वर्ष २०१४ जालौन के ...
 
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वर्ष २०१४ जालौन के पास की एक घटना!

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श्रीशः उपदंडक
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"जाग! जाग मुण्डक!" चीखी वो!
शराब के छींटे देते हुए उस अलख में! झूमती, गाती, चिल्लाती! और फिर से शराब के छींटे मारती उस अलख में!
"जाग! जाग मुण्डक!" बोली वो!
केश खुले हुए थे, तांत्रिक आभूषणों से लदी हुई, गौमा तांत्रिक, हँसे जा रही थी! वो उठा रही थी, जगा रही थी मुण्डक मसान को!
मदिरा में धुत्त थी! अलख से उठते अंगार और पतंगे, उसके नग्न-शरीर से जा चिपकते! उसे कोई असर न होता!
वो नाचती, झूमती! और चिल्लाती जाती! अलख के चारों ओर घूमती! कपाल उठाती, एक अस्थि उठाती! कालराज का नाम लेती! मदिरापान करती और अलख में झोंक देती!
"मुण्डक! मुण्डक!" फिर से चिल्लाई वो!
उसके पास ही, थोड़ा दूर, एक और स्त्री बैठी थी, उसने सफेद रंग का बस एक ही कपड़ा ओढ़ रखा था! इसी का इलाज कर रही थी गौमा तांत्रिक! उस औरत के घरवाले, थोड़ा दूर खड़े थे, एक पेड़ के पास, सब क्रिया-कलाप देख रहे थे!
गौमा उठी! चली उस औरत के पास! पकड़े उसके बाल! और खींच कर उठा लिया उसे! उस औरत ने निकाली अपनी आँखें बाहर! और फिर अपनी जीभ बाहर! जीभ ऐसे नचाये जैसे पानी चाट रही हो!
"कौन है तू हरामज़ादे?" पूछा गौमा ने!
"तेरा खसम!" बोली वो,
उसके गले से, एक भारी सी आवाज़ निकली! किसी मर्द की!
गौमा हंसी! बहुत तेज!
"मेरा खसम! आ! आ जा फिर! कर के दिखा मुझे ठंडा!" बोली गौमा!
वो औरत, मर्द की जुबां में हंसी! ठहाका मारा! और एक ही झटके में, अपने बाल छुड़ा लिए! और कूद पड़ी गौमा पर! गौमा नीचे, और वो औरत ऊपर! निकलने ही न दे नीचे से!
"साली! रंडी! रंडी साली!" बोली वो औरत, मर्द की आवाज़ में!
तब उस औरत ने, गौमा के स्तन ऐसे पकड़े, की गौमा जैसे मरने को हो गयी! मारा अपना मुंह एक स्तन पर, गौमा चिल्लाई! बढ़ाया हाथ आगे! उठायी एक लकड़ी, उस औरत के मुंह के नीचे रखा और गर्दन में घोंपने लगी! स्तन छोड़ा उसने! पकड़ी लकड़ी! इतने में ही, गौमा निकली नीचे से! स्तन से खून रिसने लगा था उसके,
"मुण्डक?" चिल्लाई वो!
और वो औरत!
खड़ी हो, हँसे! हँसे ही हँसे!
चली गौमा के पास! गौमा तो, डर गयी थी!
"हरामज़ादी! जानती है मैं कौन हूँ?" बोली वो औरत!
नीचे झुकी वो! उठायी शराब! और खींच मारी सारी बोतल!
अब तक, गौमा के होश उड़ चुके थे!
वो अपना स्तन पकड़े, चुपचाप खड़ी थी!
"इसके खसम से कह दे! ये मेरी औरत है!" चीखी वो औरत!
गौमा! भाग छूटी!
पहुंची उनके पास! और बता दिया सबकुछ!
इतनी ही देर में, उस औरत ने खाया चक्कर! और गिरी धड़ाम से!वे लोग, उस औरत को ले, चले गए वहां से!
इस बार भी हमेशा की तरह से, असफल ही हुए थे वो!
गौमा, चालीस बरस की है, अपने गुरु, आद्य नाथ के साथ रहती है, गौमा ने ये मामला, कोई छोटा-मोटा समझा था, लेकिन मामला कुछ और ही निकला!
और जब उसके गुरु को ये खबर सुनाई गौमा ने, तो उन्होंने दांत भींच लिए अपने!
"बुलाओ उसे?" बोले वो,
"किसे?" पूछा गौमा ने,
"उसके मर्द को?" बोले वो,
"उसका पता, मोहन जानता है" बोली गौमा,
"भेजो मोहन को?" बोले गुस्से से,
"कह देती हूँ" बोली वो,
और चली गयी वहां से!
दूसरे दिन,
मोहन के साथ दो व्यक्ति आये वहां, एक तो उस औरत का पति और उसके बहनोई, बाबा से बातें हुईं उनकी और उन्होंने अपना दुखड़ा सुनाया उन्हें, बाबा ने शुरू से लेकर आखिर तक सारी कहानी सुनी और फिर उनसे कुछ सवाल भी किये, जब सवालों के जवाबा मिल गए तो उन्होंने उनसे कहा,
"मुझे लगता है, ये कोई अलग ही चीज़ है, आप अपनी पत्नी को आज रात यहां लेकर आइये, मैं देखता हूँ उसे आज!" बोले बाबा,
"जी बाबा!" उस औरत के पति ने कहा,
"ले आइये कोई नौ बजे, मैं तैयारी कर लूँगा तब तक!" बोले बाबा,
"जैसी आज्ञा बाबा जी!" बोला वो व्यक्ति, और चले गए वो दोनों,
अब बाबा ने गौमा को बुलाया वहां, गौमा, अपना इलाज करवा रही थी, उसको बहुत ही गहरा ज़ख्म पहुंचा था, सूजन इतनी थी, कि साँसें लेने भी बेहद दर्द होता था, बैठी गौमा वहां,
"क्या उसने अपना नाम बताया था?" पूछा बाबा ने,
"नहीं" बोली गौमा,
"क्या लगता है तुझे वो?" पूछा बाबा ने,
"कोई मसान" बोली गौमा,
मसान सुन, बाबा ज़रा, चौंके!
"तुझे कैसे पता?" पूछा बाबा ने,
"मुण्डक हाज़िर ही नहीं हुआ?" बोली गौमा, अपने स्तन पर हाथ का दबाव बनाते हुए,
मुण्डक हाज़िर नहीं हुआ, ये एक कारण हो सकता था, और हो सकता था कि वो सच में ही मसान हो, अगर ऐसा था, तो लड़ाई बेहद ही भयंकर होनी थी!
"हम्म" बोले बाबा,
और कुछ सोचा उन्होंने,
"कल्लो कहाँ है?" पूछा उन्होंने,
"यहीं है" बोली गौमा,
"उसको तैयार कर" बोले बाबा,
"कह देती हूँ" बोली गौमा,
और उठ चली वहां से,
बाबा ने कुछ सोचा, और फिर अपनी संदूकची खोली, निकाला अपना सामान, इसमें एक कपाल, एक अस्थि, दो पसलियां और एक टखना था, अस्थियों के रूप में, ये सभी, तांत्रिक सामान हुआ करते हैं, मसान बेहद ही खतरनाक हुआ करता है, अपनी आई पर आ जाए तो बड़े से बड़े तांत्रिक को छका दे और प्राण-हरण कर ले!
सामान निकाला और रख दिया एक जगह,
एक कपड़े में बाँधा और चल पड़े अपने स्थल की ओर,
वहाँ गए, और रखा सामान, और पढ़ा एक मंत्र,
बैठे वहीँ, सामान का पूजन आरम्भ किया, दहाड़े और चिल्ला चिल्ला कर, मंत्र पढ़ते जाते!


   
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श्रीशः उपदंडक
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शाम हुई और बाबा हुए तैयार! कल्लो को सबकुछ समझा ही दिया था, कल्लो, इक्कीस या बाइस बरस की युवती थी, वो ऐसे प्रेत-बाधा जैसे कार्यों में, मदद कर दिया करती थी, वैसे मूल-कार्य ऐसा तो, उस गौमा के हाथों से ही होता था, लेकिन गौमा उस समय घायल थी, और घायल तंत्र-क्रिया में त्याज्य हुआ करता है! इसी कारण से, कल्लो को बुलाया गया था, कल्लो, भेद ही हिम्मत और जीवट वाली युवती थी, भय जैसे उस से भी खाता था!
बजे रात के नौ, वो बाधा-ग्रस्त औरत और उसका पति आ गए थे उस समय तक, साथ में बहनोई भी आया था उनका, एक बात ज़रूर गौर करने लायक थी, जहां कोई भी प्रेत-बाधा ग्रस्त व्यक्ति या औरत, किसी तांत्रिक के पास जाने से डरा करते हैं, उस औरत के साथ ऐसा नहीं था! वो तो पहले सी ही जैसे तैयार रहा करती थी! ये एक अजीब सी बात थी!
उस औरत के लाया गया एक ख़ास कक्ष में, और बिठा दिया गया, वो औरत बैठी, और उस कमरे को, घूर घूरकर देखने लगी! बाबा सामने ही बैठे थे उसके, और तब बाबा ने तंत्र-क्रिया आरम्भ की, उसमे जो कोई भी था, उसको अब उस औरत की देह में हाज़िर करना था!
मंत्र पढ़े गए, और वो औरत, लगी झूमने! अपने वस्त्र आदि सब फाड़ दिए! गुर्राए, चिल्लाये और झूमे! बाबा मंत्र पढ़ते जाएँ! उस औरत ने एकदम से झटका खाया और रुक गयी! आँखों का रंग बदला! मुंह से थूक बह निकला, साँसें जैसे रुक गयीं! और अपनी आँखों से, बाबा को घूरने लगी!
"कौन है तू?" बाबा ने पूछा,
कुछ न बोले वो औरत!
बाबा ने मारी भस्म! कुछ न हुआ!
"कौन है तू? बतला?" पूछा बाबा ने,
एकदम, गाल फाड़कर हंसी वो औरत! मर्द की हंसी में!
"बता?" गरजे बाबा!
"वहीँ बैठा रह! ओये, सरकू! वहीँ बैठा रह!" बोली वो औरत!
अब जो बाबा ने सुना, उसे सुन तो जैसे पूरे पसीने में भीग गए वो! सरकू उनके बचपन का नाम था! और अब तो इस नाम से जानने वाला उन्हें कोई न बचा था!
"सरकू! तू आया है अब!" बोली वो औरत!
बाबा की बोलती बंद!
"वो कहाँ है तेरी, वो रंडी, गौमा?" बोली वो औरत!
बाबा के बोल गले में अटके!
"सरकू! सुन, ये औरत मेरी रखैल है! मुझे जाने दे! नहीं तो इस उम्र में तेरा कुछ बुरा हो, ये अच्छी बात नहीं, समझा कि नहीं?" पूछा ज़ोर से उसने!
"तू है कौन? बता?" बोले बाबा, ज़ोर से,
"बता दूँ?" पूछा उसने,
"हाँ बता?" चीखे बाबा!
"काली पहाड़ी, और फूलै सांस, ज्यों गिरौ, कौवा नौंचे मांस!" बोली वो औरत!
बाबा न समझे कुछ भी!
कौन सी काली पहाड़ी?
कौन से कौवे और कौन सा मांस!
"खुल के बता?" बोले बाबा,
"सुरफो, सुरफो का क्या किया तूने? अ? बता? बता?" पूछा उस औरत ने!
ये सुन, जैसे बाबा का कलेजा फटा! जैसे छाती फ़टी!
"कमीने! कुत्ते! याद आया तुझे?" बोली वो औरत!
बाबा का हलक़ सूखा! थूक गटका न जाए!
"चल जा! अब जाने दे!" बोली वो औरत!
"नहीं!" बोले बाबा, और पढ़ दिया एक प्रताड़ित करने वाला मंत्र!
वो औरत, पल भर के लिए, मुट्ठी भींच, चिल्लाई! मारा घूँसा ज़मीन में!
और एक ही क्षण में फिर से सामान्य! खिलखिलाकर हंसी वो!
"तू नहीं बाज आएगा?" गुस्से से पूछा उस औरत ने!
"अपना नाम बता?" पूछा गुस्से से बाबा ने!
"बताऊँ?" पूछा औरत ने,
"बता?" चीखे बाबा!
"खटीमा का कोल्या हूँ मैं, सूअर की औलाद, रांड की औलाद!" बोली वो औरत!
कोल्या!
ये क्या सुना बाबा ने!
कोल्या, महामसानी के साधक हुआ करते हैं! मसान आदि से कभी नहीं डरा करते! ये कोल्या, पहले राजा-रजवाड़ों के लिए काले-कर्म किया करते थे!
ये ये भी एक ऐसा ही कोल्या था!
"अपना नाम बता?" बोले बाबा,
"नाम खेड़मा है मेरा!" बोली वो औरत!
"इस औरत ने क्या बिगाड़ा है तेरा?" पूछा बाबा ने,
"इस हरामज़ादी ने मेरी छाती पर पाँव रखा!" बोला वो,
"जानबूझकर?" बोले बाबा,
"मेरी इज़्ज़त खराब की इस रंडी ने!" बोली वो,
"इसे छोड़ दे!" बोले बाबा,
"अपनी लौंडिया दे दे मुझे?" बोली वो औरत!
बाबा हुए आगबबूला तब!
उठे, उठाया अपना कपाल, पढ़ा मंत्र! परोसी मदिरा और छिड़क दी उस औरत पर! भक्क से आग लगी! कमरे में आग का गुबार फ़ैल उठा! उस औरत की इस बार, अपनी चीख निकली!
और अचानक ही,
आग शांत हुई!
वो औरत, सर झुकाये, नीचे बैठी थी!
बैठे बाबा भी नीचे!
"हाँ कोल्या?" बोले बाबा!
औरत कुछ न बोले!
बस सर हिलाये अपना!
कभी दायें और कभी बाएं!
और अगले ही पल!
जैसे वो हवा में उडी! लपकी! और बाबा की गर्दन दबा ली! बाबा घिघियाए! सभी मदद को आगे बढ़े! लेकिन किसी की पार न चली! उस औरत ने गरदन तो छोड़ दी बाबा की, लेकिन उछाल उछाल कर, बाबा को अधमरा कर दिया!
घूमी अपने मर्द की तरफ!
"आज के बाद, इसे कहीं ले गया, तो तेरा खून पी जाउंगी मैं! समझा?" बोली चिल्ला के!
वो दो आदमी! दो आदमी! ऐसे भागे, ऐसे भागे! कि जैसे आज उनकी जान गयी! हाँ, वो कल्लो! उसके होश फाख्ता हो चले थे! अपनी जान पर कुछ न बने, चुपचाप देखती रही थी सबकुछ!
कोई एक घंटे बाद, वो औरत निकली वहां से, और जा पहुंची अपनी ससुराल! अब तो सब डरें उस से, कोई सामने न पड़े उसके!
पंद्रह दिन बाद,
बाबा की हालत दुरुस्त हुई, लेकिन उनको उस दिन का मलाल साल रहा था, अतः, उन्होंने, एक और बाबा से सम्पर्क किया, बाबा चखण्ड नाथ से! और कह सुनाया सारा दुखड़ा!


   
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श्रीशः उपदंडक
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बाबा चखण्ड नाथ ने सारी कहानी सुनी! बीच बीच में सवाल भी किया, गौमा, कल्लो ने जो जो देखा था, जैसा जैसा भुगता था, सब बता दिया था उन्हें!
