Notifications
Clear all

वर्ष २०११, बोड़ा! एक महान औघड़!

113 Posts
6 Users
5 Likes
2,518 Views
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

और फिर अपने नेत्र खोल दिए! तपन नाथ से कुछ कहा उन्होंने, तपन नाथ भाग लिया वहां से! शायद कुछ मंगवाया गया था उस से! तब तक बाबा बोड़ा वहीँ खड़े रहे! अपना त्रिशूल जो गाड़ दिया था उन्होंने, उसके बीच पर बंधे हुआ बन्ध पर हाथ फिराया! ये एक काले रंग का वस्त्र था, और जो दिख रहा था वो लगता था कि कोई कौड़ी सी है, जिसको टांका गया है उस वस्त्र में! उस वस्त्र के नीचे ही, लाल रंग के रुद्राक्ष गढ़े हुए थे! वे मालाओं से लग रहे थे! तीनों ही फालों में ये मुद्राक्ष और रुद्राक्ष फंसे हुए थे, फाल के नीचे, अस्थियां मढ़ी हुई सी लगती थीं! ये फूल की आकृति में थीं, इन्हीं पर अब हाथ फिराया था उन्होंने! फिर अपने अस्थिदण्ड को पकड़ा, उसका मूठ, जो कि नीचे भाले के जैसा था, जैसे कोई हीरा होता है, चतुष्कोणीय हीरा, उस जैसा मूठ था! ये अस्थिदण्ड भी काफी बड़ा था, वो जब उसको लहराते थे, तो इस से उनका दमखम पता चलता था! आयु भले ही सत्तर या अस्सी की हो, लेकिन देह ऐसी सुगठित थी कि जैसे श्रम करते रहे हों वो! न ही क्रियान्वन में कोई कमी ही थी, न कम्पन्न ही, कमाल की बात तो ये, कि वे बोलते भी बहुत कम ही थे! बस मुस्कुराते और कभी कभी हंस भी पड़ते थे!
तभी दौड़ा दौड़ा तपन नाथ आया, इस बार उसके साथ एक और बाबा सा चला आया था, सामान वो बाबा ही ला रहा था, आते ही सामान रखा और उस बाबा ने लेटकर, बाबा बोड़ा को प्रणाम किया! वो सामान उन्होंने लिया, खोला तो दो कपाल निकले, ये कपाल शिशु-कपाल से लगते थे, उन्होंने उनको अलख के सम्मुख रख दिया और तब, अलख के सामने ही बैठ गए! अलख ऐसे भड़की हुई थी कि उसमे जैसे कोई लगातार ईंधन झोंके ही जा रहा हो! मैंने सुना था, कि कई सिद्धों या महासिद्धों या फिर महाप्रबल साधकों की अलख उनकी श्वास द्वारा ही नियंत्रित हुआ करती है! मैं तो बार बार उन्हें प्रणाम ही कहे जा रहा था!
"बाबा?" बोला तपन,
बाबा ने सर उठाया, और देखा उसे,
"वो ले आऊं?" बोला वो,
बाबा ने सर नीचे कर लिया!
"बता देना मुझे!" बोला तपन नाथ,
"आदेश!" दूसरा बाबा बोला,
बाबा ने उसे भी देखा, और हाथ के इशारे से मना कर दिया! और मेरी देख अचानक ही घूम गयी! पल भर को मेरे नेत्र बन्द हुए और खोल लीं आँखें! यहां जो मैंने देखा, वो भी अद्भुत था! यहां एक बड़ी सी अलख उठी हुई थी! उसके चारों कोनों पर, चौड़े चौड़े से तसले रखे हुए थे, तसलों में, कपाल सजे थे, और कपाल, विभिन्न दिशाओं में देख रहे हों, ऐसा लगता था! ये ब्रह्म-अलख श्री जी की थी! मैं मात्र, वहीँ तक देख पा रहा था, जहाँ तक उस अलख का प्रकाश फैला था! वहां सुगन्धि फैली थी, तामलूश की सुगन्धि थी ये! ये एक प्रकार की पत्थर की राल है! इसकी महक, यक्ष, गन्धर्व, विराल, तक्ष, सुमेघ आदि ब्रह्म-योनि में योनिगत हुए दैविक सत्ताओं को भी मोह लेती है! उस बड़ी अलख के तसलों के बाहर, छोटे छोटे से कूप बने थे, इन कूपों में, अग्नि प्रज्ज्वलित थी! परन्तु, यहां मुझे न तो श्री जी ही दिखे और न ही बाबा धर्मनाथ ही!
