वर्ष २०१२ मध्य प्रद...
 
Notifications
Clear all

वर्ष २०१२ मध्य प्रदेश की एक घटना! वो रहस्यमयी कुआँ।

30 Posts
1 Users
30 Likes
426 Views
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"कहाँ है वो स्त्री?" पूछा मैंने,
"है तो यहीं, परन्तु दिवाःकाल में बाहर नहीं आती!" बोले वो,
"बाहर नहीं आती?'' पूछा मैंने,
"हाँ, नहीं आ पाती!" बोले वो,
"नहीं आ पाती?'' पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"क्या कहते हो?" पूछा मैंने,
"हाँ, विश्वास कीजिये?" बोले वो,
"कमला है? भला किस कारण से?" पूछा मैंने,
"सूर्य-रश्मियाँ छिद्रण करती हैं उसकी त्वचा का!" बोले वो,
"ये क्या क्या कह रहे हो?" कहा मैंने,
"आप मानिए?' बोले वो,
"कोई रोग है क्या?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"नहीं?" बोला मैं,
"हाँ, नहीं!" कहा उन्होंने,
"नाम क्या है?'' पूछा मैंने,
"कंचन!" बोले वो,
"आयु?'' पूछा मैंने,
"तेईस बरस!" बोले वो,
"माता-पिता?" पूछा मैंने,
"यहीं हैं!" बोले वो,
"क्या देख सकता हूँ?" पूछा मैंने,
''सूरज ढल जाए!" बोले वो,
"एक बात?" कहा मैंने,
"क्या वो?'' बोले वो,
"रात्रि में कुछ नहीं होता?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
अचानक से ही, ब्रैम स्टोकर और उनका महान नावेल ड्रैकुला याद आ गया! कुछ वैम्पायरस भी! ऐसा ही तो है उनमे! रात्रि में जीवंत, दिवस में निन्द्रालीन!
"और ऐसा है कब से?" पूछा मैंने,
"एक वर्ष हुआ!" बोले वो,
"किस कारण से?" पूछा मैंने,
थोड़ा आगे पीछे देखा, एक लड़की थी वहां, कुछ धागे से निकाल रही थी, चादर में से, आयु में कम ही थी, सत्रह या अठारह की रही होगी, उसके हाव-भाव देखकर, यही लगता था कि वो हमारे वार्तालाप में कोई ध्यान नहीं ले रही, अपनी ही धुन में व्यस्त थी!
"सुन? मुन्नी? ओ मुन्नी?" बोले वो,
"हाँ, हाँ बाबा?" बोली वो, चौंक कर,
"जा बेटी, बाहर जा ज़रा!" बोले वो,
वो समझ गयी! समझी कि कुछ गंभीर सा वार्तालाप है! तो उसने एक दो बर्तन उठाये, और चली गयी बाहर! उसकी सलवार, उसकी एड़ियों के बीच में आ जाती बार बार, रुक रुक कर, ठीक करती, और चली गयी बाहर!
"हाँ, तो क्या कह रहे थे?" बोले वो,
"किस कारण से ऐसा है?" पूछा मैंने,
"उसने ही बताया...." बोले वो, मैंने बात काटी,
"किसने?'' पूछा मैंने,
"कंचन ने!" बोले वो,
"क्या बताया?" पूछा मैंने,
"कि कोई आता था उसके पास, जिसके साथ उसके संबंध बन गए!" बोले वो,
"क्या?'' मैंने हैरानी से पूछा,
"हाँ, अरे हाँ!" बोले वो, मेरे घुटने पर हाथ मारते हुए,
"कौन आता था?" पूछा मैंने,
"यही तो पता न चल सका!" बोले वो,
"साफ़ साफ़ कहो जी?'' कहा मैंने,
"हाँ, नहीं पता चल सका!" बोले वो,
"भला आता कौन था?" पूछा मैंने,
"ये ही तो नहीं पता?" बोले वो,
"होगा तो कोई आदमी ही? कोई पुरुष ही?'' पूछा मैंने,
"नहीं जी! पुरुष ही होता तो ढूंढ न लाते?" बोले वो,
"है बाबा! आप भी! मज़ाक कर रहे हो?" बोला मैं,
"राम सौं! मज़ाक न!" बोले वो,
"क्यों सर फटवा रहे हो मेरा?" पूछा मैंने,
"हमने भी फुटवाए सर अपने बहुत!" बोले वो,
"ऐसा भला? कैसे सम्भव है?" पूछा मैंने,
"वही बात!" बोले वो,
"तो होगी ना?" कही मैंने,
"होगी तो सही!" बोले वो,
"बाबा??" आई एक आवाज़, मैंने बाहर झाँका, ये मुन्नी थी, चाय ले आई थी!
"आज मुन्नी!" कहा मैंने,
वो आई, मुस्कुराते हुए, और दो कप चाय दे गयी! फिर लौट गयी! मैंने चुस्की भरी!
"वैसे बाबा?" कहा मैंने,
"कहो?'' बोले वो,
''वो आता कब था?" पूछा मैंने,
"अरे, ये खुद जाती थी!" बोले वो,
"हैं? खुद?" पूछा मैंने,
"हाँ, खुद!" बोले वो,
"वो कब?" पूछा मैंने,
"रात को!" बोले वो,
"रात में कब?" पूछा मैंने,
"जब मर्ज़ी!" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"और जाती कहाँ थी?'' पूछा मैंने,
"यही नहीं बताती बस!" बोले वो,
"क्यों भला?" पूछा मैंने,
"पता नहीं!" बोले वो,
"वैसे क्या मानसिक स्थिति है उसकी?" पूछा मैंने,
"ये ही न पूछो!" बोले वो,
"विक्षिप्त है क्या?" पूछा मैंने,
"ना! लगता है, एकांश-मंडल भी खुल गया हो उसका!" बोले वो,
अब लगी धसकी मुझे! खांसी सी उठ गयी! दबाई मैंने!
"क्या कह रहे हो?" बोला मैं,
"सच कह रहा हूँ!" बोले वो,
"सच?" पूछा मैंने,
"हाँ, सच! राम सौं!" बोले वो,
"आता कौन था? नहीं पता! कहाँ जाती थी, नहीं पता! है न?'' कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"क्या अब नहीं आता?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"अब नहीं जाती?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
कैसी भयानक पहेली है! कौन क्या है? कुछ नहीं पता! क्या हुआ था? क्या हो रहा है, किसलिए? क्या होगा आगे? कुछ नहीं पता! बड़ी ही हैरत! बड़ी ही पेचीदा! और सच कहूँ, या तो बाबा को भी पूरी बात पता नहीं, या मुझे समझा नहीं सके! अब क्या किया जाए? मिला जाए उस कंचन से?


   
Quote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"कब मिलवाओगे?" पूछा मैंने,
"आज ही मिल लेना!" बोले वो,
"है कहाँ वो?" पूछा मैंने,
"यहीं है!" बोले वो,
यहां से बात शुरू हुई थी हमारी! बाबा
 ने तो ऐसा मृद-भांड फोड़ा कि मेरे तो पाँव ही फिसल गए! बड़ी अजीब सी ही बात थी! एक वर्ष से वो, वो कंचन, सूर्य की रौशनी में न आ सकती थी! त्वचा जलने लगती थी उसकी! अजीब सी बात ही थी ये तो! ऐसा भला क्या हो गया अचानक ही?
"बाबा?" कहा मैंने,
"हाँ जी?" बोले वो,
"क्या चिकित्सा नहीं करवाई उसकी?" पूछा मैंने,
"बहुत करवाई!" बोले वो,
"कोई लाभ नहीं हुआ?'' पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"क्या रोग बताया उसको?" पूछा मैंने,
"कि एलर्जी है कोई, करोड़ों में से एक को ही होती है! दवा दे दी, दवा असर ही न करे!" बोले वो!
"ये देखो!" बोले वो,
उठे और कुछ कागज़ टटोले! और एक कागज़ निकाल लाये, बैठे!
"ये बताया!" बोले वो,
अब मैंने पढ़ा उस बारे में! लिखा था एक कागज़ पर, टॉक्सिक एपिडर्मल नेक्रोलीसिस और ब्रैकेट में, एस.जे.एस., मुझे तो समझ नहीं आया! हाँ इतना कि ये कोई सिंड्रोम था और कोई ला-इलाज बीमारी त्वचा की, त्वचा अज़ूल या नीली पड़ने लगती है! मेरे तो ये पढ़ कर, होश फाख्ता हो, दूर लगे, सफेदे के पेड़ पर जा बैठे हिलते-डुलते हुए!
"ये सब, एक वर्ष के भीतर ही हुआ?" पूछा मैंने, वो कागज़ लौटाते हुए उन्हें,
"हाँ, एक वर्ष के भीतर ही!" बोले वो,
"बड़ी ही हैरतअंगेज बात है!" कहा मैंने,
''सब समझ से बाहर!" बोले वो,
''और रात में ठीक रहती है?" पूछा मैंने,
"हाँ, सामान्य ही!" कहा मैंने,
"क्या उसके माँ-बाप या अन्य रिश्तेदार को ऐसा रोग तो नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
मैंने घड़ी देखी तभी! अभी तो ढाई घंटे थे सूर्य देव को अस्तांचल में जाने के लिए! और यहां एक एक पल काटना ऐसा था कि जैसे अंगारों पर बैठा होऊं मैं! बाहर गरमी, अंदर गरमी, अब सोच में भी गरमी! क्या किया जाए!
