वर्ष २०१२ मोदीनगर उ...
 
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वर्ष २०१२ मोदीनगर उ.प्र. की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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बहुत खूबसूरत दिन था वो! नवंबर के दिन चल रहे थे, हवा में, सर्दी की सुगबुगाहट आने लगी थी! सुयभ शाम तो ठंड हो ही जाती थी, इतनी भी नहीं कि कोई कंबल या शाल ओढ़ लिया जाए, हाँ इतनी ज़रूर, कि पसीना आना बंद था अब! उस रोज सुबह का समय था, मैं अपने स्थान पर, लगे गैंदे के फूलों को देख रहा था, कुछ हज़ारे गैंदे लगवाए थे, बहुत खूबसूरत और बड़े फूल दिए थे उन्होंने! गुलाब क्या खूब खिले थे! बड़े बड़े और खुशबूदार! साथ में लगे दूसरे प्यारे फूल भी अपनी खूबसूरती निकाले बैठे थे! सब एक से एक! सब्जियां भी लगी थीं, टमाटर, तोरई, सीताफल, लहसुन, और भी कई, एक सहायक नराई कर रहा था उनमे, झाड़-कबाड़ अलग कर रहा था, मेरा वो बेरी का पेड़, अब बेर लादे बैठा था, उसके बेरों का भी ख्याल रखना पड़ता था! नहीं तो साह जी के कई नशेड़ी दारु के साथ बेर ही उड़ा देते हैं! एक साध्वी, अपने वस्त्र सुखा रही थी, मुझे देखा तो प्रणाम किया, तभी मुझे मेरे सहायक ने आवाज़ दी, चाय तैयार थी, मैं चला उसके साथ, 

और चाय आ गयी, चाय के साथ नमकपारे थे, बही खाये, चाय पी, और फिर थोड़ा आराम किया, 

और फिर फ़ोन-फान में लग गया! थोड़ी देर बाद ही शर्मा जी भी आ गए, उनके लिए भी चाय मंगवाई गयी, उन्होंने चाय पीनी शुरू की, और हम बातें भी करते रहे, उस दिन हमे कहीं जाना था बाहर, तो वही के लिए चल पड़े थे हम, भोजन कहीं बीच में ही कर लेना था, जाना मथुरा तक ही था, हमारे साथ एक और साहब थे, अजय, 

काम उन्ही का था कुछ, तो हम तीनों निकल पड़े थे मथुरा के लिए, आखिर में पहुँच गए मथुरा, अजय साहब का भी काम निबटवा दिया, अपने एक जानकार से ही. अजय साहब शर्मा जी के जानकार हैं, वहां अपना भी कुछ काम निबटाया और फिर वहा दो महंत हैं, मेरे जानकार, उनसे मिलने गए, अपने खास कक्ष में हमारा स्वागत किया उन्होंने, उनसे मिले, चाय-ठंडा पिया और कुछ देसी घी भी ले लिया उनसे, अक्सर दे ही दिया करते हैं, शुद्ध आता है वहां पर, अब तक शाम हो चुकी थी, अब लगी हुड़क! तो अजय साहब ने किया जुगाड़, उनके जानकार थे वहां बहुत, उनमे से एक के यहीं गए, खाने का सामान ले ही लिया था, 

और सज गयी महफ़िल हमारी! जब तक महफ़िल पूरी हुई, रात हो चुकी थी, वो उस रात हम वहीं सोये, सुबह उठे, हाथ-मुंह धोये, 

और फिर चले वापिस, और इस तरह आ गए हम अपने स्थान पर, यहाँ से शर्मा जी और अजय साहब, चले गए थे वापिस घर अपने, अगला दिन आया, शर्मा जी आये, शाम के वक़्त, सामान ले आये थे, तो हमने अब जमा दी महफ़िल! तभी मेरी एक साध्वी आई अंदर, खड़ी हो गयी, मैंने बिठा लिया उसे, "क्या बात है कुशी?" मैंने पूछा, उसको कुछ पैसे चाहिए थे, घर भेजने थे अपने, मैंने अपनी अलमारी में से पैसे निकाल कर दे दिए, खुश हो गयी, चली गयी वापिस, पैसे हाथ में बांधे! ये साध्वियां, मज़बूरी में बनती हैं मित्रगण, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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निर्धनता सबसे बड़ा कारण है, 

खैर, 

वो चली गयी थी हंसी-खुशी! 

और तभी साहू जी आ गये खांसते हुए, मैंने बिठाया उन्हें, एक गिलास और निकाला, 

और बना दिया उनके लिए भी एक बड़ा सा गिलास! "हाँ जी साहू साहब! बताइये!" मैंने कहा, "क्या बताऊँ, और क्या न बताऊँ?" वो बोले, "ऐसी क्या बात है?" मैंने पूछा, "एक है मेरे जानकार, उनका एक काम पकड़ा था, छह महीने होने को आये, कोई असर ही नहीं पड़ रहा?" वे बोले, "क्या काम है उनका?"मैंने पूछा, "वो दो भाई हैं, अतुल और निपुण, दोनों ने कैसे भी करके एक आटा-फैक्ट्री लगवायी, लेकिन जिस दिन से लगवायी, लगा लो ऐसा कोई दिन नहीं गया जिस दिन कोई न कोई घाटा न हुआ हो!" वो बोले, "अरे, पहले जांच नहीं की थी क्या ज़मीन की?" मैंने पूछा, "की थीजी, तब तो कुछ भी न था" वे बोले, "और अब, अब की जांच?" मैंने पूछा, "हाँ, पूरे गा** के घोड़े खोल लिए, कुछ समझ में नहीं आ रहा! बहुत परेशान हूँ मैं" माथे पर हाथ रखते हुए बोले वो, अब साह जी परेशान! आता है समझ! कुछ पैसे वैसे का मामला रहा होगा, साह जी ने दोनों भाइयों की जेबों पर सेंध लगा दी होगी! ये थी परेशानी! "कहाँ है ये ज़मीन?" मैंने पूछा, "यहीं मोदीनगर मार्ग पर" वे बोले, "और ये दोनों भाई रहते कहाँ हैं?" मैंने पूछा, "मेरठ के पास" वे बोले, "तो आप क्या चाहते हैं?" मैंने पूछा, "यही कि एक बार नज़र डाल लेते आप, तो थोड़ा तसल्ली हो जाती" बोले वो, अब तक दो गिलास खींच चुके थे साहू जी! "चलो, मैं बताता हूँ आपको एक दो दिन में" मैंने कहा, 

अब खुश हुए। और खड़े हुए, नमस्कार कर, चले गए! "फंस गए साहू जी!" मज़ाक उड़ाते हुए बोले शर्मा जी! "हाँ, फंस गए बेचारे" मैंने कहा, "तो किसने कहा था कि छत्ते में हाथ मारो!" वे बोले, मैं हंस पड़ा अब! "रकम ऐंठ ली होगी, काम हुआ नहीं, अब इंडा चढ़ा रहे होंगे वे लोग, ये साह जी काम भी तो लाखों में ही करते हैं!" वे बोले, "ऐसा ही मामला होगा" मैंने कहा, हम बातें करते रहे, कभी साहू जी की, कभी कहीं और की, रात हुई, भोजन किया, और सो गए। अगली सुबह, हम नहा-धो कर फारिग हुए, चाय नाश्ता किया, 