"बाबा?" कहा मैंने,
कोई उत्तर नहीं आया!
"बड़े बाबा?" मैंने डरे से स्वर में पूछा!
कोई उत्तर नहीं!
अचानक से मैंने झटका खाया, मैं खड़ा था, धम्म से बिठा दिया गया! उधर, बाबा बोड़ा के पास देख लड़ी! तपन नाथ और वो बाबा, वही बैठ गए थे, हाँ, बाबा बोड़ा के आसपास, दाएं और बाएं!
बाबा बोड़ा ने एक कपाल उठाया, उसको हाथ में तीन बार उछाला और फिर ऊपर फेंक दिया! वो कपाल, हवा में उड़ता हुआ, सीधे ही चलता चला गया आकाश में! कुछ नज़र नहीं आया! कहां गिरा, ये भी नहीं पता! मेरे यहां भी नहीं गिरा!
अब दूसरा कपाल उठाया, और उसको भी तीन बार उछाला, लेकिन ऊपर नहीं फेंका! उसको हाथ में ही रखा! उस कपाल में से रक्त की पिचकारियां फूट पड़ीं! बड़ा ही अजीब था वो! ये कौन सी विद्या थी?
"बोल?" बोले वो गुस्से से!
और खड़े हो गए! नीचे बैठे वे दोनों ही, आपस में सट गए! वहां क्या हो रहा था, किसी को अंदाजा नहीं था!
"बोल?" बोले वो,
और दबा दिया हाथों से वो कपाल! पिचकारी फिर से फूटीं! रक्त की धाराएं उन तक पहुँच नहीं पाती थीं, उनके, माथे से पहले ही टकरा कर जैसे, उनके पीछे बैठे उन दोनों पर जा गिरती थीं! वे अपनी आँखें बन्द किये, दोनों ही, भयाक्रांत से बैठ थे!
"बोल?" बोले वो,
"हाँ!" आया स्वर एक, बड़ा ही भयानक! मेरे तो कान ही फट से पड़े! एक दो बार और वो स्वर सुनता तो, जैसे भेजा ही कानों के रास्ते पिघल कर बाहर आ टपकता कन्धे पर! मैंने फौरन ही, श्रवण-वाहिनि काटी! लेकिन? ये क्या? मेरे श्रवण-वाहिनि, कटी ही नहीं!
"भरुचि दक्षम!" बोले वो,
और मुस्कुरा गए!
तभी, उनकी अलख में फिर से घमासान सा उठा! उनकी नज़र अलख पर पड़ी! अपने पाँव जैसे ही उठाया कि अलख करीब बीस फुट तक ऊपर उठ गयी! और नीचे की अग्नि, ऊपर की अलख-शिखा से मिलती हुई लोप हो गयी! उनके नेत्र कांपे! चेहरा कसता चला गया! और वो शिशु-कपाल, किसी शिशु की भांति, उनके हाथ में, किलकारी मार हंसने लगा! मेरी तो सांस ऊपर की ऊपर, और नीचे की नीचे! अब क्या होगा? मैं ये तो जानता था कि अलख का शमन किसने किया है! लेकिन उनका क्रोध? वो भंगिमा?
बाबा ने पल भर को देर न की, शिशु-कपाल को अपने दूसरे हाथ से थाम लिया, और देखा ऊपर! कुछ बुदबुदाए! जो मैंने देखा, वो कैसे बताऊं? वो जो अलख थी, अलख-शिखा से मिलती हुई, जो लोप हो गयी थी, ठीक उसी तरह से, फिर से उस अलख में समा गयी! अलख फिर से भड़कने लगी! लेकिन भड़का इस बार बाबा का क्रोध भी! अब जो होना था...वो अतिभीषण ही होना था!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उन्होंने वो कपाल उठाया, जो शिशु-कपाल था, अपने सम्मुख लाये उसे! अलख की भस्म का टीका किया उसे! और किया सामने! तीन बार उछाला उसे, और चौथी बार में सीधा ऊपर ही फेंक दिया! ये कपाल भी सीधे ऊपर ही उड़ता चला गया! ये कौन सी क्रिया थी? कौन सी क्रिया-विधि?