"कोई वैद्य-हक़ीम?" पूछा मैंने,
"सब बेकार!" बोले वो,
"ओह! तब?" पूछा मैंने,
"कच्छप-विवाह भी करवा दिया!" बोले वो,
''अच्छा! किसने बताया?" पूछा मैंने,
"अरे वो हैं न जूनागढ़ के, धरणी बाबा?" बोले वो,
"हाँ?" कहा उन्होंने,
"लेकिन वो तो सीपिया-रोग में होता है, सर्प-त्वचा में?" पूछा मैंने,
"बताया तो करवा दिया!" बोले वो,
"कोई लाभ?" पूछा मैंने,
"न जी!" बोले वो,
"होना ही नहीं था!" कहा मैंने,
"तो किया क्या जाए?" पूछा उन्होंने,
"ये तो कंचन ही बताये?" कहा मैंने,
''वो तो बताती नहीं!" बोले वो,
"बताती क्यों नहीं?'' पूछा मैंने,
"उसे याद नही रहता! आता, मेरा मतलब!" बोले वो,
"याद नहीं आता?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"अब ये क्या?'' पूछा मैंने,
"यही तो सारी दिक्कत है!" बोले वो,
"समझा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"उसकी देह में और कोई बदलाव हैं?" पूछा मैंने,
"नहीं जी!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
''आपके अनुसार, ये उस पुरुष द्वारा किये गए संसर्ग द्वारा प्रदत्त फल है, है न?'' पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"अब प्रश्न ये, कि वो है कौन?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
''आपको पता नहीं?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"कंचन बताती नहीं?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"तब तो स्थिति विकट है!" कहा मैंने,
"जटिल भी!" बोले वो,
"स्वाभाविक है!" कहा मैंने,
''एक बात और?" पूछा मैंने,
"क्या?' बोले वो,
"क्या गर्भाधान भी हुआ?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"कभी नहीं?" पूछा मैंने,
"ना!" बोले वो,
"ये और पेचीदा!" कहा मैंने,
"बिलकुल जी!" बोले वो,
"संसर्ग हुआ, गर्भ नहीं ठहरा! सम्भव है!" कहा मैंने,
"हाँ, सम्भव है!" बोले वो,
"हाँ, एक बात और?" कहा मैंने,
"वो क्या?" बोले वो,
"आपने कहा एकांश-मंडल खुल गया?'' पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो,
"कैसे कह सकते हैं?" पूछा मैंने,
"बात कर लेना!" बोले वो,
"सच में?" पूछा मैंने,
"हाँ, सच में!" बोले वो,
"इसी ब्रह्माण्ड की घटना है न ये?" कहा मैंने,
हंस दिए वो!
''आप भी!" बोले वो,
"बताइये तो?" पूछा मैंने,
"बिलकुल जी!" बोले वो,
''अब ये कौन हो सकता है?" कहा मैंने,
"पता नहीं!" बोले वो,
"अब होगा तो कोई पक्का ही!" कहा मैंने,
"होगा तो पक्का ही!" बोले वो,
"किसी ने देखा कभी?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोले वो!
और मेरे हुए कान खड़े! गाँव में छोरा और शहर में ढिंढोरा!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"देखा है? कौन है वो?" पूछा मैंने, जैसे मैंने गुत्थी ही सुलझा ली हो!
"यहीं है वो!" बोले बाबा,
"अरे है कौन जी?" पूछा मैंने खीझ कर!
"एक औरत है!" बोले वो!
"अरे बाबा है कहाँ?" पूछा मैंने,
"यहीं है!" बोले वो,
"बाबा आप भी कमाल हैं!" कहा मैंने,
"वो कैसे जी?" बोले वो,
"वो औरत यहां है, और आपने बताया भी तो अब!" कहा मैंने,
"बता तो रहा था!" बोले वो,
"यहीं की है?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"खंडवा की है!" कहा उन्होंने,
"क्या नाम है?" पूछा मैंने,
"ममता!" बोले वो,
"आपने पूछताछ की थी उस से?' पूछा मैंने,
"जो भी पता चला, सिर्फ उसी से!" बोले वो,
"तो बुलवाओ?" कहा मैंने,
"साथ चलो?" बोले वो,
"आ नहीं सकती क्या?'' पूछा मैंने,
"दो दिन से बीमार है!" बोले वो,
"क्या हुआ?'' पूछा मैंने,
"वही खांसी-खुर्रा!" बोले वो,
"मौसम के कारण!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"चलो फिर!" कहा मैंने,
"आओ!" बोले वो,
लिया अपना गमछा उन्होंने, बीड़ी का बंडल उठाया, जेब में खोंसा, और चल दिए बाहर, मैं भी चला साथ उनके!
"जगह बड़ी अच्छी है ये!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"लक्खी कहाँ हैं आज कल?" पूछा मैंने,
"वहीँ?" बोले वो,
"मऊ रानीपुर?" कहा मैंने,
"हाँ, और कहाँ?" बोले वो,
"अच्छा, आ जावे हैं इधर?" पूछा मैंने,
"हाँ, कभी कभार!" बोले वो,
"अमरुद तो ज़ोर के हैं!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"और पेड़ लगाये हैं?" पूछा मैंने,
"हां जी, अमरुद, बेर, आंवला और थोड़ी सब्जी-भाजी!" बोले वो,
"बढ़िया है!" कहा मैंने,
"हो जावे हैं कुछ आमदनी!" बोले वो,
"बढ़िया है!" कहा मैंने,
मैंने दो-चार बड़े बड़े बेर तोड़ लिए थे, गोला-बेर! बहुत बढ़िया होता है! क्षार अधिक होता है इसमें! शर्मा जी, अपने कमरे में ही सोये हुए थे, हालत खराब सी थी उनकी! बुखार बना हुआ था उन्हें!
''आओ जी!" बोले वो,
एक बहुत ही बड़ा सा कुआं था वहां! अंदर झाँकने में ही डर सा लगता था! उसी में से पानी की सारी व्यवस्था की गयी थी!
"इसमें भी मछली?" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"कमाल है!" कहा मैंने,
"यहां तो देखा ही होगा आपने?'' बोले वो,
"हाँ, तीन चार जगह देखा!" कहा मैंने,
"साफ़ रखे है पानी को!" बोले वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"और मांगे कुछ नहीं!" बोले वो!
"कौन सी पाले हैं?" पूछा मैंने,
"मांगोरा है!" बोले वो,
''हाँ, यही पक्की है सबसे!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
"पप्पू?" बोले वो, एक लड़के से! वो लड़का आया उनके पास!
"ममता है?" पूछा उन्होंने,
"हाँ, उधर!" बोले वो,
"क्या कर रही है?" पूछा उन्होंने,
"कपड़े धो रही हैं!" बोला वो,
"तबीयत ठीक है?'' पूछा,
"हाँ, कल से!" बोला वो,
"जा, बुला ला!" बोले वो,
"अभी!" या वो,
तो हम एक चारपाई पर बैठ गए! सामने ही, बैंगन का भंडार रखा था! ताज़ा बैंगन थे! शायद आज ही तोड़े गए थे वहीँ के खेतों से!
तभी एक औरत आई, आयु में तीस के करीब होगी, सर झुका कर नमस्कार की, और चली गयी पानी लेने! घड़े से पानी निकाला और दिया हमें गिलासों में डाल कर! मैंने पानी पिया!
"ममता?'' बोले वो,
"जी बाबा?" बोली वो,
"आ, बैठ!" बोले वो,
वो औरत बोरी लायी एक, और बिछा, बैठ गयी उस पर!
"ये दिल्ली वाले हैं, वो जो हैं न काशी में?" बोले वो,
"काशी?" बोली वो, ज़ोर डालते हुए दिमाग पर!
"कैराली?'' बोले वो,
"हाँ हाँ!" बोली वो!
"कंचन के बारे में जानना है इन्हें!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा उसने,
"कंचन को कब से जानती हो ममता?'' पूछा मैंने,
"चार पांच साल हो लिए!" बोली वो,
''अच्छा!" कहा मैंने,
"बाबा ने कुछ बताया मुझे!" कहा मैंने,
''अच्छा!" बोली वो,
"तुमने कुछ देखा था?" पूछा मैंने,
"हाँ जी!" बोली वो,
अब उत्कंठा ने मारा ज़ोर! उत्कंठा के सांप ने खोली कुंडली!
"क्या देखा था?" पूछा मैंने,
"तुम बात करो, मैं आया" बोले बाबा,
उठे और चले गए वहां से!
"कंचन को देखा था!" बोली वो,
"किसी के साथ?" पूछा मैंने,
"हाँ जी" बोली वो,
"कितनी बार?" पूछा मैंने,
"एक ही बार" बोली वो,
"फिर कभी नहीं?" पूछा मैंने,
"नहीं" बोली वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"क्या देखा था?" पूछा मैंने,
"क्या देखा था!!" बोली वो,
पास के एक पेड़ पर बैठे हुए कौवे ने कांव-कांव की तो उसने देखा उसे! कुछ याद करने की कोशिश की, शायद कुछ टुकड़े, उठाये थे उसने, जोड़े और तब मुझे बताना शुरू किया! इस से पहले कि वो कुछ बोलती, मैंने अपनी तरफ से बातचीत शुरू की!