और तभी साह जी फिर आ गए, चाय मंगवाई उनके लिए, बिठाया उन्हें! बैठे वो, चाय ली, 

और पीने लगे, "मैं कह रहा था कि मैं आज जा रहा हूँ वहां, साथ चल सको तो चल लो" वो बोले, मैंने और शर्मा जी ने, एक दूसरे को देखा, हाँ हुई, नज़रों में, "कब जाना है?" मैंने पूछा, "कोई ग्यारह बजे, भोजन कर लो तब तक" वे बोले, "ठीक है, चलते हैं हम" मैंने कहा, खुश हो गए, चाय, बची हुई, 

एक दो बड़े चूंट में ही सटक गए। वे चले गए, हमने फिर कार्यक्रम बना लिया, 

अब हाँ कही थी तो, जाना ही था, भोजन आदि आकर लिया था, 

और ठीक ग्यारह बजे, साहू जी आ गये, हम तैयार थे ही, सो चल दिए, साहू जी का ड्राइवर था संग उनके, ये ड्राइवर बढ़िया आदमी है बहुत! दिलखुश है, हमारी पटती है इससे! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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यही अंदर की खबरें देता है हमे! हम बैठे जी साहू जी की बड़ी गाड़ी में, टाटा सफारी रखी हुई है उन्होंने, लाल रंग की, पीछे एक रुद्र-मंत्र लगवा रखा है उन्होंने! मतलब उन्हें पता नहीं! खैर, हम चल दिए, गाड़ी भगाई ड्राइवर ने, रास्ते में एक जगह, चाय-पानी पिया, पैसे साह जी ने ही दिए! अब भलमानसता तो दिखानी ही थी! हम फिर से बैठे, 

और चल दिए, मोदीनगर कोई दूर नहीं दिल्ली से, बस भीड़ न मिले, आखिर हम पहुँच ही गए वहां! हम पहँच गए थे वहाँ, हमारे आने की खबर थी उन्हें, बाहर ही मिले अतुल जी, नमस्कार हुई, 

और वे हमे अंदर ले चले, खूबसूरत जगह थी वो, सेमल और शीशम के पेड़ लगे थे, छाया थी उनकी हर तरफ! 

फूलों के पौधे भी लगाए गए थे, प्रकृति-प्रेमी जान पड़ते थे दोनों ही भाई! जब हम घुसे थे तो किसी भी प्रकार की, कोई दिक्कत आदि तो दिखी नहीं थी वहां, सब ठीक-ठाक ही था, बस अब बात करनी थी उनसे, उस जगह एक रसोई भी थी, एक स्त्री भी थी, काम करने वाली, वही पहले पानी लायी, और फिर बाद में चाय, हमने चाय पी, 

और फिर उसके बाद अतुल जी ने साह जी से अपना दुखड़ा रोया, सबसे पहले ये कि कोई लेबर वहाँ रुकती नहीं थी, कोई आता तो हफ्ते बाद ही चला जाता था, मन नहीं करता था उसका काम करने का, इसीलिए काम में देरी हो जाती थी और माल भी, खराब होने लगता था, ऐसी ऐसी मुसीबतें थीं वहां, दो मजदूरों ने उस जगह पर, कुछ देखा भी था, उन पेड़ों के पास किसी आदमी को, 

जो सर पर कपड़ा बांधे, ज़मीन से कुछ उठाया करता था, लेकिन कोई जाता नहीं था उसके पास, वो आदमी अतुल साहब ने भी देखा था, अभी तो कोई पंद्रह दिन से दिखा नहीं था, क्योंकि साहू जी वहाँ कीलन कर आये थे, लेकिन समस्या जस की तस ही थी! साहू जी बार बार मुझे देखे जाते थे, जैसे मुझे ही सुनवा रहे हों सारा दुखड़ा! ये तो बाद में पता चला मुझे कि साहू जी ने ढाई लाख की सेंध मारी थी, उन भाइयों की जेब पर! इसलिए वे अपना न केवल दुखड़ा ही रोते थे, बल्कि साहू जी को 'काम' भी याद दिला दिया करते थे! अब साहू जी की बहुत फजीहत हो रही थी, बेचारे अपनी जूतियों से, फर्श पर कुछ लिखते जा रहे थे, 

मैंने उसकी फ़ज़ीहत भांपी, और उन्हें ले आया बाहर, "आपने जांच नहीं की थी?" मैंने पूछा, "सबकुछ किया था, सब ठीक था" वे बोले, "फिर ऐसी समस्या क्यों आ रही है?" मैंने पूछा, "मेरी फूटी किस्मत!" वे बोले, मेरी हंसी छूट पड़ी! "और वो दिखने वाला आदमी? वो कौन है?" मैंने पूछा, "होगा कोई भूत प्रेत, मैंने जमकाटा कीलन कर दिया था, भाग गया होगा" वो बोले, बिना जाने पहचाने, 

जमकाटा कीलन कर दिया! पर्दा डाल दिया! लेकिन समस्या तो वहीं की वहीं रही! अब सवाल ये, कि, वो आदमी कौन है? क्या कर रहा है? कब नज़र आता था? कितने बजे? 

कोई खास दिन? अब ये सवाल मैंने अतुल जी से पूछे, उन्होंने कोई सटीक जवाब नहीं दिया, हाँ, काम वाली ने कहा कि अक्सर रात होने से पहले, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और दो दो दिन बाद हमेशा नज़र आता था! ये भी अजीब सी बात थी! अब कीलन कर दिया गया था, तो अब वो नहीं दीखता, फिर भी, मैंने उस जगह को जांचना ठीक समझा! मैं गया शर्मा जी के साथ, साहू जी को नहीं ले गया! हमने हर जगह देखा, निर्जन स्थान पर भी, कुछ गड़बड़ नहीं था, अब गहन जांच के लिए कलुष-मंत्र लड़ाया, नेत्र पोषित किये, अपने भी, और शर्मा जी के भी! 

सबकुछ देखा वहाँ, कोई नहीं था, न कुछ दबा हुआ, न कुछ पारलौकिक! कुछ नहीं! जगह मैं तो कुछ गड़बड़ नहीं थी! सब ठीक था! समस्या कहीं और ही लगती थी, अब हम वापिस हए, कलुष वापिस लिया, 

आये साहू जी के पास, और सब बता दिया, और संग ये भी कहा कि एक बार अतुल जी के घर की भी, जांच कर लो, यहां सब ठीक है! साह जी का चेहरा उतर गया! खैर, सब ठीक था वहाँ, अब वापिस हुए हम, साह जी ने किसी दिन उनके घर आने के लिए कह दिया, 

और अब निकल आये हम वहाँ से, रास्ते में साह जी बेचारे, कुछ न बोले, हम आ गए वापिस! साहू जी अपने यहाँ, और हम अपने यहां! आराम किया अब हमने, चाय पी और थोड़ा बहुत खाया, हफ्ता बीत गया, साहू जी से कोई बात नहीं हुई फिर, आठवें दिन, वे आये, उन्होंने अतुल जी के घर की जांच कर ली थी, कुछ नहीं निकला था, अब बहुत मायूस थे वो, एक खबर और लाये थे वो, अतुल साहब के छोटे भाई की गाड़ी, 

अपने आप जल उठी थी, वहीं फैक्ट्री में खड़े खड़े ही! ये और नुक्सान हो गया था! 