"उस औरत की उमर कितनी होगी?" पूछा बाबा ने,
"करीब तीस के आसपास" बोली गौमा,
"कोई बाल-बच्चा?" पूछा बाबा ने,
"न, कोई न" बोली गौमा,
"कोई न?'; बाबा ने ज़रा चौंक कर पूछा,
"हाँ, कोई न" बोली गौमा,
"ये तो गड़बड़ है फिर......" बाबा ने होंठों पर, ऊँगली फेरते हुए कहा,
"कैसी गड़बड़?" पूछा दूसरे बाबा ने,
"इसका मतलब हुआ, कि उसने ही रोक लिया है!" बोले बाबा,
"हो सकता है" बोले बाबा आद्य,
"सकता नहीं, पक्का" बोले बाबा,
"अच्छा" बोले आद्य बाबा,
"इसका मतलब, वो उस मरद को उस औरत के संग नहीं लेटने देता, हम्म" बोले बाबा,
"हाँ जी" बोली गौमा,
कुछ सोचा बाबा ने, कुछ देर,
"कोल्या बताया उसने? खटीमा का?" पूछा बाबा ने,
"हाँ" बोले आद्या बाबा,
"और क्या बोला वो?" पूछा बाबा ने,
"काली पहाड़ी, फूलै सांस, ज्यों गिरौ, कौवा नौचै मांस" बोले बाबा,
"काली पहाड़ी!" बोले बाबा,
"हाँ जी, ये ही बोला था वो" बोले बाबा आद्य,
"फूलै सांस" बोले बाबा,
कुछ सोचा,
"ज्यौं गिरौ, कौवा नौचै मांस!" बोले बाबा,
"जी" बाबा आद्य ने हाँ भरी,
"ओ, मुनिया, बिसन को भेजियो?" बोले बाबा, एक लड़की से,
वो लड़की उठी, उठाया हुआ कपड़ा, रखा और चली बाहर, आई थोड़ी देर में, एक युवक आया उधर, बाबा को प्रणाम किया उसने,
"रै बिसन?" बोले बाबा,
"आदेश!" बोला वो,
और बाबा ने, बिसन को समझायी पूरी कहानी, अब तक की!
"बैठ ज़रा!" बोले बाबा,
बिसन बैठा और संग बाबा भी, अब बाबा ने बिसन को, वो जुमला सुनाया, बिसन ने दो बार सुना, और खुजाई खोपड़ी!
"इसका क्या मतलब हुआ?" पूछा बाबा ने,
बिसन ने की मगज़मारी!
"जिसने भी ये कहा है, वो कुछ बताना चाहता है!" बोला बिसन,
"बताना?" बाबा जैसे उछल पड़े!
"हाँ, कुछ बताना!" बोला बिसन,
"लेकिन क्या?" बाबा ने पूछा,
"जहां तक मेरी पूछो, तो कोल्या कुछ बता रहा है अपने बारे में!" बोला वो,
"सो तो ठीक, लेकिन क्या बताना?" पूछा बाबा ने,
"अब ये........रुको अभी" बोला वो,
लगाया दिमाग अपना!
"काली पहाड़ी!" बोला वो!
"हाँ, काली पहाड़ी!" बोले बाबा,
"यहाँ आसपास तो कोई है न काली पहाड़ी!" बोला वो,
"हाँ, ना है?" बोले बाबा,
"अब एक कारण हो सकता है!" बोला वो,
"तो जल्दी बता?" गर्राये बाबा!
"पहाड़ी काली कब दीखेगी?" पूछा बाबा से,
"मुझे ना पता, तू बता?" खीजते हुए बोले बाबा,
"सिर्फ रात में!" बोला बिसन!
बाबा की आँखें फटने को हुईं!
बाबा आद्य, उठ कर, उनके पास आ खड़े हुए,
उकडू बैठी हुईं दोनों औरतें, आगे को खिसक आयीं!
"वाह रै बिसन!" बोले बाबा!
"अब, फूलै सांस!" बोला बिसन!
"हाँ! फूलै सांस!" बोले बाबा,
"अब सांस क्यों फूलेगी? अगर, अगर कोई डर नहीं है तो, सुस्ता लै? अब है क्या, कोई डर है, वो पहाड़ी चढ़ रहा है, कोई पीछे पड़ा है, उसे है डर, तो? तो सांस फूल रही है!" बोला बिसन!
"रै मान गए, कालीदास!" बोले बाबा चखण्ड नाथ!
"हाँ जी!" बोला बिसन,
"तो रात है, कोई पीछे पड़ा है, कोई दुश्मन! तो सांस फूल रही है! अब आया समझ!" बोले बाबा चखण्ड नाथ, अपनी सफेद दाढ़ी में हाथ फेरते हुए!
"अब, ज्यों गिरै!" बोला बिसन,
"हाँ! हाँ, ज्यों गिरै!" बोले बाबा!
"ज्यों! इसका मतलब हुआ, जैसे ही गिरे!" बोला वो,
"हाँ! जैसे ही गिरे, यानि बेहोस हो?" पूछा बाबा ने,
"न! न!" बोला बिसन!
"तो फिर?" पूछा बाबा ने,
"एक बात बताओ?" बोला बिसन,
"पूछ?" बोले बाबा,
"अब रात में वो गिरे, तो रात में कौंवा कहाँ तै आएंगे?" पूछा बिसन ने!
"हाँ! भाई हाँ! रात में क्यों आएंगे? तू बता?" पूछा बाबा ने!
"इसका मतलब.........वो रात भर चला, या, कहीं छुप गया, और सुबह के वक़्त, वो गिरा, बेहोश हुआ! समझ आई?" पूछा बिसन ने!
"आई जी! पूरी आई!" बोले बाबा,
"रात भर चला, या छिपा, सुबह गिरा, और कौवन ने नौंच लियो!" बोले बाबा आद्य,
"हाँ!" बोला बिसन!
"रै मान गए जोड़ीदार! दिमाग लट्टू की तरियां घूमै तेरा!" बोले बाबा चखण्ड नाथ!
बिसन की बत्तीसी खुली!
और सच में! उसने उस जुमले को हल कर ही दिया था!
"अब आई बात समझ में!" बोले बाबा आद्य!
"लेकिन बिसन? वो कोल्या क्यों बताएगा?" पूछा बाबा ने,
"ये तो वो ही बताये!" बोला बिसन,
"है? दिमाग लड़ा?" बोले बाबा, झिड़कते हुए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"अब क्यों बताएगा, ये तो पता ना है!" बोला बिसन!
"रै? ज़ोर तो लगा?" बोले बाबा,
"कैसा ज़ोर? अब होगी कोई बात?" बोला बिसन,
"कोल्या कुछ बताना चाहता है, लेकिन किसलिए?" बाबा ने खुजाया अपना दाढ़ी वाला गाल!
"अब ये ना पता!" बोला बिसन!
"चल जा फिर, और सोचियो इस बारे में, लगा ज़रा डुबकी!" बोले बाबा,
बिसन उठा, अपना पाजामा ठीक किया, और चला बाहर,
थोड़ी सी, खलबली सी मच गयी सभी के दिमाग में! अपने अपने घोड़े दौड़ाने लगे सभी!
"आद्य?" बोले बाबा,
"हाँ जी?" दिया जवाब,
"कुछ और बात?" पूछा बाबा ने,
"न, और तो कुछ ना?" बोले वो,
"कब आ सकै वो औरत?" पूछा बाबा ने,
"बुला लेंगे जी" बोले वो,
"तो बुला ले, और खबर कर मुझे, भली?" पूछा बाबा ने,
"हाँ जी" बोले बाबा आद्य,
तो बाबा आद्य और उनकी मंडली, हुई वापिस वहां से, अब वो तो चले गए, लेकिन बाबा चखण्ड नाथ के मस्तिष्क में अखंड ज्वाला जल उठी!
"मुनिया?'' बोले वो,
"हाँ?" उठी वो,
"जइयो, लइयो फुग्गन को?" बोले वो,
"लायी" बोली वो,
और चल पड़ी वहां से, मुनिया कोई सोलह-सत्रह साल की लड़की थी, काम-काज कर लिया करती थी वहीँ, तो, थोड़ी देर में, एक बूढ़े से बाबा आ गए वहां, बाबा ने, उनको बिठाया वहां,
"क्या बात है?" पूछा फुग्गन ने,
"एक मामला है कोल्या का!" बोले बाबा,
बाबा फुग्गन की बूढी आँखें फैलीं! चश्मा किया थी, चश्मे पर, पता नहीं कितने धागे बंधे थे, चश्मा काफी पुराना है, वो धागे इसकी तस्दीक़ कर रहे थे!
"तुझे कहाँ मिला कोल्या?" पूछा फुग्गन ने,
"त्यागू का बाबा ना है? वो आद्य?" बोले वो,
"हाँ हाँ?" फुग्गन बाबा ने हाँ भरी,
"वही आया था" बोले वो,
"उसे कहाँ मिला कोल्या?" बाबा फुग्गन का एक और सवाल!
"एक औरत कर राखी है उसनै!" बोले बाबा,
"क्या?" फुग्गन बाबा ने जो बंडल निकाला था बीड़ी का, वो छूटते छूटते बचा!
"हाँ!" बोले बाबा,
अब तो बाबा फुग्गन में जागी गर्मी!
कंधे पर धरा अंगोछा, ऐसे फेंका जैसे बोझ हो! दांतों के बीच लगाई बीड़ी, खेंची माचिस, खस्स की सी आवाज़ हुई, उसके मसाले की गंध बाबा चखण्ड नाथ के नथुनों में घुसी! बाबा खखराये! और फुग्गन बाबा ने, जला ली बीड़ी!
तो जी, मुट्ठी में भींच बीड़ी को, उतारने लगे उस बीड़ी का घमंड! बीड़ी जलती जाए, और खाल के करीब होती जाए! अब बाबा भी पुराने घाघ थे! ऐसी कई हज़ार बीड़ियों की मुक्ति पहले ही कर चुके थे बाबा फुग्गन!
"तू, पूरी बात बता?" बोले बाबा फुग्गन!
अब बाबा ने, सारी बात बता दी! बाबा फुग्गन ने, अपने बूढ़े दिमाग में एक एक बात घुसाई! और पूछने लगे सवाल पर सवाल! कई सवाल ऐसे, जिसका कोई जवाब नहीं! जैसे,
"वो औरत पास आने देवे है अपने मरद को?" बाबा ने पूछा,
"आद्य तो मना ही करे था?" बोले बाबा चखण्ड नाथ!
"कोई बाल-बच्चा?" बाबा ने बीड़ी को झटके दे, और छोटा किया!
"न!" बोले बाबा,
"कभी ठहरा गरभ?" पूछा बाबा ने,
"अब मुझे कैसे पता?" बोले बाबा,
"तो पता करता?" बोले बाबा,
"अब सुनो तो सही?" बोले बाबा,
"बोल?" बोले बाबा फुग्गन!
"ये, कोल्या क्या चाहवे है?" पूछा बाबा ने,
"बात कर कोल्या से?" बोले फुग्गन बाबा,
"बता देगा?" बोले बाबा!
"तू? बात तो कर?" बोले बाबा फुग्गन!
"तुम चलोगे?" पूछा बाबा ने,
"चल लूंगा' बोले वो, बीड़ी को, धूल चटाते हुए! एक की और मुक्ति हुई!
"कहीं मार तो न देवै?" पूछा बाबा ने,
"किसे?" बाबा फुग्गन चौंके!
"उस लुगाई को?" बोले बाबा,
"न, न मारैं!" बोले फुग्गन बाबा!
तो साहब!वो शाम तो बाबा फुग्गन और बाबा चखण्ड नाथ, शास्त्रार्थ में उलझ गए! ये और भीषण हो गया जब देसी 'हसीना' ने और रंग बिखेरा! बाबा फुग्गन भी जवान हो उठे! आ गयी याद जवानी उन्हें अपनी! और बाबा चखण्ड नाथ! वो तो सरताज समझने लगे खुद को!
कोई तीन दिन बाद!
आई खबर बाबा चखण्ड नाथ के पास कि वो औरत आएगी आज शाम कोई छह बजे, तो वो आ जाएँ वहाँ, अब जो पूछना हो, खुद पूछ लें!
अब क्या था!
बाबा फुग्गन ने कपड़े पहने! कसी लंगोट! पहने अपने तंत्राभूषण और ऐसे ही, बाबा चखण्ड नाथ ने भी किया! और निकल पड़े, बाबा आद्य के पास जाने के लिए!
दोनों पहुँच लिए!
वो औरत न आई थी अभी, तो सभी इंतज़ार में बैठे थे!
"कै बज गए?" पूछा बाबा फुग्गन ने,
"साढ़े छह हो गए!" बोले बाबा आद्य, अपनी चाबी वाली घड़ी में हाथ मारते हुए!
"आने वाली होगी!" बोले बाबा फुग्गन!
"हाँ जी!" बाबा आद्य ने समर्थन किया!
तो जी,
बज गए साथ!
अब बाबा फुग्गन की जैसे मेहँदी सूखने लगी!
"कोई पूछ ही लो?" बोले वो,
"ओ कल्लो? करियो फ़ोन?" बोले बाबा आद्य,
अब फ़ोन किया, तो घंटी न जाए!
दो बार, तीन बार! कई बार!
"छहः के सात बज गए!" बोले बाबा फुग्गन!
और तभी गौमा आई, दी खबर, कि वो औरत, आ गयी है!


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब जो जो, चौकड़ी मारे बैठे थे, खड़े हो बैठे! उनके लिए वो औरत नहीं, वो कोल्या आ रहा था! पता नहीं क्या हो, गौमा तो उस कल्लो को ले, वहां से खिसक ली थी! कहीं और हमला न हो जाए! दूसरी बार भी, कोल्या ने पूछा था बाबा से गौमा के बारे में! और कल्लो ने भी देख लिया था कि उस कोल्या ने, कैसे बाबा आद्य की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी थी! कहीं और और भारी मुसीबत न बना जाए, इसीलिए दोनों हट ली थीं वहां से! और वो तीनों बाबा, अब उस कक्ष की तरफ चले जहाँ उसको बिठाया जाना था, और उसमे, कोल्या को पेश करना था! तो वे सब पहुंचे वहाँ! अलख जोड़ी, सामग्री रखी और इस बार, सुरक्षा-घेरा भी काढ़ लिया था, कहीं इस बार छह के छप्पन ने कर दे, इसलिए! तो तीनों, उस सुरक्षा-घेरे में आ बैठे! अब बागडोर, बाबा फुग्गन के हाथों में थी!
वो औरत, काले रंग की साड़ी पहने, झूमती सी, इतराती सी आ गयी अंदर! बाबा फुग्गन ने, बाकी सभी को हटा दिया वहाँ से! वे तो वही चाहते थे, फौरन ही, दबे पाँव सरक लिए वहाँ से! अब उस कमरे में, बस वो चार ही थे! वो औरत और वो बाबा!
"बैठ जा री?" बोले बाबा फुग्गन!
वो औरत जम कर हंसी!
बाबा फुग्गन को काटो तो खून नहीं उस वक़्त!
