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वर्ष २०१३, रात को जागता वो रास्ता! भयावह और रहस्यमय!

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श्रीशः उपदंडक
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"क्या है?" फुसफुसाते वो,
"शहहहहः!" कहा मैंने ऊँगली रखते हुए,
"घोड़ा है?" बोले वो,
"पता नहीं?" कहा मैंने,
उसके खुर चकलाये एक जगह!
"हाँ, घोड़ा है या कोई खच्चर!" कहा मैंने,
"भाग आया होगा कहीं से!" बोले वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"आओ! ठंड बहुत है!" बोले वो,
"है, अलाव पर ही रहो!" कहा मैंने,
"हाँ, वहॉ सुकून है!" बोले वो,
"आओ फिर!" कहा मैंने,
और हम जा बैठे उधर, यहां गर्मी बहुत अच्छी हो रही थी! जी करता था, कोई टेक मिल जाए तो आराम से लेट जाओ! पतंगों की चटर-चटर बड़ी ही प्यारी लग रही थी! जलती हुई लकड़ी की महक बेहद ही प्यारी और जी को आनन्द प्रदान करने वाली सी थी!
कोहरे भरी रात! या यूँ कहूँ कि कुहांसे भरे रात! कुहांसे में, ठंडे पानी की बूँदें, कभी छोटी और कभी बड़ी अक्सर गिरती रहती हैं बदन पर! कुहांसे में दिशा-ज्ञान नहीं रहता! सामने तालाब भी हो, तो ज़मीन का सा आभास मिलता है! कोहरे में आवाज़ सुनाई दे जाती है लेकिन कुहांसे में आवाज़ न तो अंदर ही जाती न बाहर ही जाती! आवाज़ जैसे, उस निर्वात में घुट कर रह जाती है!
"शहरयार?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"या समय भी याद रखना!" कहा मैंने,
"बिलकुल जी!" बोले वो,
"ये सब, होता आया है और होता ही रहेगा!" कहा मैंने,
"हाँ, आज हम हैं कल कोई और!" बोले वो,
"हाँ शहरयार!" कहा मैंने,
"अब क्या करना है?" बोले वो,
"फ़क़त इंतज़ार!" कहा मैंने,
"सो तो है!" बोले वो,
"बस, और कुछ नहीं!" बोला मैं!
"एक बात है?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"वो सारी रात न आये तो?" बोले वो,
"तो कल सही?" कहा मैंने,
"माना जाए......!" बोले तो काटीं मैंने बात!
"यही कि न आये तो?" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
"तो क्या?" कहा मैंने,
"वापिस?" बोले वो,
"क्या होना चाहिए?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"तो उम्मीद रखो!" कहा मैंने,
"वो तो है!" बोले वो,
"बस, पकड़े रखो दामन उम्मीद का!" कहा मैंने,
"सच है!" कहा उन्होंने,
"कुछ भून लूँ?" बोले वो,
"अरे हां? क्यों नहीं!" कहा मैंने,
और वे, दो बड़े टुकड़े, लकड़ी में पिरो, भूनने लगे! गन्ध उठने लगी! गन्ध बहुत ही तीखी और भूख लगाने वाली थी! सच कहता हूँ! 
"रान का टुकड़ा है!" बोले वो,
"वाह!" कहा मैंने,
"दमदार है!" बोले वो,
"भून लो सही से!" कहा मैंने,
"हाँ, ये देखना?" बोले वो,
"लाओ?" कहा मैनें,
मैंने टुकड़ा देखा, उलट-पलट कर!
"बस थोड़ी सी कसर है!" कहा मैंने,
"अभी करता हूँ पूरी!" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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अभी भी मुझे लगता है कि कई पाठकगण, इन चोण को समझ नहीं पाए हैं! उनके लिए ये मात्र भटकते हुए प्रेत हैं या फि खुले हमलावर ही! बताये देता हूँ, ये कोई साधारण प्रेत या प्रेत जैसे हरगिज़ नहीं हैं! इनके आगे तो प्रेत भी नहीं आये! हाँ, कोई नाग देवता या देवी हो, नाग-महासाधक हो अथवा, नाग से सम्बन्धित विद्याओं का जानकार हो, उसको ये प्राणदान प्रदान कर सकते हैं! इन जुझारू लड़ाकों में जो प्रविष्ट शक्ति है, वो मारणदेव हैं! ये मारणदेव, भिन्न भिन्न संस्कृति में भिन्न भिन्न नाम से जाने जाते हैं! कहीं ये आज भी पूजित हैं और कहीं आज भी कई कुओं आदि जैसे स्थानों के अधिपति हैं! हमारा काम यहां बस यही था कि उनको इस मार्ग से हटाया जाए, रोक लिया जाए, न माने तो फिर से हदबन्दी में क़ैद कर दिया जाए! बस, न हमारा उनसे कोई बैर था और न कोई याराना ही! एक फ़र्ज़ आयद हुआ था, उसी का निबाह करना था! अब विद्या होते हुए भी आप असमर्थता ज़ाहिर करो, तो इस से बड़ी और कोई कायरता नहीं!
"ये लो, अब देखो!" बोले वो,
मैंने लिया और देखा उस बोटी को! बढ़िया भून ली गयी थी! हाथ लगाकर देखा, तो गरम थी, बर्फ से हुए हाथों को गरमाइश मिली तो रुका हुआ रक्त आगे बढ़ा!
