मित्रगण! एक विनती! अनुनय! ये संस्मरण, कुछ अनूठा ही है! इसकी भाषावली, क्रिया-कलाप, विधि-रीति, कामोचित्त मनोभाव आदि कुछ पृथक हैं! अतः जो भी प्रश्न हों, वो, पहले प्रारम्भिक-ज्ञान जुटाकर ही हों! मैं सभी प्रश्नों का, तथा ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं दूंगा जो इस वर्तमान घटना से संबंध न रखते हों!
प्रस्तुत है ये संस्मरण:--
उस स्थान पर, कुल चौबीस लोग थे, आठ पुरुष, जिनमे तीन सत्तर की उम्र के, दो, प्रौढ़ावस्था के, और तीन, चालीस के आसपास के थे, मैं भी इन्हीं चालीस के आसपास के आयु-वर्ग में ही था!
बारह स्त्रियां थीं, जिनमे से, पांच पचपन से साठ के आसपास, छह, चौबीस से बत्तीस वर्ष के बीच की, और एक, अठारह वर्ष के आसपास कि कन्या थी, नाम याद है मुझे उसका, नाम उसका, रीति था, वो मूल रूप से, जिला रीवा मध्य प्रदेश की थी, परन्तु जन्म उसका, इलाहबाद में हुआ था!
शेष में, जो उस स्थान में तो थे, परन्तु किसी क्रिया-विशेष में शामिल नहीं थे, उनकी संख्या आठ के करीब थी, एक स्त्री, नीमा और उसका आदमी, बहादर प्रसाद, भेरी सम्भाले थे! शेष में, तीन स्त्री-सहायक और तीन बच्चे हुए, पुरुष थे, जिनमे एक किशोर भी था, उसका नाम भी मुझे याद है, उसमे नाम, पवन था, और पन्नू नाम से बुलाया जाता था, इकहरे बदन का, सुतवाँ सा किशोर था वो, रहने वाला काशी का था, और उधर कहाँ रहता था, ये मुझे ज्ञात नहीं!
ये एक औघड़-रात्रि थी, उस रात्रि से, तीन रात्रि पश्चात, उपाक्ष-भैरवी को जागृत करना था! भैरवी, महातामसिक एवं महातांत्रिक देवी हैं तंत्र में! स्वरुप में श्री महा औघड़ समान ही हैं! इन भैरवी के आठ रूप हैं, ये उपाक्ष इनका तीसरा स्वरुप है! उपाक्ष का अर्थ होता है, सरंक्षण प्रदान करना, सिद्धि-मार्ग को लघुत्तम रूप देना! सुनने में जितना सरल लगता है, पढ़ने में जितना सुग्राह्य लगता है, उतना लेशमात्र भी नहीं! उपाक्षा, ददंय, वृन्दिका, चन्द्रमोदनि, घटप्रिया आदि नामों से ये वर्णित है!
मेरे साथ एक छब्बीस वर्ष की, मेरी चुनी हुई साधिका, मृणाली थी! इस से पहले वो कभी, ऐसी साधना में नहीं बैठी थी, न ही उसने कभी कोई भाग ही लिया था, न ही कोई सहायिका आदि का कार्य किया था! मुझे वो भा गई थी! जो भी एक, साधिका में चाहिए होता है, वो सब था! साधिका का चयन ऐसे ही नहीं हो जाया करता, कई प्रकार की जांच, शारीरिक गुण, देहायष्टि, तीक्ष्ण नयन-नक्श, स्त्रियोचित सोलह गुण, और योनि का सबसे अहम योगदान हुआ करता है तभी, इन जांचों के उपरान्त ही, किसी साधिका को चयनित किया जाता है, कम से कम, मैं तो इस विषय में, परम्परागत हूँ या रूढ़िवादी हूँ! मृणाली को मैं गत पांच वर्षों से जानता हूँ, और, वो भी मुझे गत सात वर्षों से जानती हैं, इन्हीं दो वर्षों के अंतर् ने, उसकी हिचकिचाहट खत्म कर दी थी!
एक अलख नाद गूंजा! ये बाबा बलवंत नाथ जी थे! उन्होंने ही ये नाद किया था! बाबा बलवंत एक शक्तिपीठ के औघड़ हैं, उनके साथ, एक और उनके परिचित औघड़, बाबा बंग नाथ जी थे! ये दोनों ही, सत्तर की आयु पार कर चुके हैं! तीसरे सत्तर के औघड़, मध्य प्रदेश से थे, नाम है, कुंदन नाथ! ये बाबा मुझे बहुत प्रिय हैं! बेहद ही समझदार, मिलनसार, हंसमुख और मदद करने वाले हैं! ये भी अपनी एक साधिका के संग बैठे हुए थे, उस साधिका को मैं आरम्भ से ही पसंद नहीं करता! बस, बाबा का और मेरा, यहीं आकर, काँटा फंस जाता है! इस साधिका का नाम, मेघा है, अपने आपको बेहद चतुर, कुशल एवं प्रवीण मानती है! जबकि असलियत में, बस, डराना-धमकाना ही उसका काम है! कुछ जरायमपेशा लोगों से तअल्लुक़ात हैं उसके, बस! इसी पर, फूली नहीं समाती!
"वो मैना ही है न?" पूछा मृणाली ने,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"उधर, उधर देखिये?'' बोली वो,
"हाँ, वो मैना ही है!" कहा मैंने,
"ये अभी यहीं है?" बोली वो,
"घाघ है!" कहा मैंने,
"हाँ, चहेता भी है न!" बोली वो,
"सब जानते हैं!" कहा मैंने,
"इस को कौन नहीं जानता!" बोली वो,
"हाँ, ये तो है!" कहा मैंने,
"आप से मिला नहीं?" पूछा उसने,
"क्या ज़रूरत!" बोला मैं!
"फिर भी?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कमाल है!" बोली वो,
"देखा नहीं अभी!" बोला मैं,
''अच्छा!" कहा उसने,
मैना, वो नपुंसक!
"उसे जानते हो?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"क्या नाम है?" पूछा उसने,
"जाधू!" कहा मैंने,
"हाँ यही!" बोली वो,
"कोई बात हुई?" पूछा मैंने,
"हाँ! हुई!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"समझो आप!" बोली वो,
''अरे?" कहा मैंने,
"लेकिन, भगा दिया उसे मैंने!" बोली वो,
"ओ! अच्छा किया! हरामज़ादा!" कहा मैंने!
"सबसे बड़ा!" बोली वो,
"कब की बात है ये?" पूछा मैंने,
"दो महीने हुए होंगे!" बोली वो,
"खुद ही आया था?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"बड़िया के हाथ संदेश भिजवाया था!" बोली वो,
मैं हंस पड़ा!
"क्या हुआ?" पूछा उसने,
"बड़िया भी ले ली हपेटे में?" पूछा मैंने,
"हाँ, ले ही ली!" बोली वो,
तभी मैना ने देख लिया मुझे, गौर से देखने लगा! मैंने सर हिला दिया, मुस्कुरा भी गया, अब तो साल भर बाद ही देखा था मैंने उसे! मैना उठा और आने लगा मेरे पास ही!
"लो!" बोली वो,
"आने दो!" कहा मैंने,
"अरे?" बोला वो!
''और मैना! कैसा है?" पूछा मैंने,
"खूब! और सुनाओ?" बोला वो,
"बैठ!" कहा मैंने,
"सुनाओ!" बोला वो,
"सब ठीक है!" कहा मैंने,
"अच्छा, कहाँ हो?" पूछा उसने,
"यहीं हूँ अभी तो!" बोला मैं,
"किसके पास?" पूछा उसने,
"कृपा साहब हैं एक अपने, वहीँ हूँ!" कहा मैंने,
"धर्मशाला वाले?" पूछा मैंने,
"हाँ, वही!" कहा मैंने,
''अच्छा!" बोला वो,
"तीजा घाड़ तू ही ला रहा होगा?" पूछा मैंने,
"हाँ, और कौन लाएगा!" बोला वो,
"हाँ, ये भी है, एक और है न? क्या नाम है उसका......रा...!" मैंने याद करने की कोशिश की!
"राजो?" बोला वो,
"हाँ हाँ, वो ही!" कहा मैंने,
"वो तो चला गया!" कहा उसने,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"दो साल हो गए उसे तो!" बोला वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"वीरभूम!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ, और कैसे? खाली कैसे?" पूछा उसने,
"अभी वक़्त है!" कहा मैंने,
"कोई आ रहा है?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"हमारे साथ भी बैठ लिया करो!" कहा उसने,
"बैठूंगा!" कहा मैंने,
"कुंदन ने बुलाया होगा?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" बोला वो,
"कमला ने!" कहा मैंने,
''अच्छा जी?" बोला वो,
"हाँ!" कहा मैनें,
''अकेले हो?" बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"भेजूं किसी को?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कैसे, सब ठीक?" पूछा उसने, मेरी जांघ पर, ऊपर हाथ मारते हुए!
"हाँ, सब ठीक!" कहा मैंने,
"जांच कब करी?" पूछा उसने,
"अरे छोड़!" कहा मैंने,
"कमी क्या है वैसे आपको!" बोला वो,
"जा मैना, काम कर अपना!" कहा मैंने,
"अच्छा, मिल क़र जाना!" बोला वो,
'हाँ, ठीक!" कहा मैंने,
पाँव पटकता हुआ, चला गया वो वहां से, जा बैठा उधर ही, जहाँ पहले बैठा था!
मृणाली हंसी बहुत ज़ोर से! मैं भी हंस पड़ा!
"इसे और कोई काम नहीं!" बोली वो,
"हाँ, जांच करवा लो, यही बोलता है हर बार!" कहा मैंने,
"तो करवा लो?" बोली वो,
"करवा लेंगे!" कहा मैंने,
"किस से भला?" पूछा उसने,
"देख लेना!" कहा मैंने,
फिर से अलखनाद हुआ! एक बड़ी सी अलख उठा दी गई थी!
"आओ!" कहा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
हम जा पहुंचे अलख तक! अलख-वंदन हुआ और फिर सामग्री डाली गई! फिर उस भूमि को नमन किया गया, जल दिया गया, भेरी तक जा, अपनी अपनी गर्दन टिका, उसका भी आशीर्वाद लिया! एक दीया मृणाली ने और एक दीया मैंने लिया, प्रज्ज्वलित किया उन्हें और श्मशान में, दूर एक कोने में रखने के लिए जाने लगे!