और नुक्सान, घटने की बजाय, बढ़ता ही जा रहा था! साहू जी की खोपड़ी बस फटने ही वाली थी! चिंता के मारे! उन्होंने सबकुछ कर लिया था, अब मैंने उनको सलाह दी कि, एक क्रिया करें वहाँ, सर्वशोधन क्रिया, इस से अवश्य ही लाभ मिलेगा, वे मान गए, 

और दो दिन बाद उन्होंने, वहाँ जाकर वो क्रिया सम्पन्न कर दी! एक हफ्ता बीता, 

और उसके एक दिन बाद ही, मशीन खराब हो गयी, अपने आप, चलते चलते! ये बड़ा नुक्सान था! कोई पुर्जा मंगाया भी जाता, तो भी कम से कम दो हफ्ते लग ही जाते! एक तो काम, वैसे ही नहीं चल रहा था, अब ये मुसीबत और हो गयी! अब हुआ काम ठप्प! आई खबर साह जी को! साहू जी का बस चलता तो उस दिन, अपना सर फोड़ लेते! लेकिन उन्होंने समस्या सुनी, 

और जा पहुंचे, अब तो बुरा हाल था उनका! खबर आई मेरे पास, 

यदि उस क्रिया से भी कुछ नहीं हुआ था, तो एक बात स्पष्ट थी, वहाँ कुछ न कुछ तो है! जो पकड़ में नहीं आ रहा है। चूक रहे हैं हम! कहीं न कहीं! साह जी तो अब बस, खाट पकड़ने वाले थे, बुद्धि हो चली थी अब कुंठित! आखिर में, मेरे पास आये, 

और सारा दुखड़ा रोया फिर से, अब मैंने विचार किया, 

और अब स्वयं वहाँ जाकर, जांच करने के लिए, कुछ मंत्र साधे, तीन दिन के बाद मैं और शर्मा जी, वो ड्राइवर, जा पहुंचे वहां, दोनों ही भाई मिले, काम वाली ही थी और कोई न था, सब जा चुके थे, मशीन के पुर्जे मंगाए थे, एक हफ्ता और लगना था! अब मैं हुआ खड़ा, शर्मा जी को संग लिया, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और उस ज़मीन को बारीकी से देखा, चप्पा चप्पा छाना! तभी एक जगह मुझे, चंपा का एक ताज़ा फूल दिखा, ये मुरझाया हुआ नहीं था, औंस अभी तक जमी थी, और तो और, वहाँ कोई चम्पा का पौधा था ही नहीं! 

बेला आदि तो थे, मोगरा भी था, लेकिन चम्पा नहीं था! तो ये फूल? ये कहाँ से आया? किसने फेंका? किसने रखा? मैंने फूल उठा लिया, 

आगे गया, एक जगह फिर से, चम्पा का ताज़ा फूल दिखा! मैंने वो भी उठा लिया, रख लिया अपने पास, 

बड़ी हैरत की बात थी कि, चम्पा के फूल यहां पड़े थे! कैसे आये? कहाँ से आये? कुछ पता नहीं था अभी तक! मैं और आगे गया, 

आगे भी और फूल मिले! ताजे फूल! कमाल था! मैंने और फूल भी उठाये, 

और ले आया उनको अतुल साहब के पास, फूल देख के वे भी चौंके!! चौंकना ही था! ये पौधा तो था ही नहीं वहाँ! ये कुल ग्यारह फूल थे चम्पा के! मैंने उनकी टेबल पर रख दिए थे! अतुल और निपुण, और वो कामवाली, आँखें फाड़ उन्ही फूलों को देख रहे थे, अतुल साहब ने एक फूल उठाया, उसको छुआ तो उसकी ताज़गी का एहसास हुआ, सुंघा तो भीनी भीनी सुगंध मिली! वैसे था ही अजीब सबकुछ, 

उस ज़मीन पर ये चम्पा के फूल कहाँ से आये? उनकी ज़मीन में तो कोई चम्पा का पौधा या पेड़ नहीं था, आसपास एक और फैक्ट्री थी, लेकिन वहाँ पर बुगन-बलिया लगी थी, चम्पा वहाँ भी नहीं थी! अब कोई पक्षी तो लाता नहीं ये फूल वहां, ऐसा तो कोई पक्षी है भी नहीं! एक बात और, फूल एक समान थे, एक आकार के और गोल पत्ते वाली चम्पा के थे, क्योंकि उनका हल्का पीलापन काफी गहरा और बड़ा था, तिकोने पत्ते वाली चम्पा के फूल ऐसे नहीं होते, उसके फूल छोटे, अधखुले से, और घंटीनुमा होते हैं, उत्तर भारत में दोनों प्रकार की चम्पा मिलती है, चम्पा के फूल किसी विशेष देवी या देवता को भी नहीं चढ़ते, हाँ, मंदिर के प्रांगण में ये लगाए जाते हैं! ये फूल पहले बन चुके थे, सभी के लिए, अब इन फूलों के साथ ही आगे बढ़ना था! भेजना था अपना हलकारा इनकी खोज में! देखें तो सही, कौन लाया ये फूल वहाँ. 

क्या वजह है? हमने चाय आदि पी, और फिर उन्हें जल्दी ही ये पता लगाने के लिए, 

आश्वासन दे, हम निकल आये वहाँ से, रास्ते में,शर्मा जी और मेरी काफी बातें हुई, ये फूल हैरानी में डाल रहे थे हमे! खैर, हम पहुँच आये अपने स्थान पर, मैंने वो फूल अपने क्रिया स्थल में रख दिए! रात्रि-काल में मई अपने क्रिया-स्थल में गया, वो फूल निकाले, फूल गिने, 

तो अब ये साथ निकले। चार कहाँ गए? कोई और तो आ ही नहीं सकता यहाँ? 

और अपने आप जाएंगे नहीं? ये एक और झटका लगा मुझे! 

ग्यारह के सात कैसे हो गए ये फूल? ये कैसी माया? लेकिन फूल एकदम ताज़ा थे अभी भी! मुलायम और खुशबूदार! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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खैर जी, मैंने वो फूल एक पात्र में रखे, और अपना सबसे विश्वस्त सिपाही इबु का शाही-रुक्का पढ़ा, इबु मुस्कुराता हुआ हाज़िर हुआ, मैंने फूल दिखाए उसे, और उद्देश्य बताया, वो उड़ चला! एक पल में ही 

और फिर कोई दो मिनट में ही, वैसे ही कुछ फूल ले आया, बस! इतना ही पता चला। 

और कुछ नहीं! कहाँ से लाया था, एक बड़ा ही अजीब सा नाम था उस जगह का, तेहलीवाला, ये स्थान रुड़की से थोड़ा दूर पड़ता है, बड़ा अजीब था ये तो! तेहलीवाला से वो फूल कौन लाया था वहां? इबु तो गंध के सहारे चला गया था, एक बात साफ़ थी, ये फूल तेहलीवाला से ही लाये गए थे! अब एक बात और, कोई इंसान तो लाने से रहा, ले भी आये तो ये ताज़गी और मुलायमपन तो मिलने से रहा, इबु जो साथ फूल लाया था वो इन जैसे ही थे! मैंने इबु को भग दिया, और इबु चला गया वापिस! 