"कितना समय हुआ होगा इस बात को?" पूछा मैंने,
"करीब डेढ़ साल!" बोली वो,
"अच्छा, तब कंचन बीस की होगी?" पूछा मैंने,
"हाँ, बीस या इक्कीस?" बोली वो,
"जगह यही थी?" पूछा मैंने,
"हाँ, लेकिन यहां से कोई ढाई तीन किलोमीटर है दूर, जंगली से क्षेत्र में!" बोली वो,
"वो जंगल जाती थी?" पूछा मैंने,
"नहीं, तब हम वहां रहते थे!" बोली वो,
"ओ, अच्छा!" कहा मैंने,
"कंचन के माँ-बाप संग ही रहते हैं?" पूछा मैंने,
"हाँ, संग ही!" बोली वो,
"तो आरम्भ कैसे हुआ ये सब?" पूछा मैंने,
"कंचन को देखा है आपने?" पूछा उसने,
"नहीं, अभी नहीं!" कहा मैंने,
''अब कंचन, वो कंचन नहीं!" बोली वो,
"क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"हाँ, वो कंचन तो, चली गयी!" बोली वो,
''चली गयी? कहाँ?" पूछा मैंने,
"उसी कुँए में!" बोली वो,
"कुआँ? कैसा कुआँ?" पूछा मैंने,
"वो जंंगल का कुआँ!" बोली वो,
"कोई कुआं है उधर?" पूछा मैंने,
"हाँ, है!" बोली वो,
"तो उस कुँए से, कंचन का क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"उस कुँए से ही तो शुरू हुआ था सब!" बोली वो,
"क्या???'' पूछा मैंने,
"हाँ, उसी कुँए से!" बोली वो,
"क्या शुरू हुआ था?" पूछा मैंने,
"ये सब!" बोली वो,
"क्या सब?" पूछा मैंने,
''सारा खेल!" बोली वो,
"कैसा खेल?" पूछा मैंने,
"उस कुँए का खेल!" बोली वो,
"कुँए का खेल?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"साफ़ साफ़ बताओ!" कहा मैंने,
"वो कुआँ देखा आपने?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
''आप देखिये पहले!" बोली वो,
''फिर?" पूछा मैंने,
"फिर मैं बताउंगी कि कौन रहता है उसमे!" बोली वो,
"क्या???????" मेरे होश उड़े!
कौन रहता है? कोई प्रेत? कोई भूत? कोई और?
"कौन रहता है?'' पूछा मैंने,
"आप कुआँ तो देखिये पहले!" बोली वो,
"कुआँ तो देख ही लूंगा!" कहा मैंने,
''आप देख लीजिये!" बोली वो,
"हाँ, कल ही देखता हूँ!" कहा मैंने,
"मैं भी चलूंगी साथ!" बोली वो,
"आपकी तबीयत ठीक नहीं?" कहा मैंने,
''अब ठीक हूँ!" बोली वो,
"वैसे बताओ तो?" कहा मैंने,
"वहां रहता है कोई!" बोली वो,
''आपने देखा है?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"क्या है वो?" पूछा मैंने,
"ये नहीं पता!" बोली वो,
"कैसा है वो?" पूछा मैंने,
"सफेद!" बोली वो,
''एकदम सफेद?" पूछा मैंने,
"हाँ, एकदम सफेद!" बोली वो,
"कोई वस्त्र?" पूछा मैंने,
''वो भी सफेद!" बोली वो,
"वस्त्र कैसे?" पूछा मैंने,
"जैसे लपेटा हो अपने आप को!" बोली वो,
"कोई गाँठ, पट्ट?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"आमने सामने देखा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"छिप कर!" कहा उसने,
"साथ कौन था?" पूछा मैंने,
"कोई नहीं!" बोली वो,
''अकेली तुम?" कहा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
"दिन या रात?" पूछा मैंने,
''रात!" बोली वो,
''वक़्त?" पूछा मैंने,
"दो के आसपास!" कहा उसने,
"इतनी रात?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो!
"ये खुद जाती थी?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बताया उसने,
"अच्छा?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"तो वो, वहीँ मिलता था?" पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"नहीं? फिर?" पूछा मैंने,
"ये बुलाती थी!" बोली वो,
"कैसे?" कहा मैंने,
"आवाज़ देकर!" बताया उसने,
"तुमने सुनी वो आवाज़?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"तुम दूर थीं?" पूछा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
"तो वो आता था?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बताया उसने!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"ममता? तुम्हारे हिसाब से वो रहा क्या होगा?" पूछा मैंने,
"नहीं कह सकती!" बोली वो,
"मतलब कि देखने में कैसा था?" पूछा मैंने,
"देखा ही कहा? उसका रंग ही ऐसा चमकदार था कि आँखें ही चुंधिया जाएँ!" बोली वो,
''अरे? ऐसी चमक?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
अब ये कौन हो सकता था? ये है क्या? क्या रहा होगा?
"जैसे वो ट्यूब नहीं है?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
''ऐसी हज़ारों ट्यूब!" बोली वो,
"समझ गया!" बोला मैं,
"तो फिर कद-काठी भी नहीं देख सकी होंगी?" पूछा मैंने,
"नहीं, सफेद पिंड सा लगता था वो!" बोली वो,
''और ये देख लेती थी उसे?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"बिना परेशानी के?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
बड़ी ही अजीब बात!
"कितनी देर तक देखा होगा तुमने?'' पूछा मैंने,
"पल, दो पल?" बोली वो,
"बस?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"फिर?'' पूछा मैंने,
"फिर तो मैं जैसे अंधी हो गयी थी! माह भर बाद रौशनी लौटी!" बोली वो,
"ओहो!" कहा मैंने,
इन अशरीरियों में ऐसी चमक तो हुआ करती है, लेकिन जैसा इसने बताया, वैसी हो, ये नहीं सुना था मैंने, हाँ, तेज होता है उनका, गुलाबी चमक सी, तेज पीली सी आभा! जिन्नात में लाल सी आभा हुआ करती है! लेकिन ये ट्यूब जैसी सफेद? ये क्या है?
"तो ये वर्ष भर ऐसी ही जाती थी?" पूछा मैंने,
"हाँ, जब से हमें पता चला!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"लेकिन एक बात?" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा उसने,
"जब तुमने देखा, तो, उसके बाद कब तक गयी?" पूछा मैंने,
"एक बार भी नही!" बोली वो,
"क्या?" मैंने हैरत से पूछा,
"हाँ फिर नहीं गयी!" बोली वो,
"कभी नहीं?" पूछा मैंने,
"कभी नहीं!" बोली वो,
"इसने कभी ज़िद नहीं पकड़ी?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
ये तो और मामला पेचीदा हो चला!
"मतलब, ये, साल भर पहले की बात है!" कहा मैंने,
''डेढ़ साल!" बोली वो,
"हाँ, डेढ़ साल!" कहा मैंने,
"हाँ, डेढ़ साल पहले की!" बोली वो,
"एक बात और!" कहा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"उसमे कुछ परिवर्तन हुआ?'' पूछा मैंने,
"हाँ, कुछ नहीं, पूरी ही बदल गयी!" बोली वो,
"एक तो ये, कि दिन में बाहर नही निकलती, और?" पूछा मैंने,
"उसका रंग रूप!" बोली वो,
"मतलब?" पूछा मैंने,
"आप स्वयं देख लेना!" बोली वो,
"अभी भी साढ़े सात!" कहा मैंने,
"हाँ, एक घंटा और रुकिए!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
"चाय पिएंगे?" पूछा उसने,
"हाँ, पी लूंगा!" कहा मैंने,
"बैठिये, मैं लायी!" बोली वो,
"पानी पिला दीजिये!" कहा मैंने,
"अभी!" बोली वो,
और चली गयी, एक छोटी सी लड़की पानी ले आई, मैंने पानी पिया फिर! कुछ देर बाद, चाय भी बना लायी वो, और रख दी वहीँ!
"ये सब शुरू कैसे हुआ था?" पूछा मैंने,
"नहीं पता चला कभी!" बोली वो,
"मतलब कि कब से चल रहा है, कुछ नहीं पता?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"अजीब ही है!" कहा मैंने,
''हाँ!" बोली वो,
"चलो! पहले देखते हैं उसको!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"चलोगी?" पूछा मैंने,
"हाँ, पास ही है!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"तुम खंडवा की हो?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"गए हो उधर?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
''अच्छा!" बोली वो,
"तो यहाँ कब से हो?" पूछा मैंने,
''दस बारह बरस हुए!" बोली वो,
"ब्याह यहीं हुआ?'' पूछा मैंने,
"हुआ था" बोली वो,
"था?" पूछा मैंने,
"हाँ, अब आदमी नहीं है!" बोली वो,
"ओह...अच्छा..." कहा मैंने,
"सब क़िस्मत का खेल!" बोली वो,
"ये तो है!" कहा मैंने,
"कोई बाल-बच्चा?" पूछा मैंने,
"नहीं है!" बोली वो,
"ओह....!" कहा मैंने,
"कट जायेगी!" बोली वो,
"हाँ जी!" कहा मैंने,
तभी बाबा आ गए! बैठे हमारे साथ ही!
"चाय लाऊँ?" पूछा ममता ने,
"ले आ?" बोले वो,
वो उठी, वो चली गयी चाय लेने!
"बात हो गयी?" पूछा उन्होंने,
"अभी चल ही रही है!" कहा मैंने,
"कुछ समझ आया?" पूछा मुस्कुरा के!
"नहीं!" कहा मैंने,
"बताऊंगा!" बोले वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"बाबा?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा!" कहा मैंने,
"अभी से?'' बोले वो,
"हाँ, अभी से!" कहा मैंने,
"अभी तो झलकी ही देखी है!" बोले वो,
"अभी और क्या शेष है?" पूछा मैंने,
"मिलो तो सही कंचन से?" बोले वो,
"ऐसा?" बोला मैं,
"हाँ, ऐसा!" बोले वो,
"अब क्या देर?" पूछा मैंने,
"चलो!" बोले वो,
"चलो जी!" कहा मैंने,
"री ममता?' बोले वो,
"हाँ बाबा?" बोली ममता!
"चलें हम?" बोले वो,
''चाय पी लो पहले!" बोली वो, चाय लाते हुए!
"अच्छा, ला!" बोले वो,
मैं खड़ा हो गया था! सामने तक गया और एक अमरुद तोड़ लिया! साफ़ किया और खाने लगा! ताज़ा अमरुद था, बेहद ही स्वादिष्ट! मुलायम सा! मीठा!