"हाँ, अब बढ़िया है!" कहा मैंने, दांतों से काटते हुए!
"सही रहा न?" बोले वो,
"हाँ! आपका?'' पूछा मैंने,
"हो गया तैयार बस!" बोले वो,
और तब उन्होंने भी झाड़ना शुरू किया उस बोटी को, रुमाल से पोंछ लिया और फिर दांतों से नोंचा! मुंह और बोटी के बीच भाप बन गयी! यही है गरमाइश!
"क्या वक़्त हुआ?" पूछा मैंने,
उन्होंने घड़ी देखी, उजाले में की,
"बारह चालीस!" बोले वो,
"पौन बजने को हुआ?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"अपने आसपास देखो!" कहा मैंने,
"अँधेरा!" बोले वो,
"और ये पेड़!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"और वो बेचारा अकेला लेटा हुआ!" कहा मैंने,
"हाँ, परसों तक बिस्तर में होगा!" बोले वो,
"देख लो!" कहा मैंने,
"सब वक़्त है!" बोले वो,
''वक़्त की चाल!" कहा मैंने,
तभी आवाज़ें आने शुरू हुई! ये थी आवाज़ें इंसानों की! हम दोनों ही अब मुस्तैद हो गए! दोनों के सर एक तरफ झुक गए!
"नीचे!" फुसफुसाया में,
वे झुक गए, लेट से गए मेरी तरफ!
"कोई नज़र आया?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"आवाज़ सामने ही है!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"चुपचाप देखते रहो!" कहा मैंने,
और हम सर हिला हिला सामने देखते रहे! लेकिन कोई नज़र नहीं आये! लगता था कि जैसे डकैत आये हों उधर, रात काटने!
"वो देखो" कहा मैंने,
उन्होंने गौर से देखा उधर!
"ये कौन?" बोले वो,
"इसने तो बुक्कल मारी है?" कहा मैंने,
"अकेला ही है?" बोले वो,
"पता नहीं?" कहा मैंने,
"शहहहहः!" बोले वो,
हमारे पीछे कोई था, दीवार के पास, घूम के देख नहीं देख सकते थे, पता नहीं कौन हो, कोई गोली ही न चला दे! चुपचाप ही लेटे रहे हम!
कुछ ही देर में पीछे वाली आवाज़ बन्द हो गयी!
"पीछे देखना?" कहा मैंने,
सर घुमाया उन्होंने, देखा,
"कोई नहीं है" बोले वो,
"कोई भी?" कहा मैंने,
"हाँ" बोले वो,
"उधर अँधेरा है न?" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
"खिसको!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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हम दोनों ही खिसकते हुए वापिस से हुए! अभी फिलहाल हमारे आसपास कोई नहीं था! ठीक सामने जिस आदमी को बुक्कल मारे देखा था अभी, हाल ही, वो भी नहीं था! हाँ, अलाव की आग ज़रूर जल रही थी, पूरी पकड़ में! अब हम अँधेरे में आ गए थे, यहां से सामने, दाएं और बाएं तो दीख रहा था, लेकिन पीछे का कुछ भी नहीं! खैर, एक बात की तो हमें परवाह नहीं थी, मैंने सिर्फ एक एड़ ही लगानी थी कि मसान वीर क्षण के सौंवे क्षण में, प्रकट हो जाता वो!
"कुछ है सामने?" पूछा मैंने,
"कुछ नहीं!" बोले वो,
"अपने दाएं देखो?" कहा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"रुको फिर!" कहा मैंने,
और मैंने तब बाएं देखा! वहां कुछ भी नहीं!
"एक मिनट! वो सामने!" बोले वो, मेरी कमर पर हाथ रखते हुए! मैंने सामने देखा और झट से पीछे हुआ!
"हां!" फुसफुसाया मैं!
"दो हैं!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"बुक्कल मारे!" बोले वो,
"हां!" कहा मैंने,
"पीछे हो जाओ?" बोले वो,
और मैं पीछे हो गया! कुछ पल उन्हें ही देखता रहा!
"इन दोनों ने, हाथ पीछे बांधे हैं!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"और सर भी ढका है?" बोले वो,
"देख रहा हूँ!" कहा मैंने,
ये दोनों, टहल रहे थे, एक दूसरे के संग ही, एक बार भी रुके नहीं थे! रुकते ही नहीं थे! उन्हें जैसे सूंघ लगी हुई थी कुछ! और तो और, कुछ बोल भी न रहे थे! लेकिन थे दोनों ही कद्दावर से! मज़बूत और भारी देह वाले! कन्धे चौड़े लगते थे उनके! अब उनका बुक्कल हटे तो कुछ पता चलता!
"सुनो?" बोले वो,
मैं कहीं और ही देख रहा था उस समय!
"सुनो?" बोले वो,
"हां?" कहा मैंने,
"वो, उधर क्या है?" बोले वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"उधर, पार?" बोले वो,
"क्या है?" पूछा मैंने,
"देखो, क्या लगता है?" पूछा मैंने,
मैंने उचक कर देखा उधर, एक तो अँधेरा बहुत था, दूरी भी ज़्यादा नहीं थी, होगी करीब बीस फ़ीट के करीब!
