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वर्ष २०१२ जिला गोरखपुर की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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दोपहर हो रही थी! गर्मी ऐसी की खाल उतार कर, ज़मीन पर गिरा दे! 

और ज़ख्मों को अपने भीषण ताप से, बार बार उलीच दे! उस पर फिर पसीना! तेज़ाब सा काम करता था। जब भी टपकता, खारिश हो जाती! गर्दन के पास वाली जगह की, त्वचा तो जैसे झुलस गयी थी! माथे पर जैसे गरम तवे को छुआ दिया गया हो! 

जूतों में अपने पाँव ऐसे लग रहे थे कि, जैसे खौलते हुए पानी में पाँव डुबो दिए गए हों! मैं, शर्मा जी और वो बाबा भूषण, बढ़े चले जा रहे थे आगे, उन गरम और तपते पत्थरों पर, आगे बढ़ते हुए! अब चढ़ाई आरम्भ हुई थी, 

और चढ़ाई हमारी साँसों कि भी आरम्भ हो गयी थी! नथुने फूल जाते थे! पाँव आगे नहीं बढ़ते थे। उस रास्ते के किनारे जंगली पेड़ लगे थे, लेकिन उस भयानक धूप ने, उनको भी घायल कर रखा था! छाया तो थी, लेकिन किसी भट्टी के समीप जैसी भभक समान! मेरे पास पानी की एक बोतल थी, अभी पानी था उसमे बाकी, लेकिन पानी ऐसे खौला हुआ था कि, चाय-पत्ती डालो तो चाय बन जाए! 

लेकिन हलक़ तर रखने के लिए, वो खौलता पानी, हलक में उतारना पड़ता था! बार बार! पसीना पोंछते, सर को ढकते हुए, हम आगे बढ़ रहे थे, मैंने तो एक अंगोछा बाँध लिया था सर पर, 

और फिर तौलिया रख लिया था, नहीं तो धूप ऐसी थी कि, सीधी खोपड़ी पर पड़े, तो चक्कर आ जाए! तभी सामने एक पीपल का पेड़ दिखा, यहां छाया थी, काफी छाया, अब उस छाया का मान मैं नहीं घटा सकता! यूँ कहो कि वो छाया जैसे कल्प-वृक्ष की छाया थी! किसी भले मानस ने वहाँ दो घड़े रख छोड़े थे, एक प्लास्टिक का मग भी था, मैं भाग पड़ा उधर! हम सभी के क़दम तेज हो चले! वहाँ पहुंचे, मैंने अंगोछा और तौलिया हटाया, घड़े का ढक्कन हटाया, 

और मग से पानी निकाला, और पानी उतारा हलक में! स्वर्ग का सोम सा स्वाद आया उसमे! घड़े की मिट्टी की सौंधी सौंधी महक थी उस पानी में। मैंने पेट भर के पिया! फिर शर्मा जी ने, और फिर बाबा भूषण ने! मैं वहीं एक पत्थर पर बैठ गया, शर्मा जी भी आ गए, फिर बाबा भूषण भी! हम तीनों बैठ गए वहीं! 

छाया में नशा घुला था! आँखें भारी होने लगी हमारी! "अरे, बाबा जी? और कितनी दूर जाना है?" पूछा शर्मा जी ने, बाबा ने अपना अंगोछा खोला, मुंह साफ़ किया, तम्बाकू निकाला अंटी से, हथेली पर रखा, चूने की स्टील वाली डिब्बी निकाली, 

अंगूठे के नाखून से, चूना खरोंचा, 

और हथेली में रख लिया, तम्बाकू के ऊपर, 

और रगड़म-पट्टी हो गयी शुरू! "अब ज़्यादा न है, आधा किलोमीटर हो होगा" बाबा बोले, 

आधा किलोमीटर। यहां सूरज देवता आकाश से निकल कर, ज़मीन से बस थोड़ा ही ऊपर रह कर झाँक रहे थे, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और ये आधा किलोमीटर! साँसें उखड़ सी गयीं उसी क्षण! मैं और शर्मा जी एक दूसरे को ताड़ने लगे! एक तो चढ़ाई, ऊपर से ये आधा किलोमीटर की घिसाई, पाँव गालियां देने लगे ये सुनते ही! अब बाबा ने वो तम्बाकू, लगा लिया निचले होंठ के तले! 

और बचा खुचा हाथ से झाड़ दिया! और जीभ से, मुंह में फ़ालतू घुसे तम्बाकू के टुकड़े, बाहर फेंक दिए। थू थू करके! 

और फिर से अंगोछा बाँध लिया! शर्मा जी उठे, 

और पानी ले आये, मुझे दिया, मैंने कुछ पिया और कुछ से, 

हाथ-मुंह धो लिए! पानी, ठंडा, जब त्वचा को लगा तो, त्वचा में भी जान आ गयी! नहीं तो त्वचा तो बस ऐसे लाल थी, कि आज चले कि कल चले। बस! हम कोई आधा घंटा बैठे वहाँ, 

और फिर से चल पड़े, छाया से उठे तो जैसे, सूरज देवता ने फिर से चाबुक उठा लिया, 

और फटकारा उसे! फिर से हमारी 'महान-यात्रा आरम्भ हुई। 

वो पत्थर बहुत आवाजें करते थे, खटर-खटर! खटर-खटर! हम बस, दम साधे, 

आगे बढ़ते रहे! हमे दरअसल बाबा बशुंग नाथ के पास जाना था, उनका आदेश हुआ था कि, मैं एक बार उनसे मिलने आऊँ, कोई काम था उनको अत्यंत ही आवश्यक, अब जहां ये बड़े बाबा रहते थे, उनका पता नहीं था मेरे पास, हाल में ही अपना डेरा छोड़ यहां आये हुए थे, बाबा भूषण उनके ही साथी थे, सो, उनको ही साथ ले आया था मैं अपने, खैर साहब! हम पहुँच गए! 

लेकिन कंकाल हिल गया हमारा! जोड़ जोड़ दुहाई देने लगा! खाल ऐसे झुलस रही थी जैसे, जलती हुई कोई लकड़ी रख दी हो उस पर, जैसे किसी बरे या ततय्ये ने काट लिया हो! बहुत बुरा हाल था! अब हमारे सामने, एक स्थान था, 

यहाँ पेड़ लगे थे, शीशम और बरगद आदि के, कुल मिलाकर, जगह बहुत बढ़िया थी! हम उस लकड़ी के फाटक से अंदर गए, 

कोई नज़र नहीं आया, हाँ, छाँव में, कुछ बकरियां और गाय बंधी थीं, चारा खा कर अब जुगाली कर रही थीं, बकरियों ने जब हम, शहरी जानवरों को देखा, तो खड़ी हो गयीं! आपस में ही बतियाने लगी! गाय भी खड़ी हो गयीं! हमे देखने लगी! ये कौन हैं? कैसे अजीब से वस्त्र पहने हैं? वगैरह वगैरह! बाबा भूषण आगे बढ़ चले, हम भी उनके पीछे पीछे चल दिए, तभी कुछ औरतें दिखीं. कुछ सहायक भी, कुछ दो तीन आ गए बाबा भूषण के पास, उनके पाँव पड़े, 

और हमसे नमस्ते की! और वे भी हमारे संग चल पड़े। एक जगह बिठाया हमे, चारपाई पर, हम बैठ गए, पानी आया और हमने पानी पिया, फिर हाथ-मुंह धो लिए! 

