!
मुस्तक़बिल में ज़ोर है! ज़बर है! तो हो जाइए बेखबर!
प्याला भर दिया गया था! सामने ही रखे थे तीन प्याले! लेकिन हम तो पहले से ही पी रहे थे! अब ये बात महरोज़ को मालूम तो थी, लेकिन क्या करें! हुस्न को एक आदत हुआ करती यही, बार बार सुनने की, और एक बार भी हाँ न करने की! हम कहें सौ बार कि 'हाँ!" और वहां से, सौ बार सुनने पर भी, एक ही जवाब! ना! अब परवाने को ग़र, ये मालूम हो, कि उसका मुस्तक़बिल खाक होने को ही है, तो शायद कभी भटके ही नहीं शमा के सामने! अब समझ आया कि जो मजा जलने में है वो 'ठंडा' रहने में नहीं! अब या तो ये उस लज़्ज़त भरी शराब का असर था, या कहीं दिल में हम ही कमज़ोर थे! भई, मानने में कुछ घिसता थोड़े ही है! तो मान गए थे हम! अब दुधारी तलवार हो सामने, तो कैसे काट हो! इसके लिए तो कोई गुज़ीदा तलवारबाज ही चाहिए! तो तलवारबाजी आती तो है लेकिन सिर्फ उतनी ही, जितने में 'गुजर' हो जाती है! उस से ऊपर की सोची नहीं, और जी, सच बात तो ये है कि ऐसी दुधारी तलवार सामने हो, तो कटने का मजा कुछ और ही होगा! अब चाहे जलो! चाहे काटो! बात एक ही है! अल्फ़ाज़ों से खेलना नहीं आना चाहिए, साफ़ साफ़ कह देना चाहिए, सो जी, हमने तो खोल के रख दी अपनी किताब! बांच लो, जो बंच जाए!"
"क़ातिब साहब?" आई आवाज़!
अब आवाज़ क्या आई, मैं तो अजिसे लाल रंग के गुलाल से भरे उस गुबार से बाहर आ गया!
"क़ातिब?" पूछा मैंने,
"जी!" बोली वो,
"अजी, हम क़ातिब कहाँ!" कहा मैंने,
"रहने दीजिये जनाब! क़लम-ए-बसर से क़ाफ़िया-ए? क़ाफ़िया ए?" पूछा उसने मुझसे, मुस्कुराते हुए, अब सुर्ख़ लाल होंठों पर खेलती क़ज़ा की बारी थी, हमें क़त्ल-ओ-ग़ारत करने की! सो, महरोज़ ने वो दांव भी खेल ही दिया था!
"क़ाफ़िया-ए?" बोली फिर से,
पूरा करना चाहती थी रदीफ़!
"क़ाफ़िया-ए?" बोली वो,
"क़ाफ़िया-ए-हुस्न!" कहा मैंने,
और उसने हँसते हुए, बढ़ा दिए जाम हमारी तरफ!
अब समझा!
आय समझ, भले देर से ही सही! लेकिन आया!
कौन सा क़ातिब और काहे का क़ातिब!
बला की खिलाड़ी थी महरोज़ तो!
पानी की वो लहर, जो दीखती तो बेहद मुलायम है, जिसके सिरों पर, शरारती-ओ-श'रीर रौशनी और झिलमिलाती धूप मिलकर, फूल से सजा देते हैं, नाज़ुक पंखड़ियों वाले फूल! ठीक वैसी ही एक लहर, एक मौज, लेकिन, जब छू जाए वो मौज बदन से, तो किसी पैने धारदार हथियार की तरह से रेत दे बदन के उस हिस्से को, जो उसकी उस छुअन में आया! वैसी ही मौज! कुछ ऐसी ही मौज वाली थी वो महरोज़!
मैं जैसे ही, उस प्याले को लगाने वाला था अपने होंठों से, कि उसने पैंदा पकड़ लिया हाथ से अपने! मेरी नज़रें मिलीं उस से, उनस एदो बार आँखें मूंदकर, जैसे मुझे रोका वो प्याला पीने से! मैं रुक गया! कर लिया हाथ नीचे अपना प्याले के साथ!
शायद, क़ज़ा को धार लग चुकी थी, या फिर मेरी रगों में कुछ तूफ़ान के से आसार वो भनप चुकी थी! मेरी निगाहें उसके रुख़सार से लिपटी ही रहीं!
"ऐसी तौहीन?" बोली वो,
तौहीन?
क्या?
शर्मा जी और कमल जी के प्याले, नीचे हो गए हाथों समेत!
"ये क्या फ़रमा रही हैं आप, मोहतरमा? नाज़नीन? तौहीन? ऐसी हिमाक़त का तो मैं तस्सव्वुर भी नहीं ला सकता अपना ज़हन में? ऐसा क्या लगा आपको, गुलसार?" पूछा मैंने,
वो हंसी!
खिलखिलाकर!
कमाल था!
एक तो इलज़ाम! और ऊपर से ये हंसी!
एक तो करेला, वो भी नीमचढ़ा!
अब हंसने का सबब न आया समझ!
"मोहतरमा! ज़रा करम करें इस बन्दे पर! कुछ इल्तज़ा की थी मैंने, चंद लम्हात पहले, ज़रा ग़ौर फ़रमायें! गुज़ारिशमन्द हूँ!" कहा मैंने,
उसने हंसी पर काबू किया अपनी!
अपनी खिलते सुर्ख़ होंठों पर, हाथों की खूबसूरत उँगलियों का ताला डाला!
नज़रें रखीं मुझ ही पर!
नज़रों में क़ज़ा! लेकिन मेरी सजा!
"आप तो संजीदा हो गए!" बोली वो,
"आपने इलज़ाम भी तो संजीदा ही लगाया मुझ पर!" कहा मैंने,
"इरादा न जान सके!" बोली वो,
"कौन सा इरादा, मोहतरमा?" पूछा मैंने,
"हमने क्या कहा था भला? ज़रा बतलाएं?" बोली वो,
"यही कि तौहीन!" मैंने कहा,
"हाँ, तौहीन! वो तो आपने की, बजा फरमाये आप!" बोली वो,
क़यामत का दिन देखूं मैं! कौन सी तौहीन भला?
"करम! नाज़िया! करम! अब बटला दें, कौन सी तौहीन इस अबस, अब्तर से हुई?" कहा मैंने, गुज़ारिश करते हुए! दिल पर हाथ से सहलाते हुए!
"ना बताएं तो, क्या कीजै?" बोली शरारत से!
"अब ये तो ज़बरदस्ती हुई, हुई या नहीं?" पूछा मैंने,
"ज़बरदस्ती?" बोली वो,
"और नहीं तो क्या?" कहा मैंने,
फिर से हंस पड़ी वो!
फिर से हंसी? कमाल है, यहां जिगर का हाल, हलाल हुए जा रहा था और उसे हंसने की फ़ुरसत भी मिले जा रही थी!
"देखने, समझें!" कहा मैंने,
"क्या?" बोली वो,
"अब इतनी भी भोली और कमसिन नहीं हैं आप!" कहा मैंने,
"गुजश्ता तो हैं हम ता'रीक में!" बोली वो!
"आप जी, पहेलियाँ न बुझाएं! तौहीन कैसे हुई, ज़रा ये समझाएं!" कहा मैंने,
"जानना चाहते हैं?" पूछा उसने, मुस्कुराते हुए!
"आखिरी सांस तलक!" कहा मैंने,
"शबाब-ओ-शबाब!" बोली वो,
गोल गोल बड़ी बड़ी आँखों में, और तब डाले हुए!
"क्या?" शरारत से पूछा!
"शबाब-ओ-शराब!" कहा मैंने,
"ये दोनों ही, आतिश हैं, हैं या नहीं?" पूछा उसने,
"हाँ, हैं! इसमें भला क्या शक़? क्यों जी शर्मा जी, कमल जी?"
मैंने उनको भी इस मुबाहिसे में शामिल कर लिया तपाक से!
"बजा फ़रमाया आपने!" कमल जी ने कहा,
"आहन, बजा ही फ़रमाया, लेकिन ये मोहतरमा तो.........!" कहा मैंने,
बात न पूरी होने दी मेरी महरोज़ ने! हंस पड़ी!
"हाँ जी, आतिश हैं, फिर?" पूछा मैंने,
"ये, इज़्ज़त की तलबग़ार हुआ करती हैं! बताइये, सच या झूठ?" पूछा उसने,
"हम्म, हाँ! सच!" कहा मैंने,
"अब, इज़्ज़त न हो, तो तौहीन नहीं?" पूछा उसने,
"बेशक! तौहीन है!" कहा मैंने,
"मानते हैं न आप?" बोली वो,
"हाँ, मानता हूँ!" कहा मैंने,
"अब?" बोली वो,
"अब?" मेरे मुंह से निकला!
खेल गयी फिर से नुसरती खेल! खेल गयी!
अब! महरोज़ के इस अब का मतलब था, कि मैंने महरोज़ से पहले ये नहीं माना था, या मानता था, उसके समझाने के बाद माना! एक तो ये अब!
और दूसरा अब! उसके मायने, बड़े ही ख़तरनाक़! दिल में डमरू सा बज उठा! ज़रा सोचिये, कि क्या मायने हैं उस अब के!
"अब?" बड़ा ही अजब सा 'अब' था ये तो! सीने में धौंकनी सी चलाने लगा था! और वो, वो बला! आफ़त बन, टूटे जा रही थी हम पर! उसकी एक एक शोख अदा, हमारे में नश्तर सा भोंके जा रही थी! नश्तर भोंका तो जाता लेकिन, ख़ून इस क़दर हमारी रगों में जम चुका था कि अब तो कोई 'आतिश' ही पिघलती उसे! सच में, ख़ून ने यहां दग़ा दे दी थी, यूँ कहो, कि एन वक़्त और लम्हे पर, साथ छोड़ बैठा था! और एक नादाँ दिल था, कभी कुछ कहता और कभी कुछ! डांटा जाता उसे, तो मुंह बना लेता! मुंह बनाता तो ज़ोर से धड़कने लगता! ज़ोर से धड़कता तो आँखों में सुर्ख़ी छा जाती, सुर्ख़ी छा जाती तो चोर झांकता, जो चोर झांकता तो पकड़ा ही जाता! तमाम इंतजामात कर दिए गए थे! अब करें तो क्या करें! और वैसे भी दोस्तों, दिल ऐसा किसका है, जो पामाल नहीं होना चाहता हुस्न की गिरफ़्त में! कोई ऐसा धड़कता दिल है? शायद हो, आपका हो, लेकिन उस नाज़ुक लम्हे पर, हमारा दिल तो मोम के मानिंद पिघले जा रहा था! दिल की बात ज़ुबान पर न आ जाए कहीं, बस इसी की डोर संभाले बैठे थे हम! और मदिरा के संग संग, वो दो उस डोर की पकड़, अब शायद छूटने को ही थी! और जो डोरी छूट जाती! तो क्या होता! तो क्या होता!
"अब? जवाब का इंतज़ार है हमें!" बोली वो,
अब! अब क्या जवाब दूँ! कैसे जवाब दूँ!
पहले से ही, क़ुबूल कर लिया था कि, शबाब-ओ-शराब, ये आतिश हैं! आतिश को इज़्ज़त बख़्शी जाती है, नहीं तो एक लम्हे में ही ख़ाक़ से न टूटने वाली दोस्ती मुक़र्रर ही समझो! अब? हाँ! ये है वो, दूसरा वाला अब!
अब! अब कैसे करें जी इज़्ज़त?
क्या किया जाए?