"क्या है?" पूछा मैंने,
"मुझे तो मांस का लोथड़ा सा लगता है?" बोले वो,
"लोथड़ा?" पूछा मैंने,
"शायद?" बोले वो,
"मुझे तो नहीं?" कहा मैंने,
''फिर?" बोले वो,
"कोई गठरी सी है?" कहा मैंने,
"नहीं, गठरी तो है, लेकिन कुछ बाहर लटक तो रहा है उसमे से?" बोले वो,
"कहाँ यार?" बूझा मैंने,
"यहां से देखो!" कहा मैंने,
अब मैंने जैसे ही देखा! वैसे ही वे दोनों उछले और दूर जा कर खड़े हो गए! ये सब बड़ा ही हैरतअंगेज़ था! ये डकैत हरगिज़ नहीं थे! कोई भी इंसान इतनी लम्बी छलांग नहीं भर सकता था!
"आओ!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
और हम दौड़ कर अपनी अलाव तक आ गए!
"उठाओ ये तलवार?" कहा मैंने,
उन्होंने उठायी झट से! और दी मुझे!
"ये लो!" बोले वो,

 


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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"शहरयार?" बोला मैं,
"जी?" बोले वो,
"तैयार रहना!" कहा मैंने,
"तैय्यार हूँ!" बोले वो,
"वो क्या?" पूछा मैंने,
जो सामने था, उसको देख हम दोनों ही नीचे बैठ गए! ये बड़ा ही भयावह मंज़र था! ठीक सामने वो जो दो बुक्कल मारे दो लोग थे, वे अब वहां नहीं थे, वहां ज़मीन पर उकड़ू बैठे हुए चार लोग थे! उनके सर नहीं था, हाथों में कोई हथियार भी नहीं था! ये अवश्य ही इन चोण द्वारा मारे गए शिकार थे! कहते हैं, जिन्हें ये मारते हैं, उन्हें दास बना लेते हैं, यदि साथ देते रहते हैं तो निभते रहते हैं संग, यदि नहीं तो अँधेरे में ही कहीं भटक कर रह जाते हैं!
"ये कौन हैं?" फुसफुसाए वो,
"शिकार!" कहा मैंने,
"अब भी?" बोले वो,
"क्या सम्भव नहीं?" बोला मैं,
"इस तरह दास बने?" बोले वो,
"हाँ, यही होता है!" कहा मैंने,
"इसका मतलब जो सड़क किनारे मरे?" बोले वो,
''वो भी भटक रहे होंगे, यदि अंतिम-कर्म न हुआ हो तो!" कहा मैंने,
"यानि मरके भी चैन नहीं!" बोले वो,
"हाँ, समझ लो!" कहा मैंने,
"वे जा रहे हैं!" बोले वो,
"जंगल में!" कहा मैंने,
"वे दोनों कहाँ गए?" पूछा उन्होंने,
"यहीं होंगे!" कहा मैंने,
"नज़र नहीं आ रहे?" बोले वो,
"वो जानते होंगे!" बोला मैं,
"हमारे बारे में?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"ओह...तब?" बोले वो,
"आ नहीं रहे बस!" कहा मैंने,
"यहां तक वे आएं?" बोले वो,
"दस मिनट और!" कहा मैंने,
"फिर?" बोले वो,
"सामने है सब!" कहा मैंने,
"तब हम?" बोले वो,
"इतने सवाल आते कहाँ से हैं!" बोला मैं,
"वे थोड़ा सा अलग हैं न!" बोले वो,
"हाँ, पूरा ही!" कहा मैंने,
"वे आ गए!!" बोले वो,
"अब बाँध के रखो नज़रों में!" कहा मैंने,
और मैं उठ खड़ा हुआ! उठायी तलवार, और चला थोड़ा सा आगे, दाएं देखा और बाएं देखा! फिर सीधा चला दो क़दम!
मैंने तलवार तानी हवा में, बस फिर क्या था! वे दोनों, लपक कर खड़े हुए! ठीक सामने कोई पन्द्रह फ़ीट! युक्ति अब तक तो काम आयी थी! उनमे से एक आगे को आया, रुक गया और ठीक सामने आ, रुक गया फिर! दूसरा भी चला आया, बंधे हाथ खोल लिए उन्होंने! हाथों में, नरकट-तलवार देखीं मैंने उनके! ऐसी तलवार, जो मूठ से लेकर ऊपर मुख तक, चौड़ी ही रहे! फाल उनका फरसे की भांति! एक सही सा वार सर पर ऊपर से पड़ जाए तो नीचे तक दो टुकड़े बना दे बराबर! या गर्दन को ऐसे उड़ाए की गर्दन कट कर, उस तलवार के फाल पे ही टिकी रहे! इनकी तो कद-काठी ही ऐसी थी की, घोड़े तक बैठने के लिए, बस उछलना ही पड़े!
एक ने हटाया बुक्कल! भयानक सा सूखा चेहरा! जैसे खून रिस रिस कर, गाढ़ा हो, वहीँ चिपक गया हो! न आँखों का पता और न नाक का ही! अभी उस पर ही नज़रें थीं कि दूसरे ने भी बुक्कल हटाया! साफ़ वैसा ही चेहरा, हाँ, पीले रंग की चिरवां रस्सी चेहरे पर लटक रही थी, जिस से माथे को बाँध दिया गया था!
