वर्ष २०१३ दतिया, मध...
 
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वर्ष २०१३ दतिया, मध्य-प्रदेश की एक घटना!

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श्रीशः उपदंडक
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वो एक सुहावना दिन था, आकाश में बादल बने हुए थे, सूरज को छिपाते रहते थे, खूब छकाया था सूरज को! दिन के कोई बारह से ऊपर का वक़्त रहा होगा, हालांकि गर्मी तो नहीं थी, लेकिन जब जब धूप निकलती तो ऐसी चुभती कि छैंयाँ की ही शरण लेनी पड़ती!
हम आज सुबह ही पहुंचे थे यहां, ये शहर है दतिया, मध्य प्रदेश, खूबसूरत ऐतिहासिक शहर! हम दतिया जिले के ही एक गाँव में आये थे, दरअसल, दिल्ली में झांसी के एक जानकार के छोटे भाई, ठेकेदारी किया करते थे तो उनसे कभी-कभार हो जाती थी मुलाक़ात, ऐसी ही एक मुलाक़ात में, मोहर सिंह ने एक अजीब सी कहानी सुनाई, कहानी ऐसी कि उत्कंठा का सर्प, कुंडली मार, छाती पर लोट गया! हटे ही नहीं! शुरुआत कैसे हुई, बताता हूँ आपको!
एक शाम, मैं और शर्मा जी, मोहर सिंह के साथ उनके कमरे पर बैठे थे, खाना-पीना चल रहा था, वो बातें कर रहे थे मेरे ही क्षेत्र की, तब उन्होंने, बातों बातों में, कुछ ऐसा बताया कि नशा भी काफ़ूर हो गया!
"एक शाम की बात बताऊँ?" बोले वो,
"हाँ, ज़रूर" कहा मैंने,
"दतिया जिले में एक गाँव है" बोले वो,
"अच्छा" कहा मैंने,
"मेरे एक दोस्त की ससुराल है वहाँ" बोले वो,
"अच्छा" कहा मैंने,
"हम एक शाम चले झांसी से उस गाँव के लिए, मोटरसाइकिल थी पास, पेट्रोल आदि सब भरवा लिया था, रात से पहले पहुंच जाएँ यही सोच रहे थे हम!" बोले वो,
"हाँ, वो क्षेत्र है भी कुछ बीहड़ सा!" कहा मैंने,
"हाँ जी" बोले वो,
"अब देखो, जैसे ही हम आये सड़क से अंदर गाँव जाने के लिए, पंक्चर हो गया, अब क्या करें? कहाँ से ढूंढें कारीगर? अब न वहां बंदा और न बन्दे की जात!" बोले वो,
"अच्छा? क्या वक़्त हुआ था?" पूछा मैंने,
"आठ से ऊपर हो चुके थे" बोले वो,
"फिर क्या किया?" पूछा मैंने,
"इंतज़ार किया, रात को कोई साढ़े नौ बजे एक ट्रेक्टर दिखा, बात हुई, तो बेचारा भला आदमी था, उसकी ट्राली में चढ़ा ली मोटरसाइकिल, और चले वापिस, एक क़स्बा है वहाँ, शायद कोई मिल जाए?" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"क़स्बे पहुंचे, ट्रेक्टर वाले ने ही एक कारीगर का पता बताया, हम वहां गए, मोटरसाइकिल उतार ही ली थी, अब वहां, सारे खोमचे बंद, क्या करें? जगाया उसको, वो जागा, उसको मुसीबत बताई, उसने थोड़े दाम ज़्यादा लेते हुए, कर दिया पंक्चर ठीक!" बोले वो,
"अच्छा, तो वापिस झांसी या गांव?" पूछा मैंने,
"झांसी जाने से कोई फायदा नहीं था, और फिर ससुराल वाले भी चिंता कर रहे होंगे, तो हम वापिस गाँव के लिए चले!" बोले वो,
"अच्छा" कहा मैंने,
"हम भाग लिए बस, सरपट! मैंने रौंदी फिर गाड़ी!" बोले वो,
"तो पहुंचे गांव?" पूछा मैंने,
"सुनो तो सही?" बोले वो, अपनी नाक पोंछते हुए कपड़े से,
"बताओ?" कहा मैंने
"मोटरसाइकिल हमारी दौड़े जा रही थी, बस गाँव पहुँच जाएँ तो चैन पड़े! तो जी हम भगा रहे थे गाड़ी को, जब गाँव से कोई बीस किलोमीटर पहले पहुंचे!" बोले वो और रुके,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"अजी सामने, बीच सड़क पर, दो औरतें खड़ी हुई थीं!" बोले वो,
"औरतें?" पूछा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"रात के कितने बजे थे?" पूछा मैंने,
"पौने ग्यारह का वक़्त होगा!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"अब हम दोनों ही डरे, आज तो हो गयी भूत-बाधा, आज कैसे जान बचै? डर के मारे हम रुक गए थोड़ा पहले ही!" बोले वो,
"उसके बाद?" पूछा मैंने,
"तभी वो औरतें आने लगीं पास हमारे, हमारे तो देह में फुरफुरी दौड़ पड़ी, कि आज हुआ काम!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"वो आयीं पास, एक ने पूछा कि कहाँ जा रहे हो?" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"हमने बता दिया कि इस गाँव जा रहे हैं" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"एक बोली कि रास्ता टूटा है वहां, यहां से चले जाओ, ये छोटा रास्ता है" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"डर के मारे तो वैसे ही काँप रहे थे हम, हमने भी वो रास्ता पकड़ लिया फिर!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"लेकिन हमारी तो एक जगह जान ही निकल गयी!" बोले वो,
"कहाँ, उस रास्ते पर?" पूछा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"ऐसा क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"एक बड़े से पेड़ के नीचे लोग बैठे थे, हमारी गाड़ी की बत्ती में साफ़ साफ़ दिखे, बालक भागे हमारे तरफ, हम निकले वहां से, तो वो बालक हंस हंस कर, हमारे साथ साथ दौड़ें!" बोले वो,
"क्या?" मैंने हैरत से पूछा,
"हाँ जी, यक़ीन मानो!" बोले वो,
अब दिमाग में बजा घंटा!
कौन हैं ये लोग?
कौन हैं ये बालक?
और कौन वो औरतें?
"फिर?" पूछा मैंने,
"एक नहर सी आती है, छोटी सी, उसको पार किया तो सब पीछे रह गए, मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मुझे कुछ अलाव भी जलते दिखे वहां!" बोले वो,
बेहद ही हैरतअंगेज़!
"अच्छा, वो औरतें कैसी थीं?" पूछा मैंने,
"अजी, लम्बी-चौड़ी, ठाड़े कद की! एक हाथ मार दे तो गाड़ी से उछल कर गिर जाएँ!" बोले वो,
"ये जगह कहाँ है?" पूछा मैंने,
"हम नहीं गए जी फिर वापिस!" बोले वो,
"अच्छा, गाँव पहुंचे फिर?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, वहीँ सांस लिया फिर!" बोले वो,
"अच्छा, वो पहले वाला रास्ता टूटा था?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, उस पर रोड़े डाले गए थे उसी दिन!" बोले वो,
"रास्ते की मरम्मत हो रही होगी!" कहा मैंने,
"हाँ, यही!" कहा उन्होंने


   
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श्रीशः उपदंडक
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बात तो हैरान कर देने वाली थी! मुझ में तो सनसनी सी दौड़ गयी! मोहर सिंह बना के बोल रहे हों, ऐसा भी सम्भव नहीं था, वे सीधे और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं!
"उन औरतों की वेश-भूषा के बारे में बताइये?" पूछा मैंने,
"जी, हमने जो देखा था, या देख पाये थे वो गाड़ी की बत्ती में ही देखा था, लेकिन इतना तय है, कि उन्होंने घाघरा पहना हुआ था, राजस्थानी मान लो आप" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"और वे लोग?" पूछा मैंने,
"करीब बीस होंगे जी, उस पेड़ के नीचे बैठे थे, चार चार या पांच पांच के झुण्ड में!" बोले वो,
"हम्म" कहा मैंने,
"और वो बालक?" पूछा शर्मा जी ने,
"वो होंगे साथ आठ बरस के!" बोले वो,
"वो आपकी गाड़ी के साथ भाग रहे थे?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, खूब तेज तेज!" बोले वो,
"और होंगे कितने?" पूछा मैंने,
"कोई दस?" बोले वो,
"दस?" बोले शर्मा जी,
"हाँ दस, बारह होंगे?" बोले वो,
"तो वो नहर तक आये?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, उसको पार नहीं किया उन्होंने!" बोले वो,
"समझा!" कहा मैंने,
"जो आपका दोस्त है, वो कभी फिर उस रास्ते से आया गया? उसकी तो ससुराल है?" पूछा मैंने,
"पूछ लेता हूँ अभी" बोले वो,
सिगरेट का धुंआ छोड़ा नाक से, और मोबाइल में ढूढ़ने लगे नंबर, मिल गया तो फोन किया,
"सतीश?" बोले वो,
"हाँ मोहर!" आई आवाज़,
"यार एक बात बता, उस रात जब हमें देरी हो गयी थी, तो एक दूसरा रास्ता पकड़ा था, याद है?" बोले मोहर सिंह,
"हाँ, वो जो भूत थे?" आई आवाज़,
"हाँ हाँ! तू कभी फिर गया वहां से?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, एक बार" आई आवाज़,
"कुछ दिखा तुझे वहाँ?" पूछा उन्होंने,
"ना! कुछ ना!" बोला सतीश,
"वो पेड़ है अभी?" पूछा उन्होंने,
"हाँ है" बोला सतीश,
"चल ठीक है, बाद में करता हूँ फ़ोन" बोला उन्होंने और काट दिया,
"देखा कुछ नहीं जी, पेड़ है वहाँ" बोले वो,
"कोई गाँव है आस पास?" पूछा मैंने,
"वहां तो कोई न!" बोले वो,
"तो बनाओ कार्यक्रम?" बोला मैं,
"वहाँ जाने का?" पूछा उन्होंने चौंक कर,
"हाँ?" कहा मैंने,
"कोई उंच-नीच ना हो जा!" बोले वो,
"हम ना बैठे उसके लिए?" बोले शर्मा जी,
"वो तो ठीक है, चलो, बनाता हूँ, सतीश से बात करता हूँ कल!" बोले वो,
"ठीक है कर लीजिये" बोला मैं,
इतनी बात हो, खा-पी, हम लौट आये!
अगले दिन शर्मा जी मिले मुझसे,
बैठे,
"वैसे क्या माला हो सकता है ये?" पूछा उन्होंने,
"पहली नज़र में तो प्रेत हैं वो" कहा मैंने,
"हाँ" कहा उन्होंने,
"दूसरी बात, वे भले लगते हैं!" बोला मैं,
"वो जो रास्ता बताया उस लिए?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, नहीं तो उन्हें क्या ज़रूरत?" बोला मैं,
"हाँ, सही बात है!" कहा उन्होंने,
"अब देखना ये है कि वो हैं कौन?" कहा मैंने,
"वो तो वहीँ पता चलेगा?" बोले वो,
"हाँ, वहीँ जाकर!" कहा मैंने,
"आज करूंगा मोहर सिंह से बात!" बोले वो,
"हाँ, कीजिये!" कहा मैंने,
"वैसे इतने सारे प्रेत, एक साथ?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, यही तो बात है!" कहा मैंने,
"कोई गाँव भी नहीं है वहाँ?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तो ये आये कहाँ से?" पूछा उन्होंने,
"ये नहीं पता!" कहा मैंने,
"और वैसे भी वो इलाका ही मुझे ऐसा लगता है सारा!" बोले वो,
"खुला है, पथरीला है!" कहा मैंने,
"हाँ, रास्ते भी खराब हैं" कहा उन्होंने,
"अब शायद बन गया हो?" कहा मैंने,
"हो सकता है" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसी दिन दोपहर में शर्मा जी ने बात कर ली थी मोहर सिंह से, और मोहर सिंह ने सतीश से, दो दिन बाद जाना था, गाड़ी रात की थी, आराम से सो कर जाते, सुबह उठ ही जाते दतिया पर, यहां हमें लेने सतीश के भाई आने वाले थे,
मैंने इधर कुछ आवश्यक तैयारियां कर ली थीं, कुछ आवश्यक सामान आदि भी रख लिया था, अपने तंत्राभूषण भी अभिमंत्रित कर लिए थे!
जिस दिन हम वहां गए, मौसम का मिजाज़ बदलने लगा था, रात को भी बारिश पड़ी थी, खैर, हम तो सो ही रहे थे चादर तान! गाड़ी देर से पहुंची, कुछ तकनीकी-गड़बड़ आ गयी थी, खैर, हम सात बजे, उतर गए थे सुबह ही!
बाहर आये तो उन्होंने अपने भाई को फ़ोन किया, भाई उनके, गाड़ी लेकर आ गए थे, यहां से सीधा ससुराल ही जाना था हमें, सतीश ने वहाँ तैयारियां करवा दी थीं! उनके भाई से नमस्कार हुई, कुल्ला आदि किया और फिर वही स्टेशन के पास ही, चाय-नाश्ता भी कर लिया था!
उसके बाद हम रवाना हुए सतीश की ससुराल के लिए! वही बातें, फिर से छिड़ गयीं, दोहरा दी गयी घटना फिर से एक बार और!
"वो जगह याद है? जहाँ वो औरतें मिली थीं?" पूछा मैंने,
"हाँ जी!" बोला सतीश,
"वहाँ रुकना ज़रा!" कहा मैंने,
"ज़रूर!" बोला वो,
गाड़ी आराम आराम से चलानी पड़ रही थी, रास्ता खराब था, कहीं कहीं तो रुकना ही पड़ता था!