ये मुझे सकते में डाल गया! समस्या और गहरी हो गयी। कहाँ तो मोदीनगर, 

और कहाँ तेहलीवाला! इनका क्या मेल? मैं कभी तेहलीवाला नहीं गया था, 

इसलिए पता नहीं था उस शहर के बारे में, अब बात यूँ थी, की गड्ढा खोद तो लिया था, लेकिन भरने के लिए उसे, मिट्टी कम पड़ रही थी! नहीं तो अक्सर मिट्टी बच जाया करती है! अब मैंने वो फूल, सभी, उसी पात्र में रख दिए। 

और आ गया बाहर, शर्मा जी को, चार फूल कम होने और, इबु द्वारा साथ फूल लाने, 

और तेहलीवाला के विषय में बताया, उन्हें भी अचरज हुआ! 

जो समस्या क्षणिक और, मिट्टी का ढेला दिखती थी, वो तो पहाड़ निकला! अब एक बात और, वो फूल लाया कौन? तभी याद आया मुझे! वो आदमी! जो ज़मीन से कुछ उठाता था, शायद, वो फूल ही उठाता होगा! 

यही सही है! वो ये फूल ही रहे होंगे। लेकिन ये फूल किसलिए? वहां तो कोई मंदिर भी नहीं? तो फिर किसलिए? दिमाग फिर से उलझा, 

मैं उसी समय शर्मा जी के साथ, गया साहू जी के पास, साह जी मदिरा पी कर, अब रागिनियाँ गा रहे थे! 

अपनी देहाती भाषा में, बस ये मदिरा ही उनकी चिंता हरती थी, भले ही कुछ घंटों के लिए! मुझे देखा तो, सारे नशेड़ियों को भगा दिया वहां से, दिपाली नाम की एक महिला को बुलाया, उस से मदिरा और कुछ खाने को लाने को कहा, दिपाली, मुस्कुराती हुई चली गयी! 

अब मैंने उनको बस यही कहा कि वो वहाँ जाकर, उस जमकाटा कीलन को काटें, वे मान गए, अतुल साहब ने फूलों वाली बात बता दी थी उन्हें, उन्होंने पूछी तो बता दी मैंने! 

अब चौंके वो! सोच में पड़े! तभी दिपाली ले आई सामान, तीन गिलास, तश्तरी में भुना हुआ माल, मसालेदार प्याज, हरी चटनी, दही मिली, ठंडा पानी! साहू जी ने रख लिया सामान, 

और चली गयी वो, साहू जी ने, बड़े बड़े पैग बनाये, हमको दिए, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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पुराने आदमी हैं तो, ब्रांड भी बहुत पुराना है उनका, अरिस्टोक्रैट पीते हैं, मुझे तो नाम से ही फुरफुरी आ जाती है, गंध से तो पेट में भी मरोड़ उठ जाती है! अब क्या करते! प्यार से दे रहे थे, मैंने पहले प्याज खायी, 

ज़ायका बनाया, फिर वो माल का टुकड़ा खाया, चटनी में डुबोकर! ज़ायका बना, तो मैंने वो, प्याले में परोसा हुआ हलाहल गले के नीचे उतार दिया! तलवार सी चीरती चली गयी पेट तक! फौरन ही प्याज का एक बड़ा सा टुकड़ा खाया, 

और जान बची! फिर से पैग डाल दिया गया! मैं लेना नहीं चाहता था, लेकिन मज़बूरी थी! माल का टुकड़ा लिया, 

चटनी में डुबोया, खाया, 

और गिलास खाली कर दिया! बस! अब बहुत था, नहीं तो एक एक छह दिखने लगते मुझे तो अब! अब मैंने फिर से एक बार और कहा, कि वे वहां जाएँ, 

और वो कीलन काटें, वो मान गए, नशे में थे, तो एक बार सुबह भी कहना था, पता चला कि, याद ही नहीं रहा कि हम आये थे, हम चले अब वहां से, अपने यहाँ आ गए, और सीधे अपने कक्ष में! सुबह हुई, स्नान आदि से फारिग हए, शर्मा जी रात को यहीं ठहरे थे, 

अतः वे भी नहा-धो आये, चाय-नाश्ता आया, 

तो चाय-नाश्ता किया फिर, उसके बाद मैं गया अपने क्रिया-स्थल में, पात्र देखा, कमाल था! 

आठ फूल फिर गायब थे! ये कौन ले गया था अब? कौन आया था? 

और यहां आ कौन सकता है? दिमाग उलझ गया! मैं भागा भागा आया वापिस, शर्मा जी को बताया, वे भी चकित अब! ऐसा कौन है जिसने ये अभेद्य किला भेद दिया! कौन हो सकता है? कोई आमद की सूचना भी नहीं, 

और कब गया, ये भी नहीं पता! बहुत हैरत की बात थी! मैंने शर्मा जी को लिया, 

और चल दिया साहू जी के पास, उनको फूलों के बारे में बताया, उनके भी होश ठिकाने जा लगे! अब तो जमकाटा कीलन काटना अत्यंत आवश्यक था! बिन काटे बात नहीं बन सकती थी, 

साह जी तैयार हए, 

और ठीक एक घंटे के बाद वे चले गए अतुल साहब के पास, शाम होने से कुछ समय पहले वापसी आये, 

और मुझे बताया कि वो, कीलन काट आये हैं! अब सही था। अब मुझे जाना था वहाँ! अब कुछ देख लड़ाता मैं! अब कुछ बात बन सकती थी! अगले दिन मैं गया वहाँ, 

अतुल साहब से मिला, 

और अब ज़मीन की दुबारा जाँच की, कुछ नहीं मिला, मैंने देख मंत्र लड़ाया, 

और देखो! वो चला ही नहीं! सुप्त ही रहा! मैंने कई बार प्रयास किया, 

लेकिन सुप्त का सुप्त! अब पहली बार समझ में आया कि यहाँ कि, बहुत ही प्रबल शक्ति का वास है! लेकिन ये शक्ति है कौन? वाहिर-अमल इस्तेमाल किया, अगरबत्तियां जलाईं, जगह जगह, नौ जगह दीये जलाये, एक मंत्र पढ़ा, एक भी दीया नहीं बुझा! वो मंत्र भी बेकार! वाहिर-अमल


   
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श्रीशः उपदंडक
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वापिस हुआ! हाँ, दीये जलते रहे! मैंने फिर से आगे जांच की, चलता रहा आगे, ज़मीन काफी बड़ी थी, अकेला घूमना सम्भव नहीं था, मैंने अतुल साहब और शर्मा जी को भी काम पर लगा दिया, 

जो कुछ भी अजीब सा लगे, उसकी खबर करनी थी, हम तीनों घूमते रहे, 

जो मिलता अजीब सा, उठा लेते, और रख लेते अपने पास, इसमें टूटे फूटे कप आदि के टुकड़े, कीलें, लोहा-लंगड़ सब था, एक घंटा हम ढूंढते रहे, 

और जब सारी चीजें इकठ्ठा की, तो एक भी चीज़ सुराग देने वाली नहीं थी! 

मेहनत खराब हो गयी थी सारी! अबकी बार फिर से जांच की मैंने, 

और फिर से कुछ नहीं! तभी मेरा ध्यान एक जगह गया, ये जगह आसपास की जगह से ऊंची थी, वहा पेड़ लगे थे, लगता था कि जैसे पत्थर गड़े हों वहाँ, या फिर मिट्टी का कोई टीला हो! मैं वहां गया, पूरी तरह से देखा, आसपास घूम कर, लेकिन वही ढाक के तीन पात! कुछ हाथ नहीं लगा! 