हम आगे चले गए थे, कुछ झोंपड़े से पड़े, उन्हें पार किया और फिर दो पेड़ों के बीच में, एक जगह बनी थी, भस्मीकृत भूमि थी उसकी, उसमे, श्री महा औघड़ और श्री महा काली की मूर्तियां रखी गईं थीं, समीप ही पीपल का एक बड़ा सा पेड़ था! पेड़ पर, पताकाएं बाँधी गईं थीं! जब हम वहां पहुंचे, तो दो, आदमी, जो शायद सहायक रहे होंगे, वहीँ लेटे हुए थे, नशा ज़्यादा क़र लिया था उन्होंने इसीलिए, अब खड़ा नहीं हुए जा रहा था!
"ओ?" कहा मैंने एक से,
उसने कोई जवाब ही नहीं दिया!
"अरे, ओ?" कहा मैंने,
नहीं, कोई जवाब नहीं बनते बन पड़ा दोनों में से किसी पर भी! दीया प्रज्ज्वलित करते समय, कोई मार्ग में नहीं आना चाहिए, नहीं तो मार्ग कटता है, उस वेला में, फिर देर हो, लाभ नहीं उसका!
बहुत आवाज़ें दीं, किसी न न सुनीं!
"सुन?" कहा मैंने मृणाली से,
"हाँ, वो आ गई मेरे पास,
"ये पकड़ ज़रा!" कहा मैंने,
"हाँ, लाओ!" बोली वो, और मेरा दीया पकड़ लिया उसने!
अब मैंने एक को, बालों से पकड़ा, और खींचने लगा! उसे अभी भी होश नहीं, एक डकार ली उसने, जैसे उलटी ही कर देगा, उसको खींच क़र, एक तरफ किया! और फिर, दूसरे को भी, बालों से पकड़, खींच दिया, क़र दिया अलग अलग! लौटा अब मृणाली के पास,
और तब..............
"लाओ" कहा मैंने, दीया मांगते हुए,
"ये लो!" कहा उसने,
और दे दिया मुझे दीया!
मैं आगे चला, और उस स्थान को नमन किया, बैठा, और भूमि को अपने हाथों से साफ़ किया, तदोपरांत, दीये को स्थापित किया उधर,
"आओ?" कहा मैंने,
वो आई और बैठी, दीया उसने भी वहीँ रख दिया, फिर उस स्थान को प्रणाम किया, नमन किया, भूमि को हाथों से साफ़ किया,
"दो!" कहा मैंने,
उसने मुझे फिर माचिस दी, मैंने माचिस से सिलाई निकाली और जला ली, हाथों की उँगलियों से, लौ को सहेजते हुए, दीया प्रज्ज्वलित कर दिया! और खड़ा हो गया!
"ये लो!" कहा मैंने,
उसको माचिस दी, उसने माचिस ली, और जला कर, अपना भी दीया प्रज्ज्वलित कर दिया, तब मैंने दो बार, औघड़-नाद किया!
दीये जल उठे! अब नमन किया उन्हें और फिर हम चल पड़े वहां से वापिस! जब वापिस आये, तो भेरी-प्रसाद भी आ ही चुका था, ये दो मेढ़े थे, ऊँचे से कद के और ताक़तवर से, उनके गलों में, गेंदे के फूलों की मालाएं पड़ी थीं, सर पर खड़िया मली गई थी, इसका अर्थ ये था कि उनका पूजन हो चुका था और अब वो, भेरी की क्षुधा को शांत करने हेतु तैयार थे!
मैं, वापिस उसी स्थान पर आ बैठा था, उस स्थान के पश्चिम में अभी तक, चिताएं सुलग रही थीं, ये जगह, जहां हम बैठे थे, वे सभी बैठे थे, ये पूर्वी स्थान था, यहां और कोई सामान्य जन प्रवेश नहीं कर सकता! यही नियम हुआ करते हैं!
मैं वहां बैठा तो मृणाली भी आ बैठी, तभी एक और महिला, कविता भी आ गई वहां! कविता ने साज-श्रृंगार किया हुआ था, अवश्य ही आज की वो दोक्षा-कर्म के लिए तैयार हो कर आई थी, मेरा क्रमांक दूसरा था, अर्थात, कल मुझे इसी कर्म में बैठना था!
"कैसी है कविता?" पूछा मैंने,
"ठीक हूँ" बोली वो,
"और तेरी माँ?" पूछा मैंने,
"वो भी ठीक" कहा उसने,
"यहां किसकी खिलड़ी है तू?" पूछा मैंने,
"नेपाली की" बोली वो,
"अच्छा, उसकी?" इशारा किया मैंने, उसकी तरफ ही,
"हाँ" बोली वो,
"चल ठीक, जा अब! बुलाएगा अभी!" कहा मैंने,
"हाँ, चली मैं" बोली वो,
तभी पीछे कुछ आवाज़ें से हुईं, कोई आया था, उसके चेले-चपाटे, हुड़दंग मचाते चले आ रहे थे, मैंने भी पीछे देखा, ये तो कोई नया ही था, मैं नहीं जानता था उसे!
"ये कौन है?" पूछा मैंने,
"पता नहीं" बोली अपने कंधे उचका कर वो!
"संघिया से तो पूरब का सा लगता है!" कहा मैंने,
"होगा!" कहा उसने,
और उसने तब प्रवेश किया, सभी से नमस्कार की उसने, आयु में करीब पचपन का रहा होगा वो! उसके साथ उसकी दो सेविकाएं भी थीं, जो उसका सामान आदि उठाये हुए थीं!
वो आगे चलता चला गया और फिर, न जाने कहाँ जा बैठा! मैंने ध्यान भी दिया, यहां तो अक्सर ही आते रहते हैं लोग ऐसे!
"यहां वो आपकी, है न एक?" बोली मृणाली,
"कौन एक?" पूछा मैंने,
"वो, शोभना?' बोली वो,
"हाँ, है!" कहा मैंने,
"यहीं है?' पूछा उसने,
"नहीं" कहा मैंने,
"कहीं गई है?" बोली वो,
"हाँ, गई, हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, हैं!" बोली वो,
"उनको नहीं लाते अब?" बोली वो,
"नहीं, अब वो साधिका नहीं!" कहा मैंने,
"अत्व पूर्ण?" बोली वो,
"हाँ, कहा जा सकता है!" कहा मैंने,
"फिर ठीक" बोली वो,
"अभी तो समय है?' बोली वो,
"किसमें?" पूछा मैंने,
"पूजन में?" बोली वो,
"हाँ, कोई आधा घंटा" कहा मैंने,
"मैं ज़रा आऊं?" बोली वो,
"कहाँ जाना है?'' पूछा मैंने,
"यहीं" बोली वो,
"किसलिए?'' पूछा मैंने,
"इधर, बुआ हैं मेरी" बोली वो,
"अच्छा, फिर जा!" कहा मैंने,
"अभी आ जाउंगी!" बोली वो,
"आ जाना!" कहा मैंने,
वो उठी, मेरे कंधे पर थपक दी और चली गई! अब बुआ जी थीं तो मैं कैसे रोकता उसे, समय भी था अभी कुछ, आधा-पौने घंटा! यूँ कहो कि अभी तो सिर्फ तैयारी ही थी, खेल तो शुरू करीब बार्ज बजे के बाद से होना था!
"ओहो! ओहो!" आई आवाज़ मुझे,
मैंने देखा पीछे!
"ओए! अबे तू कहाँ से यहां?" बोला मैं,
ये रुद्रनाथ था! मेरा ही खासमखास! कई बार मिला है मुझ से, एक मित्र की तरह ही रहता है मेरे साथ, करता-धरता कुछ नहीं, बस गाँठ लगाए घूमता रहता है! किसी के लिए कुछ और किसी के लिए कुछ! जानता भी है तो सिर्फ गुनिया तक ही! लेकिन आदमी काम का है, जिसे हम अक्सर जुगाड़ू कहते हैं!
आ बैठ वो वहां पर!
"अकेले?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कौन है साथ?" पूछा उसने,
"पलल्म कोई नहीं!" कहा मैंने,
"तो कौन है?" पूछा उसने,
"अरे है, देख लेना, साध्वी है!" कहा मैंने,
"अच्छा!" बोला वो,
"सूखा? सूखा पड़ा है क्या?" बोला वो,
"नहीं भाई!" कहा मैंने,
"आओ मेरे संग!" बोला वो!
"नियमावली, समय आदि से आपको परिचित करवा ही दिया गया है अतः कोई भी सदस्य यदि उल्लंघन करता पाया जाता है तो आप स्वयं ही मेरा निर्णय जानते हैं!" बोले वो,
"आदेश आदेश!" बोले हम सभी!
"यहां, व्यक्तिगत कुछ नहीं होगा, मेरा आशय आप समझ गए हैं?" पूछा उन्होंने,
"आदेश! आदेश!" बोले हम सभी!
"आपसी वैमनस्य त्यागना होगा, कोई समस्या हो तो मुझे सूचित करें!" बोले वो,
"आदेश!" बोले वो,
और वे खड़े हो गए! एक अलख-मंत्र पढ़ा और अलख में एक थाल का सारा ईंधन झोंक दिया! आदेश! आदेश और हुंकारों से वो श्मशान गुंजायमान हो उठा! अब बस, आज का पूजन आरम्भ होने को ही था!