बाबा भूषण उठ गए और चले गए एक तरफ! मैंने अंगोछा हटाया, 

और मुंह पौंछा, शर्मा जी ने अपनी टोपी उतार ली, 

और रख दी वहीं! मैं लेट गया, कमर सीधी करने के लिए, 

शर्मा जी भी, झट से लेट गए! हम जहां ठहरे थे, वो एक झोपड़ी थी, 

गाँव जैसी, ठेठ! लेकिन ठंडक थी उस में! हम लेट गए थे, गर्मी ने हमारा सारा जीव-द्रव्य सुखा डाला था, जैसे प्राण सौख लिए हो! कमर को टेक मिली, तो रीढ़ की हड्डी सीधी हुई कुछ आराम


   
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श्रीशः उपदंडक
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मिला, तो शरीर भी हरकत में आ गया! जूते खुलते ही पाँव जैसे कैद से आजाद हो गए! बहुत बहुत पुचकारा उन्होंने! धन्यवाद किया हमारा! नहीं तो आज छाले शोभा बढ़ा रहे होते उनकी! कोई बीस मिनट गुजरे होंगे कि, बाबा भूषण आये, हम खड़े हुए, बैठ गए, आलती-पालती मार, बाबा भूषण आ बैठे, अपना अंगोछा उतारा, 

और चारपाई पर, अपने पाँव मोड़, बैठ गए, "बड़े बाबा अभी हैं नहीं, गए हुए हैं पास तलक, आ जाएंगे कोई घंटे भर में" वे बोले, "कोई बात नहीं" मैंने कहा, तभी एक सहायक आ गया वहाँ, हाथ में डलिया लाया था पकड़े हुए, इलिया चारपाई पर रखी, इसमें जामुन थीं! बड़ी बड़ी जामुन! काला नमक छिड़क कर लाया था! मुंह में पानी आ गया जामुन देख कर! मैंने एक बड़ा सा जामुन उठाया, 

और सीधा मुंह में भर लिया! स्वाद आया जामुन का! 

और क्या मीठा था वो! बाकी काम मेरी जीभ और दांत कर रहे थे! मैं तो बस आनंद ले रहा था उन जामुनों का! "यहीं के हैं ये?" मैंने जामुन मुंह में भरे हुए ही पूछा, "हाँ जी, दो पेड़ हैं यहां, खूब जामुन आते हैं!" वो बोला, मैंने एक जामुन और उठाया, 

और सीधा मुंह में धकेल दिया! एक एक जामुन मीठा था! बाकी काले नमक ने तो और स्वाद बढ़ा दिया था उसका! मैं, शर्मा जी और बाबा भूषण,सभी जामुन खाते रहे! 

और डलिया कर डाली साफ़! जामुन खत्म हो गए थे, लेकिन अभी नियत नहीं भरी थी! लेकिन मांगे नहीं और, गर्मी अधिक खाने से, पेट कुछ ज़्यादा ही 'साफ़' हो जाया करता है! इसीलिए नहीं मांगे! 

वो चला गया इलिया लेकर, एक किलो के आसपास रहे होंगे वो जामुन, हम सभी की जीभे नीली हो चली थीं! स्वाद अभी तक बरकरार था, हलक तक! कोई दस मिनट बीते होंगे, कि वही सहायक फिर से आया, अबकी बार डलिया में अमरुद लाया था। कटे हुए अमरुद, काला नमक लगाए हुए! अमरुद भी ताज़ा थे, खुश्बू आ रही थी उनमे से! मैंने झट से एक बड़ा सा अमरुद उठा लिया, और खाने लगा, अब ताज़ा फल की तो बात ही अलग है! अमरुद ऐसा लग रहा था जैसे अंगूरी-पेठा! "ये भी यहीं के हैं?" मैंने पूछा, "हाँ जी" वो बोला, "वाह! सही काट रहे हो गर्मी भाई आप तो!" मैंने कहा, हंस पड़ावो! हमने अमरुद खा लिए, और उसके बाद हाथ-मुंह भी धो लिए! फिर चारपाई पर आराम से लेट गए! पाँव-पसार कर! 

आँख लग गयी मेरी तो! उस झोंपड़ी की जो दीवार थी, वो फूस से बनायी गयी थी, उस दीवार की झिरी में से जब भी लू अंदर आती थी, तो जहाँ पड़ती, वहाँ सुई सी चुभ जाती! मेरी आँख तब खुली जब बाबा भूषण ने जगाया, मेरे चेहरे पर, चारपाई की रस्सियों के निशान उभर आये थे, मैं उठा, शर्मा जी भी उठ गए थे, बाबा भूषण ने बताया कि बड़े बाबा आ गए हैं, 

और हम, अब मिल सकते हैं उनसे, मैंने जूते पहने, अंगोछा लिया, 

और चल पड़ा बाबा भूषण के साथ, बाबा भूषण ले गए हमे बाबा के पास, बाबा जहां रह रहे थे, ये भी एक काम चलाऊ सा ही कमरा था, ऊपर टीन पड़ी थी, भभका था वहाँ गर्मी का,


   
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श्रीशः उपदंडक
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लेकिन टीन पर पेड़ों की छाया पड़ रही थी, इसी वजह से बाहर से कम तापमान था वहाँ, मैंने बाबा के चरण छुए, शर्मा जी ने भी, 

और फिर बाबा ने बिठा लिया हमे अपने साथ ही, कुशल-क्षेम पूछी, हाल-चाल पूछे, 

और फिर पानी मंगवाया, हमने पानी पिया, बड़े बाबा की उम कोई पचहत्तर साल रही होगी, लेकिन देह में अभी जान थी उनके, चेहरे से पता लगता था कि जिंदगी के कितने रंग देखे थे उन्होंने! और इधर-उधर की बातें हुई, श्री श्री श्री के विषय में भी पूछा, 

और फिर असली और मुख्य विषय पर आ गए, बाबा के अनुसार, यहां से कोई साठ किलोमीटर पूर्व में, एक स्थान था, जहां एक उनके परिचित बाबा नहल नाथ रहते थे, 

नहल नाथ अविवाहित थे, लेकिन अपने संग अपने एक भतीजे को रखते थे, उसको अपने पुत्र समान ही प्रेम करते थे, उनके भतीजे का नाम भूप सिंह था, इसी भूप सिंह को एक पराक्ष-कन्या ने, अपने सम्मोहन में कैद कर लिया था, पराक्ष कन्या भी एक सर्प-कन्या ही हुआ करती है, लेकिन ये पराक्षगण पाताल में रहा करते हैं, अर्थात इस भूमि के नीचे, ये कन्याएं अत्यंत ही कामुक, श्वेत रंग की, नीले-हरे नेत्रों वाली, 

और यक्षिणी सादृश्य हुआ करती हैं, अब भूप सिंह को वो पराक्ष-कन्या कहाँ मिली, कैसे मिली, कब मिली, कुछ पता नहीं था, वो अपने आपे में नहीं था, अपनी मर्जी से,जब मर्जी, जंगल में चला जाया करता था, न समझ आने वाली भाषा बोला करता था, कभी भोजन नहीं किया करता था, नहुल नाथ ने बहुत प्रयास किया कि, ये भूप सिंह ठीक हो जाए, लेकिन सभी विदयाएँ शिथिल पड़ जाया करती थीं, ऐसा होता है, पाताल-वासिनी पराक्ष-कन्या के समक्ष, कोई विद्या नहीं ठहर पाती, ये सत्य है! आपने कभी ध्यान नहीं दिया होगा, बताता हूँ कि क्या, कभी श्री महा-औघड़नाथ को देखिये, उनके गले में पड़ा सर्प देखिये, आपको उस सर्प के गले पर, 

गौ-पद चिन्ह दिखाई देगा, गाय के खुर का निशान, वो पद्म-नाग में भी होगा, ज़रा से बदला हुआ बस, अब श्री तारा जी को देखिये, वे भी सो से ढकी हुई रहती हैं, उनके आभूषण भी सर्प ही हैं, वर्ण भी नीला है, और श्री महा-औघड़नाथ के समान ही हैं, अब श्री तारा जी के ये जो सर्प हैं, ये पराक्ष-सर्प हैं, इनके गले पर निशान नहीं होंगे, बल्कि एक चमकदार सा मोती जैसा उभार होगा! यही पहचान है, एक नाग और एक पराक्ष में। जब मांस रूप में पराक्ष होते हैं तो, इनके माथे पर, यही मोती सा उभार, मणि समान चमकता है! इनका रूप यक्षिणी और यक्षों के समान हुआ करता है! 