"कौन है?" आयी आवाज़!
"सामने आओ?" कहा मैंने,
एक ने चक्कर सा काटा, दाएं से बायां! आवाज़ वहाँ से नहीं आयी थी, लगता था जैसे मेरे बाएं से कहीं दूर से आ रही हो!
"कहाँ से आया?" पूछा गया,
"यहीं का हूँ!" बोला मैं,
"किसका?" बोला वो,
अजीब सी बात! क्या वो सभी को जानता रहा होगा?
"किसका?" दूसरा चीखा,
और मैंने बता दिया कोई नाम ऐसे ही!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"अब तू कौन?" बोला मैं,
"नहीं जानता?'' बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"और कौन है?" बोला वो,
"बहुत हैं!" कहा मैंने,
"तू कौन सा?" पूछा उसने,
अब मैं यहां अटका?
"बता?" बोला वो,
"आ कर देख ले?" कहा मैंने,
"देख लिया!" बोला वो,
"कौन हूँ?" पूछा मैंने,
"कोई ना!" बोला वो,
"हाँ, कोई ना!" कहा मैंने,
"क्या करना है?" बोला वो,
"क्यों मार रहे हो?" पूछा मैंने,
"किसको?" बोला वो,
"जो नज़र आता है?" कहा मैंने,
"किधर?" बोला वो,
"उस सड़क के पास?" बोला मैं,
"कौन सी सड़क?" पूछा उसने,
"पूरब वाली?" पूछा मैंने,
"नाकेबन्दी?" बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"सब दुश्मन!" बोला वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"नाम न बताये?" बोला वो,
"उन्होंने नाम नहीं बताया?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोला वो,
"तब दुश्मन ठहरा?" बोला मैं,
''एक एक ऐसा!" बोला वो,
"वो दुश्मन न थे!" कहा मैंने,
''सभी थे!" बोला वो,
"तुम किसके?" पूछा मैंने,
"लाल जोट्टा!" बोला वो,
"बाबा लाल जोट्टा?" पूछा मैंने,
"अंगिया वाले!" बोला वो,
साक्षात् इतिहास आ खड़ा हुआ था सामने! ऐसे पता चलती हैं कुछ 
बातें! पहेलियाँ! ये अंगिया वाले कौन? आज शायद ही कोई जाने! लाल जोट्टा क्या? पता नहीं कौन जाने! अब जाने भी या नहीं!
"कब गए?" पूछा मैंने,
"सांझ!" बोला वो,
"कौन सी सांझ?" पूछा मैंने,
"कल सांझ!" बोला वो,
"अब ठौर कहाँ?" पूछा मैंने,
"क्यों?" बोला वो,
"नहीं बताना?" पूछा मैंने,
"फूटैर तो ना हो?" बोला वो,
"लगता हूँ?" बोला मैं,
"ना!" बोला अब दूसरा!
"हट्टे पे कौन?" पूछा मैंने,
"लाल जोट्टा!" बोला वो,
"खेमर कौन?" पूछा मैंने,
"हाड़ा!" बोला वो,
"कौन सा हाड़ा?" पूछा मैंने,
"तू न जाने?" पूछा उसने,
"कई हैं ना?" बोला मैं,
"जगबीरा हाड़ा!" बोला वो,
"टोला है?" पूछा मैंने,
"ना!" बोला वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"सगरा!" बोला वो,
"सामने कौन?" पूछा मैंने,
"पता नहीं!" बोला वो,
"तो?" पूछा मैंने,
"फ़क़त फ़र्ज़!" बोला वो,
क्या इंसान था! वाह! सामने कौन, पता नहीं! भरोसा बस अपनी तलवार का, शौर्य का और उस मारण देव का, जो सवार रहा हो!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"तूने हिम्मत करी!" बोला एक,
"तूने भी!" कहा मैंने,
"मुझे जानता है?" बोला वो,
''हाँ!" कहा मैंने,
"तो लांघ और आगे आ!" बोला वो,
''तू तो चोण है न?" बोला मैं!
"गर्व से!" बोला वो,
"क्या इतनी हिम्मत नहीं?" पूछा मैंने,
"कैसा?" बोला वो,
"लांघ और आ!" कहा मैंने,
अब वे दोनों हंसे!
"क्या सोचता है?" बोला एक,
"जैसा तूने सोचा?" कहा मैंने,
"मान गया!" बोला वो,
"बढ़ फिर?" कहा मैंने,
"पछतायेगा!" बोला वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"तू!" बोला वो,
"क्यों? मैं तो बोल रहा हूँ?" बोला मैं,
"कुछ ज़्यादा ही!" बोला वो,
"कौन रोकेगा?" पूछा मैंने,
"हम?" बोला वो,
"इतना साहस नहीं!" कहा मैंने,
"देखेगा?" बोला वो,
और गुस्से से झुंझला गया! चीखा बुरी तरह से!
"वाह!" कहा मैंने,
मैंने इतना कहा और वो दूर अँधेरे में दौड़ गए! मैं भाग नहीं सकता था उनके पीछे! जान को गंवाना ही रहा जाता फिर कारण बस!