फिर भी, वो औरत, बैठ गयी नीचे, ठीक बाबा फुग्गन के सामने! और एक एक करके, सभी को देखा उसने! आद्य या सरकू! चखण्ड नाथ, साला नवरंग! फुग्गन! असली बाप की औलाद नहीं है तू फुग्गन! अब जो कहा था, वो सच था! आद्या का नाम सरकू ही था! चखण्ड नाथ का स्लि नाम, नवरंग ही था, और बेचारे बाबा फुग्गन! सत्तर साल में पहली बार जाना कि असल बाप की औलाद नही थे वो! तीनों ही चौंक पड़े! एक दूसरे की शक्लें देखने के अलावा और करते भी क्या!
"तेरी बहन के बवालै चो*!!" बोले बाबा फुग्गन गुस्से से!
वो औरत, गाल फाड़ फाड़ कर हंसी! मर्दाना हंसी!
"हरामन! तेरे सारे छेद बंद न कर दूँ, तो फुग्गन न कहियो?" चीखे बाबा फुग्गन!
और तब बाबा ने, एक तिनकों से बनी रस्सी का एक टुकड़ा उठाया, अपनी गरदन से तीन बार छुआया, नौ बार फूंक मारी!
"देख! तेरी माय को चो*!! देख!" गुर्राए बाबा!
और वो औरत, गला फाड़-फाड़ कर हँसे! खूब हँसे!
"हरामी की औलाद! जो तेरे बस में हो, कर के देख ले! छेद किसके बंद होते है और किसके खुलते हैं! आ! सूअर की औलाद!" बोली वो, आँखें तरेड़ते हुए!
और बाबा ने लगा दिया पलीता!
जैसे ही पलीता दीये में जला!
बाबा फुग्गन का शरीर फूला!
मुंह से खून! कानों से खून! नाक से खून! आँखों से खून! हाथ-पांवों की उँगलियों के नाखूनों के नीचे से खून! मूत्र-मार्ग से खून! गुदा-मार्ग से खून! और बाबा हुए बेहोश!
"चला था कोल्या को छेदने!" हंस हंस के उसने अपनी जांघें पीट लीं!
बाबा को बेहोश देख, उन दोनों के नीचे की जैसे मिट्टी फोकी हो गयी! मिट्टी में जैसे धंस चले वो दोनों! क्या सोच कर आये थे, और क्या हो गया!
"सुनो? ओ बाबाओ?" वो खड़े होते हुए बोली!
बाबा! दोनों बाबा तो ऐसे हुए जैसे मोम!
जहाँ ऊँगली रख दो, वहीँ छेद!
"आखिरी बार! आखिरी बार आया मैं! अब कि बार बुलाया, तो कोई ज़िंदा नहीं बचेगा! इस रखैल का तो वो हाल करूँगा कि छूटेगी नहीं कभी!" बोली वो, चिल्ला कर!
बाबा कांपे!
आँखें ऐसे, जैसे पत्थर बन गयी हों!
"जाता हूँ! हो जाएगा ये बूढा ठीक! बूढा है, छोड़ रहा हूँ!" बोली वो,
और धड़धड़ाते हुए, बाहर चली!
बहुत देर!
बहुत देर तक, दोनों बाबा बैठे बैठे कांपते रहे!
और जब होश की डोर थामी, तो आया कुछ ध्यान! आये वर्तमान में!
बाबा को जगाया! और बाबा जागे! जैसे ही जागे! चिल्ला पड़े! उनको समझा दिया उन्होंने! और उस दिन, बाबा फुग्गन ने, कानों में अंटी मार ली, कि आज के बाद, किसी कोल्या के आड़े नहीं आना उन्हें! आड़े तो क्या, कोल्या के बारे में सुनना भी नहीं!
तो मित्रगण!
दो महीने बीत गए!
और उस कोल्या या उस औरत का क़िस्सा, दिनों की गर्द के तले, दबता चला गया! लेकिन, अब जब, मुंह से मुंह जुड़ जाते हैं, तो बात, फुसफुसाहट से शुरू हो, आगे जाते जाते, चिल्लाहट में बदल जाती है! तो बाबा के उस समाज में, उस औरत और उस कोल्या का चर्च, आम तो नहीं, हाँ, सरसरी ज़रूर बन गया! लेकिन उन तीनों बाबा ने, अपना मुंह सिए रखा! कोई पूछता, तो सीधा न में ही जवाब देते वो!
इस तरह, एक माह और बीता!
और हुआ एक आयोजन! ये आयोजन, दीवाली से पहले हुआ था! तो इसमें, हमारे को भी निमत्रण मिला था! हम दो दिन पहले पहुँच गए थे! अपने जानकारों से मिलना-जुलना बहुत अच्छा लगता है, एक दूसरे की उपलब्धियां जाने जाती हैं, नव-सदस्य आदि की जानकारी मिलती है, कौन रहा और कौन नहीं, ये सब जाना जाता है!
उसी शाम, धनतेरस का दिन था वो!
हम चार लोग थे उस समय, मैं, एक और बाबा, बाबा लड्डू नाथ, बाबा अरंग नाथ, अपना वो रूद्र नाथ! शर्मा जी, उस समय भोजन करने गए थे, उन्होंने उस दिन मदिरापान न करने का मन बनाया था, दरअसल उनका पेट भी ठीक नहीं था!
"उसको जानते हो न, वो सुमिता?" बोला रूद्र नाथ,
"हाँ?" कहा मैंने,
"वो बाबा अरिन्दर नाथ के साथ हो गयी है!" बोला वो,
"क्या?" मुझे यक़ीन नहीं हुआ!
"हाँ! मानो!" बोला वो,
"कैसे हुआ ये?" पूछा मैंने,
"पता नहीं!" बोला वो,
"अरिन्दर साला बहुत हरामी है!" बोले अरंग नाथ!
"ये तो है!" रूद्र नाथ, मांस का टुकड़ा फाड़ते हुए बोला,
"अजीब बात है!" कहा मैंने,
"ये तो है ही!" कहा उसने,
सुमिता के पिता में और अरिन्दर नाथ में, छत्तीस का आंकड़ा था! ये सुनना ऐसा ही था कि जैसे एक मगरमच्छ ने एक हिरण से मित्रता कर ली हो!
"ये लो!" बोला रूद्र नाथ! मुझे गिलास देते हुए!
"एक मिनट!" बोले बाबा लड्डू नाथ,
मेरा गिलास लिया उन्होंने, और ऊँगली से, एक पत्ता जो गिरा था उसमे, निकाल दिया, और दे दिया मुझे गिलास वापिस!
"खैर जाने दो!" बोला मैं,
"हाँ जी!" बोले अरंग!
"और सुनो!" बोला रुद्रनाथ, गिलास नीचे रखते हुए,
"बोल?" बोला मैं,
"उसे जानते हो? वो जालौन वाला, आद्य नाथ? त्यागू वाला?" बोला वो,
दिमाग पर ज़ोर डाला!
याद आया!
"हाँ!" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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मेरे तो कान खड़े हो गए ये सुनकर! जैसे श्वान के कान खड़े हो जाया करते हैं! बहुत ही अधिक समय बाद मैंने किसी कोल्या का ज़िक़्र सुना था आज! तो, कान खड़े हो जाना, लाजमी ही था!
"पूरी बात बता यार?" मैंने कहा,
"बताता हूँ!" बोला वो,
और एक टुकड़ा रखा मुंह में, चबाया, और अपना गिलास खत्म किया, मदिरा का स्वाद कड़वा था, उसके चेहरे के भाव ने ज़ाहिर कर दिया!
"आद्य को तो जानते ही हो?" पूछा उसने,
"हाँ, आगे बोल?" बोला मैं,
"और फुग्गन को?" बोला वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"और चखंडु को?" पूछा उसने,
"अबे आगे बोल न?" कहा मैंने,
"जानते हो न?" दुबारा पूछा!
"अरे हाँ ताऊ! बोल आगे?" कहा मैंने, खीझ कर!
और तब, मुझे रुद्रनाथ ने, सारी कहानी, अपने ही अंदाज़ में सुना दी! मैं तो चौंक पड़ा! वो कोल्या तो हद से अधिक ताक़तवर था! इसका मतलब था वो ज़रूर ही अपने जीवन में एक महा-साधक रहा होगा!
"सुन?" कहा मैंने,
"हाँ जी?" बोला वो,
"यहां आया है वो आद्य?" पूछा मैंने,
"पता नहीं" बोला वो,
"पता कर ज़रा!" कहा मैंने,
"सुबह कर लूँगा पता, अभी तो सभी मस्त होंगे!" बोला वो,
"चल ठीक, सुबह बता मुझे!" कहा मैंने,
तो इस तरह, बात सुबह पर चली गयी! वो पता करता और बताता मुझे! दरअसल मैं स्वयं, उस औरत से मिलना चाहता था, कि एक बार मुलाक़ात हो जाए, तो आगे देखा जाए फिर!
रात आराम से गुजरी, चाय-नाश्ता किया, बारह बज गए, लेकिन रुद्रनाथ न आया, शर्मा जी तो दुबारा से भी सो गए थे, तबीयत ठीक न थी उनकी, मैंने भी नहीं जगाया उन्हें! इंतज़ार करता रहा उसका मैं!
और करीब डेढ़ बजे, वो आया मेरे पास, मैंने बिठाया उसको, वो बैठा,
"हाँ?" पूछा मैंने,
"कोई न आया!" बोला वो,
"सही से पता किया?" पूछा मैंने,
"एक एक आदमी छांट मारा मैंने!" बोला वो,
अब उसकी इस बात पर यक़ीन किया जा सकता था, वो खबरी है एक नंबर का! पता आदि ढूंढ ही लाता है!
"तू चलेगा?" पूछा मैंने,
"कहाँ?" पूछा उसने,
"जालौन!" कहा मैंने,
"किसलिए?" पूछा उसने,
"चलेगा या नहीं?" पूछा मैंने,
"चल लूँगा!" बोला दांत दिखाते हुए!
तो इस तरह, दो दिन बाद का कार्यक्रम बन गया हमारा! और हम, दो दिन बाद जा पहुंचे जालौन! वहाँ से सीधे पहुंचे चखण्ड नाथ के पास! यहां जान-पहचान थी रुद्रनाथ की, और यहीं से, उसे उस कोल्या की खबर मिली थी! उसने रहने-ठहरने का इंतज़ाम कर दिया था हमारा!
उसी शाम, रुद्रनाथ, हमें ले गया चखण्ड नाथ के पास! बाबा जी, अपने कक्ष में बैठे हुए थे, माला बना रहे थे, गुड़हल के फूलों की!
बाबा से प्रणाम हुई! परिचय हुआ! कुछ जानकारों के नाम आये, जो हमने जाने पहचाने! और बैठ गए हम भी उधर ही!
"बाबा जी?" बोला रुद्रनाथ!
"हाँ?" बोले वो,
"ये मिलना चाहते हैं!" बोला वो,
"किस से?" पूछा उन्होंने, फूल पिरोते हुए,
"उस औरत से!" बोला वो,
"कौन सी औरत?" बाबा ने फिर से पूछा, सुतली खींचते हुए!
"वो जिस पर कोल्या है!" बोला रुद्रनाथ!
फूलों की माला ही गिर गयी हाथों से!
और हमें घूरा एक एक करके!
चुप हुए वो, जैसे कोल्या का क्रोध सूंघ गया हो उन्हें!
"जान प्यारी न है?" पूछा मुझ से,
मुझे कुछ समझ नहीं आया!
वो समझा रहे थे या धमका रहे थे!
"हैं जी? बताओ?" बोले वो फिर से,
"अब जान तो सभी को प्यारी होती है!" कहा मैंने,
"कदि ना हो?" बोले वो,
"आप बताओ तो सही?" बोला मैं,
उन्होंने झाँका बाहर, गरदन, इधर-उधर की,
"ओ री छोरी?" चीखे वो, दो बार,
और एक सत्रह अठारह साल की लड़की अंदर आई,
"जी बाबा?" बोली वो,
"नैक, फुग्गन नै बुलैयो?" बोले उस से बाबा,
"जी" बोली वो, और चली बाहर,
थोड़ी ही देर में, वो फुग्गन बाबा आ गए, बनियान पहने, पुराना सा चश्मा पहने, और एक तहमद पहने, गले में, मालाएं, बाजुओं पर, गंडे-ताबीज़ बांधे!
"आओ जी!" बोले बाबा बड़े बाबा से, हमने भी प्रणाम किया!
अब हुआ परिचय!
और बढ़ी आगे बात!
"ये जी, उस औरत से मिलना चाह रहे हैं!" बोले बाबा,
"काई सै?" पूछा बाबा फुग्गन ने,
"वाई सै! वो कोल्या!" बोले बाबा,
बाबा ने सुना! और हमें देखा! और जैसे भय खा गए हों, तहमद ऊपर कर ली!
"जीने सै मन भरगौ कहा?'' बोले मुझसे,
मैं हंस पड़ा!
"देख, यहां, यहां, यहां, और यहां, खून छूट पड़ौ मेरौ!" बोले वो,
"आप मिलवा सकते हैं?" पूछा मैंने,
"नाह!" बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"धमका कै गयौ, सायरे, अब आगौ तो टेंटुआ भींच दूँगौ तेरौ!" बोले वो,
मैं फिर से हंस पड़ा!
शर्मा जी भी हंस पड़े!
"जब सामने आयगौ ना, मोंह-** एक हो जांगे!!" बोले वो,
अब तो मेरी हंसी, रोके न रुकी!
"हंस च्यौं रे हो?" पूछा बाबा ने!
"आपकी बात पर!" कहा मैंने,
"कोई गलत कही मैंने? हैं रे चखंडु?" बोले वो छोटे बाबा से!
"नाह! क़तई न!" बोले छोटे बाबा!
और मेरी हंसी! फिर से छूटी!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"झूठ मान रे हो?" बोले बड़े बाबा,
"ना!" कहा मैंने,
"तो भैया, घर कू जाओ!" बोले वो,
निकाल ली बीड़ी, तहमद में उड़सी हुई थी, निकाली बंडल से बाहर, ऊँगली और अंगूठे से दबा के देखा! और लगा ली दांतों के बीच, और जलायी माचिस, एक बार, दो बार, तीन बार! न जली!
"तेरी बेटी के बिजारै मारूं!" बोले खीझ कर, और इस बार, जला ही ली!
"अच्छा, कुछ मदद तो करो?" बोला मैं,
"कैसी?" पूछा उन्होंने,
"उसका पता मालूम हो?" पूछा मैंने,
"आद्य को जानो हो? वो बता देगौ!" बोले वो,
"ठीक है जी, धन्यवाद!" कहा मैंने, और उठा गया मैं! हम तीनों ही उठ गए!
"राम राम जी!" बोले बाबा फुग्गन!
और हम चल पड़े बाहर!
"बड़ा डर रहे हैं ये तो!" बोले शर्मा जी,
"हाँ, सही से नापा होगा इन्हें!" कहा मैंने,
"हाँ, तभी तो!" बोले शर्मा जी,
"चलो, कल चलते हैं आद्य के पास!" कहा मैंने,
और हम जा पहुंचे कमरे में अपने! लेटे और कुछ आराम किया!
रात को महफ़िल जवान हुई, और भोजन किया, उसके बाद, पाँव पसार, सो गए!
अगले दिन, फारिग हुए, चाय-नाश्ता किया, और फिर उसके बाद, बाबा आद्य के पास चल पड़े! वो शहर से दूर रहते थे, एक छोटा सा स्थान है उनका, एकांत में, तो हम वहीँ जा पहुंचे!