आज भी. कई स्थानों में ऊंचे पहाड़ों में, भूमि में गुफाएं हैं, जो भूमि में उतर रही हैं, यही इन पराक्ष के आने जाने का मार्ग हुआ करते हैं! बाबा ने बता तो दिया, लेकिन मैं उलझ गया, मैंने कभी किसी पराक्ष को नहीं देखा था, सुना तो था, लेकिन देखा कभी नहीं था! ये मेरा पहला अवसर था! अब मेरा जो काम था, वो, समझा दिया गया था मुझे, मुझे उस भूप सिंह को देखना था, जांच करनी थी कि क्या है उसके साथ, बस, यही कम था, किसी और पचड़े में नहीं पड़ना


   
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श्रीशः उपदंडक
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था, तभी बड़े बाबा ने लस्सी मंगवा ली, लस्सी क्या जी, यूँ कहो कि कटोरों में दही डाली थी, और उसी में बूरा डाल दी गयी थी! 

कटोरा मुंह से लगाया और खाने लगे हम वो लस्सी', लस्सी खाने लगे,अब आप अंदाजा लगाओ कि कैसी दही थी वो, बार बार कटोरा हिलाना पड़ता था, ताकि दही अंदर मुंह में जाए, 

और जो बची कटोरे में, वो ऊँगली से रगड़ रगड़ के साफ़ कर दी! बहुत आनंद आया! मजा ही आ गया! उस समय तक, चार बज चुके थे, सूरज महाराज का चाबुक अभी तक लहरा रहा था! धूप में आओ,और चाबुक खाओ! अभी वापिस जाना सम्भव था नहीं, तो यही निर्णय हुआ कि हम कल सुबह ही यहाँ से., वापिस जाएंगे और सीधा गोरखपुर के पास वाले, डेरे में जाएंगे, वहाँ से सामान उठाएंगे और फिर, बाबा नहुल नाथ के डेरे के लिए कुछ करेंगे, दिन छिपा जी कोई साढ़े साथ बजे, 

लेकिन अभी तक सूरज महाराज की लालिमा, अपनी प्रचंड ज्वाला लिया आकाश में उपस्थित थी! भूमि जो आज बहुत प्रताड़ित हुई थी, अब कराह रही थी, 

और उसकी ये कराह हमे फूंके दे रही थी! भूमि का ऐसा कोई कोना नही था जहां ये, प्रचंड गर्मी दस्तक न दे रही हो! परिंदे तो परिंदे, जानवर ही हताहत थे उस गर्मी से! हम बाबा के पास से उठ लिए थे, 

एक खाली जगह पर, एक बरगद के पेड़ के नीचे, हमारी चारपाइयां लगवा दी गयी थीं! बाबा भूषण ने स्नान करने की पूछी, अब इस से बढ़िया क्या हो सकता था! हमने स्नान किया और मन प्रफुल्लित हो उठा! हालांकि पानी अधिक ठंडा नहीं था, फिर भी, 

देह को असीम शान्ति प्राप्त हुई थी! स्नान हुआ और फिर आराम! 

अब हुई शाम! अब हुई शाम तो लगी हड़क! अब हुड़क कैसे शांत हो! मैंने बाबा भूषण को टटोला, उन्होंने सहायक को बुलाया, सहायक से बात की, सहायक हंसा और चला गया वहाँ से! शायद बात बन गयी थी! जुगाड़ हो गया था कड़वे अमृत का! कोई पंद्रह मिनट के बाद, वो सहायक आया, क छोटा सा घड़ा लाया था, इसमें पानी था, बगल में एक बोतल थी, 

और दूसरी बगल में दूसरी! घड़ा पकड़ा उस से, बोतलें ली, मैंने देखा उन बोतलों को, 

कोई लेबल नहीं था उन पर, देसी भी नहीं थी, मैंने ढक्कन खोला और सूंघा, 

ये तो कच्चा माल था! घर की तोड़ी हुई शराब! अब नाक में खुश्बू गयी तो पेट में मची हलचल! सहायक फिर से वापिस हआ, 

और अबकी बार तीन गिलास और और इलिया ले आया, इलिया में अमरुद कटे थे, प्याज और खीरे, पत्ता-गोभी, टमाटर, 

और चुकंदर कटे थे! बढ़िया सलाद का जुगाड़ किया था उस सहायक ने! ऊपर से काला नमक और भुना हुआ जीरा भी छिड़का था! मैंने गिलास में शराब डाली, 

झरझरा के, इठलाते हुए गिलास के तले में, अपना हुस्न बिखेरते हुए भरती चली गयी! 

अब स्थान-भोग दिया, फिर गुरु भोग, फिर प्रेत-भोग, 


   
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और अंत में लौहदंडधारी को नमन किया! और गिलास उठा कर, मुंह से लगाया, और सीधे हलक में उतार दी! गले को चीरते हुए नीचे चली वो! जैसे समीप से कोई तेजी से आ रही रेलगाड़ी गुजर जाया करती है, हॉर्न बजाते हुए, ऐसी ही वो शराब नीचे चली! एक बार को तो छाती भी सहलानी पड़ गयी मुझे! सलाद न होती साथ में तो समझो जो कल रात को और, आज सुबह खाया था वो बाहर आ जाता! सलाद के सहारे खेंचम-खेंच होती रही। एक बोतल ख़त्म हुई, लेकिन टक्कर न लगी! टक्कर यानि नशा नहीं हुआ था अभी! दूसरी भी खोल ली, 

और हुए शुरू वो सहायक और सामान ले आया, अबकी बार सलाद तो लाया ही, खरबूजा भी काट लाया था! वो भी लील गए हम! 

और फिर टक्कर सी लगी! अब आया आनंद सा कुछ! बत्ती थी नहीं वहाँ, तो उस सहायक ने, एक हण्डा जला दिया वहाँ, हण्डा जला तो कीट-पतंगों की महफ़िल आ सजी! मैंने ज़रा दूर रखवा दिया उसको! 

रौशनी पर्याप्त थी फिर भी! तभी उस सहायक को आवाज़ दी किसी औरत ने, उसने भी आवाज़ दी, उठा और चला गया, जब आया तो भोजन लाया था, एक कड़ाही में भोजन था, साथ में रोटियां, 

कटोरों में भोजन परोसा, भोजन देखा तो समझ आ गया कि, कोई मुर्गा कल बांग नहीं देगा! खैर, भोजन आरम्भ किया हमने, चूल्हे की रोटियां थीं, बड़ी बड़ी और मुलायम, अब चूल्हे की रोटियों का क्या मुकाबला! हम तो जीमते चले गए एक एक करके! हमारी 'खुराक' ख़त्म हो गयी थी, 

सहायक समझ गया था! समझदार था वो! उठा, गया, और फिर एक और बोतल ले आया, अब वो भी खल गयी! दबा कर पी जी हमने! हम तीनों ने 

खूब खाया हमने! ऐसा खाया कि कोई श्वान होता तो, पूरी रात गालियां देता, क्योंकि कुछ बचा ही नहीं था उसके खाने के लिए! उस से बड़े श्वान जो आ गए थे आज वहाँ! हमने खाना खा लिया, पूरी तीन बोतलें साफ़ कर दी, 

और अब बस एक ही काम था, हाथ-मुंह धोओ, और सो जाओ! अब सुबह की सुबह देखि जायेगी! 