मैं पीछे लौटा, थोड़ा इंतज़ार करते हुए!
"वे चले गए क्या?" पूछा शहरयार ने,
"नहीं!" कहा मैंने,
'फिर?" पूछा उन्होंने,
"रास्ता ढूंढने!" कहा मैंने,
"रास्ता?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"क्या ये, सामने, रास्ता नहीं?" बोले वो,
"है!" कहा मैंने,
"तो? फिर?" बोले वो,
"वे अब इंसान नहीं!" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
"वो अब चोण हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, तो?" बोले वो,
"क्या बोल रहे हो?" कहा मैंने,
"वे चोण हैं, मान लिया, फिर?" बोले वो,
"क्या फिर?" पूछा मैंने,
"कोई तो अंत होगा?" बोले वो,
"है!" कहा मैंने,
"क्या?" बोले वो,
"कर रहा हूँ!" बोला मैं,
"इंतज़ार?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"आएंगे?" बोले वो,
"हथेली कटी है! आएंगे!" कहा मैंने,
"मैं? क्या आदेश?" बोले वो,
"पीछे देखो!" कहा मैंने,
"मतलब?" बोले वो,
"छत से भी कूद सकते हैं!" कहा मैंने,
"ओह!" बोले वो,
"हाँ, और जो भिड़े तब समझो मुश्किल!" कहा मैंने,
"और एड़?" बोले वो,
मैं मुस्कुराया!
"हाँ, तैयार है!" कहा मैंने,
"तभी यहां नहीं आये!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"समझ गया था मैं!" बोले वो,
"आ जाते तो खेल ही ख़तम!" कहा मैंने,
"कब तक नहीं आएंगे!" बोले वो,
"वही!" कहा मैंने,
"अब थूक के चाट नहीं सकते वे!" बोले वो,
"अब समझे बात!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"सामने, पीछे, चौकस रहो बस!" कहा मैंने,
"हाँ, अवश्य ही!" बोले वो,
 

   
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श्रीशः उपदंडक
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करीबन आधा घण्टा हम इसी उहा-पोह में ऊपर और नीचे होते रहे! ज़रा सी भी आहट होती तो कान वहीँ लग जाते! गर्दन झुक कर वहीँ टिक जाती! हवा में कोई परिंदा भी न था! इसी से पता चलता था कि उस घोर कुहांसे में किस तरह से कोई ठहरे! हालांकि हमारे पास वो अलाव जला था, लेकिन होता क्या था, अलाव के सामने जो अंग होता वो गरम हो जाता और जो पीछे रहता वो जैसे किसी बर्फ की सील को छू रहा होता! घुटने जाम से होने लगे थे, जोड़ ऐसे लग रहे थे कि जैसे अभी अभी रस्सी से खुले हों! खून नसों में जैसे जम कर रहा गया था!
"पौन घण्टा होने को आया!" बोले वो,
"हाँ, देख रहा हूँ!" कहा मैंने,
"कोई नहीं आया?" बोले वो,
"आएंगे!" कहा मैंने,
"कुछ और भी?" बोले वो,
"सम्भव है!" कहा मैंने,
"मतलब और भी?" बोले वो,
"जो भी!" कहा मैंने,
"ओह!" बोले वो,
"इस जगह जो होंगे, वे आएंगे!" कहा मैंने,
और तभी, दूर, सामने ही, नगाड़े की सी आवाज़ गूंजी!
"आ गए!" कहा मैंने,
और खड़ा हुआ मैं! वे भी खड़े हो गए! नगाड़े, रुक गए, और कुछ पलों तक कोई आवाज़ नहीं हुई!
"क्या हुआ?" बोले वो,
"सामने देखते रहो!" कहा मैंने,
"देख रहा हूँ!" बोले वो,
"चूके कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"ये नगाड़े क्या थे?" बोले वो,
"चालन!" कहा मैंने,
"ये क्या?" बोले वो,
"टुकड़ी आगे भेजना!" कहा मैंने,
"तो यहां टुकड़ी है?" बोले वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"तब?" बोले वो,
"कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"समझा नहीं?" बोले वो,
"यहां हो न?" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
"यहां कोई कुछ नहीं बिगाड़ेगा!" कहा मैंने,
''सो तो पता है!" बोले वो,
"तब क्या पूछा?" पूछा मैंने,
"मतलब कि कहीं बहुत से हुए तो?" बोले वो,
"होने दो!" कहा मैंने,
"तब भी पार नहीं पड़े?" बोले वो,
"किसकी?" पूछा मैंने,
मैंने अभी पूछा ही था कि कुछ आया उधर फिंकता हुआ!
ढप्प! और लुढ़का वो!
"वो क्या है?'' पूछा उन्होंने,
"कोई मस्तक होगा!" कहा मैंने,
"मस्तक?" हैरत से पूछा,
"हाँ!" कहा मैंने,
"वो किसलिए?" बोले वो,
"और क्या भेजेंगे ये!" कहा मैंने,
तभी एक दूसरा सर आया उधर! लुढ़कता हुआ चला गया वो भी!