बाबा से मुलाक़ात हुई! वे जानते थे हमें, तो तस्सली से मिले! ले गए अपने कक्ष में! बिठाया हमें वहाँ! पानी पिलाया और फिर बातें हुईं!
"कहीं आये थे क्या?" पूछा बाबा ने,
"आपके पास ही आये हैं!" कहा मैंने,
बता दिया कि कहाँ ठहरे हैं हम!
"अच्छा, बताओ, क्या काम है?" पूछा उन्होंने,
अब उन्हें बताया गया अपना प्रयोजन! सुन कर, वे भी चौंक पड़े!
"बड़ा ही ताक़तवर है वो तो!" बोले वो,
"बात ही करेंगे उस से हम!" कहा मैंने,
"चलो, करता हूँ कोशिश!" बोले वो,
उठे, और दरवाज़े तक गए वो, लगाई आवाज़, "गौमा? ओ गौमा?"
"आई!" आई एक आवाज़!
वो अंदर आ बैठे, और तभी, एक चालीस बरस की एक औरत अंदर आई, तंदुरुस्त थी वो, पूरी ही तांत्रिक लगती थी, ऐसी ही वेशभूषा थी उसकी!
"हाँ बाबा?" पूछा उसने,
"मोहन है यहां?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, बुलाऊँ?" पूछा उसने,
"हाँ, भेज उसे" बोले वो,
"भेजती हूँ" बोली वो, और चली गयी वहां से,
अब बाबा ने मुझे सबकुछ बताया उस औरत के बार में, और उस कोल्या के बारे में, और उस जुमले के बारे में भी, उसका अर्थ भी, उस जुमले ने तो और तीव्रता ला दी उत्कंठा की लहर में!
त्तभी एक तीस बरस का एक युवक आया अंदर, प्रणाम किया बाबा को, हमको भी,
"अरे मोहन?" बोले वो,
"आदेश!" बोला वो,
"वो जो औरत थी, वो ही, अब कहाँ है?" पूछा उन्होंने,
"वहीँ है, कल ही उसका आदमी मिला था, बहुत परेशान है, उसकी औरत, अभी तक वैसी ही है!" बोला वो,
"उसको कल ला सकता है?" पूछा उन्होंने,
"हाँ?" बोला वो,
"कल ले आ उसे, ये बात करेंगे उस से!" बोले वो, हमारी तरफ इशारा करते हुए!
"ले आता हूँ!" बोला वो, और प्रणाम कर, चला गया!
"बहुत बहुत धन्यवाद आपका!" कहा मैंने,
"कोई बात नहीं, हाँ, सम्भल के रहना ज़रा! बहुत ताक़तवर है!" बोले वो,
"जी!" कहा मैंने,
और उसके बाद, चाय पी, वापिस हुए हम!
अगले दिन, करीब दो बजे दिन में, फ़ोन आ गया बाबा का, कि वो औरत वहां तीन बजे आ जायेगी, और हम आ जाएँ अभी! हम तभी के तभी रवाना हो लिए वहाँ की तरफ!
वहाँ पहुंचे,
बाबा से मिले, बाबा ने, अपना क्रिया-कक्ष खुलवा दिया था, हमें वहीँ तक छोड़ आये, मैं अकेला ही था उस समय, शर्मा जी और रुद्रनाथ को मना कर दिया था मैं, कहीं कोई अनहोनी न हो जाए उनके साथ, इसलिए!
कोई सवा तीन बजे,
वो औरत, अपने मर्द और बहनोई के साथ, आ गयी वहां, उसको देख कर, कोई नहीं कह सकता था कि उसमे किसी कोल्या का वास है! साफ़ रंग-रूप की, मज़बूत देह वाली और सुंदर भी थी, जैसे ही अंदर आई, आँखें फाड़ कर, मुझे देखा!
"बैठो!" कहा मैंने,
धम्म से बैठ गयी नीचे! मार ली चौकड़ी! आँखें फाड़, मुझे ही देखे, आँखें कभी तिरछी करे, कभी नीचे देखे, कभी चौड़ी करे, कभी बारीक करे!
"क्या नाम है तुम्हारा?" पूछा मैंने,
"कविता'' बोली वो,
"अच्छा कविता, कैसी हो?" पूछा मैंने,
"बहुत बढ़िया!" और अंगड़ाई भरी उसने!
मैंने तब तक, हाज़िर-मंत्र पढ़ दिया था, उसने सर को झटका दिया, कई बार! जैसे उसके कानों में कुछ घुस गया हो! मुंह चौड़ा किया! हवा को चाटा उसने, अपनी नाक तक को जीभ से छुआ उसने! फिर एक झटके से शांत हो गयी! चौकड़ी खोल, उकडू बैठ गयी! और आँखों का रंग, गहरा पीला हो गया तभी! मैं समझ गया, ये अब कविता नहीं, कोल्या है!
"हम्म! हम्म!" बोली वो, मर्द की आवाज़ में!
"भैल भैरू कोल्या!" कहा मैंने,
वो चौंकी!
उकडू बैठी थी, धम्म से पीछे बैठ गयी, अपने नितम्बों पर इस बार!
"भैल भैरू कोल्या!" कहा मैंने,
"भैल भैरू!" बोला वो,
"करजू तामिस हरफिया!" बोला मैं,
"तामिस!" बोला वो,
और अपना हाथ आगे बढ़ाया उसने!
मैंने अपना सर नीचे किये!
उसने, मेरे सर पर हाथ फिराया! जैसे, मैं पसंद आया उसे! जैसे आशीर्वाद सा दिया हो उसने!
"कोल्या? नाम?" पूछा मैंने,
"बलधर!" बोला वो,
"कहाँ से?" पूछा मैंने,
"खटीमा!" बोला वो,
और तब मैंने सर हटाया तब!
जैसे ही उसको देखा, उस औरत की आँखों से, खून के आंसू रिसने लगे! जैसे वो खून के आंसू रो रहा हो!
"बस कोल्या!" कहा मैंने,
और आंसू, झट से बंद! कोई निशान नहीं! न चेहरे पर, न उस औरत के कपड़ों पर!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उस समय, कोल्या का व्यवहार क्रोधपूर्ण नहीं था, वो सामान्य तौर पर ही व्यवहार कर रहा था, ये मेरे लिए बहुत बढ़िया बात थी, अगर वो क्रोध करता, तो बात बिलकुल ही अलग हो जाती! और तब, मेरे लिए समस्या खड़ी हो जाती, अब न तो उसे इबु और न ही तातार, काबू कर सकते थे, काबू क्या, वो तो हाज़िर ही नहीं होते उसके सामने, वो महामसानी का महासाधक था! इसी वजह से!
"कोल्या?" बोला मैं,
"हम्म!" बोला कोल्या,
"इस औरत को अब छोड़ दो कोल्या!" कहा मैंने,
"इसने मुझ पर, लात रखी!" बोला वो,
"जानबूझ कर नहीं!" कहा मैंने,
"इसको नहीं छोड़ने वाला!" बोला वो,
"इसका अर्थ यही हुआ कोल्या, की एक समझदार व्यक्ति, किसी ऐसे छोटे बच्चे को बे-वजह मारे, पीटे, जिसकी वजह स्वयं उस छोटे बच्चे को मालूम नहीं! है न कोल्या?" बोला मैं,
"वाह! सही, सही कहा तूने तो!" बोला वो,
"विनती है कोल्या, इसे छोड़ दो!" कहा मैंने,
चुप हो गया वो!
लेकिन देखे मुंझे ही, उसने मुंह बंद कर लिया अपना, और मुझे घूरने लगी वो औरत!
"छोड़ दो कोल्या! ना-समझी हो गयी बेचारी से!" कहा मैंने,
"हम्म्म्म" बोला वो,
"छोड़ दो!" कहा मैंने,
"मेरे पास दूजा कोठा नहीं है!" बोला वो,
"उसकी ज़रूरत भी क्या है? पहले भी तो कहीं वास करते होगे ही?" कहा मैंने,
"हाँ, ये तो है" बोला वो,
"तो छोड़ दो!" कहा मैंने,
"छोड़ देता हूँ!" बोला वो,
"वाह कोल्या!" कहा मैंने, और जोड़े हाथ उसके!
"लेकिन, तू कहीं न जाना अभी?" बोला वो,
"नहीं जाऊँगा!" कहा मैंने,
और तभी वो औरत उठी! अपनी पुत्तियाँ भींची उसने, गरदन हिलायी अपनी! दांत भींचे और जैसे ही गिरने को हुई, मैंने पकड़ लिया उसे!
"इधर आओ?" कहा मैंने, बाहर बैठे उसके आदमी से, वो दौड़ा दौड़ा आया!
"इसको अभी होश आ जाएगा, अब ये ठीक है, ले जाओ इसे!" कहा मैंने,
वो विश्वास न कर सका, बस आँखों में, कई सवाल लिए, उस औरत को अपनी गोद में ले, चला गया वो! अब वो औरत, बिलकुल ठीक थी! कोल्या ने छोड़ दी थी वो, थोड़ी दवा-दारु से, जो असरात बाकी थे उसमे, वो अब ठीक हो जाने थे! चलो, कम से कम, वो औरत तो ठीक हुई! और वो कोल्या, उसने मेरी बात मानी, तो मैं अब उसका कर्ज़दार हो चुका था!
जैसे ही वो औरत और वो आदमी गए, मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया! और वापिस आ बैठा!
थोड़ी ही देर में, ठीक सामने, धुंआ उठा, और उस धुंए ने, एक आकृति का रूप लिया! यही था वो कोल्या! अपनी ही वेश-भूषा में!
काली धोती, पावों में, कंगन, कड़े पहन रखे थे, बहुत सारे, मज़बूत जिस्म था उसका, किसी पहलवान जैसा! कमर में, पीले रंग की एक मोटी सी रस्सीनुमा चुनरी सी बाँध रखी थी, ऊपर की देह नंगी ही थी, कानों में बड़े बड़े कड़े से पहने थे, सर गंजा, लेकिन बीच में एक चोटी रखी थी, जो काफी लम्बी थी, उसमे कई गांठें बंधी थीं, गले में, कड़े पहने थे उसने, शंखों की, छोटे शंखों की मालाएं पहन रखी थीं, मस्तक पर, त्रिपुण्ड बना था, पीला, हल्दी से बना था वो, ठुड्डी को लाल रंग से रंगा था उसने, बाजुओं पर, लकीरें बनी थीं, कलाइयों में, कंगन पहने थे मोटे मोटे! कम से कम, डेढ़ सौ किलो का रहा होगा कोल्या, जब जीवित था तब! किसी वेताल से कम नहीं लग रहा था वो कोल्या!
वो दहाड़ा! हंसा! और ताली बजाई!
"धन्यवाद कोल्या!" कहा मैंने, खड़ा होते हुए, मैं तो उसके सीने तक ही पहुंचा! उसकी लम्बाई कम से कम सवा सात फ़ीट की रही होगी!
"बैठ जा!" बोला वो, आदेश सा देते हुए!
मैं बैठ गया तभी!
"तू बोलन सा लगता है मुझे!" बोला वो,
बोलन मायने, दिमाग वाला! बुद्धिमान!
"धन्यवाद कोल्या!" कहा मैंने,
"वो साले हरामज़ादे, तीनों, लड़ने आये थे मुझ से!" बोला ठहाका मारते हुए!
और इसीलिए, मुंह की खायी उन्होंने!
मुझे भी हंसना ही पड़ा उसके साथ!
"कहाँ रहते हो कोल्या?" पूछा मैंने,
"महोलिया! वहीँ था मेरा याबता!" बोला वो,
"याबता!" कहा मैंने,
याबता मायने, स्थायी निवास!
"कहाँ याबता और कहाँ जालौन?" पूछा मैंने,
"हाँ! मेरी एक ठौर नहीं, उस दिन, साँझ को, दो बालकों को खिला रहा था मैं, अपनी टांगों पर, की वो औरत, मेरे सीने पर चढ़ गयी! हरामज़ादी!" बोला वो,
"समझ गया कोल्या!" कहा मैंने,
"नहीं समझा तू!" बोला वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
"नहीं समझा!" बोला वो,
"समझ गया कोल्या!" बोला मैं,
"नहीं! नहीं! नहीं! नहीं समझा नहीं समझा, नहीं समझा तू!" चीख के बोला वो!
मेरे तो कानों में पीपनी सी बज गयी!
दर्द होने लगा!
कोई बात तो ज़रूर थी! जो वो बताना चाह रहा था!
"कोल्या, कुछ दबा ही सीने में?" बोला मैं,
"अब समझा तू!" बोला धीरे से वो!
और अगले ही पल, फूट कर रोने लगा वो!
जैसे कोई बालक, अचानक ही, रुलाई छोड़ देता है, थी वैसे!
"क्या मैं जान सकता हूँ?" पूछा मैंने,
एकदम से चुप हुआ वो!
ऊपर देखा, कुछ बुदबुदाया!
और फिर एक झटके से मुझे देखा!
जैसे ज़मीन खिसकी हो पांवों के नीचे से उसकी, ऐसे चला आया ठीक मेरे सामने!
"अबंग इराट!" बोला वो,
अब ये न समझा मैं!
"इसका अर्थ?" पूछा मैंने,
"विश्वास करता है?" बोला वो,
"तुम पर?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोला वो,
"हाँ, क्यों नहीं!" कहा मैंने,
उसने मेरे गले में पड़ी मेरी रुद्राक्ष की माला को पकड़ते हुए कहा, "सच में?"
"हाँ!" कहा मैंने,
एक झटके से पीछे हुआ वो!
घूमा, और दोनों हाथ, पीछे कर, बांधे उसने,
और टहलने लगा!
"पुरना!" बोला वो,
दो बार!
"कौन पुरना?" पूछा मैंने,
"है एक पुरना!" बोला वो,
"औरत?" पूछा मैंने,
"पुरुष" बोला वो,
"अच्छा" कहा मैंने,
"सेनझा!" बोला वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"सेनझा!" बोला वो,
"औरत?" फिर से पूछा,
"न, पुरुष!" बोला वो,
रुका, और देखा मुझे! उसके हाथ तन गए! घूंसों की मुद्रा बना ली उसने! दांत भींचे और आँखें हुईं लाल! वो क्रोध में उबल पड़ा था! कोई पुराना घाव, अचानक से खुल गया था सीने में!


   
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श्रीशः उपदंडक
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और वो कोल्या, डूबा पुराने वक़्त में! उसकी त्यौरियां चढ़ गयीं! क्रोध के मारे कांपने लगा! मुंह से, हुंकारें निकलने लगीं! क्रोध ऐसा की, सामने उसके कोई भी आ जाए, तो काट के रख दे उसे! फाड़ कर रख दे अपने हाथों से ही! मार मार के अधमरा कर दे, और छाती फाड़, रक्त से नहा जाए वो कोल्या! पल भर के लिए आँखें बंद कीं उसने, और खोल दीं! देखा मुझे! और.....................
और खुलकर आई एक कहानी सामने, शायद ये कहानी, उस कोल्या की कहानी, इतिहास में दबी ही रह जाती, अगर मैंने पर्यटन न किया होता तो, वो कोल्या, वो क्रोधी कोल्या, ऐसे ही भटकता रहता और उसके क्रोध में, न जाने कितने ही व्यर्थ में उसका कोपभाजन बनते!