"बड़े ही मीठे हैं!" कहा मैंने,
"हाँ जी!" बोले वो,
चाय पी ली थी, उठ खड़े हुए!
"ममता, चल?" बोले वो,
''चलो!" बोली वो,
और फिर हम तीनों ही, चल पड़े! मेरे मन में तीव्र इच्छा थी उस कंचन को देखने की! देखूं तो सही, कौन से आवरण में लिपटी है वो रहस्य के! न जाने कौन सा रहस्य था! अब देखूं, बात करूँ तो जानूँ!
और हम आ गए उस जगह! बड़ी ही शानदार जगह थी! फूलों के पौधे लगे हुए थे! करेले की बेल में फूल खिले थे! बैंगन के पौधों में फूल खिले थे!
"आओ!" बोले बाबा,
ममता एक कमरे में गयी, हम बाहर खड़े रहे, दो महिलाएं बाहर आयीं, और फिर ममता!
''आ जाओ!" बोली वो,
"हाँ!" बोले वो,
और हम अंदर चले तब!
अंदर, एक दिया और एक धूपबत्ती जली हुई थी! गुग्गल की सुगंध फैली थी!
"बैठो!" बोले वो,
मैं बैठ गए उधर ही! मूढ़े पड़े थे, उन्हीं में से एक पर बैठा मैं! उसी कमरे में ही, एक और दरवाज़ा था, ममता वहीँ गयी थी!
''आप आ जाओ!" बोली ममता!
मैं खड़ा हुआ, और चल पड़ा उसके साथ! मुझे उधर छोड़, खुद बाहर चली गयी ममता! सामने ही, बिस्तर पर, बैठी थी कंचन! मैंने देखा उसे, तो देखता ही रह गया! इतनी सुंदर! ऐसी सुंदर! स्त्रियोचित सभी गुण थे उसमे! सुडौल देह, तेजपूर्ण सा चेहरा! अत्यंत ही तीक्ष्ण हाव-भाव! गोरा, उज्जवल सा रूप!
"बैठिये?" बोली वो,
मैं बैठ गया उधर ही!
"आप ही आये हैं?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मात्र मिलने?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?'' पूछा उसने,
"जानने!" कहा मैंने,
''वो क्या?" पूछा उसने,
"जो जानना है!" कहा मैंने,
''वो क्या?" बोली वो,
"आपको!" कहा मैंने,
"बस?' बोली वो,
"और भी!" कहा मैंने,
"वो क्या?" बोली वो,
"मैं जानूँ!" कहा मैंने,
"कोई नहीं जानता!" बोली वो,
''आपने बताया नहीं!" कहा मैंने,
"सच?" बोली वो,
"हाँ, सच!" कहा मैंने,
"जान पाओगे?'' पूछा उसने,
"उम्मीद है!" कहा मैंने,
"पक्की?' बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"संदेह है!" बोली वो,
"आप साथ हो?'' पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"तो कैसा संदेह?" पूछा मैंने,
"कुछ जानते हो?" बोली वो,
"नहीं!" बोला मैं,
"तो?" कहा उसने,
''आप बताओगी नहीं?" कहा मैंने,
"कोशिश!" बोली वो,
"बहुत है!" कहा मैंने,
"इतना ही?'' बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"कैसे?' पूछा उसने,
"देखना!" कहा मैंने,
"मान लूँ?" बोली वो,
"मानना ही होगा!" कहा मैंने,
"सच?" बोली वो,
"हाँ, सच!" कहा मैंने,
"सब आये थे!" बोली वो,
"मैं नहीं!" कहा मैंने,
"वाह!" बोली वो,
"अभी नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?'' बोली वो,
मैं आगे झुका! गौर से देखा उसे! वो मुस्कुरा गयी! मैं नहीं!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"क्या देख रहे हो?" पूछा उसने,
"कुछ!" कहा मैंने,
"क्या कुछ?" पूछा उसने,
"श्ह्ह्!" मैंने कहा उस से!
उसने अटपटी सी निगाह से देखा मुझे!
"देख लिया?'' पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने, और पीछे हुआ!
"क्या देखा?'' पूछा उसने,
"कंचन को!" कहा मैंने,
"मिली?'' बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कहाँ गयी?'' पूछा उसने,
"छिपा दी गयी है!" कहा मैंने,
"किसने छिपाया?" पूछा उसने,
"कंचन ने!" कहा मैंने,
अब वो मुस्कुरा उठी!
"मिल जायेगी?" पूछा उसने,
"प्रयास करूंगा!" कहा मैंने,
"पूर्ण होगा?" पूछा उसने,
"अवश्य!" कहा मैंने,
"कंचन मना करे तो?" पूछा उसने,
"कर ही न सकेगी!" कहा मैंने,.
"इतना विश्वास?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"चूर हो जाओगे!" बोली इठलाते हुए!
"न होऊं तो कैसा प्रयास!" कहा मैंने,
"ओह! सच कहा!" बोली वो,
"दोहरापन छोड़ दो!" कहा मैंने,
"कैसे?" फुसफुसा के बोली वो!
"सामने आओ!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"डर लगता है!" बोली वो,
"वजह?" पूछा मैंने,
"जानते हुए भी, न पूछो!" बोली वो,
"हम्म! तू तो, सच में, कंचन नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उसने!
"कोई और!" कहा मैंने,
"कौन हो सकता है?" पूछा उसने,
"बताऊँ?'' बोला मैं,
"हाँ, बताओ?" बोली वो,
मैं उठा, और उसके पास आ बैठा! उसके दायें कान के पास के बालों को हाथ में लिया मैंने और खींच लिया अपनी तरफ! उसने, कोई कोशिश न की, छूटने की, बस, नीचे ही देखती रही!
"कौन हो तुम?" पूछा मैंने,
"नहीं जानती!" धीरे से बोली, सिर्फ मैं ही सुन सकूँ, ऐसे!
"जानती हो!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"झूठ?" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
मैंने और झुका दिया उसको, अपने घुटने के पास ले आया! और झुकाते हुए, अपने घुटने पर सर रख दिया उसका!
"खुल जाओ!" कहा मैंने,
"खोल दो!" बोली वो,
"मैं नहीं!" कहा मैंने,
उसके मुंह से थूक की लार, टपकी, मेरे घुटने पर, ठंडी लार! गरम नहीं! समझा दिया उसने मुझे कुछ, छिपा हुआ!
"खुलो?" बोला मैं,
"खोलो?" बोली वो,
"खुलो??" ज़ोर से बोला मैं,
"सुना नहीं?" बोली वो,
"बोलो?" बोला मैं,
"खुलवाओ?" बोली वो,
"मरना होगा!" कहा मैंने,
"मारो! हाँ, मुझे मारो! मार दो!" बोली और मेरे घुटने के नीचे ज़ोर से दबा दिया अपनी उँगलियों से!
"ज़ोर नहीं?" कहा मैंने,
"है!" बोली वो,
"दिखाओ?" कहा मैंने,
"उफ़!" निकला मुंह से उसके!
"समझी?' कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"खुलो फिर, और?" कहा मैंने,
"उफ़!" बोली वो, फिर से!
मैंने और ज़ोर से खींचा, रगड़ दिया चेहरा उसका अपनी टांग से! दांत भींच गए थे मेरे! उसने, अपना बदन खोल दिया था, धीरे से!
"अहां? और?" कहा मैंने,
"उफ़! छोड़ दो!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"छोड़ दो!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"छोड़ो?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर ऐसे नहीं?'' बोली वो,
"तो?' बोला मैं,
"ज़ोर से!" बोली वो,
"ना!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"ना!" कहा मैंने,
"हाँ, हाँ!" बोली वो,
और तब, छोड़ दिया उसे मैंने! वो, झट से पीछे गिरी, और आखें बंद कर लीं अपनी! अपने हाथों से, आँखें ढक लीं!
"सुनो?" कहा मैंने,
"हम्म?'' बोली वो,
"कंचन कहाँ है?' पूछा मैंने,
"नहीं पता!" बोली वो,
"पता है!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"झूठ?" कहा मैंने,
"किसलिए?' बोली वो,
"आँखें खोलो?" कहा मैंने,
"नहीं" बोली वो,
"खोलो?" कहा मैंने,
"नहीं" बोली वो,
''सुनो?" कहा मैंने,
"बोलो?" बोली वो,
"खोलो आँखें?'' कहा मैंने,
आँखें खोल दीं उसने! गौर से देखा मुझे!
"क्या चाहती हो?" पूछा मैंने,
"समझदार समझती हूँ आपको!" बोली वो,
अब मैं मुस्कुराया!
"मत खेलो!" कहा मैंने,
"शुरू हो चुका है!" बोली वो,
"मैं राजी नहीं!" कहा मैंने,
"मना लूंगी!" बोली वो,
"ये दम्भ या अति-आत्मविश्वास?" पूछा मैंने,
"दोनों ही नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"सुनना चाहते हो?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"लालची!" बोली वो,
''हाँ!" कहा मैंने,
"खेलोगे?'' बोली वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"डरते हो?" बोली वो,
"किस से?" पूछा मैंने,
"बहुत तर्रार हो!" बोली वो,
"हाँ, इस से भी अधिक!" कहा मैंने,
"जानती हूँ!" बोली वो,
''ठीक जानी हो!" कहा मैंने,
"मात पसंद है?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
''अब पड़ जायेगी आदत!" बोली वो,
"तैयार हूँ!" कहा मैंने,
"टूटोगे तो नहीं?' बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"आएगी ऐसी घड़ी!" बोली वो,
"जानता हूँ!" बोला मैं,
"तैयार हो?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
"मैं 'सख्त' हूँ बहुत!" बोली वो,
''हाँ, बाहर से!" कहा मैंने,
"अंदर से?" पूछा उसने,
"पिघल जाओगी!" कहा मैंने,
"यक़ीन है?" बोली वो,
"हाँ, पूरा!" कहा मैंने,
"तुम तो, पास में रखने के लायक हो!" बोली वो,
"ऐसा भूल से भी न करना!" कहा मैंने,
''सोच तो सकती हूँ?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"तुम भी सख्त हो?" बोली वो,
"बहुत ज़्यादा!" कहा मैंने,
"उलीच दूँ तो?" बोली वो,
"पूरा अवसर है!" कहा मैंने,
"सोच लो?" बोली वो,
"न सोचा होता, तो कहता ही क्यों?" कहा मैंने,
अब गौर से देखा मुझे उसने, आगे आई, और मेरे दायें कान के नीचे एक ऊँगली रखी, मेरी नस में वहां, गरमी सी फ़ैल गयी, आ गयी आवाज़ मुझे, धड़कने की, दिल की!