और यही किया हमने! सहायक ने खेस बिछा दिया, 

और हमने अपनी कमीज उतार कर, सिरहाने रखी, पैंट भी, अंगोछे बांधे, 

और लेट गए! हण्डा वापिस भिजवा दिया था! 

आँखें की बंद, और हम इस तरह एक एक करके सोते चले गए! सुबह हुई! मुर्गों ने बांग दी, शर्मा जी को उठाया मैंने, बाबा भूषण तो जाग ही गए थे, हम भी उठे, मैंने पास में ही लगे एक पेड़ की, दातुन तोड़ ली, और दातुन करने लगा, शर्मा जी ने भी दातुन तोड़ ली, 

और वे भी करने लगे, उसके बाद हम फारिग हुए, जंगल फिरने गए, स्नान किया, 

और फिर चाय आ गयी! चाय पी, साथ में, परांठा भी खाया, लाल-मिर्च की चटनी के साथ! उसके बाद फिर बड़े बाबा के पास गए, उनको आश्वासन दिया, और उनसे विदा ली तब! अब


   
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हम निकल पड़े थे, सुबह थी, धूप में अभी जान नहीं थी, हाँ, वैसे भभका अभी भी था, लेकिन अब नीचे ही उतरना था, चढ़ाई तो करनी नहीं थी, आराम से चलते हुए हम वहाँ से चल पड़े थे, कोई घंटे के बाद सड़क तक आये, एक टेम्पो पकड़ा, 

और चल दिए बस अड्डे की तरफ, ऐसे ही आये थे हम तीनों, बस अड्डे पहुंचे, अड्डा क्या था, एक मोड़ था बस, यहीं से बस मिल जाती थी, 

बस मिली, हम बैठे, 

और चल दिए अपने ठिकाने की तरफ, किसी तरह से उस जानलेवा यात्रा से बचे, 

और उतर गए बस से, यहाँ से पैदल चले, अपने डेरे के लिए, वहाँ आये, अब तक दिन चढ़ चुका था और धूप में अब जान थी! हम आ गए अपने डेरे, आराम किया तब हमने, बस में धक्कों ने तो, सारा खाना हज़म कर दिया था! आराम किया हमने और फिर उसके बाद भोजन किया, बाहर लू चल रही थीं, लू के चपेट में आते ही सबकुछ खुल जाना था! इसीलिए हमने यही निर्णय लिया कि, हम उस दिन न चल कर, 

अगले दिन ही चलेंगे, सुबह तड़के ही निकल लेंगे, मैं जिस डेरे में था, उस डेरे में एक शालन जोगन थी, उम होगी कोई चालीस बरस, लेकिन अपने क्षेत्र में माहिर थी। बस एक ऐब था उसमे, आज भी है वो चौबीसों घंटे नशे में ही रहती है, अब नशा चाहे कोई भी हो, चाहे भांग, चाहे अफीम, चाहे गांजा, चाहे चरस और चाहे शराब! बस, यही एक ऐब है उसमे जिस से मैं दूर रहता था उस से, एक बार शुरू हुई नहीं कि, अपनी सारी कहानी खतम करती थी, दूसरे की नहीं सुनती थी कतई भी! उसके पास बैठने का मतलब था कि अब खुद भी नशा कर लो और चुपचाप, इसकी कथा सुनते रहो! वही आई थी मेरे कमरे में, बैठी, 

आसपास देखा, आज भांग का अंटा चढ़ा लिया था उसने सुबह सुबह ही, आँखें लाल हो रखी थीं बिलकुल! भांग से गला खुश्क रहता है इसीलिए पानी अधिक पीना पड़ता है, उसने मेरी बोतल ही साफ़ कर दी पूरी! "पानी पी लिया?" मैंने पूछा, "हाँ, अब जाऊं क्या?" वो बोली, "नहीं, बैठ जा" मैंने कहा, वो बैठ गयी तभी के तभी! "खाना खा लिया तूने?" मैंने पूछा, "हाँ" वो बोली, "अच्छा" मैंने कहा, "और तुमने?" उसने पूछा, "हाँ" मैंने कहा, "बढ़िया किया" वो बोली, 

और लेट गयी, मैं बाहर निकल आया, अब वो यहीं सो जाए, कुछ नहीं पता था उसका, इसीलिए मैं बाहर आ गया था, बाहर आया तो बाबा भूषण के पास गया, वे आराम कर रहे थे, वहीं बैठा गया मैं, शर्मा जी बाहर ही थे अभी, बाबा से काफी बातें हुईं मेरी बाबा नहुल नाथ के बारे में, बाबा नल नाथ पहुंचे हए बाबा थे, अब एकांत में जीवन काट रहे थे, भूप सिंह के दुःख को लेकर, बहुत परेशान थे वे बेचारे, जो कुछ कर सकते थे, सब कर लिया था, लेकिन समस्या की जड़ हाथ में नहीं आई थी, 

और यही सबसे बड़ी व्यथा थी! मुझे यही जानने के लिए भेजा जा रहा था कि, मैं एक बार देख लूँ भूप सिंह को, 

कोई सूत्र ही हाथ आ जाए, बस, यही था मेरा काम! करीब एक घंटा मैं उनके साथ बैठा, 


   
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और फिर वापिस हुआ, अपने कमरे में पहुंचा, शालन अभी तक सोयी थी, अब जगा दिया मैंने उसे, वो जागी, नशे में थी, लड़खड़ा गयी, लेकिन मैंने वापिस भेज दिया उसको, टेढ़ा सा मुंह बना कर, वो चली गयी वहाँ से, अब शर्मा जी भी आ गए वहां, अब तलक शाम घिर आई थी, 

और अब हुड़क का इंतज़ाम करना था। मैंने एक सहायक को बुलाया, छिंदा नाम है उसका, एक आँख है उसकी, यहां इस डेरे पर सहायक है, बेचारे का कोई नहीं, बस उसको यहां पर ही आसरा मिला है, सभी प्रेम भाव से बात करते हैं उस से, मैंने छिंदा को सामान लाने को कहा, वो मुस्कुराता हुआ चला गया, 

और मैंने अपने बैग से अपना दिल्ली का अंग्रेजी सामान निकाला, और बैठ गया अपने पलंग पर! छिंदा आ गया तभी, संग अपने एक सहायिका को लाया था, नाम है उस सहायिका का लज्जा, लज्जा जब छोटी थी तब यहां आयी थी अपनी माँ के साथ, अब यहीं रहती है, इसका ब्याह भी कराना है दो एक साल में, अभी तो पढ़ रही है, मैंने उस से कुछ पूछा पढ़ाई के बारे में, उसने बता दिया जितना वो जानती थी, सामान रखा उन्होंने, सलाद थी, भुनी हुई कलेजी थी, और फिर बहुत कुछ था, सब चबाने का ही माल था! 