अमा वैसे तो हर एक इंसान जानता है हुस्न की इज़्ज़त करना! लेकिन जब सामने महरोज़ जैसा हुस्न हो, तो इज़्ज़त भी कई गुना बढ़ा दी जाए तो अच्छा रहता है! तो अब? अब कैसे बढ़ाएं इज़्ज़त? कदमबोसी करें? अजी नहीं! लब-बोसी करें? क्या कह रहे हैं साहब? मायने जानते हो इसके? जिस्म-बोसी करें? ना जी ना! तो अब? अब क्या करें? फंस गए खुद के ही बने जाल में!
"हुज़ूर?" बोली वो,
मैं जैसे तूफ़ान से लड़कर लौटा! लौटा, जैसे बड़ी जंग जीती हो! जैसे, मुझ जैसा कोई लड़ाका था ही नहीं मैदान में!
"महरोज़!" कहा मैंने,
वो लड़ाका, हारने की कगार पर ला पटका उसकी मुस्कुराहट ने, अगले ही लम्हे!
मुस्कुराई वो!
"जी, फ़रमायें!" बोली वो,
"ये अब और तब, कब और जब, छोड़िये और उस तौहीन पर लौटिए!" कहा मैंने,
शर्मा जी और कमल जी की निकली हंसी मेरे जवाब से! वे जान गए थे, कि मेरे पिटारे में उसके इस अब का कोई जवाब था ही नहीं! मैं तो बस ऐसे ही टटोले जा रहा था पिटारा अपना!
"वैसे एक बात कहें? इज़ाज़त है?" पूछा उसने,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
"आप, कम नही!" बोली वो,
कोई और होता तो सीना फूल गया होता! कंधे चौड़े हो गए होते! जबड़ा कस गया होता! लेकिन मेरी तो फूंक सरकते सरकते बची!
"कम ही रहने दें! वो अच्छा है!" कहा मैंने,
हंस पड़ी फिर से!
"अच्छा कैसे? ना बतलायेंगे?" पूछा उसने,
"क्या बतलाऊं?" पूछा मैंने,
"आप ज़्यादा हैं, कहा हमने, कम नहीं हैं, मायने ये थे!" बोली वो,
अब क्या कहूँ?
अब क्या करूँ?
हाँ! बगलें झाँक सकता हूँ! तो लो जी, वही करने लगा!
वो अपने होंठों को अपने दोनों हाथों के दरम्यान ढक, एक मर्तबा फिर से हंसने लगी! शर्मा जी के होंठों पर हंसी थी, कमल जी जैसे चुटकियाँ ले रहे थे!
"अरे जवाब तो दीजिये मोहतरमा को!" बोले शर्मा जी, बोले या कील घुसेड़ दी तलवे में?
"जानते सब हैं, बोलते नहीं बस!" बोली वो,
अब ये तो वही हुआ, कि मरते में दो लात और मार दो! काम ही ख़तम!
"ऐसा नहीं है महरोज़!" कहा मैंने,
लाज बचानी थी, न जाने क्यों लगता था कि शर्मा जी और कमल जी को, महरोज़ के हुस्न के पंखे की हवा कुछ ज़्यादा ही रास आ रही थी! मेरा पाला छोड़, सरके जा रहे थे महरोज़ के पाले में! ऐसा मुझे लगने लगा था!
"आप कहें, और मान लेंगे हम? आप कहें, और मान लेंगे हम? ये बाग़ है, कोई ज़बीं नहीं मेरे आली!" बोली वो!
"वाह! वाह! बहुत खूब! बहुत खूब! बेहतरीन! बेहतरीन!"
बोल उठे दोनों ही, मेरे यार जो अब, पाले में घुसने को तैयार थे महरोज़ के, बस, आधा इधर बाकी थे, तभी नज़र भर लेते थे मेरी तरफ, कभी-कभार!
आइए, जो अश'आर(शेर) कहा था मोहतरमा महरोज़ ने, मन तो मेरा भी मचल उठा था वाह! वाह! करने को! बस रुका ही रहा किसी तरह!
उसके मायने देखिये आप ज़रा!
आप कहें, तो मान लेंगे हम?
मायने ये कि आपने कहा, और हमें यक़ीन कर लिया?
ये बाग़ है, कोई ज़बीं नहीं!
मायने ये, कि ये जो सामने है वो हुस्न का बाग़ है, कोई छोटी-नन्ही सी कली नहीं, जो दिखाई भी न दे या नज़रों से चूक जाए!
क़त्ल कर दिया!
उसके उस अश'आर ने, क़त्ल करके रख दिया!
किस मौक़े पर बोला था वो भी!
पकड़े गए थे! झुठला भी न सकते थे!
"महरोज़?" कहा मैंने,
"जी?" बोली वो,
"अब ज़रा वो तौहीन वाला मसला!" कहा मैंने,
"ज़रूर!" बोली वो,
और तब, उसने उठाया वो जाम! प्याला! ज़रा सा हिलाया! हिलाने से शराब में जैसे मौज सी बन गयीं! किनारों के छूने लगीं वो मौज!
"ये देख रहे हैं?" बोली वो, प्याला मेरी तरफ बढ़ा कर,
"हाँ!" कहा मैंने,
"ये अब तलबग़ार हो उठी है!" बोली वो, एक अलग ही लहजे से! मुझ से तो आँखें ही न उठ सकीं ये सुन कर! मैं तो अनजान सा, उस हिलती हुई शराब को ही देखता रहा! जानबूझकर! आँखें उठा लेता, तो न जाने और नया कौन सा शगुफ़्ता खिला देती वो!
"है न? है न तलबग़ार?" पूछा मैंने,
"किसकी तलबग़ार?" पूछा मैंने,
नज़रें शराब पर रखते हुए ही!
"किसी इख़लास की प्यास बुझाने को!" बोली वो!
मेरी तो सांस रुकी!
इख़लास!
खैर, टालना ही बेहतर था! अंगूर खट्टे हैं, आज अच्छी लगी ये कहावत!
तब उसने, अपनी एक ऊँगली, उस शराब में डुबोई! एक बूँद नीचे तक बह चली! उसने, हाथ घुमा कर, अपने हाथ के दरम्यान रख लिया उस बूँद को! और किया मेरी तरफ वो प्याला!
मैंने आँखें उठायीं अपनी! नज़रें मिलीं!
और तब उसने, अपनी उस शराब से भीगी हुई ऊँगली से, मेरे होंठों को गीला कर दिया! ऊँगली फिरा दी मेरे होंठों पर! मेरे सूखे से होंठ, तर हो उठे!
"अब कोई तौहीन नहीं इस आतिश की!" बोली वो!
अच्छा! अच्छा! अब समझा! तौहीन! तौहीन उस शराब की! कि बिना इज़्ज़त बख्शे, सीधा ही प्याला लगा लिया मुंह से और कर दिया प्याला खाली! अब आया समझ!
मैंने दो घूँट भरे! उसने हटाया प्याला! दिया मेरे हाथों में! मैंने पकड़ लिया! और अगले ही लम्हे उसने वो हाथ, जिसमे वो बूँद क़ैद थी, चाट ली!
दिमाग में झुनझुने खनखना उठे! महरोज़ सच में ही अलग थी! सबसे ही अलग! मैंने ऐसा साक़ी कभी सपने में भी न देखा था, उसके हाथों से पीना तो कोसों दूर की बात है!
आज तो आफ़त में पड़ी थी जान! पर निकले बाहर वहां से! उस जगह से नहीं, उस, ईमान डिगाने वाली महरोज़ के उस जाल से! शर्मा जी और कमल जी, ये तो पलटीमार साबित हुए थे! अपनी नाव के खिवैया को ही डुबोने की पूरी तैयारी कर रखी थी! पलक नहीं झपकी और पाला बदल लिया था! लेकिन! साहिबान! हम भी पुराने घाघ ऐसे ही नहीं हैं! मौक़े की नज़ाक़त को जो नहीं समझे, समझो गड्ढे में पड़ना पक्का हुआ उसका तो! गड्ढे में पड़ा और न हुआ जाए फिर खड़ा! और महरोज़! ज़ालिम ने तो जान निकाल ही दी थी! इज़्ज़त-हुज़्ज़त के चक्कर में, आज ईमान की लज़्ज़त चली जाती! वो तो संभाल लिया अपने आप को किसी तरह! नहीं तो आज नैय्या उलटी ही बह जाती! अब चलाते रो चप्पू! चिल्लाते रहो बचाओ! बचाओ! न कोई आता, न कोई रोकता! यही तो ज़माना है आजकल का! कि हम तो फिसल गए कीचड़ में, आप हाथ दो, हंसो मत, और हाथ देने वाले का हाथ ही खींच लो! कर दो उसे भी कीचड़ में गप्पमगप्पा! और मारो ठहाके!
तो किसी तरह से वो प्याला किया खाली! शर्मा जी और कमल जी, अब मुझे देखें! देखें जैसे मैं कीचड़ में गिरते गिरते बचा, बचा तो कैसे!
"और कुछ पेश करूँ जनाब?" बोली महरोज़!
और कुछ? नहीं जी नहीं! अब तबीयत हरी हो गयी है! अब ना है कोई हसरत बाकी! अब तो बस किसी भी तरह से, कुछ किया जाए यहां से!
और जैसे मेरी सुन ली उस उपरवाले ने! अंदर आया हरदेव! महरोज़ खड़ी हुई, कुछ बातें हुईं उनमे, और फिर, महरोज़ ने रुख़सती डाली! जाते जाते भी, कुछ तीर छोड़ ही गयी! और हमारी निगाहों की भी सुन लो! पर्दे के पीछे से, खुद ही तस्सव्वुर कर लिया कि अब गयी, ऐसे! और अब गयी, ऐसे! जब तक पायजेब की आवाज़ चली न गयी, निगाहों ने पीछा नहीं छोड़ा! एक सच्चे निगेहबान की तरह! क्या करें! जब अपने जिस्म के हिस्से ही बग़ावत पर उतर आएं! अब काटा तो जा सकता नहीं! तो सुन ही ली, यूँ कहिये, सुननी पड़ी उनकी खरी-खोटी!
हरदेव अंदर आया, मुस्कुराया और बैठ गया! सागर, ज़रा सा टेढ़ा किया और फिर सीधा कर दिया! शायद जायज़ा लिया था कि हमने कितना माल ग़र्क़-ए-हलक़ किया था! अब दो दो प्याले हमारे हिस्से आये थे! तो माल बचना ही था! हाँ, वैसे कितनी पी थी, ये तो हम ही जानें! कोई दूजा क्यों जानेगा! भई, क़ब्र का हाल, मुर्दा ही जानता है! तो साहब, ऐसा ही हाल था हमारा!
"शायद, महरोज़ ने ख़ास ख़िदमत नहीं की!" बोला हरदेव!
ख़िदमत? अमा हरदेव साहब! ऐसी ख़िदमत की ईमान पर बन आई!
"नहीं नहीं! खूब ख़िदमत की महरोज़ ने तो!" कहा मैंने!
"तो शायद, जाम नहीं छलके!" बोला वो,
"ऐसा भी नहीं है! खूब मजा लिया हमने!" कहा मैंने,
"तो शायद, कुछ कमी रह गयी महरोज़ से!" बोला वो,
"नहीं साहब! कोई कमी नहीं! ऊपर तलक छक गए हैं हम तो!" कहा मैंने,
"सच मान लें?" पूछा उसने,
"मानना ही पड़ेगा! ऐसा ही है!" कहा मैंने,
"खैर, आप तैयार हैं?" पूछा उसने,
"तैयार?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोला वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"अरे साहब, बग्घी तैयार है! आगे जाना है न!" बोला वो,
"अरे हाँ! हाँ! तैयार हैं हम!" कहा मैंने,
"तो आइये फिर!" बोला वो, उठते हुए, अपनी तलवार उठा ली थी उसने! जूतियां पहनीं, हमने अपने जूते पहने बाहर आ कर!
तभी सामने से अज़मत आता दिखा, मुस्कुराया वो!