वे खड़े हुए, और अचानक से ही, ऊपर सी बालकों की चिल्लाने, पुकारने की आवाज़ गूंजी! उन्होंने ऊपर देखा, वो दोनों ही कपाल, जलते हुए, नीचे आ रहे थे, इस से पहले कि बाबा बोड़ा कुछ समझते वे भूमि से टकराये, उछले दो तीन बार और भड़ाक से फट गए! उनकी उस क्रिया को दग्ध कर दिया गया था! लेकिन! अब भी बाबा विचलित न हुए! आकाश को देखा, और फिर अलख को! नीछे झुके, और अलख की भस्म, एक मुट्ठी में ली! पढ़ा मन्त्र मुट्ठी मुख के सामने लाते हुए, और फू! फू करते ही वो भस्म उड़ी और उस स्थान पर, ज़मीन से करीब तीस फ़ीट ऊपर, वो बड़ी सी अलख नज़र आने लगी! वही अलख! जिसके चारों कोनों पे तसले रखे थे, तसलों में वो कपाल और कपाल के संग वो छोटे छोटे से कूप! हैरत ये, कि अलख शान्त पड़ गयी थी! वे कपाल, सभी के सभी बाबा बोड़ा को देखने लगे थे! ये परछाईं मात्र सी ही लगती थी! बाबा ने किया त्रिशूल आगे और लहरा दिया! ये कांटक-मुद्रा थी, लहराते ही, वो कपाल आपस में मिले और भड़ाक! भड़ाक से फट पड़े! लोप हो गयी वो अलख!
उन्होंने शीघ्र ही तपन नाथ को देखा, कुछ हाथों से इशारा किया, तपन नाथ और वो औघड़ सा, वापिस भाग लिए तभी के तभी! वे भागे और बाबा ने अपना त्रिशूल थाम कर, भूमि पर रखा, जैसे ही रखा, उनके बाएं हाथ की एक माला टूटी! माला टूटते ही त्रिशूल छोड़ा उन्होंने, त्रिशूल, नीचे गिर पड़ा, जब तक वे अपना दूसरा हाथ रखते, मालाएं टूट टूट कर नीचे बिखरने लगीं! उन्होंने फौरन ही मन्त्र पढ़ा और अपने हाथ पर, एक ऊँगली सी दबाया, मालाएं वहीँ के वहीँ रुक गयीं टूटना! वे झुके और झुकते ही अपना त्रिशूल थाम लिया!
"ठहरो!" बोले वो, हाथ आगे करते हुए!
और पीछे की तरफ चल पड़े!
"क्या हो रहा है?" बोला जीवेश,
मुझे जैसे उसने सोते से जगाया!
"क्या बताऊं?" कहा मैंने,
"जो घट रहा है?" पूछा उसने,
"मुझे भी नहीं पता!" कहा मैंने,
"ऐसा क्या है?" पूछा उसने,
"द्वन्द!" कहा मैंने,
"ये तो पता है?" बोला वो,
"अदृश्य सा द्वंद!" कहा मैंने,
"अदृश्य?" बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
"क्या बोड़ा बाबा अदृश्य हैं?" पूछा उसने,
"नहीं नहीं!" कहा मैंने,
"फिर?" पूछा उसने,
उसकी उत्सुकता का शिखर मैं देख सकता था, मैं तो पागल ही हो जाता जो उसकी जगह होता उस समय!
"उनके अभिकर्म, अदृश्य हैं!" कहा मैंने,
"यही बताया था ब्रह्म जी ने!" हाँ!
"हम?" बोला वो,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"क्या?" बोला वो,
"कहां हैं, कुछ नहीं पता!" बोला मैं,
तभी मैंने कुछ देखा!
''रुको?" बोला मैं,
"क्या हुआ?" पूछा उसने,
"बताता हूँ!" कहा मैंने,
मैंने देखा, तपन नाथ और वो औघड़, एक शव ले आये थे, शव के ऊपर कई चिन्ह से बने थे, शव किसी स्त्री का था! उस स्त्री का पूरा चेहरा, सफेद पड़ा था, जैसे उस पर खड़िया पोती गयी हो, और एक बात विशेष, उसके देह पर आभूषण भी थे! अमूमन ऐसा तो मैंने कभी नहीं देखा, न ही सुना ही था? यही सुना था कि देह पर वस्त्र मात्र उसकी त्वचा ही होती है, और आभूषण तो कहीं नहीं?
वे ले आये थे उस शव को, बाबा बोड़ा ने, वो शव वहीँ रखवा दिया, अपनी अस्थिदण्ड से, उसको तीन जगह पर दग्ध किया, एक पाँव पर, एक उदर पर, और एक मस्तक पर! और फिर तपन नाथ को कुछ इशारा किया! इशारा वे समझ गए! उन्होंने फौरन ही, उस अलख की भस्म ली, और उस भस्म को उस शव पर मलने लगे! वे मलते जाते और बाबा कुछ बुदबुदाए जाते!