अब तो हिम्मत जवाब देने लगी! मंत्र चल नहीं रहे थे, अमल उठ नहीं रहा था, यहां जो कुछ भी था, बहुत शक्तिशाली था! जिसके वास के कारण सारे मंत्र सो जाते थे! 

लेकिन अभी तक ये भान नहीं था, कि यहाँ कौन सी शक्ति है, ये कोई खंडहर नहीं थे, न ही कोई मंदिर या मस्जिद का क्षेत्र, ये तो जंगली क्षेत्र था, जो कि अब औदयोगिक क्षेत्र बन गया था! बसावट अब होने लगी थी, नहीं तो इक्का-दुक्का ही लोग नज़र आते होंगे वहां! इसी फटोरय के साथ ही, एक और फैक्ट्री भी थी, वो काफी बड़ी थी, वहाँ उत्पादन सही था, समस्या इसी ज़मीन में थी! 

और मेरी जांच घुटने टेक कर बैठ गयी थी! मैं उलझा हुआ था, 

साह जी के मकड़जाल में, पूरी तरह से फंस गया था! साहू जी तो फंसे ही थे, लेकिन मेरा उनसे अधिक बुरा हाल था, तभी एक विचार आया, 

क्यों न एक पकड़-क्रिया की जाए! मैंने अपना छोटा बैग खोला, भस्म निकाली, 

और एक खाली स्थान पर गया! वहाँ जाकर मैंने, भस्म फेंकी! जैसे ही भस्म ज़मीन पर गिरी, वो सुलगने लगी! अब ये देख, मेरा पसीना छूटा! ऐसा कभी नहीं हुआ था, कभी भी नहीं! 

और तभी एक जगह कड़ाक की सी आवाज़ हुई, उस मिट्टी के टीले के पास, वाले एक पेड़ की शाख टूट गयी थी! मैं भागा उधर! पकड़-क्रिया से निशानदेही हो गयी! अब जो कुछ भी था, वो यहीं था! इसी टीले के नीचे! एक सूत्र हाथ लग गया! अब मैं खुश था! दौड़ा दौड़ा आया, और शर्मा जी, अतुल, निपुण, सभी को वहाँ बुला लाया, अब अतुल साहब से मैंने, उस टीले की खुदाई करवाने को कहा, वे मान गए! 

कुछ तो पता चले! निपुण जी तभी भाग लिए शहर, मज़दूरों को बुलाने के लिए! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और कोई डेढ़ घंटे में, ले आये दो मज़दूर! अब मैंने उन मज़दूरों को समझाया, खुदाई करने को कहा, पहले तो वो घबराये। निपुण साहब ने, और अधिक पैसे देने को कहा, 

तो मान गए वे! 

और हुई खुदाई शुरू! बहुत ही कड़ी मिट्टी थी, पत्थर थे वहां, मज़दूरों का हाल खराब हो गया! पेड़ों की जड़ें थीं, छोटे-मोटे पत्थर भी थे, पूरा जोर लगा दिया, लेकिन ज़मीन बस साफ़ ही हुई! ऊपर से बस घास-फूस ही हटाया गया, शाम हो गयी उस दिन! काम रुक गया, मज़दूरों को पैसे दे दिए गए, 

और निपुण साहब उनको छोड़ भी आये, अब कल ही होना था काम शुरू, रात वहीं इंतज़ाम किया गया सोने का, सोये रात को, सुबह हुई, नहाये धोये, चाय पी, निपुण जी नाश्ता बनवा लाये थे, 

वो खाया, और मज़दूर भी ले आये थे, वहीं मज़दूर, 

खुदाई फिर से शुरू हुई, 

जान निकल गयी बेचारों की, बार बार पानी पीते, 

और जुट जाते काम पर, मैं तो चादर लेकर, बिछा कर, वहीं बैठ गया था! शर्मा जी टहल रहे थे। मैं कभी बैठता, कभी लेट जाता, कभी खड़ा होता, उस जगह को देखता, जड़ें काटनी पड़ रही थीं, इसी में समय लग जाता था! चार घंटे हो गए, 

और दो फ़ीट ही खुदा, तभी कुछ नज़र आया, पुरानी सी ईंटें, लखौरी ईंटें! मज़दूर हट गए डर के मारे पीछे! मैंने देखा उन ईंटों को, उसके पीछे कुछ था! 

ये एक गड्ढा सा था, उसको चिना गया था, ये लखौरी ईंटें लगाई गयीं थीं, ईंटें भी बहत पक्की थीं, लगता था जैसे कि पत्थरों से बनी हो, बहुत मज़बूत थीं वो ईंटें। मज़दूरों ने मना कर दिया काम करने से अब, डर गए थे बेचारे, डरना लाजमी भी था, वे क्या डरे, अतुल और निपुण भी डर गए, ये क्या नयी बला आ गयी सामने? क्या है यहाँ? वैसे वो गड्ढा था भी भयानक सा! अतुल और निपुण मेरे पीछे आकर खड़े हो गए! पूछने लगे कि क्या है ये! जितना वो जानते थे, उतना ही मैं जानता था, लेकिन जो भी था, बहुत शक्तिशाली था! मैं एक टोर्च मंगवाई, टोर्च लायी गयी, मैंने टोर्च जलायी, गड्ढे को देखा, रौशनी मारी उसमे, अंदर कुछ भी नहीं था, कोई सांप आदि न हो, इसके लिए नमक डलवा दिया था मैंने, सांप आदि होता, तो नमक के स्वाद और गंध से, भाग आता बाहर! लेकिन कुछ नहीं था, मैंने कुछ ईंटें हटाईं उसकी, थोड़ी जगह बनी, 

अब देखा उसके अंदर, कुछ नहीं था, सामने भी ईंटें ही थीं, ये कोई चबूतरा सा लगता था, कोई पुराने समय में बनाया हुआ चबूतरा! अब और खुदाई भी करवानी थी, लेकिन मज़दूर तैयार नहीं थे, मैंने कुछ और ईंटें हटवाने को कहा, नहीं माने वो! आखिर में मैंने ही गैंती ली, और ज़ोर ज़ोर से चोट मारते हुए, वो ईंटें हटाई, अब काफी जगह बन गयी थी, मैं आधा अंदर सरक सकता था, मैंने यही किया, मैं लेटा, पेट के बल, 

और सर अंदर डाला, टोर्च की रौशनी डाली अंदर, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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जो मैंने देखा, उसे देख मैं हट गया! मुझे लगा कि जैसे कोई बहुत लम्बा चौड़ा आदमी, अंदर सो रहा है। बहुत लम्बा चौड़ा था! मुझे बड़ी हैरानी हुई। 

अपने आप पर! मैं चौंक पड़ा था! डर गया था! फिर से हिम्मत की, 

और फिर झाँका, अब कोई नहीं था वहाँ! मैंने टोर्च आसपास मारी, एक जगह, कोने के पास, चम्पा के फॉलो का ढेर रखा मिला! वैसे ही फूल! ताज़े! भीनी भीनी महक वाले! 