ये कहानी आज से, एक सौ उनहत्तर साल पहले की है, कोल्या का वास्तविक नाम, चीमल थारु था, थारु, एक जनजाति है, ये प्राचीन समय से ही, खटीमा में इस जनजाति का वास रहा है, ये खटीमा, कुमाऊं की पहाड़ियों से घिरा है, तो कुमाऊं लोग भी यहां रहते हैं, कुमाऊं भाषा बोली जाती है, जिसे पहाड़ी भाषा कहा जाता है, सिक्ख समुदाय भी यहां बसता है, और मुस्लिम समुदाय भी यहां रहता है, आपस में सौहार्द है वहां के निवासियों में, लेकिन, मूल रूप से, ये क्षेत्र, पहाड़ी गाँव, जंगल आदि में थारु लोग ही रहते हैं, ये क्षेत्र, प्राकृतिक सम्पदा से बहुत समृद्ध है! वन्य-जीवन समृद्ध है, औषधियां आदि से समृद्ध है, यहां के ये थारु निवासी, बेहद ईमानदार और मेहनतकश हैं! खटीमा, जिला ऊधम सिंह नगर के अंतर्गत आता है और ये उत्तराखंड में आता है!
एक सौ उनहत्तर साल पहले, खटीमा कैसा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती! न पक्के रास्ते होंगे, न संचार सुविधाएं, न यातायात और न ही आज जैसी समृद्धि! हाँ, खेती के मामले में, यहां गेंहू और चावल की खेती की जाती है, आज भी खटीमा का चावल बेहद शानदार माना जाता है!
बनबड़वा गाँव था उसका! आज ये गाँव पता नही, है भी या नहीं, या नाम बदल गया होगा इसका, होगा तो वो उस समय के अनुसार, एक पहाड़ी पर था, उसके आसपास, तीन और गाँव थे, इन चार गाँवों की कुल आबादी, पच्चीस हज़ार से भी कम थी, उस गाँव से, करीब सत्रह कोस दूर, एक मंदिर पड़ता था, ये मंदिर, एक स्थानीय देवी का था, जिसे आज हम, आद्य-शक्ति श्री दुर्गा के रूप में जानते हैं, दुर्गा देवी के साधक, कई प्रकार के हैं, कहीं इन्हें दुग्ध-पदार्थ का भोग लगता है और कहीं इन्हें, मांस का भोग लगता है, सभी के अपने अपने विश्वास हैं, अक्सर पहाड़ी देवी-देवता आदि को, मांस-मद्य का भोग लगाया जाता है! आज खटीमा, टनकपुर और पीलीभीत के मध्य रेलवे-लाइन पर है, उस समय, यहां मात्र जंगल ही था, और ये टनकपुर, पीलीभीत भी, छोटे छोटे क़स्बे ही हुआ करते थे!
एक थे कोल्या, भौभन नाम था उनका, और ये चीमल, उन्हीं का प्रधान सहायक और शिष्य था! कोल्या के विषय में में आपको बता ही चुका हूँ, अतः वो नहीं लिखूंगा, भौभन का नाम, उस समय, सर्वत्र फैला हुआ था, स्थानीय समृद्ध लोग, दूर के राजे-रजवाड़े आदि के वो कोल्या, अक्सर ही मेहमान हुआ करते थे! इनका मुख्य कार्य, भेदन ही था, अर्थात, शत्रु को महामारण से मारना, उसका संहार करना! उनके धन, खजाने की रक्षा के लिए, महातंत्र से रक्षा करना, उनके बदले में, वो जो चाहें, दिया जाता था, क्या स्त्री, क्या धन और क्या कुछ अन्य! उस समय, भौभन ने, कोल्या चीमल को, एक सम्पूर्ण कोल्या बना दिया था! उनका बोझ हल्का किया था चीमल ने! अब चीमल, उनकी आज्ञा लेकर ही, ऐसे काल-कर्म किया करता था!
समय बीता, और भौभन का देहांत हुआ, अब समस्त बागडोर, चीमल के हाथो में आ गयी, चीमल, सुलझा हुआ इंसान था, बुद्धिमान कहा जाएगा, आपसी विवादों को, आपस में बैठ कर ही सुलझाया जाता था! लेकिन कुछ विवाद ऐसे थे, जिन्हें, क्रोध का जल मिल रहा था, और ये जल, उन विवादों के बीजों को, अब अंकुरित कर रहा था, अंकुरण पश्चात वे पौधे बनने थे, और वे पौधे, फिर पेड़ बन जाते! जड़ें फैलतीं तो विशाल रूप ले लेते! ऐसा ही एक विवाद था, वहाँ से बत्तीस किलोमीटर दूर, एक समृद्ध व्यक्ति, केदार का! केदार, बहुत धनाढ्य था! उसका व्यवसाय बहुत फैला हुआ था! अब लालच तो लालच ही होता है! केदार एक अन्य जानकार, सारंग से, अंदर ही अंदर बैर रखता था, सारंग उसके रिश्ते में, बड़ा भाई लगता था वैसे तो, लेकिन केदार का वो सबसे बड़ा शत्रु था! उसके व्यवसाय में सबसे बड़ी बाधा था वो! आखिर में, उस केदार ने, उसको हमेशा के लिए, हटाने की योजना बनायी!
एक दोपहर,
आराम कर रहा था कोल्या अपने कक्ष में, दोपहर का समय था, और उस समय उस गर्मी में, अलसायापन आ ही जाती है, मनुष्य तो क्या, वनचर और नभचर, दोनों ही विश्राम किया करते हैं! सूरज ताप का ऐसा प्रभाव डालता है की जैसे त्वचा का चोला निकल ही जाएगा, भुनकर शरीर से!
"ठक! ठक!" आवाज़ हुई, चौखट पर,
कोल्या, खर्राटे बजा रहा था! दोपहर का भोजन, अभी आध घंटे पहले ही किया था, इसीलिए भोजन का कुछ नशा भी था!
"ठक! ठक!" फिर से आवाज़ हुई!
न उठा कोल्या, बल्कि कमर कर ली चौखट की तरफ!
"ठक! ठक! ठक!" फिर से आवाज़ हुई!
अबकी सुना कोल्या ने, पलटा, और देखा चौखट की तरफ! बाहर, उजाला था, अतः वहाँ कौन खड़ा ही, ये न दिख सका उसे!
"कौन है?" बोला वो,
"मैं हूँ, रम्मा!" बोला कोई,
रम्मा, सहायक था कोल्या का!
उठा कोल्या, पसीने पोंछे अपने!
"आ जा!" बोला कोल्या,
"भैल भैरू!" बोला रम्मा, हाथ जोड़ते हुए,
"हम्म, बैठ!" बोला कोल्या,
रम्मा ने, पास ही में रखी, एक मटकी उठायी, मिट्टी से बना सकोरा उठाया, और भरा पानी उसमे, दिया कोल्या को, कोल्या ने पानी पिया, और आधी मटकी ही खत्म कर दी! उसके बाद, रम्मा ने पानी पिया, रख दी वापिस, वो मटकी वहीँ!
"बोल?" बोला कोल्या,
"केदार का आदमी आया है" बोला रम्मा,
"केदार? वो जूरेंजु वाला?" पूछा कोल्या ने,
"हाँ, वही" बोला रम्मा,
"किसलिए?" पूछा कोल्या ने,
"कह रहा ही, आप से ही कम है" बोला रम्मा,
"तुझे नहीं बताया?" पूछा कोल्या ने,
"नाह!" बोला वो,
"भगा दे हरामज़ादे को, सूअर की औलाद, कमीना!" बोला कोल्या गुस्से से!
"मैंने कहा था, मुझे बताना पड़ेगा, लेकिन बोला केदार ने कहा है की सिर्फ कोल्या को ही बताना!" बोला रम्मा!
"भगा दे कुत्ते को, अबकी आये, तो घुसने नहीं देना, न माने तो टांगें तोड़ देना कुत्ते की!" बोला गुस्से से कोल्या!
"कह देता हूँ!" बोला रम्मा, और उठा,
"अगर मान जाए तो बात कर लेना, नहीं तो भगा साले को!" बोला कोल्या,
"जी!" बोला वो,
रम्मा गया तो लेटने से पहले, फिर से मटकी उठा ली, उठायी, और फिर से पानी पिया! रखी मटकी, और लेटा फिर!
करीब दस मिनट बाद,
आया रम्मा फिर से,
दस्तक दी, बुला लिया अंदर!
"हाँ?" बोला कोल्या, लेटा लेटा!
"हाथ जोड़ रहा है, पाँव पड़ रहा है!" बोला रम्मा,
"बुला उसे अंदर!" बोला वो,
उठा कोल्या और देखने लगा बाहर!
रम्मा, लम्बे लम्बे डिग भर, उतरे जा रहा था नीचे!
अब जो आ रहा था साथ में, उसके हाथ में एक लट्ठ था, और पहाड़ी पोशाक पहने था! ले आया रम्मा उसको वहां, उसका लट्ठ लिया, और अब उसकी जांच शुरू की, जब कुछ नहीं मिला, एक तम्बाकू की थैली के अलावा तो, इशारा कर दिया अंदर जाने का रम्मा ने!
प्रणाम किया उस हलकारे ने!
प्राणाम स्वीकारा, सर हिलाकर कोल्या ने, और बुला लिया अंदर!
वो अंदर आया, घुटनों पर बैठा, और कोल्या के पांवों में, सर रख दिया अपना!
"बैठ जा!" बोला कोल्या,
अब बैठा वो, चौकड़ी मार!
"हाँ, बोल?" पूछा कोल्या ने,
"मुझे, केदार जी ने भेजा है, आपको निमंत्रण भेजा है, मुलाक़ात का!" बोला हलकारा!
"किसलिए?" पूछा कोल्या ने,
इतने में ही, उसको पानी दिया गया रम्मा द्वारा, हलकारे ने पानी पिया, और रख दिया सकोरा वहीँ, उठा लिया रम्मा ने वो सकोरा!
"ये तो वो ही जानें!" बोला हलकारा,
"हम्म्म!" बोला कोल्या,
अपने दोनों हाथ बांधें अपने सीने पर,
"कब?" पूछा कोल्या ने,
"इस सोम को" बोला वो हलकारा,
"हम्म!" बोला कोल्या, सर हिलाते हुए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"इस सोम को?" पूछा कोल्या ने,
"जी!" बोला हलकारा,
"ठीक है, बोला देना केदार को, कि हम पहुँच जाएंगे उधर, दोपहर समय, यदि केदार नहीं मिला, तो उस से कहना कि अब वो यहां किसी को न भेजे, न ही खुद आये!" बोला कोल्या,
"जी, ऐसा ही कहूँगा!" बोला हलकारा!
"ठीक है!" बोला कोल्या,
अब उठा हलकारा, और प्रणाम कर, वापिस हुआ, वो गया, तो रम्मा आ बैठा पास कोल्या के!
"ये वही केदार है न?" पूछा रम्मा ने,
"हाँ, वो जुरेन्जू वाला!" बोला कोल्या,
"समझ गया!" बोला रम्मा!
''एक काम कर रम्मा, अपने आदमियों से मालूम कर वहां के माहौल का!" बोला कोल्या,
"चिंता न करें! आप न भी कहते तो भी आज आदमी अपने काम पर लग जाते!" बोला रम्मा!
हंस पड़ा कोल्या! उसका पेट उछल पड़ा! भारी बदन था उसका, और वैसा ही चौड़ा चेहरा! मूंछें ऐसी भारी कि ऊपर वाला तो होंठ ही न दिखे!
"अभी भेजता हूँ!" बोला रम्मा और उठा, चला बाहर!
आसपास का माहौल जांचना, सबसे पहले देखा जाता था, पता नहीं कौन किस भेस में हो! कब कौन मिल जाए! और वैसे भी आस्तीन में सांप तो हर युग में रहते आये हैं! इनमे बहुत घना याराना है! इसीलिए रम्मा ने, लगा दिए थे अपना आदमी काम पर!
चार दिन बाद सोमवार आना था, और दूसरे दिन ही ये भी पता चल गया कि माहौल ठीक है, न कोई साजिश है और न कोई उल्टा भेस! केदारा मिलना ही चाहता था!
सोमवार से पहले की एक रात, यानि कि इतवार की रात.....
बैठे थे वहाँ रम्मा और कोल्या, मशाल जल रही थी एक जगह, भोजन कर ही लिया था उन्होंने, और मदिरा-भोग भी लगा ही लिया था! अब कल के बारे में बातें हो रही थीं!
"साथ किसको लिया?" पूछा कोल्या ने,
"रूंगड़ है, टेपा है, संतू है!" बोला रम्मा,
"ठीक!" बोला वो,
और हो गयीं तैयारियां! हथियारों पर, धार लगा ली गयी! घोड़ों की जांच हो गयी! चारा-पानी और खरेड़ा कर, तैयार कर लिए गए! अपनी अपनी पौशाकें, जिनमे अनगिनत अंदरूनी जेब थीं, सब तैयार कर ली गयीं!
अगले दिन, सोमवार को, अपनी आराध्या का पूजन कर, कोल्या ने, एक मेढ़े की बलि भेंट की! और उसके बाद, टीका कर उसी रक्त से, घोड़ों पर हुए सवार! सबसे आगे रूंगड़ चला! फिर टेपा! बीच में कोल्या और रम्मा, और पीछे संतू! ऐसा चलता था कोल्या का सुरक्षा दल!
घोड़ों के खुरों की आवाज़ें गूँज उठीं! उन संकरे पहाड़ी रास्तों पर, घोड़े जैसे बे-लग़ाम दौड़ने लगे! घोड़े हिनहिनाते, तो कई किलोमीटर तक, जंगल जाग उठता था! क्या बरसाती नदी-नाले, क्या छोटी तलहटियां और क्या ऊंचे-नीचे रास्ते! घोड़े सब पार करते गए!
और तब, एक जगह, रूंगड़ का घोडा धीमा होते हुए रुका! उसके पीछे टेपा! फिर वो दोनों, और फिर वो संतू!
सामने, दूर थोड़ा सा, एक गाँव दीख रहा था! उसमे बना एक ऊंचा सा मंदिर, जो सफेद रंग का था, चमक रहा था! गाँव, पहाड़ी पर बना था! सीढ़ीदार से खेत जैसे सांप हों, ऐसे दीख रहे थे!
"वहां है केदार का कोठा!" बोला रूंगड़!
आगे आया कोल्या, देखा सामने, अपनी बुक्कल खोली, मूंछों पर हाथ फेरा! और देखा!
"जुरेन्जू!" बुदबुदाया कोल्या!
"जी! यही है!" बोला रूंगड़!
"चलो!" बोला रम्मा!
और ठीक उसी तरह, वे आगे बढ़ चले!
आगे रूंगड़! फिर टेपा! फिर वे दोनों और फिर संतू!
अब लोग-बाग़ दिखने लगे थे! उन्हें लोग देखते, तो ठिठक जाते! रास्ता दे देते! कई सलाम ठोंकते उन्हें! और वो, अपनी घुन में मग्न, आगे बढ़ते जाते!
पहुंचे वो उस रास्ते पर, जहां से रास्ता अब केदार के घर को जाता था! उस रास्ते पर, केदार के आदमी नज़र आने लगे! वे पैदल पैदल चल, उन्हें आगे ले जाते! और तब आया एक बड़ा सा घर! एक लम्बा-चौड़ा अहाता! आसपास खुला मैदान! और बीच में बना, एक शानदार घर! पत्थरों से बना! वो उतरे घोड़ों से अपने, उनके घोड़े, केदार के आदमियों ने लग़ाम से पकड़े, और ले चले बाँधने! जहाँ उनके खाने-पीने का इंतज़ाम पहले से ही कर दिया गया था!