"ये कब के होंगे?" पूछा उन्होंने,
"यही नहीं जानता मैं!" कहा मैंने,
"आ सामने?" अब चिल्लाया मैं,
"सुनो?" बोला मैं,
"जी?" बोले वो,
"हट जाओ यहां से!" कहा मैंने,
"पीछे जाऊं?" बोले वो,
"हाँ, अभी!" कहा मैंने,
वे पीछे होते चले गए!
"नज़र में रहना?" बोला मैं,
"जी, हाँ हाँ!" बोले वो,
अब मैंने तलवार फिर से उठायी और देखने लगा सामने! कोई था तो नहीं वहां, लगता था वे जैसे चक्कर काट रहे हों!
"सामने आ?'' कहा मैंने,
कोई भी नहीं आया!
"आ सामने?" बोला मैं,
नगाड़ा सा बज उठा! मैं हुआ मुस्तैद!
"आ जा! सामने आ मैदान में!" कहा मैंने,
कह तो दिया, कहीं भिड़ ही जाता तो सच में मेरे तो पर्चे उतार देता वो! कहाँ वो जीमड़, शहीद और कहाँ मैं, सिर्फ एक 'पढ़ा-लिखा' सा इंसान!


   
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श्रीशः उपदंडक
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तब उन दोनों में से एक सामने आया! उसका कद था कि बिजार था! आदमी कम और बिजार ज़्यादा! वो तो बिन हथियार के ही एक हाथ सही सा गुद्दी पर बिठा दे तो हड्डी अंदर से अंदर तो टूटें ही, बाहर भी अरोड़-मरोड़ सी पड़ जाएँ! ये पहले के लोग, शारीरिक मेहनत वाले, भले ही मोटा अन्न खाते थे, लेकिन थे बड़े ही ताक़तवर! कभी उनके ज़माने की ईंटें देखिये ज़रा, ऐसी भारी कि आज चार ईंटें हमारे सर पर रख दो और चढ़ने को कह दो तो टांगों से ही 'बचाओ-बचाओ!' की आवाज़ें आने लगें! बांस की सी खोखली हो गयी हैं अब! एक भाला देखा था मैंने, करीब ढाई सौ बरस पहले के, करीब सात फ़ीट का, और जहां से उसे बीच में पकड़ा जाता था, वहां, मनके से गुंथे थे, वजन ही इतना था उसका कि मुझ से तो फेंका न जाए सामने! जो उसे फेंकता होगा, उसके कन्धे, पसलियां, टखने घुटने कैसे मज़बूत रहे होंगे, सोच कर ही आश्चर्य हो उठता है!
खैर, कोशिश यहां तो मेरी यही थी कि वो इस सरहद में घुस जाए और फिर उसको क़ैद कर लिया जाए!
"आ?" कहा मैंने,
वो रुक जाता था, बार बार सामने देखता था!
"आ?" कहा मैंने,
तभी उसने ज़ोर से एक प्रहार किया! फहरर की सी तेज आवाज़ हुई! अलाव की रौशनी उसकी तलवार के फाल से टकरा कर लौटी तो लगा आग सी खेल गयी है! उसने प्रहार किया और मैं पीछे हो गया था! वो गुस्सा नहीं हुआ! वो चुप सा खड़ा हो गया! और पीछे देखा, उसके देखते ही, मैं सब समझ गया कि वे चाहते क्या हैं! मैं झट से पलट गया और लगा दौड़ने! मेरे पीछे वे दोनों ही भागने लगे!
"तेज!" चिल्लाये शहरयार!
और दौड़ के आ गए सामने! मेरी तलवार वहीँ गिर पड़ी थी जल्दबाज़ी में ही! मैं गिर ही जाता कि शहरयार जी ने सम्भाला और जैसे ही हम आगे हुए, कि पीछे से वे दौड़ते हुए जो आ रहे थे, पांवों से पकड़े गए और उठा दिए गए ऊपर! करीब दस फ़ीट के करीब! तलवारें नीचे गिर पड़ीं! रेत, मिट्टी आदि उनके बदन से रिस कर नीचे जा गिरीं! कुछ मालाएं सी, उनकी ठुड्डियों के सहारे नीचे की ओर झुक गयीं!
और मैं चला उनकी तरफ!
"सम्भल कर!" बोले वो,
"अब कुछ नहीं कर सकते ये!" बोला मैं,
''सच?" बोले वो,
"हाँ, पकड़े गए हैं!" कहा मैंने,
"अच्छा!" कहा मैंने,
अब मैं ठीक उनके नीचे आया!
"हाँ, वीरवर!" कहा मैंने,
वे अचेत से पड़े थे! हाथ झूल रहे थे उनके!
"आ जाओ!" कहा मैंने,
और वे दोनों झम्म से नीचे गिरे! नीचे एक लाश की तरह! यहां दरअसल मारणदेव ने प्रवेश ही नहीं किया था, यहां सिर्फ उनकी लाशें ही थीं! सर उनकी बेजान लाशें! 
"शहरयार?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"कुछ लकड़ियां हैं?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"कुछ सामग्री?" पूछा मैंने,
''हाँ, वो भी!" बोले वो,
"आओ ज़रा?" कहा मैंने,
वे आ गए उधर!