"आप नहीं आ रहे अज़मत मियाँ?" पूछा मैंने,
"बस, आ रहा हूँ, आप चलें, कुछ काम हैं यहां, फ़ारिग हो लूँ, तब मिलूंगा!" बोला वो,
"बेहतर है!" कहा मैंने,
और अज़मत, मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए, कमरे में चला गया अंदर! पर्दा हिला और फिर से शांत हो गया!
"आइये, यहां से आइये!" बोला हरदेव!
"जी! चलें!" कहा मैंने,
वो हमें, एक जगह से ले गया, ये एक गलियारा सा था, वहां कई कमरे बने थे, पर्दे लगे थे, पर्दों के अंदर से रौशनी झिलमिला रही थी, इसका मतलब था, अंदर महफिलें सज रही थीं! हरदेव आगे आगे, लम्बे लम्बे डिग भर, आगे आगे चल रहा था, उसकी जूतियों की चर्रम-चर्र की आवाज़, बड़ी ही शानदार सी लग रही थी! हम आगे बढ़ते चले जा रहे थे, किस आमने से, महरोज़ दिखी, आते हुए! मुस्कुराई वो, और रोक लिया हमें! हाथ आगे बढ़ाकर!
"चल दिए?'' पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"कोई कमोबेशी तो ना रह गयी इस कनीज़ से?'; पूछा उसने,
"अरे नहीं महरोज़! बिलकुल नहीं!" कहा मैंने,
हरदेव आगे जाकर रुक गया था, हमें देख रहा था, इंतज़ार करने लगा था हमारे आने का!
"अब कब आइयेगा?" पूछा उसने,
बड़ा ही अजब सा सवाल था!
पता नहीं, आना होगा या नहीं!
आ भी पाएं या नहीं!
कल क्या हो, पता नहीं!
"कह नहीं सकता!" कहा मैंने,
"आएंगे तो ज़रूर! दिल कहता है!" बोली वो,
"फिर तो ज़रूर!" कहा मैंने, मुस्कुराते हुए!
"इंतज़ार शुरू कर दिया है हमने!" बोली वो,
इतनी तेज?
कमाल है!
ये कैसा तेज ज़माना रहा होगा! सोचने पर मज़बूर हुआ मैं! वो महज़ अलफ़ाज़ नहीं थे, उन अल्फ़ाज़ों में, वजन हुआ करता था! आजकल की तरह झूठ से लबरेज़ नहीं! खोखले नहीं! लचकदार नहीं! जो मोड़े मुड़ जाएँ! मुक़र ही जाएँ! और साहब, पहचानें ही नहीं! ये है जी आज का ज़माना! जिस थाली में खाए, उसमे छेद करे! जो कांधा सहारा दे, उसको ही कटवाए या काटे! जो छत सर छिपाए, उसकी नींव ही खोद दो! तब ऐसा नहीं था! अलफ़ाज़, महज़ अलफ़ाज़ नहीं थे! वो इंसान का ईमान था! उसका अक्स था, उसकी शख्सियत था! उसकी ज़हनियत था! इंसान अपने अल्फ़ाज़ों से पहचान लिया जाता है! ऐसे ही अलफ़ाज़ थे उस ज़माने के! हाँ, तो हाँ! अब जान चली जाए, कोई बात नहीं! ना तो ना! जान जाती हो, तो जाए, लेकिन ईमान नहीं जाए! ताकि कल की तारीख़ में वो झूठा, फ़रेबी, मक्कार न जाना जाए! क्योंकि कहीं उसका बदनुमा दाग़, उसकी आने वाली पुश्तों को दाग़दार न बनाये! ये थी अल्फ़ाज़ों की असल क़ीमत! और आज! टके टके में बिकता है ईमान! आज ऐसी क्या चीज़ है जिसका दाम नहीं? क्या नहीं खरीदा जा सकता? सबकुछ! लेकिन आज भी, हैं ईमानवाले! आज भी, हैं ज़हनियत वाले! लोग कम ही जानते हैं उन्हें! क्योंकि, उनके पास दौलत नहीं है दिखाने को! बस! ये है फ़र्क़!
"अब आप जाएँ! मुलाक़ात का इंतज़ार रहेगा!" बोली वो,
कुछ न बोल सका मैं!
कुछ हाथों में नहीं था मेरा, सो, क़ुबूल न कर सका! बस, एक फीकी मुस्कान बिखेर दी होंठों पर, चेहरे पर, एक झूठा सा जज़्बा ओढ़ लिया! और कुछ न कर सका! आगे बढ़ गया! पीछे मुड़कर भी न देखा!
हम हरदेव तक पहुंचे!
"वो! वही है बग्घी जिसमे आये थे हम, आप चलें उधर, एमी आता हूँ, कुछ सामान है, संग ले जाना है!" बोला वो,
"जी!" कहा मैंने,
और हम बढ़ गए आगे!
तभी बाएं नज़र गयी! वो फौजी-टुकड़ी, अब रवाना होने को तैयार थी! घोड़ों ने पानी-चारा ले लिया था, और उनके घुड़सवार, रक़ाब कस, अब बस, सवार होने ही वाले थे उन पर! कुछ तैयार हो चुके थे, जीन में पाँव फंसा लिए थे उन्होंने! तभी, एक और टुकड़ी आन मिली! इस टुकड़ी की पोशाक़ कुछ अलग सी थी, सर पर अंग्रेजी सी टोपी थी, लेकिन वो अंग्रेज न थे! उनकी पोशाकें भी, चमकदार और घुटनों तक आने वाले लम्बे से कुर्ते जैसी थीं! पीछे, पीठ पर, सामान बंधा था!
हम आगे बढ़े....
ऐसा लगता था कि जैसे ये बारात किसी फौजी-सरंक्षण में आगे जा रही हो! फौजी टुकड़ियों के साये में! हमें तो यही लगा था कि एक रसूखदार और सरकारी ऊंचे ओहदेदार के बेटे का ब्याह है, इसीलिए सारे इंतजामात मुक़्क़म्मल तौर पर किये जा रहे हैं! पीछे पीछे आती थीं ये टुकड़ियां, अपने साये में ही, सभी को क़ैद रखती थीं!
खैर जी, हम पहुंचे बग्घी तक, यहां पर कुल चार बग्घियां खड़ी थीं, हमारी वाली बाएं से दूसरी थी, हमारा बग्घीवाला आ चुका था और घोड़ों के मुंह पर लगे वो चमड़े के पट्टे से खींच कर ठीक कर रहा था! बग्घीवाला भी बढ़िया पोशाक़ पहने था, शायद, सरकारी मुलाज़िम ही हो वो भी! पहले तो यही बग्घियां दूरी तय किया करती थीं! जब ये चला करती थीं, तो लोग अपने आप रास्ता दे दिया करते थे! ऐसा रुतबा हुआ करता था इन बग्घियों का! मैं जब भी कभी ऐसी कोई बग्घी देखा करता हूँ तो मुझे बरबस ही ख़याल हो उठता है उस मौरिस का! उस कोचवान का! उसकी शानदार विक्टोरियन अंग्रेजी का! उसके पास भी ऐसी ही बग्घी थी, बस, ये वाली खुली थीं, छत नहीं थीं, या शायद हटा रखी हों, जो बरसात में ढक जाती हो, और मौरिस की बग्घी, उसमे छत थी! घोड़े चार जुड़ेंगे या दो, ये तो कोचवान ही जानता था, अभी तो हमारी वाली बग्घी में चार घोड़े जुड़े थे! और घोड़े भी कैसे दमदार थे! ऊंचे-ठाड़े, जैसे अरबी नस्ल के हों! उनकी अयाल ऐसी शानदार थी कि देखे ही बनती थी! अयाल से ही घोड़े की चुस्ती-फुर्ती, ताक़त का जायज़ा लिया जाता है, उसकी दुम से उसकी उम्र का! खुरों की मज़बूती से, उसकी चाल का, तज़ुर्बे का!
उन दिनों के हालात तेजी से बदल रहे थे, आसपास की रियासतों में, ब्रितान्वी दख़ल बढ़ गया था, कई रियासत घुटने टेकने वाली थीं और कुछ बग़ावत करने की क़गार पर खड़ी थीं! बग़ावत वे अकेले नहीं कर सकती थीं, इसीलिए, अंदर ही अंदर सियासी बयार बह रही थी, नए नए दोस्त मिल रहे थे, कुछ साथ छोड़ रहे थे, कुछ नयी करवटें बदली जाने लगी थीं, को वक़्त, कब नयी शक़्ल-ओ-सूरत अख़्तियार कर ले, कहा नहीं जा सकता था!
हम वहाँ आये, तो बग्घीवाले ने हमें देखा, फ़ौरन ही आगे आया, और कोर्निश की, मुस्कुराया, बग्घी का एक दरवाज़ा खोला,
"आइये हुज़ूर!" बोला वो,
"शुक्रिया!" कहा मैंने,
और हम एक एक करके, सभी चढ़ गए, इस बार मैं आखिर में चढ़ा, जब हम चढ़ गए, तो दरवाज़ा बंद करने के लिए वो बग्घीवाला आया, दरवाज़े को धकेला और किया बंद फिर, अंदर से सांकल भी चढ़ा दी उसने!
"सुनो?'' कहा मैंने,
बग्घीवाला पलटा और देखा मुझे,
"जी, मैं?" बोला वो,
"हाँ! क्या नाम है आपका?" पूछा मैंने,
"वासदेव!" बोला वो,
"अच्छा! कहाँ रहते हो वासदेव?" पूछा मैंने,
"जी गौहरपुरा!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"कभी गए हैं?'' पूछा उसने,
मैंने तो नाम ही पहली बार सुना था, मुझे नहीं पता था कि ये कोई गाँव है या कोई तहसील, नया है या पुराना!
"नहीं, कभी नहीं गया!" कहा मैंने,
"तो कभी आइये हुज़ूर! बेहद सुंदर गाँव है, आपका जी लग जाएगा!" बोला वो,
"अच्छा! शुक्रिया! हाँ, कभी आये उधर, तो ज़रूर आएंगे हम!" कहा मैंने,
"जी!" बोला वो,
"वासदेव?" बोले शर्मा जी,
"जी जनाब?" बोला वो,
"भाई, क्या पानी मिल जाएगा?" पूछा शर्मा जी ने,
"जी, क्यों नहीं! अभी लाता हूँ!" बोला वो,
और लम्बे लम्बे डिग भर, चला गया बग्घी के पीछे से, कहाँ गया था, पता नहीं! हाँ, इतना ज़रूर देखा मैंने, कि उस वक़्त वहाँ पर, एक बड़ा, बेहद बड़ा इमली का पेड़ लगा था! देसी इमली का, उस पर इमली के कटारे, गुच्छों में झूल रहे थे! दर्ज़न-चिड़िया(टेलर-बर्ड) ने उस पर कई जगह, अपने घोंसले बना रखे थे! और कभी-कभार उनके छोटे से गलों से, चहचाहट निकल आती थी, शायद उनके छोटे बच्चे भी रहे हों! आज, अफ़सोस, वो इमली का पेड़ नहीं है, कुछ है, तो बस एक ठूंठ! जो पेड़ कभी तीन मंजिल जितना ऊंचा था, आज इंसान को, सर उठकर देखता है, अपनी बूढी आँखों से! कोई फुटाव नहीं है उसमे, खोखला है, आने वाले वक़्त में, शायद उसका ये ठूंठ भी, जल कर राख हो जाएगा! ये ठूंठ अभी तक तो साक्षी है उस शानदार बारात का!
"लीजिये हुज़ूर!" आई आवाज़, इस मर्तबा दूसरी तरफ से,
वासदेव, एक जग और तीन गिलास ले आया था संग अपने, एक में पानी डाला और बढ़ा दिया शर्मा जी की तरफ! शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए पानी का गिलास ले लिया उसके हाथों से!