अब हुए हम शुरू, छिंदा के लिए भी, गिलास बनाया मैंने, बाबा भूषण भी आने ही वाले थे, 

थोड़ी देर में वो भी आ गये, हमने अब शुरू किया अपना कार्यक्रम! छिंदा से हंसी-मजाक चलता रहा काफी देर तक, लज्जा को पहले ही भेज दिया था मैंने वापिस, तभी बड़े बाबा का फ़ोन आया, बाबा भूषण ने बात की, पता चला कि भूप सिंह के शरीर में दर्द है बहुत, 

और जगह जगह गांठे बन आई हैं, मेरा माथा ठनका! समझ गया मैं कि इस भूप सिंह ने उस पराक्ष-कन्या से सम्भोग कर लिया है, ये इसी का परिणाम है। यही होता है जब कीस पराक्ष-कन्या से सम्भोग किया जाता है तो, अब मामला गंभीर था, भूप सिंह को दर्द तो होगा ही, क्योंकि, जब तक वो पराक्ष-कन्या के समक्ष होगा, ये दर्द नहीं होगा, जब नहीं होगा, तो अवश्य ही दर्द होगा! एक विशेष बात और है. पराक्ष-कन्या से सम्भोग के पश्चात व्यक्ति को नौ जन्मों तक नपुंसक रहना पड़ता है, चाहे कोई भी योनि हो! सुबह हुई और हम जागे सभी! नहाये-धोये, चाय-नाश्ता किया! अपना अपना सामान उठाया और तैयार हुए, सुबह ही निकल जाना बेहतर था, नहीं तो धूप अता-पता पूछती, 

और इस चक्कर में चक्कर आ जाते! इसीलिए सुबह सुबह ही जाना बेहतर था! जहां हमने जाना था वो जगह यहां से, कोई एक सौ दस किलोमीटर थी, रेलगाड़ी से सीधा जा नहीं सकते थे, 

बस में ही जाना था, 

और उस खाल-उतार गर्मी में बस में सफर करना, अपने आप में ही एक जौहर है! हम निकल पड़े वहाँ से, पानी भर लिया था, पानी का ही सहारा था, हलक़ को तर रखना ज़रूरी था बहत, नहीं तो जीभ भी नहीं मुड़ती! हम आये बाहर, सवारी ली, और सीधा बस अड्डे पहुंचे, यहां से एक बस मिल गयी, अब जो सीट मिली हमें, उसमे मेरी टांगें ही नहीं आ रही थीं, मुड़ कर ही बैठना पड़ रहा था, एक सौ दस किलोमीटर की वो यात्रा, मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं थी! बस भट्टी बनी हुई थी! लोग जैसे तैसे अपने स्मालों और गमछों से ही, हवा कर रहे थे,


   
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श्रीशः उपदंडक
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पसीना ऐसे बह रहा था कि, जैसे अभी नहा के आये हों! बस चली और हवा आई! पसीनों से वो लूटकराई तो ठंडी लगी! 

और बाद में वो लू ऐसी लगी जैसे कि कोई नश्तर! मैंने अंगोछे से अपना चेहरा और सर बाँध लिया था, फिर भी लू भेदे जा रही थी उसको! 

जैसे तैसे आड़ा-तिरछा हो कर, हमने वो यात्रा पूर्ण की। उत्तर गए हम वहाँ और फिर चले कुछ कदम आगे, वहाँ पेड़ लगा था एक बड़ा सा, पिलखन का था, छाया बहूत सघन थी, और भी कई लोग खड़े थे वहाँ, पान-बीड़ी का एक खोमचा भी पड़ा था वहाँ, हमने ठंडा पानी लिया उस से, उसने अपनी बर्फ की पेटी में से तीन बोतल निकाली, हमने पानी पिया और फिर कुछ देर आराम किया, 

ठीक सामने, बायीं तरफ एक मंदिर था, सुनसान पड़ा था अभी तो, उस मंदिर में लगे पेड़ों की छाया में कुछ, श्वान लेटे हुए थे, अच्छी जगह मिली थी उन्हें! अब हम चले वहाँ से, बाबा भूषण ने बताया कि, कोई सवा किलोमीटर चलना पड़ेगा, ऐसी धूप में सवा मीटर में ही जान सूख जाती थी, 

और ये सवा किलोमीटर! मैंने ये सुनते ही अपनी बोतल से पानी के तीन बड़े बड़े घूट मारे! 

और हम चल दिए फिर आगे, ये रास्ता था तो बढ़िया, लेकिन कोई पेड़ आदि नहीं था उसमे, धूप सीधी पड़ ही थी! बदन को झुलसा देने वाली धूप! प्रचंड गर्मी! 

खैर, अब जाना तो था ही, चल पड़े, बातें करते करते, आखिर हम पहुँच ही गए वहां, वहाँ भी एक मंदिर बना था, ज़्यादा बड़ा तो नहीं था, लेकिन दूर से साफ़ दीख पड़ता था, सफ़ेद रंग पर काले रंग के लहरदार सांप बने थे! शिखर पर एक त्रिशूल लगा था! यही था बाबा नहुल नाथ का स्थान! दरवाज़ा खुला था, हम अंदर चले गए, अंदर काफी रौनक थी, औरतें साफ़-सफाई में लगी थीं, बालक-बालिकाएं खेल रहे थे, सहायक भी अपने अपने काम में लगे थे, मवेशियों को चारा डाला जा रहा था, बकरी आदि सभी बंधे थे वहाँ, हम आगे चले, एक सहायक से बात की बाबा भूषण ने, 

उसने लकड़ियाँ नीचे रखीं, चेहरा पोंछा और हमे साथ ले गया, एक कमरा आया, कमरा काफी बड़ा था, हमने जूते उतारे और अंदर चले उसके साथ, बाबा नल नाथ लेटे हुए थे, हमें देखा तो उठ खड़े हए, हमने प्रणाम किया उन्हें और चरण स्पर्श किये, 

उन्होंने बिठा दिया हमे वहीं, नीचे एक दरी पर, सहायक से पानी लाने को कहा, सहायक चला गया, अब बाबा ने हमसे बातें करनी शुरू की, उनको बड़े बाबा ने सूचित कर दिया था कि, हम आ रहे हैं उनके पास आज, 

तो बाबा नहुल नाथ भी हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे, चेहरे पर चिंता साफ़ स्पष्ट थी, पानी ले आया था सहायक, तो हमने अब पानी पिया, घड़े का पानी था, दो दो गिलास पिया हमने, घड़े का पानी हमेशा ही बढ़िया और प्यास मिटाने वाला होता है, और उसमे से आती मिट्टी की गंध तो और प्यास खोल देती है। अब मैंने भूप सिंह के विषय में बात करनी शुरू की, "कहाँ है भूप


   
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श्रीशः उपदंडक
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सिंह?" मैंने पूछा, "गया होगा जंगल में" वे बोले, "रोज जाता है?" मैंने पूछा, "हाँ" वे बोले, "कब से?" मैंने पूछा, "एक साल हो गया" वे बोले, 

मैं चुप! 

एक साल! एक साल तो बहुत लम्बा अरसा है! "इलाज कराया था?" मैंने पूछा, हालांकि जानता तो मैं भी था कि इलाज तो कराया ही गया होगा, फिर भी पूछ ही लिया था मैंने! "बहुत कराया इलाज, पराक्ष-प्रभाव है" वे बोले, ये तो बाबा जान ही गए थे कि ये पराक्ष से ही सम्बंधित है, लेकिन कोई सटीक काट नही हो पायी थी, "यहां है कोई पराक्ष-मार्ग?" मैंने पूछा, "पूरा जंगल खुन्वा दिया मैंने, एक एक कोना, लेकिन कुछ पता नहीं चला" वे बोले, पूरा जंगल! लेकिन मार्ग कहीं नहीं! 