ऐसा करीब तीन या चार मिनट तक हुआ, फिर हटवा दिया उन दोनों को वहां से, और स्वयं, अलख के दूसरी ओर चले गए! लिया अपना त्रिशूल, मन्त्र पढ़ा और बैठ गए! नेत्र बन्द किये अपने! कुछ ही क्षणों में उन्होंने नेत्र खोले! लाल हो चुके थे नेत्र! भृकुटियां तन चुकी थीं! पसीना छलछलाने लगा था!
वे उठे, और चले उस शव की तरफ! और बोले कुछ! और जो देखा, वो न केवल आश्चर्यजनक ही था, वरन हौलनाक भी था! अचानक से ही  उस शव में हरक़त सी हुई!
उसके हाथ उठे! उसके पाँव उठे! तपन नाथ दौड़ता हुआ, बाबा की अलख के पास आ बैठा! घुटने मोड़ अपने! तपन नाथ को देख, वो दूसरा औघड़ भी बिना शोर किया, चुपचाप आ बैठा उधर ही!
उस शव की कमर, ऊपर उठी! और आँखें खुल गयीं! बाबा पीछे हुए, शव घूमा, और उस का सर, घूमते हुए, बाबा की तरफ हो गया.......वो शव हंसा! हंसते हुए, झुकी कमर, हाथों और पांवों पर आगे बढ़ा, बाबा की तरफ! बाबा ने एक अट्टहास सा किया! ऐसा भयानक सा अट्टहास जैसे कोई साक्षात वेताल ने अट्टहास किया हो! और...................!!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

उस शव की कोई मुद्रा भी देख ले, आम इंसान तो सच कहता हूँ, आत्मा उसकी भय के रथ पर सवार हो कर, भयमिश्रित भाव से, इस संसार से कूच कर जाए! मैंने स्वयं ऐसी भयानक मुद्राएं देखी हैं, परन्तु, शव को इस प्रकार हांकते हुए कभी नहीं देखा था! वे दोनों तपन नाथ और वो औघड़, यदि ये दृश्य पहले न देख चुके होते, तो मुझे विश्वास है, शव के साथ साथ वे भी अपने आप, हांक दिए जाते मारे भय के! वे खड़े हो गए उस अलख के पास और शव को देखा, शव आगे चलते हुए, अलख तक आया, नेत्र खुले हुए, और बाबा ने जैसे उस से कुछ कहा, वो शव आगे जाकर, फिर से नीचे गिर गया, जैसे उसमे से प्राण-वायु बाहर खींच ली गयी हो! बाबा आये, अपना अस्थिदंड पकड़ा, और एक पाँव, उस शव के माथे पर रखा! पढ़ा एक मन्त्र! मन्त्र पढ़ते ही, मेरे यहां पर नन्हीं नन्हीं से रक्त की छींटें सी गिरने लगीं! इस से पहले मैं समझता कुछ, कि वहां साभीष्ट सा हुआ! उस शव ने, मारी एक भयानक चीख और लगी उसके मस्तक में आग! बाबा पीछे हटे और उस जलते हुए शव को देखते रहे! शव एक बार को ऊपर उठा, और उसकी अग्नि इतनी तेज जली कि उसकी गर्दन ही नीचे ढुलक गयी! ये देख वे दोनों तो बैठे बैठे कांप गए! फिर से बाबा बोड़ा की उस महाविद्या को काट दिया गया था, भंजन कर दिया गया था! बाबा उस जलते हुए शव को ही देखते रहे! आगे बढ़े, त्रिशूल लहराया और उस जलते शव से छुआ दिया! पल भर में ही आग बुझ गयी, परन्तु उस शव की गर्दन अब धड़ से अलग ही जा पड़ी थी! चेहरा जल गया था! देह झुलस गयी थी! वो शव, मुर्दा अब किसी काम का न बचा था उनके लिए! 
"ठहरो!" बोले वो,
और उस तपन नाथ को बुलाया, कपड़े झाड़ता सा, वे दोनों ही उठ गए, उन्होंने, कुछ कहा उनसे, वे बोलते कम थे, और संकेतों में अधिक वार्तालाप किया करते थे! उन्होंने उस शव को वहां से हटाने को कहा, उन दोनों ने हामी भरी और औघड़ ने उठाया सर, और दूसरे, तपन नाथ ने, पाँव से खींच कर उस शव को वहां, उस स्थल से दूर कर दिया! वे दोनों आने को थे वहां, कि बाबा ने त्रिशूल दिखा, उन्हें मना कर दिया! अब अलख से खुद ही निबटते बाबा बोड़ा!