अब दिमाग में बजा घंटा! पड़ा हथौड़ा! ये क्या मामला है? ये फूल यहां कैसे? क्या रहस्य है? कौन लाता है? मेरे वाले फूल भी क्या, यहीं लाये गए थे? इबु वाले भी! अब तो दिमाग में लस्सी घुट गयी! सवाल इतने सारे! और उत्तर एक का भी नहीं! ये गड्ढा ! किसलिए? 

क्या दफनाया गया है इसमें? क्या प्रयोजन था? जंगल में? और ईंटें, मतलब पुख्ता इंतज़ाम किया गया था, फिर वही, किसलिए? 

ये मंदिर भी नहीं, मज़ार भी नहीं, चबूतरा सा लगता है, लेकिन चबूतरा अंदर से खाली क्यों? ये भी अजीब सी बात थी! अब ये मिट्टी में दबा हुआ है, इसका मतलब चार-पांच सौ सालों में ऐसा हुआ होगा, तब तो यहां इंसान तो, आया ही नहीं होगा! फिर ऐसा निर्माण? एक एक कर सर से घन टकरा रहे थे। जितना हल निकालता, उतना ही हलाक हो जाता था मैं! खुदाई ज़रूरी थी, लेकिन मज़दूर तैयार न थे, 

अब दूसरे मज़दूर लाने थे, तो यही हुआ, निपुण साहब ने उन मज़दूरों को, बिठाया, और ले गए, कोई दो घंटे के बाद वे नए दो मज़दूर ले आये, पहले तो वो भी डरे! लेकिन फिर हिम्मत की, 

और मान गए, मैं था ही वहां, उनकी मदद को! तो अब हुई खुदाई शुरू! ईंटें हटाई गयीं! बड़ी ही मज़बूत ईंटें थीं, गड्ढा और चौड़ा होता गया! 

और अब साफ़ साफ़ नज़र आने लगा वो चबूतरा, काफी बड़ा था वो चबूतरा! काफी बड़ा! कम से कम बीस गुणा बीस फ़ीट का! निहायत ही करीने से बनाया गया था, कुशल कारीगरी की थी बनाने वाले ने! ईंटें आपस में ऐसे फंसाई थीं, कि चाहे भूकम्प आये या फिर बाढ़, न ही दरार आती और न ही बाढ़ में बहता वो! बहुत ज़बरदस्त चबूतरा था! लेकिन ये बनाया किसलिए गया था? क्या छिपाने के लिए, कुछ सुरक्षित करने के लिए? धन छिपाने के लिए? यदि धन ही छिपाया जाता, तो ऐसी कौन सी शक्ति है, जो ऐसा रक्षण कर रही है! मंत्र ही नहीं चलने दे रही! 

खैर, 

खुदाई हुई, पेड़ों के जड़ें कार्टी गयीं, 

और फिर वो जगह साफ़ हुई! 

अब जगह साफ़ हुई, अब जगह साफ़ हुई, तो एक नयी मुसीबत आ गयी! नीचे बड़े बड़े पत्थरों का एक फर्श था, मिट्टी पड़ी थी उस पर, 

अब मिट्टी साफ़ करनी थी! मज़दूरों ने, साफ़ करनी आरम्भ की, मिट्टी करीब दो दो फ़ीट जमी थी, एक दिन का काम नहीं था, और मज़दूर भी चाहिए थे, इसीलिए, उस दिन जितना हो सका, उतनी सफाई हुई, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और फिर काम रुक गया, उस रात भी वहीं रुकना पड़ा, अब चूंकि उस शक्ति का पता नहीं था कि कौन सी है, इसलिए कोई मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं किया, रात हुई, भोजन किया, और सो गए हम फिर, मैं और शर्मा जी, बारामदे में ही चारपाई बिछा कर सो रहे थे, साथ में ही अतुल जी थे, निपुण साहब जा चुके थे घर, कामवाली अंदर अपने कमरे में सोयी थी, रात कोई एक बजे, मुझे जगाया अतुल जी ने, मेरी आँख खुली, कामवाली वहीं खड़ी थी, भय छाया था उस पर! "क्या हुआ?" मैंने पूछा, 

वो कामवाली आई मेरे पास, "वो, वही आदमी, कपड़े बांधे सर पर, वहा है" फुसफुसा के बोली वो! मैं खड़ा हुआ! यही तो चाहता था! जमकाटा कीलन इसीलिए तो हटवाया था! 

शर्मा जी भी जाग गए, हम खड़े हुए, 

और दीवार की ओट लेते हुए, चले उस तरफ, मोरपंखी के पौधे लगे थे वहां, वहीं बैठ गए छिप कर, 

और देखने लगे सामने! सामने एक आदमी था, उम का पता नहीं चल रहा था उसकी, काफी दूर था, सर पर कपड़ा बाँधा था, नीचे घुटने से ऊपर तक एक तहमद पहने था, घास पर कुछ ढूंढ रहा था, हम थोड़ा आगे गए, पेड़ों और पौधों में, छिपते-छिपाते! 

वो आदमी झुकता, कुछ उठाता, 

और फिर अपने कंधे पर रखे, झोले में डाल लेता वो! 

और फिर आगे बढ़ जाता! अब वो उठा क्या रहा था? तभी दिमाग में ढपली बजी! फूल! चम्पा के फूल! हाँ! वही चम्पा के फूल! वो चंपा के ही फूल उठा रहा था! ये सही अंदाज़ा था मेरा! लेकिन ये है कौन? कब से है? 

और फूल किसलिए? और सबसे बड़ी बात, ये फूल आ कहाँ से रहे हैं? कौन ला रहा है ये फूल? 

रोज रोज? हम थोड़ा और आगे गए, 

अब वो आदमी तेज चलने लगा था, वो वहीं जा रहा था, जहाँ हमने खुदाई की थी, वो वहाँ गया, 

और उस गड्ढे में कूद गया! और गायब! अब मैं समझा! इस गड्ढे से ही सम्बन्ध है इसका! ये फूल इकट्ठा करता है, 

और चला जाता है। अब तो सारा रहस्य इस आदमी से ही जुड़ा था, यही थी कुंजी! अब इस से मुखातिब होना ज़रूरी था! और उसके लिए मुझे खुद ही, बात करनी थी उस से, लेकिन जहाँ मेरी एक न चल रही थी, वहाँ मैं कैसे बात करता उस से! कोई जुगाड़ करना था! 

खैर, 

हम वापिस हुए, 

उन दोनों को समझा दिया कि, कोई डरने की ज़रूरत नहीं है! आराम से रहें, और सो जाएँ! तसल्ली दे उन्हें, तब शांत हए वो, लेकिन भय अभी भी, मन में नाच रहा था दोनों के, कामवाली अकेले नहीं सोना चाहती थी, तो मैं और शर्मा जी एक चारपाई पर आ गए, और वो चारपाई, उस काम वाली को दे दी, अब हम सो गए आराम से! सुबह हुई, नहाये धोये


   
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श्रीशः उपदंडक
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निपुण साहब आ गए थे, भोजन ले आयेथे संग, चाय पी ही ली थी, मज़दूर भी लाये थे अपने संग, अब चार मज़दूर थे वहां, भोजन किया, और फिर काम शुरू करवाया, काम शुरू हुआ, मिट्टी हटाई गयी तसले में भर भर के, करीब एक घंटा हुआ, 

और तभी उस ज़मीन में से आग निकली! कोई दस बारह फीट ऊंची आग की लपटें! मज़दूर चीखते चिल्लाते हुए भागे! मैं भी पीछे हटा! अतुल और निपुण तो गिर ही गए थे नीचे घास में, भागते समय! शर्मा जी भी बच गए थे, वे गड्ढे में ही खड़े थे, भाग निकले थे! मेरी समझ में कुछ नहीं आया था कि, 

अचानक से आग क्यों लगी? हम तो केवल साफ़-सफाई करवा रहे थे? 

