उस रात, बाबा ने गुणा-भाग, धन-ऋण सब कर डाला! कहाँ चूक हुई थी, कहाँ गलती हुई थी, सब का हिसाब कर डाला! और अब उसने अति-क्लिष्ट सिद्धियों का प्रयोग करना आवश्यक समझा! इसके लिए उसको केशि की आवश्यकता पड़ी थी, तो केशि को भी संग ले लिया था! और सुबह चार बजे तक, वो अपनी सिद्धियों के मद में उन्मत्त हो गया था! उसके बाद, स्नान किया और आराम करने चला गया था, सुबह करीब आठ बजे उठा, स्नान किया, पूजन आरम्भ किया, पूजन, करीब तीन घंटे तक चला! अपनी इष्टा को, उसने, माछ-भोग दिया था! और तब, वो तैयार था!
"लोहकू?" बोला बाबा,
"हाँ?" बोला लोहकू, सुलपा खींच रहा था!
"पुत्तन कहाँ है?" पूछा बाबा ने,
"यहीं है! बुलाऊँ?" बोला वो,
"हाँ!" कहा उसने,
लोहकू ने आवाज़ दी पुत्तन को, पुत्तन दौड़ा दौड़ा आया, बैठ उकडू,
"हाँ?" बोला पुत्तन,
"एक काम कर, उस जगह जा, लोहकू के साथ, और ये, ये गाड़ आ उधर, समझा?'' बोला बाबा!
"अभी!" बोला वो,
और तब बाबा ने, हड्डी का एक टुकड़ा दे दिया उसे, ये अभिमंत्रित था! इस से बाबा को लाभ मिलता, ऐसे टुकड़े से, स्थान-स्तम्भन हो जाया करता है, यही उद्देश्य था बाबा का!
"लोहकू? जा चला जा अभी!" बोला वो,
"जाता हूँ!" बोला लोहकू, और सुलपा, कर दिया खाली!
उसके बाद, वे दोनों चले गए वहाँ से, वहीँ जहां भेजा गया था उन्हें, उन सखियों और मृणा से पहले पहुंच कर, ये काम कर देना था उन्हें!
"तम्मी?" बोला बाबा,
"हाँ?" बोला तम्मी!
"जा, किसी को साथ ले जा, और गाँव में जा, उसी घर से, ले आ कुछ!" बोला वो,
"अच्छा!" बोला तम्मी!
"अभी निकल जा!" बोला वो,
"जाता हूँ!" बोला वो,
वो ही चला गया, तब बाबा ने कुछ सामान निकाला, और करने लगा, छानबीन उसकी, कुछ निकालता और रखता जाता!
"केशि?" बोला वो,
बाहर थी केशि, बाल सुखा रही थी अपने,
"केशि?" ज़ोर से बोला वो,
"हाँ? बुलाया?'' पूछा केशि ने, बाल फटकारते हुए!
"हाँ, इधर आ?" बोला वो,
"हाँ?" पास बैठते हुए बोली वो,
"सुन, आज तू यहीं रहना!" बोला वो,
"क्यों?" चौंक के पूछा केशि ने,
:हाँ, मामला वैसा नहीं है जैसा लगता था!" बोला बाबा,
"क्या मतलब?" पूछा केशि ने!
"हाँ, आज मत जा!" बोला वो,
"ठीक है!" बोली वो,
और उठ कर, चली गयी बाहर!
बजे चार.........
पुत्तन और लोहकु, वापिस आ गए थे, कर आये थे बखूबी अपना काम! बाबा हुआ खुश!
मृणा के घर से धान मिल गया था, वो दे दिया गया बाबा को, बाबा ने, उसको एक डिब्बी में डाल कर रख दिया, थोड़ा सा, और बाकी वहीँ रख दिया!
ठीक साढ़े चार बजे,
बाबा अकेला ही चल पड़ा, सभी को समझा दिया था उसने, अगर नहीं लौटा दो घंटे तक, तब पुत्तन और लोहकू रवाना होने थे, उनके एक घंटे बाद, तम्मी और पीरु! केशि को आज नहीं जाना था, बाबा ने मना कर दिया था उसे!
तो बाबा चल पड़ा था, मंत्र जपते हुए! आज उसने बहुत तैयारी की थी! आज तो कुछ होना ही था! या तो पतवार गिरेगी या नैय्या पार ही समझो! बाबा अम्फू तैयार था! चाहे कुछ भी होता, उसे भय नहीं था! साढ़े पांच बजे, वो वहीँ आ गया, जहाँ वो पहले आया था, उस पेड़ की ओट में! मृणा को आने में अभी कुछ देर थी, तो बाबा ने अपना सारा सामान पेड़ की एक टहनी से बाँध दिया था, खंजर निकाल लिया था बाहर,
पौने घंटे बाद......
मृणा अपनी सखियों संग आ पहुंची थी वहां! उस पर नज़र बाँध ली थी उसने! मृणा ही तो वो कुंजी थी, जिससे, सेंध लगती उस ब्रह्म-पिशाच के अस्तित्व में!
"अम्फू!" आवाज़ आई फिर से!
वो खड़ा हुआ तभी!
"सामने आ!" बोला अम्फू!
"क्या चाहता है तू?" आई आवाज़!
बाबा के चेहरे के भाव बदले!
कड़वी सी हंसी आई होंठों पर!
ये तो, बिन लड़े-भिड़े ही, हार मानने के करीब था! और क्या चाहता था बाबा! ख़ुशी के मारे, दोगुना हो गया फूल कर वो!
"क्या देगा मुझे?" बोला बाबा,
"क्या चाहता है?" पूछा किसी ने,
"दे सकेगा?'' बोला बाबा, किसी मंझे हुए से प्रपंची के जैसे! कूटनीतिज्ञ जैसे!
"सामर्थ्य में है जो!" आई आवाज़!
"जा! तू नहीं दे सकता!" बोला वो,
"मांग!" बोला कोई!
"लौकिक-द्विक्ष एवं इक्तवांग!" बोला बाबा!
"असम्भव!" बोला कोई!
अब हंसने लगा वो बाबा! खूब हंसा!
"मैं जानता था, तैतिल! मैं जानता था!" बोला वो,
"कुछ और मांग!" बोला वो,
"ना! और कुछ नहीं!" बोला वो,
"तो लौट जा! इसी में तेरा हित है!" आई आवाज़!
"लौट जाऊं?" बोला बाबा, हँसते हुए!
"हाँ! इसी क्षण!" बोला कोई!
"हा! जिसे अम्फू ने ठाना, वो मिल गया, अब चाहे जैसे भी! समझा?" बोला अम्फू!
"तेरा अंश भी शेष न होगा!" आई आवाज़!
"और उसका? हैं? उसका?" बोला इशारा करते हुए, उस मृणा की तरफ!
"उतना तुझ में साहस नहीं" आई आवाज़!
"साहस? मेरा साहस?" बोला वो,
"हाँ! तेरा साहस!" आई आवाज़!
और एक ही क्षण में, वो भीमकाय तैतिल, प्रकट हो गया! बाबा ने ऊपर से नीचे तक देखा उसे! और देखते ही, मुस्कुराया!
"तैतिल! वाह! तुझे आना पड़ा! जानता है न? क्या होता? उसका??" बोला अम्फू!
"अम्फू?" बोला क्रोध से वो!
और अम्फू! गाल बजाए! हँसे!
"अच्छा किया तो आ गया! नहीं तो इसकी निशासखी बनाता मैं!" बोला अम्फू!
अब क्रोध के मारे हुए लाल वो! नेत्र हो गए पीले उसके! भुजाएं फड़क उठीं उसकी! लेकिन, फिर नेत्र बंद कर लिए अपने! जैसे सारा क्रोध पी गया हो!
"अम्फू! एक जीवनदान दूंगा तुझे!" बोला वो,
"तू? तू देगा?" बोला हँसते हुए अम्फू!
"हाँ! मैं!" बोला गरज कर वो तैतिल!
"तुझ में साहस नहीं! नहीं है साहस!" बोला अम्फू!
"लौट जा! प्राण बख्श देता हूँ तेरे!" बोला वो,
"प्राण तो मैं लेने वाला हूँ तेरी प्रेमिका के!" बोला वो,
फिर से क्रोध पी गया तैतिल! पीना ही पड़ा उसे! ये बाबा, हठी, वाचाल और कुमति था, न जाने क्या करता, कहीं, मृणा के परिवार को ही न जला-फूंक देता! हर कोना देखना पड़ रहा था तैतिल को! इसीलिए, बार बार क्रोध और अपमान के घूँट निगले जा रहा था वो! बार बार!
"अम्फू! मान जा! मैं तुझे बदले में और कुछ भी दे सकता हूँ!" बोला वो,
"नहीं! नहीं चाहिए!" बोला वो,
"मान जा अम्फू!" बोला हल्की से आवाज़ में!
"तैतिल! तेरे बस में जो हो, कर ले! मैं नहीं जाने वाला! जो माँगा, वो दे, नहीं तो, मैं हरूँगा इसके प्राण!" बोला वो,
"अम्फू??" चिल्ला के पड़ा तैतिल!
कोई सुन लेता, तो फट ही जाता सीना उसका!
उसके नेत्र देखते ही, काठ का हो कर रह जाता!