"काम हो गया है शुरू यहां" बोला वो,
"अच्छा" कहा मैंने,
"अब सड़क बन जायेगी" बताया उसने,
"ठीक" कहा मैंने,
अब एक क़स्बा पड़ा, गाड़ी रोक ली, कुछ फल आदि खरीदने थे उन्हें, सतीश और उनका भाई चल पड़े, क़स्बा ऐसा था जैसे अभी भी अठारहवीं सदी में रुका हुआ वो! वहां के बेचारे लोग, ऐसे प्रतीत होते थे जैसे बस वक़्त को धक्का दे रहे हों!
खैर, सामान आदि खरीद लिया गया,
और गाड़ी फिर से आगे बढ़ चली!
"ये ही जगह है जी, जहां पंक्चर जुड़वाया था!" बोले मोहर सिंह,
"अच्छा!" कहा मैंने,
बातचीत चलती रही, कुछ गाँव की, कुछ शहर की और कुछ राजनीति की! करीब एक घंटे के बाद, गाड़ी एक जगह रुकी!
"यहां मिली थीं जी वो!" बोले मोहर सिंह,
हम उतरे बाहर,
देखा आसपास,
दूर दूर तक सन्नाटा!
इंसान तो छोड़िये, एक जानवर भी नहीं!
"और उनके द्वारा बताया रास्ता कौन सा है?" पूछा मैंने,
"वो उधर है" बोले वो,
"वहीँ से चलो!" कहा मैंने,
"जी" बोला सतीश!
अब बढ़ी आगे गाड़ी,
"ये हुआ रास्ता शुरू!" बोले सतीश,
"अच्छा!" कहा मैंने,
मैं आसपास नज़रें दौड़ा रहा था, कि कोई खंडहर आदि मिल जाए, या कोई इंसानी-त'आमीर कोई दूसरी जगह, लेकिन वहां तो सपाट से, परतदार पत्थर थे! और कुछ नहीं! दूर दूर तक, कुछ नहीं!
"चलते रहो!" कहा मैंने,
"हाँ" बोले वो,
करीब बीस मिनट के बाद, एक पेड़ के नीचे उन्होंने गाड़ी लगाई,
"देखो जी, ये है वो पेड़!" बोले मोहर जी,
"अच्छा!" कहा मैंने,
और उतरा मैं गाड़ी से, संग शर्मा जी भी, मोहर भी आ गए!
"यहां बैठे थे वो सब!" बताया सतीश ने,
मैंने पेड़ देखा, बड़ा मज़बूत और पुराना पीपल का पेड़ था वो! देखने में तो करीब दोसौ साल से ज़्यादा का लगता था!
"पेड़ बहुत बड़ा है!" बोले शर्मा जी,
"हाँ, ऊंचाई देखो?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"मोहर जी?" बोला मैं,
"जी?" बोले वो और आये पास मेरे,
"वो बालक यहीं थे सारे?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, यहीं खेल रहे थे!" बताया उन्होंने,
"और यहीं से पीछे भागे थे?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, साथ साथ!" बताया उन्होंने,
"आप हटिये ज़रा, मैं देखता हूँ कुछ!"
"देख लो आप" बोले वो, और लौटे सभी,
शर्मा जी वहीँ रह गए मेरे पास ही!
मैंने मिट्टी उठायी,
मुट्ठी में बंद की,
अभिमंत्रित की,
फूंका उसे, और फूंक मार, उड़ा दिया!
मिट्टी हवा चलते हुए भी उड़ी नहीं! वहीँ गिर पड़ी!
"हाँ शर्मा जी!" कहा मैंने,
"क्या पता चला?" पूछा उन्होंने,
"यहां और भी अस्तित्व हैं हमारे सिवाय!" कहा मैंने,
"पक्का?" बोले वो,
"हाँ, पक्का!" कहा मैंने,
"एक मिनट रुकिए" बोले वो, और चले गाड़ी तक,
ले आया पानी, दिया मुझे, मैंने आँखें साफ़ कीं, शर्मा जी ने भी साफ़ कीं, और तब मैंने कलुष का प्रयोग किया,
नेत्र पोषित हुए,
और खोले नेत्र!
लेकिन कोई नहीं वहाँ!
कोई भी नहीं!
पहले जैसा ही सन्नाटा!
"कोई नहीं?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"इसका मतलब......." बोले वो,
"हाँ वही मतलब!" कहा मैंने, कलुष को वापिस लेते हुए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"चलिए अभी तो चलते हैं!" कहा मैंने,
"चलो" बोले शर्मा जी,
हम हुए वापिस, आये गाड़ी तक बैठ गए, सतीश ने सिगरेट बढ़ा दी आगे, मैंने निकाली और लगा ली, छोड़ा धुँआ खिड़की से बाहर!
"लो!" बोला मैं शर्मा जी से,
"मैं नहीं पीता सिगरेट!" बोले वो,
"अरे ले लो यार, मैं कौन सा पीता हूँ!" कहा मैंने,
और दे दी उन्हें सिगरेट!
"कुछ पता चला?" पूछा मोहर ने,
"नहीं जी!" कहा मैंने,
"तो कहीं से डोल आये होंगे?" बोले वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"अब घर कितना है सतीश?" पूछा शर्मा जी ने,
"कोई आधा घंटा बस" बोला वो,
"मोहर जी?" कहा मैंने,
"हाँ जी?" बोले वो,
"जब आप यहां आये थे, तो क्या बजा होगा?" पूछा मैंने,
"करीब साढ़े ग्यारह के करीब" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"शर्मा जी?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"आज कब चलें फिर?" पूछा मैंने,
"दस तक आ जाओ?" बोले वो,
"ये ठीक है!" कहा मैंने,
"कितने बजे? दस?" बोले मोहर जी,
"हाँ जी!" कहा मैंने,
"ठीक है साहब!" बोले वो,
बातें करते करते हम आ गए घर, सभी इंतज़ार ही कर रहे थे, सभी से मिले, सतीश के साले भी आ गए था, लोग भले हैं बहुत, भले ही देहाती हैं, लेकिन आजकल देहाती होना ही सबसे मुश्किल काम है!
पहले नहाये धोये, फिर दूध आ गया, दूध पिया, अब देहात के दूध के बारे में मैं क्या कहूँ! इस से बढ़िया और कुछ है ही नहीं! दो गिलास छाँक गया मैं तो! दो ही गिलास शर्मा जी!
आई डकारें!
खुला पेट!
"वाह जी वाह!" बोले शर्मा जी, कटोरी में से दूध की मलाई खाते हुए!
"बढ़िया!" कहा मैंने,
"आप खाओ जी?" बोला सतीश,
"अभी खाता हूँ!" कहा मैंने,
पेट में जगह बनी तो मलाई खायी मैंने, क्या स्वाद! गाँव याद आ गया! जब बरोसी में औटते दूध की मोटी मोटी मलाई उतार, खिलाई जाती थी! अब कहाँ बचा वो खान-पीन! सब हाइब्रिड, वैक्सीन्स, इंजेक्शन, यूरिया आदि!
खैर,
उसके बाद आराम किया हमने, थोड़ी नींद ली, करीब तीन बजे उठे हम!
"खाना तैयार है जी!" सतीश बोला,
"चलो" बोले शर्मा जी,
अब चले खाना खाने, दही, दाल, आचार प्याज और लाल-मिर्च और लहसुन की चटनी, और मटर-गाजर की सब्जी! चूल्हे पर बनी हुई! चूल्हे की, हाथ वाली, पानी वाली रोटियां! देखते ही, पेट में सूराख खुद गया!
जम के खाना खाया साहब! पेट गले तक भर गया!मैं तो हाथ धोकर, कुल्ला कर, जा बैठा एक कुर्सी पर! शर्मा जी भी पेट पर हाथ फेरते हुए आ गए! बैठ गए!
"भाई बहुत खाया!" बोले वो,
आई डकार!
"हाँ!" कहा मैंने,
"यहां आदमी रह ले, तो सीधा हो जाए!" बोले वो,
"खाना मिलावटी नहीं है न!" कहा मैंने,
"अब करना है आराम!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
दरअसल मुझे भी खाने का नशा होने लगा था!
हम, अंदर आ, पसर गए पलंग पर!
"मिठाई लोगे?" पूछा सतीश ने,
"अभी नहीं!" बोले वो,
"अच्छा जी!" बोला वो,
"सतीश?" शर्मा जी बोले,
"हाँ जी?" वो रुका और बोला,
"यार बीड़ी मिल जाएंगी?" पूछा शर्मा जी ने,
"अजी बहुत! कौन सी?" पूछा उसने,
"जो मर्ज़ी यार!" बोले वो,
"लाया अभी!" बोला और चला गया!
"जगह बढ़िया है!" बोले वो,
"बीहड़ भी तो है!" कहा मैंने,
"हाँ ये तो है" बोले वो,
"जैसा धौलपुर है न, कुछ ऐसा है!" कहा मैंने,
"बिलकुल!" बोले वो,
बीड़ी ले आया था सतीश चार बंडल! चार ही माचिस!
"अबे! इतने की क्या ज़रूरत थी!" बोले वो,
"अरे कोई बात नहीं!" बोला वो,
कुछ देर चुप्पी!
"वैसे कलुष नहीं चला, क्यों?" पूछा उन्होंने,
"कोई है जो काट कर रहा था!" कहा मैंने,
"वो तो ठीक है, लेकिन काट क्यों रहा था?" पूछा उन्होंने,
"ये भी लगा जाएगा पता!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"दस बजे चलोगे जी?" पूछा सतीश ने,
"हाँ, दस बजे!" बोले शर्मा जी,
"कुछ होगा तो नहीं?" पूछा उसने,
"अरे नहीं!" बोले वो,
"फिर ठीक है!" बोला वो,
"तैयार रहना!" बोले शर्मा जी,
"जी" बोला वो,
उठा, और चल दिया बाहर!


   
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श्रीशः उपदंडक
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तो रात दस बजे का समय निर्धारित हो चुका था, मैंने इस बीच कुछ आवश्यक वस्तुएं रख ली थीं अपने पास, जैसे कि अभिमंत्रित भस्म इत्यादि, इनकी आवश्यकता पड़ सकती थी, प्रेत-मंडल एक सा ही कार्य करे, ऐसा सम्भव नहीं, सभी की अपनी अपनी फ़ितरत हुआ करती है, कोई उग्र है तो कोई सौम्य, इसी कारण से ये वस्तुएं रखी गयी थीं!
इस तरह रात के बजे दस, अँधेरा छाया था हर तरफ! हाथ को हाथ न दीखे, ऐसा घुप्प अँधेरा! हम तैयार हुए, सतीश जी और मोहर जी भी तैयार थे, तो हमने मोटरसाइकिल निकाल लीं, वो जगह ज़्यादा दूर तो थी नहीं, आराम से जाया जा सकता था!
"कुछ और तो नहीं रखना?" पूछा शर्मा जी ने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"छोटा बैग ही काफी है?" पूछा उन्होंने,
"हाँ!" कहा मैंने,
मैंने मोटरसाइकिल की स्टार्ट और हम चल पड़े, साथ हमारे सतीश और मोहर सिंह, दोनों चल पड़े, उनके मन में कोई चिंता नहीं थी, ये एक अच्छी बात थी, इस से मेरा ध्यान नहीं बंटता! नहीं तो एक पाँव उधर और एक पाँव इधर, संतुलन खराब ही रहा करता है!
करीब आधा घंटा बीता, और वो जगह आने लगी पास, मैंने मोहर जी को आगे रहने के लिए कह दिया था, हम पीछे पीछे थे उनके, गाड़ी आराम से ही चला रहे थे हम, जल्दबाजी थी नहीं, और फिर रास्ते भी ऐसे थे, कि गलबहियां करने को तैयार! गड्ढे ऐसे ऐसे कि पहिया घुस जाए तो लगे अब घुसे पाताल में!
खैर, करीब दस पचास पर, हम उस जगह आ पहुंचे, टोर्च ले ही आये थे, उस पेड़ तक आये, आसपास देखा, पेड़ के नीचे देखा, कोई नहीं था वहाँ! सारा स्थान वो, सुनसान पड़ा था, कुछ था तो बस कीड़े-मकौड़ों की आवाज़ें! और कुछ भी नहीं!
"यही पेड़ है न?" पूछा मैंने,
"हाँ, यही है" बोला सतीश,
"अच्छा, देखता हूँ!" कहा मैंने,
मैंने आसपास, आगे-पीछे, जा जाकर देखा, वहां तो कुछ नहीं था, केवल सन्नाटा और अँधेरा, जो आपस में बाहें फंसाये एक-दूसरे की दोस्ती का परिचय दे रहे थे! करीब आधा घंटा हम वहां रुके, लेकिन कुछ नहीं मिला वहाँ!
"यहां तो कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा शर्मा जी ने,
"वहां चलते हैं जहां वो औरतें मिली थीं!" कहा मैंने,
"क्यों मोहर साहब?" पूछा शर्मा जी ने मोहर जी से,
"चलो, कोई बात नहीं!" बोले वो,
"तो चलो!" कहा मैंने,
मोटरसाइकिल स्टार्ट कीं, और चल पड़े आगे के लिए! धीरे धीरे चल रहे थे, आसपास देखते हुए, क्या पता, कुछ दिख ही जाए!
पूरे रास्ते, कुछ न दिखा, बस वही, जो गाड़ी की बत्ती में नज़र आता था, कुछ सूखे से पेड़ पौधे, और वो पथरीला रास्ता! बस, और कुछ नहीं!
