वर्ष २०१२ काशी की ए...
 
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वर्ष २०१२ काशी की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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ये विद्याएँ अब, वैसे तो लुप्तप्रायः हैं,
पर जागड़ ये सिद्ध कर रहा था कि,
वो वास्तव में अनूठा है,
और सभी विद्याएँ जानता है!
मेरा त्रिशूल दहका!
और तभी!
मेरे यहां जैसे कोई कूदा!
मेरे सर के ऊपर के वृक्ष के पत्ते,
नीचे गिरने लगे!
वायु-वेग बढ़ गया!
और जो प्रकट हुआ,
उसको देख कर मैं तो चौंक क्या,
डर ही गया!
मेरे सामने एक ऐसी स्त्री थी,
जिसके धड़ तो था,
पर न बाजुएँ थीं और न ही सर!
सर की जगह पांच विशाल फन थे!
काले रंग के विशाल फन!
आँखें ऐसी दहकती हुईं कि,
जो एक बार देख ले,
वो सीधा ही यमक्षेत्र में विचरण करे!
उसके वो फन,
लहरा रहे थे!
और फुंकार!
फुंकार ऐसी कि भूमि काँप उठे!
तभी वृक्ष के पत्ते लगातार गिर रहे थे!
पर भय!
भय नहीं होना चाहिए मन में!
नहीं तो मेरा त्रिशूल काँप जाता!
और मैं काल का ग्रास बन ही जाता!
मैंने श्री महाऔघड़ का नाम पुकारा!
और अपना त्रिशूल उठा कर,
सामने तानते हुए,
दौड़ चला!


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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हम दोनों टकराये!
मैं जा कर गिरा पीछे, झटका खाकर,
और मेरा त्रिशूल जैसे ही छुआ उस से,
वो एकदम घूमी, और उसकी लातें हवा में उठीं!
और भूमि पर गिरने से पहले ही,
वो लोप हो गयी!
मैं उठा,
दौड़कर अपना त्रिशूल उठाया,
मेरा त्रिशूल अभी तक दहक रहा था!
हाँ, मेरे त्रिशूल का,
बायां फाल मुड़ गया था!
ऐसी टक्कर थी वो!
मैं बच तो गया था,
लेकिन कमर में ऐसा झटका आया था कि,
खड़े होने में भी बहुत पीड़ा हो रही थी!
मैं किसी तरह से खड़ा हुआ,
अपने आसन तक पहुंचा,
और बैठ गया,
अलख में ईंधन झोंका!
और फिर से देख लड़ाई!
देख लड़ी!
देख पकड़ी गयी!
बाबा जागड़,
मुझे ऐसे देख रहा था जैसे कि,
मैं सामने ही बैठा होऊं उसके!
वो हंस रहा था!
मुस्कुरा रहा था!
"आगे बढ़!" वो बोला,
उसने बोला,
आगे बढ़?
क्या अर्थ हुआ?
मैं वार करूँ?
यही कहा इसने?
ऐसा कैसे सम्भव था?


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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उसका वार खाली गया था,
और दूसरा वार करने से पहले,
वो मुझे कह रहा था आगे बढ़?
इसका क्या अर्थ हुआ?
अब कौन सी चाल खेल रहा था ये,
बाबा जागड़?
"आगे बढ़!" वो फिर चिल्लाया!
वो खड़ा हुआ!
और आगे आया,
अलख में ईंधन झोंका!
और त्रिशूल किया मेरी तरफ!
"आगे बढ़ अब!" वो बोला,
और मदिरा पी उसने!
"नहीं जागड़! तू आगे बढ़!" मैंने कहा,
वो हंसा!
ठहाका लगाया!
अपना त्रिशूल भूमि से स्पर्श किया!
और यहां झटका लगा मुझे!
मेरी कमर का दर्द,
उठ खड़ा हुआ!
"बस?" वो बोला,
"नहीं जागड़!" मैंने कहा,
"तो चला जा! जा वापिस!" वो बोला,
"नहीं जागड़! तू जाएगा वापिस!" मैंने कहा,
उसने ठहाका मारा!
ताली पीट कर!
जैसे मेरा उपहास उड़ाया हो!
उसने कटा सर उठाया,
उसको बालों से पकड़ा,
और अलख पर रखा,
लटकाया!
और देख बंद हुई!
ऐसा कैसे?
कैसे सम्भव?