लेकिन बाबा तो बंधा हुआ था अपने सिद्धि-बल में! कवच पहने था! अभेद्य कवच था उसका! इसी के बल पर, उसने इतना बड़ा जोखिम उठा लिया था! कोई और होता, तो नाम सुन कर ही, विक्षिप्ति का रोगी हो जाता!
"तैतिल? तू मुझे, जो माँगा दे! मैं अपनी राह चला जाऊँगा! किसी को बताऊंगा भी नहीं! मरते दम तक, मुंह न खोलुंग इस विषय में!" बोला अम्फू!
"वो असम्भव है!" बोला तैतिल!
"तो हो गया निर्णय! कल का सूरज न देख पाएगी तेरी शैय्या-सुंदरी!" बोला गाल बजाते हुए अम्फू!
पल में ही, उसके सम्मुख आ खड़ा हुआ! इतना निकट, कि साँसें टकरा जाएँ! आकार में, अब उसके बराबर हो गया था!
"मान जा अम्फू!" बोला धीरे से,
"ना!" बोला वो,
"समझ जा, अभी भी!" बोला तैतिल!
"समझ चुका हूँ!" बोला अम्फू!
और हंसने लगा! झट से, लोप हुआ तैतिल! और प्रकट हुआ, मृणा के पास, समझाया उसने मृणा को, कि अभी वो लौट जाए! चौंक पड़ी थी मृणा! आज से पहले, कभी न हुआ था ऐसा! लेकिन कहा टाला नहीं उसने! लौट पड़ने को जैसे ही चली, कि सामने, आ गया था वो बाबा!
"ठहर जा!" बोला अम्फू!
डर गयी बेचारी मृणा! आँखे फ़टी की फ़टी रह गयीं उसकी! कुछ न भांप सकी वो! तब, तैतिल ने, पीछे कर लिया उसे!
"तैतिल?" बोला बाबा!
और आया करीब!
"बस अम्फू!" बोला हाथ दिखाते हुए अम्फू को!
अम्फू, रुक गया! देखने लगा दोनों को!
"इसकी खातिर, मान जा तैतिल!" बोला वो, अपना खंजर अपने चोगे से निकालते हुए!
"बस अम्फू! बस!" बोला वो!
इतना बोला तैतिल! और वो बाबा, हवा में उठ चला! ऐसा उठा, कि उलटा हो गया! सर नीचे, पाँव ऊपर! जैसे किसी ने पाँव से पकड़ कर, उठा दिया हो उसे!
"मृणा! जाओ! शीघ्र! शीघ्र ही!" बोला वो,
कुछ नहीं समझी वो! बस, देखा तैतिल को, भयभीत सी लग रही थी!
"जाओ, जाओ, जल में खड़ी रहना, मेरी प्रतीक्षा करना!" बोला वो,
और मृणा का हाथ पकड़ कर, किया आगे, और भेज दिया वहां से! वो गयी, और बाबा ने अपना जप पूरा कर लिया था! जप के पूरा होते ही धम्म से नीचे गिरा! जैसे ही गिरा, उठ खड़ा हुआ! मृणा को जाते हुए देखा!
"कब तक बचाएगा?" बोला अम्फू!
"कोई आवश्यकता नहीं उसकी!" बोला तैतिल!
"अच्छा?" बोला बाबा!
"हाँ!" कहा उसने,
"आज तेरा अंत आया है अम्फू!" बोला वो,
बाबा हंसा! बुक्का फाड़ कर हंसा!
"अंत!" बोला वो, पेट पकड़ कर, हंसने लगा!
"तुझे एक जीवनदान दिया था, कल छोड़ दिया था, तू फिर से लौट आया अम्फू! अम्फू, क्या तू जानता है, मैं तेरा क्या करने वाला हूँ?" बोला तैतिल, क्रोध में भड़कते हुए!
"थू! तेरे मुंह से ये शोभा नहीं देता, ऐसा कहना!" बोला वो,
और तभी!
तभी वायु का ज़ोर प्रचंड हो गया! ऐसपर्चण्ड, कि अम्फू न सांस ले सके और न खड़ा ही हो सके! वो नीचे बैठा, गिर पड़ा, पत्थर चले उसकी तरफ! पेड़ झुक झुक कर, उसके ऊपर आने लगे! भूमि में, छेद स अहोने लगा! लगा कि, अम्फू अभी समा जाएगा उसके अंदर!
लेकिन!
लेकिन अम्फू ने उसकी भी काट कर दी! अराल-महाविद्या का मन ही मन, संधान कर लिया था उसने! अब वायु तो बहती रही, पर उसे न छू रही थी!
आँखें पोंछीं उसने!
थूक फेंक कर, मुंह साफ़ किया!
"तेरी एक न चलेगी!" बोला गुस्से से वो! बाबा!
भराड़ की सी आवाज़ हुई!
भूमि में से, कई जगह से, धुंआ निकलने लगा! झाग से निकलने लगे! ताप ऐसा, कि लोहा भी पिघल जाए! बाबा न घबराया! एक मंत्र पढ़ा, तेज तेज! और अपनी कलाई खंजर से बींध कर, रक्त टपकाता चला गया! अभीष्ट हुआ! सब सामान्य हो गया! शेष बचा कुछ तो जले हुए से झाड़-झंखाड़!
"तेरा पाला अम्फू से पड़ा है! अम्फू से!" बोला वो,
और आया ठीक सामने!
पढ़ा एक मंत्र! आँखें कीं चौड़ी! रक्त मुंह में लिया! चूसा!
"आक थू!" थूका अम्फू ने!
और वो, तैतिल, लोप!
"कहाँ जाएगा?'' बोला अम्फू!
और फिर से एक मंत्र पढ़ा! भूमि पर दी थाप, और थूक दिया! एक ही पल में, प्रकट हो गया तैतिल! इस बार, लाल रंग से लिपा हुआ! जैसे, रक्त का रंग हो! बाबा ने फाड़े गाल अपने!
"तैतिल?" बोला चीख कर!
"मान जा! नहीं तो यहीं बाँध दूंगा अनंतकाल के लिए तुझे!" बोला चीख कर अम्फू!
तैतिल, खड़ा रहा, जस का तस! आँखें मिलाता हुआ, उस अम्फू से! अम्फू ने जो काट की थी, उस से उसका मनोबल और बढ़ गया था! इसीलिए बड़बोलापन अब सर पर सवार था उसके! जो मुंह में आ रहा था, बके जा रहा था वो! और तैतिल, चुपचाप उस बाबा को, देखे जा रहा था!
"अम्फू से कोई नही बच पाया! तू भी नही बचेगा!" बोला अम्फू!
और तब पढ़ा एक मंत्र! मंत्र एक महाविद्या का था! अपने खंजर पर, अभिमंत्रण किया उसने! फिर बैठा, उठायी मिट्टी एक मुट्ठी! हंसा! और अपनी इष्टा का नाम लेते हुए, फेंक मारी सामने! ठीक तैतिल पर! लेकिन? ये क्या? ये क्या हुआ?
मिट्टी तो तैतिल को ऐसे पार कर गयी कि जैसे वो परछाईं हो! जैसे कोई तस्वीर हो, वो भी पारदर्शी सी! जैसे प्रकाश से बनी कोई तस्वीर! मिट्टी, जस की तस, बाहर चली गयी थी उसके अंदर से!
बाबा के आँखें फ़टी रह गयीं! उसे यक़ीन ही नहीं हुआ! ऐसा तो न उसने कही सुना था, न किसी ने बताया ही था और देखा, आज पहली बार ही था!
"जा! लौट जा अम्फू!" बोला वो,
"नहीं! नहीं! अब अम्फू नहीं लौटेगा!" बोला वो,
"प्राण गंवा देगा अम्फू!" बोला वो!
"कौन प्राण गँवायेगा, ये तू भी देखेगा!" बोला अम्फू!
"हठ न कर! तुझ में सामर्थ्य नहीं!" बोला तैतिल!
अब तो ये सुन, भड़क गया अम्फू! बैठ गया नीचे! खंजर से, ज़ीक़ा काढ़ा उसने! और ज़ीक़े में एक त्रिकोण पर, हाथ रख दिया अपना! पढ़ा मंत्र! किये नेत्र बंद, और खोले फिर! उठाया हाथ, और मंत्र पढ़ते हुए, भूमि पर हाथ फेर दिया! सर्र की सी आवाज़ हुई! और वो वो तैतिल, झम्म से लोप हुआ!
"आ?" बोला चीख कर अम्फू!
नहीं आया वो!
"आता क्यों नहीं? डर गया अम्फू से?'' अर्रा के बोला वो!
अगले ही पल, वायु में, प्रकट हुआ वो! इस बार, पुनः अपने ही पुराने वाले वेश में!
और उतर आया भूमि पर!
बाबा ने फिर से हाथ घुमाया भूमि पर!
और इस बार, इस बार जम कर खड़ा रहा तैतिल!
केश भी न हिला उसका! बाबा ने कई बार मंत्र पढ़े, बार बार! लकेँ कोई प्रभाव नहीं हुआ तैतिल पर! वो, वैसे ही खड़ा रहा!
"जा! क्षमा करता हूँ!" बोला तैतिल!
बाबा दहाड़ा! चीखा!