ऐसा कैसे हो सकता है? मार्ग तो अवश्य ही रहा होगा वहाँ, अवश्य ही कोई चूक थी वहाँ, या नज़र नहीं पड़ी थी किसी की, 

और जंगल में ढूंढना, वैसे भी कोई सरल कार्य नहीं। "जंगल में टीले वगैरह हैं क्या?" मैंने पूछा, "बहत हैं,सब देख डाले" वे बोले, सारे के सारे देख डाले! कुछ नहीं मिला! अजीब बात थी! "कब तक आता है ये भूप सिंह?" मैंने पूछा, "आने को अभी आ जाए, न आने को रात भी न आये" वे बोले, तभी सहायक छाछ ले आया, चीनी डाली थी उसमे, मैंने दो गिलास खींच मारे, शर्मा जी ने भी और, भूषण बाबा ने भी! घी तैर रहा था उसमे, अब शहर में कहाँ मिलता है ऐसा सबकुछ, न छाछ न घी, कुछ शुद्ध नहीं! बस ख़ुश्बू से ही काम चलाया जाता है। छाछ तो ये थी, ताज़ा और बढ़िया! मन प्रसन्न हो गया! हम खड़े हुए, और बाबा नहुल नाथ के संग ही बाहर चले, बब एक जगह ले गए, ये एक कमरा था, ये भूप सिंह का कमरा था, कमरे में, मिट्टी के निशान लगे थे, हर जगह, फर्श पर, दीवार पर, खिड़की पर, मिट्टी से सने कपड़े पड़े थे, 

और कोने में एक दरी बिछी थी, यहीं सोता था वो भूप सिंह! अब बाहर आये हम, 

सहायक हमे एक दूसरे कमरे में ले गया, यहीं आराम करना था हमे, अगर समय पर भूप सिंह आ जाता तो आज जी काम हो जाता, मैं तो यही दुआ कर रहा था कि, वो आ जाए, और काम हो, और हम चलें, दोपहर बीती, शाम हुई, शाम हुई तो हड़क लगी! अब बाबा भूषण ने एक सहायक को बुलाया, सहायक आया, उस से बातें हुई, 

और वो सामान लेने चला गया, हमने अपना कोटा निकाल लिया अपने बैग से, थोड़ी ही देर में, सहायक आया, एक बड़ा सा थाल भर लाया था, 

खीरे, टमाटर, ककड़ी, प्याज और नीम्बू लाया था, चाट-मसाला भी ले आया था! उसने रखा थाल वहाँ, 

और फिर पानी लेने चला गया, पानी ले आया थोड़ी देर में, 

और हम हुए शुरू अब! निबट लिए, 

रात हुई, भोजन आया तो. भोजन किया! 

और फिर आराम! भूप सिंह नहीं आया था अभी तक, आज रात यहीं रुकना था, अब ये निश्चित था! रात गहराई और हम सो गए, सुबह नींद खुली, नहाये-धोये, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और फिर चाय-नाश्ता किया, आलू-पूरी का नाश्ता था, बढ़िया और लज़ीज़! दिन चढ़ा, भोजन किया, लेकिन भूप सिंह नहीं आया था अभी तक! इंतज़ार के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं था अब! रात हई, हमने भोजन कर लिया था, बाबा नहुल नाथ एक बार मिल कर जा चुके थे, भोजन आदि और व्यवस्था के विषय में बात कर रहे थे, यहां कोई कमी नहीं थी, सब सुलभ था यहां, रात कोई ग्यारह बजे, एक सहायक आया, उसने बताया कि बाबा नहुल नाथ ने बुलाया है इसी क्षण, हम तीनों भाग छूटे उसके साथ, बाबा नहल नाथ अपने कमरे के बाहर ही खड़े थे हमें देखा तो सामने आये तेज चलकर, बाबा नहल नाथ ने बताया कि भूप सिंह अभी अभी आया है! 

और अपने कमरे में है इस समय, हम उनके साथ हो लिए और चले भूप सिंह के पास, 

वो अपने कमरे में बैठा था, दीवार को घूरते हुए, हम कब अंदर आये उसे पता ही नहीं चला! हम उसके करीब गए, उसके हाथ-पाँव और माथे, गर्दन पर बड़े बड़े, ददौड़े उभरे हुए थे, ये गिल्टियाँ नहीं थीं, ददौड़े थे, जैसे अक्सर लाल चींटी के काटने से हो जाते हैं, या खारे पानी के मच्छर के काटने पर, बाबा नल नाथ ने आवाज़ दी उसे, भूप सिंह ने अनसुनी कर दी, वो कहीं और ही खोया था उस समय, साफ़ था, वो अपने आप में नहीं था क़तई भी, बाबा नहुल नाथ ने उसको हिलाया डुलाया, लेकिन कोई असर नहीं पड़ा उस पर! 

वो वैसा का वैसा ही बैठा रहा! दीवार को घूरता रहा, बाबा नहुल नाथ ने मुझे देखा तब, मैं समझ गया कि वो क्या कहना चाहते हैं, मैंने अब खुद उस से बात करने की सोची, नीचे बैठा मैं, उसके कंधे पर हाथ रखा, उसने मुझे देखा, घूर कर, पुतलियाँ सिमटी हुई थीं उसकी, वो गौर से देख रहा था मुझे, शायद पहचान रहा था, पुतलियाँ फैली, 

और मुझसे नज़रें हटा, फिर से दीवार को घूरता रहा, मैंने फिर से आवाज़ दी उसे "खरगस खरदम" वो बोला, 

ये क्या है? ये कैसे शब्द? न उर्दू ही है, न अरबी, न फ़ारसी! न ही संस्कृत, न ही प्राकृत और न ही डामरी, ये क्या बोला वो? मैंने बाबा नहुल नाथ को देखा, 

वे नीचे बैठे, "यही बोलता है बस ये" वे बोले, मैंने तभी कृद्रुप-मंत्र का जाप किया, बाबा नहल नाथ पीछे हट गए, मैंने मन्त्र को मन ही मन जपा, 

और मंत्र जागृत हुआ, अब नेत्र पोषित किये मैंने, नेत्र खोले, 

आश्चर्य! वो भूप सिंह अब किसी राजकुमार के समान दिखाई दे रहा था! चमकता चेहरा! दमकता रूप! सफ़ेद चांदी जैसी आभा फूट रही थी उस से! सुगंध फैली थी वहाँ, केवड़े की सुगंध! भीनी भीनी! मुझे देखा भूप सिंह ने, मुस्कुराया! "खरगस खरदम!" वो बोला, अब तो रहस्य खड़ा हो गया मेरी जान को! एक ऐसा रहस्य जिसमे, मैं भी उलझ के रह गया! अब न तो उसके शरीर पर ददौड़े ही थे, न ही उसका रूप पहले जैसा था! मैंने मंत्र वापिस किया, 

और बाबा नहल नाथ के पास पहुंचा, "क्या आपने कभी कृद्रुप-मंत्र से देखा है इसको?" मैंने पूछा, "हाँ! और यही रहस्य है!" वे बोले, बाबा भी जानते थे, उन्होंने भी देखा था! बड़ी हैरत की बात थी! ये मिट्टी से सना भूप सिंह, जिसके शरीर पर ददौड़े थे, 

राजकुमार जैसा कोनों दीख रहा था? कोई संग भी नहीं था उसके, फिर ये प्रदीप्ति कैसी? 


   
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श्रीशः उपदंडक
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ये क्या कारण है? कौन सा तर्क है यहां? क्या हो सकता है? ये पराक्ष-माया तो है, लेकिन समक्ष न रहने के बाद भी, कैसे काम कर रही है ये माया? 

बड़ा ही अजीब रहस्य था ये! अब दिमाग में भोंपू बजने लगे थे, सवालों के मेंढक, दिमाग के दरिया में, टर्र-टर्र करने लगे थे। हर तरफ टर्रमटर मची थी! सवाल भी ऐसे ऐसे कि, दिमाग ही फट जाए! 