करीब एक घंटे में, हम उस जगह भी आ गए, अब वहां से बाएं होना था, तो बाएं हुए, और इस तरह, फिर उस जगह आ पहुंचे जहां, वो औरतें मिली थीं! गाड़ी रोक दीं, उतरे और हुए साथ,
"यही जगह है न?" पूछा मैंने,
"हाँ जी" बोला सतीश,
"ठीक" कहा मैंने,
आसपास टोर्च की डाली रौशनी, कुछ नहीं जी वहाँ! बस सन्नाटा!
"कुछ नहीं है!" कहा मैंने,
"कमाल है!" बोले शर्मा जी,
"शर्मा जी?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"ज़रा आइये मेरे साथ?" कहा मैंने,
"चलिए" बोले वो,
और हम चल पड़े,
"हम यहीं रहें?" चिल्ला के पूछा मोहर जी ने,
"हाँ, आते हैं अभी!" कहा मैंने,
और हम चल दिए आगे, एक जगह रुके,
"यहां तो कुछ नहीं है!" कहा मैंने,
"इसका मतलब?" पूछा उन्होंने,
"मतलब ये कि?" बोला मई,
"क्या?" पूछा उन्होंने,
"एक मिनट!" बोला मैं,
मैंने कान लगाये, कुछ सुनाई दिया था मुझे अचानक से!
"सुनो ज़रा?" कहा मैंने,
उन्होंने भी कान लगा दिए अपने, गौर से सुनने लगे,
दो मिनट,
तीन मिनट,
"सुनाई दिया?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"क्या है?" पूछा मैंने,
"कोई लोक-गीत सा है!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
शुक्र था, मैंने सोचा था कि कहीं मेरे ही कान तो नहीं बज रहे?
"लेकिन ये आ कहाँ से रहा है?" पूछा उन्होंने,
"एक मिनट!" बोला मैं,
सच में, जहां भी, जिस दिशा में भी पलट जाओ, कान लगाओ, आवाज़, एक हल्की सी, मद्धम सी, सुनाई देने लगती थी! कोई लोक-गीत गा रहा था, कुछ औरतें मिलकर!
"सुनो?" बोले वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"शायद उधर से?" बोले वो,
दक्षिण की तरफ इशारा किया था उन्होंने,
"रुको!" कहा मैंने,
अब चारों तरफ कान लगाये, तो दक्षिण में ही आवाज़ तेज सी गूंजी!
"आओ ज़रा!" कहा मैंने,
"चलिए!" कहा उन्होंने,
हम चले, रास्ता पार किया, और रुके,
"सुनो?" बोला मैं,
गौर से सुना उन्होंने,
करीब दो मिनट,
"हाँ, यहीं से आ रही है!" बोले वो,
"आओ!" कहा मैंने,
अब जहाँ हम चले, वहाँ पत्थर ही पत्थर थे, सपाट से पत्थर!
"चढ़ो!" कहा मैंने,
उनको पहले चढ़ाया मैंने एक ऊंची जगह, फिर मैं चढ़ा,
"चलो आगे!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
और हम आगे चले,
"रुको?" बोले वो,
"क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"वो?" बोले वो,
"क्या वो?" पूछा मैंने,
"वहां देखो?" इशारा किया उन्होंने,
मैंने वहीँ देखा, चौंक पड़ा!
"ये क्या है?" पूछा मैंने,
"जुगनू तो हैं नहीं!" बोले वो,
"हाँ, हिल नहीं रहे हैं!" कहा मैंने,
"तो क्या है ये?" पूछा उन्होंने,
"रुको!" कहा मैंने,
अब ध्यान से देखा उधर! दूर, बहुत दूर, जैसे आग जल रही थी जगह जगह!
"अलाव!" बोले वो,
झटका लगा!
"हाँ! सही कहा! अलाव!" बोला मैंने,
"लेकिन बहुत दूर हैं!" बोले वो,
"कोई बात नहीं, चलो, आओ!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
और हम चल पड़े, उस वीराने में,
"रुको!" बोला मैं,
रुक गए वो!
"क्या हुआ?" पूछा उन्होंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"वो अलाव ही हैं न?" पूछा उन्होंने,
"ऐसा ही लगता है!" कहा मैंने,
"लेकिन?" बोले वो,
"क्या लेकिन?" पूछा मैंने,
"वो तो लगता है बहुत दूर हैं?" बोले वो,
"हाँ, चलो, देखते तो हैं?" कहा मैंने,
"चलो" बोले वो,
हम टोर्च की रौशनी में आगे बढ़ते रहे! हम कम से कम आधा घंटा चले, लेकिन लगता था जैसे वो अलाव हमसे और दूर हुए जा रहे हैं! न उनका आकार ही बढ़ रहा था, न वो पास ही दीख रहे थे!
"रुको!" कहा मैंने,
वो हांफ चले थे अब तक, मुझे प्यास लगी थी बहुत!
"ये तो जैसे कोई छलावा है!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"क्या करें?" पूछा मैंने,
"वापिस चलते हैं, मोटरसाइकिल लेते हैं, क्यों?" बोले वो,
सुझाव तो बढ़िया था! तो देर किस बात की!
"चलो फिर!" कहा मैंने,
और हम लौट चले,
पीछे देखा, तो हैरत में पड़े हम!
"देखो? कुछ नहीं है अब?" बोले वो,
"सारे एक साथ ही गायब?" बोला मैं,
"हाँ!" कहा उन्होंने,
"ये क्या माज़रा है भला?" पूछा मैंने,
"वापिस चलो, वहीँ से पता चलेगा!" कहा उन्होंने,
"चलो फिर!" बोला मैं,
और हम जैसे दौड़ लिए वहां से!
पहुंचे वहाँ, वे दोनों वहीँ एक बड़े से पत्थर पर बैठे थे, बीड़ी खींच रहे थे!
हमें देखा, तो खड़े हो गए! कपड़े झाडे अपने!
"कुछ दिखा?" पूछा सतीश ने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"क्या?" हैरत से पूछा उसने,
"कुछ अलाव से!" बोला मैं,
"अलाव?" चौंक के पूछा,
"हाँ, अलाव!" कहा मैंने,
"सतीश?" बोले शर्मा जी,
"जी?" बोला वो,
"क्या उधर, उधर के लिए कोई रास्ता है?" पूछा शर्मा जी ने,
"हैं एक" बोला वो,
"तो चलो ज़रा!" बोले शर्मा जी,
"चलो जी!" बोला वो,
मोटरसाइकिल कीं स्टार्ट, और चल पड़े वहां के लिए, रास्ता ऐसा बेकार कि गिर जाओ तो हड्डी अपनी जगह से हट कर, हंसी-ठिठोली करे दर्द बन कर!
"क्या रास्ता है!" बोले शर्मा जी,
"हाड़तोड़ रास्ता है!" कहा मैंने,
"ओले-गोले बच जाएँ बस!" बोले वो,
मैं हंस पड़ा! बहुत तेज! रास्ता ही ऐसा था!
हम कम से कम चार किलोमीटर चले होंगे, कि रास्ते में पत्थर मिलने लगे, जैसे रखे गए हों, बड़े बड़े! रुकना पड़ा हमें! उतरे हम सभी!
"ये क्या?" बोले मोहर जी,
"क्या?" बोला सतीश,
"यहां क्या बारिश हुई है पत्थरों की?" बोले वो,
ऐसा ही कुछ लगा था मुझे भी!
"इतने बड़े पत्थर, यहां कौन छोड़ गया?" बोले शर्मा जी,
"वाक़ई!" कहा मैंने,
मोहर जी ने, आगे टोर्च मारी, पत्थर ही पत्थर!
"न जी! कोई रास्ता नहीं!" बोले वो,
और सच में, कोई रास्ता नही था वहां, पत्थर बेतरतीबी से बिखरे पड़े थे, मोटरसाइकिल तो क्या, ट्रक भी नहीं जा सकता था वहाँ से!
"अब?" बोले मोहर जी,
"अब क्या?" बोला सतीश.
"अब चलो वापिस, सुबह देखते हैं!" कहा मैंने,
"चलो जी!" बोले मोहर जी!
और हम हुए वापिस! कोई चारा नहीं था!
"ये पत्थर आये कहाँ से?'' पूछा शर्मा जी ने,
"पता नहीं, शायद भराव के लिए लाये गए हों?" कहा मैंने,
"ये हो सकता है!" बोले वो,
"नहीं तो ऐसे कौन लाएगा?'' बोला मैं,
"हाँ, गड्ढे भरने के लिए!" कहा उन्होंने,
"हाँ!" कहा मैंने,
हम वहीँ आ गए, जहाँ वो औरतें मिली थीं, वहां से, उसी रास्ते पर मुड़ लिए, चलते गए, और जैसे ही उस पेड़ के नीचे पहुंचे, सभी के होश हुए फ़ाख्ता! उस पेड़ के नीचे एक बड़ा सा अलाव जल रहा था! लेकिन कोई था नहीं वहां!
हम उतरे गाड़ी से, और मैं चला उस अलाव की तरफ! शर्मा जी भी आ गए, और उनके साथ दौड़े दौड़े वे दोनों भी, उनको तो जैसे काठ मार गया था! मारे भय के, काँप ही पड़े थे दोनों ही!
"ये किसने जलाया?" बोले शर्मा जी,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
मैं नीचे बैठा, अलाव की लकड़ियाँ देखीं, कुछ लकड़ियाँ अलग पड़ी थीं, भारी तपिश उठ रही थी उसमे से, मैंने एक सूखी लकड़ी उठायी, और उसको देखा गौर से,
"ये तो बेरी की लकड़ी है!" कहा मैंने,
"बेरी की?" बोले शर्मा जी,
"हाँ, देखो?" कहा मैंने,
उन्होंने ली लकड़ी और देख उसे,
"हाँ, वही है!" बोले वो,
"सतीश?" बोला मैं,
"ह...ह.....हाँ जी?" बोला वो,
"इधर आओ?" कहा मैंने,
कटी सी टांगों से, वो आगे बढ़ा, आया मेरे पास,
"यहां कहीं बेरी के पेड़ हैं?" पूछा मैंने,
"हैं जी!" बोला वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"अंदर जंगल में" बोला वो,
"कितनी दूर?" पूछा मैंने,
"करीब दो किलोमीटर?" बोला वो,
"दो किलोमीटर?" बोला मैं,
"जी" कहा उसने,
"शर्मा जी?" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
"अब तो वक़्त नहीं, कल देखते हैं!" बोला मैं,
"ठीक!" कहा उन्होंने,
"चलो फिर!" बोला मैं,
और हम चल पड़े वापिस वहां से,
अब ये जो खेल था, बेहद दिलचस्प था! ऐसा कब से हो रहा था, पता ही नहीं था, कौन कर रहा था, ये भी पता नहीं था! लेकिन था जो कुछ भी, अजब-गज़ब था!
"शर्मा जी?" बोला मैं,
"हाँ?" जवाब दिया,
"ये शायद, उदभेद है!" बोला मैं,
"उदभेद?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, ये पहला साबका होगा हमारा!" कहा मैंने,
वे दोनों, कुछ न समझ सके! मुंह ही ताकते रहे हमारा!
उदभेद! अर्थात, एक नियत खेल!
जो, लगातार खेल जाता है, किसी तिलिस्म को गढ़ने से पहले!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उदभेद! मित्रगण! जब भी कोई तिलिस्म रचा जाता है, तो एक कच्चा खेल खेल जाता है! उसमे कौन सा किरदार कहाँ रखना है, उसका क्या कार्य है, कहाँ से आरम्भ होना है उसका किरदार और कहाँ अंत होना है, इसकी रूप-रेखा बनाई जाती है! अब मैं समझ रहा था, कि, वो अलाव कौन से थे! क्यों लगातार दूर होते जा रहे थे! दरअसल वो अलाव थे ही नहीं! वो छाया मात्र ही थे! एक भृंश! यही है उदभेद! कोई माहिर, कुशल खिलाड़ी, तिलिस्मबाज़ ही ऐसा प्रबल तिलिस्म गढ़ने का माद्दा रखता है! ये अलाव जो जल रहा था, ये दरवाज़ा था उस तिलिस्म में घुसने का! यहां, हमारी मर्ज़ी थी, या तो लौट जाओ, या फिर इस तिलिस्म को भेद डालो!
मैंने यही सबकुछ शर्मा जी को बताया, उन्हें भी हैरत हुई, इस बीहड़ में क्यों कोई तिलिस्म रचेगा? उसको क्या आवश्यकता!
"क्या आवश्यकता?" पूछा उन्होंने,
"ये तो मैं, इस वक़्त नहीं जानता!" कहा मैंने,
"या तो धन हो, या कोई ऐसा कार्य जो शेष रहा हो?" बोले वो,
"हाँ, दोनों ही कारण हो सकते हैं!" कहा मैंने,
"क्या कहते हो?" बोले वो,
"इसमें खतरा है!" कहा मैंने,
"एक खतरा और सही?" बोले वो,
"आप तैयार हो?" पूछा मैंने,
"बिलकुल!" बोले वो,
"तो ठीक है! हम करते हैं इसमें प्रवेश!" कहा मैंने,
और कुछ बातें हुईं, और उसके बाद हम, वापिस हो गए सतीश की ससुराल के लिए! वहां पहुंचे, हाथ-मुंह धोये और सो गए! अब कल सुबह ही, तड़के ही, हमे इस काम पर लग जाना था!
सुबह पांच बजे,
हम सब तैयार हो गए, स्नान-ध्यान कर लिया था, दूध और कुछ सूखे हुए बेर खा लिए थे, और उसके बाद, हम निकल पड़े वहां से, वहां से सीधा उसी पेड़ तक आये, जहां कल अलाव जला था, आज कुछ नहीं था, बस पीली सी मिट्टी ही थी!