"आओगे?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"कब?" बोली वो,
"जब बुलाओगी!" कहा मैंने,
"अपने अप नही?" बोली वो,
"अभी तो लगता नहीं!" कहा मैंने,
"आग से जले हो?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
''अब पानी से जलना!" बोली वो,
"ओह!" कहा मैंने,
"ओंस से!" बोली वो,
"समझ गया!" कहा मैंने,
मैंने उसका हाथ हटाना चाहा, तो मेरी त्वचा को पकड़ लिया उसने! मैं रुक गया! वो भी! एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे हम, जैसे सांप और नेवला, नज़रें मिलाते हैं एक दूसरे से!
"मन है?'' पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"क्या भला?" पूछा उसने,
"जो तुमने पूछा!" कहा मैंने,
"मानोगे नहीं?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"उफ़!" कहते हुए, त्वचा छोड़ दी मेरी उसने! धधक उठी मेरी त्वचा वहां! मुझे सहलाना पड़ गया उधर!
"मुझे मारोगे?" पूछा उसने,
''आवश्यकता पड़ी, तो निःसंदेह!" कहा मैंने,
''और मैं?" पूछा उसने,
"जो चाहो!" कहा मैंने,
"मिटा दोगे?" पूछा सुने,
"ज़रूरी हुआ तो!" कहा मैंने!
"अब, कोई नहीं यहां!" बोली वो,
मैंने झाँक कर देखा, बाहर, सच में कोई नहीं था!
"कोई नहीं!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
''आओ?" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"खेलने?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"जानते हो!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
''आओ फिर!" बोली वो, और उठ खड़ी हुई!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"सुनो?'' कहा मैंने,
"हाँ?" बोली वो, अपने कपड़े ठीक करते हुए!
"तुम मुझे जानती हो न?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"जानता हूँ!" कहा मैंने,
"कहाँ ले जा रही हो?" पूछा मैंने,
"कहीं भी?" बोली वो,
"हम्म!" कहा मैंने,
"मुझे जानते हो?" पूछा उसने,
''जानने लगा हूँ!" कहा मैंने,
"जान जाओगे?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"ज़रूरी भी है!" बोली वो,
"पता है!" कहा मैंने,
"चलें?" बोली वो,
''चलो!" कहा मैंने,
हम बाहर आये, अन्धकार! एक बल्ब जला था, एक दीवार पर लटका हुआ! कीट-पतंगे, भवरें काट रहे थे उसकी! कोई नहीं था वहां! जैसे हम दोनों अकेले ही थे वहाँ! मैंने आसपास देखा भी, कोई चूल्हा-चौकी नहीं!
"आओ, इधर!" बोली वो,
जंगल सा था वहां तो! पथरीला सा स्थान! एक पतली सी पगडंडी! और बिना तारों के, बल्बों के, खम्बे लगे थे! दोनों तरफ, आंवले के पेड़ लगे थे! ऊपर काला आकाश, कोई तारा भी निकला था, जगमगा रहा था! चाँद भी न आये थे अभी! अन्धकार था! वो आगे चल रही थी, और मैं उसके पीछे, बीच बीच में रुक कर, देख लिया करती थी मुझे!
"कहा ले जा रही हो?" पूछा मैंने,
''आओ तो सही?" बोली वो,
"चल तो रहा हूँ?" कहा मैंने,
''चलते रहो बस!" बोली वो!
हम काफी दूर तक चले आये थे, न कोई आबादी ही थी, न कोई ऐसी जगह, जो कभी वाबस्ता ही रही हो इंसान से! एक जगह जाकर, रुक गयी वो! मैं आया उसके पास! साथ ही, आ खड़ा हुआ!
"मुझे उठाओ!" बोली वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"हाँ, उठाओ!" बोली वो,
"उठाऊँ? कैसे?" पूछा मैंने,
"अपनी हाथों में!" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"मैंने कहा, उठाओ?" बोली तर्राट से!
"हे?" कहा मैंने भी, झिड़कते हुए उसको!
"उठाओ?" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"उठाओ न?" बोली वो,
मैंने घूर के देखा उसे! ये क्या हुआ था उसे? अचानक से ही? उठाओ? बाजूओं में? लेकिन क्यों? काहे?
"हाँ, हाँ! यहाँ से!" बोली वो,
मैंने उसको, उसकी कमर से उठा लिया तब, उसने, जैसे मेरे बदन में जगह बना ली! अपनी दोनों बाजूओं को, मेरे गर्दन के इर्द-गिर्द लपेट लिया! मैं लेकर चला! मेरी छाती से, सर चिपका लिया उसने!
"नीचे देखो!" बोली वो,
मैंने नीचे देखा तभी!
"क्या है?" पूछा मैंने,
"रुको?" बोली वो,
मैं रुक गया!
''सुनो, ध्यान से!" बोली वो,
मैंने कान लगाये अपने! और वो, जैसे डरे! जैसे, कुछ सुन कर, कांपे! चिपकती जाए! और अंदर धंसे! लेकिन यहां तो कुछ भी न था? फिर किस से?
"चलो!" बोली वो,
मैं आगे चला फिर!
"बस!" बोली वो,
मैं रुक गया!
"उतार दो!" बोली वो,
मैंने उतार दिया उसे!
"अब चलो!" बोली वो,
''आगे चलो!" बोला मैं,
"नहीं, तुम चलो!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
मैं आगे चल पड़ा, वो इस तरह से मेरे पीछे चल रही थी, कि जब भी मैं पलट कर देखता उसे, नज़र ही न आती, रुकना पड़ता, तब दिखती!
"साथ चलो?" कहा मैंने,
"चलते रहो!" बोली वो,
"क्यों?" बोला मैं,
"ढूंढ रही हूँ!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"अवसर!" कहा उसने,
"अवसर?" मैंने चलते हुए ही पूछा, वो पीछे चलती आ रही थी!
"हाँ!" बोली वो,
"कैसा अवसर?" पूछा मैंने,
"चढ़ने का!" बोली वो,
"चढ़ने का?" पूछा मैंने,
रुका, और देखा उसे, वो उकडू बैठ गयी थी नीचे, सर उठाकर, मुझे देख रही थी! कोई और होता, तो मारे भय के पछाड़ खा जाता! मुझे उसके इरादे सही नहीं लगे, मैं पीछे हो गया, एक तरह से तैयार हो गया!
"अवसर!" बोली वो,
"किसलिए?'' पूछा मैंने,
"चढ़ने का!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"तुम्हारे कंधों पर!" बोली वो, और उठ गयी, चली मेरी तरफ, और फिर बैठ गयी! मैं, उसके एक एक हाव-भाव पर, नज़रें बनाये रखने में अपने आपको व्यस्त किये रहा!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

कुछ पल, मैं देखता रहा उसको! और वो, वो मुझे! जैसे, कोई चूहा फंस जाता है, कोई रास्ता नहीं बचता उसके पास, जब वो आभास पाता है, अपने पास ही मौजूद, सांप का, तब वो, शांत हो, अपलक, खड़ा रहता है! कुछ ऐसे ही पल थे ये भी!
"सुनो?" बोली वो,
"हम्म?" कहा मैंने,
"मुझे उठाओ?" बोली वो,
"उठ जाओ!" कहा मैंने,
"नहीं, उठाओ!" बोली वो, हाथ आगे बढ़ाते हुए!
"उठ जाओ?" कहा मैंने,
''आओ? उठाओ न?" बोली वो,
"उठ जाओ!" कहा मैंने,
"नहीं उठ सकती!" बोली वो,
"मैं उठा नहीं सकता!" कहा मैंने,
"उठा सकते हो!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"बस, थोड़ी दूर?" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"बता दूंगी!" बोली वो,
"बताओ?" कहा मैंने,
"उठाओ?" बोली वो,
मैंने कुछ सोचा, ज़रा सा, त्वरित निर्णय लिया, और चल पड़ा उसके करीब! वो मुस्कुरा पड़ी!
"पकड़ो?" बोली हाथ आगे बढ़ाते हुए,
मैंने हाथ पकड़ लिया उसका!
"खींचो?" बोली वो,
खींचा उसका हाथ, और हो गयी खड़ी वो!
"अब, उठाओ?" बोली वो,
"तुम मुझे, विक्षिप्त तो नहीं लगतीं?" कहा मैंने,
"नहीं हूँ!" बोली वो,
"फिर...उठाओ...क्यों?" बोला मैं,
"उठाओ पहले?" बोली वो,
मैंने जैसे ही उसकी कमर में हाथ डाला, वो लपकी! और इस तरह से आ चढ़ी मेरे ऊपर, कि उसने अपनी टांगें मेरी कमर के पार निकाल, बाँध लीं एक दूसरे से! हाथों से सीना पकड़ लिया पूरा! और चेहरा, ठीक मेरे सामने!