मित्रगण!
अब ये द्वन्द, मध्य में था, या अंत में, कुछ कहा ही नहीं जा सकता था! अभी तक, उन्होंने वार किये थे, प्रतिवार झेले थे, क्रियाएं काटी गयीं थीं एक दूसरे की, एक से बढ़ कर एक, महाविद्याओं का प्रभाव दिखा था! परन्तु, अब, बाबा बोड़ा और श्री जी के मन में क्या था, ये तो वो ही जानें, हाँ, तपन नाथ, इस द्वन्द का असली 'सूत्रधार' उसको सरंक्षण मिल गया था! उस घटिया स्तर के इंसान को, ऐसा सुदृढ़ सरंक्षण प्राप्त हुआ था, कि जो, कभी-कभार तो अभेद्य सा लगता था!
"सुनो?" बोला जीवेश,
"हाँ?" बोला मैं,
"क्या हो रहा है?" बोला वो,
"कुछ नहीं कह सकता!" कहा मैंने,
"वो मुर्दा?" बोला वो,
"वो, तो जल गया!" कहा मैंने,
"जल गया?" पूछा उसने,
"हाँ, जल गया!" कहा मैंने,
"अब किसी काम का नहीं?" बोला वो,
"काट दी गयी वो परम्-विद्या!" कहा मैंने,
"बाबा बोड़ा? क्या कर रहे हैं?" पूछा उसने,
"अलख के समीप खड़े हैं!" कहा मैंने,
"और जो वो तपन है?" बोला वो,
"उसे हटा दिया है!" कहा मैंने,
"इसे लाओ सामने?" बोला वो,
"लाओ?" कहा मैंने,
"हाँ, लाओ?" बोला वो,
"कैसे?" कहा मैंने,
"गुहार लगाओ?" बोला वो,
"गुहार?" मैंने पल भर को नेत्र बन्द किये और तब उसको देखा!
"कैसी गुहार?" पूछा मैंने,
"कि वो सामने आये?" बोला वो,
"उस से लाभ?" बोला मैं,
"द्वन्द का अंत!" बोला वो,
"रुको!" कहा मैंने,
और देख भिड़ाई उधर! अभी भी बाबा बोड़ा खड़े खड़े कुछ गहन सा मंत्रोच्चार कर रहे थे! उनके मन में क्या था? मुझे तो अंदाजा ही नहीं? कहीं कोई ऐसी विद्या? जिसकी काट न हो? काट हो, तो उस से पहले, लक्ष्य-भेदन हो जाए? यदि ऐसा ही था, तो ये तो सोचकर ही पांव उखाड़ देने वाला था!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

मेरे यहां मेरी अलख भी शांत पड़ने ही वाली थी, जीवेश उसमे प्राणरूपी ईंधन झोंक देता था! मुझे हैरत तो इस बात पर थी, कि वो बड़बोला, बड़ंग 'बाबा' ये तपन, कैसे झींगुर सा बन, कभी बोड़ा बाबा के इधर डोले, कभी उधर डोले! परछाईं तो छोड़े ही न! जी तो कर रहा था कि मैं वहाँ स्वयं ही पहुँच जाऊं और बोड़ा बाबा से, स्वयं ही गुहार लगा दूँ!
"अब?" बोला जीवेश,
"अभी भी!" कहा मैंने,
"कमाल है!" बोला वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"सच कहता हूँ, इतना समय मुझे मिले तो धड़ से सर उतार दूँ!" बोला वो,
"ये तो गलत है?" कहा मैंने,
"यही कहा मैंने!" बोला वो,
''समझा नहीं?" बोला मैं,
"इन बड़े बाबाओं को देखो! ये है द्वन्द, ऐसे लड़ा जाता है द्वन्द!" बोला वो,
"हाँ, सामर्थ्य है तो दिखाओ!" बोला मैं,
"यक़ीनन!" बोला वो,
"और जो ये होता वहां? ये ******** उन बाबा के स्थान पर? तो? तो हमारा सबसे पहले नाश करता! है या नहीं?" बोला वो,
"नाश हो!" आया स्वर एक बहुत तेज तो इस बार! ये न वाचाल के स्वर थे, और न ही उस कर्ण-पिशाचिनि के ही!
फौरन ही देख घूमी! बाबा के हाथ में, उनका त्रिशूल था! त्रिशूल, शम्बट-मुद्रा में पकड़ा गया था, ये आखेट-मुद्रा है! इस मुद्रा से, शत्रु का अंत किया जाता है! मेरी आँतों में मरोड़ सी उठी! जीवेश सही था! एकदम सही जगह था, कम से कम, ये सब देख तो नहीं पा रहा था!