"आइये!" वो हलकारा ही मिला,
"चलो!" बोला रम्मा!
हलकारा, ले चला उन्हें अंदर!
एक बड़ा सा कक्ष! कक्ष में बिछा एक बड़ा सा गद्दा! एक पुरानी विक्टोरियन घड़ी! कुछ अंग्रेजी चित्र!
"आइये, विराजिये!" बोला वो हलकारा!
उन्होंने जूतियां खोलीं अपनी,
और जा बैठे गद्दे पर!
एक लड़की आई, सजी-संवरी सी, पानी लायी थी, पानी पिया उन्होंने, अब जैसा उनका डील-डौल था, वैसा ही पानी भी पिया! दो बार पानी लाना पड़ा उस लड़की को!
दीवारों पर नज़रें दौड़ायीं उन्होंने, अब कई चीज़ें समझ में आयीं, कई नहीं! अंग्रेजी चीज़ें तो क़तई समझ में न आयीं!
मिठाइयां परोसी गयीं!
पकवान परोसे गए!
ऐसी ऐसी चीज़ें, जो उन्होंने देखी ही नहीं थी कभी!
हाँ, चाख के ज़रूर देखीं!
"बुलाओ केदार को!" बोला कोल्या,
"जी!" बोला हलकारा! और चला बुलाने!
और थोड़ी ही देर में, अपनी पहाड़ी लेकिन आलीशान सी पोशाक पहने, केदार आ गया! सभी को प्रणाम किया उसने! और कुछ व्यवहारगत बातें हुईं!
"किसलिए बुलाया केदार?" पूछा कोल्या ने!
इस सवाल का जवाब मिलता, इस से पहले ही, भौभन से क्या क्या क्वाया था केदार और उसके पिता जी ने, इसका चिट्ठा खोल दिया था केदार ने! कुछ प्रभाव बने, इसलिए!
"कारण बताइये?" बोला रम्मा!
और तब!
तब केदार ने बता दिया प्रयोजन!
सभी ने इत्मीनान से सुना!
"हम्म्म!" बोला कोल्या,
"अब आप देख लें!" बोला केदार!
"क्या नाम बताया? सारंग?" पूछा कोल्या ने,
"जी हाँ!" बोला केदार!
"हम्म्म!" बोला कोल्या,
"ठीक है, पहले जानकारी काढ़ लें, फिर बताएँगे!" बोला रूंगड़!
"जैसी आपकी इच्छा!" बोला केदार!
"चलो!" बोला कोल्या,
और सभी उठ खड़े हुए!
केदार ने भोजन की बहुत कही, लेकिन अब कोल्या को जाना था, इसीलिए, रुका ही नहीं, आ गए बाहर, उनके घोड़े खुलने शुरू हो गए!
"तो कब पता करूँ?" पूछा केदार ने,
"तीन दिन बाद" बोला रम्मा,
आ गए घोड़े,
वो हुए सवार!
लगाई एड़!
और घोड़ों ने दिखाई फुर्ती!
कुछ ही देर में, गाँव से बाहर और करने लगे हवा से बातें!
अब लौट रहे थे वापिस सभी!


   
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श्रीशः उपदंडक
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तो मित्रगण!
तीसरा दिन, खबर आ गयी थी कोल्या के पास, खोजबीन, बड़े पैमाने पर हुई थी, मुखबरी की गयी थी, और जो उनके मुखबिर थे, वो सभी भरोसे वाले थे! वो खुद ही जानकारियां जुटाया करते थे, किसी और द्वारा दी गयी जानकारी को नहीं माना जाता था! तो उस शाम, रूंगड़, कोल्या, जमवा और रम्मा, ये बैठे थे एक कक्ष में!
जो खबर आई थी, वो ये, कि सारंग एक ईमानदार आदमी था, वो गरीबों की मदद करने वाला, उनके धन आदि से मदद करने वाला, कभी किसी की खेती तबाह हो जाए, तो उसकी सहायता करने वाला आदमी था, रात, बे-रात कोई भी पहुँच जाओ उसके पास, वो कभी मना नही किया करता था! दूसरी बात ये कि, उसके यहां जितने भी लोग काम करते थे, वो सभी खुश थे उसके व्यवहार से! उसने कभी छोटा-बड़ा, ऊंचा-नीचे, नहीं किया था! गरीब बच्चों के लिए जो मदद होती तीज-त्यौहार पर, वो किया करता था! उसका व्यवसाय खूब फैला हुआ था, और उसका जो व्यवहार था, वही उसके सबसे ऊंचा रखता था समाज में, वहीँ नहीं, दूर-दराज में भी वो एक ईमानदार आदमी के तौर पर जाना जाता था! सारंग की दो पत्नियां थीं, एक पत्नी से संतान नहीं हुई थी, लेकिन उसको छोड़ा नहीं गया था, उसका सम्मान पूरे घर में होता था! और तो और, वो व्यवसाय में भी हाथ बंटाया करती थी! जो दूसरी पत्नी थी उसकी, वो भी बेहद नम्र स्वभाव वाली थी, घर में कोई कलह-क्लेश नहीं हुआ करता था, उस दूसरी पत्नी से सारंग को, तीन पुत्रियां और एक पुत्र था! किसी भी कन्या का विवाह, अभी तक नहीं हुआ था!
"क्या किया जाए?" पूछा कोल्या ने,
और सभी ने, यही तर्क दिया, कि अगर उसका भेदन किया जाता है, तो ये एक पाप होगा, वो अकेला ही, कई लोगों के पेट भरता है, कई बच्चे पलते हैं उसके ऊपर, और फिर, उसका परिवार, किसी भी बेटी या बेटे का विवाह नहीं हुआ है, अतः, उसका भेदन नहीं किया जाना चाहिए! और यही फैंसला दिया कोल्या ने भी!
"ठीक है! कोई भेदन नहीं होगा उसका, लेकिन अब उसके लिए, खतरा बढ़ गया है, कोई जाओ, और उसको बताओ, कि वो चाक-चौबंद रहे, अपनी सुरक्षा बढ़ा ले, क्योंकि उसके ही रिश्तेदार ने उसकी मौत का चक्रव्यूह रच दिया है, रही बात भेदन की, तो मेरे होते हुए, उस तक कोई आंच नहीं आएगी!" बोला कोल्या!
और मित्रगण!
यहीं से, अब, उस कोल्या के दिन, गिनती के रह गए!
अगले दिन,
रम्मा स्वयं गया मिलने, सारंग से, सारंग ने सम्मानपूर्वक उसके साथ व्यवहार किया, जब पता चला कि वो कोल्या के यहां से आया है, तो और भी प्रसन्नता हुई सारंग को! और तब, रम्मा ने, सारी बात कह सुनाई, सारंग को तो जैसे यक़ीन ही नहीं हुआ! उसका ही अपना कुनबे का छोटा भाई?
रमम ने समझा दिया उसको, जितना समझा सकता था! और हुआ फिर वापिस! आया कोल्या के पास, और बता दी एक एक बात!
अगला दिन..............
सुबह करीब नौ बजे ही, केदार अपनी बग्घी पर आया कोल्या के पास, प्रणाम आदि हुई, केदार कुछ अन्न आदि लाया था कोल्या के लिए, कोल्या ने मना कर दिया! कह दिया, वो ये काम नहीं करेगा! बता दिया, कोल्या को कुछ भी बुरा नहीं नज़र आया उसमे!
केदार के होश उड़ गए!
उसके साथ आये सभी लोग, जो अब तक बैठ चुके थे, सभी खड़े हो गए!
"तुम्हें धन चाहिए न? मिल जाएगा! ज़मीन चाहिए? मिल जायेगी?" बोला केदार,
"बस! अब निकल जा यहां से!" बोला कोल्या,
गुस्से से देखा केदार ने उसे!
कोल्या भांप गया, उतरा दो सीढ़ी नीचे, रखा उसके कंधे पर हाथ!
"तेरा जल न ग्रहण किया होता, तो तेरी ये आँखें अब तक तेरे सर में बाकी न रहतीं! अब लौट जा, जैसे आया था, ठीक वैसे ही! नहीं तो, ये जगह मेरी है! कहीं मुझे क्रोध आया, तो यहीं गाड़ दूंगा तुझे और तेरे इन लोगों को!" बोला कोल्या, और दिया धक्का!
गिरते गिरते बचा केदार!
मन में, क्रोध लिए, गुस्से में पाँव पटकते हुए, लौट गया वापिस!
लेकिन!
अब तो भेद खुल गया था!
केदार क्या चाहता है, ये अब कोल्या जान गया था! और कोल्या का मुक़ाबला करना, केदार में तो क्या, वहां आसपास किसी के बस में न था!
दस दिन बीते होंगे,
केदार, वहां से बहुत दूर, एक जगह आया था, किसी के साथ!
जहां आया था, वो जगह थी, एक अधंग बाबा की!
अधंग! लूट-मार करने वाले! तंत्र-मंत्र में माहिर! खूंखार! हत्यारे, पेशेवर हत्यारे! इनसे लड़ने में, कोई सानी नहीं था इनका! दया आदि का भाव तो, बचपन से ही नहीं भरा जाता था उनमे! आज ऐसे अधंग, अब शेष नहीं बचे हैं, अंग्रेजी राज में, इन पर इनाम रखा जाता था, और एक एक अधंग को, मार दिया जाता था, अंग्रेजी सरकार ने, ऐसी ही इनका खात्मा किया था!
ये अधंग, अपना भेस बदल कर, दूसरे राज्यों में भाग जाते थे और इन्हीं अधंगों में से जन्म हुआ था ठगों का! ठग-विद्या का! ये मात्र एक रुमाल से ही, एक व्यक्ति की गरदन ऐसे काट सकते थे, जैसे किसी धारदार हथियार से काटी जाती है!
इन्हीं ठगों ने, अंग्रेजी सरकार में कोहराम मचा दिया था! ये अंग्रेजी सरकार के खजानों को ही लूट लेते थे! इनका एक नियम था, कोई भी जीवित न रहे, चाहे बालक हो, चाहे औरत, कोई बेहोश न हो, बस सभी की गरदन काट कर, बोरे में सर भरकर, ले जाया करते थे, ताकि शिनाख़्त ही न हो सके उस लाश की! ये ठग, हरियाणा, मध्य उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल प्रदेश उत्तर प्रदेश का, मध्य प्रदेश बुंदेलखंड, पूरा राजस्थान, यहां तक फ़ैल गए थे!
आप मानिए, एक महाठग, रौमना के ऊपर उस सस्ते ज़माने में, पचास हज़ार का इनामी ठग था! लूट-पात  के बाद वो अगली जगह का भी पता लिख दिया करता था! आप सोचिये कैसा होगा वो! कहते हैं रौमना ने, हज़ार से ज़्यादा अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था! उसके दबे खजनाने, आज भी अचानक, कहीं न कहीं मिल ही जाया करते हैं!
तो, वो केदार, बैठा था ऐसे ही एक अधंग बाबा पुरना के पास! बाबा पुरना ने, सारी बात सुनी थी उसकी! उस बाबा के साथ उसका बड़ा बेटा, सेनझा भी बैठा था!
"तो दो काम हैं तेरे!" बोला बाबा,
"हाँ बाबा!" बोला वो,
"ठीक! हो जाएंगे!" बोला वो,
बड़ी शान्ति सी मिली केदार को!
जैसे काम, अभी हो ही गया था!
एक रकम तय हो गयी! आधी रकम, अदा कर दी गयी! और आधी अब काम हो जाने के बाद दी जानी थी!
"अब कब सम्पर्क करूँ?" पूछा केदार ने,
"हमारा आदमी आ जाएगा!" बोला बाबा,
"अच्छा जी!" बोला वो,
"अब जाओ!" बोला बाबा,
"वैसे, कब तक की उम्मीद रखूं?" पूछा, खड़े होते हुए केदार ने,
"पहले खोजबीन कर लें, दस या बारह दिन" बोला बाबा,
और वो रकम, दे दी अपने बेटे को,
"बहुत अच्छा जी!" बोला केदार!
और चला आया बाहर, अपने दो साथियों के साथ! और हुआ वापिस!
"ये कोल्या कौन है?" पूछा बाबा ने,
"वहीँ रहता है, यही बोला ये तो?" बोला सेनझा,
"पकड़ वाला आदमी है?" पूछा बाबा ने,
"किसी भौभन का शिश्श है!" बोला सेनझा,
"भौभन........भौभन....भौभन.............अच्छा!" आया याद बाबा को!
"कौन था ये भौभन?" पूछा बेटे ने,
"समझ गया! कोल्या था वो भी!" बोला बाबा,
"पकड़ वाला था?" पूछा बेटे ने,
"हाँ, था तो सही!" बोला बाबा, दाढ़ी खुजाते हुए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"क्या जाफन के बराबर है?" पूछा सेनझा ने,
"हाँ, माना जा सकता है" बोला बाबा,
"फिर कैसे होगी?" पूछा बेटे ने,
"ऐसे पार नहीं पड़ेगी!" बोला बाबा,
"तो फिर?" पूछा बेटे ने!
"वहां संख्या काम आएगी!" बोला बाबा!
"समझ गया!" बोला बेटा! हँसते हुए!
और बूढ़े दिमाग ने, एक मंझी हुई बात कही!
"उस सारंग का तो कुछ नहीं, बस इस कोल्या का इंतज़ाम करना होगा!" बोला कुटिल बाबा!
"कल ही खोज लगवाता हूँ" बोला बेटा,
"हाँ, पता करो, कितने पानी पैठ है!" बोला बाबा!
"कल चल जाएगा पता!" बोला बेटा,
"ठीक, और सुनो?" बोला बाबा,
"हाँ?" रुका जाते जाते वो, और पलटा,
"कोई चूक ना हो, वो कोल्या, संख्या में कम भले ही लगे, ताक़त में दूना है!" बोला बाबा,
"समझ गया! नहीं होगी!" बोला वो, और चला गया बाहर!
अगला दिन,
शाम का समय,
बाबा अधंग का स्थान,
बैठे थे सभी, आज दिन भर खोज लगी थी, कई खोजी, अपनी अपनी जानकारी लाये थे, अब उन्हें, बाबा को देनी थीं वो सारी जानकारिया!
"झज्झल?" बोला बाबा,
"बाबा, ये कोल्या जहाँ रहता है, वहां कुल पच्चीस आदमी हैं,  गाँव से थोड़ा हटकर है इसकी जगह, ये सारे के सारे आदमी, उस कोल्या के, इर्द-गिर्द ही रहते हैं, कोल्या, कभी अकेला नहीं रहता, इसका हर आदमी हथियारबंद रहता है, एक एक आदमी जैसे जुझारू है!" बोला एक,
"हाँ?" दूसरे आदमी को देखते हुए बोला बाबा,
"ये कोल्या, महोलिया का है, इसके घर में, इसके भाई हैं, कुल नौ हैं ये, तीन बहनें ब्याह दी गयी हैं, ये कोल्या, तीसरे नंबर का है, लेकिन ये कोल्या, नहीं जाता घर अपने, और उसके भाई आदि किसी भी रिश्तेदार से आपस में कोई संबंध नहीं हैं इसके!" बोला दूसरा!
"हूँ?" बाबा ने देखा तीसरे को,
"ये कोल्या, बहुत पकड़ वाला है, इसका रसूख है हर जगह! कोई ऐसा नहीं मिला, जो उसके खिलाफ बोला, सभी इज़्ज़त करते हैं उसकी!" बोला तीसरा,
"हाँ रे?" पूछा चौथे से!