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैंने फिर से देख लड़ाई!
उसने देख पकड़ी!
वो खड़ा था!
आकाश की ओर,
दोनों हाथ किये!
और फिर घुटनों पर बैठा!
अचानक से मैंने देखा!
कि उसकी आँखों से आंसू टपके!
क्यों?
मैं तो विचलित हो गया!
क्या कोई आह्वान था ये?
या कोई चाल?
क्या?
कैसा स्वांग?
समझ नहीं आया!

अब जागड़ मुड़ा!
और जा बैठा अपनी अलख के,
साथ रखे आसन पर!
भूमि को थाप दी,
अपने हाथ से कोई चार बार!
आकाश को देखा,
और जैसे उसने तारे तोड़े आकाश से!
ऐसी मुद्रा में हाथ चलाये उसने!
और अब अपना त्रिशूल उठाया,
और गुस्से में हो जैसे,
ऐसे गाड़ दिया,
भूमि में!
सामने रखे थाल के ऊपर से,
उसने कपड़ा खींचा,
और भोग में मदिरा के छींटे दिए!
और अब खड़ा हुआ!
कपाल-कटोरा उठाया झुककर,
और ढेर सारी मदिरा परोसी उसमे,
और एक सांस में ही पी गया!


   
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श्रीशः उपदंडक
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फि से भरा वो कपाल-कटोरा!
मुंह में भरी,
और अलख में झोंक दी!
अग्नि लपक पड़ी उसके मुंह की ओर!
अब बैठा आसन पर जागड़!
और लिया डमरू!
और लगाया मुंह से अपने!
कुछ ताल सी छेड़ी!
और रख दिया!
अब अपनी झोली खोली,
एक अस्थि निकाली,
और उस अस्थि को,
अपने खंजर से तीन जगह काटा,
और खंजर से भूमि खोद,
उसमे आधी गाड़ दी उसने!
और अब अट्ठहास किया!
कुछ मंत्र पढ़े और अब द्वन्द में क़दम रखा उसने!
अपना खंजर लिया,
अलख में गरम किया,
और अपने सामने की भूमि पर,
एक चिन्ह अंकित किया!
उसने फिर से अट्ठहास किया!
और ऊपर देखा!
और फिर गाड़ दिया त्रिशूल उसने उस चिन्ह में!
उसने त्रिशूल गाड़ा,
और मेरी अलख मुरझाई!
मैं घबरा सा गया!
और अब उसने आह्वान किया!
उसके आह्वान से,
मेरे यहां पसरा सन्नाटा जैसे,
भागने लगा हो वहाँ से!
जैसे ताप बढ़ने से,
वहाँ के कीट-पतंगे भी,
भागने लगे हो!


   
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श्रीशः उपदंडक
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ऐसा माहौल यहां!
और तभी कर्ण-पिशाचिनी के स्वर गूंजे!
कपाल-रूढ़ा!
ओह!
तो अब कपाल-रूढ़ा का आह्वान किया जा रहा था!
कपाल-रूढ़ा, श्मशानी शक्ति है!
चालीस रात्रि साधना है इसकी,
चालीस रात, नग्न अवस्था में, एक सहस्त्र मन्त्रों का,
जाप किया जाता है,
फिर, प्रत्येक तीसरे दिन,
बलि-कर्म किया जाता है,
इक्कीस रात्रि में,
ये जागृत होने लगती है,
इसके संगी-साथी,
प्रेत, चुड़ैल,
सब नज़र आने लगते हैं!
वे विघ्न डालते हैं,
सगे-सम्बन्धियों की वाणी में,
वार्तालाप किया करते हैं,
उनके जैसा रूप बनाते हैं!
जिसकी मृत्यु हो गयी हो,
किसी प्रियजन की,
उसको पीटते हैं!
त्रास देते हैं!
साधक डटा रहे,
तो सफल होता है,
अन्यथा,
विक्षिप्त हो जाता है!
कई बार साधक कुछ,
देख नहीं पाता,
कई बार सुन नहीं पाता,
कई बार सांस नहीं ले पाता,
ये सब विघ्न आते हैं!
किसी निपुण गुरु के मार्गदर्शन में ही,