"क्या चाहती हो?" पूछा मैंने,
"मुझे मार डालो!" बोली वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"भींच कर!" कहा उसने,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"तुम मार सकते हो मुझे!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"मैं चाहती हूँ!" बोली वो,
"झूठ?" कहा मैंने,
"तो सच क्या?" पूछा उसने,
"इसे तो न छिपाओ?" कहा मैंने,
"सच?" पूछा उसने,
"हाँ!" कहा मैंने,
''सच?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
उसने तभी, मेरे होंठों पर चुंबन ले लिया, मैंने नहीं रोका उसे, मैं आगे का खेल देखना चाहता था, इसीलिए, कोई अवरोध नहीं!
"ले चलो!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"जहां चाहो!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"अपना बना लो!" बोली वो,
मैं मुस्कुराया! गौर से देखा उसको! उसे, तभी एक और चुंबन दागा मेरे होंठों पर! और हटाया चेहरा!
मेरे कान तक, लायी अपना चेहरा, और फिर.......
"बना लो!" बोली सांस की आवाज़ में!
"नहीं!" कहा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"क्यों?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"किसलिए?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"ऐसा न कहो?" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"दर्द होता है!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"मान जाओ?'' बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"नहीं चाहते?" पूछा उसने,
"नहीं!" बोला मैं,
"सच?" पूछा उसने,
मैं हंसा एक टेढ़ी सी मुस्कान!
"बोलो? सच?" बोली वो,
"नहीं!" बोला मैं,
'आह! फिर क्या मानूं?" बोली वो,
"जो चाहो?" कहा मैंने,
"मान गए?" बोली वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"मैं क्या करूँ?" पूछा उसने,
"जो चाहे करो!" बोला मैं,
"तो चलो आगे!" बोली वो,
"ऐसे ही?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
''तुम्हारी देह गरम है अब!" बोली वो,
'अच्छा?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"जाना कहाँ है?" पूछा मैंने,
''सामने!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
'चलते रहो!" कहा उसने,
''हाँ! चलने लगा हूँ अब!" कहा मैंने,
"यही आशा भी थी!" बोली वो,
"तेज हो!" कहा मैंने,
"बहुत तेज!" बोली वो,
"जान गया हूँ!" कहा मैंने,
"कट न जाओ?" बोली वो,
"इतनी भी तेज नहीं!" कहा मैंने,
और वो, लिपट, खिलखिला कर हंस दी! उस सन्नाटे में, वो हंसी, दूर तक गूँज गयी! दूर तक! और तभी...........!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"अब उतार दो!" बोली वो,
मैं रुक गया, और उतार दिया उसे!
"सच में!" बोली वो,
"क्या?" कहा मैंने,
"मुझे मजा आएगा!" बोली वो,
"कैसा मजा, भला?'' पूछा मैंने,
"मरने में!" बोली वो,
"सो तो आएगा ही!" कहा मैंने,
"मुझे मारोगे न?" बोली वो,
"ज़रूरत पड़ेगी, तो नहीं चुकूँगा!" कहा मैंने,
''आह! भर लो!" बोली वो,
मैं खड़ा रहा जस का तस! कान लगाये हुए था, उसके एक एक शब्द पर! नज़र बनाये हुआ था, उसके प्रत्येक हाव-भाव पर!
"भर लो ना?" बोली वो,
"किसलिए?'' कहा मैंने,
झट से पलटी, और दोनों हाथों से, गरदन पकड़ ली मेरी! दबाव नहीं बनाया था, इसीलिए मैंने विरोध नहीं किया!
"भर लो?" बोली वो,
"क्यों?" कहा मैंने,
"सुनो न?? भर लो!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"नहीं, मेरी जान न लो?" बोली वो,
"मरना नहीं है?'' पूछा मैंने, एक हंसी, रहस्य भरी, अपने होठों पर लाते हुए!
"मरना तो है?" बोली वो,
"तो शुरुआत हो गयी?" कहा मैंने,
हाथ, हटा लिए! थोड़ा आगे गयी! रुकी, पीछे पलटी, और दौड़ पड़ी मेरी तरफ! आ लिपटी मुझ से, तेजी से, मेरा संतुलन डगमगाया, मैंने नियंत्रित किया अपने आप को! वो कस कर, चिपक गयी! कुछ पल ऐसे ही! फिर, महसूस किये मैंने, कुछ आवृतियों वाले अजीब से कम्पन्न! उसके कंधे, जांघें, कम्पन्न से भरी थीं! अपनी चप्पलें, उतार दीं उसने, और मेरे जूतों पर एक एक पाँव रख, चढ़ गयी थी, सर मेरे कंधे से नीचे झुलका दिया था नीचे अपना!
"मुझे पकड़ो!" बोली वो,
मैंने, उस समय, कुछ विचारा नहीं, उसको, कस के पकड़ लिया, कमर से, जैसे ही पकड़ा, उसने बदन को कसमसाया और धनुष सी बन, समाने लगी मेरे बदन में!
"और!" बोली वो,
मैंने और कसा उसे!
"और, हाँ! और, तोड़ तो मुझे!" बोली वो,
मैंने और कसा, मेरी कलाइयां अब, जैसे गड़ने लगी थीं उसकी पसलियों में!
"सुनो?" बोली वो,
"हूँ?" कहा मैंने,
"मैं, खुलने लगी हूँ!" बोली वो,
"अब?" कहा मैंने,
"हम्म!" बोली वो,
और तभी, एक झटका खा, मेरी भुजाओं के ऊपर से, झूल गए नीचे, मेरे सामने, पीछे की तरफ! आँखें बंद किये हुए! बदन, ढीला हो चला था उसका, जैसे, अब जान ही न शेष हो!
फिर झटके से आँखें खोलीं अपनी! सर उठाया, और देखा मुझे, अपना ऊपर का होंठ, नीचे के होंठ से ढका, और उठी सामने मेरे!
"सच में सख्त हो तुम!" बोली वो,
कुछ अ बोला, मंतव्य जानना चाहता था, उसकी शब्दावली तो भेद दी थी मैंने, बस, कुछ छिपे से अर्थ बाहर आ जाएँ, इसीलिए नहीं बोला था मैं, बस, एकटक, देखता रहा उसको!
"सभी को यहां लाईं?' पूछा मैंने,
"कोई न आ सका!" बोली वो,
"कितने आये?" पूछा मैंने,
"कोई नहीं!" बोली वो,
"मैं पहला?" पूछा मैंने,
"आखिरी भी, शायद!" बोली वो,
''अब जाना कहाँ है?" पूछा मैंने,
''डरते हो?" बोली वो,
"किस से?" पूछा मैंने,
"मुझ से?'' बोली वो,
"तुम से?" बोला मैं,
"हाँ, मुझ से!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"मान कैसे सकती हूँ?" बोली वो,
"बताता हूँ!" कहा मैंने,
और तब नीचे उतारा उसको! उसके कंधे पर एक हाथ रखा, ज़ोर लगाया, नीचे किया, झुकाया उसको, वो झुकी, बेहद ही चौड़ी करते हुए अपनी आँखें, नथुने फूल उठे थे उसके, जबड़ा, भिंच गया था उसका!
"क्या चाहते हो?" पूछा उसने, इस बार गुस्से में!
"यही!" कहा मैंने,
"पछताओगे, देख लेना?'' बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"बता दिया है!" बोली वो,
"नहीं दिया ध्यान!" कहा मैंने,
"ये चेतावनी भी नहीं!" बोली वो,
"जानता हूँ, इसीलिए!" बोला मैं,
"तो ले चलो!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
''सामने ही!" बोली वो,
''चलो, आगे चलो!" कहा मैंने,
मैंने उसको धक्का सा दिया, हल्का सा! वो मुस्कुराई और चल दी आगे, रुकी, और मेरा हाथ माँगा उसने, मैं आया करीब, और बढ़ा दिया हाथ आगे अपना! उसने पकड़ा, और ले चली मुझे, अपने साथ!
"ओंस?" बोली वो,
"नहीं तो?" कहा मैंने,
"मुझे चाटनी है!" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"मन हुआ!" बोली वो,
"अभी नहीं पड़ी!" कहा मैंने,
"पड़ी है!" बोली वो,
"नहीं तो?" बोला मैं,
"हाँ?" बोली वो, और रुक गयी!
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"हर तरफ!" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"देख नहीं रहे?" बोली वो,
"दिख नहीं रही!" कहा मैंने,
"तो देखो?" बोली इशारा करते हुए एक तरफ! मैंने झट से उधर सर किया, अँधेरा था वहां! लेकिन कुछ आवाज़ भी आ रही थी! जैसे पानी रुका हो उधर, और कुछ जल-पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों!
"क्या है वहां?" पूछा मैंने,
"देख लो?'' बोली वो,
"बताओ?" पूछा मैंने,
"आओ?" बोली वो,
"कोई तालाब है?" पूछा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
"तो वहाँ क्यों जाना?" पूछा मैंने,
''शुरुआत!" बोली वो, एक मुस्कुराहट लाते हुए, रहस्य भरी! जो, शुरू होंठों से हुई लेकिन फैली माथे तक!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"चलो!" कहा मैंने,
"आओ!" बोली वो,
मैं चला तब उसके साथ! कोई तालाब ही था वहां, ठंडक सी उठ रही थी वहां से! वो मुझे, मेरा हाथ पकड़ कर, ले चलती जा रही थी! सामने घुप्प सा अँधेरा था, हाँ, चन्द्रमा आ चुके थे, एक वही थे, जो मुझ पर नज़र बनाये हुए थे! और कोई भी नहीं! मैं नितांत अकेला ही था! कंचन का साथ होना, न होना, अभी तक तो, कोई मायने नहीं रखता था! वो होते हुए भी नहीं थी, और न होते हुए भी, वहीँ थी!
"बस!" बोली वो,
रुक गया मैं!