"नाश!" बोले वो!
और लगा, कि जैसे उनके त्रिशूल से कोई वेग-वाहिनि निकली हो! जो कि सच में ही निकली थी! मेरे यहां, गुबार सा छा गया मिट्टी का! वो मिट्टी थी या कोहरा? पता नहीं! लेकिन मैंने अपने आसपास, किसी को घूमते हुए देखा! जीवेश ने भी मसहसूस किया, त्रिशूल उखाड़ लिया उसने और मैंने एक साथ ही! आगे पीछे हम देखते रहे! एक अट्टहास सा गूँज उठा! मैंने जो देखा वो कभी पहले कभी नहीं देखा था! ठीक सामने, एक स्त्री खड़ी थी, उसके पांव नहीं दिख रहे थे, लग रहा था कि अपने केशों में ही ढक कर, वो वहीँ खड़ी हैं! ये मात्र मैं देख रहा था! अचानक से, वो लोप हुई! कहाँ गयी, पता नहीं चला! मैं कभी ऊपर, कभी सामने देखता उसे! लेकिन वो नहीं थी वहां! दिल धड़क रहा था बहुत तेज तेज! 
तभी, अस्थियों की जली हुई सी राख चारों तरफ गिरने लगी! ये तो कोई प्रबल-संहारिका शक्ति थी! न मुझे उस विषय में पता ही था, न ये कि आगे क्या होगा! बचाव के लिए, अभिमन्त्रित सा त्रिशूल ही था! आकर अचानक ही! मैं और जीवेश फिर से जैसे वायु में ही उड़ चले! त्रिशूल मेरे हाथों से नीचे गिर पड़ा, जीवेश रगड़ता हुआ हुआ चला गया! जीवेश चिल्लाया! मैं चिल्लाया! और यकायक ही, पीछे से जैसे किसी ने थाप दी भूमि पर! हम रुक गए! खड़े हुए, फिर से गिर गए! ज़मीन उबड़-खाबड़ सी हो गयी थी! श्मशान में, एक अंतःश्मशान के दर्शन हो गए थे! वहाँ हर तरफ, कपाल, मुर्दे, ढेर के ढेर पड़े थे! कैसी का सर नहीं, किसी का पेट ही नहीं, कोई किसी के पेट में मुंह धंसाए लेटा था, किसी की टांग उठी थी, किसी की कोहनी, पूरी सफेद पड़ गयी थी! भयानक सी दुर्गन्ध थी वहां! भूमि पर जैसे जल सा, या रक्त सा उबल रहा था, जब देखा तो वो, शवों को खाने वाले कीड़े थे! कुछ उड़ते थे, भन्न की सी आवाज़ें आ रही थीं! मैंने जीवेश का हाथ थामा हुआ था!
पल भर को एक भयानक सी आवाज़ हुई! और लगा, कोई उड़ कर आया हो उधर! आया हो, और उस भयानक मंजर को अपने संग ले गया हो! अब सब सामान्य था! मस्तिष्क अभी भी दो-फाड़ था! ये माया है, या प्रति-माया? यहां तो भयानक माया-प्रभाव फैला था! कुछ भी कहना, न तो पूर्ण था, न सत्य ही! कब वार हुआ? कब काट हुई? वो षस्मशान क्यों दिखाया गया? किसने दिखाया? वो उड़ती हुई शक्ति क्या थी? वो मंज़र, अब कहाँ चला गया?
"सब ठीक?" बोला फुसफुसा कर जीवेश!
"हाँ!" मैंने भी फुसफुसा कर कहा!
"अलख?" बोला वो,
"उधर" कहा मैंने,
"मृत हो गयी?" बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
और तभी मेरे सर में पीड़ा सी उठी! नेत्र खोले तो झिलमिलाता सा प्रकाश कौंध रहा था आँखों के सामने ही! आँखें डबडबा रही थीं! और तभी दृष्टि स्थिर हुई! दूर सामने, एक योगी बैठा था! मंत्रोच्चार करता हुआ! उसके आसपास की मिट्टी और कोहरा, चारों ओर से सब ज़मीन पर रेंग जैसे, उसकी अलख में जा घुसता था! ये योगी कौन? कहाँ से आया? 
"जीवेश?" कहा मैंने,
उसने देखा मुझे, कहा कुछ नहीं!