"सतीश?" बोले शर्मा जी,
"जी?" वो आगे आते हुए बोला,
"वो बेरी के पेड़ कहाँ हैं?" पूछा उन्होंने,
"आओ, दिखाता हूँ" बोला वो,
अपनी मोटरसाइकिल की स्टार्ट और हम ने भी की, चल पड़े उसके साथ साथ, अब हम पीछे मुड़े, और चले सीधा अब, उसी रास्ते पर, पर इस बार, दूसरी दिशा में! करीब डेढ़ किलोमटर चलने के बाद, एक कच्चे से रास्ते पर उतर गए, वहां चले, दायीं तरफ, रास्ता बड़ा ही खराब था, बड़ी बड़ी नालियां सी बनी थीं, वहाँ उतरना पड़ता था और फिर से चलना पड़ता था, यहां मोर बहुत दिखे, बहुत ही सारे, उनके शोर से, जंगल का वो हिस्सा ज़िंदा हो पड़ा था!
"बड़े मोर हैं यहां?" बोले शर्मा जी,
"हाँ जी!" बोला सतीश,
"कोई उपवन है क्या?'' पूछा शर्मा जी ने,
"नहीं जी, जंगल है!" बोला वो,
हम सीधा चलते रहे, पहुंचे एक जगह, आसपास देखा, बड़ा ही डरावना सा दृश्य था वो तो! कोई भी ऐसा पेड़ नहीं था बरगद का या पीपल का, जिसकी शाखों ने, सांप का सा रूप न लिया हो! कोई भी पेड़ नहीं था ऐसा!
"सारे पेड़ देखो?" कहा मैंने,
"हाँ, ऐसा नहीं देखा कभी!" बोले वो,
"बड़े ही अजीब से हैं!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले शर्मा जी,
और हम आगे बढ़ते चले!
आगे पहुंचे, तो पेड़ जैसे एक दूसरे के पास होते चले गए!
"कैसी अजीब सी जगह है?" कहा मैंने,
"यहां कोई नहीं आता!" बोले सतीश,
"कौन आएगा यहां?" बोले शर्मा जी,
मोहर जी, चुपचाप, हमारे साथ, क़दम साधे आगे बढ़ते जा रहे थे!
तभी सामने एक अजीब सा पेड़ देखा!
"रुको?" बोला मैं,
सभी रुक गए,
"क्या हुआ?" बोले शर्मा जी,
"वो पेड़ देखना ज़रा?" बोला मैं,
वो आगे गए, और पेड़ को देखा,
काफी देर तक!
मैंने भी देखा, उस पेड़ में सम्मोहन सा था!
"ये कैसा अजीब पेड़ है?" बोले शर्मा जी,
"हाँ!" कहा मैंने,
"इसकी शाखें ऐसी हैं, जैसे किसी ने स्त्री का रूप दिया हो!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
हाँ मित्रगण!
उस पेड़ की शाखें ऐसी थीं, जैसे स्त्री किसी नृत्य की मुद्रा में अपना एक पाँव उठाये, घुटना मोड़े, अपनी जंघा पर रखा हो, दूसरे पाँव की! ऐसी करीब चौदह सी आकृतियाँ थीं वहां! अगर गौर से देखो, तो ही पता चलता था!
"सतीश?" बोले शर्मा जी,
"हाँ जी?" बोला वो,
"इस जगह का नाम क्या है?" पूछा उस से,
"जंगल ही कहते हैं जी!" बोले वो,
कोई सटीक उत्तर नहीं मिला!
"आगे चलो!" कहा मैंने,
अब आगे चले,
वहाँ पहुंचे, तो ज़मीन बंजर सी हो चली!
रुके हम सब वहीँ!
"वो सामने हैं जी बेरी के पेड़!" बोला सतीश,
"चलो फिर!" कहा मैंने,
और हम चल पड़े,
रास्ता पत्थरों से भरा पड़ा था, आराम से ही चले,
जा पहुंचे वहाँ,
वहां, करीब दस या बारह पेड़ रहे होंगे बेरी के, कुछ अब ठूंठ हो चले थे! बेर किसी पर भी नहीं लगे थे, सभी पत्तों को छोड़ बैठे थे, लगता था कि जैसे बस उन्हीं पर ही पतझड़ की मार पड़ी हो! पत्ते थे भी, तो छोटे छोटे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो सभी पेड़, काफी पुराने थे, अजीब से रूप में मुड़े हुए थे, नहीं तो बेरी का पेड़ कभी-कभार ही मुड़ता है ऐसे, लेकिन यहां तो सभी मुड़े हुए थे, पत्ते लगभग थे ही नहीं उन पर, पास लगे पापड़ी और सेंधल के पेड़ हरियाली से झूम रहे थे! लेकिन इन पर पतझड़ आया हुआ था!
"बड़ी हैरत की बात है?" कहा मैंने,
"हाँ, इन्हें जैसे लकवा मार गया है?" बोले वो,
"हाँ, अजीब से पेड़ हैं सारे!" कहा मैंने,
"हाँ, ज़रा आसपास का मुआयना करें!" बोले वो,
"हाँ, आओ ज़रा!" कहा मैंने,
और हम चल पड़े मुआयना करने आसपास का, हम सीधे ही चले, ये बीहड़ ही था, पत्थर ही पत्थर, दोपहर तक तो यहां ऐसी गर्मी पड़ती कि बदन का सारा पानी ही निचुड़ जाता! अच्छा हुआ था कि हम अल-सुबह ही आन पहुंचे थे!
"ये देखना?" बोले वो,
"क्या है?" पूछा मैंने,
"ये मिट्टी कुछ अजीब सी नहीं?" बोले वो,
मैं नीचे बैठा, मिट्टी को देखा, हाथ में लिया, मिट्टी बड़ी ही भुरभुरी सी थी, पीले रंग की सी मिट्टी थी वो, हाथ में निशान नहीं छोड़ती थी और चिपकती भी नहीं थी, ऐसी मिट्टी कहीं कहीं ही पायी जाती है!
वे भी बैठ गए नीचे,
"है न अजीब?" बोले वो,
"हाँ, यहां के भूगोल से नहीं मिलती!" कहा मैंने,
"हाँ, जैसे कहीं और से लायी गयी है!" बोले वो,
"आओ, आगे चलें!" कहा मैंने,
"चलिए!" बोले वो,
और हम दोनों खड़े हुए, आगे चले, आगे, कुछ घने से पेड़ लगे थे, वहीँ चल दिए, यहां सीरक थी, अच्छा लगा, गर्मी तो तभी से पड़ने लगी थी, यहां कुछ आराम मिला!
कुछ देर ठहरे हम, आसपास देखा,
"वो देखना ज़रा?" बोले वो,
"क्या है?" पूछा मैंने,
"वो कोई चबूतरा सा है?" बोले वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"वो, उधर" इशारे से बताया उन्होंने,
वो एक चबूतरा सा ही लग रहा था देखने में तो,
"आना ज़रा?" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
हम जा पहुंचे वहां, ये एक चबूतरा ही था, लेकिन अब तो ज़मीन में धंसा हुआ था, इसका मतलब, ये बेहद पुराना था, पत्थर भी वहीँ का था, छैनी-हथौड़े से काटा गया था उसे, कहीं कहीं गहरे निशान भी थे उस पर, ये ढाई फ़ीट चौड़ा और करीब सात फ़ीट लम्बा था,
"है न?'' बोले वो,
"हाँ, वही है!" कहा मैंने,
"और देखें?" बोले वो,
"हाँ, आओ!" कहा मैंने,
हम और आगे चल दिए, और तब एक जगह रुक गए हम! वहाँ कुछ बड़े बड़े पत्थर पड़े थे, उन पत्थरों में जो निशान थे, वो बड़े ही अजीब से थे! जैसे कोई खगोलीय चिन्ह! शायद, हमें उस समय वो वैसे लग रहे थे, शायद पत्थर भुरभुरे हो चले थे वक़्त और बारिश की मार से, इसी कारण से ऐसा हुआ था!
"ये देखिये?" बोले शर्मा जी,
"ये है क्या?" पूछा मैंने, और छूकर देखा उस पत्थर को,
"लगता है जैसे कोई त्रिभुज हो?" बोले वो,
"नहीं, ये चतुर्भुज सा लग रहा है!" कहा मैंने,
"कैसे?" पूछा उन्होंने,
"इस त्रिभुज का लम्ब नहीं है! और ऊपर का त्रिभुज शायद मिट गया है, ये निशान छूकर देखिये!" कहा मैंने,
उन्होंने छूकर देखा,
"हाँ, चतुर्भुज ही रहा होगा!" बोले वो,
"सारे पत्थरों पर ऐसे ही निशन हैं!" कहा मैंने,
"इसका मतलब क्या हुआ?" पूछा उन्होंने,
"ये तो अभी पता नहीं!" कहा मैंने,
"आइये!" बोले वो,
"चलो!" कहा मैंने,
और हम आगे चल पड़े,
एक जगह एक गड्ढा सा दिखा, वहां रुक गए,
"गड्ढा?" बोले वो,
"बरसाती होगा?" कहा मैंने,
"इतना बड़ा?'' बोले वो,
"बन सकता है!" कहा मैंने,
"मान लिया!" बोले वो,
हम और आगे चले, और एक जगह, एक बड़ा सा पत्थर देखा, वहीँ रुक गए!
"ये तो प्राकृतिक नहीं!" कहा मैंने,
"हाँ, गाड़ा गया है!" बोले वो,
"उकेरा भी कुछ नहीं!" कहा मैंने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"कुछ तो प्रयोजन रहा होगा?" बोले वो,
"हाँ, कुछ तो अवश्य ही!" कहा मैंने,
"ये तो भूल-भुलैय्या है!" बोले वो,
"अभी न जाने क्या बाकी है!" बोला मैं,
"हाँ!" कहा मैंने,
और तभी वहां एक सर्द सा झोंका बहा! ऐसा सर्द, जैसा सर्दी की सुबह में चलता है! ऐसी भीषण गर्मी में ऐसा झोंका?
हम दोनों ने एक दूसरे को देखा!
"रुको!" कहा मैंने,
और तब मैंने संधान किया कलुष का!
"आओ इधर!" कहा मैंने,
और तब, मैंने नेत्र पोषित किये, अपने भी और उनके भी, और फिर खोले नेत्र अपने! जैसे ही खोले, नज़ारा बदल गया! वहां की मिट्टी का रंग, काला था! पत्थर गहरे लाल थे! आसपास देखा, लेकिन था कोई नहीं वहां!
"काली मिट्टी?" बोले वो,
"हाँ, हैरत की बात है!" कहा मैंने,
"सो तो है ही!" कहा मैंने,
तभी उनकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी! वो चौंके!
"आना ज़रा?" बोले वो,
दौड़ पड़े वो, उनके पीछे मैं भी!
उस पत्थर तक पहुंचे वो, पीछे मैं भी!
"ये देखो!" बोले वो,
वो पत्थर, बड़ा ही अलग था!
सफेद सा पत्थर, उन सब में सबसे अलग!
"ये यहां का नहीं है!" बोला मैं,
"यक़ीनन!" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो सफेद रंग का दूधिया सा पत्थर था, जैसा जिप्सम हुआ करता है, ये गढ़ा हुआ भी नहीं था, बस आधा ज़मीन के अंदर धंसा हुआ था, करीब चार फ़ीट का ये पत्थर रहा होगा, अब सवाल ये कि इसको कौन लाया? लाया तो क्यों लाया गया? क्या उद्देश्य रहा होगा? किस कारण से इसको यहां गाड़ा गया? किसने गाड़ा? आसपास कोई भग्नावशेष भी न थे, जिस से ये ही पता चले कि यहां क्या हुआ होगा? क्या कोई भवन था यहां या कोई मंदिर आदि? ऐसा कुछ भी नहीं था, बस वहां अब पत्थरों का ही राज क़ायम था, उनके बंद मुंह में, उनकी पथरायी हुई ज़ुबान में वे सब राज दफ़न थे! कुछ भी कहना, बेहद मुश्किल था!
"कुछ पता नहीं चल रहा है!" कहा मैंने,
"समझ सकता हूँ!" बोले वो,
"क्या किया जाए?" पूछा मैंने,
"दो रास्ते हैं!" बोले वो,
"वो भला क्या?" पूछा मैंने,
"एक, कि यहां तफ़सील और पुरदोज़ मुआयना किया जाए, शायद कुछ मिले, या फिर, कोई इमदाद, ग़ैबी इमदाद!" बोले वो,
उनका इशारा मैं समझ गया था! या तो यहां का ठीक ढंग से मुआयना किया जाए, चप्पा चप्पा टटोल दिया जाए, जिसमे मेहनत बेहिसाब लगती! गर्मी के दिन, भड़कती हुई गर्मी, अपने आप ही बहस-ओ-मुहाबिसा पर उतर आती! ये बेहद ही मुश्किल काम होता! अब वहां क्या है? ऊपर और ज़मीन के नीचे, इसकी तह तक जाने में, जोड़-जोड़ खुल जाता! मोहर जी और सतीश, वे मदद कर नहीं सकते थे, वे जानते ही नहीं थे कि यहां कौन सी चीज़ माक़ूल है और कौन सी नहीं! क्या उठाया जाए और क्या नहीं! अब रही बात ग़ैबी-इमदाद की, तो उसके लिए भी कुछ अहम सुराग ज़रूरी थे, जैसे कोई चीज़, पत्थर कोई हड्डी या कोई धातु का टुकड़ा, मिट्टी, परत दर परत बदलती रहती है, उसमे मौजूद खवायां(खनिज) अपना अपघटन करते रहते हैं, उसका जहां रंग बदलता जाता है वहीँ उसकी ज़मीनी फ़ितरत में भी बदलाव आ जाया करते हैं! तो, कुल मिलाकर, ये सब इतना आसान नहीं था, जितना फौरी तौर पर दीख रहा था!