उत्तर किसी का था नहीं मेरे पास, 

और जो बचा था, वो यही कि, किसी तरह से इस रहस्य को सुलझाया जाए! 

और इस रहस्य को सुलझाना, बहुत टेढ़ी खीर थी! सरल कार्य नहीं था ये! अब जांच करनी आवश्यक ही थी! अब हम बाहर आ गए, मैंने बाबा से कुछ आदमियों का इंतज़ाम करने को कहा, मैं जंगल जाना चाहता था, एक बार फिर से जांच करने, गर्मी तो थी, लेकिन कोई रास्ता नहीं था अन्य कोई, जाना ही था! बाबा मान गए, उस रात हम सो गए, अगली सुबह हम नित्य कर्मो से निवृत हुए, चाय-नाश्ता किया, 

और आदमी आ गए थे सभी, कुल सोलह आदमी थे, तीन हम थे, इस तरह उन्नीस हो गए, अब मैंने जंगल जाने के लिए तैयारी की, एक घास काटने वाला हंसुआ ले लिया, बाकी के पास तो थे ही, 

और हम चल पड़े, 

चार चार आदमी विभिन्न जगहों के लिए, चल दिए, 

और हम चले मध्य में, जो जगह ऊंची थी, उसका मुआयना पहले करना था, काम मुश्किल था बहुत, भूसे में सुई खोजने जैसा ही था ये सब, लेकिन करना तो था ही! चार दिनों में हम लोगों ने, जंगल का चप्पा चप्पा छान मारा, लेकिन कोई सूत्र हाथ नहीं लगा, हम सुबह जाते और शाम को, बैरंग वापिस आ जाते, आखिर में, छठे दिन, कुछ हाथ नहीं लगा, वहाँ कोई गुफा या केंद्र नहीं दिखी, न ही कोई गड्ढा, सांप तो दिखे, लेकिन वो पराक्ष नहीं थे, मायूस हो गए थे हम, 

आखिर में, मैंने एक योजना बनायी, हमें इस भूप सिंह का पीछा करना था, लेकिन भूप सिंह बहुत सजग था, कब आता था, कब जाता था, पता ही नहीं चलता था! एक दिन हाथ लग ही गया वो! हम तीनों उसके पीछे पीछे हो लिए, वो जंगल में दौड़ा दौड़ा जा रहा था, हम भी भाग रहे थे उसके पीछे पीछे, एक जगह जाकर वो रुक गया, पीछे देखा, 

और फिर पीछे पलट आया, हम छिप गए सभी! 

वो आ गया वहीं पर! 

और एक एक को ढूंढ निकाला! 

पागलों की तरह से हंसने लगा! 

और फिर हमें, खदेड़ता हआ, ले आया वापिस उसी डेरे में! अगले दो दिन तक कहीं नहीं गया! हम झुंझला गए थे बुरी तरह से! बाबा नहल नाथ ने भी पीछा करवाया था उसका, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और हमारी तरह ही, उसने सभी को ढूंढ निकाला था! मेरी ये योजना भी धरी की धरी रह गयी! कुछ हाथ नहीं लगा! भूप सिंह बड़ी धूर्तता से हम सभी को, छका रहा था! हम में से किसी को भी देखता, 

तो हंस पड़ता! मज़ाक उड़ाता! तालियां पीटता! गुस्सा तो बहुत आता उस पर, लेकिन उसकी हालत पर तरस भी आता! दो दिन और गुजर गए! मुझे खबर मिली कि सुबह तड़के ही, 

वो निकल गया था वहाँ से! चूक हो गयी थी हमसे! नाक के नीचे से चोरी हो गयी थी! मैंने अब दूसरी योजना पर काम करना शुरू किया, इस बार, मुझे खुद ही दिमाग लगाना था, जंगल में कुछ नहीं दिखा था, लेकिन क्यों? 

और फिर, ये भूप सिंह, क्यों जाता था जंगल फिर? हफ्ते भर से हम सभी, 

धूल ही चाट रहे थे! लाठी भांज रहे थे धूल में, 

और लाठी हमारे ही सर आ पड़ती थी! कुछ भी सूत्र नहीं मिला था! रोज जंगल जाते और वापिस आ जाते, वहाँ तालाब थे दो, काफी बड़े थे, कुछ लोग मछली भी पकड़ा करते थे उनमे, इसी सोच में डूबा रहता था मैं, नींद नहीं आती थी, रहस्य गहराता जा रहा था! मैं रात को सो भी नहीं पा रहा था ढंग से, एक रात की बात है, मैं पानी पीने उठा, पानी पिया और बैठ गया, शर्मा जी भी उठ गए, पानी पीना था उन्होंने, मैं सोया नहीं फिर, लेटा भी नहीं, बस कुर्सी पर बैठ गया था, शर्मा जी भी वहीं आ बैठे, उन्होंने बीड़ी सुलगा ली अपनी, एक मैंने भी ले ली, दिमाग कुन्द पड़ा था बिलकुल! न आगे जाता था और न पीछे ही! "सारा जंगल छान मारा हमने, हाथ कुछ नहीं लगा। मैंने कहा, उन्होंने गर्दन हिलायी, मेरा समर्थन किया, वो कुछ सोच रहे थे, कहीं खोये हुए थे, तभी कुछ आया उनके दिमाग में, 

और मुझे देखा, धुंआ छोड़ा, "सारा जंगल देख लिया, है न?" वे बोले, "हाँ" मैंने कहा, 

और बीड़ी बुझाई अब, "लेकिन वो दो तालाब?" वे बोले, मेरे सर में धमाका हुआ! 

विचारों की रेलगाड़ी दौड़ पड़ी! 

झनाझन झनाझन! ये तो मैंने सोचा ही नहीं था! क्या खूब कड़ी ढूंढी थी शर्मा जी ने! उम आखिर उम ही होती है। तजुर्बा सच में तजुर्बा ही होता है! वो दो तालाब! काफी बड़े थे वे तालाब! हमने तो ध्यान ही नहीं दिया था उन पर! इन्ही तालाबों में से किसी एक में, मुहाना हो सकता है प्राक्ष-मार्ग का! ये सम्भव है, असम्भव नहीं! मैं खड़ा हो गया। सोचा अभी भाग जाऊं उन तालाबों के पास, जाकर, निरीक्षण करूँ! हो सकता है कोई सूत्र हाथ लगे! लेकिन रात के ढाई बज रहे थे, अब जाना सम्भव ही नहीं था, कल सुबह ही जाना था! कुछ तसल्ली हुई, शर्मा जी की पीठ ठोंकी मैंने! उनके इस खुलासे से जैसे मुझे, इस कहानी का छोर हाथ लग गया था! अब आराम से सो गया मैं, सुबह हुई, हम निवृत हुए, चाय-नाश्ता किया, अपना बैग उठाया मैंने, 

और हम तीनों निकल पड़े वहाँ से, एक तालाब जंगल के मध्य पड़ता था, वहीं जाने के लिए मैंने तैयारी की थी! हम उस भरी गर्मी में, तीनों ही चल दिए, तालाब पहुंचे, एक पेड़ के नीचे सामान रखा, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और कुछ देर सुस्ताए, जल-पक्षी जल-क्रीड़ा में मग्न थे, मैं आगे गया, तालाब को देखा, तालाब गहरा था, बीच में पानी शांत था उसका, लहरें कम ही बन रही थीं, मैंने पानी उठाया उसका हाथ में, 

और कृद्रुप-मंत्र पढ़ा, मंत्र जागृत हुआ, नेत्र खोले मैंने, पानी जस का तस था! छोड़ दिया पानी तालाब में, इसमें कुछ नहीं था, कोई चिन्ह अथवा ऐसा रसायन नहीं था, 

जो रंग बदले, मैं वापिस आ गया पेड़ के नीचे, बता दिया उनको कि ये तालाब सामान्य ही है! अब दूसरा तालाब देखना था, 

और वो दूर दक्षिण में पड़ता था, अब वहीं के लिए हम चल पड़े, दोपहर होते होते हम वहाँ पहुँच गए! एक पेड़ के नीचे बैठ कर आराम किया हमने, कोई आधा घंटा, पानी पिया, गर्मी सर चढ़ के बोल रही थी! 