"कुछ दीखता है सामने?" पूछा मैंने,
"नहीं, अन्धकार है...बस..!" बोला वो,


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"कोई और नहीं?'' पूछा मैंने,
"नहीं!" कहा उसने,
"उधर एक योगी हैं!" कहा मैंने,
"कहाँ?" पूछा उसने,
हम दोनों ऐसे खुसर-फुसर बातें कर रहे थे जैसे अँधेरे में सेंध मारने जा रहे हों, और उजाले का कोई छोटा सा हिस्सा भी हमारी चोरी पकड़वा दे!
मित्रगण? जोगी, योगी और तपी, इनमे क्या अंतर होता है? आप बताएं, मैं कई बार बता चुका हूँ, अतः नहीं बताऊंगा पुनः!
"ठीक, सामने, उधर?" बोला मैं,
"नहीं, नहीं!" बोला वो,
और अचानक से ही, उस भूमि में फिर से कम्पन्न सी हुई! मेरे पांव उखड़ गए, जीवेश का हाथ थाम लिया था मैंने,जीवेश दोनों टांगें खोल कर खड़ा था, सम्भल गया था! लेकिन हमारे मुंह खुले के खुले ही थे! 
अट्टहास सा हुआ, ये एक स्त्री अट्टहास सा था! कोई स्त्री, जैसे बेहद प्रसन्न हुई हो! जैसे उसकी मन-मुराद पूर्ण हुई हो!
वायु को स्तम्भन लगा!
हमको भी स्तम्भन लग गया!
समय, जैसे स्तम्भित हो, जड़ता से जा मिला हो!
हमारे चेहरों पर, हल्की हल्की सी फुहारें से आयीं! उन फुहारों के पर्दों में, उस जोगी का रूप ढकने लगा! कभी वो दीखता और कभी वो अलख जलती सी दीखती! सच कहता हूँ, वो पृथ्वीलोक तो क़तई नहीं था! यहां जो सोच मस्तिष्क में बनती थी, पल के हज़ारवें हिस्से में, नयी सोच की बुनियाद सी बन जाती थी! नींव के इस खेल में, दो महाभट एक दूसरे के समक्ष थे! कोई कम नहीं! कोई अधिक नहीं! एक उदय तो दूसरा अस्त नहीं! दूसरा अस्त नहीं, तो लालिमा छूटे! लालिमा संग, शक्तियों का प्रवाह फूटे! एक का त्रिशूल बोले, एक के मूक प्रहार बोलें! एक का अस्थिदंड सामर्थ्य का वाहक बने, एक उस अस्थिदंड को भयभीत करे! कौन गिरेगा, कौन उठेगा, कौन झरेगा और कौन जीतेगा, कुछ नहीं पता! सोच के पाषाण तो पल पल खण्डित होते थे!
अट्टहास फिर से हुआ! और किसी के पदचाप की से आवाज़ सुनने में आयी! लगता था, भारी भरी से घण्टे से बांधे हों घुटनों में! वो आवाज़, स्वर, एक समान ताल से आता था! जैसे कोई सधे हुए क़दमों ने, हमारी ओर ही बढ़े आ रहा हो!
"जीवेश?" फुसफुसाया मैं,
"हूँ?" बोला वो,
"सावधान!" कहा मैंने,
"हूँ!" बोला वो,
मैंने उसका हाथ थाम रखा था, लेकिन उसके हूँ की आवाज़ कुछ अजीब सी थी, मैंने पलट के देखा तो मैंने कुछ भी नहीं पकड़ा था! झटके से मैंने हाथ खींचा और मुझे किसी ने, मेरे केशों से पकड़ कर, ऊपर उठा लिया! मेरे मुख से, श्री जी! ऐसे स्वर गूंजे! धम्म से नीचे गिरा मैं, मेरे पांव का अंगूठा मुड़ गया! मुझे बेहद पीड़ा महसूस हुई! कोई भाग लिया वहां से! और कुछ ही दूर से, एक चीत्कार सी सुनाई दी! जैसे, किसी का संहार कर दिया गया हो!  अभी मैं पीड़ा में किसी तरह से बैठा, जड़ता को प्राप्त हुआ, उधर ही देख रहा था, कि पल भर में ही, उधर, शून्य से, वही योगी दिखाई दिया! वो रक्त-रंजित था! जैसे उसने ही, उस न दिखने वाली मौत को ही मौत के घाट उतार दिया हो! वो योगी, आगे मुड़ा, और शून्य में ही, लांघ गया! मैं, आँखें फाड़े, अविश्वास में पड़ा, बैठा हुआ, वही सब देख रहा था! मेरे नेत्र साक्षी थे उसके! चेहरे पर भाव, कठोर से, अब मृदु से पड़े, लेकिन? अचानक ही! मैंने अपने आसपास देखा! खड़ा हुआ, पीड़ा हुई बहुत! आगे चला! जीवेश?