"शहरयार!" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"ये हमारे शत्रु नहीं! बल्कि ये अपनी मातृ-भूमि की रक्षा करने वाले शहीद हैं! किसी बाबा ने इन बेचारे लोगों, सैनिकों में मारणदेव का प्रवेश कराया दिया होगा, भेज दिया होगा, ये निर्भीक, मौत के परकाले, सबकुछ भूलभाल कर, सिर्फ अपने फ़र्ज़ पर ही अटके रहे!" कहा मैंने,
"हाँ, ये मान-सम्मान के अधिकारी हैं!" बोले वो,
"इनका संस्कार करना होगा!" कहा मैंने,
"क्या ये वहीँ हैं?" बोले वो,
"कौन?" पूछा मैंने,
"सड़क किनारे भटकने वाले?" बोले वो,
"हाँ, वही हैं!" बोला मैं,
"पता नहीं कभी? बेचारे!" बोले वो,
''हाँ, कब से!" कहा मैंने,
''ऐसे और भी होंगे?" बोले वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"वे फिर?" बोले वो,
"उनका मैं कुछ नहीं कर सकता!" कहा मैंने,
"समझता हूँ!" बोले वो,
"हाँ, बस इतना कि, अब सड़क सुरक्षित है!" कहा मैंने,
"अभी तो इतना ही बहुत है!" बोले वो,
"ये मियादी रूप से बंधे हैं!" कहा मैंने,
"हाँ, समझ गया!" बोले वो,
"किसी और की कब मियाद ख़तम हो, कुछ नहीं पता!" कहा मैंने,
"हाँ, ये तो कोई नहीं जानता!" बोले वो,
"आओ, तैय्यारी करें!" कहा मैंने,
"जी, अभी लीजिये!" बोले वो,


   
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श्रीशः उपदंडक
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तैयारी तो करनी ही थी! उनका मान-सम्मान अतिआवश्यक था! वे शहीद थे और आज भी ऐसे ही शहीद पूजे जाते हैं इस क्षेत्र में! लाल जोट्टा जैसे खिलाड़ी, तांत्रिक उनमे शक्ति का प्रवेश कराया करते थे और ये तब, सैनिक, सबकुछ भूलभाल बस, रक्त के प्यासे हो जाते थे! इनके सामने जो पड़ता, समझो जान से गया! और आज, ये बेचारे दोनों, इस धरा पर पड़े थे, उनकी रुक को तो मारण देव अपने संग ही ले गए थे, इसी दोहरी सी बची आयु को अब चीरा कहा जाता है!
"मस्तक की तरफ से ऊँचा रखना!" कहा मैंने,
"हाँ, अवश्य!" बोले वो,
"ये लो, ये रखो!" कहा मैंने,
"लाओ!" बोले वो,
और चितासन बना दिया लकड़ी का उन्होंने!
"एक बात पूछ रहा था!" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"ये तो आज मुक्त हुए, लेकिन वो मारण देव?" बोले वो,
"वे निकल गए होंगे औरां, अब नहीं होंगे यहां!" कहा मैंने,
"कहाँ गए होंगे?" बोले वो,
"लाल जोट्टा के पास!" कहा मैंने,
"वो ज़िंदा?" बोले लकड़ी रोकते हुए!
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" बोले वो,
"लाल जोट्टा ने मार्ग काट दिया होगा, जैसा कि ये अक्सर ही किया करते थे, रास्ता बन्द, धोक दे दी गयी, किस्सा ख़तम!" कहा मैंने,
"ये तो गलत है?" बोले वो,
"वो क्यों?" पूछा मैंने,
"ये मारण देव, क्या सच में देव हैं?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"उप-देव?" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" बोले वो,
"लोक-देव!" कहा मैंने,
"ग्राम-देव?" बोले वो,
"हाँ, ये ही!" कहा मैंने,
"अन्तर क्या?" बोले वो,
"लांघ का!" कहा मैंने,
"मतलब?" बोले वो,
"मियादी, हदबन्दी के!" कहा मैंने,
"ओह हो...!" मुंह से निकला उनके,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"तब तो इनके साथ खेल हुआ?" बोले वो,
"सच पूछो तो हाँ!" कहा मैंने,
"तब कैसे निकलें ये?" बोले वो,
"कुछ भटकते हैं, कुछ रखे जाते हैं, कुछ रक्षक बनाये जाते हैं!" कहा मैंने,
"इस कार्य से मुक्ति नहीं?" बोले वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"ये तो सही नहीं!" बोले वो,
"हम्म!" कहा मैंने,
हमने चिता बना ली थी अब तक! अलाव न जल रहा होता तो सच में हालत बड़ी ही अजीब हो जाती हमारी तो!
"आओ!" कहा मैंने,
"चलिए!" बोले वो,
"उठाओ!" कहा मैंने,
मैंने एक शहीद के पांवों की तरफ से पकड़ते हुए कहा! उन्होंने कन्धे पकड़ लिए थे उसके!
"अभी भी वजन है!" बोले वो,
''अब तो मुर्दा है, सब सूख गया!" कहा मैंने,
"जीवे की कल्पना की!" बोले वो,
"तब तो क्या बात!" कहा मैंने,
"रख दो!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"आओ, दसूरा भी!" कहा मैंने,
"चलिए!" बोले वो,
"उठाओ?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
जैसे ही उठाया उसे, कि उसकी कमर बीच से चटक गयी!