तब मैंने शर्मा जी को दोनों ही बातें बता दीं, वे समझ गए,
"तो एक काम न करें?" बोले वो,
"वो क्या?" पूछा मैंने,
"पहले यहां का मुआयना कर लेते हैं?" बोले वो,
"ये ठीक रहेगा!" कहा मैंने,
और हम, अब अलग अलग दिशा में चले, जो कुछ अहम सा दीखता उसको गौर से देखना होता! कोई ऐसी चीज़ जो उस ज़मीन से अलग सी लगे, उस पर ध्यान देना सर्वोपरि था!
करीब एक घंटे के बाद, हम दुबारा मिले, मुझे तो कुछ नहीं मिला, लेकिन शर्मा जी को कुछ मिला था, कुछ पत्थर के मनके से! उनमे छेद हुए, हुए थे, ये मनके डेढ़ सेंटीमीटर के रहे होंगे, स्लेटी रंग के, और करीब ग्यारह, उनमे छेद थे, छेद से पहले, एक पत्थर की छोटी सी गेंद थी, जिसको भेदा गया था, डोर पिरोने से पहले! ये काम की चीज़ लगती थी!
हम उनको लेकर, एक पेड़ के नीचे आये, और उनको, एक ढाक के पत्ते पर रखा, कमाल ये, कि सारे मनके एक जैसे ही थे, उनमे कोई अंतर नहीं था, जैसे किसी कुशल कारीगर ने बनाया हो उन्हने, वो भी उसने जो कैलिब्रेशन का पूर्ण ज्ञाता हो! जैसे किसी मशीन से उनको बनाया गया हो, परिमाप ऐसा, कि न एक सूत कम और न एक सूत ज़्यादा! हम दोनों ही हैरान थे!
"इन्हें देखकर लगता है किसी कुशल कारीगर ने बनाया है इन्हें!" बोले वो,
"हाँ, बहुत नायाब से हैं!" कहा मैंने,
"आकार और माप, दोनों ही एक जैसे और एक समान हैं!" बोले वो,
"हाँ, यही बात तो दीगर है!" कहा मैंने,
"क्या इनसे कोई मदद मिल सकती है?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, मिल सकती है!" बोला मैं,
"तो पता लगाइये?" बोले वो,
"इसका पता अभी लगाता हूँ!" कहा मैंने,
"लगाइये!" बोले वो,
पानी हम लाये ही थे, पानी से साफ़ किया उन्हें हमने, और तब मैंने एक अभिमंत्रण किया, नेत्र बंद किये अपने, बाहर का शोर सुनाई देना बंद हो गया, नथुनों में, गाय के गोबर की गंध आने लगी, जैसे भर का उजाला हुआ, अँधेरा छंटा और मेरे नेत्र खुले!
मैंने देखा!
देखा कि मैं एक बड़े से पलाश के पेड़ के पास खड़ा हूँ! दूर दूर तक कोई नहीं है वहां, न खेत और न खलिहान! कोई व्यक्ति भी नहीं! पलाश के दहकते, अंगार जैसे फूल जैसे, आग बरसा रहे हों! आसपास, जंगली पेड़-पौधे लगे थे, हवा बहुत तेज चल रही थी, पास ही में लगा एक पीपल का पेड़, अपने पत्ते खड़खड़ा रहा था! दिन के कोई चार बजे का वक़्त रहा होगा वो! गोबर की गंध आ कहाँ से रही थी? ये जानने के लिए मैं ज़रा पीछे चला, गंध का भड़ाका, वहीँ से आ रहा था! मैं आगे चला! और ठिठक कर रुका!
उस पीपल के पेड़ के नीचे की ज़मीन लीपी हुई थी गोबर से, और उसी पेड़ में एक जगह, कुछ पीले धागे से बंधे थे, उन्हीं एक धागे में, ऐसे मनकों की माला भी लटकी थी! ये करीब सोलह इंच की रही होगी, लेकिन उसका रंग काला था! स्लेटी नहीं! मैं आगे बढ़ा, आसपास देखा, कोई नहीं था वहां! न कोई झोंपड़ी और न ही कोई अन्य आवास!
मैं रुक गया वहीँ!
ऊपर बैठे कठफोड़वे ने, चिल्ला चिल्ला कर जैसे आसमान सर पर उठा लिया! क्या कौवा और क्या अन्य पक्षी, जैसे मेरे आने की सूचना सम्प्रेषित करने लगे!
मैं पीछे हटा! धीरे धीरे! जो भी पक्षी आता, उस पेड़ पर आ बैठता, धीरे धीरे वहां पर, उनका जमावड़ा लग गया! सैंकड़ों पक्षी आ बैठे वहाँ! शोर ऐसा कि कान फोड़ दे! मैं पीछे लौटा, जैसे ही लौटा, मेरा पाँव फिसला और मैं, नीचे गिर पड़ा! मेरी कोहनी में चोट लगी, झट से ही रक्त बह निकला, मैंने रोकने की कोशिश की, तो मेरा पूरा हाथ सन गया रक्त में! मेरे रक्त के छींटे वहाँ टपकते चले गए!
और तभी!
तभी मेरी आँख खुल गयी!
मैं लौट आया वर्तमान में!
साँसें तेज थीं मेरी!
मेरा हाथ, मेरी कोहनी पर रखा था, मैंने देखा वहां, कोई चोट नहीं थी!
"क्या हुआ?' उन्होंने पूछा,
तब मैंने सबकुछ बता दिया उन्हें!
सुनकर, वे भी अचम्भित!
और तभी, तभी एक कठफोड़वे की आवाज़ आई!
झट से हम दोनों की निगाह उस पर पड़ी!
एक कौवा बोला!
एक एक करके, अनेकों कौवे, वहां आते चले गए! कांव! कांव! चिल्ला चिल्ला कर, जैसे हमें चेतावनी देने लगे!
"ये क्या?'' बोले वो,
हैरत में तो मैं भी था!
कुछ न बोल सका!
"ठीक वैसा ही?" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
वे कौवे, बढ़ते चले गए, अब नीचे ज़मीन पर भी बैठने लगे थे, गरदन के रोएँ उनके, खड़े हो गए थे! ये सब ठीक न था!
"उठो! जल्दी उठो!" कहा मैंने,
और हम दोनों ही उठ लिए, ढाक के पत्तों में लिपटे वो मनके, जेब में खोंसे, और चल पड़े वापिस! वे कौवे, उछल उछल कर, आते रहे हमारे पीछे! कठफोड़वे, पेड़ों के तनों को पकड़ कर, करर्र जैसी आवाज़ें निकालते चले गए!
हमारे क़दम तेज हुए और हम, उसी क्षण दौड़ पड़े वहाँ से!


   
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हम दौड़े वहां से! वे कौवे जैसे हमारे पीछे ही पड़ गए थे, वे कठफोड़वे भी! ये बड़ी अजीब सी बात थी! ऐसा पहले कभी न हुआ था, कम से कम मुझे तो याद नहीं! हम आये भागे भागे! हमें देख वे दोनों, जो बैठे हुए थे, अपने कपड़े झाड़ते हुए, हुए खड़े, और आये भागते हुए हमारी तरफ!
"चलो! निकलो यहां से!" मैंने कहा,
झट से दौड़े सब, स्टार्ट कीं मोटरसाइकिल और बैठे हम!
दौड़ा दीं आगे के लिए! कौवों की कांव कांव अभी तक पीछे लगी थी! मैंने पीछे मुड़कर देखा, भारी जमावड़ा था उनका तो वहां! कोई अकेला हो तो गिरा ही लें उसे वो सब! और नोंच डाले एक एक बोटी! गई दौड़ीं और हमने फिर सड़क पकड़ी! अब कौवों की कांव कांव मंद पड़ी! एक आद ज़रूर नज़र आ जाता था! लेकिन हमने उन्हें पीछे छोड़ ही दिया! हम आ रुके एक जगह! यहां पेड़ लगे थे, एक सरकारी नल भी लगा था, वहीँ रुके, चेहरे, हाथ साफ़ किये अपने! और उस ढाक के पत्ते को, अब संभालकर रखा मैंने!
"बहन**! हज़ारों इकट्ठे हो गए थे क्या?" बोले शर्मा जी,
"हाँ, कम से कम सैंकड़ों!" कहा मैंने,
"कोई अकेला-दुकेला हो, तो पिंजर ही बचे उसका तो!" बोले वो,
"कोई शक नहीं इसमें!" कहा मैंने,
"इतने सारे, आ कहाँ से गए?" पूछा सतीश ने,
"पता नहीं यार!" बोले शर्मा जी,
"इतने तो मैंने भी कभी नहीं देखे!" बोले मोहर जी,
"हाँ, पता नहीं कहाँ से आ धमके!" बोले शर्मा जी,
"कहीं कोई घोंसला आदि तो नहीं था वहां?" पूछा सतीश ने,
"अरे नहीं!" कहा मैंने,
"घोंसला हो तो तभी करते हैं ये ऐसा!" बोले मोहर जी,
"हाँ, इनमे एका बहुत होता है, जैसे कोई संदेश फ़्लैश हुआ हो, ऐसे ही इकठ्ठा हो जाया करते हैं, और फिर अगर कर दिया हमला तो राम ही खैर बचाये!" बोले शर्मा जी,
"हाँ! ये तो है!" कहा मैंने,
मित्रगण! आपने देखा भी होगा, कभी-कभार कोई कोई कौवा दुश्मनी बाँध लेता है, या तो उसके घोंसले को छेड़ा हो, या उसकी मादा को तंग किया हो, या उसके बच्चे को कोई खतरा हो! तब ये ऐसा ही करते हैं! कुछ ही क्षणों में, न जाने कहाँ कहाँ से इकठ्ठा हो जाया करते हैं! और फिर ठोंग मारा करते हैं! इस से बचने का केवल एक ही उपाय है! कि जिस से कौवे ने दुश्मनी बाँधी हो, वो अपने सर पर, एक मोतीचूर का लड्डू रखे, अपने दोनों हाथों में, एक एक लड्डू रखे! और आ जाए बाहर! अब कोई भी कौवा कुछ नहीं कहेगा! ये उनका सम्मान हुआ और क्षमा भी! इसके बाद, कोई भी कौवा, कभी कुछ नहीं कहेगा!
खैर, हम वहाँ से वापिस हुए, घर आ पहुंचे, भोजन आदि से निवृत हुए और फिर कुछ आराम किया! मैं और शर्मा जी, लेट गए थे अपनी अपनी चारपाई पर, अब दोपहर थी, लू का प्रकोप ज़ारी था उस समय! इंसान तो क्या, कोई पशु-पक्षी भी नहीं दीख रहा था! झुलसाने वाली गर्मी पड़ रही थी, बिजली की बड़ी समस्या थी वहाँ, हाथों के पंखें झलने पड़ते थे, ऊपर से मक्खियाँ! मक्खियाँ भी ऐसी ज़िद्दी कि बार बार हार कर भी, दौड़ी चली आएं वापिस! ऐसी बे'शऊर और बे'हया!
"बुरा हाल है!" बोले शर्मा जी बैठते हुए,
"क्या करें!" कहा मैंने,
"हाँ! बाहर जाओ, तो लू खाओ, लू खाओ तो लोटा उठाये घूमो रात भर!" बोले वो,
मैं हंसा पड़ा!
"हाँ, यहीं ठीक है!" कहा मैंने,
"यहां? ये मक्खी देखो! इसकी माँ की **!!" बोले पंखे से मारते हुए एक मक्खी को, जो उनके घुटने पर बैठ, उन्हीं को मुंह चिढ़ा रही थी!
"मरी क्या?" पूछा मैंने,
"ये मर रही हैं?" बोले वो,
मैं फिर से हंसा!
"तो क्यों मार रहे हो?" कहा मैंने,
"इनकी बहन की **! नाक में दम कर रखा है!" बोले वो, झुंझला कर!
"अब ये तो जाने वाली हैं नहीं!" बोला मैं,
"हाँ जी! हमें ही भेज के मानेंगी!" बोले वो,
"कहाँ जाओगे?' पूछा मैंने,
"सोच रहा हूँ!" बोले वो,
उठे, और चले बाहर, मैं भी उठा और चला बाहर, उनके साथ आ खड़ा हुआ!
"ऐसी भीषण गर्मी में कहाँ जाओगे?" पूछा मैंने,
"कोई पेड़ ढूंढ रहा हूँ!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"फिर क्या? खटिया बिछा लेंगे वहीँ?" बोले वो,
"और लू?" पूछा मैंने,
"कम से कम इन आतंकवादियों से तो बचेंगे?" बोले गुस्से से!
"कौन आतंकवादी?" पूछा मैंने,
"ये बहन की ***! मक्खियाँ!" बोले वो,
अब ठट्ठा गूंजा मेरा!
आतंकवादी!
"वो रहा पेड़! मिल गया!" बोले वो,
"वो?" मैंने देखते हुए कहा,
"हाँ!" बोले वो,
"वहां देखा है पीछे?" कहा मैंने,
"क्या है?" पूछा उन्होंने,
"खाली बीहड़ है!" बोला मैं,
"तो वहां घूमना थोड़े ही है?" बोले वो,
"लू तो घूमेगी?" कहा मैंने,
''अरे हाँ!" बोले वो,
"सोच लो!" बोला मैं,
"मरो फिर यहीं!" बोले झुंझलाते हुए!
"आओ, अंदर चलो!" कहा मैंने,
"अंदर ये साली तंग करती हैं!" बोले वो,
"पंखा झलते रहो?" कहा मैंने,
"कब तक? जब भी झपकी आती है, साली मुंह में घुसती हैं!" बोले वो,
बात सही थी!