"नहीं! तुझे मेरा बल नहीं पता! नहीं जानता तू!" बोला वो,
"कोई बल नहीं चलेगा अम्फू!" बोला वो,
"कैसे नहीं चलेगा?" बोला वो,
और हुआ खड़ा! पढ़ा मंत्र! अपनी जवहा निकले बाहर! दांतों से काटा उसे, रक्त किया मुंह में इकट्ठा, मन ही मन, जपे मंत्र! और थू!
थूक दिया रक्त सामने!
ये, अहोम-क्रिया थी! कोई प्रेतादि होता, तो भाग चुका होता अब तक! लौट के कभी नहीं आता वापिस फिर! लेकिन तैतिल, टस से मस भी न हुआ!
"अम्फू! लौट जा! अभी भी समय है!" बोला वो!
कुछ न बोला वो, बस, कुछ बुदबुदाता रहा!
"अम्फू! तू वर्षों तक खेल, खेल! कुछ न होगा!" बोला वो,
"बता देता हूँ! ठहर!" बोला वो,
और फिर से बुदबुदाने लगा!
अगले ही पल, लोप हो गया तैतिल! लेकिन अम्फू ने बुदबुदाना नहीं छोड़ा! दरअसल, बाबा किसी का आह्वान कर रहा था, किसी शक्ति का, जिसके आगे, ये तैतिल नत-मस्तक हो जाए! लेकिन ऐसी शक्ति थी कौन सी? ये नहीं पता चला सका!
कम से कम पच्चीस-तीस मिनट गुजर गए होंगे! कि बाबा उठा! पीटीं जंघाएँ उसने अपनी! और आया आगे! चारों तरफ देखा! हर तरफ!
"मैं यहीं हूँ अम्फू!" बोला तैतिल!
"देख! तेरा क्या हाल करता हूँ मैं!" बोला चीख कर बाबा अम्फू!
और तब, बाबा अम्फू ने, बीजिशा (मंत्र समाप्त होने के बाद वाले शब्द) पढ़ डाला! एक बार! दो बार! तीन बार! चीख चीख कर!
"हे कंक-माले! हे कंक-माले! दया! दया!" चीखे वो, गिड़गिड़ाए! भूमि पर हाथ मारे! छाती पर हाथ मारे बार बार!
"कंक-माले? दया! प्रकट हो! प्रकट हो!" चीखा वो!
बार बार! आकाश को देखते हुए! भूमि पर, घूंसे बरसाते हुए!
लेकिन नहीं! नहीं हुआ कोई प्रकट! कोई भी नहीं!
"मैं कहा था न अम्फू!" बोला तैतिल!
बाबा को गुस्से में अब कुछ न दिखाई दे! बोलने लगा अनाप-शनाप! जो मुंह में आया, बके चला गया! मृणा के बारे में, तैतिल के बारे में! आदि आदि!
और तैतिल!
पहली बार हंसा! पहली बार! थर्रा के रख दिया अम्फू को उसने!
"अम्फू! समय है अभी, लौट जा!" बोला वो,
बाबा को आया गुस्सा तब!
बैठ गया भूमि पर!
अपनी छाती पर चलाया खंजर! बनाया एक चिन्ह! अर्थात, वो जिसको बुलाने वाला था, अब चाहे वो, अम्फू को जिताने के बाद, भोग स्वरुप में, भक्षण कर ले! ये था उसका आशय!
करने लगा जाप!
उच्च तांत्रिक महाजाप!
और तैतिल! लोप हुआ!
कोई दस मिनट के बाद, बाबा भूमि पर लेट गया! और जपने लगा मंत्र! रोता जाए! हँसता जाए! रोये भी, हँसे भी! और फिर, एक झटके से उठ बैठा!
हुआ खड़ा!
"तैतिल?" चीख कर बोला वो!
और तैतिल प्रकट हुआ! एक ही क्षण में!
"तब शेष रहा, अब न रहेगा!" बोला बाबा, हँसते हुए!
तैतिल सुनता ही रहा! बोला कुछ नहीं!
और तब, पढ़ा बीजिशा बाबा ने! बैठ भूमि पर, हाथ नचाये अपने, और पढ़ दिया बीजिशा! मारा हाथ भूमि पर!
"हे कपाल-डिम्बा! प्रकट हो!" बोला अब, वो दोनों हाथ जोड़ कर!
वायु बह चली!
तेज! प्रलयंकारी सी! सांय सांय का शोर! पेड़-पौधे बावरे हो गए! धूलम-धाल मच गयी! और बाब का अट्ठहास भी आरम्भ हो गया!
तब, तैतिल ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया! बंद! वायु-प्रवाह बंद! जैसे, वहां के वातावरण से, सारी वायु सोख ली गयी हो! सब शांत! बावरे हुए पेड़-पौधे, जैसे, हवा में किसी सुंदरी का आँचल ढुलक जाता है और वो, झट से उसको संभालती है, ऐसे संभालने लगे अपने आप को!
बाबा की आँखें फटीं!
ये कैसे हुआ? कैसे सम्भव? महामसानी समान, कपाल-डिम्बा, क्यों नहीं प्रकट हुई? क्या कारण रहा? ऐसा कैसे सम्भव है? कैसे? बाबा, इधर उधर देखे, और तब, नज़र भरी उस तैतिल पर, जो, पाषाण समान, शांत ही खड़ा था!
और फिर.....................
कपाल-डिम्बा नहीं प्रकट हुई! कपाल-डिम्बा, श्मशान-सुंदरी हुआ करती है, महामसानी के समकक्ष ही मानी जाती है, परन्तु आयु में, उस से कम हुआ करती है, मारण-कर्म में, इसकी विद्या का प्रयोग होता है, इसको कई नामों से जाना जाता है, काल-रूढ़ा, अजेय-रूपा आदि आदि! ये अभीष्ट प्रदान किया करती है, त्वरित ही! लेकिन जैसा बाबा अम्फू ने सोचा, हो ही नहीं पाया! बाबा अम्फू के प्रत्यक्ष-मंत्र और बीजिशा, शून्य में ही धसरित हो रहे थे! सम्भवतः, ये बाबा अम्फू नहीं जान पा रहा था! आह्वान पर, प्रकट होना ही होता है किसी भी शक्ति को, परन्तु ऐसा नहीं हो पा रहा था! इस से पहले कि अम्फू को कुछ समझ आता कि....
"अम्फू!" बोला वो,
बाबा अम्फू ने, लाल लाल नेत्रों को तरेड़ता हुआ, देखा तैतिल को! तैतिल, तो अब उसके अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया था! ऐसा लग रहा था बाबा अम्फू को!
"लौट जा अम्फू! लौट जा!" बोला तैतिल!
"लौट जाऊं? खाली हाथ?" चीखा बाबा अम्फू!
"प्राण तो शेष हैं!" बोला तैतिल!
"प्राणों की चिंता ही नहीं अम्फू को!" बोला बाबा अम्फू!
"अपने प्राणों की न सही!" बोला तैतिल!
बाबा चौंका! उछल ही पड़ा ये सुनकर!
"इसलिए कहा अम्फू! लौट जा! लौट जा! अभी ही समय है!" बोला तैतिल!
"ऐसे नहीं जाएगा अम्फू! ऐसे नहीं जाएगा!" बोला अम्फू!
बैठा नीचे बाबा अम्फू!
उतारा अपना कंठ-माल!
निकाले मनके उसके! और पढ़ने लगा मंत्र! एक एक मनका, फेंकने लगा सामने! मंत्र पढ़े जाता और क्रोध में भरे जाता अम्फू! जो ज़ीक़ा काढ़ा था उसने, उसमे कुछ मनके स्थापित कर दिए! ये प्रबल षट-कर्म में से एक था! वो महाभंजन करने पर तुला था अब!
अचानक से हुआ खड़ा! हँसते हुए!
"सुन तैतिल! तेरी वो प्रेमिका! देख! क्या हाल होता है उसका! देख!" बोला वो,
और मंत्र पढ़ते हुए, फेंक मारे सारे मनके नदी की तरफ!
अब दृश्य देखने वाला था!
एक एक मनका, भूमि पर गिरने से पहले, राख होता चला गया! एक भी मनका नीचे न गिरा! ये देख, बाबा बिफर पड़ा! गुस्से में न जाने क्या क्या बकता रहा! भूमि पर बैठ गया, और उठाये मनके, पढ़ा मंत्र, फिर से फेंक मारे सामने! और फिर से वही! सभी के सभी, राख होते हुए, भूमि पर आ पड़े!
"अम्फू! तेरे साहस की दाद देता हूँ! अभी भी कुछ मांग सकता है, प्रदान करूंगा!" बोला तैतिल!
"हुंह? तू प्रदान करेगा? तुझे इस लायक छोड़ूंगा तब करेगा न?" चीख कर बोला बाबा अम्फू!
अम्फू, अब क्रोध में भड़कने लगा था! कहते हैं न, क्रोध में व्यक्ति विवेक की सीमा लांघ जाता है! उसे तब आभास ही नहीं होता कि कुछ उचित है और क्या नहीं! किसमें हित है और किसमें नहीं! अब यही होने लगा था बाबा अम्फू के साथ!