उपाक्ष-भैरवी! तृतीय भैरवी-रूपा महाशक्ति! ढाई वर्ष में एक बार, उपाक्ष का आह्वान अवश्य ही किया जाता है! तो यही वो उपलक्ष था! मुझे इस अवसर पर, बाबा की एक अभिन्न चिलम कमला ने सूचित किया था, हालांकि मुझे भान तो था, परन्तु जब तक बुलावा न आ जाए, अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की जा सकती थी! मैं इस स्थान पर, शहर में, तीन दिन पहले ही पहुंच चुका था, मुझे एक योग्य-साधिका की तलाश थी, अब यूँ तो डेरों में, न जाने ऐसी कितनी ही साधिकाएं आपको मिल जाएंगी जो धन के बदले, किसी क्रिया के बदले, किसी 'सोपान' के बदले, किसी, 'विशेष काम-क्रीड़ा' के बदले, आपकी साधिका बनने को सहर्ष ही तैयार हो जाएंगी! परन्तु, साधिकाओं का चयन ऐसे नहीं हुआ करता! हर साधिका, हर साधना के लिए उपयुक्त नहीं हुआ करती! यूँ तो मसान को काम-भोग देते समय, कोई भी साधिका, पर्याप्त रहा करती है, परन्तु मैं, व्यक्तिगत रूप से उन्हें साधिका नहीं कहता! इसमें मैंने बहुत ही शोषण होते हुए देखा है! हाँ, गरीब स्त्री आदि, धन के बदले ऐसा कार्य करने को तैयार हो जाया करती है! और फिर, मसान के काम-भोग पश्चात वो स्त्री किसी भी अन्य काम-क्रीड़ा हेतु योग्य नहीं रहा करती! ऐसी मैंने कई स्त्रियां देखी हैं, जो बाद में जोगन, जोगना, परियाली आदि बन जाती हैं! जिस प्रकार हर साधिका हर क्रिया हेतु पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार हर पुरुष साधक भी, हर साधिका हेतु पूर्ण नहीं होता! तंत्र में काम एक अहम स्तम्भ है! काम से सृजन होता है, ये शिव और शक्ति का मिलन है, एक के बिना भी कभी पूर्णत्व नहीं प्राप्त हो सकता! और इसी मूल विचारधारा से, अन्य कई विचारधाराएं भी जुड़ती चली गई हैं! शाखाएं बनती चली गई हैं! औघड़ों का विभाजन हो गया है और फिर अनेक शाखाएं और उप-शाखाएं! श्मशान, हर तंत्र-साधक की जन्म-स्थली, कर्म-स्थली एवं अंतिम स्थली हुआ करती है! श्मशान में मात्र मृत शरीरों का ही दाह नहीं होता, अपितु अन्य प्रकार की भौतिकताओं का भी दाह हो जाता है स्वतः ही! इस संसार में सबसे सरल ही सबसे कठिन हुआ करता है! उदाहरण के लिए ये कहना कि शांत-मन, शांत-चित्त! अब, बहुत से तो ऐसे होंगे, जो मन और चित्त को एक ही समझते होंगे! एक ही नाम! शब्द दो, अर्थ एक! मन भी वही, चित्त भी वही! नहीं मित्रगण! दोनों ही अलग हैं! मन, एक सागर है, और चित्त उस पर बनती हुई लहरें! मन को ढाला नहीं जा सकता! अर्थात, मन में ही दोनों गुण सामान रूप से मौजूद रहते हैं! जिसे हम सही, एवं गलत की संज्ञा देते हैं! जबकि, मनुष्य-समाज में, सही-गलत की व्याख्या पर, वहां के भूगोल, जलवायु, कारण, उपलब्धता बदलने लगती है! जैसे, हमारे यहां, गौ-हत्या नृशंश पाप है! परन्तु अन्य स्थानों पर नहीं! जहां नहीं है, हम ये नहीं कह सकते कि वे असभ्य हैं, हमारी तरह सभ्य नहीं! अपितु उनको असभ्य कहना, हमारी ही एक गलत वृत्ति है! उदाहरण लीजिए एक, अरब देशों में, रेत है, खेती नहीं, जल हर जगह नहीं, वहां मांस ही मुख्य भोजन है, अब, वे न जाने कब से मांस का सेवन करते आ रहे हैं, उनके पाचन-तंत्र ने उसको पचाना सीख लिया है! अब वहां मांस की बहुतायत है तो वे मांस ही खाएंगे! हमारे यहां कृषि है तो अन्न अधिकतर खाया जायेगा! खैर, मांसाहारी और शाकाहारी का विषय नहीं है ये, प्रकृति कभी गलत चयन नहीं करती! मनुष्य आदिम है, विवेक जागा तो आविष्कार हुए, चिकित्सा आदि के क्षेत्र में प्रगति हुई आदि आदि! जानते हैं, आज भी हमारे शरीर में, उस आदिम मनुष्य के अंग शेष हैं जो सिर्फ मांस पर ही ज़िंदा रहा करता था? यानि कि वो अंग, जिनका अब कोई प्रयोग हमारे लिए नहीं होता! जैसे कि बाइल-डक्ट से रिसता बाइल! इसी के कारण जिगर की बीमारियां होने की सम्भावनाएं रहती हैं! ये बाइल-डक्ट, कच्चे मांस को पचाने में सहायक के रूप में बाइल-स्राव को भेजता था, भोजन पच जाता था! उसी तरह हमारी आँख की झिल्ली! जैसे मगरमच्छ में होती है, छिपकली में होती है! कभी ध्यान से देखिये, आँखें झपकाते समय, आपको, सम्भव है दिख जाए! उसी तरह अपेंडिक्स, इसका कोई लाभ नहीं हमारे शरीर में अब, प्राचीन समय में, कच्चा मांस, कच्ची वनस्पति आदि पचाने में, मदद किया करती थी, अब हम पकाकर, भोजन बनाते हैं, इसीलिए इसका कोई लाभ नहीं, बल्कि जी का जंजाल और है! इसी प्रकार और भी अंदरूनी अंग हैं जिनका कोई लाभ नहीं अब!
खैर, विषय से भटकूंगा नहीं, हाँ तो शांत-मन! मन तो सभी का शांत ही रहता है! चित्त ही चंचल होता है! उसी में पल भर में विकार आ जाते हैं! चित्त, मन का मुंह दबा देता है और कोई गलत काम हो ही जाता है!
शांत-मन! कैसा हो ये शांत मन? मन एक सागर है! सागर, कभीं गहरा, कहीं थुथला और कहीं अशांत अधिक होता है! विकार रूपी हवाएं, इसके चित्त को आकर्षित करती हैं और उसमे, तूफ़ान उठ जाते हैं! मन को शांत किया जा सकता है, परन्तु चित्त को? ये घोर-दुष्कर कार्य है!
इसीलिए, मलिन-चित्त, चंचल-चित्त, निर्मल-चित्त आदि की संज्ञाएं उत्पन्न हुई हैं! आपके चित्त में क्या है, ये तो बस आप ही जानो! न माँ जान सके, न पिता! मात्र आप! और कोई नहीं! चित्त सबसे बड़ा बैरी! और चित्त ही, सबसे बड़ा हितैषी भी, यदि इसे, साध लिया जाए! साध! अर्थात, साधना! वो क्रिया, जिस से, किसी उद्देश्य का साधन किया जाए, साधना होती है!
"संगियों!" आई बाबा की आवाज़!
''आदेश! आदेश!" बोले हम सभी!
"पुनः, इसी स्थान पर, ठीक, एक बजे, एकत्रित होना है!" बोले वो,
"आदेश!" बोले सभी!
"विलम्ब न हो!" बोले वो,
"निष्ठादेश!" बोले हम सभी!
"जय श्री औघड़नाथ!" बोले बाबा,
"जय श्री औघड़नाथ!" बोले हम सभी!
बाबा लौट गए वापिस, अपने साथियों सहित! और यहां, चिमटे, मांजर, कपाल-मुण्ड टकराने लगे!
"आओ मृणाली!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"स्नान करना है?" पूछा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"चलो मृणाली!" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
और चलने लगी मेरे साथ, मैंने मृणाली को चुना था, उसमे स्त्रियोचित एवं एक साधिका के समस्त गुण था, हाँ, काम-भाव न जाना सकता था, जब तक कि अनुभव नहीं कर लेता, यहीं मुझे कुछ संदेह सा था! यदि उसमे उतावलापन हुआ, वेगवान हुई, कुमिकाशेचित, रान्धर्व, अतिपिप्सि हुई तो मुझे अवश्य ही कठिनाई होती! जब, भलोमा 'सवारी' करती हे साधिका की, या, उसमे प्रवेश करती हे, तब काम का साधन, उक्त साधिका से न होकर, उस भलोमा से हुआ करता है! भलोमा ही वो शक्ति है जो आगे बढ़ने में मदद किया करती है! साधक, कोई भी परा-सहायता नहीं ले सकता अन्यथा, वो कभी साधना कर ही नहीं सकता! कभी कोलाचार्य के क्रिया-कलाप देखिये, जानिये, आप अचम्भित ही हो जाएंगे! कोलचार्य, कौलव से संबंध रखते हैं! कौला कहा जाता है! हाँ, यदि वो वैसी हुई, जैसा मैंने सोचा था, शंका सी हुई थी, तो कठिनाई अवश्य ही होती! और यदि उसमे, जड़ता ही रही, तब भी, साधना का मूल उद्देश्य पूर्ण नहीं होना था! इसका पता, साधारण रूप से, स्त्री की नाभि से पता चल जाता है! देखने मात्र से उसकी काम-वृत्ति जनि जा सकती है! नाभि के तीन फलक हुआ करते हैं! प्रथम से रूप, द्वितीय से वृत्ति एवं तृतीय से, जनन-शक्ति का भान होता है! यदि पुरुष भी, अपनी बाईं कनिष्ठा को, नाभि में अंदर चुभोये तो नीचे, अंडकोषों के, एक क्षणिक, तीक्ष्ण सी पीड़ा का अनुभव होगा! इसी से, काम-शक्ति, जनन-शक्ति एवं पौरुष का भान हो जाएगा! स्त्री की कमर की की तरफ की कूल्हों की अस्थियां, यदि समरूप न हों, तो गर्भ में विकार होगा, कंधे यदि, नितम्ब-स्थल के अनुरुप हों, और बाईं पसलियां, श्वास में पहले चले और पहले ही वायु को निष्कासित करें तो वो स्त्री, सर्वोत्तम जनन-गुण से युक्त होगी! इसी प्रकार, साधिका की जितनी, जनन-शक्ति प्रखर होगी, उतनी ही साधिका, साधना में सहायक होगी! इसी प्रकार, पुरुष के भी गुण हैं! तंत्र के पंच-मकार में, मुद्रा का विशेष महत्व है, इसी मुद्रा-प्रखंड में, यही सब विस्तृत रूप से लिखा गया है! साधिका में किसी भू गुण का ह्रास नहीं होना चाहिए, अन्यथा, उद्देश्य-रहित हो जायेगी साधना!
'आओ!" कहा मैंने,
और उसको ले, एक कक्ष में ले आया! ये कक्ष मुझे दिया गया था, यहां मेरा सभी सामान आदि रखा था! मुझे यहां भस्म-स्नान करने के लिए, भस्म से भरे पात्रों से भस्म निकालनी थी! एक साधक, स्वयं ही अपनी साधिका को भस्म-स्नान करवाता है और साधिका, अपने साधक को!
"बैठो!" कहा मैंने,
वो बैठ गई!
"केश खोल दो!" कहा मैंने,
उसने केश खोल दिए!
"समस्त आबन्ध-मुक्त हो जाओ!" कहा मैंने,
उसने आँखें बंद कीं, और अपनी देह पर बंधे दूसरे भी माल आदि उतार दिए! फिर, कुछ वैचारिक रूप से विचार किया और नेत्र खोल दिए!
"साधिके!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"पुनर्विचार आवश्यक है!" कहा मैंने,
"किसलिए?'' पूछा उसने,
"कभी भी लौट सकती हो!" कहा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"कोई विवशता तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"कोई प्रश्न तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"कोई शंका?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"मेरा आदेश सर्वोपरि?" पूछा मैंने,
"जी!" सर हिलाकर हाँ कहा उसने!