पंखा झलते झलते झपकी आती थी, पंखा बदन और मक्खियाँ अटोलने-टटोलने लगती थीं उसके बाद! गुस्सा अलग से आता था!
"एक काम करें?" बोला मैं,
"क्या?" पूछा उन्होंने,
"यहां ले आएं खटिया?" बोला मैं,
"ये ठीक है!" बोले वो,
"आओ!" कहा मैंने,
शर्मा जी ने खेस उठाया, मैंने खटिया, ले आये बाहर, खेस बिछाया और बैठ गए! तभी सामने से एक लड़का दिखा,
"अरे ओ लड़के?" बोले शर्मा जी,
वो आया दौड़ा दौड़ा!
"पानी ले आ भाई!" बोले वो,
लड़का  चला, दौड़ा, पानी लाने के लिए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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खटिया बाहर बिछा ही ली थी, लू का कहर ऐसा था कि छाती में घुसे और खून से कुश्ती कर, उबाल ला उसमे, बाहर निकल जाए! बदन में झुरझुरी सी उठ जाती थी, लू में, अक्सर इसी झुरझुरी से बचना होता है, कहीं लू का चपेटा लगा तो समझो, खून-पानी एक हुआ! उलटी-दस्त तो शुरुआत हुआ करती है! गर्मी का यही सबसे बुरा रूप हुआ करता है, इसीलिए, बदन को, खासतौर पर, सर को बचा कर रखना चाहिए! हमने सर पर अंगोछे बाँध रखे थे, कुछ तो राहत मिल ही रही थी! लू से बचने के लिए सबसे अहम तोड़ होता है कच्चे आम का पन्ना! कच्चे आम को भूनकर, काला नमक और भुना जीरा डालकर ये बनाया जाता है, स्वाद तो बढ़िया होता ही है, लेकिन लू का महातोड़ हुआ करता है! अक्सर मैं तो गर्मियों में इसका सेवन किया करता हूँ! बाज़ार में जो मिला करता है वो शुद्ध नहीं होता, उसमे रसायन होते हैं जो शरीर के लिए नुकसानदेह हुआ करते हैं! सब सतीश दिखे तो उस से कहा जाए कि आम का पन्ना मिला जाता तो राहत मिलती!
तभी वो लड़का, आया भागा भागा, पानी लाते हुए, उसने पानी पिलाया, पानी पिया तो हलक़ तर हुआ! अब पानी भी कितना पिया जाए! पी पी कर पेट भर जाता था और हलक, अगले ही पल, फिर से खुश्क हो जाता था! खैर, पानी पिया और प्यास मिटाई!
"अरे, सतीश कहाँ है?" पूछा शर्मा जी ने,
"अंदर ही हैं" बोला लड़का, गिलास उठाते हुए,
"ज़रा भेज यार?'' बोले वो,
"अभी!" बोला वो, और दौड़ लिया,
कुछ ही देर में सतीश आ रहा था हमारे पास,
आया और बैठ गया साथ हमारे!
"बुलाया था?" पूछा उसने,
"हाँ यार!" बोले वो,
"हाँ जी?'' कहा उसने,
"पन्ना ही बना लो?" बोले वो,
"अभाल!" बोला मुस्कुराते हुए!
उठा और चल दिया वापिस, कुछ ही देर में, बरोसी में, उसकी पत्नी, तीन-चार कच्चे आम दबा गयी! अब आम भुनने लगे थे, ये बढ़िया था, गाँवों में अक्सर यही पन्ना काम आता है बहुत! स्वाद का स्वाद, हाज़मा दुरुस्त और लू से बचाव!
"देखो, कैसी खाल-छीला लू है!" बोले वो,
"ये तो है ही!" कहा मैंने,
"यहां कुछ ज़्यादा ही है?'' बोले वो,
"पथरीला इलाक़ा है जी!" कहा मैंने,
"हाँ, और रात को ठंडा!" बोले वो,
"यही तो मुसीबत है!" कहा मैंने,
"जान का झमाल है ये!" बोले वो,
मैं लेट गया था, पंखा झल रहा था, मक्खियाँ नहीं थीं यहां, अब इतना सुकून तो था यहां!
कुछ ही देर में, एक लोटे में पन्ना लाया गया, हमने पिया, स्वाद बढ़िया था डेढ़ डेढ़ गिलास पेट में उतार लिया! अब कम से कम लू का डर तो नहीं था, और वैसे भी, मिर्च का एक दान भी अगर पेट की आँतों में हो, तो लू का असर नहीं होता! इसीलिए गरम जगहों पर, मिर्चों का सेवन किया जाता है!
उसके बाद कुछ आराम किया, आँख लग गयी थी, जब खुली तो शाम के साढ़े छह बजे थे, बदन पर, पसीनों की सफेद रेखाएं बन गयी थीं! अब नहाने का जी था, तभी राहत मिलती! तो जी, स्नान किया, शीतल जल बदन से लगा तो आनंद आया! जी किया कि बस, ऐसे ही पानी बदन पर पड़ता ही रहे!
संध्या समय के कुछ समय पश्चात, भोजन भी कर लिया था, आज रात मैं जाना चाहता था उसी जगह, जहां वे कौवे मिले थे, रास्ता कोई मुश्किल नहीं था, कौवे भी न होते और कुछ पता भी चल जाता! कुछ न कुछ तो हाथ लगता ही! इसीलिए, दो टोर्च रख ली थीं हमने! मोहर सिंह और सतीश दोनों ही तैयार थे! और इस तरह, आठ बजे हम निकल पड़े वहाँ के लिए!
माहौल शांत था, दशमी का शुक्ल-चन्द्र था, रौशनी पर्याप्त थी, चन्द्र की रौशनी, अक्सर अँधेरी जगहों पर ही पता चला करती है, कहीं कहीं तो इतनी तेज होती है कि आप ज़मीन पर पड़ा सिक्का भी देख सकते हैं!
"आप दोनों यहीं रुको!" बोले शर्मा जी उन दोनों से,
"जी!" बोले वो,
"ये हमें दे दो!" एक टोर्च लेते हुए कहा उन्होंने,
"ये लो!" बोले वो,
"वैसे तो कुछ नहीं होगा, भय लगे, तो वापिस चले जाना, एक मोटरसाइकिल यहीं रहने दो, और चाबी दे दो!" बोले वो,
"ये रही चाबी" बोला सतीश,
"जल्दी ही आएंगे!" बोले वो,
चाबी ली और चले पड़े फिर आगे!
हम वहाँ जा पहुंचे, वहाँ की मिटटी में सफेद कण चमक रहे थे, जैसे रुई के फाहे!
"ये कैसी मिट्टी है?" बोले वो, रौशनी मारते हुए,
"ये पत्थर के कण हैं!" कहा मैंने,
"अच्छा, परावर्तन है!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
पांवों के नीचे कंकड़-पत्थर, अजीब सी आवाज़ें कर रहे थे!
"रुको!" कहा मैंने,
"क्या हुआ?" फुसफुसाए वो,
'वो, वहाँ?" कहा मैंने इशारे से,
"क्या है?" पूछा उन्होंने,
"देखो तो?" बोला मैं,
सामने लगा कि जैसे कोई खड़ा है, कोई दो लोग, लम्बे से, जैसे कोई लठैत से, हाथों में लट्ठ लिए हुए, वैसे तो साफ़ नहीं दिख रहे थे, लेकिन लग ऐसे ही रहे थे,
कुछ पल ऐसे ही बीते,
हम भी जड़ और वो भी जड़!
"कोई पेड़ तो नहीं?" बोले वो,
"शायद!" कहा मैंने,
"आगे चलें?" बोले वो,
"हाँ, रुको!" कहा मैंने,
अब देह-रक्षा और प्राण-रक्षा मंत्र से पोषित किया अपने आपको मैंने! फिर शर्मा जी को भी, वो सामने जो भी थे, अभी तक वैसे ही थे, कोई चालीस फ़ीट दूर!
"कोई है क्या?'' चीखा मैं,
कोई जवाब नहीं!
"है कोई?" फिर से चीखा,
कोई उत्तर नहीं!
हमने एक-दूसरे को देखा,
इशारा हुआ आगे चलने का! और चल पड़े आगे!
वे दो जो थे, वैसे ही खड़े रहे!
"रुको!" कहा मैंने,
अब गौर से देखा,
वो पेड़ नहीं थे, वो इंसान ही लगते थे! आठ फ़ीट की लम्बाई रही होगी उनकी!
"ये पेड़ नहीं हैं!" बोला मैं,
"हाँ, कोई है!" बोले वो,
"आराम से चलिए, चौकस रहिये!" कहा मैंने,
पांच फ़ीट,
दस फ़ीट,
पंद्रह और फिर हम रुके!
वे दोनों, मुस्तैद से खड़े थे, फ़ौरन ही, हमारी तरफ मुड़े!
"रुको!" कहा मैंने,
और दम साधे, हम वहीँ खड़े हो गए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कुछ क्षण ऐसे ही आगे बढ़े! न वो हिले और न हम! जैसे वो हम पर नज़रें बांधे थे और हम उन पर! एक अजीब सा खेल चल निकला था! वो, पत्थर की तरह से खड़े थे और हम भी, फ़र्क़ इतना था कि उनमे जैसे सांस नहीं थी और हमारी छातियाँ दम अंदर बाहर कर रही थीं! अचानक से मुझे खांसी उठी, धुल का एक भड़ाका सा नथुनों में टकराया था, रात में भी लू सी चली थी, पत्थर वैसे तो अब ठंडे होने की शुरुआत में थे लेकिन हवा अभी तक गरम थी, कनपटी और गर्दन से पसीनों की धारें नीचे की ओर खिसकने लगी थीं! एक अजीब सी स्थिति बन गयी थी, न जाने आगे, किस क्षण क्या हो! क्या वो टकराएंगे या फिर कुछ मदद मिलेगी? और फिर ये हैं कौन? कोई रक्षक हैं क्या? या कोई द्वार की रक्षा करने वाले कुछ लठैत? लठैत! ये भी एक कला है! आजकल तो सीमित हो कर रह गयी है! न तो ऐसे लट्ठ ही हैं और न ही ऐसे लठैत अब! मैंने, राय-बरेली में एक बार एक लठैत देखा था, इब्राहीम! पुलिस में नौकरी करता ही वो! उसके हाथ में लट्ठ हो अगर तो सामने अगर बीस भी हों, तो कुछ ही क्षणों में धूल चाटे जाएँ वो सब! चाहे कोई पहलवान ही हो! ऐसा लट्ठ पड़े कि कंधे टूट जाएँ! घुटने अपनी जगह से हट जाएँ! लट्ठ ऐसा घूमे कि जैसे पंखा! कमाल का लठैत है वो इब्राहीम! तो ये कला अब सीमित हो कर रह गयी है! इसके लिए दम-खम और मज़बूत मांस-पेशी वाला जिस्म चाहिए! अब न वैसा खाना है और न ही वैसे मज़बूत लट्ठ! तेल पिलाया जाता था उन लट्ठों को! फिर पीतल जड़ा जाता था उसकी गांठों पर! तब वो ऐसा बचाव का हथियार बन जाता था कि उस से लड़ने वाला कम से कम दो बार सोचता! अगर सामने वाला भी लठैत हो तो कमाल की लड़ाई हुआ करती है! लट्ठ ऐसे टकराते हैं आपस में कि जैसे खड्ग टकरा रहे हों! आजकल की देह पर पड़ जाएँ तो सीधा दफ़ा तीन सौ सात या तीन सौ दो का मुक़द्दमा दायर हो जाए! आजकल की देह मशीनी है! मांसपेशियां फुला लेते हैं हमारे मशीनी पहलवान! इसका सेहत पर क्या असर पड़ता है इस बात से अनजान ही रहा करते हैं! हड्डियां खोखली और भंगुर हो जाती हैं, समय से पहले बुढ़ापा आ घेर लेता है! चालीस के बाद हाथ और पाँव कांपने लगते हैं! दृष्टि-दोष हो जाता है! शीत-प्रदाह से ग्रस्त हो जाते हैं, नपुंसकता शीघ्र ही मित्रता कर लेती है, संतान हो भी अगर तो उसमे भी दोष हुआ करता है! मुझे याद है, एक मियाँ हाफ़िज़ हुआ करते थे, नब्बे बरस की उम्र रही होगी उनकी, उस उम्र में भी, कीकर के मोटे पेड़ को अकेला ही काट काट कर टुकड़े कर दिया करते थे! कीकर का पेड़ ऐसे नहीं कटता, सबसे मज़बूत रेशा होता है उसमे, लोहे जैसा! चिंगारी छूटा करती है उसकी लकड़ी काटने में! पहले, इमारती दरवाज़ों में, उसके लकड़ी की कीलें बनायी जाती थीं, आज तलक किले के दरवाज़ों में लगी हैं! जितना पानी, नमी लगती है, उतना लोहा हुए जाती हैं! नावों के तले इसी लकड़ी से बना करते थे! तो हाफ़िज़ साहब, पुराने खिलाडी थे, अंग्रेजी ज़माने में, पहलवान थे! कभी चश्मा नहीं चढ़ा, कभी भी एक दांत न गिरा उनका! पहलवान सरीखी देह रही उनकी! दूध-घी, खिचड़ी, हलवा और खीर-पूरी के शौक़ीन रहे! उम्रदराज़ थे तो गाँव में सभी के मेहमान हुआ करते थे वो, बरात में जाते तो कितने लड्डू खाए, पता नहीं, कितना दही खाया पता नहीं! सच में, बाजू पकड़ लें तो अब चाहे चार आदमी लग जाएँ, छुड़ा ही न सकें! कहते थे, उनके माँ-बाप ने सही चराई की थी उनकी! पंद्रह लीटर दूध पीना तो कोई बात ही न थी! घी बिना रोटी-सब्जी हलक से ही न उतरती थी नीचे! कच्ची सब्जियां खा जाते थे! और जब तक जिए, जीदार ही रहे! आजकल की पीढ़ी तो दसवां हिस्सा भी नहीं उनका! खड़े भैंसे को नकेल से खींच कर, कोल्हू में जोड़ दें! खूंटा उखाड़ दें हाथों से! कद ऐसा कि जैसे कोई दैत्य! कंधे ऐसे चौड़े कि सामने आ जाएँ तो सामने अगल-बगल दिखे ही नहीं कुछ! उनके बेटे हैं शौक़त मियां, पहलवान तो हैं, लेकिन वैसे नहीं हैं! खुद कहते हैं, वे मियां हाफ़िज़ के पासंग भी नहीं! तो हमारे सामने जो दो लठैत से खड़े थे, वो मियाँ हाफ़िज़ जैसे ही लग रहे थे! लट्ठ तो छोड़िये, हाथों से पकड़ कर ही ऐसा हिलाएं कि कहाँ ज़मीन और कहाँ आसमान, पता ही न चले बहुत देर तक!