"रखो! रखो!" कहा मैंने,
"रीढ़ खुल गयी शायद!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"यहां से पकड़ता हूँ!" बोले वो,
"एक से मस्तक भी!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
और हमने, अथक प्रयास करते हुए, रख दिया उसे भी चिता पर! न जाने कौन थे वे, कहाँ जन्मे थे, कौन माँ-बाप, कौन गाँव, कौन परिवार, कौन राजा! कुछ नहीं पता! अब बस मुर्दा!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सुनिये?" बोला मैं,
"जी?" बोले वो,
"हमारे पास गंगा-जल नहीं!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"तब एक काम करना, हो सकता है कि मैं भूल जाऊं, जाते समय आप इनकी भस्म अवश्य ही ले लेना!" कहा मैंने,
"अवश्य ही!" बोले वो,
"आओ, अब मुक्ति-कर्म करें!" कहा मैंने,
"जी, जी!" बोले वो,
हम दोनों उन चिताओं के सम्मुख खड़े हुए और तब मैंने उन चिताओं का चक्कर लगाते हुए, दाह-कर्म करने के लिए, मन्त्रोच्चार किया! और अग्नि दे दी! भक्क से अग्नि ने लीलना शुरू कर दिया उनके हिस्सों को! मनके वाली मालाएं, कमरबंध, बाजूबन्ध, तावीज़ आदि सब, जलने लगे!
"आओ!" कहा मैंने,
"जी" बोले वो,
और हम एक जगह, उस अलाव के पास जा कर बैठ गए!
"यही थे वो हंता!" बोला मैं,
"लेकिन ये ललकारते थे उन्हें?" बोले वो,
"हाँ!" बोला मैं,
"और फिर?" बोले वो,
"वे दौड़ते होंगे, भागते हुए शत्रु!" कहा मैंने,
"और सर धड़ से जुदा!" बोले वो,
"हाँ, एक ही पल में!" कहा मैंने,
"लेकिन एक बात?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"वे कटे सर बोलते कैसे थे?" बोले वो,
"समझो! वे चेताते थे कि भागो! भागो! ये एक चाल ही थी, उनकी!" कहा मैंने,
"किनकी?" बोले वो,
"मारण देवों की!" कहा मैंने,
"उस से लाभ?" बोले वो,
"शत्रु निकल आएंगे बाहर!" कहा मैंने,
"ओ! अच्छा!" कहा उन्होंने,
और इस तरह, कुछ और समय बीता! कभी हम बोलते और कभी चुप हो जाते! वो चिताएं, अब सुलगने लगी थीं! ठंडी भी पड़ने वाली थीं कुछ ही देर में!
"मसान वीर?" कहा मैंने,
और कुछ सामग्री झोंकी उस अलाव में!
"जा! जा! पिंडाल में जा!" कहा मैंने,
और हुआ एक अट्टहास! कोई जैसे तेज हवा में उड़ता हुआ, निकल पड़ा वहाँ से!
"गया?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"ठीक!" बोले वो,
"समय क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"पौने पांच!" बोले वो,
''आओ अब!" कहा मैंने,
"भस्म?" बोले वो,
"यहीं रहने दो!" कहा मैंने,
"बाहर चलें?" बोले वो,
"कमरे में!" कहा मैंने,
"अरे हाँ!" बोले वो,
हम आ गए वहां और सारा सामान बाँध लिया! और बैठ गए! सुबह होने में अभी कुछ वक़्त बाकी था!
"किस्सा ख़तम!" बोले वो,
"ह्म्म्म!" कहा मैंने,
"न जाने कब से यूँ ही भटकते रहे होंगे ये!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"हे ईश्वर! शान्ति!" बोले वो,
"शान्ति!" कहा मैंने,
अभी पौ फटने में कुछ ही देर थी कि गाड़ी की रौशनी आती दिखाई दी! ये कृष्ण जी और पूरन ही ही होंगे!
"आ गए वे!" कहा मैंने,
"हाँ! वही हैं!" बोले वो,
और गाड़ी रुक गयी!
"जाओ, समझा दो उन्हें!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो और चल पड़े उस तरफ! उनसे बातें हुईं और सब समझा दिया गया उनकी! करीब घण्टे बाद, भस्म ले ली गयी! स्थानीय मान्यता के अनुसार भस्म कहाँ रखी जानी थी, ये भी बता दिया था उन्होंने, ठीक वैसा ही किया गया!
मित्रगण!
ऐसे न जाने और कितने होंगे! अँधेरे में, बीहड़ में, अनजान से, भटकते हुए ये चोण! देखा जाए तो ये चोण कभी किसी के शत्रु नहीं! वे आदर के पात्र हैं! परन्तु, अब बहुत हुआ, अब न रियासतें रहीं न रियासतों की सेनाएं! ये आज तक शहीद सिपाही हैं! अपने फ़र्ज़ के पाबन्द! उसी राह पर चलने वाले! प्रणाम है ऐसे शहीदों को! और सदैव ही ये सभी शहीद प्रणाम के पात्र बने ही रहेंगे!
साधुवाद!

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(@rupeshthakurbhilai)
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जो नहीं जानता उनके लिए यह भूत प्रेत ही है,बहुत ही अच्छी जानकारी।🙏


   
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