   
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श्रीशः उपदंडक
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ये क्लिष्ट साधना सम्पूर्ण हो सकती है,
अन्यथा नाश सम्भव है!
कपाल-रूढ़ा का आह्वान ज़ारी था,
और यहां वाचाल के स्वर गूंजे,
ढुढौनी!
अति क्रूर!
माँ रौद्र!
कृशकाय!
भक्क काला स्वरुप,
गाल पिचके हुए,
पसलियां चिपकी हुईं,
श्वेत केश,
रूक्ष केश,
सूखे हुए स्तन,
हाथ में अस्थि-दंड लिए!
और नग्न अवस्था में होती है,
मात्र कंकाल ही होती है,
बस जिव्हा और नेत्र,
यही चलायमान होते हैं!
इक्यावन रात्रि की साधना है इसकी,
इक्कीस बलि-कर्म आवश्यक हैं,
रेत से बना आसान होना चाहिए,
रेत में सरसों का तेल,
लबालब भरा हो!
मैंने अब उसी का आह्वान किया!
वहाँ कपाल-रूढ़ा,
और यहां ढुढौनी!
करीब आधा घंटा लग गया!
और मेरे यहाँ चमकते हरे प्रकाश सी लिपटी,
ढुढौनी प्रकट हो गयी!
इसको कहीं कहीं,
पल्लभूषा भी कहा गया है,
अर्थात, ये पल में ही रूप बदलती है,
कभी षोडशी,


   
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श्रीशः उपदंडक
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कभी अनुपम काम-सुंदरी,
कभी प्रौढ़ स्त्री,
और कभी वयोवृद्ध!
पर इसके वार अचूक है!
शीशम के पेड़ पर,
यही चौदह रात्रि,
मध्य-रात्रि में,
उसके तने पर,
इसका बीज मन्त्र पढ़कर,
टीका किया जाए,
तो ऐच्छिक स्त्री का वरण होता है!
वो स्त्री, काम-वशीभूत हो कर,
खिंची चली आती यही!
चाहे कितनी ही घोर कटुता रही हो!
अब जब तक वो वृक्ष रहेगा,
ये मोहन भी तब तक स्थायी रहेगा!
कई तांत्रिक यही प्रयोग किया करते हैं!
यदि शत्रु-भंजन करना हो,
तब भी ऐसा ही एक प्रयोग काम में,
लाया जाता है!
शत्रु का नाश हो जाता है!
ढुढौनी को भोग अर्पित किया!
इसको,
अपनी भार्या जैसी ही जानकर,
सम्बोधित किया जाता है!
वैसे ही बोला जाता है जैसे एक,
पति अपनी पत्नी को निर्देश देता है!
अभी भोग हुआ ही था,
कि क्रंदन करती हुई वो कपाल-रूढ़ा प्रकट हुई!
दोनों सम्मुख हुईं!
और ढुढौनी ने,
पल भर में ही,
कई काल रूप धर लिए!
कपाल-रूढ़ा की ऊर्जा क्षय हुई!


   
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श्रीशः उपदंडक
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और अगले ही पल लोप हुई!
और ढुढौनी उड़ पड़ी!
जा लगी उसके पीछे,
वहाँ वो बाबा जागड़,
सब देख रहा था!
कपाल-रूढ़ा लोप हुई तो,
झट से मन्त्रों में पोषित किया उसने स्वयं को!
और उस प्रकट हुई ढुढौनी को,
देखा!
हंसा!
और अपना त्रिशूल आगे कर दिया!
पल में ही, लोप हो गयी ढुढौनी!
ऐसा प्रबल था वो जागड़!
मुंझे बहुत हैरत हुई!
आँखें चौडीं हो गयीं मेरी उस क्षण!