"इसके आदमी ऐसे खूंखार हैं कि मरने से नहीं डरते, उन्हें जैसे मौत का डर ही नहीं है, अगर सामने सौ आदमी हों, तो भी पीछे नहीं हटेंगे, एक एक आदमी, पहलवान है उसका!" बोला चौथा!
बाबा ने थूक गटका!
कुछ सोचा!
"और कुछ?" पूछा बाबा ने,
"एक बात और!" एक बोला,
"हाँ, आगे आ?" बोला बाबा,
"ये जो केदार आया था, इसने झूठ बोला हमसे!" बोला वो,
"कैसे झूठ?" पूछा बाबा ने,
"दरअसल, ये केदार के यहां ही गया था सबसे पहले, उस सारंग का काम करवाने के लिए!" बोला वो!
"उस से क्या फ़र्क़ पड़ता है?" पूछा बाबा ने,
"फ़र्क़ ये कि हो सकता है कि कोल्या को भी हमारे बारे में भान हो गया हो? या हो जाए?" बोला वो,
अब बात तो सही थी!
कोल्या को पता चल जाता तो उसके आदमी, यहीं आ धमकते! खून-खच्चर हो जाता! अब भले वो सभी ही मारे जाते! लेकिन दुश्मन ज़िंदा रहे, ये नागवारा था उनके लिए!
"हम्म" बोला बाबा,
खुजलाई दाढ़ी,
"सेनझा?" बोला वो,
"हाँ?" आया सेनझा!
"रे, बात तो चोखी कही इसने!" बोला बुड्ढा बाबा!
"आप सुझाओ फिर?" बोला सेनझा,
बाबा ने घुमाया दिमाग!
दौड़ाया दिमाग!
हिलायी हाँ में और ना में गरदन, कई बार!
खुद के सुझाव और खुद के बदलाव!
"एक काम कर?" बोला बाबा,
"बोलो?" बोला वो,
"कल, छीरनी को बुला!" बोला बाबा,
"अच्छा" बोला वो,
"वो करेगी कुछ!" बोला बाबा!
छीरनी!
एक ऐसी तांत्रिक जो ऐसा काम किया करती थी, जो शायद कोई और ही करती हो! वो, गर्भ-धारण करती थी! शत्रु की प्राण-वायु, अथवा प्राण-कण स्थापित करती थी उसमे! और ठीक तीसरे माह, प्रसव हो जाता था उसे, उस भ्रूण को, वो, खा जाया करती थी!
ये है, अरिभङ्ग-महातंत्र!
सुना है आपने?
नहीं न?
मित्रगण! मैं कुछ नहीं छिपाता कभी!
न पाप, न पुण्य!
न आकर्षण,
न प्रसंग!
न निकटता!
न काम-भाव!
नहीं!
नहीं छिपाता मैं!
जिस प्रकार, एक हवा से हल्की रुई का टुकड़ा, जब जल सोख लेता है, तो वो कितना भारी हो जाता है! रुई तब, अपना गुणधर्म त्याग कर देती है! इसी प्रकार! अपने गुण, रुई समान मानिए, और वो जल, अपने दुर्गुण मानिए! तो सोचिये, कौन भारी? गुण? अथवा दुर्गुण?
अपने गुणों का, परीक्षालन करना, ऐसे ही आवश्यक है, जिस प्रकार, नए आम के पेड़ पर आई हुई बौर, गिरा दी जाती है, हर वर्ष! कम से कम, पांच वर्ष! तभी आम मीठा हुआ करता है!
इसी लिए, ये अरिभङ्ग-महातंत्र भी नहीं छिपाया!
ये एक दुर्लभ ज्ञान है!
ये तो, स्वयं देवताओं ने भी संधानित किया है!
महाभारत में, ऐसे कई दृष्टांत हैं! बस, आवरण चढ़ा दिया गया है!
ठीक वैसे ही,
जैसे, श्रृंगी ऋषि ने, खाने के लिए, एक सेब दिया था!
मित्रगण!
तब भारत में सेब होता ही नहीं था!
इसका रोपण तो, ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने किया था!
तो वो फल क्या था?
दरअसल, वो फल, था ही नहीं!
खैर, ये बाद में बताऊंगा, अब समय है, क्रमशः का,
तो, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो रात, बाबा अधंग के लिए, चिंता वाली रात ही बनी! कोल्या का सामर्थ्य जानता था वो कुटिल बाबा! ये भी जानता था कि, भले ही कोल्या पर आमने-सामने से वार किया जाए, या पीछे से, छिपकर, वार किया जाए, वो पलट कर ऐसा भीषण वार करेगा कि जान के लाले पड़ जाएंगे! कोल्या और उसके साथी, अधंग बाबा के आदमियों को ऐसे काट देंगे कि जैसे केले के वृक्ष का कोई तना काटा जाता है! एक बात और मित्रगण! उस समय में, भारत में जो तलवारें बन रही थीं, उसमे अब अफ़ग़ान और तुर्क तकनीक का समावेश हो रहा था, अब कि तलवारें, पहले या राजपूताना जैसी, अर्ध-चंद्राकार न रही थीं, अब तलवारें, मूठ से चार इंच, बीच में छह इंच, और शीर्ष पर आठ इंच हो रही थीं, ये सीधी और जहां से चौडीं हो रही थीं, वहाँ से उनमे वजन बढ़ता जा रहा था, अब वे तलवारें, सीधी हो चली थीं! इनका फाल इतना चौड़ा हो रहा था, कि शत्रु की गरदन को, एक बार में ही धड़ से अलग कर दिया जाता था, वो भी बस वार की ताक़त से! छाती में ऐसे घुस जाया करती थीं जैसे किसी मिट्टी की गीली दीवार में घुस रही हों! अब मूठ पर, पूरा पोठा, जो कि उँगलियों को बचाया करता था, अब वो न रहा था, बल्कि, अब मूठ पोठा-रहित थीं, इसका लाभ ये था, कि तलवार, अपनी कलाई से ही घुमा ली जाती थीं! और वैसे भी, कोल्या तो एक साथ, दो दो ऐसी तलवारें चला सकता था! उसकी देह ही ऐसी विशाल और मज़बूत थी! कद्दावर जिस्म था! किसी को अगर वैसे ही छाती में एक घूँसा जड़ दे, तो देह के हर छिद्र से खून-आलूदा मलीदा बाहर रिसने लगता!
अगला दिन.............
सुबह कोई ग्यारह बजे...........
बाबा पुरना अपने कमरे में था, कोई हिसाब-किताब में लगा था, आज कुछ लोग आ रहे थे उसके पास, कुछ अदल-बदल होना था, कुछ वो लाते और कुछ यहां से जाता!
"बाबा?" आवाज़ दी किसी ने,
"कौन है?" बोला बाबा, कुछ सामान नीचे सरकाते हुए,
"कलुआ हूँ!" बोला एक आदमी,
"हाँ, क्या बात है?" पूछा बाबा ने,
"वो छीरनी आई है!" बोला कलुआ,
"अच्छा, जा, भेज उसे!" बोला बाबा,
कलुआ गया वापिस, बाबा खड़ा हुआ, दरवाज़े पर खड़ा हो गया, सामने से, एक चालीस साल की, भारी-भरकम औरत आ रही थी, देखने में ऐसी लगे, कि बालक-बालिकाएं देख लें, तो मारे भय के बुखार आ जाए उन्हें! हाँ, उसके साथ, एक नव-यौवना थी, वो बहुत सुंदर थी, सभी मर्द वहां के, उसी को देख रहे थे!
हाथ जोड़े छीरनी ने, और बाबा ने अंदर बुला लिया उसे, अंदर बिठाया दोनों को,
"कैसे बुलाई?" बोली छीरनी,
और तब बाबा ने बात बताई उसे, पूरी बात सुनी छीरनी ने, और हुआ फिर कुछ मोल-भाव! और बन गयी बात!
"ये कौन है?" पूछा बाबा ने,
"सुरजा है ये!" बोली छीरनी, उस नव-यौवना का वस्त्र उठाते हुए, छाती से!
"खूब ताप है इसमें तो!" बोला बाबा,
"हाँ, कल ही लायी इसे मैं!" बोली वो,
"कहाँ की है?" पूछा बाबा ने,
"भिरसना की!" बोली वो,
ये एक पहाड़ी गाँव था, उस समय, अब है या नहीं, नहीं पता!
"तो ये बता, काम कब तक हो?" पूछा बाबा ने,
"तीन महीने तो मान लो!" बोली वो,
"इतना समय तो बहुत है? कुछ कम में?" बोला बाबा,
"गरभ भी तो पकना है?" बोली छीरनी!
"कुछ जल्दी कर!" बोला बाबा,
"कोसिस करूंगी!" बोली वो,
तब बाबा ने, निकाले पैसे अंटी से, कुछ सिक्के थे ये सोने और चांदी के, दे दिए छीरनी को! छीरनी ने, लिए वो, और खोंस लिए अपनी चोली में!
"मावस रोज आउंगी!" बोली वो,
"कोई ना! आइयो!" बोला बाबा,
और छीरनी उस मटकती हुई तापन को, ले चली! मर्द ऐसे देखते जैसे रस टपक रहा हो उस से! अधंग थे, ये सब ही उनका काम-धंधा था!
मित्रगण!
समय आगे बढ़ा!
कोल्या को, अभी तक कुछ भान नहीं था, कि उसके लिए भी कुछ जाल बन दिया गया है! दिन बीतते गए, और एक रात, जब चन्द्रमा चमक रहे थे, उस जगह पर, जहां वो कोल्या रहता था, कोई आया! कोल्या के पहरेदार, मुस्तैद थे! मशाल जल रही थीं, कोल्या, भोजन कर, सोने जा चुका था, या तैयारी में था!
"कौन है?" एक दहाड़ा,
"मैं हूँ, मजबूर........." आई एक आवाज़, एक औरत की,
"कौन?" फिर से पूछा,
"मेरी मदद करो!" बोली कोई,
एक पहरेदार उतरा नीचे, उठायी मशाल, और चला आवाज़ की तरफ, उजाला सा हुआ, तो देखा, एक नग्न  स्त्री खड़ी थी, उसने बस, अपने हाथों से ही अपना शरीर छिपा रखा था,
"कौन है तू?" पूछा पहरेदार ने,
"सुरजा हूँ जी, यहां से शाम को, जा रही थी, लुटेरों से सामना हो गया, और देख लो, मेरी हालत, मैं तो साँझ  से वही झाड़ियों में छिपी रही, अब आई हूँ निकल कर, मेरी मदद करो!" बोली वो, अब तो सुबकने भी लगी थी,
पहरेदार ने, अपना खेस उछाल दिया उसकी तरफ,
"ले, ओढ़ ले, और यहीं रुक!" बोला पहरेदार,
और चल पड़ा वापिस,.
थोड़ी देर में आया, तो साथ में रम्मा था,
"इधर आ?" बोला रम्मा,
वो धीरे से आगे आई,
"शादी हो गयी तेरी?" पूछा रम्मा ने,
"ना" बोली वो,
"गाँव कौन सा है तेरा?" पूछा उसने,
"भिरसन!" बोली सुबकती हुई,
"तुझे वापिस ले जाएँ?" बोला रम्मा,
"अब तो रात है, मैं कल ही चली जाउंगी, सुबह तक का आसरा दे दो....." बोली वो,
कुछ सोचा रम्मा ने,
"साथ चल मेरे!" बोला रम्मा,
और ले चला उसको ले कर, कोल्या के पास, कोल्या जागा ही था, कोल्या के पास तक, ले आया वो, और सुना दी सारी कहने उसकी, कोल्या ने सुनी कहानी!
"भूखी है?" पूछा कोल्या ने,
"हाँ" बोली वो,
"रम्मा, इसको खाना दे" बोला कोल्या,
"जा, बैठ जा!" बोला रम्मा, वो बाहर ही बैठ गयी, चौखट के बाहर,
"इधर आ जा अंदर, कहना बाहर खायेगी?" बोला कोल्या,
आ गयी अंदर,
कोल्या उठा, और मटकी में से पानी निकाला, भरा सकोरे में, दे दिया उसको, प्यासी थी, सो पानी पी गयी, दिया वापिस सकोरा, तो और भर दिया पानी कोल्या ने,
बैठ गया कोल्या,
"भिरसन की है तू?" पूछा कोल्या ने,
"हाँ" बोली वो,
"यहां अकेली क्या कर रही थी?" पूछा कोल्या ने,
"मैं आई थी किसी के साथ, वो आगे निकल गए, मैं रह गयी पीछे" बोली वो,
खाना आ गया, दे दिया उसको,
"अब खाना खा ले" बोला कोल्या, और चला बाहर, वहाँ से, कुछ कपड़े लाया, अंदर आया और बैठ गए,
"ले, ये पहन लियो, सो जा आराम से फिर, सुबह तेरे गाँव छोड़ दिया जाएगा तुझे!" बोला कोल्या,
वो औरत, उस कोल्या को, देखते ही रह गयी! ये कैसा मर्द है? अलग ही है! एक औरत, अकेली, और ये कोल्या, खाना, कपड़े, आसरा, छोड़ेगा भी उसके गाँव तक?
"खाना खा ले आराम से, और मंगवाऊँ?" पूछा कोल्या ने,
कुछ न बोली वो, मुंह में गस्सा रखे, अपलक, उसे ही देखती रही वो!


   
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श्रीशः उपदंडक
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अपलक देखती रही वो उसे! कोल्या, पंखा झलने लगा था, कभी-कभार उसकी तरफ भी झल देता था, ये व्यवहार, उस सुरजा के अन्तःमन पर कहीं चोट कर गया था! उसे जैसे अब, आत्म-ग्लानि होने लगी थी, चेहरे के भाव बदल गए थे उसके, उसने धीरे से, खाना चबाना शुरू किया, और फिर निगलना, खाने लगी थी खाना,
"तेरे घर में कौन कौन हैं?" पूछा कोल्या ने,
"दो भाई, बाबा और माँ" बोली वो,
"भाई क्या करते हैं?" पूछा उसने,
"अभी छोटे हैं" बोली वो,
हल्के से गरदन हिलायी कोल्या ने,
"चिंता न कर, सुबह छोड़ देंगे तुझे, रात आराम से सो तू!" बोला कोल्या,
हाँ में, कई बार गरदन हिलायी उस सुरजा ने,
उसने खाना खा लिया, तश्तरी भी साफ़ कर दी थी उसने, हाथ भी धुलवा दिए थे उसके कोल्या ने, और कोल्या, अंदर आ बैठा फिर, वो चौखट पर बैठ गयी,
"रम्मा?" बुलाया कोल्या ने,
"आया!" आई आवाज़,
दौड़ा दौड़ा आया रम्मा,
"इसको ओसारे में सुलवा दे, देख, रात में इसके पास कोई नज़र न आये मुझे!" बोला कोल्या, समझा दी थी अपनी मंशा!
लेकिन कोल्या के ये शब्द, हथौड़ा मारे जा रहे थे उस औरत के कलेजे पर! वो चोरी चोरी, नज़रें बचा कर, उस कोल्या को नज़र भर देखती!
"जी हाँ!" बोला रम्मा!