"आप लेंगे हुज़ूर?" पूछा बड़ी अदब से उसने,
"हाँ, पिला ही दो!" कहा मैंने,
और भरा हुआ गिलास, ले लिया मैंने,
"आप भी लें!" बोला वो कमल जी से,
"हाँ, लाइए!" बोले कमल जी, औरफिर हम दोनों ने अपने गिलास, पानी पी कर, उसको वापिस कर दिए, शर्मा जी तो पहले ही वापिस कर चुके थे, उसने और पानी की पूछी तो मना कर दिया था हमने! वो वापिस चला या, जग और गिलास रखने के लिए!
तभी हरदेव आ गया वहां! अकेला ही आया था, हाँ, उसके पीछे कई लोग थे, जो बढ़ रहे थे उन बग्घियों की तरफ ही, साफ़ था, वे सभी चल रहे थे वहां से अब!
आया हरदेव, बग्घी में झाँका, हांकने वाला दिखा नहीं, तो आसपास देखने लगा!
"आ रहा है अभी वासदेव! पानी मंगवाया था, बर्तन रखने गया है!" कहा मैंने,
"अच्छा अच्छा!" बोला वो,
और तभी दौड़ा दौड़ा आया वासदेव, कोर्निश की, और बग्घी का दरवाज़ा खोल दिया, हरदेव चढ़ा गया उसमे, और तब, सबकुछ ठीक देख, हाँक दिए घोड़े वासदेव ने आगे!
"कोई शिक़ायत तो नहीं?" पूछा हरदेव ने,
"कैसे शिक़ायत?'' पूछा शर्मा जी ने,
"कोई तक़लीफ़?" पूछा हरदेव ने,
"अरे नहीं साहब!" बोले शर्मा जी,
वो मुस्कुराया और बायीं तरफ देखने लगा,
"वासदेव??" बोला हरदेव,
"जी हुज़ूर?" बोला वासदेव,
"रहीसु दिखा?''
"हाँ जी!" बोला वो,
"कहाँ?" पूछा हरदेव ने,
"किरमा के संग!" बोला वो,
"अच्छा! अच्छा! ठीक!" बोला हरदेव,
"अब यहां से कोई डेढ़ कोस!" बताया हरदेव ने, आगे झुकते हुए, हमें!
"जहा बारात जानी है?" पूछा मैंने,
"जी....नहीं! वहाँ सब मिलेंगे! और तब, वहां से निकलेंगे आगे!" बोला हरदेव!
"अच्छा!" कहा मैंने,
बग्घी के पहियों में बंधे घुंघरू, छन्न-छन्न की मधुर सी आवाज़ें निकाल रहे थे! एक सुर सा! एक ताल हो जैसे!
मैं चुपचाप, आसपास देखे जा रहा था! एक अजब संसार! एक संसार में संसार! एक मूर्त संसार में अमूर्त संसार! एक अमूर्त संसार में मूर्त संसार! कैसा अजब संसार!
और तभी घुंघरुओं की आवाज़ दबी! घोड़ों की टापों की आवाज़ों ने दबा लिया उन घुंघरुओं की आवाज़ को! बग्घी, दायें जा कर, रोक ली, वासदेव ने! और हम सभी के चेहरे, उस तरफ घूम गए, जहाँ से वो फौजी टुकड़ियां ताबड़तोड़ भागे जा रही थीं!
वो घोड़े सरपट दौड़े जा रहे थे! ऐसी टुकड़ियां तो मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं! अब जंग कैसी होती होगी उस ज़माने में, अंदाज़ा लगाया जा सकता था! मुझे तो एक एक सिपाही ही ऐसा लगता था जैसे कोई पहलवान सा! फिर उनके कंधे पर सजी उनकी बंदूकें, कांधों पर लटका उनका असलहा-बारूद! कमर पर बंधी, म्यान वाली चौड़ी तलवारें, और छाती में छिपाया हुआ एक बड़ा सा दुधारी खंजर! सच कहता हूँ, हम जैसे अगर चार भी उन सिपाहियों में से एक को भी दबोच लें तो हमने खूब पसीना बहाया और जीत हांसिल की, मायने रखने वाली बात थी! सामने उनसे लड़ो, तो लोहा लेना ही पड़े! हाँ, पीछे से गोली दाग़ दो तो एक अलग बात है! ऐसा था एक एक सिपाही वो! उनको देख कर तो ऐसा ही लगता है कि हम आज के लोग, ठिगने, कमज़ोर और अशक्त हुए जा रहे हैं, शायद ये पैदा होते ही दवाइयों के सम्पर्क में आने के कारण है, या फिर हमारी आब-ओ-हवा ही इस लायक नहीं बची! हड्डियां भंगुर हो गयी हैं, खड़े खड़े ही गिर जाओ अगर तो हड्डी टूट जाए! कहीं से फिसल जाओ तो या तो कूल्हा टूटे या खिसक जाए! नाप उतरती रहती है, नाप उतरने का कारण ही है कमज़ोर तंत्रिका-तंत्र! तो साहब, ढाई सौ-तीन सौ सालों में, हमने जहां भौतिक उन्नति की है, वहीँ अपने देह से भी जाते रहे हैं!
अब घटना पर लौटते हैं वापिस......
वो टुकड़ियां जिस तेजी से आयीं थीं, उस तेजी से गुज़र भी गयीं! हवा के मानिंद! मुझे तो किसी घुड़दौड़ का सा नज़ारा लगा था वो!
"ये क्या है हरदेव साहब?" पूछा शर्मा जी ने,
"कुछ ख़ास नहीं! आगे एक चौकी है! वहीँ जा रहे हैं!" बोला वो,
"कोई हिफ़ाज़त चौकी?'' पूछा उन्होंने,
"हाँ, ये सब मिलेंगे वहां!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा उन्होंने,
"मैंने सोचा कोई मुसीबत आ पड़ी!" कहा मैंने,
"अरे नहीं साहब! ऐसा हरगिज़ नहीं! हमारे इंतज़ामात पुख़्ता हैं!" बोला वो,
पुख़्ता इंतज़ामात!
ये तो अच्छी बात थी! जब बारात किसी रसूखदार के बेटे की हो, तो इंतज़ामात भी पुख़्ता और वैसे ही होंगे! ये तो लाजमी है!
तो हमारी बग्घी आगे बढ़ी, घुंघरुओं की दबी दबी सी आवाज़ अब ताल पकड़ने लगी! घोड़ों की टापों के साथ मिलकर, बंदिश भिड़ाने लगी! बड़ा ही सुक़ून बख़्श देने वाला वक़्त लगा था वो! खुली बग्घी! ख़ुशबूदार इत्र से महकती बग्घी! शानदार सजी हुई! चमकदार फुलेरों से सजे घोड़े! आसमान में चमकते सितारे! जैसे सितारों को भी न्यौता दिया गया हो उस बारात का, और सजे हों वो भी आसमान में! और वो इठलाता, सफेद, शफ़्फ़ाफ़, गोरा-चिट्टा चाँद! जैसे, अपनी निगेहबानी में सब देख रहा हो! जायज़ा ले रहा हो! आगे का रास्ता दिखा रहा हो!
वो रास्ता! जो आज बियाबान पड़ा है, बे-ज़ुबान और ख़ामोश, उनींदा, अलसाया सा, कैसे रौब झाड़े जा रहा था उस रात! अपने सीने से गुजरते उस कारवाँ को आगे बढ़ाते हुए! और वो रास्ते लगे, बड़े बड़े पेड़! कैसे अपनी आँखें फाड़ फाड़ देखे जा रहे थे एक एक को! और वो झाड़ियाँ! कैसे नाप रही थीं एक एक क़दम सभी के! और उन शाखों पर बैठे वो रात के परिंदे! कैसे अपनी गरदनें उचका-उचका कर, ले रहे थे जायज़ा उस कारवाँ का! ऐसा मंजर, शायद ही देखा होगा किसी ने!
और हमारी बग्घी में लगी वो दो बड़ी लालटेनें! जिनकी रौशनी न्यौत रही थीं, परवानों को, उड़ने वाले झींगुरों को, पतंगों को! वो टकराते, और उस जाल में फंस जाते जो आसपास लपेटा गया था उन लालटेनों के नीचे!
ए वक़्त!
रुक जा!
रुक जा यहीं!
मैं नहीं लौटना चाहता अपनी फ़ीकी, बे-जान दुनिया में!
क़ैद कर ले मुझे अपने क़फ़स में!
न लौटने दे! न लौटने दे!
मैं यहीं वाबस्ता हुए रहना चाहता हूँ!
नहीं मांगता और कुछ! नहीं रखता हसरत और कुछ!
बस क़ैद! एक मुक़्क़म्मल वैद! एक क़फ़स! क़ैद कर ले मुझे!
नहीं लौटना चाहता मैं! नहीं लौटना चाहता मैं वापिस! अपनी बे-जान दुनिया में!
कुछ ऐसे ख़याल, दिमाग़ की दीवारों से आ टकरा रहे थे! कैसा हसीन वक़्त था वो! कैसा हसीन! आप यक़ीन करें दोस्तों, जो वहां का हो गया, नहीं लूटेगा वापिस, और जो लौटा! तो यहां का भी न रहेगा! तब लोग उसे, अक़्ल से पैदल, पागल तक कह डालेंगे! वो नहीं जानते, कि सिर्फ, उसका जिस्म ही अब यहां का है, दिमाग़ तो कहीं और छूट गया! ज़हनियात कहीं और छूट गयी!
"वासदेव?" कहा हरदेव ने!
और मैं जैसे जागा! कहीं और से, कहीं और आ गया उसी लम्हे!
"जी हुज़ूर?" बोला वासदेव,
"यहां से, दोमिला से हो कर जाएगा?" पूछा हरदेव ने,
"आप बताओ?" बोला वो,
"चल, वहीँ से चल!" बोला वो,
"जी!" कहा वासदेव ने,
"ये दोमिला, एक फौरी-ज़े'आबख़ाना है!" बोला वो,
"अच्छा जी!" बोले शर्मा जी,
"यहां से, रास्ता छोटा भी है!" बोला वो,
"अच्छा!| बोले शर्मा जी,
और तभी हमारी बग्घी, एक ढलान पर जा पहुंची, यहां आये तो दायें से आतीं दो और बग्घियां दिखाई दीं, वो भी यहीं के लिए आ रही थीं! तो बग्घी, धीमे हो, थोड़ा सा हिल-डुल कर, सीधी हो, धीमी रफ़्तार से, आगे बढ़ चली! अब खुरों की आवाज़ नहीं आ रही थी, मैंने नीचे झाँका, तो नीचे स्लेटी से रंग की रेत सी दिखाई दी, उसी की वजह से, पहिये उस रेत में धसक गए थे, खुर, धंस रहे थे, लेकिन घोड़ों में जान थी! खींच ही ले गए आगे! और फिर से, खुरों की हल्की सी आवाज़, आने लगी थी!
"रुक वासदेव!" बोला हरदेव,
वासदेव रुक गया! घोड़ों ने नथुने फड़काए अपने! दुम हिलायीं अपनी! हरदेव तब नीचे उतरने के लिए, दरवाज़े की सांक खोलने लगे! सांकल खोली और उतर गए नीचे, पीछे की तरफ जा, खड़े हो गए, वासदेव भी संग ही जा खड़ा हुआ उनके!
"आ गए शायद उस जगह!" बोले कमल जी,
"लेकिन यहां तो कुछ नहीं?" बोले शर्मा जी,
"वो देखो!" बोले कमल जी,
मैं भी उनकी तरफ हुआ, झुका थोड़ा सा, तो एक जगह, कुछ रौशनी सी आती दिखाई दी! लेकिन वो किसी इमारत की ओट में थी, बस रौशनी ही दिखाई दी!
"हाँ, आ गए शायद!" बोला मैं,
तभी पीछे आवाज़ें आयीं!