अब तो मज़दूर डर गए! कोई काम करने को तैयार नहीं था। पैसे लेने को भी तैयार नहीं थे! देह बचेगी तभी तो पैसा काम का! उनका डरना लाजमी था! और फिर आग बंद हुई! एकदम शांत! मैं गया उधर, मिट्टी काली पड़ गयी थी, 

लेकिन एक पत्थर के पास, मिट्टी धसक गयी थी। मैंने गैंती उठायी, वो मिट्टी निकाली वहाँ से, यहां फिर से ईंटें दिखीं! वैसी ही ईंटें, 

मज़दूर मुझे देख रहे थे, दो ने हिम्मत की, आगे आये, और हो गए शुरू, मिट्टी हटवाई उनसे, मिट्टी हटी, तो ईंटें साथ वाले पत्थर के नीचे भी थीं, अब वो पत्थर हटवाने के लिए कहा मैंने, उन्होंने बड़ी मेहनत कर, वो पत्थर हटाया, और मिट्टी हटाई, ईंटें थीं यहां पर! अब साफ़ की वो जगह! ये ईंटें, दरअसल में सीढ़ियां सी थीं, कोई रास्ता था नीचे की तरफ! मिट्टी हटाते रहे वे दोनों, 

और तीन सीढ़ियां निकल आयीं! भूल-भुलैया थी ये तो! 

और मिट्टी हटवाई! अब कोई आग नहीं निकली थी! चार बजे तक, नौ सीढ़ियां निकल आई थीं! झक के ही जाया जा सकता था उसमे! मैंने टोर्च ली, 

और नीचे उतरा, शर्मा जी संग थे! मिट्टी ही मिट्टी थी, 

और कुछ नहीं, पूरी खुदाई होनी थी, तभी रास्ता बनता, हम पीछे मुड़े, जैसे ही मुड़े, कुछ आवाज़ सी आई, जैसे किसी ने ज़मीन पर छड़ी या लाठीमारी हो! हमारे कान खड़े हो गए, मैंने ध्यान से सुना, 

पांवों के नीचे, ऐसी ही आवाजें आ रही थीं! बहुत बड़ा रहस्य बाकी था अभी! अब हम ऊपर आये, 

और मज़दूरों से और खुदाई करने को कहा, जैसे ही मज़दूरों ने काम शुरू किया, ज़मीन से पानी निकलने लगा, अचानक ही। हम सब भागे! ऊपर आये, पानी भरे जा रहा था! अब ये पानी कहाँ से आया? फिर से दिमाग में लगा ताला! 

और फिर अचानक से ही पानी घट गया! ज़मीन सूखी पड़ गयी एकदम! कोई सपना सा लगा मुझे तो ये! अब मज़दूर मुझे देखें! अब काम कैसे हो? उस रोज काम नहीं हुआ! मज़दूर चले गए! हुई रात! किया भोजन! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और रात को फिर से एक बजे, वही आदमी दिखा, वो आकाश को देखता, इशारा करता, जैसे किसी को आदेश दे रहा हो, 

और फूल गिर जाते! वो एक एक करके, फूल उठा लेता! 

और सीधा अपने झोले में! अब मैं चला सीधा उसकी तरफ! बिना डर, बिना खौफ के, शर्मा जी को रोक लिया था मैंने, 

मैं बढ़ चला, 

और पहुंचा उसके पास, उसने मुझे देखा, 

और फिर से फूल ढूंढने लगा, कोई बात नहीं की उसने! मुझे अनदेखा कर दिया उसने! "कौन हैं आप?" मैंने पूछा, उसने सुना ही नहीं। मैंने कई बार पूछा, कोई उत्तर नहीं दिया उसने, उसकी दाढ़ी थी, सफ़ेद रंग की, सर पर कपड़ा बाँधा था, फकीरों की तरह, नंगे पाँव था, 

कोई सात फीट का रहा होगा! मैं तो कंधे तक आ रहा था उसके! उसने हाथों में, कपड़े बाँध रखे थे, रंग-बिरंगे! मैंने कई बार पुकारा उसे, उसने कोई ध्यान नहीं दिया, अब मैं और आगे बढ़ा, 

और उसकी बाजू जैसे ही पकड़ी, मैं उछला हवा में, कोई पांच फ़ीट और धड़ाम! धड़ाम से गिरा नीचे! उसने देखा मुझे, आया, और उठाया मुझे, अब उसने उठाया तो, कुछ नहीं हुआ मुझे, मैं खड़ा हो गया था, कपड़े झाडे अपने, जेब से सामान गिर गया था, 

वो उठाया, 

और जब सामने देखा, तो वो गड्ढे की तरफ जा रहा था, मैं भागा उसके पीछे, लेकिन वो कूदा और गायब! कितना अजीब वाक़या था! 

मैं छूते ही उसको, उछल गया था। कैसी शक्ति थी उसमे! या किसका सरंक्षण था उसको! मैं तो सोचता ही रह गया था! अब वापिस आया, 

और सब बताया सभी को, सभी अब घबराये बुरी तरह से! अतुल साहब ने तो दिल थाम लिया अपना! लेकिन अब! अब मुझे वो लौ जल गयी थी, कि अब खेल हो जाए आमने सामने का! मेरे मंत्र नहीं चल रहे था वहां! ये तो मैं जानता था, लेकिन वहाँ यही कौन, ये भी पता नहीं चल रहा था, अर्थात वो शक्ति अपने आपको, ज़ाहिर ही नहीं कर रही थी! अगर ज़ाहिर करती तभी पता चलता कि गलती कौन कर रहा है, हम या उसी ज़बरदस्ती! यहाँ तो कोई तंग नहीं कर रहा था उसको, फिर कौन सी बात थी? इसीलिए मैंने उस स्थान पर अब एक, क्रिया करने की सोची! इस से उस शक्ति का अनावरण हो जाता, और मैं जान जाता है आखिर वहां है कौन? एक बार पता चल जाए तो, आगे का रास्ता साफ़ हो जाता! 

नै तो ऐसा ही चलता रहता! मैं भी उस शक्ति को ये बताना चाहता था कि, हमारा कोई बैर नहीं है उस से, बस जानना चाहते हैं कि चल क्या रहा है! सुबह के समय हम वहां से चले अपने स्थान के लिए, निपुण जी आये थे हमारे साथ, मैंने कुछ देर आराम किया, चाय पी, नाश्ता भी कर लिया था, मुझे अपना सामान लेना था, इसीलिए आया था मैं यहाँ, मैंने अपना सारा ज़रूरी सामान ले लिया, 

और फिर चल पड़ा निपुण और शर्मा जी के साथ वापिस वहीं के लिए, वहां


   
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श्रीशः उपदंडक
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पहुंचा, उसी गड्ढे के पास एक स्थान पर, साफ़-सफाई की, निपुण जी को ज़रूरी सामान लेने भेज दिया था, तब तक जगह साफ़ करवा ली थी, झाडू मैंने ही लगाई थी, अब रात को यहां एक क्रिया करनी थी, गड्ढा खोदकर, एक अलख बनायी, कामचलाऊ, बस एक रात के लिए ही, इस प्रकार मैंने सारी तैयारी कर ली, 

और ठीक रात दस बजे, स्नान कर, मैं अपना सामान ले, वहाँ आ गया, अलख उठा दी, औघड़-नाद कर! और फिर समस्त नमन किये! गुरु-नमन! अघोर-पुरुष नमन, स्थान नमन आदि आदि! भोग रखा सामने, मदिरा भी रखी! चिमटा खड़खड़ाया मैंने और हई क्रिया आरम्भ! 