"यदि अनहोनी हो?" पूछा मैंने,
"मैं संग!" बोली वो,
"कुछ अदल-बदल?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"कोई लौट-फेर?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"कोई अपेक्षा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"हम उपाक्ष के लिए आये हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, जानती हूँ!" बोली वो,
"उद्देश्य?" कहा मैंने,
"जानती हूँ!" कहा उसने,
"वचन?" पूछा मैंने,
" हाँ, वचन!" कहा उसने,
"स्वीकृत!" कहा मैंने,
और उसके सर पर हाथ रख कर, अंगीकार कर लिया उसे! अब वो मेरी साधिका थी! मेरी अपनी साधिका! शक्ति-स्वरुप साधिका!
मैंने स्वीकृत किया और उसने एक मंत्र बोला! फिर मैं भी खड़ा हो गया और वो भी! अब भस्म-स्नान करना था, शरीर पर मैंने कंठ-माल, भुजबंध बांधे थे, वे अब अलग रखे! और वस्त्र उतार दिए, अब, मेरी साधिका ने मेरी मदद की भस्म-स्नान करने में, मैंने भस्म-स्नान किया और फिर उसको भी करवा दिया, भस्म-स्नान आवश्यक हुआ करता है! उसके बाद मैंने अपने तांत्रिक-आभूषण धारण कर लिए, कपाल, त्रिशूल एवं अन्य आवश्यक सामान उठा लिया, इनका पूजन, वहीँ, क्रिया-स्थल पर करना था! फिर साधिका को मैंने आभूषण पहनाए, तांत्रिक-आभूषण, मंत्र पढ़ते हुए! कमर में, एक बंध, बाँध दिया ये, उसकी पहचान थी, ये बंध सूचित करता था कि इस साधिका पर अब किसी और का ही अधिकार है!
फिर मैंने कूर्प-लंगोट धारण की, और उसने, एक वस्त्र लपेट लिया! उस स्थान पर, मात्र वही प्रवेश कर सकता था जिसके साथ साधिका हो, अन्यथा नहीं! जिसकी कोई साधिका नहीं होती, उसको, भेज दिया जाता है वापिस! इस क्रिया का यही नियम है!
"चलें?" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
तब मैंने उसके वक्ष को, उसके केशों से ढक दिया, उसके केशों को, बाँध दिया सामने ही!
"कुछ रहा तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"ठीक है!" कहा मैंने,
''आपका?" पूछा उसने,
"सब है!" कहा मैंने,
"प्रस्थान?" बोली वो,
"अवश्य!" कहा मैंने,
और मैं, उसको आगे ले, चलता चला गया उस स्थान के लिए, वहाँ पहुंचे हम, और अलख को नमन किया! अलखनाद गूंजा, छह ही साधक एवं छह ही साधिकाएं, और कोई नहीं! भेरी को, एक बड़े से कपड़े के पीछे रख दिया गया था, वहां पात्र रख दिए गए थे, हमने अपने अपने स्थान ग्रहण कर लिए थे! और तब, मंत्रोच्चार आरम्भ हो गया! औघड़ी मंत्रों से वो स्थान जैसे, श्वास ले गया हो! और तब, बाबा ने वहाँ प्रवेश किया, दो सहायिकाएं, बड़े बड़े से थाल लिए, थालों में सामग्री रखे, बढ़े चली आ रही थीं! बाबा के हाथ में त्रिशूल था और चिमटा उनका, गले में पड़ा था! बड़ा सा कुन्दा पड़ा था उसमे, उसमे ही सर फंसाया था उन्होंने!
वे आये, सभी को प्रणाम किया! सभी को उनके दर्ज़े के अनुसार पुकारा, चूँकि हम सभी खड़े हो गए थे शीश नवाकर, जिस जिस का नाम पुकारा जाता वो नमन कर, स्थान ग्रहण करता जाता! बाबा ने एक नाद किया! और अपने आसन पर बैठ गए, सहायिकाओं ने, थाल नीचे रख दिए और बाबा के दाएं और बाएं खड़ी हो गईं!
उन्होंने मंत्र पढ़ा और अलख में सबसे पहले ईंधन झोंका! उसके बाद, जिस जिस का नाम पुकारा गया था, ईंधन झोंकता चला गया! और तब, सभी ने, उस भस्म से, माथे पर पुंड काढ़े!
"बहादर?" बोले वो, चिल्ला कर,
वो आया कपड़े के पीछे से बाहर,
"आदेश?'' बोला वो,
"चढ़ा!" बोले वो,
"जय महानाथ!" बोला वो, और चला गया पीछे ही!
मेढ़ों के रेंकने की आवाज़ आई, बाबा ने, मुट्ठी में भस्म ली, और मंत्र पढ़ा, बहादर, दौड़े दौड़े आया और फूलों की मालाएं दे गया उन्हें, सर झुकाया और बिना पीठ दिखाये, लौट गया वापिस! बाबा ने वो मालाएं, फेंक मारीं अलख में! और फिर, एक लम्बा सा सांस भर, वो मुट्ठी भर भस्म, ज़ोर से झोंक दी अलख में! इसके साथ ही, हम सभी ने, ईंधन झोंका अलख में!
खच्च!
आवाज़ हुई एक! शररर्र! आवाज़ हुई!
"नीलम?" बोले वो,
"आदेश!" बोली एक सहायिका!
"जा, भर ला!" बोले वो,
"आदेश!" बोली वो,
और कुछ ही देर में, एक बड़ा सा पात्र, हिलते-हिलाते ले आई वहां! सर पर रखा! और खड़ी हो गई!
"रख दे! यहां!" बोले वो,
"आदेश!" कहा उसने,
रख दिया उसने वहां! और पीछेः जा खड़ी हुई, और फिर, दाएं आ खड़ी हुई!
अब बाबा ने, एक छोटा सा पात्र लिया, और भरा रक्त उसमे, मंत्र पढ़ा और अलख में झोंक मारा! सभी ने अलखनाद किया!
"संगियों!" बोले वो,
"आदेश!" बोले सभी, हाथ जोड़ते हुए!
"सिंगार!" बोले वो,
तब, बाबा, सेंधा नाथ उठे, और उस पात्र को उठाया! उठाकर, सभी के पास लाने लगे! सभी एक एक करके, कपाल-कटोरा उठा, उसमे डुबो, भरने लगे रक्त! अब कपाल=कटोरे, भर लिए गए! और हाथों में ही रखे रहे सभी! दोनों ही हाथों में पकड़ कर!
अब पात्र, दिया गया बाबा को, बाबा ने भी अपना कपाल-कटोरा भर लिया उसमे डुबोकर, और फिर..
एक घूँट भरा!
"संगियों!" बोले वो,
"प्रसाद!" बोले वो,
तब सभी ने कपाल-कोटरे को मुख से लगा लिया! घूंट भरने लगे सभी! मन में जाप किये जाते और प्रसाद ग्रहण किये जाते! एक हाथ में चिमटा खड़काते और दूजे हाथ से, रक्तपान करते! कटोरे से मुख यदि हटा, तो उसके क्रिया से ही हटना होगा!
प्रसाद ग्रहण कर लिया गया!
''संगियों!" बोले वो,
"आदेश!" बोले सभी!
"धामली!" बोले वो,
"आदेश!" बोले सभी,
और तब, कटोरों में बचे रक्त से, देह पर, चिन्ह अंकित किये गए! माथे को लसड़ लिया गया! शेष बची बूंदों को, केशों से साफ़ कर लिया गया!
'संगियों?" बोले वो खड़े होते हुए,
हम सब खड़े हो गए और............
"संगियों!" बोले वो,
"आदेश! आदेश!" बोले हम सब!
"अब हम, सोपान चढ़ेंगे!" बोले वो,
"आदेश!" बोले सभी!
"जाओ! षट्कोणीय मुद्रा में स्थान ग्रहण करो! श्मशानाध्यक्ष की लौ बाल दो!" बोले वो,
"आदेश! आदेश! ब्रह्मादेश!" बोले सभी!
और हम सभी, खड़े हो गए! बाबा खड़े हुए, हुए थे, तो, अब आसान पर विराजित हो गए थे! विराजित होते ही, बाबा न अलख में मुंह में ईंधन झोंका! अलख ने मुंह फाड़ा और समस्त ईंधन लील गई!
"जय अलखनाथेश्वर! जय ब्र्हमेश्वर!" बोले बाबा!
"जय श्री औघड़नाथ! सर-माथे औघड़नाथ! छाती विराजे औघड़नाथ! प्राण वासे औघड़नाथ!" बोले हम सभी!
"जाओ!" बोले बाबा!
"आदेस गुरु कौ!" बोले हम सभी!
हम उठ खड़े हुए! मैंने अपना झोला, सामान उठा लिया! कुछ सामान, मृणाली ने भी उठा लिया! अब चूँकि में, व्याहमेख-क्षेपण में था, अतः मुझे वायव्य कोण में जा, आसन जमाना था!
"आओ साधिके!" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
और हम चल पड़े, उस कोण की तरफ! चौरासी कदम से अधिक न हो ये आसन-भूमि! अन्यथा, आप बाहर ही माने जाओगे! आपकी समस्त क्रिया, दग्ध हो जायेगी! ये अकाट्य नियम हैं अघोर के!
कुल बहत्तरवें कदम पर, मुझे एक स्थान, दिखाई दिया! यहां से अलख भी दीख ही रही थी! ये स्थान, बढ़िया था, यहां से क्रिया-कलाप किया जा सकता था!
"साधिके?" कहा मैंने,
"जी?" बोली वो,
"आसन बिछाओ!" कहा मैंने,
उसने, झोले में से, आसन निकाल लिया, ये एक काले रंग का वस्त्र था, गोल सा वस्त्र, साधिका का आसन गोल हुआ करता है! काल हो, तो साधक संग है, लाल-रूषण हो तो, स्वयं-साधक है, दुरंगा हो, तो मारण-कर्म करने वाली, तिरंगा हो, तो सिद्धि-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाली होती है!
"विराजो!" बोला मैं!
"नाथ!" बोली वो,
और अष्टांग-मुद्रा का प्रयोग करते हुए, उसने आसन सम्भाल लिया!