बाबा जागड़ हंसा!
बहुत तेज!
बहुत तेज!
अपना डमरू बजाते हुए!
जैसे मेरा उपहास,
उड़ा रहा हो!
और सच में,
उपहास ही तो उड़ाया था उसने मेरा!
मेरी शक्ति को,
मात्र अपने मन्त्र से ही,
वापिस भेज दिया था!
ये उसकी प्रबलता की पहचान थी!
"आगे बढ़!" वो बोला,
हँसते हुए!
"नहीं, तू बढ़!" मैंने कहा,
अट्ठहास किया उसने!
"अरे! आगे बढ़!" वो बोला,
"नहीं जागड़!" मैंने कहा,
"ठीक है, मैं ही बढ़ता हूँ! ये देख!" उसने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसने वो कटा सर उठाया,
और ऊपर उछाला!
सर ने अट्ठहास किया!
और नीचे आने से पहले,
वो बोला, "मैं गोपी हूँ! मैं गोपी हूँ!"
और लपक लिया बाबा जागड़ ने!
ये क्या?
कोई माया?
कोई खेल?
ये है क्या?
बड़ा अजीब सा,
व्यवहार था उस जागड़ का!
"आगे बढ़, आगे बढ़ द्वैपा!" वो हँसते हुए बोला!
द्वैपा!
बहुत दिनों के बाद सुना ये शब्द!
द्वैपा मायने वो शिष्य जो,
कार्य-कुशल हो!
गुरु की जिव्हा हिलने से पहले ही,
उनका आशय जान ले!
लेकिन मैं द्वैपा?
क्या कहा इसने?
समझ नहीं आया!
"चल द्वैपा! चल!" वो बोला,
और तो और!
वो कटा सर भी बोला!
"ठीक है जागड़!" मैंने कहा,
और अब मैं बैठा!
अब मैंने एक महाशक्ति की प्रधान सहोदरी,
ज्वाल-मालिनि का आह्वान किया!
मैंने जाप आरम्भ किया,
और उधर,
वो बाबा जागड़ मुस्तैद हुआ!
उसे खबर लग गयी थी!
वो कटा सर,


   
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श्रीशः उपदंडक
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सब बताये जा रहा था उसे!
अट्ठहास हुआ बाबा जागड़ का!
मैं उस महा-रौद्र शक्ति के,
आह्वान में जुट गया!
लगातार ईंधन झोंकता रहा,
मांस को अभिमंत्रित करता रहा!
मदिरा से पोषित करता रहा!
आधा घंटा बीता!
और गरम गरम राख के कण,
नीचे गिरने लगे!
छोटे छोटे अंगार!
भूमि पर पड़ते,
और शांत हो जाते!
ज्वाला जैसा ताप भड़क उठा वहां!
समय को विराम लगा!
शून्य,
अपने फटने की,
प्रतीक्षा करने लगा!
और फिर अंतिम आह्वान मंत्र!
जैसे ही पढ़ा!
भाम की सी आवाज़ हुई!
प्रकाश फ़ैल उठा!
और जैसे कोई बड़ा सा दिव्य-रथ,
रुक गया हो!
ध्वजाएँ लगी थीं!
फड़ फड़ कर रही थीं वो!
जैसे वायु सारे बंधन तोड़,
उन्ही पर कब्ज़ा करने चल पड़ी हो!
और फिर!
उप-सहोदरियां उतरने लगीं!
एक से एक रौद्र रूप में!
फिर महा-रूक्ष सेवक उतरे!
स्थान साफ़ किया गया!
भूमि,


   
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श्रीशः उपदंडक
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स्निग्ध हो गयी!
फूल बिखरने लगे!
पृथ्वी कांपने लगी!
पेड़ और पौधे,
शांत हो गए!
वो प्रकाश,
निरंतर बढ़ता रहा!
और मैं अब,
उन सभी उप-सहोदरियों के मध्य खड़ा था!
महा-रूक्ष सेवक,
सम्मुख खड़े थे!
चौरासी उप-सहोदरियों द्वारा सेवित,
और अठारह महा-रूक्ष सेवकों द्वारा सेवित,
वो ज्वाल-मालिनि अब किसी भी पल,
प्रकट होने को थी!
फिर एक बड़ा सा लौह-थाल,
प्रकट हुआ!
घूमता हुआ!
अंगार था उसमे!
खौलता लावा सा!
उसका ताप ऐसा था,
की पेड़ों के पत्ते भी,
कुम्हला गए!
घास के कोंपल,
जल कर,
काले हो गए!
सूखी घास,
जगह जगह जल उठी!
यदि मैंने,
अपना शरीर पोषित नहीं किया होता तो,
निःसंदेह,
मेरा शरीर भी भस्म रूप में,
वहीँ गिर जाता!
ढेरी बन जाती भस्म की!