हमने पीछे देखा, दो बग्घियां आ चुकी थीं, कुछ लोग उतर चुके थे उनमे से, हरदेव एक से बातें कर रहा था, और दूसरे आसपास खड़े हुए थे उनके!
"आ गए वो भी!" बोले शर्मा जी,
"वो कौन?" बोले कमल जी,
"अरे! दूसरे लोग!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा कमल जी ने,
तब वो लोग, अपनी अपनी बग्घियों में हुए सवार! हरदेव और वासदेव भी लौट पड़े, बैठा हरदेव अंदर,
"चल वासदेव!" बोला हरदेव!
और बग्घी आगे बढ़ चली!
साथ से गुज़रती एक बग्घी, हमसे आगे निकल गयी, उसमे छह लोग बैठे थे, तीन तीन करके, आमने सामने!
वो बग्घी आगे निकली, तो हमारी बग्घी भी आगे चल पड़ी, हम पहले वाली बग्घी के पीछे पीछे चल दिए! और वो, पहले वाली बग्घी, एक जगह जा कर रुक गयी, बाएं से आती रौशनी उन पर पड़ने लगी! उस रास्ते पर, हिलते हुए पेड़ों की शाखों की परछाइयाँ कुछ और ही आलम बयान करती दिख रही थीं! जैसे ज़मीन पर लोग सोये हुए हों और बार बार करवटें बदल रहे हों! पहली बग्घी से आदमी उतरे और चले गए अंदर, उस बग्घी वाले ने बग्घी आगे बढ़ा दी, और फिर हमारी बग्घी को जगह मिली! रुकी हमारी बग्घी!
"आइये!" बोला हरदेव,
और तब तक, दरवाज़ा खोल दिया था वासदेव ने,
हम सब उतर गए, सामने देखा तो क्या नज़ारा था! एक हवेली सजी हुई थी! उसकी दीवारों पर, जगह जगह लालटेनें सी लटकी हुई थीं! लाल सा कांच रहा होगा तो तमाम दीवारें लाल रंग से चमक रही थीं! अंदर हवेली के रौनक थी! लोग-बाग़ आ-जा रहे थे! कोई रुक कर मिलता और कोई साथ साथ आ, अलग हो जाता था! यहां मैंने, धोती पहने कई लोग देखे थे, ये ठेठ हिन्दू परिवेश था, वे लोग आपस में बतियाते औरअपनी अपनी जगह चले जाते! उन लोगों के सतह उनके सहायक, उनके साये से भी अलग न होते थे! शानदार पोशाकों में, गज़ब के लोग शामिल थे इस हवेली की महफ़िल में!
"आइये, अंदर चलें!" बोला हरदेव,
मैंने पीछे देखा, वासदेव, बग्घी हाँक, आगे चला गया था, और हमारी बग्घी की जगह, अब एक दूसरी बग्घी आ गयी थी, उसमे से, भी मेहमान ही उतरे थे! वे सभी अपने अपने वस्त्र ठीक करते हुए, संभालते हुए, अंदर की तरफ जा रहे थे!
मैं ठगा सा खड़ा था वहां, इस ठगी में मेरे साथ कमल जी भी थे, वे एक एक चेहरा देख जैसे, याद करते जा रहे थे उन्हें! ऐसा माहौल न उन्होंने देखा था, न मैंने कभी, महफिलें बहुत देखी थीं, लेकिन बारात का मौक़ा ये पहली मर्तबा ही पेश आया था!
"हाँ, चलिए!" बोले शर्मा जी, हम दोनों के कंधो पर जकड़ बनाते हुए, आगे धकेलते हुए हमें!
"हाँ हाँ!" कहा मैंने,
और तब हरदेव आगे आगे चला, हम उसके पीछे पीछे! लोग आते जाते, हमारी तरफ देखते, आगे बढ़ते जाते, हम भी यही सब किये जा रहे थे! उन्हें देखते और आगे बढ़ जाते!
हम एक गलियारे को पार कर, एक और गलियारे में आये, यहां बड़े बड़े गमले सजे थे, हर चौपले पर, इमारत के गलियारे की, बड़े बड़े से फूलदान और गुलदस्ते सजे थे! ख़ुश्बू ही ख़ुश्बू फैली थी हर तरफ!
"आइये, इधर!" बोला हरदेव!
ये सीढ़ियां थीं ऊपर जाने के लिए! सीढ़ियों पर, छोटे छोटे से क़ालीन से रखे थे, इन्हीं पर पाँव रखते हुए आगे बढ़ना था, सो जी, हरदेव की देखादेख, हम भी ऊपर चढ़ लिए! जैसे ही ऊपर चढ़े, फूलों की पंखुड़ियाँ हमसे आ टकराईं! नज़रें ऊपर की, तो थैले से लटके थे ऊपर छत पर, हवा का रुख होता तो थैले में से वो पंखुड़ियाँ निकल कर, नीचे गिरने लगती थीं! क्या शानदार इंतज़ाम था ये! ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था! और अब हवा की सुनिए! वो गोल सीढ़ियां थीं, हमारे चलने से, हवा बनती थी, वो हवा ऊपर थैले से टकराती और थैले में से पंखुड़ियाँ नीचे आ गिरतीं! मुंह से तो नहीं, हाँ, मन ही मन वाह! कहना नहीं भूला मैं!
"आइये!" बोला वो,
"जी!" कहा मैंने,
और हमें एक जगह ले गया वो,
वहां पानी का इंतज़ाम था, बाक़ायदा एक मुलाज़िम तैनात था वहां, वो हाथ धुलवाता था, तो हमें भी हाथ धोये अपने! पानी में भी इत्र मिला था, तेज गैंदे के फूल की महक सी आई हमें! मन तरोताज़ा हो उठा!
"हरदेव जी?'' कहा मैंने, हाथ पोंछते हुए,
"जी? फ़रमायें?" बोला हरदेव!
"प्यास लगी है!" कहा मैंने,
"ज़रूर!" बोला वो,
"हाँ, पानी मिल जाता तो...." बोले कमल जी!
"आइये साहब! क्यों नहीं मिलेगा! आखिर आप, इस बारात के मेहमान हैं! बाराती हैं! बड़ी फ़िक़्र कृ आपने तो! आइये! आइये!" बोला वो,
और ले गया हमें, एक जगह, एक कमरे में! वहां, बाक़ायदा, पानी का इंतज़ाम किया हुआ था! और एक बात साहब! जो मैंने कहीं नहीं देखा! वो यहां देखा! पानी की क़िस्में! कभी सुना है? या कहीं पढ़ा है? हाँ, सुना तो नहीं, पढ़ा ज़रूर था, विज्ञान की किताब में, रसायन-शास्त्र में, तीन क़िस्में होती हैं, पहला तो वही, जो हम पीते हैं, एच-टू-ओ., दूसरा डी.टू.ओ. यानि ड्यूटीरियम और तीसरा टी.टू.ओ. यानि ट्रीट्रियम, अब ज़्यादा पता नहीं कि ये पानी ही होता है या नहीं! विज्ञान का छात्र रहा नहीं, तो पता भी नहीं, हल्का सा याद आया तो लिख दिया, गड़बड़ भी हो सकता है! मात्र पहले के अलावा पीने लायक नहीं हैं वो दोनों पानी! ऐसा ही कुछ था!
लेकिन यहां तो कमाल था जी! यहां तो, सखरी, मेड़वी, दहलवी, नक़सूरी, रिंजी जैसे पानी थे! मैं न सुने, न ही जाने! शायद, उनमे मौजूद लवणों के अनुसार त'आसीर अलग अलग हो उनकी! अब जिसको जो पचता हो, पी लीजै!
तो साहब! हमें तो दहलवी पानी ही पसंद आया! माँगा एक मुलाज़िम से, तो दे दिया गया पानी! हाँ, पानी बड़ा ही स्वाद वाला था वो, हल्की सी मिठास का ज़ायक़ा था उसमे, शायद शहद डाला गया हो! गाँव देहातों में तो आज भी मेहमानों को मीठा जल ही पिलाया जाता है! मुझे याद है, बचपन में जब जाया करते थे तब घी-बूरा मिला करती थी! सच कहूँ तो निगलना ही दूभर हो उठता था! और आज, आज तो जैसे तरस गए जी! अब कहाँ वो बूरा और कहाँ वो देसी घी! तो उस पानी में शहद था, या गुलकंद पानी या बूँदें! पानी में शहद दाल कर पियो अगर, तो ये विषाक्त भोजन को भी विष-रहित बना देता है, बशर्ते कि शहद असली हो!
खैर, पानी पी लिया हमने! रख दिए गिलास!
"आएं!" बोला वो,
और हम चले उसके पीछे!
चलते रहे! अलग अलग कमरे पड़ने लगे, कोई बंद, तो कोई खुला, किसी में से कोई निकले, किसी में कोई जा घुसे! हम फिर से मुड़े, ये पहली मंजिल थी, हवेली काफी बड़ी थी वो, और ऐसे ही एक कमरे में, हमको ले जाया गया! कमरा था या रक़्क़ाशखाना! हर तरफ फूल ही फूल! बड़े दबे गुलाब, बड़े बड़े से पर्दे! बड़ी बड़ी सी तस्वीरें! काम-मुद्रा की तस्वीरें, परन्तु, उसमे केवल स्त्री-सौंदर्य ही दिखाया गया था! दीवारों पर, शीशे जड़े थे! रंग-बिरंगे! दो बड़े बड़े से फानूस लटक रहे थे, पास उनके ही, आतिश-फानूस भी थे, रोशनियाँ दमक रही थीं उनमे से! चारों कोनों में, मेज़ रखीं थीं, ये तो अंग्रेजी मेजें लग रही थीं! चौकोर किनारों वाली, उनमे खींचने के लिए, छोटो छोटी ज़ंजीरें सी लटक रही थीं!
"तशरीफ़ रखें!" बोला हरदेव!
हम उस कमरे की रौनक में पामाल से, बैठ गए जी वहीँ, कालीन पर, कालीन पर बिछे मोटे मोटे गद्दों पर! और ले ली मसनद, लगा ली टेक और ऐसे बैठे जैसे सूबेदार अब हम ही हों वहां के!
"आप ज़रा इंतज़ार करें, मैं भिजवाता हूँ कुछ!" बोला वो,
कुछ! पहले ही एक कुछ ने, कुछ कर ही दिया था, कुछ हो जाता तो कुछ न रहता पास, कुछ न हुआ, तो कुछ तो रह गया! अब फिर से कुछ! दिमाग़ में आये कुछ! कुछ निकले बाहर और कुछ रह जाए! तो अब कौन सा कुछ था बाकी?
"क्या आलीशान कमरा है!" बोले कमल जी!
"हाँ! कमाल का है!" बोला मैं,
"अरे मुझे तो कुछ और लगता है!" बोले शर्मा जी,
"कुछ, और?" पूछा मैंने,
"हाँ! रक़्क़ाशख़ाने सा, नहीं क्या?" बोले वो,
"अमा क्या कह रहे हो?'' बोला मैं,
"देख क्यों नहीं लेते खुद ही?" बोले वो,
"हो सकता है हमसे पहले भी कोई आया हो?'' कहा मैंने, आसपास देखते हुए!
"अभी देख लेना फिर!" बोले वो,
"डरा क्यों रहे हो?" बोला मैं,
"रुको, मैं देखता हूँ!" बोले वो,
उठे, और चले खिड़की की तरफ, बाहर देखा, और इशारा किया हाथ से, एप पास बुलाने के लिए! हम दोनों उठे, और चल पड़े उनके पास जाने को!
"क्या है वहां?" पूछा मैंने,
"देखिये तो?" बोले वो,
मैंने देखा बाहर झाँक कर, नीचे बड़ी ही रौनक थी! शामियाने गड़े थे!