इसी वार-प्रतिवार में, दो घंटे बीत गए! और अब वहां, पहुँचने वाले थे पुत्तन और लोहकू, यही निर्धारित हुआ था, ये बात अम्फू भी जानता था!
सहसा ही, तैतिल लोप हो गया!
और इधर, बिना देर किये, पुत्तन और लोहकू भी पहुँच गए! उन्होंने बाबा को देखा, तो फौरन ही जान गए कि बाबा अम्फू को अभी तक कोई जीत नहीं मिली है, बाबा बेहद घबराया हुआ और सदमाग्रस्त सा लग रहा था!
"लोहकू?" बोला बाबा,
"हाँ बाबा?" बोला वो,
"अलख जोड़! जल्दी!" बोला वो,
"अभी बाबा!" बोला वो,
"पुत्तन?" बोला बाबा,
"हाँ बाबा?" बोला वो,
"झोला खींच ले, हाड़ दे दे!" बोला वो,
पुत्तन ने ठीक ऐसा ही किया, दे दिया झोला बाबा को, बाबा ने झटपट से झोले में से, निकाल लिए दो हाड़! ये भुजाओं के हाड़ होते हैं, अक्सर, कई विद्याओं में, ये उन्हें जागृत करने के काम आते हैं! कुछ ही देर में, अलख उठा ली गयी! बाबा ने जम कर अट्ठहास किया और पुत्तन, लोहकू को पीछे रहने को कहा, अलख में ईंधन झोंकना ही काम था उनका!
अब बाबा ने अलख में झोंका ईंधन! और करने लगा कुछ गहन मंत्रोच्चार! पूत और लोहकू, आँखें फाड़ते हुए, बाबा को देखते रहे!
एल प्रबल अट्ठहास गूंजा!
ऐसा अट्ठहास कि पुत्तन और लोहकू भी काँप गए एक बार को तो! इधर बाबा भी अलख से भिड़ रहा था! अब कि बार क्या करे, ये सिर्फ बाबा को ही पता था!
"तैतिल?" चीखा बाबा!
पुत्तन और लोहकू, वे भी खड़े हो गए!
और तब, चमकदार लाल से वस्त्रों में, राजसिक वेशभूषा धारण किये हुए, तैतिल प्रकट हो गया! तैतिल का रूप देख, पुत्तन और लोहकू की रीढ़ में भय ने नाच किया तब ही! उन्होंने न तो कभी ऐसा कोई देखा था और न ही कुछ सुना ही था! ब्रह्म-पिशाच ऐसा होता है, आज पहली बार ही देखा था उन्होंने!
"तैतिल?" बोला चीख कर बाबा!
तैतिल, सम्मुख हुआ, कुछ ही दूर!
"अब तेरा नाश करूंगा मैं! बहुत खेल दिखाया तूने!" बोला ज़ोर से बाबा!
तैतिल ने अट्ठहास किया!
"मूर्ख! तू नहीं समझ पा रहा!" बोला तैतिल!
"तू क्या समझायेगा मुझे?" बोला बाबा,
"एक अवसर! बस! अम्फू, शेष है एक अवसर!" बोला तैतिल!
"तैतिल! तू जानता नहीं किसके सम्मुख खड़ा है!" बोला बाबा!
अब तो तैतिल ने, उसके पूर्वजों की पूरी फेहरिस्त ही सुना दी बाबा को! बाबा जानता था, कि उस से कोई बात नहीं छिपी थी! इसीलिए, नहीं घबराया वो!
आगे बढ़ा बाबा!
लिए दोनों हाड़ हाथों में!
और एक मंत्र पढ़, टकरा दिए आपस में!
तैतिल! इसके बाद, कई जगह प्रकट हुआ, और कई जगह लोप! स्पष्ट था, इस वार से तैतिल को कष्ट पहुंचा था! इसीलिए वो बार बार प्रकट होता, बार बार लोप!
और बाबा!
बाबा ने जम कर अट्ठहास लगाया! कई बार!
"मुझसे टकराएगा?" बोला बाबा!
पुत्तन और लोहकू, मारे भय के चिपक गए आपस में!
अचानक!
अचानक से ही, बाबा अम्फू के हाथों में जकड़े वो दोनों हाड़, चटक गया! किरिच किरिच बिखर गयी उनकी! आग जल उठी उनमे! फेंक दिए भूमि पर! अपने वस्त्रो से किरिच से पैदा हुआ अंगारों को झाड़ा उसने! और अलख के पास, लौट आया!
"पुत्तन? ईंधन?" चीखा बाबा!
अ वे दोनों, अलख में ईंधन झोंकने लगे! कांपते हुए हाथों से! नज़र कहीं और, और हाथ कहीं और! सामग्री, कुछ अलख में गिरती और कुछ बाहर ही रह जाती!
बाबा का ये प्रयोग भी छिन्न-भिन्न हो गया! ये एक महाप्रयोग था, लेकिन उसकी तो किरिचें उड़ा दीं! पुत्तन और लोहकू मारे भय के, अपने पांवों से, रगड़-रगड़ कर, भूमि में मांद ही बना देते! वे दोनों इतना घबरा गए थे कि बाबा ने अगर एक बार भी ये कहा होता कि चलो यहां से, तो शायद वे ही, एक सांस में, सबसे पहले पहुँच जाते वहीँ, जहां वो ठहरे थे! लेकिन अब मज़बूरी थी! बाबा की नहीं सुनी तो गए, बाबा की सुनी, तो जो हो रहा है, ये तो तय है कि अब नहीं तो कुछ पलों के बाद, और नहीं तो कुछ और पलों के बाद, प्राण छूटने ही वाले हैं! वे फंस के रह गए थे!
उधर अट्ठहास लगाया उस तैतिल ने! अब तक, तैतिल समझ ही चुका था कि बाबा अम्फू नहीं लौटने वाला! वो या तो वही प्राप्त करके जाएगा या फिर, अपने प्राण गंवा देगा! ऐसा हठ पकड़ा था बाबा अम्फू ने!
"अम्फू?" बोला तैतिल,
बाबा खड़ा हुआ, अपना त्रिशूल लिए हुए!
"तेरा अंत निकट है अम्फू! ये अंतिम चेतावनी है! मान जा, लौट जा!" बोला तैतिल!
हंसी में उड़ा दिया! तैतिल के इस गंभीर व्यक्तव्य को, हंसी में उड़ा दिया!
"जब शत्रु, परास्त होता है, पराजय के सम्मुख होता है, तो तेरे जैसी ही भाषा का प्रयोग करता है तैतिल! अंत मेरा नहीं, तेरा आया है! तू ब्रह्म-पिशाच है! जानता हूँ! तुझे तो आंक रहा था मैं! आंक लिया, अब तू? कैसे काटेगा मेरे वार-प्रहार?" बोला अकड़ कर अम्फू!
शक्तियों का मद क्या होता है, स्पष्ट था!
मद किस प्रकार ईंधन का प्रबंध कर लेता है, स्पष्ट था!
अंत किसका होगा, अब ये भी स्पष्ट होने ही वाला था!
एक घंटा और बीत गया!
और तब, पीरु भी आ गया उधर, तम्मी के साथ! सारा हाल देख लिया था उन्होंने! ये भी कि अब आगे होगा क्या! लेकिन, वे पीछे हटने वाले नहीं थे! उन्हें बाबा की शक्ति और बल पर पूरा विश्वास था! तो उन दोनों ने भी, पलड़ा संभाल लिया अब! हो गए बाबा के साथ ही खड़े! अब वे हुए पांच! कुल पांच!
तैतिल, लोप हो या था! ये तैतिल की नैसर्गिकता थी, वो लोप होता और पुनः प्रकट! काट करता जा रहा था मफु की, बार बार! और लोप हो, अवसर पर अवसर प्रदान किये जा रहा था सभी को!
"पीरु?" बोला बाबा,
"हाँ बाबा?" बोला वो,
"केशि कुशल?" पूछा उसने,
"हाँ!" बोला वो,
"तम्मी?" चीखा बाबा,
"हाँ बाबा?" बोला तम्मी!
"अब अलख तेरे हवाले!" बोला बाबा,
"अवश्य!" बोला तम्मी!
हाथ जोड़, एक परिक्रमा डाल, भस्म से तिलक कर, संभाल ली अलख उसने! तम्मी अलख अच्छी तरह से पकड़ता था, अलख की सांस न टूट पाती उसके हाथों से! इसीलिए बाबा ने अलख उसके हवाले सौंप दी थी!
"पीरु?" चीखा बाबा!
"हाँ बाबा!" बोला पीरु!
"मैं, मदनी-संधान करूंगा अब!" बोला बाबा,
"जय हो! जय हो!" बोला पीरु!
मदनी का संधान! हाँ, इस से तो कुछ बात अवश्य ही बनती! मदनी, यक्षिणी है! और सर्वप्रथम, उसकी सहोदरी अजरुषा सम्मुख हुआ करती है! अजरुषा, महातमोगुणी, महा-रूण्डा होती है! शत्रु का क्षण भर में नाश करने में सक्षम है! और वो, एक ब्रह्म-पिशाच से भिड़ने में भी समर्थ है, इसमें कोई संदेह नहीं!