"सामग्री तैयार रखना!" कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
और मैंने शेष सामान भी वहीं रख दिया! और चल पड़ा, किसी दहकती हुई चिता की तरफ! ये चिताएं 'विशेष' हुआ करती हैं! मैं एक चिता के पास पहुंचा, तो दो और सड़क भी वहीँ खड़े मिले, वे पहले आये थे, अतः मैं दूसरी चिता की तरफ चल पड़ा, यहां भी एक सहायिका थी, उस से बात हुई, और मैंने समझा दिया उसको, उसने प्रणाम किया और दूसरी चिता की और चल पड़ी, कुल नौ चिताएं थीं वहां पर ऐसी, कमी कुछ न थी! अब चूँकि, श्मशानाध्यक्ष, अर्थात मसान को जगा, उठा, आज्ञा लेनी थी इसके लिए, रीढ़ की अस्थि चाहिए थे! या कोई फलक ही मिले, खण्ड ही, भण्ड ही! मैंने एक बड़ी सी लकड़ी खींची, और उस चिता में रखे, जले शव को, उलटा और जब वो उलट गया तब, नमन किया उसे, उसे परम-शान्ति मिले, मंत्र जपे! मेरी भूल, कृत्या क्षम्य हों, निवेदन किया! वो मेरा कोई नहीं लगता था, लेकिन इस समय, मेरे लिए उस से अहम कोई नहीं था! तो, मैंने, मेरा निवेदन स्वीकार को, प्रार्थना भी की! और एक बड़ी लकड़ी से ही, उसकी रीढ़ की अस्थि, खींच ली! अंगार, चिड़चिड़ा से पड़े! चटक-चटक की आवाज़ होने लगी, शेष वसा शायद जो रह गई थी उन खण्डों में, वो जली थी शायद, या फिर, मेरी लकड़ी ही जली हो! दुर्गन्ध या गंध कोई भी नहीं थी वहां, वसा जली हो, ऐसा भी न था! खैर, मैंने अस्थि निकाल ली, बाहर निकालते ही, उसको चार पसलियां, टूट गईं, मैंने उन्हें, आदर के साथ, वापिस चिता में ही रख दिया! अब दो, छोटी लकड़ियों के सहारे से, उस अस्थि को उठाया, और ले चला अपने उसी स्थान की ओर!
वहां पहुंचा, तो सामान, सामग्री आदि तैयार थी! मैंने वो जलती हुई अस्थि वहीं रख दी, और तब, छींटे दिए उस पर, शराब के, शराब की बोतल, निकाल ही दी थी मृणाली ने! एक मंत्र पढ़ा, और अपनी कनिष्ठा ऊँगली को हल्का सा चीर कर, रक्त के छींटे भी छिड़क दिए उस पर! अब शेष सामग्री छिड़की गई! और देखते ही देखते, उसने एक अलख का रूप धारण कर लिया! तब मैंने और भी लकड़ियां उसमे लगा दीं!
अब मैंने बोतल से, दी घूंट मदिरा पी! और गले से नीचे उतार ली! फिर एक मंत्र बोला, मंत्र पढ़ते ही, मैं अपनी क्रिया में आ जुटा!
बहादर की औरत, भागी भागी आ रही थी! आई, और रुक गई! उसने नमन किया और मुझे प्रणाम! मेरी साधिका को भी प्रणाम किया!
"महाशुद्धि!" बोली वो,
"रख दे!" कहा मैंने,
'आदेश!" बोली वो,
उसने नीचे, वो छोटा तसला रख दिया, तसला, पीतल से बना था, उसमे उस मेढ़े की कलेजी, दिल का आधा भाग, एक गुर्दा, और पुट्ठा कटा हुआ था, ये कुल इक्कीस टुकड़े होने चाहिए थे, इक्कीस ही हुआ करते हैं!
"ले!" कहा मैंने,
और अपनी कनिष्ठा उसकी ओर कर दी, उसने माथे से छुआई! अलख की भस्म, माथे से रगड़ी और उठ, चली गई वापिस!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ?" बोली वो,
"स्थापन करो!" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
और तब, सभी सामग्री आदि उसने, मेरे हाथ भर की दूरी पर, प्राथमिकता के अनुसार रख दी!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ?" बोली वो,
"मीन-मुद्रा!" कहा मैंने,
"जी!" बोली वो,
तब वो, मीन-मुद्रा में लेट गई, मैं, अपना श्रृंगार करता जाता, और उसका भी! उसके देह पर नौ जगह चिन्ह अंकित करने थे, और अपने ग्यारह जगह! ये शक्ति-चिन्ह हुआ करते हैं! आवश्यक भी हैं! इन चिन्हों से, देह सशक्त हो जाया करती हैं, ये शक्ति-पुंजक हैं, परा-अस्तित्व से छनती ऊर्जा को देह के सहने लायक बना देते हैं! त्रिपुंड ऐसा ही एक शक्ति-पुंजक चिन्ह है! भूतम, वर्तमान एवं भविष्यकाल के ज्ञाता इस पुंजक को धारण किया करते हैं! आपने देखे होंगे ऐसे कई लोग, जो इस प्रकार के पुंजक, माथे पर धारण किया करते हैं, आजकल, इनमे कुछ देर-बदल होने लगी है, ये अब मत, सम्पदाय, शाखा आदि को सूचित करने के काम आने लगे हैं, मूल विषय से इनका कुछ लेना-देना अब कम ही है! औघड़ साधक, किसी भी शाखा का हो, ग्रीवा पर, रक्त से पुंजक बनाता है, ये एक नियम है! फिर, वक्ष पर, उदर पर, और घुटनों पर भी चिन्ह अंकित किये जाते हैं! एक साधक को, शक्ति यंत्रों के विषय में सटीक ज्ञान होना चाहिए! इनका बहुत महत्व है तंत्र-क्षेत्र में!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ?" बोली वो,
"उठो!" कहा मैंने,
और वो उठ बैठी, हाथ जोड़े, और कहा आदेश!
बहादर की औरत जो तसला लायी थी उसमे एक लोटा भी था, छोटा सा, इसमें रक्त था, अब ये रक्त मैंने एक पात्र में डाला और मंत्र पढ़ते हुए, मदिरा भी मिला दी उसमे!
"साधिके?" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"आस्वादन करो!" कहा मैंने,
और वो पात्र दे दिया उसको!
उसने एक घूंट भरा और पात्र मुझे थमा दिया, मैंने दो घूंट भरे, और एक घूंट, अलख में झोंक दिया! अलख तो बर्रा पड़ी! झरर की सी आवाज़ करने लगी!
"साधिके?' कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"फलकृतेषि!" कहा मैंने,
वो उठी, और मेरा त्रिशूल थमा दिया मुझे, मैं उठा, त्रिशूल लहराया और मंत्र पढ़ते हुए, अपने स्थान से बाएं गाड़ दिया! त्रिशूल, उस नरम सी मिट्टी में, खक्क की सी आवाज़ करता हुआ, आठ इंच तक अंदर घुस गया!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"कपालकृतेषि!" कहा मैंने,
वो चली आगे, और कपाल उठा लिया, कपाल माथे से लगाया अपने, और बाएं हाथ को खोल, उसको जबड़ों से टिका, सम्मुख ले आई मेरे! मैंने कपाल उठा लिया! उसका मुण्ड चाट कर गीला किया और उधर, भस्म, रक्त छिड़क दिए! वे जा चिपके! अब अपने ठीक सामने, मैंने उसको एक चौखण्ड खींच ऊँगली से, रख दिया! उसके नेत्रों के कोटर ठीक पश्चिम दिशा में रख दिए थे! मान जाता है, कपाल अपने नेत्रों से अवलोकन किया करता है और, जब मृत्यु सन्निकट हो, तो चीख भी पड़ता है, हालांकि, आज तक, मैंने ऐसी स्थिति का समाना नहीं किया था, हाँ फटते हुए, उछलते हुए, छिद्रित हुए, हुए कपाल अवश्य ही देखे थे! मुझे याद है, कैसे एक वृद्ध साधक ने, एक द्वन्द में, मेरे छह के छह कपाल, राख कर दिए थे पल भर में ही!
'साधिके?'' कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"काण्डककृतेषि!" कहा मैंने,
वो आगे बढ़ी, और ज़मीन पर गड़ा, मेरा वो काण्डक अर्थात चिमटा थमा दिया मेरे हाथों में! अब क्या था, छेड़ दी एक औघङिया-ताल! कभी बाएं कंधे, कभी दाएं कंधे, कभी शीर्षोच्च तो कभी उदर के समीप! मंत्र समाप्त हुआ और चिमटा, उस कपाल के मुण्ड पर, तीन बार टकरा, रख दिया वहीं!
"साधिके?' कहा मैंने,
"अमृत-पात्र!" कहा मैंने,
और तब उसने मेरे झोले से, दो कपाल कटोरे बाहर निकाल लिए! मेरे पास आकर, एक बाएं घुटने से छुआ, और एक दाएं घुटने से छुआ, रख दिए समीप ही!
"साधिके!" कहा मैंने,
"नाथ!" कहा मैंने,
"आलिंगन!" कहा मैंने,
और तब मैं खड़ा हुआ, उसका वो अंतिम वस्त्र भी हटा दिया और अपना वस्त्र भी! क्रिया के द्वितीय चरण में प्रवेश हुआ हमारा तब! आलिंगन हुआ, तो उसके मस्तक को चूमा मैंने, उसके माथे को, मुण्ड को, कंधे को और फिर, उसके उदर को! उसका हाथ अपने माथे रखा, और शक्ति से, मेरा हाथ थामने की विनती की! साधिका एक, स्त्री है, स्त्री एक शक्ति, और शक्ति सर्वोच्च है किसी साधक के लिए! सच कहा जाए तो बिन शक्ति, शिव पूर्ण नहीं!
माँ उमा, जब, अलमस्त श्री महा औघड़ नाथ को, मोहिनी रूप में, कामपीड़ित करती हैं तब नव-सृजन होता है! इसी क्रिया को, तंत्र कहा जाता है! इस समय, श्री महा औघड़ एवं शक्ति आद्या श्री माँ से जो माँगा जाए, सरलता से, अघोरता से, वो, पूर्ण हुआ करता है! अनेक रहस्य हैं, और सभी रहस्यों को, यहीं लिखना, सम्भव भी नहीं, बतलाना भी सम्भव नहीं! समझाना भी दुष्कर है! शिव और शक्ति के मिलन के समय को, हम साधक, किसी भिखारी की तरह से, आँखें चौड़ी करते देखा करते हैं! उस समय, लालच, बलात-चेष्टा, लोलुपता यदि उच्च पर न हो, तो समय चुक गया, समझो! खैर! फिर कभी!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"विराजो और देखो!" कहा मैंने,
वो जा बैठी और मैं, अपने आसन पर बैठने से पहले, गरजा! गरजा, है किसी में सामर्थ्य जो मुझे मेरे मार्ग से हटा सके? विमुख कर सके? है कोई? है? है तो आये सामने? आये! उसका, शीश झुका स्वागत करता है ये औघड़!
पूरब में मुड़ा!