"यहां आओ?" बोला मैं,
कोई न आया!
वो वैसे के वैसे ही रहे! पत्थर की तरह!
"आगे चलें?" बोले शर्मा जी,
"आप रुको!" कहा मैंने,
और मैं चला आगे फिर,
कुछ फ़ीट आगे!
और तभी, उनमे हरकत हुई! अपनी अपनी जगह बदल ली उन्होंने! मैं रुक गया, पीछे देखा, शर्मा जी, दौड़ के आ गए मेरे पास!
"ये क्या हो रहा है?" फुसफुसाए वो,
"देखते रहो" कहा मैंने,
और मैं आगे बढ़ा!
सामने देखा!
अब दिखे मुझे वो! साफ़ साफ़!
लम्बी-लम्बी दाढ़ी!
मज़बूत देह वाले!
पहलवान से!
उभरे हुए जिस्मानी हिस्से उनके!
कानों में बालियां और गले, बाजुओं पर, गंडे बंधे हुए!
"कौन हो तुम?" पूछा मैंने,
"चला जा यहां से!" एक बोला,
रौबदार आवाज़! भारी आवाज़!
"चला जाऊँगा! बताओ पहले?" कहा मैंने,
"यही गाड़ दूंगा! जा?" बोला दूसरा चिल्ला कर!
"पहले बता? कौन है तू?" बोला मैं,
इस बार, उसी के लहजे में!
दोनों ही ठहाका मार कर हँसे!
"किसने भेजा तुझे?" पूछा एक ने,
"एक औरत ने!" बोला मैं,
वो चौंके! एक-दूसरे को देखा!
"कौन सी औरत?" पूछा एक ने,
"वो बाहर रास्ते पर!" कहा मैंने,
"कौन सा रास्ता?" पूछा उसने,
"वो, पेड़ वाला!" कहा मैंने,
"कौन सा पेड़?" पूछा एक ने,
"वट वाला" बोला मैं,
अब दोनों चुप!
एक-दूसरे को देखें!
फिर मुझे देखा!
"मोहना ने?" पूछा एक ने!
मोहना! ये पता चला अब!
"नाम नहीं बताया उसने!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उसने,
"कहा कि यहां जाओ?" बोला मैं,
"किसलिए?" पूछा दूसरे ने,
"पता करने!" कहा मैंने,
"क्या पता करने?" पूछा चौंक कर!
"यही कि यहां कोई स्थान है!" बोला मैं,
"तो?" पूछा उसने,
"यही कि किसका स्थान है?" पूछा मैंने,
"तेरा क्या सरोकार?" पूछा उसने,
"जानना चाहता हूँ!" बोला मैं,
"क्या?" पूछा उसने,
"कि तुम कौन हो?" पूछा मैंने,
"जा! बस!" बोला एक,
"बताओ तो सही?" कहा मैंने,
"लौट जा अब!" बोला एक, सीना फुलाते हुए, सामने आते हुए!
"रुको!" कहा मैंने,
वो रुका और लट्ठ अपना, मारा ज़मीन पर!

   
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श्रीशः उपदंडक
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माहौल तनातनी का सा हुए जा रहा था! वो तो अडिग से खड़े थे, पहरेदारों की तरह! खैर, वो उनका फ़र्ज़ था और वो अपनी फ़र्ज़-अदायगी में लगे थे! और यही बेहतर भी था! और हम, हम तो उनके लिए मेहमान तो नहीं थे, हम तो परदेसी थे, शायद वो भी दुश्मन से!
"लौट जा!" बोला वो,
"ऐसे नहीं!" कहा मैंने,
"अंजाम जानता है?" बोला वो, लट्ठ तनाते हुए!
"मैं तो जानता हूँ, लेकिन तू नहीं!" कहा मैंने,
वो चौंका! आँखें चौड़ी हो गयीं उसकी!
"तेरी ये हिम्मत?" बोला गुस्से से वो!
"आजमा के देख ले!" कहा मैंने,
अब तुर्रा बदलना पड़ा मुझे, उनका रौब अब बर्दाश्त न हुआ था!
उसने दूसरे की ओर देखा, और दोनों ही हुए साथ!
और अगले ही पल, मारी उछाल! दोनों ही मेरे आगे!
मैं संभला! और हुआ थोड़ा पीछे!
एक ने घुमाया लट्ठ, जैसे मेरी कमर को निशाना बनाया गया हो! लट्ठ, छाया सा बन, आरपार हो गया! मेरी स्थूल काया पर, उसके छद्म का एक भी वार न चला!
अब समझदार को इशारा काफी! वो समझ गए! दोनों ही समझ गए!
उन्होंने, अपने लट्ठ बाँध लिए अपने कंधों से! और मुस्कुरा दिए! हालांकि मुझे ऐसा ही कुछ आभास था, और हुआ भी ऐसा ही!
"जा, वहाँ जा!" बोला एक,
एक तरफ इशारा किया था उसने, वहाँ कुछ टीले से थे मिट्टी के! अँधेरा था वहां, मैंने टोर्च की रौशनी डाली थी उधर, तो दिखा ये अब!
"वहाँ?" बोला मैं,
सामने देखते हुए ही,
कोई उत्तर नहीं आया,
जब सामने देखा, तो वे दोनों, थे ही नहीं वहाँ! वे जा चुके थे!
मैं समझ गया था, उनका उद्देश्य तो पूर्ण हुआ था, अब मेरा काम शुरू हुआ था! अब पता नहीं किस काम में उलझने वाले थे हम! वहाँ क्या था, क्या नहीं था, अब पता चलना था!
"आओ!" कहा मैंने,
"चलिए" बोले शर्मा जी,
और हम, उस संकरे से, पथरीले रास्ते पर बढ़ चले!
जा पहुंचे वहां, यहां कुछ टीले से थे, कुछ पत्थर भी पड़े थे, कुछ अनगढ़ से पत्थर भी थे, कुछ चौकोर थे और कुछ गोल कटे हुए, जैसे अक्सर मेहराब में कटे रहते हैं!
"यहां तो कुछ नहीं?" बोले वो,
"इशारा तो यहीं का क्या था?" कहा मैंने,
"तो कुछ होना चाहिए!" कहा उन्होंने,
"लेकिन है कुछ नहीं!" बोला मैं,
हमने खूब मुआयना किया उधर, लेकिन ऐसा कुछ नहीं जिस से कुछ पता चल सके! बस कुछ टीले और वो पत्थर, और कुछ नहीं, हाँ, वो अजीब से पेड़ अवश्य ही थे!
"कुछ ख़ुश्बू आई?'' पूछा उन्होंने,
मैंने सांस ज़ोर से खींची, कुछ गंध तो आई,
"कैसी है?" पूछा उन्होंने,
"जैसे मेहँदी की होती है, है न?" बोला मैं,
"हाँ, वैसी ही है" बोले वो,
"कच्ची मेहँदी जैसी है!" कहा मैंने,
"हाँ, जैसे पीसी जा रही हो!" बोला मैं,
"हाँ, बड़े से इमरतबान में या किसी ओखली में!" बोले वो,
"हाँ, ओखली में!" कहा मैंने,
"सामने चलो!" बोले वो,
"चलिए!" कहा मैंने,
और हम बढ़ चले सामने!
अब यहां कुछ गड्ढे दिखे! कुछ झाड़ियाँ थीं!
"ये तो भटकटैया सी हैं?" बोले वो,
"हाँ, लेकिन यहां कैसे?" पूछा मैंने,
"हाँ, नमी तो नहीं है यहां?" बोले वो,
"एक मिनट!" कहा मैंने,
मैं नीचे बैठा, वो झाडी देखी, गौर से देखा,
"ये भटकटैया नहीं है!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उन्होंने,
"ये रतपोखन है!" कहा मैंने,
"अच्छा!" कहा उन्होंने,
तभी सामने एक आवाज़ हुई! जैसे कोई औरत भागी हो! उसकी पायलों की आवाज़ ऐसी तेज आई थी कि जैसे हमारे करीब से ही गुजरी हो!
हम एक झटके से ही उठ खड़े हुए!
आवाज़ वाली दिशा में देखा, कोई नहीं था वहां!
"आओ!" कहा मैंने,
और हम भाग लिए सामने की तरफ! और आ रुके एक टीले के पास!
"यहीं से आई थी आवाज़!" बोला मैं,
"हाँ!" कहा उन्होंने,
और अचानक ही, फिर से आवाज़ गूंजी! हमारे ठीक पीछे!
हमने एक झटके से पीछे देखा! कोई नहीं था!
"यहीं रुको!" बोला मैं,
और हम, नीचे बैठे, घुटनों पर!
कुछ पल ऐसे ही बीते, इंतज़ार में!
लेकिन कोई आवाज़ नहीं हुई!
हर तरफ, बस सन्नाटा ही सन्नाटा!
"कोई तो है!" फुसफुसाया मैं!
"हाँ!" बोले वो,
और अचानक से फिर से आवाज़ गूंजी!
जैसे कोई भागा हो! इस बार, पायल की आवाज़ नहीं थी बस!
"खड़े हो जाओ!" कहा मैंने,
वो हुए खड़े,
और जैसे ही खड़े हुए, उनके मुंह पर छपाक से जैसे कोई पानी पड़ा! पूरा भीग गए थे वो, आँखें बंद हो गयीं थीं, चश्मा भीग चला था, कुछ छींटे मुझ तक भी आये थे, मैं लपक के उनके पास चला!
"क्या है ये?'' पूछा मैंने,
"पानी लगता है!" बोले वो, मुंह, रुमाल से पोंछते हुए!
वो पानी ही था! सूंघ कर देखा, तो मेहँदी जैसी गंध थी उसमे!
"लाल तो नहीं है?" पूछा उन्होंने,
"नहीं तो!" कहा मैंने,
"तब पानी ही है!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
ऊपर देखा, सारा आकाश साफ़ था!
"किसने फेंका?" बोले वो,
"ए? कौन है वहाँ?" चीखा मैंने,
कोई उत्तर नहीं आया! मेरी आवाज़, मुझ तक आ पहुंची वापिस ही!
"आना ज़रा?" बोला मैं,
"चलो!" बोले वो,
और हम, सामने की तरफ चल पड़े!


   
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श्रीशः उपदंडक
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सामने, वही टेढ़े-मेढ़े से अजीब पेड़ लगे थे, बेरी के पेड़ थे वो, उन्हें कोई देख ले तो दो बात सोचे! या तो उनकी परवरिश ऐसी जगह हुई थी जो जगह या तो कुआं रही हो, वो भी एक संकरा कुआं! या फिर, किसी कारीगर ने ऐसी कारगुजारी की हो! हालांकि मैं उन्हें कई मर्तबा आँखों के सामने से निकाल चुका था, फिर भी, बरबस निगाह पकड़ ही लिया करते थे वो! एक तो छाल बहुत कम थी उन पर, ऊपर से, एक एक शाख, एक मीटर तलक की, कम से कम पांच जगहों से मुड़ी हुई थी! कोई दिन में भी उन पेड़ों को देख ले तो मारे डर के उनके पास ही से न गुजरे! सांप जैसी शाखें लगें उनकी! और लगे कि जैसे वो पेड़ भुतहा हों! जैसे भूतों का बसेरा हो उन पर! और सच में ऐसा ही था! ये जगह भुतहा ही थी!
अभी हम आगे चले ही थे कि एक हंसी सी गूंजी! किसी ने तालियां मारिन और वक हल्की सी आवाज़, किसी औरत की, गूँज उठी! आवाज़ दूर तलक गयी! और वहाँ के जैसे एक एक पेड़ से टकराई! एक एक टीले से! उस हंसी से, देह के सारे रोएँ खड़े हो चले थे! आवाज़ बेहद ही विस्मयकारी सी थी! मैंने घड़ी पर नज़र दौड़ाई, समय उस समय, करीब दस बजे का हो चला था! घुप्प अँधेरा था और हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था! शर्मा जी मेरा कंधा पकड़े खड़े थे, चाँद की रौशनी उनके चश्मे के सुनहरी फ्रेम से टकरा रही थी और धवल रूप में बाहर छलक जाती थी! बस, इतना ही देख पाता था मैं शर्मा जी को!
हंसी फिर से गूंजी! हाड़ कंपा देने वाली हंसी!
"ये कौन है?" शर्मा जी ने पूछा,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"है कहाँ, ये भी नहीं पता?" बोले वो,
"हंसी शायद पीछे से आती है!" कहा मैंने,
"पीछे?" बोले वो, और पलट के देखा,
"अँधेरा है!" बोले वो,
"आओ ज़रा!" कहा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
हम आगे चले फिर, हंसी फिर से गूंजी, इस बार तालियां ज़ोर से बजीं!