"जा! आराम से सो, रात घिर गयी है!" बोला कोल्या,
वो औरत उठी, और जाने से पहले, एक ग्लानि के भाव से, कोल्या को देखा उसने, न देख सकी तो पलकें नीचे गिरा लीं, चली गयी वो रम्मा के साथ!
रम्मा सुला आया उसे, कपड़े दे ही दिए थे, हाँ, अब एक छोटी मटकी ले कर जा रहा था उसके लिए, रात में कहीं प्यास लगे, तो कहीं जाना न पड़े उसे, इसीलिए!
इस तरह, उस रात आराम से सो गए सभी!
अगला दिन, सुबह का समय, कोई पांच बजे होंगे!
कोल्या अपने कक्ष से बाहर निकला, अंगड़ाई ली, तभी उसे, किसी के सुबकने की आवाज़ें आयीं, वो चल पड़ा उस तरफ, आवाज़ें, ओसारे से आ रही थीं, वहीँ के लिए चला, वहां पहुंचा, तो वो औरत, नीचे बैठे हुए, अपने घुटनों में अपना सर घुसाये, सुबक रही थी! कुछ न समझ आया, बल्कि उसकी भुजाएं फड़क उठीं! किसने किया ये दुष्कर्म? इसीलिए उसका सर, मारे क्रोध के, फटने लगा था!
"क्या हुआ?" बोला वो,
अब जैसे ही उस औरत ने कोल्या की आवाज़ आई, वो अब दहाड़ें मार कर रोने लगी!
"मुझे बता? क्या हुआ? कोई आया था? पहचान उसे, बता मुझे? यहीं गरदन अलग कर दूंगा उसकी, बता मुझे? चल उठ?" बोला कोल्या,
न उठे वो!
रोये ही जाए!
जितना कोल्या पूछे, उतना ही रोये!
बैठा कोल्या,
"बता? बता तो सही?" बोला वो,
न बताये! रोये ही जाए! कोल्या के आदमी, एक एक कर, वहाँ इकट्ठे हों!
"सुरजा? बता तो सही?" बोला कोल्या,
और अगले ही पल! अगले ही पल पांवों से लिपट गयी वो कोल्या के! और कह सुनाया सारा प्रपंच! किसने भेजा, किसलिए! क्या कहा गया था उस से! सब कुछ सुना दिया सुरजा ने! केदार, बाबा अधंग से लेकर, छीरनी की कपट-विद्या तक! डर रही थी वो औरत! कि अब, कोल्या, उसकी ही गरदन धड़ से अलग कर देगा! भिजवा देगा सर छीरनी को! कांपने लगी थी वो! एक एक ने, जिसने सुना, वो तो क्रोध में उबल पड़ा! कोल्या सकते में था! उसने किसी का क्या बिगाड़ा था?
"चल उठ सुरजा! तुझे क्षमा किया! उठ! चल तुझे तेरे गाँव छोड़ आते हैं!" बोला कोल्या,
वो औरत, न माने! रोये ही जाए!
जब तक, कोई और बात होती, रम्मा, दौड़ चुका था अपने साथ छह लोगों को लेकर! जानता था कोल्या! कि कहाँ गया है वो रम्मा!
उस दोपहर! रम्मा और उसके आदमियों ने उस स्थान में प्रवेश किया! किसी को बोर में भर लाये थे वो! और जब बोरा खोला गया, तो ये छीरनी थी! उसके मुंह में कपड़ा ठुंसा था, निकाला गया कपड़ा बाहर, और छीरनी ने, अब क से ह तक की पूरी वर्णमाला सुना डाली!
और कोल्या ने सुना दिया फैंसला! उन दोनों को नहीं मारा जाएगा! छीरनी वो स्थान ही छोड़ कर, वहाँ से चली जायेगी, कभी दुबारा नज़र आई, तो दोनों कान और नाक, काट लिए जाएंगे! सुरजा, अपने गाँव में ही रहेगी, छीरनी उसके पिता से कोई रकम वसूल नहीं करेगी! ज़िंदा रहने के लिए, ये रकम वो बहुत ही कम थी!
मित्रगण! इसके बाद, ये दोनों औरतें, कभी नहीं आयीं! इनका क़िस्सा यहीं खत्म हो गया था!
उसी शाम,
भोग दिया कोल्या ने, अपनी आराध्या को!
पूर्ण पूजन हुआ उस शाम!
और फिर सब, एक जगह बैठे!
"ये केदार, क्या करना है इसका?" बोला रम्मा,
"करना क्या है? कर देते हैं टुकड़े?" बोला रूंगड़!
"फूंक आते हैं घर हरामज़ादे का!" बोला जमवा!
"यहां लाते हैं उसको उठाकर, और टुकड़े टुकड़े काटेंगे उसके!" बोला टेपा!
"नहीं! मामला वो नहीं!" बोला कोल्या,
"फिर?" पूछा रम्मा ने,
"वो अधंग!" बोला कोल्या,
"तो बोल देते हैं धावा?" बोला रम्मा!
"और क्या? आदेश?" बोला रूंगड़!
"नहीं!" बोला कोल्या,
"तो?" बोला रम्मा!
"जाफ़न है वहाँ!" बोला कोल्या!
"हाँ, है? तो?" बोला रूंगड़,
"उसके जीते जी, अधंग जीते नहीं जा सकते!" बोला कोल्या,
"तो जाफ़न को हटा दें?" बोला रम्मा,
"ये इतना आसान नहीं!" बोला कोल्या,
"तो करना क्या है?" पूछा टेपा ने!
"पहले बातचीत!" बोला कोल्या,
ये सुन, सभी सकते में!
"किस से?" पूछा रम्मा ने,
"पुरना से!" बोला कोल्या,
हंस पड़ा रूंगड़! और फिर जमवा!
"मान जाएंगे वो हरामज़ादे?" बोला हँसते हुए रूंगड़!
"नहीं! तब आरपार होगी!" बोला वो, कोल्या,
"आरपार तो होनी है है अब! या तो आज, या कल!" बोला जमवा!
"हाँ, सही कहा!" बोला टेपा!
"कौन जाएगा बातचीत करने?" पूछा कोल्या ने,
"आप बताओ?" बोला जमवा,
"तू, रम्मा, और तू, जमवा, तू रूंगड़ और उस थरुआ को ले जाना!" बोला कोल्या,
"कब जाएँ?" पूछा रम्मा ने,
"कल सुबह ही!" बोला कोल्या!
था वो, हाथ जोड़कर, अपने ईष्ट का स्मरण किया!
और चल पड़ा, अपने क्रिया-स्थल की ओर! लेने आशीर्वाद अपनी आराध्या का!


   
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श्रीशः उपदंडक
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अगले दिन, सुबह सुबह, पूजन पूर्ण किया कोल्या ने, और टीका-करण किया उन छह लोगों का, जो आज जा रहे थे, अपने शत्रु अधंग के पास! बाबा पुरना और उसके बेटे सेनझा के यहां! उनके हथियारों का पूजन कर लिया गया था! घोड़े निकाल लिए गए थे अस्तबल से! जीन कस ली गयी थीं! बुक्कल मार लिए गए थे! और फिर हुआ आदेश कोल्या का! एक एक आदमी, अपना सर झुका, घोड़े को एड़ लगा, दौड़ पड़ा था! छह घोड़े, जब दौड़ते हों अपनी रौ में, तो उनकी चाल देखते ही बनती है! उनके खुरों की टाप से, जो आवाज़ आया करती यही, उसमे जोश तो होता है है, एक अलग क़िस्म का रोमांच भरा होता है! घोड़े, आँखें चौड़ी किये, नथुने फुलाये, अपनी मांस-पेशियों को कसे, ऐसे दौड़ते हैं कि जैसे आज नाप ही देंगे वो सामने का पूरा भूगोल!
भूमि को देखें अगर, तो जैसे घकिया रही होती है घोड़ों को आगे! उनके खुरों से उछली मिट्टी और कंकड़, ऐसे उछलते हैं कि जैसे बंदूक से गोलियां निकल रही हों! लोग, अपने आप रास्ता छोड़ देते हैं! मवेशी, श्वान आदि, भाग पड़ते हैं खुले स्थान के लिए! ऐसी द्रुत गति से दौड़ रहे थे वो घोड़े! और उनमे, सबसे आगे था वो, जो इस दल का मुखिया था, रम्मा! सबसे ज़्यादा विश्वस्त साथी उस कोल्या का! उसक इर्द-गिर्द, रूंगड़ और टेपा! घोड़े जैसे एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में थे! करीब एक घंटा घोड़े दौड़ते चले! अब ज़रा उन्हें आराम देने का वक़्त था, एक जगह, रोक दिया गया उन्हें, जीन हटा दी गयी, पानी पीने के स्थान पर ही रोक था! मुंह से झाग छूट रहे थे उनके!
इनमे, एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे इंसानी-कसाई कहा जाता था! को थरुआ! इंसान के जिस्म से, खाल ऐसे छीलता था पेशियाँ ऐसे निकाल लेता था कि एक बूँद खून नहीं टपकता था! थरुआ के सामने जो आया, समझो काल का प्यारा हुआ! सबसे भारी और बड़ी तलवार थी उसकी! थरुआ, आदिवासी था और रम्मा का सबसे अधिक विश्वस्त! गठा हुआ जिस्म था उसका, एक साथ कई लोगों को हलाक़ करने का दमखम रखता था वो! वैसे तो कोल्या का एक एक आदमी, अपने अपने काम में माहिर था! वे सभी के सभी, अपनी जान देने को तैयार रहते थे कोल्या के आदेश करने पर!
एक बार फिर से, सुस्ताने के बाद, घोड़ों पर, जीन कस दी गयीं! और घोड़े, फिर से द्रुत गति से दौड़ने लगे! अब उनकी मंजिल, वो अधंग बाबा था, उसका वो स्थान!
उस दिन, करीब बारह बजे, रम्मा का वो दल, पहुंचा उस अधंग बाबा पुरना की सरहद में! बीचे जगह में ही, पूछताछ हुई! पुरना के साथी, इकट्ठे होने लगे! जब ये खबर पता चली, कि कोल्या की तरफ से आये हैं वो लोग, तो माहौल, अचानक से गरम हो गया था! जाफ़न और भौभन, एक दूसरे के शत्रु रहे थे! भौभन तो स्वर्गवासी हो लिए थे, लेकिन जाफ़न अभी भी ज़िंदा था! और ये जाफ़न, बेहद क्रूर, खौफ़नाक क़िस्म का था! ये सभी अधंग उसी के इशारे पर चला करते थे!
हाँ, तो वे छह आदमी जा पहुंचे थे उन अधंगों को बीच! जैसे ही उनके घोड़े वहां पहुंचे, कई पहरेदारों ने, म्यानों में से अपनी अपनी तलवार निकाल ली थी, ये दल, कोई मामूली नहीं था! उन्होंने भी अपनी 'भवानी-तलवार' खींच ली थी अपनी अपनी म्यान से! बुक्कल खो दी गयी! सभी के चौड़े और विश्वास से भरे चेहरे देख कर, ऐसा नही लगता था कि उनको भय नाम की किसी भी वस्तु ने भयभीत किया हो!
"कौन हो तुम?" पूछा एक ने, जो चला आ रहा था उनकी तरफ, धीरे धीरे!
"बता दिया है हमने अपने बारे में!" बोला टेपा!
कर दी गयी खबर! चल गया पता कि कोल्या के आदमी आ ये हैं उधर!
"क्या काम है?" पूछा एक ने,
"तुझ से बात नहीं करनी, पुरना को भेज, चल जा!" बोला रम्मा, घोड़े से उतरते हुए! वो उतरा तो अभी उतरते चले गए, वो छह के छह!
"जानता है? कहाँ है?" बोला वो पहरेदार!
"जा, पुरना को भेज!" बोला रम्मा!
आखें तरेड़ता हुआ, अपना सा मुंह ले, वो पहरेदार, चल पड़ा अंदर जाने के लिए!
आया एक लम्बा-चौड़ा जवान! ये था सेनझा! पुरना का बेटा!
"अपने हथियार रख दो इधर!" बोला वो,
सुनी तो सभी ने, लेकिन हथियार न रखे!
"मैं पुरना का बेटा हूँ!" बोला वो,
रम्मा ने रखी अपनी तलवार! लिया रूंगड़ को साथ में, शेष चार, वहीँ खड़े रहे, वो तलवारें उन्हीं चारों के पास रह गयीं थी!
"आ जाओ!" बोला सेनझा,
चल पड़े उसके पीछे वो दोनों!
जा पहुंचे अंदर! एक अहाता था, पत्थरों का बना हुआ! वहीँ, अपने बीस-बाइस साथियों के साथ बैठा था बाबा पुरना!
"चलो!" बोला सेनझा,
उन्हें बिठाया गया उधर, नीचे ही सब बैठे थे! वो भी बैठ गए!
"हाँ, कोल्या ने भेजा है?" बोला पुरना,
"हाँ!" बोला रम्मा,
"किसलिए?" पूछा पुरना ने,
"छीरनी सब बक गयी है, तेरा षड्यंत्र पता चल गया है, क्या चाहता है तू?" बोला गरज कर रम्मा! उसके गले में लटका, जंगली सूअर का दांत, हिलता रहा, जब तक रम्मा बोलता रहा!
छीरनी ने बक दिया? कैसे? इन्हें कैसे पता चला?
"कौन छीरनी?" बोला बाबा पुरना,
"जानता है तू!" बोला रम्मा,
"कोई छीरनी नहीं है!" बोला पुरना,
"केदार आया था यहां?" बोला रम्मा,
जैसे, बोरे में कोई छेद हो, और उस छेद में से, अन्न बाहर निकलता जा रहा हो, ऐसे हालात बन रहे थे वहाँ!
"हाँ, आया था!" बोला पुरना,
"किसलिए?" पूछा रम्मा ने,
"तू कौन होता है पूछने वाला?" बोला पुरना,
"सुन ले साफ़ साफ़! अगर कोल्या को, या अन्य किसी को, ज़रा भी खरोंच आई, तो पुरना, तेरा वो बूढ़ा जाफ़न भी नहीं बचा पायेगा किसी को, ये जगह जला कर राख कर दी जायेगी, तुम में से, एक का भी दाह-संस्कार नहीं होगा! याद रखा!, चल! उठ रूंगड़!" बोला उठते हुए रम्मा!
उठा रूंगड़, घूरते हुए पुरना को!
और जैसे ही चले, एक तलवार म्यान से बाहर आई!
पीछे मुड़कर देखा दोनों ने! ये सेनझा था!
"अगर कुछ देर और, रुके हम यहां, तो दूसरा दल, जो हमारे पीछे आधे घंटे बाद रवाना हुआ था, यहां होगा! उसके बाद इसी तरह तीसरा, फिर चौथा और फिर कोल्या!" बोला रम्मा!
आँखें फटी रह गयीं सभी की!
क्या खूब योजना थी ये कोल्या की!
तलवार, म्यान में वापिस हुई! और वापिस हुए वो!
अब न रोका किसी ने भी, पहुंचे अपने साथियों के पास, उठायीं तलवारें अपनी! चढ़े घोड़ों पर! लगाई एड़ और करके ईष्ट-नाद, दौड़ लिए वे छह के छह!
बीच रास्ते में, उन्हें दूसरा दल मिला! उस से बातें हुईं और फिर हुए वो सभी वापिस! फिर, मिला तीसरा दल! वे भी आ मिले! और चले अब, वापिस कोल्या के! अपना काम बखूबी कर आया था वो दमदार रम्मा!


   
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