"इंतज़ाम तो वाक़ई में ज़बरदस्त है!" कहा मैंने,
"हाँ, वो देखो ज़रा?" बोले वो,
"क्या है?" पूछा कमल जी ने,
"कुछ मज़दूर हैं शायद?" बोले वो,
"मज़दूर?" कहा मैंने, डाली नज़र उधर, हाँ, वहां थे मज़दूर ही!
"शायद, खाने-पीने का इंतज़ाम हो?'' कहा मैंने,
"हो सकता है!" बोले कमल जी,
वहां, कुछ मज़दूर, अपनी कमर पर बोरे से लटकाये, जा रहे थे एक तरफ, क़तार बनाये, शायद, कहीं रख रहे थे उन्हें वो, किसी गोदाम आदि में! यही लगता था!
"आओ, बैठते हैं!" कहा मैंने,
"रुको! वो देखो!" बोले शर्मा जी,
"क्या है?' पूछा मैंने,
"देखो!" बोले वो,
"ये क्या है?" बोले कमल जी,
"ये! ये बंदूकें हैं!" कहा मैंने,
"अच्छा!" बोले शर्मा जी,
"और इस से पहले जो लाया गया था, वो शायद असलहा-बारूद रहा होगा!" कहा मैंने,
"असला-बारूद?" चौंक के पूछा कमल जी ने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"लेकिन किसलिए?" पूछा उन्होंने,
"ये हिफ़ाज़त-चौकी है, बताया था न!" कहा मैंने,
"अच्छा! समझा!" बोले कमल जी!
"तो ये, रोज की बात है यहां!" बोले शर्मा जी,
"हम्म, आया समझ!: कहा उन्होंने,
तभी नीचे, कुछ लोग आये, वहीँ कुछ भीड़ सी भी इकट्ठा हुई, कुछ लोग बातें करने लगे थे आपस में, कुछ जैसे राय-मशविरा चल रहा हो, ऐसा लगता था!
"आओ!" कहा मैंने,
और हम तीनों वापिस जा बैठे वहां!
"एक बात देखी आपने?'' बोले शर्मा जी,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"फ़ौज की टुकड़ियां, असलहा-बारूद, इस वक़्त उसका उतारना, कहीं कोई गड़बड़ है!" बोले वो,
"अरे नहीं!" कहा मैंने,
"कैसे नहीं?" बोले वो,
"ऐसा होता, तो यहां क्यों बुलाते मेहमानों को?" पूछा मैंने,
"साफ़ है, हिफ़ाज़त के लिए!" बोले वो,
"तो?'' कहा मैंने,
"बारात का मौक़ा और असलहा-बारूद, नहीं समझ आया!" बोले वो,
"अब छोडो यार!" कहा मैंने,
तभी बाहर आहट हुई, किसी की जूतियों की आवाज़ गूंजी, हमने वहीँ देखा!
कोई अंदर आया! अंदर आते ही, अपने पांवों से जूतियां उतार दीं, एक-दूसरे पाँव की मदद से!
एक खूबसूरत नौजवान! मुस्कुराता हुआ! हाथों में, एक बड़ा सा थाल उठाये, उसमे तीन गिलास और एक बड़ा सा घड़ा सा रखे! उसने नीचे रखा उसे, तीन कटोरियाँ भी थीं उसमे, कटोरियों का मुंह, सोने के वर्क़ से बंधा था!
"नमस्कार!" हाथ जोड़ कर बोला वो!
"नमस्कार जी!" बोला मैं,
"ये लें साहब!" बोला वो,
और एक एक गिलास हमें दे दिया उसने, गिलास पर छोटी छोटी सी तश्तरियां रखी थीं, उनमे, छोटी सी गेंदें लगी थीं, चारों तरफ, एक को पकड़ा और खोल लिया गिलास! केसर, खोया, दही, मलाई और शरबत की सी सुगंध आई!
"नौश फ़रमाइए!" बोला वो,
मैंने एक घूँट भरा! वाह!
क्या लज़्ज़त! क्या स्वाद! क्या गाढ़ा सा शरबत, अब वो शरबत था, या लस्सी, या कुछ और, पता नहीं! लेकिन ऐसा बढ़िया! ऐसा बढ़िया कि कोई जवाब ही नहीं!
"ये क्या है जनाब?" पूछा मैंने,
"ये बहार-ए-गुलनाज़ है साहब! रुहेलिया-शरबत कहिये इसे आप!" बोला वो,
"जैसा नाम, वैसा ज़ायक़ा!" कहा मैंने,
"बेहतरीन!" बोले कमल जी!
"बे-नज़ीर!" बोले शर्मा जी,
वो हंस पड़ा! मुस्कुरा पड़ा फिर!
"उम्मीद है, आपको पसंद आया!" बोला वो,
"पसंद! हमने तो आज तक ऐसा शरबत देखा भी नहीं! वो.....क्या नाम है आपका वैसे?" पूछा शर्मा जी ने,
"कातिक हूँ जी मैं!" बोला वो,
गोरा-चिट्टा! लाल-सुर्ख़ चेहरा! सुनहरे से बाल थे उसके! हाथों में जो लहरें थीं, वो सुनहरी थीं! कलाई में दो बड़े ही भारी कड़े से पड़े थे! ॐ और स्वास्तिक बना था उन पर, बीच बीच में, काले मनके पड़े थे! कद करीब सात फ़ीट होगा! जाँघों के मांस-पेशियाँ ऐसी उभरी हुई थीं कि मर्दाना जिस्म क्या होता है, दीख पड़ता था! मान गया! भाई मान गया! वो ज़माना ही कुछ और था! हम कहते हैं हम आगे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, हम पिछड़ते जा रहे हैं! हमारा पतन हुए जा रहा है!
"यहीं रहते हो कातिक?" पूछा कमल जी ने,
"जी नहीं साहब!" बोला वो,
"तो?" पूछा कमल जी ने, एक घूँट भरते हुए!
"आपने राजनौता सुना होगा, है न?" पूछा उसने,
और हमारे आधे खाली गिलास, फिर से भर दिए, मना करने पर भी!
"हाँ, सुना है, देखा भी है!" बोले कमल जी!
"जी, वही गाँव है मेरा!" बोला वो,
"बड़ा ही शानदार गाँव है जी आपका!" बोले कमल जी!
"जी शुक्रिया!" बोला वो,
"आप साहिबान देहली से आये हैं?" पूछा उसने,
"जी!" कहा कमल जी ने,
"हमारे बड़े भाई की बेटी ब्याही हैं उधर!" बोला वो,
"अरे वाह!" बोले कमल जी!
"वैसे आप यहां मुलाज़िम हैं?" पूछा शर्मा जी ने,
"जी! यहां का मुलाज़िम हूँ!" बोला वो,
"तो आप आये ये सामान लेकर?" पूछा शर्मा जी ने,
"आप देहली से हैं, तो हमारा फ़र्ज़ बनता है!" बोला वो,
"वाह कातिक!" बोले शर्मा जी,
तहज़ीब पसंद लोग! अदबी लोग! मान-सम्मान वाले लोग! आपके लिए, आपकी ख़िदमत में, जान तक निसार कर दें, ऐसे लोग!
ऐसा था मेरा हिन्दुस्तान! ऐसा! सीना चौड़ा हो जाता है! कि कम से कम, उस मिट्टी से तो त'आल्लुक़ रखते ही हैं हम!
"वैसे कातिक, बारात की जगह यहां से और कितनी दूर है?' पूछा शर्मा जी ने,
"जी, ज़्यादा नहीं, कोई तीन कोस!" बोला वो,
यानि कि, नौ किलोमीटर! यानि कि एक घंटा कम से कम!
"अच्छा, एक बात बताओ?" बोले शर्मा जी,
"जी, पूछें?'' बोला वो,
"ये नीचे क्या असलहा-बारूद रखा जा रहा है?'; पूछा शर्मा जी ने,
"जी साहब! ये चौकी है न, दो सौ सिपाही तैनात रहा करते हैं!" बोला वो,
"अच्छा! समझा!" बोले शर्मा जी,
"आपने क्या सोचा हुज़ूर?'' पूछा उसने, मुस्कुराते हुए,
"यही कि कोई जंग की तैयारी दीखै!" बोले वो, मुस्कुराते हुए!
"अरे नहीं हुज़ूर! नवाब साहब की रियासत में कभी जंग नहीं हुई!" बोला वो!
नवाब साहब! हाँ! नवाबों का शहर रहा है टोंक! नवाब आमिर खान ने ही तो नींव डाली थी इस शहर की! सवाल माक़ूल पूछा था शर्मा जी ने, और जो सवाल, मेरे दिल में, दिमाग़ में, नट बन, कलाबाजियां कर रहा था, उसके हल होने का अब वक़्त आन पहुंचा था! (मैं कभी-कभार आ की जगह आन इस्तेमाल करता हूँ, इसका जवाब शायद आप जानते हों, और कहीं कहीं दिखना की जगह दीखना, इसका भी जवाब शायद आप जानते हों, क्योंकि इनमे ठीक वैसे ही फ़र्क़ है, जैसे ज़मीन और आसमान! आप जानते होंगे, उम्मीद करता हूँ!)
"कातिक साहब?" पूछा मैंने,
"नाचीज़ को साहब न कहें हुज़ूर!" बोला वो, हाथ जोड़ते हुए!
"ऐसा न कहें कातिक! आप भाई हैं!" कहा शर्मा जी ने,
"ये तो आपका बड़प्पन है साहब!" बोला वो,
बेहद ही ईमानदार, इख़लाक़-पसंद और ज़िंदा-दिल इंसान था वो कातिक!
"कातिक?" पूछा मैंने,
"जी हुज़ूर?'' बोला वो,
"आपके नवाब साहब कौन हैं अब?" पूछा मैंने,
"आप नहीं जानते साहब?" पूछा उसने,
"नहीं!" बोले शर्मा जी,
"नाम तो सुना होगा? ज़रूर ही?'; पूछा उसने,
"हाँ, लेकिन तिजारत के चक्कर में दिमाग़ उलझ कर रह जाता है! कभी-कभार तो सुलतान का नाम तक भूल जाते हैं!" बोले शर्मा जी,
बात संभाल ली थी उन्होंने! इसीलिए उनको साथ रखना ज़रूरी पड़ता है!
"हाँ, मसरूफ़ियत का ही चक्कर है ये सब!" बोला वो!
"तो क्या नाम है नवाब साहब का?" पूछा शर्मा जी ने,
उसने दिल पर हाथ जोड़े, नमस्कार की मुद्रा में आया, हमें देखा! मुस्कुराया!
"नवाब मुहम्मद इब्राहीम अली खान!" बोला वो,
"अच्छा! हाँ, पता नहीं अकिसे उतर गया दिमाग़ से!" बोले शर्मा जी, अपने माथे पर हाथ मारते हुए!
"बेहद नेकदिल इंसान हैं, फ़रिश्ता मानें आप! रियाया के लिए तो माई-बाप हैं! एक एक को पहचान लें! वो कहते हैं, ग़र रियासत में उनकी एक भी पेट भूखा सोये तो खुदा उन्हें जहन्नुम बख़्शे और खाना हराम हो उनका!" बोला वो, फख्र से!
"क्या बात है कातिक!" बोले शर्मा जी,
"हमसी रियासत और न मिलेगी आपको हुज़ूर!" बोला वो,
"सुभान-अल्लाह! मान गए कातिक साहब!" कहा कमल जी ने!
"अरे?" बोला वो, चौंक कर!
"क्या हुआ?' पूछा मैंने,
"दौरान-ए-गुफ़्तगू ये भी न याद रहा कि बहारा खत्म हो चला है! लें, और लें!" बोला वो, वो घड़ा उठाकर!
"अरे नहीं कातिक! बस! अब और नहीं!" कहा मैंने,
"बस?" बोला वो,
:हाँ, बस!" कहा मैंने,
"तो आप फिर ये लें!" बोला वो, एक कटोरी उठाते हुए! दी मुझे!