तदोपरांत उसकी सहोदरी, उपालिका प्रकट होती है, उपालिका, महाभीषण शक्ति है! मदनी की शस्त्र-वाहिनि है! मदनी यदि सिद्ध हो जाए, तो बत्तीस उप-सहोदरियां, स्वयं ही सिद्ध हो जाया करती हैं! बाबा ने, सम्भवतः, मदनी को सिद्ध किया होगा! इसी कारण से, मदनी-संधान के विषय में सोचा होगा! इसका अर्थ था, कि द्वन्द अब निर्णायक मोड़ पर आ पहुंचा था!
बाबा ने संधान आरम्भ किया! संधान अत्यंत ही भयानक हुआ करता है इस मदनी का! मदनी, सौम्य रूप में अप्सरा और रौद्र रूप में, भामरी समान होती है! समय समान रूप में, साधक को समस्त शय्या-सुख, रति-सुख, काम-सुख, देलि-सुख, रूमक्ष-सुख प्रदान किया करती है! इसका नाम मदनी है! मद में रहना, इसका स्वभाव है! इसी कारण से, इसका साधक भी मद में ही रहता है! ये भय का नाश करती है! और अपने साधक की मृत्योपरांत तक, सेविका के रूप में सेवा भी करती है!
प्रथम चरण!
इस चरण में, बाबा ने पहली सीढ़ी पकड़ी! मंत्रोच्चार आरम्भ किया! इस मंत्रोच्चार में, प्रबल वायु, विक्षिप्त सी हो, चलने लगी थी उधर! सम्मुख यदि हाथी भी हो, तो वो भी रुक जाए, बैठ जाए या पाँव ही उखड़ जाएँ उसके! लेकिन, बाबा ने अपने त्रिशूल का फाल जैसे ही भूमि में गाड़ा, सब सामान्य हो गया! न कोई वायु, न कोई धूलम-धाल शेष!
द्वितीय चरण!
इस चरण में, मंत्रोच्चार और गहन हुआ! बाबा ने, मंत्रों में जान फूंक दी! पीरु, संग संग, मंत्रोच्चार करने लगा था! इस चरण में, अंगार बरसे! बड़े बड़े से पत्थर बरसे, जलते हुए! ऐसे जो, देह से चिपक जाएँ और मांस को जलाते हुए, पार हो जाएँ! इस पर, बाबा ने अलख की भस्म को, फेंका चारों कोने में! अंगार सब समाप्त हुए! वो सब माया था, माया का नाश कर दिया बाबा ने! बाबा जी-जान से जुटा था इस मंत्रोच्चार में!
तृतीय चरण!
इस चरण में, बाबा खड़ा हुआ, ये चरण उसे, खड़े हो कर ही पूर्ण करना था! इस चरण में, मंत्रोच्चार दीर्घतम होता चला गया! इस चरण में, भूमि में से आवाज़ें आयीं! झाग से निकले! धुँआ आदि सब निकला! गंधक जैसे पदार्थ ऊपर आने लगे! भूमौ कब पलट जाए, कहा नहीं जा सकता था! तब बाबा ने, अपने त्रिशूल से, एक धन का चिन्ह बनाया भूमि पर, और रख दिया पाँव! जैसे ही थूका, सब समाप्त! सब सामान्य!
चतुर्थ चरण!
इस चरण में, मंत्रोच्चार और क्लिष्टतम होता चला गया! खम्म-खम्म की स्वरों से, वो स्थान पूरा गुंजायमान हो गया! और तब सामने से, सर लुढ़कते हुए आये! सभी के, सभी के! बाबा का, पीरु का, पुत्तन का, सभी का, और एक सर, जो बिलकुल ही काला था, वो था केशि का! बाबा का ध्यान नहीं भटका! वो जानता था, ये सब माया-रचित है! और उसका ध्यान भटकाने के लिए किया गया है!
और इस प्रकार, ये चारों ही चरण, पूर्ण कर लिए थे बाबा ने! अब शेष था, तो बस, आह्वान! और अब आह्वान में, कुछ विलम्ब शेष न था!
"तैतिल?" चीखा बाबा!
तैतिल, पल भर में ही प्रकट हुआ!
बाबा ने अट्ठहास लगाया! त्रिशूल लहराया अपना!
"तूने अंत देखना था न? देख? देख? मदनी कैसे अपने कटिबन्ध में बाँध, तुझे ले जाती है! देख, देख कि बाबा अम्फू है क्या!" चीख कर बोला अम्फू!
और तब!
तब एक अट्ठहास किया तैतिल ने!
एक प्रबल अट्ठहास! हिला कर रख दिया सभी को उस अट्ठहास ने!
"अम्फू! कुछ ही क्षणों में, तेरा नाश निश्चित है!" बोला तैतिल!
शान्ति!
सन्नाटा!
दोनों ही प्रबल शत्रु, देख रहे थे एक दूसरे को, उनके नेत्रों में!
तभी कुछ आवाज़ हुई! शान्ति भंग हुई!
बाबा ने पलट कर देखा पीछे!
ये क्या?
केशि? केशि चली आई थी?
बाबा का दिल ज़ोर से धड़का!
कैसे? कैसे आई थी केशि वहां?
"केशि?" दौड़ कर गया बाबा वहाँ, उसके पास!
केशि हैरान!
"तुझे मना किया था न?" बोला बाबा,
और हुआ तब अट्ठहास! एक महा-अट्ठहास!
बाबा के दिमाग की सुइयां दौड़ीं बड़ी तेज!
पल भर में समझ गया कि केशि को कौन लाया था उधर!
जैसे मृणा को, दो बार चौंकाया था, ठीक उसी प्रकार, केशि को भी लाया गया! आवाज़ देकर!
"अम्फू! बस! ये ही अंतिम क्षण और अवसर है! लौट जा! चला जा वापिस! कोई अहित नहीं करूंगा तेरा! तेरी समस्त आशंकाएं यहीं समाप्त हो जाएंगी! जा! लौट जा!" बोला तैतिल! अपने दोनों हाथ, बांधते हुए!
समय! समय की गति! उसके चलते हुए पहिये! उस क्षण, बाबा अम्फू ने सुन ली थी समय की गति के पहियों से आती हुई तेज आवाज़ें! सुन ली थीं!
और जब मित्रगण! कोई समय की गति के पहियों का घूर्णन या ध्वनि सुन लेता है, तो उसका समय इस धरा पर, समाप्त होने हो होता है! मृत्यु-शैय्या पर लेटे हुए व्यक्ति को, दो आभास होते हैं, प्रथम, उसको प्रकाश दिखाई देता है! केंद्र में श्वेत प्रकाश होता है, इसके ऊपर पीला चटखदार प्रकाश, फिर नीला-आसमानी सा, फिर संतरी रंग, फिर काला और फिर से श्वेत! इसका केंद्र घूमता है! ये शून्य में से प्रकट होता है, श्वास के कई प्रखंडों में ही, ये दीर्घ, और दीर्घ होता चला जाता है! जब शरीर से स्पर्श करता है, तब उसको ध्वनि सुनाई देती है, ये ध्वनि न किसी प्राणी की ही होती, न किसी वस्तु की, न किसी संयंत्र की, न नदी की, जल की, न वायु की, न ही कोई प्रस्फुटन की! ये ध्वनि ऐसी होती है, कि जैसे, आकाश एवं पृथ्वी, दो पाट हों, दो पलड़े हों, और उनके बीच कोई ध्वनि गूँज रही हो! ये ध्वनि, धीरे धीरे इतनी बढ़ती चली जाती है, कि कानों से भी सुनाई नहीं देती फिर! तब, मस्तिष्क का कार्य रुक जाता है, और मनुष्य की साँसें समाप्त हो जाती हैं! समाप्त होते ही, उसका वजन, कम हो जाता है! ये वजन, लघुत्तर रूप से जाना जा सकता है, जोड़ों के मध्य, हृदय के मध्य, कूल्हों के जोड़ों के मध्य, पाँव के जोड़ों के मध्य, सभी जोड़ों के मध्य की वायु, जो एक संग प्रवाहित हुआ करती थी, अब शेष नहीं रहती! रक्त, जमने लगता है, अर्थता, उसमे से ऑक्सीजन जैसे सोख ली जाती है! हाँ, नेत्रों की पुतलियाँ कुछ समय तक, जीवित रहती हैं! तदोपरांत उनमे सूजन सी भर जाती है! और मनुष्य-देह का क्षय होना आरम्भ हो जाता है, दो घटी और बारह पलों के बाद, देह में, मानवीय कुछ भी शेष नहीं रहता! रहता है तो शुष्क अस्थियां-मांस और नमक! बस! तो, ठीक ऐसी ही ध्वनि, बाबा ने सुन ली थी शायद! दो योग-क्रिया ऐसी हैं, जिनसे ये ध्वनि एवं प्रकाश देखा जा सकता है, ध्वनि सुनी जा सकती है! संसार भर में ऐसे क़िस्से आपको ढेरों मिल जाएंगे जिसमे लोगों ने, अपनी मौत के बाद के क्षणों को जीया है! इसका कारण क्या है? क्या वो असत्य बोल रहे हैं? नहीं! हाँ, तो फिर ऐसा क्यों हुआ? वे लौट कैसे आये? कारण है, वो युग्म पूर्ण न हुआ! ध्वनि सुनी तो प्रकाश न देखा, प्रकाश देखा तो ध्वनि नहीं सुनी! तो, सब लौट आये! वो, मृतक भी! एक स्त्री ने तो बताया कि उसको, एक प्रेत ने वापिस भेजा, कि तू जा वापिस, तेरा समय नहीं आया है अभी! उस स्त्री ने बताया कि उसको काले रंग की रस्सियों से बाँधा गया था! और वो रस्सियाँ उसको गोल-गोल घुमाए जा रही थीं! एक बात और मित्रगण! हमारे ऊपर, हमारी संस्कृति, विश्वास, ढर्रों का बहुत प्रभाव पड़ता है! जब भी ऐसे अनुभव हुआ करते हैं, तब ये सब, इन्हीं में रचे-ढ़ले से प्रतीत होते हैं! खैर बस इतना जान लीजै कि सूरज एक, चाँद एक! नाम हज़ारों!