   
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श्रीशः उपदंडक
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और फिर!
आकाश चीरती हुई एक सर्प सी रेखा,
वहाँ प्रकट हुई!
और ज्वाल-मालिनि,
उस घूमते हुए थाल पर,
आ विराजित हुई!
अब मैं लेट गया!
प्रणाम किया,
भोग सम्मुख किया,
त्रिशूल का फाल,
अपनी ओर किया!
और अपना उद्देश्य कह डाला!
पल में ही,
सब लोप हुए!
अब कुछ शेष नहीं!
वे वहाँ प्रकट हुए!
लेकिन!
बाबा जागड़!
कालखंडा की गोद में बैठा,
निश्चिन्त हो,
उन्ही प्रकट शक्तियों को देख रहा था!
कालखंडा!
अत्यंत महा-रौद्र और क्रूर महा-महाशक्ति!
द्रुत-वाहिनी से युक्त!
ब्रह्म-शक्ति से परिपूर्ण!
चौदह लोकों में,
स्वेच्छा से विचरण करती है!
क्या देव,
क्या दानव,
क्या दैत्य,
क्या दनुज,
और क्या असुर,
और क्या किन्नर!
सभी में पूजित है!


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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यहां बाजी मार ली थी बाबा जागड़ ने!
मैं हैरान था!
अचंभित था!
कालखंडा मानव आयु के,
पचपन वर्ष व्यतीत होने पर,
सिद्ध की जाती है!
इसकी सिद्धि,
महा-सिद्धि कही जाती है!
एक वर्ष की सिद्धि है इसकी!
अत्यंत क्लिष्ट!
तीक्ष्ण!
प्राणहारी!
मुझे बहुत आश्चर्य हुआ!
कालखंडा के सम्मुख पहुँचते ही,
ज्वाल-मालिनि के सभी सेवक,
और सेविकाओं ने,
नमन मुद्रा अपना ली,
और लोप हुए!
ज्वाल-मालिनि भी!
आज पहली बार,
मेरी ज्वाल-मालिनि,
निस्तेज हो,
लौटी थी!

वहाँ ज्वाल-मालिनि लोप हुई,
और उसने कालखंडा को लोप कर दिया!
अब मुझे बहुत बहुत हैरत हुई!
वो चाहता तो,
कालखंडा को मेरे पास भेज सकता था!
प्राण-हनन के लिए!
लेकिन नहीं!
उसने नहीं भेजा?
क्यों?
समझ नहीं आया!
मैंने ऐसा औघड़ कभी नहीं देखा था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वास्तव में,
बाबा जागड़,
अद्भुत औघड़ है!
बहुत अद्भुत!
न मैंने पहले कभी देखा,
और न सुना!
क्या लगन थी उसमे!
जब भिड़ जाता,
तो अपने प्रतिद्वंदी को,
खाली ही करता,
फिर क्षमा के लिए कहता,
नहीं मानता, तो आगे कुछ और होता फिर!
कमाल का औघड़ था बाबा जागड़!
शांत!
और शालीन!
श्री महाऔघड़ का रूप बनाये!
सांप गले में,
धारण किये हुए!
वैसा ही कद,
वैसी ही काठी!
वैसा ही चेहरा,
वैसे ही क्रिया-कलाप!
"आगे बढ़ द्वैपा!" वो बोला,
और फिर झूम झूम कर,
डमरू बजाने लगा!
मदिरा पीता,
और झूमने लगता!
"द्वैपा! आगे बढ़ बच्चे!" वो बोला,
बच्चे?
उसने,
बच्चा कहा?
मुझे बच्चा कहा?
क्यों?
उसकी यही कही-सुनी,


   
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