"है कोई?" कहा मैंने, त्रिशूल लहराते हुए!
पश्चिम में मुड़ा!
"है कोई?" कहा मैंने, त्रिशूल हवा में उठाते हुए!
दक्खन में मुड़ा!
"है कोई, जो आये सामने?" और दहाड़ पड़ा मैं!
और फिर उत्तर!
"है औघड़नाथ! आशीष! आशीष!" कहा मैंने, और चूम लिया त्रिशूल अपना! उसके बाद, दो कदम आगे बढ़ा, झुका, धनुष-मुद्रा में! और फिर पीछे हुआ! तीन थाप दीं! उठाया त्रिशूल! लहराया हवा में!
"है कोई? है?"" चीखा मैं!
और फिर, एक अट्ठहास भरा! छाती में तीन बार हाथों से थाप दी! आया आसन पर, और बैठ गया! त्रिशूल, ऊँचा उठाते हुए, गाड़ दिया बाएं!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"प्रचण्डा प्रकट होते ही, क्या करना है?" पूछा मैंने,
उसने हाथों के इशारे से बता दिया! स्त्री-साधक को, नाम लेने की इजाज़त नहीं है उसकी! कारण वही! कहीं, मसान की प्रिया न हो जाए!
"हाँ साधिके! हाँ!" कहा मैंने,
"हे, श्मशान-वासिनि!" चीखा मैं,
"हे श्मशान-धौमिनि!" चीखा मैं फिर!
"हे श्मशान-अधिष्ठात्री!" नमन किया फिर!
"आज्ञा! आज्ञा! आज्ञा!" कहा मैंने,
और क्रोध में भर गया हूँ जैसे, आँखें चौड़ी करते हुए, मुट्ठी में भस्म और अन्य सामग्री मिला, झोंक दी अलख में! अलख लपलपाई! चौड़ी सी जीभ, निकली उसकी! और व्योम में छा जाने के लिए मचल उठी!
मांस का टुकड़ा लिया, निचोड़ा, रक्त को मुख में लिया, गटक गया, और फिर से, एक अट्ठहास!
"मसान?" चीखा मैं!
"हे मसान?" चीखा ज़ोर से!
"जाग?" चीखा मैं!
"उठ?" चीखा मैं!
और वो टुकड़ा, आधा काट लिया!
"खं खं खं खं यं....................................................हूम फट्ट!" ये महामंत्र, मैंने जपना आरम्भ किया! और करता रहा! एक नशा सा चढ़ गया! मंत्र, स्वतः ही फूटने लगा मुख से! मुंह से निकला जाए और गर्दन मेरी हिलती जाए! वक्ष अंदर और बाहर हो! मैं जैसे, अलख से बातें करता जा रहा था! जैसे मैं अलख में धौंकनी सी चला, उसमे प्राण फूंके जा रहा था! और तब, मैं शांत हुआ!
''साधिके?' कहा मैंने,
"नाथ?" बोली वो,
"कपाल-मुण्ड पर दीया धरो!" कहा मैंने,
'आदेश नाथ!" बोली वो,
और उसने, एक बड़ा सा मृद-दीया निकाल, झोले से, और, तेल डाल, ये तेल, मसानी तेल होता है, चर्बी से निकाला जाता है, कहाँ से प्राप्त होता है, इसे रहस्य ही रहने दीजिये! तो उसने वो तेल घाल दिया, और बाती भिगो, बाती, ये भी एक तांत्रिक-वस्तु है! है तो वनसप्ति ही, परन्तु एक विशिष्ट वनस्पति ही होती है! देर तलक जलती हेम एक सुगंध सी छोड़ती है, इस सुगंध से, अशरीरी, मंत्र-मुग्ध से हो उठते हैं! तो उसने प्रज्जवली कर दिया!
"आदेश नाथ!" बोली वो,
"रख दो, मुण्ड पर!" कहा मैंने,
उसने वही किया, दीया, आहिस्ता से उस कपाल के मुण्ड पर रख दिया! अब तो जैसे कपाल में जान ही पड़ गई! जैसे उस आनंद आ रहा हो उस दिए के तले की गर्मी से, जैसे, सुलपा सुलगा लिया हो उसने!
"साधिके?' कहा मैंने,
"आदेश नाथ!" कहा उसने,
"सींगी!" कहा मैंने,
''आदेश!" बोली वो,
"जलखन भर!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
और उसने कुछ, भरा उसमे, सींगी मायने हिरण का सींग, ये भी घिस कर, एक सुलपे की तरह ही बनाया जाता है, बीच में, हड्डी की एक फलक ठोकी जाती है! जिस से, जलखन (कुछ भी, भांग, अफीम, गांजा, चरस आदि नशीला पदार्थ) का धुआं छन कर और गाढ़ा हो कर आये, ये अंदर ही अंदर, घूम जाता है, और एकदम सफेद सा धुंआ, कश के रूप में मुख से बाहर आ जाता है! इस से, केंद्रीकरण हो जाता है, कार्य-विशेष का! न सर्दी ही लगे, न गर्मी ही! न मच्छर ही काटें और न कोई कीड़ा-मकौड़ा!
"सालोट फूंक?" बोला मैं,
उसने, उस सींगी को हवा में, दाएं से बाएं और बाएं से दाएं किया, फिर उलटा कर, घुमाया ऊपर-नीचे, जलखन गिरनी नहीं चाहिए, यदि गिरे तो और भरी जाती है! जब स्थिर हो जाए तो तैयार हो जाता है! मसान को ये बहुत प्रिय है!
"ला!" कहा मैंने,
उसने दिया मुझे,
और मैंने, हाथों में ले, खींच मारे चार कश!
आ हा! आ हा! आ हा! मजा आ गया! चिंगारियां से फूट पड़ीं कनपटियों से जैसे! माथा ठंडा होने लगा!
"ईंधन झोंक?" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
"ले!" कहा मैंने,
और सुलपा उसे दे दिया!
उसने खींचा औेर मैंने मंत्र पढ़ा!
"उठ?" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
वो उठ गई!
"जा!" कहा मैंने,
उसने मेरी तरफ देखा!
"जा! सामने बैठ!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
और जा बैठी उस अलख के सामने!
"उकड़ू बैठ!" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
वो उकड़ू बैठ गई!
"शेषांग सम्मुख रख!" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
और उसके शरीर का, सामने का भाग, साफ़ दिखे, इसीलिए बिठाया था मैंने उसे, अब उसकी देह पर, कुछ क्रिया करनी थी, ये अति-आवश्यक हुआ करती है! मैंने तब मन्त्र पढ़ते हुए, उसके सर, माथे, कंधे, वक्ष, उदर, योनि, जंघाएं, पांवों पर, भस्म के फुनगे छिड़क दिए!
"खड़ी हो!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"घूम जा!" कहा मैंने,
वो घूम गई! और मैं खड़ा हो गया! अपना चिमटा लिया, मंत्र पढ़ा, तीन बार श्वास फूंकी! और उसके सर का पृष्ठ भाग, गर्दन, कंधे, पीठ, नितम्ब, पृष्ठ-जंघाएं, पिंडलियाँ और एड़ियां भी सशक्त कर दीं! फिर, उसकी भुजाओं पर हाथ फेरा, और इस प्रकार, उसकी देह को आबन्ध में जकड़ लिया मंत्रों के, देह-रक्षा, प्राण-रक्षा, क्रिया-रक्षा आदि से पुष्ट कर दिया उसे!
और मैं पीछे जा बिठा तब!
"साधिके?"
वो घूमी नहीं, वहीँ, वैसे ही खड़ी रही!
"आदेश नाथ!" बोली वो,
"जा, बैठ जा!" कहा मैंने,
वो घूमी, नमन किया और अपने आसन पर जा बैठी! अब मैंने एक काली सूती डोर निकलवाई उस से, उस सामान से!
"ला?'' कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
उसने मेरे हाथ पर रख दी वो डोर!
मैं खड़ा हुआ, और उस डोर को, उसकी कमर के इर्द-गिर्द, लपेट दिया, फिर कुछ ढील दी, और उस ढील के बाद, मैंने वो डोर तोड़, अपने दाएं पाँव के अंगूठे में कस कर बाँध लिया!
"जय श्री औघड़नाथ!" कहा मैंने,
"जय श्री औघड़नाथ!" बोली वो!
"साधिके?" कहा मैंने,
"आदेश!" कहा उसने,
"सम्मुख रहना!" कहा मैंने,
"आदेश नाथ!" कहा उसने,
"और अब देख! देख उधर!" कहा मैंने, और इशारा किया उसको, एक अँधेरी जगह पर देखने के लिए!
"कुछ दिखा?" पूछा मैंने,
"नहीं नाथ!" बोली वो,
मैंने अलख में ईंधन झोंका!
'अब?" पूछा उस से!
"नहीं नाथ!" कहा उसने,
"हा! हा! हा! हा!" हंसा मैं तब, बुक्का सा फाड़कर!
और मांस के दो टुकड़े, अलख में झोंक दिए! और पढ़ा फिर एक मंत्र! कपाल कटोरे में मदिरा परोसी, नाम लिया मन्त्राधिपति का! और मदिरा गटक गया!
"साधिके?" कहा मैंने,
"आदेश नाथ!" बोली वो,
अब मैं उठा! और चला उसकी तरफ! अपना चिमटा उसके सर पर तीन बार छुआया!
'आँखें बंद कर साधिके!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"डूब जा!" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो!
और तब, मैं उसके पीछे आ, उसके कंधों पर, अपने कूल्हे टिका, बैठ गया! पांवों से तक ले रखी थी ज़मीन की!
"साधिके?" कहा मैंने,
"नाथ!" बोली वो,
"नेत्र खोल!" बोला मैं,
उसने नेत्र खोले! और चेहरे के भाव बदले! चेहरा कड़ा होने लगा! त्यौरियां चढ़ने लगीं! उसका वक्ष ज़ोर ज़ोर से हिलने लगा! उसने सर हिलाने की कोशिश की, लेकिन मैंने अपनी जंघाओं के बल से उसे न हिलाने दिया!
"साधिके?" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
"क्या दिखा?" पूछा मैंने,
"जोड़ा!" बोली वो,
"कैसा?" पूछा मैंने,
"खड़े हुए!" कहा उसने,
"हाथों में क्या?" पूछा मैंने,
"शव!" बोली वो,
"किसका?" पूछा मैंने,
"बालक का!" कहा उसने,
"अब?" पूछा मैंने,
"भक्षण!" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"औरत!" कहा उसने,
"कैसी?" पूछा मैंने,
"विकराल!" बोली वो,
"रूप?" पूछा मैंने,
"वृद्धा!" बोली वो,
""संग?" पूछा मैंने,
"पुरुष" बोली वो,
"कैसा?" पूछा मैंने,
"विकराल!" कहा उसने,
'रूप?" पूछा मैंने,
"कुमार!" कहा उसने!