"केशि? केशि? तू लौट जा!" बोला बाबा!
"नहीं!" केशि वहीँ खड़ी रही!
अब क्यों खड़ी रही, ये तो मैं भी नहीं जान सका!
"पीरु? ले जा इसे! ले जा!" बोला बाबा,
पीरु चला केशि की तरफ! पकड़ा हाथ तो केशि ने झिड़क दिया! और बाबा के संग आ खड़ी हुई!
"यही है वो तैतिल?" पूछा उसने,
"ह.....हाँ!" बोला बाबा,
"अब हट जाओ!" कहा उसने,
"क्या?" बोला बाबा चौंक कर!
"हट जाओ सारे! अब ये, मेरे और इसके बीच है!" बोली वो,
"तेरा दिमाग सही है? पीरु?" बोला बाबा,
"ओ पीरु! वहीँ खड़ा रह!" बोली वो!
पीरु चुप! वहीँ खड़ा रहा!
"केशि! लौट जा!" आई आवाज़!
लोप हो गया था तैतिल!
"समक्ष आ!" बोली वो,
और किया उसने अपने सिद्ध वेताल का आह्वान!
"केशि?" चीखा बाबा!
"शांत!" बोली वो,
"केशि, तू मेरी शत्रु नहीं, परोक्ष रूप से, हाँ, अपरोक्ष रूप से अवश्य! लौट जा!" आई आवाज़!
"अच्छा! क्या करेगा?" बोली अकड़ कर केशि!
अट्ठहास हुआ!
प्रबल अट्ठहास!
और हुआ प्रकट तैतिल! लिए एक स्वर्ण-दण्ड अपने हाथ में! मुस्कुराया! भूमि पर उतरा!
"तुम मूर्ख हो! सब के सब!" बोला तैतिल!
अब तक आह्वान कर लिया था केशि ने!
अब जैसे ही उसने, 'हौं-फट्ट' कहा!
आग का एक गोला, केशि के चारों ओर प्रकट हुआ! तैतिल ने माथे से लगाया वो दण्ड! और छुआ दिया पृथ्वी से! कम्पन्न उठी! और अगले ही पल!
अगले ही पल...........
वो केशि.........धू-धू कर जल उठी!
चीखने का अवसर भी न मिला उसे! आग ऐसे प्रबल कि कोई समीप न जा सके! मुर्दा जलने की गंध भड़क उठी! और, केशि, चार हिस्सों में टूटते हुए, धराशायी हो गयी!
बाबा?
बाबा की आँखें, फट गयीं!
कलेजा, मुंह को आ गया!
जिव्हा, हलक़ में उतर कर, जा छिपी!
वे चारों, पछाड़ सी खा गए! अलख, बुझ गयी! यही तो लक्षण थे सर्वनाश के! यही तो समझा रहा था वो तैतिल बार बार! लेकिन ये मूढ़, मूढ़ इंसान, न समझ पा रहे थे! कितने अवसर दिए! लेकिन नहीं! अहंकार कहाँ सुनता है ऐसे शब्द! इस बार भी न सुने!
अब तो बाबा बिफरा!
नंगे पाँव ही जा दौड़ा तैतिल का गला पकड़ने! अपने आपे से बाहर हो गया था बाबा! जहाँ नज़र आता तैतिल, वहीँ त्रिशूल घुमा देता! तैतिल के अट्ठहास ने, जंगल में जान डाल दी! ये थी दुर्दशा! एक महाप्रबल औघड़ की ऐसी दुर्दशा!
सहसा!
रुका वो औघड़!
लौटा अलख के पास!
मदनी-संधान कर ही रखा था, तो पढ़ने लगा बीजिशा! अब, मंत्र ही फूट रहे थे मुंह से उसके! कभी उस राख की ढेरी को देखता वो कभी अपने आपको कोसता! कभी सर्वनाश करने की बात कहता! अचानक से उठा वो! और मारा फेंक कर त्रिशूल भूमि पर! भम्म की सी आवाज़ हुई! तैतिल पल भर के लिए लोप हुआ! और जब प्रकट हुआ, अग्नि में लिपटा हुआ था! क्रोध में भरा था! दण्ड कर दिया आगे! अग्नि की प्रचंड धाराएं चल पड़ीं सामने के लिए! बाबा पलटा, एक तरफ जा गिरा! वैसे भी, सिद्धि-बल में लिपटा था वो! उसका कुछ अहित तो होता नहीं! लेकिन, चपेट में आ गये वे चारों! एक पल के सौंवे विपल में ही, भूमि पर अंगार छा गए! जैसे गरम लौह को भट्टी से निकाल कर, पीटने के लिए रखा जाता है! बाबा ने ये सब देखा! वो भौंचक्का तो था! लेकिन अब, मरने-मारने पर आमादा था!
"तैतिल?" चीखा वो!
तैतिल पलटा! देह से अग्नि शांत हुई!
"सर्वनाश तो तेरा भी करूंगा मैं! सर्वनाश करूंगा तेरा भी!" बोला वो,
और दौड़ कर, उखाड़ा त्रिशूल! उठाया उसने, और पढ़ा एक विशेष मंत्र! एक अत्यंत ही विशेष मंत्र! और वो मंत्र था........................
और अब जो उसने मंत्र पढ़ा, वो उसकी हार का मंत्र या जीत का, नहीं पता! आप ही विचार करें मित्रगण! उसने क्या मंत्र पढ़ा? बताता हूँ अभी! उसने उठाया त्रिशूल! चला केशि की राख की तरफ! बैठा! नेत्रों में मोटे मोटे आंसू छलके! उठायी भस्म उसकी, रगड़ी माथे से! देखा तैतिल को, क्रोध में! काँप उठा अम्फू उसे देख कर! हुआ खड़ा! आकाश को देखा! नेत्र बंद किये!
"कलाकेशि! तू जीतेगा!" बोला वो,
और उठाया त्रिशूल! किया सामने, पढ़ा, स्वयं-बलि का मंत्र! लगा दी आन अपनी इष्टा को अपनी बलि की और, अगले ही पल, त्रिशूल को घोंप लिया अपने उदर में! त्रिशूल पीछे से, रीढ़ फाड़ता बाहर आ गया! हंस पड़ा अम्फू! बैठता गया अम्फू नीचे!
"तैतिल! तू, सदा के लिए यहीं क़ैद हो जाएगा! इसी स्थान पर!" बोला वो, और गिर पड़ा, अंत-समय के उर्हन्तिक-मंत्र, मन ही मन, पढ़ डाले! जब तक बाबा अम्फू की इच्छा नहीं होगी, उसे कोई मुक्त नहीं कर सकेगा! वो, अपनी इष्टा की आन से, सदा के लिए, यहीं रहेगा! आँखें, नहीं कीं बंद उसने! साँसें तोड़ने से पहले, बस, एक बार देखा तैतिल को! और देह, शिथिल हो गयी उसकी!
तैतिल, जम गया! अंदर तक, सिहर गया! एक कुम्भ प्रकट हुआ, और तैतिल, अनंत के लिए, क़ैद हो गया! अब, वो चाहेगा भी मुक्त होना, तो पता नहीं, कितना समय बीत चुका होगा!
तैतिल, जीत कर भी हार गया.............
यहां, अंत हो गया बाबा अम्फू की इस कथा का! अम्फू कौन था, पुत्तन, केशि, लोहकू, तम्मी, पीरु कौन थे, इतिहास में भी न रहे!
तो ये थी कथा इस बाबा अम्फू की!
जो हार कर भी जीता था! और तैतिल, जो जीत कर भी हार गया था! किसी को कुछ न मिल सका! न तैतिल को उसके बाद मृणा ही मिली, और न अम्फू को, उसकी सिद्धियां!
वो मृणा, रोज की तरह आई अगले दिन वहाँ, इस बार सीधे ही वहीँ गयी, उस रोज, पहली बार ऐसा हुआ, कि कई बार पुकारने पर भी, वो तैतिल, जो उसकी एक सांस खत्म होने से पहले प्रकट हो जाता था, न प्रकट हुआ!
आशंकाएं और आशंकाएं!
समय बीतता गया!
और वही हुआ, जी होता है, प्रेम-बावरी, अपनी ही न रही! किसी को कुछ बताती, तो पागल कहते उसे! सच है, वो पागल ही तो थी, जिसने, प्रेम की डोर बाँधी भी तो, किसी हाड़-मांस वाले प्राणी से नहीं, एक दिव्य-प्राणी से! जिसके खेल ही दिव्य हैं!