"ये क्या है?'' पूछा मैंने,
"देखें तो सही हुज़ूर!" बोला वो,
और तब मैंने वो वर्क हटाया! मेवे-पिस्ते, केसर, गोंद-कतीरा, बादाम, अखरोट, छुआरा और न जाने क्या क्या! क्या क्या पड़ा था उसमे!
"ये फिरनी है साहब!" बोला वो,
"अरे वाह कातिक!" बोले शर्मा जी, और उठा ली कटोरी एक, दी एक कमल जी को भी! अब मीठे के शौक़ीन हैं शर्मा जी, जल्दी से हटाया वर्क़ और हो गए शुरू! मैंने भी उँगलियों से खानी शुरू की! मैं वैसे मीठा कम ही पसंद किया करता हूँ, लेकिन वो तो जैसे शाही-मिठास थी! जितना खाओ, उतना ही कम लगे! फ़िक़्र हो, कि अब खत्म और अब खत्म! पैंदा न दिखे! बस! पैंदा ही न दिखे!
"क्या स्वाद है साहब! वाह! आज तलक नहीं खायी ऐसी फिरनी!" बोले कमल जी!
"जी! कहीं और मिलेगी भी नहीं साहब, ऐसी!" बोला कातिक!
बात में दम था उसकी!
कम से कम, मैंने तो नहीं खायी थी ऐसी फिरनी! एक बार अलवर के पास ज़रूर खायी थी, लेकिन ऐसा ज़ायक़ा नहीं था उसमे! इसमें तो ऐसे ऐसे पिस्ते पड़े थे, जो शायद आज तलक नहीं देखे मैंने! ऐसे ही एक था काले रंग का, हलुफ़ कहा जाता है उसे! मानो जैसे काली सुपारी! लेकिन मुलायम! स्वाद में, जैसे खिन्नी का फल हुआ करता है मीठा वाला! ऐसा स्वाद था उसका! वो सरहिंद से मंगवाया जाता था उस वक़्त! आज तो वहां मिलता है, लेकिन हिन्दुस्तान में नहीं! कम से कम, मैंने तो नहीं देखा! यहां किसी भी बाज़ार में या किसी भी दावत में!
तो साहब, उस लाजवाब फिरनी के तो हम क़ायल हुए! और भी बातें हुईं हमारी कातिक से, बहुत कुछ जानने को मिला! ये भी, कि जहां वचन सिंह का ब्याह हो रहा था, वो धौलपुर का एक राज-प्रतिष्ठित परिवार था! वो यहां आया हुआ था, अपने सभी संबंधियों के साथ! घराती सभी वहीँ ठहरे हुए थे! कुल मिलाकर, बारात एक ऊंचे घराने में जा रही थी!
उसके बाद, कातिक ने विदा ली, और वो हमें, अब वहीँ मिलने वाला था, उधर ही, जहां बारात जाने वाली थी! हम कुछ देर वहीँ बैठे रहे, शर्मा जी उठे और गए खिड़की तक, मैं भी जा पहुंचा वहां, कमल जी भी आ पहुंचे, अब वहाँ नीचे कोई न था, बस शामियाने और कुछ अलाव जलते हुए!
तभी साथ वाले कमरे से शायद, या कहीं और से, संगीत की ताल गूंजी! किसी ने सारंगी की ताल छेड़ी थी, साथ में छोटा वाला नगाड़ा बज रहा था! और कोई गा भी रहा था!
"अरे आना ज़रा?" बोला मैं,
"चलिए!" बोले वो,
हम उस कमरे से बाहर झाँकने लगे, आवाज़, बायीं तरफ से आ रही थी! मधुर सा संगीत था, नाच-गाना हो रहा हो, ऐसा लगता था! तभी सामने से, हरदेव आता दिखाई दिया, हम वहीँ खड़े रहे, वो आया, मुस्कुराया और मेरा हाथ पकड़, ले चला कमरे में, हम सभी वहीँ आ गए!
"बैठिये!" बोला वो,
हम तीनों बैठ गए!
"मुआफ़ी! मुझे देर हो गयी!" बोला वो,
"कोई बात नहीं!" कहा मैंने,
"आपने कुछ लिया ना?" पूछा उसने,
और जेब से निकाल वो बड़ी सी डिबिया आगे बढ़ा दी, मैंने खोली, पान का बीड़ा उठाय और वो लज़ीज़ पान मुंह में रखा, शर्मा जी ने भी उठाया, कमल जी ने भी!
"हाँ! कातिक आया था!" कहा मैंने,
"अच्छा! मैंने कहा था उसे, भेजा था!" बोला वो,
"आपका शुक्रिया!" कहा मैंने,
"अरे साहब! सारी रात पड़ी है, बाद में कह लीजियेगा शुक्रिया! अभी कहाँ हुई खातिरदारी आप साहिबान की! ये तो हमारा मुस्तक़बिल आज चमक उठा है, कि आप के क़दम इस ओर बढ़ आये!" बोला वो, मुस्कुराते हुए!
हम तीनों भी मुस्कुरा पड़े!
"ये तो हमारी भी ख़ुशक़िस्मती है हरदेव जी!" कहा मैंने,
"ये तो साहब आपका बड़प्पन है!" बोला वो,
तभी आवाज़, उस नाचने-गाने की गूँज उठी! हमारे कान वहीँ जा लगे!
"ये तैयारी है जश्न की!" बोला हरदेव!
"अच्छा!" कहा मैंने,
"तो यहां से कब चलना है?" पूछा मैंने,
"बस, कुछ मेहमान आने को हैं, वे ज़रा दूर से आ रहे हैं, वे आ जाएँ, तो यहां से सब मिलकर, आगे चल पड़ेंगे!" बोला वो,
"अच्छा, हाँ, ठीक है ये भी!" बोले शर्मा जी,
"और हरदेव जी?" बोला मैं,
"जी?'' बोला हरदेव,
"वो बरात कहाँ गयी, क्या आगे?'' पूछा मैंने,
"नहीं, आगे नही साहब, वो भी यहीं हैं, इस हवेली के पीछे ही एक और जगह है, वहीँ ठहरी हुई है!" कहा उसने,
"अच्छा! इसका मतलब, सब यहीं हैं!" कहा मैंने,
"जी हाँ साहब!" बोला वो,
"तब तो कोई बात नहीं!" कहा मैंने,
"आप कुछ नौश फ़रमाएंगे और? भेजता हूँ!" बोला वो, खड़े होते हुए!
"अरे नहीं हरदेव जी! वो शरबत और फिरनी, वही अभी पेट में जगह बनाये हुए है!" कहा मैंने,
"साहब! ऐसा न कहें! मौक़ा दें! मौक़ा!" बोला वो,
और अपनी तलवार उठा, जूतियां पहन, दौड़ पड़ा बायीं तरफ!
"अब पेट में जगह नहीं है!" बोले शर्मा जी,
"अब क्या करें!" कहा मैंने,
"बात ये है कि मना ही नहीं किया जा सकता! भले ही थोड़ा लो!" कहा मैंने,
"हाँ, ये ही तो बात है!" बोले वो,
"चलो देख लेते हैं!" कहा कमल जी ने!
कमल जी को जैसे सबकुछ बेहद पसंद आ रहा था, मैं समझ भी सकता था कि क्यों! उनके लिए तो ये कोई सपना सच हुआ, ठीक वैसा ही था, सपना जिसे वो जी रहे हों, खुली आँखों से! और कोई अगर, अपना सपना जिए खुली आँखों से, तो क्या होता है, वही कमल जी का हाल था, मुझे फ़िक़्र थी कुछ अगर तो वो ये, कि जब ये सब फ़ना होगा तब कैसे पेश आएंगे कमल जी! मुझे सूरज जी की हालत भी याद है! उनका तड़पना, उनका इस दुनिया से अलहैदा हो जाना, वो भी याद है! बस देखना ये था, कि दिमाग़, कमल जी का किस करवट टेक लगाता है!
तभी बाहर कोई आया, ये दो लोग थे, पहलवान सरीखे! कमाल था, मैंने अभी तक वहां, आज के जैसा इंसान नहीं देखा था, या तो वो था नहीं या फिर था तो सामने नहीं आता था! आजकल का इंसान तो उनके सामने ऐसा लगे जैसे कोई कठपुतली! आजकल तो मशीन इस्तेमाल कर, दवा खा कर, देह को पुष्ट कर लिया करते हैं, ये मात्र दिखावे का ही है, इस से चाहे मांस-पेशियाँ कितनी ही बढ़ जाएँ लेकिन हड्डी नहीं बढ़तीं! बल्कि, वो दवा के असर से खोखली और हो जाया करती हैं, रक्त-दोष, स्नायु-दोष आदि रोग दान में अतिरिक्त मिल जाया करते हैं! जो आये थे, उनमे से एक ही अगर आज के किसी इंसान के एक झापड़ भी मार दे तो ज़िंदगी में उसकी आँखें कभी सीधा देखें ही नहीं! या फिर जबड़ा ऐसा हिले कि चेहरा का भूगोल ही बिगड़ जाए! उनमे से, एक बाहर रह गया और एक, कुछ सामान लेकर अंदर आ गया! मुस्कुराया और नमस्कार की, झुक कर! हमने भी नमस्कार का उत्तर दिया!
उसने एक बड़ा सा बर्तन रखा नीचे, उस पर कपड़ा बिछा था, कपड़ा हटाया, और तीन कटोरे निकला लिए! कटोरे उस बड़े से बर्तन के मुंह पर रखे थे, एक चमचा भी था, चमचा था या हलवाइयों का तेल चढ़ाने वाला चमचा! बड़ा था आकार में! ढक्कन खुला! और जैसे ही खुला, तेज, दूध की ख़ुश्बू आई! ऐसी ख़ुश्बू कि दूध से मुंह मोड़ने वाला यहां सारा का सारा दूध ही लील जाए! खोये की महक़, मावे की महक़ और एक और अलग महक़, जिसे बस वही जाने जो दूध पिया करता है! मुंह में पानी के बुलबुले बनने लगे थे!
और जी हमारे सामने, आया एक कटोरा! मेरे सामने रखा गया तो मैंने देखा! जो देखा तो कुछ जाना भी! वो जवे थे! जवे तो आप जानते ही होंगे, खाए भी होंगे ज़रूर ही! मैदे से बनाये जाते हैं, अक्सर औरतें बनाया करती हैं, इसमें बस हाथ का एक अंगूठा और एक ही ऊँगली लगाई जाती है, और छोटे छोटे से जवे लगातार बनाये जाती हैं वो औरतें! सेवइयों की तरह ही होते हैं, बस सेवइयां लम्बी-लम्बी हुआ करती हैं और जवे छोटे छोटे! वही दिया गया था हमें! दूध मारे खोये के, मावे के, पिस्ते-बादाम के, पीला हो उठा था, उस पर तो जैसे इतना बोझ पड़ा था कि बेचारा सर उठाकर देख भी नहीं पा रहा था बाहर का आसमान! पूरा कटोरा भरा था!
अब साहब, हाथों से ही खाना था, कोई बात नहीं जी! हाथों से ही खा लेंगे! एक एक कटोरा, उनको, शर्मा जी और कमल जी को भी दिया गया! दोनों ही दूध के पिब्बैया हैं! मैं भी कभ-कभार पेट भर दूह उड़ेल ही लिया करता हूँ पेट में! शहर वाला नहीं, थैली वाला नहीं, मशीन वाला नहीं, गाँव-देहात का ही!
उसने परोसा, और इज़ाज़त ले, बाहर चला गया! उस दूसरे के साथ बातें कीं, और सामने से हट गए दोनों, पर्दा ठीक से बंद कर दिया था उसने जाते जाते!