''सामने?" बोली इशारे से,
अब गौर से देखा, तालाब तो था, लेकिन पानी या तो काला था, या फिर था ही नहीं! खुली सी जगह थी, दिख रहे थे तो कुछ फोके से पौधे, या सरकंडे से! मैंने पानी नहीं देखा, पानी होता, तो चन्द्रमा का अक्स तो नज़र आता उसमे!
"ये, देखा?" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"क्या दिखा?" पूछा उसने,
"जो दिखाया!" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा उसने,
"खाली है ये!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"तो क्यों लाईं?" पूछा मैंने,
"लाना था!" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"मन था!" बोली वो,
"मन से चलती हो?" पूछा मैंने,
"ये न पूछो!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"नहीं दे पाउंगी जवाब!" बोली वो,
"दे पाओगी!" कहा मैंने,
"जवाब के सिवा!" बोली वो,
"जवाब ही!" कहा मैंने,
"दूँ?" बोली वो,
''हाँ!" कहा मैंने,
"चूमो मुझे!" बोली वो,
मैं हंस पड़ा! उसको देख, हंस पड़ा! और वो भी!
"ये मन है?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"यही चाहती हो?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"चूमो किसलिए?'' कहा मैंने,
"पहले!" बोली वो,
"बताओ, पहले?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"उत्तर दो?" कहा मैंने,
''दिया तो?" पूछा उसने,
"ये मन है?" पूछा मैंने,
"हाँ! मन!" कहा उसने,
"न मन ही तुम्हारा है, और न ये तन ही!" कहा मैंने,
"क्या?'' पूछा उसने,
"सच कहा, नहीं कहा?" बोला मैं,
"नहीं!" बोली वो,
और दौड़ आई मेरे पास, चिपक गयी मुझ से!
"मुझे बचाओ!" बोली वो,
"किस से?" पूछा मैंने,
"मुझ से!" बोली वो,
अब हुआ मैं संजीदा! इतनी देर बाद, अब कुछ सच बोला था उसने! वो लिपटी हुई थी! चिपकी हुई! सच कहता हूँ.....मुझे, पहली बार तरस आया उस पर! मैंने भी, कस लिया उसे, सरंक्षण प्रतीत हो उसे, और मैं कुछ जान सकूँ फिर!
"खुद से डरती हो?" पूछा मैंने,
सर हिला कर हाँ कही!
"तुम्हारा खुद, खुद डराता है?" पूछा मैंने,
सर हिलाकर फिर से हाँ!
"डर जाती हो फिर, खुद से, खुद अपने खुद से?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"ऐसा क्यों?" पूछा मैंने,
"खुद नहीं मालूम!" बोली वो,
"जाना नहीं कभी?" पूछा मैंने,
''डर लगता है!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"नहीं जानती!" बोली वो,
"जानती हो!" कहा मैंने,
"नहीं जानती!" बोली वो,
"बताना नहीं चाहतीं!" कहा मैंने,
मेरे कंधे पर, काट लिया उसने तभी! मैंने फिर भी विरोध नहीं किया! काटा तो तेज ही था, तिलमिला सा गया था मैं, अंदर ही अंदर!
"बताओ?" कहा मैंने,
"क्या?" बोली वो,
"भूल गयीं?" पूछा मैंने,
"भुला दिया!" बोली वो,
"किसने?" पूछा मैंने,
"खुद ने!" बोली वो,
"किसका खुद?" पूछा मैंने,
''तुम्हारा!" बोली वो,
''डर गयीं?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"कहूँ अगर, कि न डरो? तो?" पूछा मैंने,
"सच?" बोली वो,
"मान लो!" कहा मैंने,
"चूमो फिर!" बोली वो,
"ये कौन है?" पूछा मैंने,
"मैं नहीं!" बोली वो,
"फिर कौन?" पूछा मैंने,
मैंने ये पूछा, और वो हटी मुझ से! गुस्से में भर आई! सर को झटके दिए दो बार उसने! आसमान को देखा! धम्म से नीचे बैठी, घुटनों के बल! मैं देखता रहा उसे! उसने आँखें बंद कीं और फिर सर घुमाया मेरी तरफ! खोल दी आँखें!
"इधर आओ?" बोली वो,
मैं चला आगे, रुक गया उसके पास!
"बैठो?" बोली वो,
"खड़ी हो जाओ?" कहा मैंने,
"खड़ा करो मुझे!" कहा उसने,
"हाथ दो!" कहा मैंने,
"पकड़ लो!" बोली वो,
''दो?" कहा मैंने,
"बैठो?" बोली वो,
"हाथ दो!" कहा मैंने,
"बैठो, मैंने कहा बैठो!" बोली वो,
"तुम कौन होती हो ऐसा कहने वाली? हाँ?" पूछा मैंने,
"बैठो?" चिल्ला के बोली वो! आवाज़ गूँज गयी उसकी उस खालीपन में!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"नहीं!" कहा मैंने,
"बैठ जाओ? हूँ? बैठ जाओ न? मान जाओ?" बोली अब वो,
ठीक कतराए हुए से स्वर में! पल में कुछ और पल में कुछ! मैंने, लिया कुछ निर्णय! और बैठ गया पास में ही, उकडू!
"ओंस में ठंडक होती है?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उसने,
"प्रदाह!" कहा मैंने,
"उफ़! कितना सटीक समझते हो तुम!" बोली वो,
"और आग में?" पूछा उसने,
"ठंडक!" कहा मैंने,
"हाँ! हाँ! ठीक समझते हो तुम!" बोली वो,
मैं मुस्कुराने लगा था! इसकी बातों की गहराई को भाँपने लगा था! ओंस की प्रदाह! और आग की ठंडक!
"मैं ओंस से जलती हूँ!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"पता नहीं!" बोली वो,
"या, जलने लगी हो?'' पूछा मैंने,
"हाँ, जलने लगी हूँ!" बोली वो,
"और आग से ठंडक लेती हूँ!" बोली वो,
"कौन सी आग?" पूछा मैंने,
"अंदर, जलती हुई!" कहा उसने,
"जो ओंस से जली?" पूछा मैंने,
"हाँ, जो झुलसी मैं, ओंस से!" बोली वो,
""ओंस? इसी से न?'' पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"कौन गया था ओंस के पास?" पूछा मैंने,
"मैं!" बोली वो,
''क्यों?" कहा मैंने,
"नहीं पता!" बोली वो,
"इसी में उत्तर है!" कहा मैंने,
"नहीं है!" बोली वो,
"जान कर तो देखो?" पूछा मैंने,
"नहीं जानना!" बोली वो,
"तब, जलती रहो!" कहा मैंने,
"कब तक?" पूछा उसने,
"जब तक आग समाप्त न हो जाए!" कहा मैंने,
"फिर?'' पूछा उसने,
"फिर राख!" कहा मैंने,
"शायद........" बोली वो,
"क्या शायद?" पूछा मैंने,
"राख होने लगी हूँ....." बोली वो,
"तो समेटो अपने आप को!" कहा मैंने,
"तुम करोगे?' बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"मुझे समेट दो?" बोली वो,
"नहीं कर सकता!" कहा मैंने,
''झूठ तो न बोलो?" बोली वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"नहीं जले न अब तक?" पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"इसीलिए!" बोली वो,
"इतना तेज न दौड़ो!" कहा मैंने,
''रुका नहीं जाता!" बोली वो,
"रुकना तो होगा!" कहा मैंने,
"पकड़ कर, रोक दो!" बोली वो,
"रुकोगी तो खुद ही!" कहा मैंने,
"नहीं, रोको मुझे?" बोली वो,
"खुद रुको?" कहा मैंने,
"कैसे?" पूछा उसने,
"खुल जाओ!" कहा मैंने,
"खोल दो!" बोली वो,
"मैं कौन?" पूछा मैंने,
"ले आये न साथ?" बोली वो,
"नहीं तो?" कहा मैंने,
"अब पीछे?" बोली वो,
"क्या कहती हो?" पूछा मैंने,
''लाये हो न?" बोली वो,
"संग तुम्हें!" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"तो संग चलो!" बोली वो,
"कब तक?" पूछा मैंने,
"जब तक मैं कहूँ?" बोली वो,
''ऐसा हो सकता है क्या?'' पूछा मैंने,
"क्यों?" पूछा उसने,
"न मैं ओंस से जलता! और न आग से ठंडक पड़ती है!" कहा मैंने,
"इसीलिए!" बोली वो,
"क्या कहना चाहती हो?" पूछा मैंने,
"मैं रिक्त हूँ!" बोली वो,
''फिर?" पूछा मैंने,
"उठाओ मुझे?'' बोली वो,
मैं खड़ा हुआ, और उसको, उठा लिया हाथ पकड़ कर! वो लड़खड़ायी हल्का सी! मैंने सहारा दिया उसे! मेरा पूरा हाथ पकड़ लिया उसने!
''आओ!" बोली वो,
"और कहाँ?" पूछा मैंने,
''आओ तो?" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
और ले चली मुझे फिर आगे!
"अच्छे हो तुम!" बोली वो,
"बहुत देर बाद कहा?" कहा मैंने,
"कहना चाहती थी!" बोली वो,
"इतनी देर से?'' पूछा मैंने,
"हूँ!" बोली वो,
"हूँ!" कहा मैंने,
"मैं?'' पूछा उसने, रुक कर!
"नहीं हो!" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा उसने, धीरे से!