माह बीते! कंकाल मात्र रह गयी वो! परन्तु, वो जाती, जाती उधेर, उस पेड़ के नीचे, वो पारिजात के पुष्प, अब तो कुछ बचा ही नहीं था वहां, बस, झाड़ियाँ, सूखी हुई और वो पेड़, जो चाह कर भी कुछ न बता सकता था उसे!
एक शाम, वो न लौटी, पागल थी, लेकिन खोज हुई, उसका मृत शरीर नदी के पास ही मिला पड़ा हुआ, न सर्प-दंश था, न कोई घाव, सम्भवतः सदमाग्रस्त होने के कारण ही, देह से, दुःख में, विरह में, प्राण छूट गए थे!
तो इस तरह, मृणा की कथा भी खत्म हुई! मृणा का नाम, इतिहास के गर्भ में दफन रह गया! वो शायद, कभी सुना भी नहीं जाता, यदि गोमती के साथ ऐसा कुछ न हुआ होता!
और अब रहा अकेला, छटपटाता हुआ तैतिल!
कुम्भ में क़ैद तैतिल! उसके दुःख पर, शायद, उस बाबा की इष्टा को भी तरस आ गया होगा, चौवन वर्षों के बाद, वो मुक्त हुआ उस क़ैद से! मुक्त हुआ, तो भूल गया कि मानस के लिए चौवन वर्ष का समय पौन-जीवन समान है!
वो, नित्य, छिप छिप कर, देखा करता कुछ स्त्रियों को, ढूंढा करता अपनी मृणा को, बावरा! ये भी न जान सका, कि मानस, समय के दास हैं! समय-चक्र में फंसी गोटियां हैं! जिसके पास, समय ही फेंकता है, किसको कहाँ रखना है, किसको कहाँ से हटाना है, किसका समय पूर्ण हुआ, किसका खेल समाप्त हुआ, ये सब, समय के हाथों में है!
तैतिल!
जानते हुए भी अनजान बना रहा!
अनजान, इसी से उसे कुछ स्मरण हो आता था! स्मरण, उस खेलती-चिंहुकती मृणा का! कुछ पल, जिन्हें वो जीया था उस मृणा के साथ! वो सुबह से संध्य तक, और संध्या से सुबह तक, प्रतीक्षा करता मृणा की! उसके पास तो, अश्रु-जल भी न था, कैसे सींचता होगा अपनी श्वास! कैसे जीता होगा, उस मृणा की अनुपस्थिति! कैसे, अपने आप को, अकेला महसूस करता होगा! कैसे, एकटक, एक राह पर ही, दृष्टि बिछा देता होगा! कैसे, पुनः पारिजात के पुष्प रोपे होंगे उसने! और कैसे, अकेला ही, विचरण करता होगा वहां! वो समर्थ था जितना, अब खोखला भी था उतना!
उस संध्या-समय भी तैतिल, प्रतीक्षा में था!
मौसम, अचानक से खराब हो गया था, दो सखियाँ, जंगल से, ईंधन एकत्रित कर, कुछ खाद्य-सामग्री ले, लौट रही थीं, कि बारिश होने लगी! बिजली कड़कने लगी! वे बेचारी, ऐसे कभी न फंसी थी कभी! काँप गयी प्रकृति का वो भयानक रूप देख कर!
वे, उसी पेड़ के नीचे आ गयीं!
"गोमती?" बोली रुपी,
"हाँ?" कांपते हुए बोली गोमती,
"पानी बढ़ता जा रहा है, क्या करें?" बोली रुपी,
"प्रतीक्षा, शायद बंद हो जाए तो चलें हम!" बोली गोमती,
"और न बंद हुई तो?" बोली आशंका धर रूपी!
"हो जायेगी!" बोली गोमती, ढांढस बंधाया उसका!
"वन-बिलाव निकलते हैं इतने बजे यहां" बोली रूपी,
"भगवान पर विश्वास रख!" बोली गोमती!
"जानती हूँ" बोली रूपी,
"इधर बैठ जा!" बोली गोमती,
बिठा लिया साथ में अपने उसे, ऊपर, बेलें लगी थीं, पानी से कुछ बचाव तो हो ही रहा था!
"अँधेरा देख?" बोली रूपी,
"हाँ!" बोली गोमती,
पानी बढ़े जा रह था लगातार!
उनके बीच और पानी के बीच, अब फांसला कम हुए जा रहा था!
"ऊपर की तरफ चलें?'' बोली रूपी,
"चल!" बोली गोमती,
मित्रगण!
अब वो उसी स्थान पर आ गयी थीं, जहां बरसों पहले, ये घटना घटी थी, तैतिल वाली! तभी बिजली कड़की, और दोनों सखियाँ काँप उठीं! अब तो, गोमती भी सिहर उठी! और तभी गूंजी एक भयानक सी आवाज़ जंगल से! उनके उड़े होश अब!
कोई बिलाव था वहां अवश्य ही! खतरनाक बिलाव!
"मत डरो! मत डरो पुत्रियों! मैं आता हूँ!" गूंजी एक आवाज़!
आवाज़, गरजन जैसी! आवाज़, जैसे मेघ थर्रा गए हों! वे चौंक कर, उठ गयीं! आसपास देखने लगीं! इस जंगल में ऐसा कौन? कौन है?
"आ रहा हूँ पुत्रियों! आ रहा हूँ!" बोला वो,
और अगले ही क्षण.....................!!
और अगले ही क्षण! तैतिल प्रकट हुआ! तैतिल से कौन नहीं होगा प्रभावित! उसने मनुष्यों का आचरण, बखूबी देख लिया था! उसके बावजूद भी, तैतिल ने, मदद की उन दोनों की! वो छोड़ कर आया सुरक्षित उन्हें! अब इसे आप क्या कहेंगे! उसने उन्हें, पुत्री सम्बोधित किया! उन लड़कियों ने उसे, वन देवता माना! इस क्षेत्र में ऐसी प्रचलित मान्यताएं हैं, वन-देवियाँ, वन-देव आदि आदि!
तो ये रही कहानी उस तैतिल की! ये था इतिहास! इतना बता, तैतिल शांत खड़ा हो गया था, ये वही तैतिल था, वही तैतिल, जिसे में क्या कहूँ? अभागा, दुर्भागी अथवा, एक प्रेम-पीड़ित दिव्य-प्राणी! मैंने उस से उस वार्तालाप के मध्य कोई प्रश्न नहीं किया था, प्रश्न बहुत आये मस्तिष्क में, लेकिन, वचनानुसार, मैं नहीं पूछ सकता था!
अब वो गोमती, वो, उस घटना को भूल न सकी थी, रूपी के संग, वो अक्सर वहां चली जाया करती थी, बैठ जाया करती थी, रूपी ने अब मना करना शुरू किया, समझाया कि जो हुआ, अब भूलना ही ठीक है, ये उनका नसीब था कि तैतिल जैसा 'वन-देव' उन्हें मिला और इसी कारण वे जीवित थीं अभी तक! कुछ दिन बीते और फिर, इसके बाद, करीब माह बाद, गोमती का व्यवहार बदलता चला गया! वो पल में कुछ और पल में कुछ! ऐसा हो जाया करती थी! उसका इलाज भी करवाया! लेकिन लाभ न हुआ, ओझा-गुनिया आदि भी आये, तब भी कुछ न हो सका! गोमती, अपने आप से अलग होती चली गयी! लेकिन अब, अब कुछ प्रश्न अनुत्तरित थे!
गोमती के साथ ऐसा क्या हुआ था जिस से उसका व्यवहार बदल गया था? क्या पुनः कभी तैतिल, मिल पाया गोमती से? जहाँ तक मुझे लगता है, फिर कभी नहीं! मिलती, तो तैतिल उसके साथ ऐसा नहीं होने देता! तो फिर ऐसा हुआ कैसे? अम्फू! अम्फू के कारण! अम्फू, अभी तक, उस तैतिल संग, जैसे युद्ध में था! अब भले ही ये युद्ध आमने-सामने न होकर, परोक्ष ही था! परन्तु था अभी ही! और इस युद्ध का मोहरा भी उसको मिल गया था, ये गोमती!
वाह रे अम्फू! क्या शत्रुता निभायी है तूने भी! जीते जी तो रहा ही शत्रु, मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा उसने! अब मृणा न सही, ये गोमती ही सही! अब समझा मैं, कि क्यों लाया गया था दुबारा गोमती को यहां! क्यों उसका रूप-परिवर्तन हुआ था! क्यों उसे सर्प दीखते थे! क्यों वो, कुछ समय बाद, सामान्य हो चली थी! और क्यों अचानक ही, उसमे बदलाव भी आने लगे थे! ये सब, इस बाबा अम्फू का किया-धरा था! तो अब, मुझे जिसके विरुद्ध खड़ा होना था वो अम्फू था! वो तैतिल नहीं! बस, मेरे पक्ष में एक ही बात जाती थी, वो अब प्रेत रूप में था! और प्रेतों की अपनी कुछ सीमाएं हैं! प्रेत-दाह से वे अछूते नहीं! मुझे कुछ करना होगा! करना ही होगा! चाहे कुछ भी! चाहे वे मुक्त हों चाहे उनको क़ैद ही कर दिया जाए! परन्तु, कोई क़ैद इतनी सटीक नहीं हुआ करती, कि अनंत तक रुके! तो, प्राथमिकता यही थी कि, वे सब अब मुक्त हो जाएँ! इस से भला और कुछ नहीं हो सकता था!