"कमल जी!" कहा मैंने,
"हाँ जी?" बोले वो,
"जवे हैं ये!" कहा मैंने,
"जानता हूँ जी!" बोले वो,
"कैसे हैं?'' पूछा मैंने,
"अब क्या बताऊँ!" बोले वो,
"दूध देखा?'' पूछा मैंने,
"कमाल है साहब! ज़िंदगी में ऐसा दूध नहीं देखा!" बोले वो,
"दिखेगा भी नहीं!" बोले शर्मा जी,
अपनी उंगलियां चाटते हुए!
"सही कहा आपने!" बोले वो,
"न अब ऐसे मवेशी हैं, न ही चारा! बेचारे ढोर-डंगरों का जीना मुहाल है अब तो!" बोले शर्मा जी!
"हाँ जी!" बोले कमल जी,
"अब ऐसा दूध आदमी रोज पिए, तो बिजार बनेगा या नहीं?" पूछा शर्मा जी ने,
"बिलकुल!" बोले कमल जी!
"इसीलिए यहां सभी पहलवान हैं!" कहा शर्मा जी ने,
"सही बात है!" बोले वो,
मैंने तब कटोरे को मुंह लगा लिया उठाकर उसे! और गप्प-गप्प खाने लगा!
मेरी देखा-देख उन्होंने भी ऐसा ही किया!
"इसमें गोंद-कतीरा मिला है!" बोले कमल जी,
"हाँ, गाढ़ेपन के लिए!" कहा शर्मा जी ने,
"हाँ, और आजकल तो बा-मुश्किल ही कोई जाने!" कहा मैंने,
"ये तो है ही!" बोले कमल जी,
हमने कटोरे खाली किये अपने, रख दिए! मुंह पोंछ लिए! डकार आने लगीं!
"हरे राम मेरे!" बोले शर्मा जी, डकार लेते हुए!
"पानी पीना है अब!" बोले कमल जी,
"अभी, आने दो!" कहा मैंने,
और कुछ देर बाद ही, पानी ले आया वही आदमी!
रख दिया, और पूछी खाने की, दोनों हाथ जोड़कर, मना की!
पानी पिया फिर, और वो, सामान उठा, चला गया बाहर!
फिर से नाच-गाने की आवाज़ गूंजी! लगता था कि जैसे रियाज़ किया जा रहा हो! आगे इसके बाद, सीधा वहीँ रुकना था कहाँ वो बारात रुकनी थी! वही था अंतिम मुक़ाम इस बरात का! मैंने घड़ी पे नज़र टिकाई, सवा बारह बज चुके थे, हमारा तो अंग्रजी वक़्त बदल चुका था, दिन भी बदल ही चुका था, लेकिन ये रात के कैदी अभी तलक उसी रात में क़ैद हो कर, बरात की तैयारी में लगे थे! न जाने कब से ये बरात यूँ ही चले जा रही थी! पता नहीं, कही अपने मुक़ाम पर पहुंची या नहीं! और ये ह्वेल, जब मैंने दिन में देखी थी तो उस वक़्त ये उजाड़ थी, दीवारों पर, कंटीली झाड़ियाँ उगी थीं, दरारें खुल चुकी थीं, न अब कोई मंजिल बची थी, न कोई कमरा, नीचे भट-कटैया की झाड़ियाँ फल-फूल रही थीं, उनके हल्के हरे और पके पीले फल, हमें देख रहे थे! छिपकलियां, कनखजूरे, बिच्छू, झींगुर आदि कीड़े-मकौड़े रेंग रहे थे! पत्थर बदरंग हो चुके थे, बरसात ने अपने निशान छोड़े थे पत्थरों पर, कई रुतें यहां ठहर चुकी थीं! सभी ने अपना अपना निशान नुमाया किया था यहां! लेकिन आज, आज तो यह हवेली, अपनी अज़ीम शान-ओ-शौक़त से दमदमा रही थी! इतरा रही थी! किसी नव-यौवना के जैसे, अठखेलियां कर रही थी! इसका आज साज-ओ-सिंगार देखने लायक़ था! फूलों की पंखुड़ियों से महकती, फर्श पर उन्हें पनाह देती ये हवेली, भी ज़िंदा हो चुकी थी, जी कर न सही, मरने के बाद ही सही!
उस कमरे की दीवारों पर जो काम-मुद्रा वाली तस्वीरें थीं, वो गांधार-शैली की अधिक थीं, कांगड़ा-शैली तो देखते ही बनती थी! बांस की खप्पच्चियों को गूंथ कर, पत्थरों के रंग से बनी हुई वो तस्वीरें जैसे किसी शीशे के अंदर किसी खूबसूरत बला को क़ैद किये बैठी थीं, जैसे वो अभी बाहर आ जाएँ और हम सब, रसपान में डूब जाएँ उनके सौंदर्य के! पश्तून और बल्ख़ शैली के वो कालीन, बेशक़ीमती रहे होंगे! वो दीवार पर सजे, तंज़ीर, वो छत से लटके, आई'ज़ोख़ास पर्दे, सब बेहतरीन थे! नहीं लगता था कि ये आज से ढाई सौ या तीन सौ साल पुराना रहा होगा! दीवारों पर, चित्रकारी थी, हर दीवार पर, उसके आधे में, ये मुग़ल-शैली की पहचान और पैठ बताती थीं! बीचों-बीच एक गोल सा क़ालीन बिच था, आज की तो मशीनें भी ऐसा क़ालीन नहीं बना सकतीं! उसमे एक एक तार ऐसे गूंथा गया था कि जैसे बनाने वाले ने, अपनी पूरी ज़िंदगी ले एक एक लम्हे को सुईं और धागे के साथ पिरो दिया हो! आँखें टिक जाएँ तो उधेड़ती रहें उन धागों को! नज़रें जम जाएँ तो एक रंग और उभर आये उसमे से! जैसे जैसे रौशनी बढ़े या घटे, उसके रंग भी बदलते चले जाएँ! ऐसी कारीगरी, आज तो मुमकिन ही नहीं लगती मुझे!
दीवारों पर, छोटी-छोटी मोज़ाइक-टाइल्स लगी थीं, बताता हूँ उनका भी तरीक़ा, डिज़ाइन उनका, एक बारह इंच की एक ऐसी टाइल को आप एक कोने से लगाइये, अर्थात उसका एक कोना ऊपर, एक नीचे, एक दायें और एक बाएं! अब इस्तिले में, दो मिलीमीटर के बाद, एक वृत्त बने! फिर दो मिलीमीटर के बाद, फिर से एक चतुर्भुज! औरफिर से ऐसे ही एक त्रिकोण! अब उस त्रिकोण में, एक और चतुर्भुज! इस चतुर्भुज में, एक अष्टकोण और उस अष्टकोण में, शतरंज के जैसे समाकार चौखाने! अब इस डिज़ाइन में, रंग-बिरंगे पत्थर जड़े हों, उन चौखानों की तरह! उस दो मिलीमीटर की रेखा को, सुनहरी से पत्थर से, या तार से बनाया गया हो! क्या कोई हाथ ऐसा कर सकता है? कटाई? गढ़ाई? एक ही जैसी रूप-रेखा? समान परिधि? दिमाग़ झन्न रह जाता है! झटके खाता है! ऐसे कैसे सम्भव है? कैसे सम्भव किया इन्होने? जबकि न आज जैसे परिकृष्ट एवं उत्कृष्ट औजार ही थे, न चश्मे और न कोई गणितीय-संयंत्र ही!
जी जनाब! मैं जन्नत की बातें नहीं कर रहा! इसी ज़मीन की बातें कर रहा हूँ! इसी ज़मीन की! जो देखा, बस वही लिख रहा हूँ! न एक लफ्ज़ कम और न एक लफ्ज़ ज़्यादा!
और वो तस्वीरें! औरत की जिस्मानी खूबसूरती को आँखों में बसा लेना, बेहद ही आसान सा काम लगता है, सभी कर सकते हैं ऐसा! लेकिन उसको, हू-ब-हू, रंगों की मदद से, किसी पत्थर पर उतारना, कागज़ पर उतारना, इतना आसान नहीं! और ये सब मैं, एक जगह नहीं, पांच, छह, इसी तरह बारह जगह देख रहा था! कौन कह सकता है कि वो कैमरे से खींची तस्वीरें नहीं? कौन कह सकता है कि उन्हें हाथों से बनाया गया है? नहीं! कोई नहीं! और मुझ से भी नहीं कहा गया! उनके बिखरे बाल, उनके बदन की सरवटें, उनके साज-ओ-सिंगार, झीने से कपड़े, बदन से टपकती पानी की बूँदें, फर्श पर छपे उनके गीले पांवों के अक्स, हू-ब-हू ठीक वैसे ही, ठीक वैसे ही जैसे आँखों ने अभी देखा हो उन्हें! कौन हैं वो गुमनाम कलाकार? पता नहीं! अब गुमनामी के अंधेरों में स्याहपोश हो गए हैं! बस, उनकी बनायीं तस्वीरों में उनका हुनर दीखता है, और इसीलिए दिल में उनके लिए खूब तारीफों का सैलाब उमड़ आता है!
बाहर आहट हुई! कोई आ रहा था हमारे पास!
अब जो अंदर आया, वो कातिक था! उसने कोर्निश की, मुस्कुराया!
"चलिए हुज़ूर!" बोला वो,
हम तीनों उठ खड़े हुए!
बाहर आये, जूते पहने अपने अपने!
"हरदेव कहाँ हैं?" पूछा मैंने,
"नीचे हैं!" बोला वो,
"वो नहीं आये?" पूछा मैंने,
"मुझे भेजा हुज़ूर!" बोला वो!
"कोई बात नहीं!" कहा मैंने,
"आइये हुज़ूर!" बोला वो,
और हम चल पड़े उसके पीछे पीछे!
"यहां से!" बोला वो,
इशारा करते हुए, सीढ़ियों की तरफ!
"हाँ!" कहा मैंने,
वो आगे आगे और हम उसके पीछे पीछे!
"आइये!" बोला वो,
"चलो!" बोले शर्मा जी,
अब हम जहाँ आये, वो एक खुला सा अहाता था! हम यहां से नहीं आये थे पहले, वहां पेड़ लगे थे, दो शामियाने पड़े थे, अलाव जल रहा था, और कुछ लोग, सामान उठा रहे थे!
"आइये!" बोला वो,
"ये कौन सी जगह है कातिक?" पूछा शर्मा जी ने!
"ये अस्तबल है जी, उधर!" बोला वो, रुक कर, इशारा करते हुए एक तरफ!
"अच्छा!" कहा मैंने,
"जी!" बोला वो,
"आएं, इधर आएं, ज़रा सा बच कर, गुलाब-बाड़ी है जी यहां, इस हवेली की!" बोला वो,
"इस हवेली की, समझा नहीं?" बोले शर्मा जी,
"जी, मेरा मतलब था कि हर हेवली की अपनी एक गुलाब-बाड़ी होती है यहां!' बोला वो,
"अच्छा! तभी यहां ख़ुश्बू है गुलाबों की!" कहा मैंने,
"जी!" कहा उसने,
दोस्तों!
फूल वालों की सैर!
याद है न आपको?
क्या है ये फूल वालों की सैर? नहीं? तो पढ़िए!
ये गुलाब-बाड़ी अक्सर इसीलिए हुआ करती थीं! तब तो यहाँ और शानदार और बेहतरीन गुलाब हुआ करते होंगे! गुलाब की न जाने कितनी क़िस्में हैं! न जाने कितनीं! मैंने, ज़्यादा तो नहीं देखीं लेकिन जो देखीं वो जन्नत के फूलों से कम नहीं थी!
"ये देखिये!" बोला वो,
मद्धम सी रौशनी में, वो बाड़ी नहायी हुई थी ख़ुश्बू से! गुलाब ही गुलाब! छोटे! बड़े! दरम्याने! शानदार! बस, शानदार!
हम निकलते गए वहां से, आराम आराम से, और एक जगह आ कर, मुड़ गए, सामने, बग्घियां खड़ी थीं वहां!