"बुरी!" कहा मैंने,
"क्या मानूं?" पूछा उसने,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"मानना ही होगा!" कहा मैंने,
''और जो, न मानूं......तो?" बोली वो,
"तो तुम रहो इस बीहड़ में, मैं चला वापिस!" कहा मैंने,
"जा सकते हो?" पूछा उसने,
"क्यों नहीं?" कहा मैंने,
"नहीं जा सकते!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"मुझे जानते हो न?" पूछा उसने,
"कुछ घंटे से!" कहा मैंने,
"सो ही!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"तो?'' बोली वो,
"तो कैसे जाओगे? छोड़कर?'' पूछा उसने,
"तुम्हें नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उसने,
"समझती तो हो?'' कहा मैंने,
"कंचन को नहीं छोड़ना!" बोली वो,
"नहीं, तभी तो आया!" कहा मैंने,
"ओह.....तुम समझे हो मुझे!" बोली वो,
"कोशिश है!" कहा मैंने,
"तुम...तुम हो!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"सुनो?" बोली वो,
"हाँ??'' कहा मैंने,
"मुझे बना लो? अपना?" बोली वो!
"किसको?" पूछा मैंने,
"मुझको?'' बोली वो,
"कौन मुझको?" पूछा मैंने,
"नहीं जानते?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
''श्ह्ह्ह!" बोली अचानक से! और करीब आ गयी मेरे, मुझे नीचे झुकाया, और बिठा लिया फिर, मेरी जांघ पर, चढ़ गयी, दोनों पाँव, मेरी जाँघों के भीतर टिका लिए, आसपास देखने लगी, घूर घूर कर!
"क्या हुआ?" मैं फुसफुसाया!
"श्ह्ह्!" बोली अपनी ऊँगली मेरे होंठों पर रखते हुए!
"कौन है?" पूछा मैंने,
"श्ह्ह्ह्ह्ह!" बोली वो,
और ढक लिया मेरा मुंह, अपने हाथ से! लगा लिया सर, कंधे से मेरे! मेरा दूसरा हाथ उठाया, और रखा वक्ष पर वहां, जहाँ दिल होता है, धकड़-धकड़! तेज तेज! सामान्य से, तीन गुना ज़्यादा!
"ये क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"मैं...मर जाउंगी!" बोली वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"ऐसे ही!" बोली वो,
"इस तरह ही, मतलब?" कहा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"वो क्यों?" पूछा मैंने,
"कोई नहीं समझता!" बोली वो,
"कौन नहीं?" पूछा मैंने,
"कोई भी नहीं!" बोली वो,
"मतलब, कौन?" पूछा मैंने,
''वो सब!" बोली वो,
"बाबा, ममता?" पूछा मैंने,
"हाँ" बोली वो,
"और मैं?" पूछा मैंने,
"पूरा!" बोली वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
''अकेले!"" बोली वो,
"तुम्हारे संग?" पूछा मैंने,
"हूँ!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
''अब चलो!" बोली वो,
''और कहाँ?" पूछा मैंने,
"जहाँ कहूँ वहाँ!" बोली वो,
"अच्छा?" कहा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
"नहलाओगे मुझे?" पूछा, आँखों में आँखें डालते हुए उसने!
मैं मुस्कुरा गया! उसने कुछ सोच कर ही कहा था ये!
"नहला या स्नान?" पूछा मैंने,
"नहला!" बोली वो,
"स्नान क्यों नहीं?" पूछा मैंने,
''चाहते हो?'' बोली वो,
"सच में! सच में बहुत आगे आ पहुंची हो!" कहा मैंने,
"बोलो?" पूछा उसने,
"क्या?" पूछा मैंने,
''स्नान?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"मुझे?' पूछा उसने,
"नहीं!" कहा मैंने,
"डरते हो, या डर गए?'' पूछा उसने,
"न डरता हूँ, न ही डरा!" बोला मैं,
''आओ फिर!" बोली वो,
पड़े पलाश के पीड! पलाश का ही जंगल था वो! रुकी एक पेड़ के पास!
"इधर आओ?" बोली वो,
"हाँ?" पूछा मैंने, आ कर वहां!
"ये देखो!" कहा उसने,
मैंने गौर से देखा! उस पेड़ के तने में एक रस्सी बंधी थी! रस्सी में छल्ले बंधे थे, पीतल, लोहे के! छू के देखे थे मैंने वे!
"ये क्या है?" पूछा मैंने,
"बताऊँ?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"कापस!" बोली वो, (कापस मायने सरहद)
''अच्छा!" कहा मैंने,
"हूँ!" बोली वो,
''आओ!" बोली वो,
"हूँ! चलो!" कहा मैंने,
और मुझे हांकती हुई, चलती रही आगे!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9494
Topic starter  

"आओ!" बोली वो,
''चल रहा हूँ!" बोला मैं,
कुछ ऐसे ही चले, शांत से हम दोनों! मैं पीछे पीछे चल रहा था उसके, उसके पूर्ण पृष्ठ-भाग को देखते हुए, चाल में एकसारिता थी, कोई डांवाडोली नहीं! एक एक क़दम, सध के रखती थी वो, उसका बदन, यौवन से परिपूर्ण था, न चाहते हुए भी, मैं नज़रें चुरा, खुद से ही, उसके उस दमकते और छलकते से यौवन को निहार लिया करता था!
"अच्छा है!" बोली वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"मेरे साथ हो!" बोली वो,
"अर्थ?" पूछा मैंने,
"लौट न जाते अब तक?" बोली वो,
"ये तो सही कहा!" कहा मैंने,
"सभी पनगुनिये थे!" बोली वो,
मैं हंस पड़ा!! क्या शब्द बोला था उसने भी!
"हाँ, सभी के सभी, लौट गए!" बोले वो,
"मुझे यहां तक ले आई?" कहा मैंने,
''अभी कहाँ?" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"अभी देखो!" बोली वो,
"और क्या?" पूछा मैंने,
"जो जानने आये हो?" बोली वो,
"ये तुम्हें कैसे पता?'' पूछा मैंने,
"क्या नहीं जानती मैं?'' बोली वो,
"हैरत में हूँ!" कहा मैंने,
"छान चुकी हूँ तुम्हें!" बोली वो,
"पूरा नहीं!" कहा मैंने,
"अ...कह सकते हो!" बोली वो,
"हाँ, कह तो सकता ही हूँ!" कहा मैंने,
"यहां से!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने,
कमाल था! इतनी दूर! उस निवास-स्थल से इतनी दूर, ये कक्ष? कमाल था! मैं तो सकते में ही आ गया उसे देख कर!
"ये कक्ष है?'' पूछा मैंने,
'हाँ!" बोली वो,
"किसका?" पूछा मैंने,
"मेरा!" बोली वो,
''और वहाँ?" पूछा मैंने,
"उनका!" बोली वो,
"और तुम कौन?" पूछा मैंने,
"उनसे अलग!" कहा उसने,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"जान जाओगे!" बोली वो,
''आओ!" बोली वो, और कक्ष खोला! अंदर चली वो! पास से ही, दीया-बाती उठायी, माचिस जलायी और जला दिया दीया! उसने ये सब काम ऐसे किया, जैसे लम्बे समय से अभ्यस्त हो वो!
"बैठो!" बोली वो,
मैं बैठ गया!
"यहां लायी हूँ!" बोली वो,
"समझ गया!" बोला मैं,
"कुछ और भी?" बोली वो,
''हाँ, वो भी!" कहा मैंने,
"गलत सोचा, है न?" बोली वो,
"नहीं, सही सोचा!" कहा मैंने,
"गलत!" बोली वो,
"मान भी लो!" कहा मैंने,
"ऐसे कैसे?" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"लेट जाओ!" बोली वो,
मैं टेक लगा, लेट गया!
मेरे जूते खोल दिए उसने, मैंने मना भी किया, लेकिन नहीं मानी! और फिर, संग आ लेटी मेरे ही!
"मैं जानती हूँ!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"तुम्हारे बारे में!" बोली वो,
''अच्छी बात है!" कहा मैंने,
"मुझे जानते हो?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"कैसे जानोगे!" बोली वो,
"बताओ आप?" पूछा मैंने,
तभी बाहर से, शिशु के रोने की आवाज़ आई! मैंने टेक हटाई, बाहर लगाये कान! उठ बैठा!
"लेट जाओ!" बोली वो,
"वो आवाज़?" पूछा मैंने,
"शिशु है!" बोली वो,
"अकेला?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोली वो,
"किसका है?" पूछा मैंने,
"ममता का!" बोली वो,
"क्या????" मैं तो उठ खड़ा हुआ!
"बैठो, बैठो!" बोली वो,
"बाहर कहाँ है?" पूछा मैंने,
"ज़मीन के नीचे!" बोली वो,
"हैं???????" मेरे होश उड़े! एकाएक! सभी पागल ही बसते हैं क्या यहां? एक से बढ़कर, एक पागल?
शिशु फिर से रोया! मेरा तो कलेजा सा फटा! ऐसा रूदन जैसे दबा रहा हो उसको कोई, कोई गला दबा रहा हो उसका, या फिर, मुंह के बल, उस असहाय को, घुसेड़ रहा हो मिट्टी में! मैं झट से पलटा!
"रुको???" बोली वो,
"ना! ना!" बोली वो,
मैं सकते में!
"ना! ना!" ऊँगली हिलाकर, ना कहा उसने!
"ऐ?????????" चिल्लाई वो, ज़मीन पर हाथ मारते हुए!
और शिशु चुप!
ये हो क्या रहा था?
"आओ, बैठो!" बोली वो,
मैं न बैठ सका! पांवों में जैसे जड़ता मार गयी!
''अब नहीं रोयेगा! आओ?" बोली वो,
"ममता कहाँ है?" पूछा मैंने,
"बाहर!" बोली वो,
"बाहर?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
न समझा मैं कुछ भी!
"तुम्हारे पीछे ही तो चलती आ रही थी वो? देखा नहीं??" पूछा उसने,
मैंने झट से बाहर देखा, जैसे ही देखा!!!!


   
ReplyQuote
Page 1 / 2
Share:
error: Content is protected !!
Scroll to Top