आधे घंटे के बाद मैं तालाब पर पहुंचा, पानी उठाया, मंत्र पढ़ा, मंत्र जागृत हुआ! और नेत्र खोले! पानी का रंग बदल गया था! नीले रंग का चमक रहा था वो पानी! अब स्पष्ट था!! कि पराक्ष-मार्ग इसी तालाब में है कहीं! 

और वो भूप सिंह यहीं आता है उस पराक्ष-कन्या से मिलने! तभी उसके कपडे मिट्टी से सने रहते हैं! अब सब समझ आ गया था मुझे! बाबा भूषण बहुत प्रसन्न हुए थे। मेरे माथे पर हाथ रख कर, अनेक मंत्र पढ़े थे उन्होंने लेकिन इसका श्रेय शर्मा जी को जाता था! उन्होंने ही रास्ता आगे का खोला था! हम वापिस आ गए पेड़ के नीचे, मैंने चादर निकाली, बिछायी, 

और लेट गया! नींद लग गयी मेरी! सपने आने लगे। साँपों के! अजीब अजीब से सांप, दस सर वाले, चार पूंछों वाले, 

बड़े बड़े, 

भयानक सांप! जब नींद खुली तो वे दोनों भी सोये हुए थे, शर्मा जी अपने तौलिये पर सोये थे, बाबा भूषण अपने अंगोछे पर, मैं उठा, तालाब तक गया! 

और तालाब का निरीक्षण किया, तालाब सामान्य दिखाई देता था! ले ये तालाब, अपने अंदर, एक रहस्य लिए बैठा था! एक ऐसा रहस्य जिसके बारे में, शायद ही कोई जानता हो! सांप तो बहुत देखे होंगे, 

लेकिन जो यहां थे, वे तो कल्पना से भी परे थे! आपने कई भित्ति-चित्र अथवा पट्टिकाएं देखी होंगी, या फिर मूर्तियां, जिसमे उत्कीर्ण आकृति आधी सांप की, 

और आधी मनुष्य की सी होती है, ऐसी आकृति में अक्सर कन्याएं हुआ करती हैं, ये ही पराक्ष हैं! ये एक सर्प की विशेष योनि है! नाग से पृथक! जहां तक मैं जानता हूँ, उसके अनुसार दो सगी बहनों से ही इनकी उत्पत्ति हुई है, एक से नाग उत्पन्न हए, और दूसरी से ये पराक्ष! ये पराक्ष विशिष्ट योनि है। नाग से कहीं अधिक समृद्ध! ये भी पातालवासी हैं! इस संसार में ऐसी कई सर्प योनियाँ है, जो अनेक अनेक स्थानों पर, वास किया करती हैं, कुछ नभ में, कुछ जल में, कुछ पाताल में, कुछ पहाड़ों में, कुछ हिम स्थानों में, शेषनाग झील के आसपास और उसमे बसने वाले सर्प, एक माह में ही युवा हो जाया करते हैं, अपने माता-पिता समान ही! जंगली सांप के संपोले, पैदा होते ही अलग अलग हो जाते हैं, अकेले ही विचरण करते हैं, लेकिन शेषनाग झील के पास वाले सर्प, विशेष हैं! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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वे हम मनुष्यों की तरह ही अपने संपोलों का, 

लालन-पालन करते हैं, वे संपोले भी, उनका वैसा ही आदर किया करते हैं जैसे कि हम अपने, माता-पिता अथवा बुजुर्गों का करते हैं! ये पराक्ष भी ऐसे ही होते हैं। इनका कुटुंब बहुत बड़ा होता है! ये सभी तरह के रूप, धर सकते हैं! स्त्री भी और पुरुष भी! कोई भी, कैसा भी रूप! ये भूप सिंह ऐसी ही किसी पराक्ष-कन्या के सम्मोहन में था! इसी कारण से, उसको अपनी कोई सुध-बुध नहीं थी। वो खोया हुआ था उस, पराक्ष माया में! उस रात हमने वहीं ठहरने का विचार कर लिया, भोजन तो था नहीं हमारे पास, बस कुछ मछलियाँ पकड़ लेते तो बात बन जाती, इस बारे में बाबा भूषण तेज थे, वो अंगोछे से मछली पकड़ सकते थे, मछलियों के कांटे फंस जाते उस अंगोछे में और बात बन जाती, न काँटा था हमारे पास, और न चारा ही, बाबा भूषण ने अपने कपड़े उतारे और कूद पड़े तालाब मैं, 

और तैर कर चले गए आगे, पानी में खूब अंगोछे चलाये, 

लेकिन बात नहीं बनी! कोई मछली हाथ नहीं आ सकी! बहत मेहनत की उन्होंने, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ! आखिर में बाहर आ गए वो, कपड़े-लत्ते निचौड़े उन्होंने, गमछा भी निचोड़ा, आखिर में सोचा कि चलो वापिस ही चला जाए, जब भूप सिंह निकलेगा, तभी हम भी निकल लेंगे, शाम घिर आई थी अब तक, 

हम वापिस हुए, 

और कोई दो घंटे के बाद हम डेरे पर पहुँच गए, यहाँ आकर आराम किया, नहाये-धोये, 

और फिर हुड़क शांत की! रात को भोजन किया और सो गए! रात को कोई दो बजे करीब मेरी नींद खुली, मैं उठा, बाहर आया, सोचा कि, भूप सिंह के कमरे की तरफ चलूँ, वहीं गया, कमरा खुला था, भूप सिंह नहीं था वहाँ, इसका अर्थ ये था कि, वो चला गया है वहाँ से! मौक़ा अच्छा था बहत! मैं दौड़ कर आया अपने कमरे में, सभी को जगाया और बताया, सभी तैयार हुए हम, 

और निकल पड़े वहां से हम, जाने से पहले हमने टोर्च ले ली थी, 

और एक हंसुआ भी, ये काटा-पीटी के काम आता, या कोई जंगली जानवर मिलता तो मुकाबला किया जा सकता था उसका! हम तेज तेज चल पड़े, 

अँधेरा बहुत था! टोर्च के बिना तो अंधे थे हम! आकाश में बादल बने हए थे, शायद बारिश हो आज सुबह, ऐसा लगता था, इसी कारण से चन्द्र की रौशनी भी नहीं खिल रही थी, वैसे दशमी थी उस रात, शुक्ल पक्ष की, तो हम टोर्च के सहारे चलते चले! करीब दो घंटे के बाद हम वहाँ आ गए, तालाब नहीं दीख रहा था, काल घुप्प अन्धकार था वहाँ, हम टोर्च के सहारे एक पेड़ के नीचे आ गए, वहाँ से मैंने तोच की रौशनी डाली तालाब के आसपास, वहां कोई नहीं था! 

तभी हंसने की आवाज़ आई! मैंने टोर्च वहीं की, सामने ही खड़ा था भूप सिंह, एकदम नग्न, एक भी वस्त्र नहीं था उसके शरीर पर, विक्षिप्त सा हँसे जा रहा था! हमे देखता और हंसने लगता! मैं


   
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