ये सब जानते जानते हमें, लगभग सुबह ही हो चली थी, सुबह के चार बज चुके थे, उस समय और कुछ नहीं सूझा, बस यही कि वापिस चला जाए, और बाबा अम्फू से अब जो सामना होना था, उसके लिए समुचित तैयारी की जाए! अब अम्फू के पास खोने को कुछ नहीं बचा था और तैतिल के पास भी, रहा मैं, तो अब तो जैसे मैं ही दांव पर था! अगर बाबा अम्फू मान जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो सकता था, अन्यथा, बाबा अम्फू के साथ कुछ न कुछ द्वन्द की तो स्थिति बनती ही थी! तो हम वापिस हो गए थे उस समय तो, हम पहुंचे घर, घर में लोग भी जाग ही चुके थे, अब हमने हाथ-मुंह धो, आराम किया!
मुझे तैयारी में दो दिन लग गए, लेकिन मेरी तैयारी इस बार अत्यंत ही तीक्ष्ण रूप से हुई थी, मैंने सलाह ली थी, मार्गदर्शन भी लिया था इस विषय में! और तब मैं पूर्ण रूप से तैयार था!
दो दिन बाद, रात करीब नौ बजे...........
मैंने उसी स्थान पर, अलख उठाई, मैंने वो स्थान दग्ध किया, वहां प्रेत-वास था, अतः, प्रेत-उन्मूलन यंत्र भी स्थापित कर दिया, और उसके बाद, मैंने प्रत्यक्ष-मंत्र चलाया! करीब आधे घंटे के बाद, बाबा अम्फू प्रकट हुआ! प्रकट होते ही सब भांप गया था वो! वो ठहाका मारते हुए उस स्थान पर दौड़ा, भागा! और मुझे देख, बार बार हँसता रहा!
"अम्फू?" मैंने कहा,
तब वो, सामने आया, सामने आते ही, अलख से करीब पंद्रह फ़ीट दूर, उकडू बैठ गया, इस उकडू बैठने में, वो इस प्रकार बैठा था कि जैसे सामने की तरफ छलांग मारने वाला हो!
"अम्फू! तू अच्छी तरह से जानता है कि मेरा उद्देश्य क्या है! मैं किसलिए आया हूँ इधर! न मैं शक्ति ही चाहता हूँ, तेरी तरह, और न सिद्धि ही, तेरी तरह! मैं तो यही चाहता हूँ कि तू, अनंत काल तक यहीं क़ैद हो तड़पे! तुझे तेरे कृत्यों का फल अवश्य ही मिले, एक बार नहीं, पुनरावृति में! तू किसी भी प्रकार से आदर योग्य नहीं है! किन्तु, मैं तेरी तरह नहीं हूँ, तूने मानव होते हुए भी मानव-धर्म का पालन नहीं किया! तेरे व्यर्थ हठ के कारण, कई मानव बलि चढ़ गए, कुछ तेरे संगी थे, तो उन्हें तेरा साथ देने का फल प्राप्त हुआ, परन्तु, मृणा के संग जो हुआ, उसके लिए तो कदापि क्षमा के योग्य नहीं है! तू मानव होते हुए जितना निःकृष्ट था, उस से अधिक तू अब प्रेत रूप में है! फिर भी, मैं चाहूंगा कि तू मुक्ति-पथ पर चला जाए! अम्फू, शत्रुता निभाने से कोई लाभ नहीं, मैं दोनों प्रकार से ही तैयार हूँ, मैं तेरे हाथ जोड़ता हूँ, पाँव भी पड़ता हूँ, और, तेरे पास कोई अन्य मार्ग हो, तो उसके लिए भी तैयार हूँ! बता अम्फू! बता!" कहा मैंने,
"तूने मुझे जाना नहीं? क्या उस तैतिल ने ये नहीं बताया कि मैं कौन हूँ? मैंने क्या चुना? क्या किया? मुझ से क्या आशा रखता है? झुक जाऊं मैं? मान लूँ अपनी हार, स्वीकार कर लूँ पराजय?" बोला वो, अब भी गुस्से से!
"झुकने से पराजय नहीं हुआ करती! कौन कहता है? इस प्रकार, भटकने से, क़ैद रहने से, तेरा कोई भला नहीं होना अम्फू! तेरे साथ साथ, ये कलाकेशि और अन्य भी तेरे पाप के भागी बने हुए हैं! इन्हें मुक्त कर अम्फू और स्वयं भी मुक्त हो! अब मृणा नहीं है, कोई शेष नहीं है! फिर? कैसी शत्रुता?" पूछा मैंने,
"लेकिन वो तो है?" बोला वो,
"वो मुक्त है, अब क़ैद नहीं है अम्फू!" कहा मैंने,
वो ये सुन, जैसे उछल पड़ा! विश्वास ही नहीं हुआ उसे!
"अफ़सोस! अब तो तेरी इष्टा भी तेरी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकती! अब तेरे पास कुछ शेष नहीं अम्फू! मान जा! मुक्ति-मार्ग चुन!" कहा मैंने,
"क्या तैतिल मुक्त है उस कुम्भ से?" पूछा उसने,
"हाँ! मुक्त है!" कहा मैंने,
वो हंसा! जम कर हंसा!
"उसे, पुनः क़ैद करूंगा मैं!" बोला वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
इस 'कैसे' का उत्तर नहीं था उसके पास! कैसी भूल में अटका था वो! अब उम्मीद थी, कि वो समझ जाए! निकल जाए इस कपट और भूल से बाहर!
अब हुआ वो गंभीर! अब उसकी प्रेत-नैसर्गिकता ने टटोलना शुरू किया इस 'कैसे' का उत्तर! और मेरे पास, उस समय, ये ही सबसे बड़ा हथियार था!
"अम्फू! अब न स्वयं-बलि ही सम्भव है और न ही तेरी इष्टा से इच्छा-पूर्ण की गुहार! सोच अम्फू! सोच!" कहा मैंने,
कुछ पल बीते.............
कुछ और पल भी बीते.........
और अम्फू, नीचे बैठता गया, भूमि पर लेट गया..............वो सब समझ गया था कि अब, कुछ सम्भव ही नहीं...कुछ सम्भव नहीं!
और फिर, उस की आवाज़ गूंजी......वो नाम ले रहा था, सभी के, एक एक करके!.....उस रोज क्या हुआ था, सब बोले जा रहा था .........मैं जान गया! मैं जान गया कि अम्फू जान गया है अब सब! सब! उसको अमानवीय सोच, ढह गयी उसी क्षण! वो अब यथार्थ में था! और यही मेरा उद्देश्य भी था!
उसने सभी का नाम लिया! चीख चीख कर! और यही कहता रहा, 'मुझे क्षमा कर दो! मुझे क्षमा कर दो!' बोलता रहा वो, बार बार!
मैंने कुछ नहीं कहा! उसकी संवेदनाएं जाग चुकी थीं! उसके अंदर का सच्चा अम्फू अब बाहर आने लगा था! वो रोया! गुहार लगाता रहा! अपनी इष्टा से, शरण में लेने की गुहार लगाता रहा!
"तैतिल?" चीख कर बोला वो,
और तैतिल प्रकट हुआ!
"मुझे क्षमा कर दो! मुझे क्षमा कर दो!" बोला बाबा अम्फू! रो रो कर!
मित्रगण!
तैतिल ने क्षमा कर दिया उसे! बाबा को भी राहत पहुंची! भटकाव का अंत हुआ! संस्कारगत रूप से, उन सभी का संस्कार किया गया! गोमती उसी क्षण ठीक हो गयी थी! आज गोमती एकदम ठीक है! हाँ, वो पेड़ ही है अब वहां! और कोई नहीं! या, उस से जुडी हुई कुछ स्मृतियाँ! तैतिल, जा चुका है, अपने लोक, इस धरा पर कभी न लौटने के लिए! मैंने तैतिल से कुछ नहीं माँगा! कुछ भी नहीं, उसने जो खोया था, उसकी भरपाई तो कदापि सम्भव नहीं!
वो पेड़, अब जर्जर अवस्था में है, कुछ आगामी वर्षों में, शायद ठूंठ बन जाए, या नदी में गिर, बह जाए, और बहा ले जाए अपने साथ कुछ प्रेम भरी मीठी स्मृतियाँ और कुछ कड़वी यादें!
वो मृणा, ईश्वर उस पर कृपा रखे सर्वदा!
बाबा अम्फू एवं उसके साथी, अब शान्ति प्राप्त करें!
वो तैतिल........उसके विषय में मैं मूक हूँ...............बस, मुस्कुरा जाता हूँ उसको याद कर...........हाँ, गोमती अब कुशल से है! न गोमती ही होती, न कुछ कथा ही पता चलती! कौन तैतिल, कौन मृणा और कौन वो नगनिया का बाबा नोमा अम्फू!
साधुवाद!