HE 

ये हाज़िर-क्रिया थी! इसमें चाहे कोई भी शक्ति हो, उसको हाज़िर होना पड़ता है! इसमें किसी का अपमान नहीं किया जाता, 

अपितु सम्मान सहित उसको आमंत्रण दिया जाता है! अब क्रिया आगे बढ़ी! कोई आधा घंटा हुआ होगा, कि ज़मीन में कम्पन्न हुआ! लगा कि भूचाल आ रहा है! सामने गड्ढे में से फिर से लपटें निकलने लगी! पेड़ों के पत्ते गिरने लगे, मेरी अलख डगमगाने लगी! मेरा भोग और मदिरा सब कंप-कपाने लगे! थी लगा जैसे कि आकाश से कोई उतर रहा है, कुछ साये, बड़े से आये, वे आते जा रहे थे, करीब, मेरे करीब! मैंने गौर किया, 

वे क्या हैं? जब मैंने देखा तो पता चला ये सब, खेड़िया जिन्नात हैं। जिन्नात की सबसे पुरानी किस्म! जिन्नात आ रहे थे! 

वाह! ये हैं कौन? 

रक्षक? सेवक? किसके? 

यही खास सवाल था, जिसका उत्तर अभी मिल जाना था! वे एक निश्चित दूरी बना कर खड़े हो गए! कम से कम बीस तो होंगे! 

अब मामला समझ आने लगा था कुछ कुछ! ये जिसके सेवक है, जिसके रक्षक हैं, वो कोई पहुंचे हए पीर साहब हैं, या फिर कोई अव्वल दर्जे के सैय्यद जी! ये उन्ही का स्थान है! मैंने ईंधन झोंका अलख में! 

और वे जिन्नात जैसे परेशान हुए। यही तो चाहता था मैं! 

और तभी वही आदमी आया उधर, वो कपड़ा सर पर बांधे हए! कुछ दूर खड़ा था, 

और फिर जमीन पर बैठ गया था! मुझे ही देख रहा था, कोई भाव नहीं थे उसके चेहरे पर, न क्रोध के, 

और नहीं ही अन्य कोई भाव! उसके आते ही, वे जिन्नात सभी गायब हो गए! अब रह गया वो, सिर्फ एक! वो और सामने आया, ज़मीन पर बैठे बैठे ही, उसके हाथ में एक फूल था, चम्पा का फूल! मैंने ईंधन झोंका, अलख बिलबिला गयी! "नाम बताओ अपना?" मैंने पूछा, "मंसूर" वो बोला, अब बोला वो! 

हा! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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यही तो चाहता था मैं! "मंसूर, यहाँ कौन हैं?" मैंने पूछा, "बाबा" वो बोला "कौन से बाबा?" मैंने पूछा, 

वो चुप! हंसा! "खुद ही जान जाओगे!" वो बोला, वो जिन्नात फिर से प्रकट हुए! "ये कौन हैं?" मैंने पूछा, "जिन्नात" वो बोला, "किसलिए?"मैंने पूछा, "ये तो हमेशा से ही साथ हैं" वो बोला, सहसा! मंसूर में जैसे प्रकाश समाया, 

वो जगमगा गया! मेरी आँखें चंधिया गयीं! जब आँखें खोली, तो सारे जिन्नात घेर के खड़े थे उसे! वो हवा में बैठा हुआ था, "तुम ये क्या उठाते हो ज़मीन से?" मैंने पूछा, "फूल, ये फूल" वो बोला, वही चम्पा के फूल! "कौन लाता है इनको?" मैंने पूछा, "ये सब, तेहलीवाला से, जहाँ तुमने खबर निकलवाई थी" वो बोला, 

खबर! तो मंसूर जानता था! सब जान रहा था। "ये तेहलीवाला से आते हैं रोज़, बाबा की ख़िदमत करने, फूल लेकर" वो बोला, अब समझा! ये बिखेरते हैं फूल ज़मीन पर, और मंसूर उठाता है उनको! वही फूल! "मेरे यहाँ से फूल कौन ले गया था?" मैंने पूछा, "मैं!" वो बोला, मैं चौंका! मंसूर आया था मेरे यहां? "वो बाबा के फूल हैं" वो बोला, 

मैं चुप! 

"बाकी बचे भी ले आया था" वो बोला, 

अब हुई हालत पतली मेरी! ऐसी महाशक्ति से कौन भिड़ेगा? जो मेरे श्मशान के स्थान को भेद दे, फूल ले आये, आये और जाए, किसी की नज़र में न आये, किसी की देख, पकड़ में न आये, 

वो कैसी शक्ति होगी, मैं तो नतमस्तक होने को अब तैयार था! मेरे हाथ जुड़ते चले गए, "माफ़ी! माफ़ी दे दो मंसूर!" मैंने कहा, 

वो मुस्कुराया! "तुमने ऐसा क्या किया?" उसने पूछा, "मैंने ज़मीन खुदवा दी, बाबा की अमानत में खयानत कर दी!" मैंने कहा, "नहीं। कोई खयानत नहीं" वो बोला, उसने फूंक मारी सामने, मेरी अलख शांत हो गयी! ऐसा सामर्थ्य था उस मंसूर में! सच्चाई से भागना नहीं चाहिए, मैं नहीं भागा था! माफ़ी मांग ली थी मैंने, मैं खड़ा हुआ! चला मंसूर की ओर, मंसूर भी खड़ा हो गया! मैं जैसे ही सामने आया, वे सभी जिन्नात, सामने आ खड़े हुए, मैंने आवाज़ दी मंसूर को, मंसूर आगे आया, 

और मेरे सामने खड़ा हो गया, "आओ" बोला वो, मैं चल पड़ा उसके साथ, मुझे ले गया वो गड्ढे तक, 

गड्ढे को देखा मैंने, जैसे दूधिया प्रकाश ने, उस गड्ढे को ढक रखा हो! जैसे चाँद सीधा वहीं रौशनी डाल रहा हो! वो चम्पा के फूल, वहीं पड़े थे। मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था! कि न जाने आगे क्या हो। मैं गड्ढे में देख रहा था! चम्पा के ताजे फूल बिखरे हुए थे! तेज़ लोहबान की गंध आने लगी थी! महक बहुत तेज़ थी! हम गड्ढे में उतरे, वे जिन्नात वहीं, बाहर ही खड़े रहे, 

और फिर ज़ोर की आवाज़ हुई, जैसे कोई फिसला हो, मैंने पीछे देखा, सारे जिन्नात गायब थे अब! मंसूर ने अपने दोनों हाथ उठाये, ज़मीन में आवाज़ हुई, उसने ज़मीन को छुआ, 


   
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