"क्या चले वो?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"क्या कर रहे हैं?" पूछा मैंने,
अब चुप वो!
"हे?" मैंने ज़ोर से पूछा!
नहीं दिया जवाब!
"नेत्र खोल?" बोला मैं,
उसने नेत्र बंद कर लिए थे अपने!
"नेत्र खोलो साधिके?" मैंने चिल्लाकर कहा!
उसकी गर्दन तो, नीचे ही झुकती चली जा रही थी!
"साधिके?" मुझे क्रोध आया तब! और खींच दिए उसके केश! खींचे तो थोड़ा कसमसाई वो!
"साधिके? प्राणों से जाओगी! प्राणों से! आओ बाहर?" कहा मैंने,
और मैंने, अपना चिमटा खड्का दिया! कभी इधर, और कभी उधर! मैं अपनी जाँघों से उसकी हिलाये जा रहा था!
और अचानक ही!
"नाथ! नाथ!" बोली वो,
"सामने देखो साधिके?" कहा मैंने,
"आदेश!" बोली वो,
आ गया था होश उसे! मद से बाहर निकाल लाया था उसे मैं!
"क्या देखती हो?" कहा मैंने,
"उन्हें!" बोली वो,
"क्या कर रहे हैं?" पूछा मैंने,
"समागम!" बोली वो,
"और?" कहा मैंने,
"एक औरत आई है अभी! सामने!" बोली वो,
"और?" बोला मैं,
"वो देख रही है!" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा मैंने,
"उनका समागम!" बोली वो,
'और?" पूछा मैंने,
"हंसने लगी है!" बोली वो,
"और?" पूछा मैंने,
"ओह!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"वो तो, उस पुरुष की पीठ पर चढ़ गई है!" कहा उसने,
"समागम करने वाली स्त्री?" पूछा मैंने,
"वो नीचे है!" बोली वो,
"पुरुष?" पूछा मैंने,
"मध्य में!" बोली वो!
''और?" पूछा मैंने,
"वो औरत खड़ी हो गई!" कहा उसने,
"कौन सी?" पूछा मैंने,
"वो जो ऊपर चढ़ी थी!" कहा उसने,
"हाँ! और?" पूछा मैंने,
"वो औरत कूद पड़ी!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"सामने!" बोली वो,
"और?'' पूछा मैंने,
"एक और पुरुष आया है!" कहा उसने!
"अच्छा! और?' पूछा मैंने,
"ओ!" चिल्लाई वो!
"अब?" कहा मैंने,
"उस पुरुष को, उठा फेंका!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
और दूसरी औरत ने, उस औरत को लात मार, ज़मीन में धंसा दिया!" कहा उसने,
"फिर?" पूछा मैंने,
"ओह...हाथ-पाँव उखाड़ दिए उस औरत के!" बोली वो,
"किसने?" पूछा मैंने,
"उस पुरुष ने!" कहा मैंने,
"पहला पुरुष कहाँ है?" पूछा मैंने,
"नहीं है!" बोली वो,
"कहाँ है?" पूछा मैंने,
"नहीं है!" बोली वो,
"कहाँ है?" पूछा मैंने, फिर से, तीसरी बार!
"वो आ गया! आ गया!" बोली वो,
"कहाँ है?" पूछा मैंने,
"इस पुरुष के पीछे!" बोली वो,
"अब ध्यान से देखो साधिके!" कहा मैंने,
उसने घूरा सामने! और खाया एक झटका!
"क्या देखा!" कहा मैंने,
"उस पुरुष ने, आगे खड़े पुरुष का सर काट दिया!" बोली वो!
"अब?" पूछा मैंने,
"उस औरत ने, उसका धड़ उठा फेंक दिया दूर!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"अब?" पूछा मैंने,
"वो स्त्री, बैठ गई!" बोली वो,
"हाँ! अब?" पूछा मैंने,
"अपनी टांगें चौड़ा ली हैं!" बोली वो,
'और?" पूछा मैंने,
"वो पुरुष, आ लेटा उसके ऊपर!" बोली वो,
"हाँ! अब?" कहा मैंने,
"समागम होने लगा है!" बोली वो,
"हाँ साधिके! हाँ!" बोला मैं,
"आदेश नाथ!" बोली वो,
"अब ध्यान से देखो!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
और सन्नाटा! सन्नाटा पसर गया, कुछ ही क्षणों के लिए!
"कोई आया है नाथ!" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"कोई वृद्धा स्त्री है! लंगड़ी!" बोली वो,
"देखती रहो!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"अब?" कहा मैंने,
"वो खड़ी हो गई है!" बोली वो,
"और अब?" पूछा मैंने,
"अब उस पुरुष ने, उस स्त्री को, अपनी गोद में बिठा लिया है!" बोली वो,
"अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
"घुमा रहा है!" बोली वो,
"और वो लंगड़ी?" पूछा मैंने,
"वो बैठ गई है!" कहा उसने,
"हाँ, और अब?" पूछा मैंने,
अब...........मित्रगण! अब! अब...............
"ओह!" बोली वो,
"क्या देखा?" पूछा मैंने,
"दो शव!" कहा उसने,
"किसके?'' पूछा मैंने,
"शिशु हैं!" बोली वो,
"कौन लाया?" पूछा मैंने,
"पता नहीं, कोई फेंक कर भाग गया है!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"ओ! इसने एक शिशु को उठा लिया है?" बोली वो,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"ओह! उसने, उसको दोनों टांगों से पकड़ कर, चीर दिया है!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"वो! वो..! खाने लगी है उसके आंत-गूदडे!" बोली वो,
तभी साधिका का जी मचला, उसके पेट में से आवाज़ हुई, डकार सी लेने लगी और मुंह फेरते हुए उसने उबकाईआं लीं, ज़ोर ज़ोर से!
"साधिके?' बोला मैं!
उसने उबकाई लेना न छोड़ा! बार बार मुंह खोले, खांसी, अजीज़ कुछ बाहर आएगा, साँसें तेज होने लगीं उसकी! शायद ऐसा दृश्य उसने पहली बार ही देखा था!
"साधिके?" मैंने अपना बायां घुटना, उसके बाएं जबड़े पर मारते हुए कहा!
"नाथ!" बोली वो,
"सम्भालो!" कहा मैंने,
"वो. यहीं हैं!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"यहां, पास में, दुर्गन्ध आ रही है, नाथ!" बोली वो,
"जो देखती हो, बताओ?" कहा मैंने,
"ओह...एक का मुण्ड नोंच नोंच कर खाये जा रही है!" बोली वो,
"और?" कहा मैंने,
"अब, पिंजर मात्र, फेंक दिया!" बोली वो,
"और वो जोड़ा?" पूछा मैंने,
"संसर्ग में है!" बोली वो,
"पुरुष?" पूछा मैंने,
"सर उस स्त्री के वक्षों में है!" बोली वो,
"और ये वृद्धा?" पूछा मैंने,
"ए...ये तो दूसरे शिशु को भी खाने के लिए, उसे ज़मीन पर मार रही है! पटक रही है!" बोली वो,
"हड्डियां तोड़ रही है उसकी?" पूछा मैंने,
"हाँ, यही नाथ!" बोली वो,
''अब?" पूछा मैंने,
"खाना शुरू कर दिया है उसने!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
उस शिशु के उदर से, झाग निकल रहे हैं!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"चाट रही है!" बोली वो,
और फिर से उबकाई आई उसे! सांस जैसे अटक गई उसकी! मैंने चिंता उसकी जंघाओं में चुभो दिया!
"साधिके?" चीखा मैं,
"नाथ!" बोली वो,
"जो देखती हो, बताओ?" कहा मैंने,
"वो खड़ी हो गई!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"उस शिशु को, फेंक दिया!" कहा उसने,
"और?" पूछा मैंने,
"वो चली है उस संसरग्लिप्त जोड़े की तरफ!" बोली वो,
"अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
वो देख रही है उधर, उनको!" बोली वो,
"बताती जाओ?" कहा मैंने,
"वो चली आगे!" कहा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"उसने उस पुरुष के केश पकड़े हैं!" बोली वो,
"अच्छा, अब?" पूछा मैंने,
"पुरुष ने देखा उसे!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"ओह! उसको उठा लिया उस स्त्री ने!" कहा उसने!
"फिर?'' पूछा मैंने,
"पुरुष गिड़गिड़ा रहा है!" बोली वो,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"अरे! उसे ज़मीन में घुसेड़ दिया एक ही हाथ से!" बोली वो,
"हा! हा! हा! हा! हा!" मैंने ज़ोर से हंसा!
साधिका की आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं!
"नाथ?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"वो स्त्री के पास चली!" बोली वो,
"अच्छा, अब?" कहा मैंने,
"उस स्त्री को, कमर में हाथ डाल उठा रही है!" बोली वो,
"वो स्त्री, मूर्छित है?" पूछा मैंने,
"हाँ, लगता है!" बोली वो,
'अब?" पूछा मैंने,
"उस स्त्री को उस वृद्धा ने, उठा, कंधे पर रख लिया है!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
एक पल! वो खामोश! सिहर गई! फुरफुरी सी चढ़ गई उसे!
"साधिके?'' कहा मैंने,
"ना....ना...थ.." बोली मरी हुई सी आवाज़ में!
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"वो आ रही है!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"हमारी तरफ...." बोली वो,
और होने लगी पीछे!
मैंने अपना चिमटा उसके नितम्बों के पीछे मारा तब, रोकने के लिए!
"अब?" पूछा मैंने,
"ओह नाथ!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"हो...हो......." अब कांपने सी लगी वो!
"ए? साधिके?" चीखा मैं, और अपनी जाँघों में उसका चेहरा दबा दिया!
"डुबो नहीं, प्राणों से जाओगी!" कहा मैंने,
"हाँ! हाँ नाथ!" बोली वो,
"अब, देखो? क्या देखती हो?" पूछा मैंने,
"नाथ??" वो चिल्लाई!
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
'वो, वो...सामने है! ठीक सामने! हे नाथ, रक्षा!" बोली वो,
"जो कहता हूँ सुनो! अपनी नहीं जोड़ो! समझीं? बताओ? बताओ क्या देखती हो?" पूछा मैंने,
"नाथ, उसने रख दिया है उस स्त्री को नीचे" बोली वो,
'अब?" पूछा मैंने,
"अब खड़ी है समीप ही उसके!" बोली वो,
"हुन्न! अब?" पूछा मैंने,
"ओह! वो उस औरत को बालों से पकड़ कर, खींच रही है!" बोली वो,
"कहीं ले जा रही है?" पूछा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"उधर!" बोली वो,
अर्थात बाएं!