"कौन है?" चीखा मैं,
हंसी और तेज!
"सामने आओ?" बोला मैं,
अब कोई हंसी नहीं!
कुछ देर ऐसे ही, कान लगाये रहे हम!
और तभी दो आवाज़ें गूंजीं!
जैसे किसी ने किसी को उठाकर, रगड़ दिया हो, और फेंक मारा हो!
"ये तो?" बोले शर्मा जी,
"हाँ, भागो!" कहा मैंने,
दरअसल, वो आवाज़ें, मोहर सिंह और सतीश की सी लगीं हमें! जैसे वो चिल्लाये हों! बहुत तेज! आवाज़ें एक बार ही आई थीं, उसके बाद नहीं! इसीलिए हम भाग चले थे उनकी तरफ!
हम वहां पहुंचे, मोटरसाइकिल गिरी पड़ी थीं, मोहर सिंह बायीं तरफ, एक पेड़ के पास गिर पड़े थे, औंधे मुंह, और सतीश का पता नहीं था!
"देखो उन्हें?" कहा मैंने,
शर्मा जी भाग लिए मोहर सिंह के पास, मैं भी गया, उलट-पलट के देखा, खून-खान तो नहीं था, न कपड़े ही फ़टे थे, इसका मतलब, वो सदमाग्रस्त हुए थे, या कुछ ऐसा देखा था जिस से डर गए हों वो!
"मैं सतीश को ढूंढता हूँ!" कहा मैंने,
मैं आगे गया, उधर देखा, नहीं मिला वो,
पीछे आया, तो देखा एक जगह, मिट्टी के टीले के नीचे कमर के बल पड़ा हुआ था सतीश! कुछ बड़बड़ा रहा था, मैंने सुना ध्यान से, "नहीं.......नहीं...........छोड़ दो........छोड़ दो....." ये बड़बड़ा रहा था वो,
"सतीश?" बोला मैं, नीचे बैठता हुआ,
वो बड़बड़ाये जाए,
"सतीश?" मैंने थपथपाया उसे,
आँखें न खोले अपनी!
"सतीश?" बोला मैं,
न सुने, गर्दन हिलाये, आँखें मींचे, बंद ही बंद!
"सतीश?" बोला मैं,
नहीं सुना उसने,
तभी शर्मा जी उठ कर आये मेरे पास, बैठे नीचे,
"आया होश उन्हें?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"पानी डालो ज़रा!" कहा मैंने,
"हाँ, लाया!" बोले वो,
"बाइक पर रखे बैग में है!" कहा मैंने,
"हाँ, देखता हूँ" बोले वो,
टोर्च दे दी उनको, और वो चले गए,
"सतीश?" मैंने फिर से पुकारा,
उसके गालों पर, दो-चार चपत भी लगा दीं हल्की हल्की,
"सतीश?" इस बार चीख के बोला मैं,
नहीं सुना उसने, वो तो जैसे ख़ौफ़ज़दा था बहुत!
तभी शर्मा जी, पानी ले आये, बैठे, दिया मुझे पानी बोतल खोलकर, मैंने छिड़का अब सतीश के मुंह पर, उसने मुंह बिचकाया अपना, और पानी छिड़का!
"सतीश?" बोला मैं,
और इस बार, आँखें खोल दीं उसने!
जैसे ही हमें देखा, मारी एक चीख! भागने को हो! पकड़ लिया उसे हमने! खूब समझाया-बुझाया तब उसे समझ में आया सब!
"शर्मा जी, मोहर सिंह को जगाओ!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
और चल पड़े मोहर सिंह के पास, उन्हें होश में लाने को!
"क्या हुआ था सतीश?" पूछा मैंने,
मुझे घूरे! बिना पलक पीटे!
"बताओ?" कहा मैंने,
न बोले कुछ! बस थूक गटके!
"बताओ?" कहा मैंने,
वो तो कांपने लगा! बैठ गया नीचे! मैं भी बैठा नीचे!
और तभी मोहर सिंह को ले आये शर्मा जी! मोहर सिंह तो सूखे पत्ते की तरह से काँप रहे थे! मैंने बिठा लिया उन्हें उधर ही!
"पानी पियो!" कहा मैंने,
मोहर सिंह ने पानी पिया,
"सतीश? पानी पी?" बोले शर्मा जी,
पानी पिया तब सतीश ने!
कुछ पल, हिम्मत बंधाई उनकी हमने! सहज किया उनको! और तब जाकर उनसे पूछा हमने, उन्होंने तो जैसे ज़िद ही पकड़ ली थी मुंह न खोलने की, कम से कम एक घंटा समझाया हमने उन्हें, नहीं समझ सके!
"क्या करें?" पूछा मैंने शर्मा जी से,
"इंतज़ार करो, मैं समझाता हूँ!" कहा उन्होंने,
"ठीक है!" कहा मैंने,
आधा घंटा और बीत गया, और बात न बनी! आये शर्मा जी मेरे पास,
"चलो, वापिस ही चलते हैं फिर!" कहा मैंने,
"ठीक है, सुबह बात करेंगे!" बोले वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
अब किसी तरह से मोटरसाइकिल पर बिठाया उन्हें, और चल पड़े वापिस, आज तो एक अच्छा मौक़ा चूक गए थे हम, वो कुछ बता देते तो सच में ही एक बड़ी सफलता हाथ लग जाती! लेकिन, चलो, अब जो हो, जैसा हो!
पहुंचे घर हम,
खुलवाया घर हमने,
और जा पहुंचे कमरे में, पानी मंगवाया, और तब वे दोनों हुए सहज! पानी पिया और अब की बात शुरू उनसे!
"सतीश?" कहा मैंने,
मुझे देखा उसने,
"क्या हुआ था?" पूछा मैंने,
"कोई कूदा था मुझ पर!" बोला वो, ऊपर देखता हुआ,
"कौन कूदा था?" पूछा मैंने,
"पता नहीं, बहुत बड़ा था वो" बोला वो,
"कितना बड़ा?" पूछा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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वो चुप! आगे कुछ न बोले! शून्य में ही ताके!
"मोहर सिंह जी?" कहा मैंने,
"ह...हाँ?" बोले वो,
"क्या देखा था आपने?" पूछा मैंने,
"एक साया सा था वो!" बोले वो,
"कैसा साया?" पूछा मैंने,
"मैं और सतीश वही बैठे थे, नीचे, बीड़ी सुलग रही थीं, सामने से, किसी कुत्ते की भौंकने की आवाज़ आई!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"उस बियाबान में, कुत्ता कहाँ से आ गया?" बोले अपने आप से ही वो,
बात तो सही थी, कुत्ता अक्सर इंसानी ठिकानों या बस्ती, गाँव में रहा करता है, वहाँ उस बीहड़ में कोई कुत्ता कैसे आया? बात तो चौंकाने वाली ही थी!
"फिर?" पूछा मैंने,
"कुत्ता बराबर भौंके जाए!" बोले वो,
''अच्छा!" कहा मैंने,
अब फिर से चुप वो!
मैंने कुछ पल इंतज़ार किया उनके बोलने का,
"फिर?'' पूछ ही लिया शर्मा जी ने,
"अब भेड़िया तो ऐसे भौंकता नहीं, वो तो अर्राता-गर्राता है, लेकिन वो कुत्ते की ही भौंकने की आवाज़ थी" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"वहां कोई फौजी ठिकाना भी नहीं है, जो वे लोग वहाँ पहरेदारी कर रहे हों, फौजी-ठिकाना तो बहुत दूर है वहाँ से, फिर वो कुत्ता?" बोले वो, घबराते हुए,
"बात तो सही है आपकी!" कहा मैंने,
"फिर क्या हुआ?" पूछा शर्मा जी ने,
कुछ देर, शून्य में ताक उन्होंने!
सतीश को देखा, सतीश ने उन्हें!
"उस कुत्ते की आवाज़ आगे आती गयी, हम खड़े हो गए, वो जो भी कुत्ता था, अलसेशन लगता था, बड़ी भारी आवाज़ थी उसकी, हमसे भिड़ जाता अगर तो बोटी बोटी नोंच लेता, हम डर गए थे, पता नहीं कौन हो उसके साथ!" बोले मोहर सिंह जी,
"हाँ, बात तो सही है!" कहा मैंने,
"अगर वो फौजियों का कुत्ता होता और फौजी साथ होते, तो हमारे पास कोई रास्ता नहीं था, बड़ी भारी मुसीबत हो जाती, इसीलिए हम बुरी तरह से डर गए थे!" बोला सतीश अब!
"हाँ, बात तो ठीक है!" कहा मैंने,
"तो कोई आया?" पूछा शर्मा जी ने,
"नहीं, वो कुत्ता जैसे घूम घूम कर हम पर भौंक रहा था, हम आसपास देखे जा रहे थे, न लाठी न डंडा, कैसे करेंगे, यही सोच रहे थे!" बोले मोहर सिंह तब,
"फिर?" पूछा मैंने,
"हम अँधेरे में देखते रहे, टटोलते रहे उस कुत्ते को, लेकिन नहीं दिखा!" बोले वो,
"अच्छा, आगे?" बोले शर्मा जी,
"क्या आपको भौंकने की आवाज़ नहीं आई?" पूछा सतीश ने,
"नाह! क़तई नहीं!" बोले शर्मा जी,
"कमाल है, उसकी भूंक तो दूर दूर तक आ रही थी?" बोले वो,
उनके लिए ये कमाल ही था, लेकिन असलियत क्या थी, ये हम जानते थे!
"फिर क्या हुआ?" पूछा मैंने,
करीब बीस मिनट के बाद, एक आदमी सीखा, उस कुत्ते को रस्सी से पकड़े हुए, कुत्ता नज़र आया हमें, चमक रही थीं उसकी आँखें, आग की तरह!" बोले वो,
"अलसेशन था कुत्ता?'' पूछा मैंने,
"नहीं, वो जैसे गड़रियों के होते हैं न? वो जो बंजारे हुआ करते हैं, वैसा कुत्ता था, चितकबरा सा, उसके बाल बहुत बड़े थे!" बोले वो,
'फिर?" पूछा मैंने,
"उस आदमी ने, हमारी तरफ किया इशारा और वो कुत्ता भाग छूटा हम पर!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"फिर? हम भागे उलटे पाँव, मोटरसाइकिल से टकराये, गिरे, उठे, सोचा पेड़ पर चढ़ जाएँ, भागे जल्दी जल्दी!" बोला सतीश,
"फिर?" पूछा मैंने,
"हम पहुंचे एक पेड़ के पास, रुके, चढ़ने को हुए, तो कुत्ते की भूंक बंद हो गयी!" बोले मोहर सिंह,
"मतलब? अब कुत्ता नहीं भौंक रहा था?" पूछा मैंने,
"हाँ जी, पीछे देखा तो कोई कुत्ता नहीं था!" बोले वो,
"फिर?" शर्मा जी बोले,
"कुत्ता नहीं था कहीं भी वहां, हमने आसपास देखा, कहीं भी नहीं था वो कुत्ता!" बोला सतीश,
"और वो आदमी?" पूछा मैंने,
"वो भी नहीं था!" बोला सतीश,
"अच्छा, एक बात?" कहा मैंने,
"जी?" बोला वो,
"वो आदमी कैसा था?" पूछा मैंने,
"बाबा जैसा!" बोला वो,
"क्या उम्र?" पूछा मैंने,
"करीब पचास?" बोला वो,
"वस्त्र?'' पूछा मैंने,
"लाल थे शायद, या मेहरून से?" बोला वो,
"कद-काठी?" पूछा शर्मा जी ने,
"लम्ब-तड़ंग!" बोले मोहर जी,
"तो वो आदमी भी नहीं था?" पूछा मैंने,
"कहीं नहीं!" बोले वो,
'फिर?" पूछा मैंने,
"हम वापिस मुड़े, सोचा आपके पास दौड़ आएं!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"जैसे ही मुड़े, पेड़ से कोई साया सा कूदा!" बोले वो,
"उसी पेड़ से?" पूछा मैंने,
"हाँ जी!" बोला सतीश,
"फिर?" पूछा मैंने,
"फिर क्या था? किसी ने मुझे और सतीश को बाजूओं से पकड़ा, दिखे कोई नहीं, हाँ, गंध मेहँदी सी आये उस वक़्त, उसने फेंक के मारा हमें, करीब बीस फ़ीट, मैं सतीश को देखूं और सतीश मुझे!" बोले वो,
"साया?" पूछा मैंने,
"जी!" बोला सतीश,
"कोई इंसान जैसा नहीं?" पूछा मैंने,
"नाह जी?" बोले वो,
"कोई बड़ा सा कपड़ा?" कहा मैंने,
"मान लो!" बोले वो,
"उठा कर फेंक दिया!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"कोई आवाज़?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"आवाज़ नहीं हुई?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"कैसी भी?" पूछा मैंने,
"कैसी भी!" बोले वो,
मैं सोच में पड़ा था!
साया? बड़े कपड़े जैसा? कौन हो सकता है?
और वो कुत्ता? वो आदमी? कौन?
"एक बात और?" कहा मैंने,
"जी?" बोला सतीश,
"क्या कोई चोट लगी है तुम्हें?" पूछा मैंने,
उन्होंने अटोला-टटोला! कोई चोट नहीं!
"नहीं जी, बच गए!" बोले वो,
"इसका मतलब जानते हो?" पूछा मैंने,
"क्या जी?" बोले मोहर सिंह,
"कोई आपकी जान नहीं लेना चाहता था!" कहा मैंने,
उन्हें जैसे यक़ीन ही नहीं हुआ! जैसे मैंने कोई मज़ाक किया हो!


   
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