"उधर!" बोली वो,
अर्थात सामने!
"नहीं, उधर!" बोली वो,
अर्थात, दाएं!
"नहीं! नाथ!" बोली वो,
"क्या देखती हो?" पूछा मैंने,
"वो सामने नहीं है!" बोली वो,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"हमारे पीछे है नाथ!" बोली वो,
"पीछे!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"आ गई! आ गई!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"ये क्या नाथ?" बोली वो,
"क्या?' पूछा मैंने,
"ये तो उसको खींच, हमारे चक्कर लगा रही है!" बोली वो,
"हाँ! हाँ! अब?" पूछा मैंने,
"अभी भी नाथ!" बोली वो,
"रुकी?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"पल में यहां, पल में वहां?" पूछा मैंने,
"हा..हा....हाँ नाथ! बहुत तेज! मैं देख नहीं पा रही, नज़रें नहीं तक पा रही नाथ, क्षमा!" बोली वो,
"घबराओ नहीं! अब?" पूछा मैंने,
"हाँ! हां!" चीखी वो!
"क्या हुआ साधिके?" पूछा मैंने,
'वो ठीक सामने है, हमारे!" बोली वो,
"कितनी दूर?" पूछा मैंने,
"उधर ही, उधर!" बोली वो,
उधर ही! मतलब, चार फ़ीट दूर अब!
"शांत!" कहा मैंने,
"शांत!" फिर से कहा मैंने,
"शांत साधिके, शांत!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"अब क्या देखती हो?" पूछा मैंने,
"वो, उठी है अब!" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"वो वृद्धा!" कहा उसने,
"अब?" पूछा मैंने,
"ये......ये क्या?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"उस मूर्छित स्त्री का पेट फूल आया है, बहुत ज़्यादा!" बोली वो,
"गर्भ पक गया है साधिके क्या?" पूछा मैंने,
"हाँ! हाँ यही! गया है! पक गया है!" बोली वो,
"और अब?" पूछा मैंने,
"ओह...ओ!!" चीखी वो!
"क्या?" पूछा मैंने,
"मेरे कान?? मेरे कान?" बोली वो,
"क्या हुआ?" ज़ोर लगाकर पूछा मैंने,
"फटने लगे हैं?" बोली चीख कर!
"क्यों?" पूछा मैंने,
"वो चिल्ला रही है!" बोली वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"वो, गर्भवती स्त्री!" बोली वो,
"और वो वृद्धा?" पूछा मैंने,
"हंस रही है...और...ये क्या?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"उस स्त्री के स्तनों से, ऊँची धार निकल रही है?" बोली वो, और सिहर गई! सिहरती चली गई! झटके से खाती चली गई!
"क्या ये दुग्ध है?" पूछा मैंने,
"नहीं नाथ?" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"रक्त!" बोली वो,
"कैसे जाना?" पूछा मैंने,
:श्वान दौड़े चले आये हैं, अँधेरे से, रक्त चाट रहे हैं भूमि से, कुछ उसके स्तनों को चाटने लगे हैं! ओह...नाथ.......वो औरत....चीख रही है!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"ओह!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"वो वृद्धा?" बोली वो,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"वो वृद्धा, उस स्त्री की जंघाओं पर, उकड़ू बैठ गई है अब!" पूछा मैंने,
''और वे श्वान?" पूछा मैंने,
"अखह...अखह!" बोली वो,
उसे उबकाई आने लगी थी! मैंने उसके केश पकड़े, और सर हिला दिया, झिंझोड़ दिया बुरी तरह से!
"बता? बता? अब क्या?" पूछा गुस्से से!
"नाथ नाथ!" बोली वो,
"हाँ?" पूछा मैंने,
"वे श्वान, उसके स्तन काट ले गए हैं, भंभोड रहे हैं, रक्त ही रक्त! रक्त ही रक्त!" बोली वो,
"वो वृद्धा?" पूछा मैंने,
"बैठी है!" बोली वो,
"यथावत?" पूछा मैंने,
"ह.....नहीं! नहीं! वो उठी, वो उठी!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"उस गर्भवती स्त्री की, योनि...योनि में कुछ अटका है नाथ?" बोली वो,
"ध्यान से देख? बता? क्या?" पूछा मैंने,
"काला सा रंग है, लोथड़े सा, मांस का, बड़ा सा लोथड़ा अटका है......" बोली वो,
और उबकाई ली उसने! दुर्गन्ध आने लगी थी उसे!
"और वो वृद्धा साधिके?" पूछा मैंने,
"वो, नाथ! नाथ!" बोली वो, बिन पूरी बात किये!
"हाँ, बताओ साधिके?'' पूछा मैंने,
"योनि से कुछ बाहर आने को है?" बोली वो,
"क्या? कुछ दीखता है?'' पूछा मैंने,
"नहीं नाथ, ये काले रंग का है!" बोली वो,
"और देखो, बताओ?" कहा मैंने,
"वो वृद्धा, वो वृद्धा योनि के सम्मुख आ खड़ी हुई है!" बोली वो,
"अब साधिके?" पूछा मैंने,
"ओह..उसने योनि में हाथ डाले हैं!" बोली वो,
"खींचने के लिए साधिके!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"देखती रो, अब?" पूछा मैंने,
"ओ!ओ!ओ!" बोली वो,और थूक दिया एक तरफ!
"आँखें नहीं बंद करना साधिके? नेत्र चले जाएंगे!" कहा मैंने,
"हाँ नाथ, हाँ!" बोली वो,
फिर से उबकाई छूटी उसकी!
"बताओ?" कहा मैंने,
"नाथ?" बोली वो,
"हाँ? बता? जल्दी बता?" कहा मैंने,
"ये क्या??" बोली वो, कांपते हुए!
"क्या देखा?" पूछा मैंने,
"ये तो एक काला सा शिशु है?" बोली वो,
"आया योनि से बाहर?" पूछा मैंने,
"सर ही, ओह! ओह!" बोली वो,
और फिर से थूक दिया!
"क्या देखा?" पूछा मैंने,
"उसका सर कितना बड़ा है?" बोली वो,
"हाँ! हाँ साधिके! बड़ा सा सर! अब?" पूछा मैंने,
"वो वृद्धा, गर्दन पर, जा बैठी है उस स्त्री के नाथ?" बोली वो,
"अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
"ये तो दबा रही है उसका गला, गर्दन?" बोली वो, अब डरने लगी थी मेरी साधिका!
"अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
"ओह! उस स्त्री की आंतों सहित बाहर आ गिरा है वो शिशु!" बोली वो,
"और वो स्त्री? गर्भवती?" पूछा मैंने,
"वो मर गई!" बोली वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"मार दिया उस वृद्धा ने उसे!" बोली वो,
"और शिशु?" पूछा मैंने,
"वप उठ बैठा है!" बोली वो,
"अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
"वो वृद्धा, उसे उठा रही है!" कहा उसने,
''अब?" पूछा मैंने,
''वो शिशु हाथ बढ़ा रहा है!" बोली वो,
"किसकी तरफ?" पूछा मैंने,
"उस वृद्धा की तरफ!" बोली वो,
"और?" पूछा मैंने,
"पकड़ लिया शिशु का हाथ उसने!" बोली वो,
"अच्छा, अब?" पूछा मैंने,
"वृद्धा ले जा रही है उसे!" बोली वो,
"खुद चलने लगा है?" पूछा मैंने,
"हां! हाँ नाथ! खुद ही उठकर!" बोली वो,
''अब?" पूछा मैंने,
"वो दोनों जा बैठे!" कहा उसने,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"उस लाश के पास!" बोली वो,
"ओ! अच्छा! अब?" पूछा मैंने,
"आक.....ईई..ह....!" बुरी सी आवाज़ निकाली उसने!
"साधिके? स्वर से जाओगी! बताओ?" कहा मैंने!
अब न बोले वो, एकटक देखती रहे उन्हें!
"हे? तू? बता? बता?" मैंने ज़ोर से केश खींचे उसके!
"नाथ! नाथ!!" बोली वो,
"बता?" कहा मैंने,
"वो वृद्धा, उस मृत औरत के पेट में से, पता नहीं क्या मांस की गेंदें निकाल निकाल उस शिशु को खिला रही है!" बोली वो,
"शिशु खा रहा है?" पूछा मैंने,
''हाँ नाथ!" बोली वो,
"चाव से?" बोली वो,
"हाँ नाथ!" बोली वो,
"रुक! थम! थम!" कहा मैंने,
और उसके कंधों से उतरा और भाग लिया भोग-थाल लेने! लिया और फिर से, वापिस आ चढ़ा उसके कंधों पर!
"ले!" कहा मैंने,
उसने हाथ किया पीछे,
"ले! ये ले!" कहा मैंने,
उसने ले लिया, मैंने मांस का एक बड़ा सा टुकड़ा दिया था उसे, उसके हाथ में, उसने पकड़ लिया था!
"सुन?" बोला मैं,
"आदेश!" बोली वो,
"ये टुकड़ा, डे उसे!" कहा मैंने,
"क्या नाथ?" पूछा मैंने,
"हाँ? जैसा कहा वैसा कर? समझी, कोई सवाल-जवाब नहीं? समझ गई तू?" बोला मैं, एक ज़ोर का चांटा उसको लगाते हुए!
"हाँ! हाँ नाथ!" बोली वो,
"दे? दे उसे?" चीखा मैं,
"आदेश नाथ!" बोली वो,
और उसने, कांपते हुए हाथ से, फेंक दिया टुकड़ा सामने, उस शिशु के पास!
"क्या देखती है?" पूछा मैंने,
"उसने देख लिया!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"टुकड़े को, और फिर मुझे, फिर टुकड़े को!" बोली वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"वो चल रहा है! उठ कर!" बोली वो,
''अब?" पूछा मैंने,
"बैठ गया नीचे!" बोला वो,
"अब?" पूछा मैंने,
"टुकड़ा उठा लिया!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"ले चला!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"उस वृद्धा के पास!" कहा उसने,
"अब?" पूछा मैंने,
"वृद्धा ने टुकड़ा देखा है अभी, फिर मुझे!" बोली वो,
''और?" पूछा मैंने,
"वृद्धा ने टुकड़ा वापिस किया और दे दिया उस शिशु को!" बोली वो,
"अब?" कहा मैंने,
''शिशु ने चबाना शुरू कर लिया है!" बोली वो,
"हा! हा! हा! हा! हा! हा!" किया ज़ोरदार अट्ठहास मैंने, और खड्का दिया चिमटा अपना, ज़ोर ज़ोर से!