मैंने हतप्रभ सा हो, रुआंसा सा होकर, अपने आसपास देखा! कोहरा नहीं था, गुबार मिट्टी का नहीं था, कोई और नहीं था, तो फिर जीवेश?
मैं दौड़ लिया लंगड़ाते हुए! उस जगह तक आया जहां वो योगी, उस शून्य में लांघ गया था! वो चीत्कार सी गूंजी थी! यहां आ, आसपास देखा! कोई नहीं था, कुछ झाड़ियां थीं वहां, बस! और कुछ नहीं!
मैं फिर से आगे दौड़ा! आया अपनी अलख तक, पागलों की तरह से, तेल आदि दाल कर, ईंधन झोंक कर, अलख उठायी! और अलख उठ गयी! मैं खड़ा हुआ, मेरे अंगूठे में भयानक दर्द दुआ! मैंने पंजा उठा लिया अपना! दर्द ऐसा तीव्र था कि जैसे अंगूठे की हड्डी या तो टूट गयी हो या फिर, हट गयी हो वहां से!
"जीवेश?" मैंने आवाज़ दी!
कोई उत्तर नहीं आया!
"जीवेश?" चिल्लाया मैं!
कोई भी उत्तर नहीं!
कहां गया? अभी तो यहीं था? मैंने फिर से दूर दूर तक देखा! कहीं कोई नहीं! ज़मीन में अभ्रक के छोटे छोटे से कन, अलख की लौ की रौशनी में, स्वर्ण-कण से प्रतीत हों, दूर दूर तक, यही कण बस!
"जीवेश?" मैं फिर से चिल्लाया!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  
"जीवेश?" कहा मैंने, बार बार कहता था! अभी तो यहीं था? कहाँ गया? वो तो संग ही था मेरे? कहां चला गया? क्या कोई दुर्घटना हुई उसके साथ? कहां लोप हो गया? मेरे मन में आशंकाएं उभर रही थीं! पल पल मैं सिकुड़ता जा रहा था....अब क्या होगा? क्या हुआ उसे?
अचानक से, कोई नज़र आया मुझे! धुंधला सा, मैं दौड़ पड़ा, जैसे ही दौड़ा, पांव सुन्न पड़ गया था, सूजन बढ़ने लगी थी, पांव किसी तरह से उठाया मैंने, और चल पड़ा उधर....अब कुछ नहीं...गौर से देखा, नहीं कुछ नहीं..!
"जीवेश? कहां हो?" मैंने पुकारा!
"सुनो?" उसकी आवाज़ आयी!
मैं पीछे घूमा!
"कहां थे? यहां कैसे आ गए?" बोला जीवेश,
मैं अचम्भे में पड़ा! ये क्या? क्या मैं माया में पड़ा था? मेरे माया-नाशक तंत्राभूषण? क्या शिथिल हो गए थे? मुझे ही चुरा लिया गया था? मेरी चेतना, जागते भी, कैसे लोप हो गयी थी? मैं कहां था?
"यहां कैसे आये?" बोला मुझे झिंझोड़ते हुए,
"अ.....ह......" पूरा न कह सका मैं अपना वो वाक़्य, जीभ से चिपक कर ही रह गया था!
"यहां कैसे?" बोला चिल्ला कर,
"ह...हाँ! मैं यहां कैसे?" पूछा मैंने,
"तुम तो योगी के पास गए थे न?'' बोला वो,
"योगी? मैं गया था? उसके पास?" मैंने दिमाग़ पर ज़ोर डाला तभी!
"तुम्हें? दिख नहीं रहा था?" बोला वो,
"अ...हाँ!" कहा मैंने,
"तुम गए वहां?" बोला वो,
"मैं?...मैं?" पूछा मैंने,
"हाँ, मुझे रोक कर?" बोला वो,
"नहीं तो?'' बोला मैं,
"गए थे? भूल गए?" बोला वो,
"हो...सकता है!" कहा मैंने,
"चलो उधर?'' बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
मैं चला, पांव आगे रखा, देखा, आराम से रख लिया था पांव मैंने! झुक कर, अंगूठा देखा! अंगूठा, एकदम ठीक था! मैं सच में ही माया में उतर गया था! हाँ सच में, ये विप्र-माया ही थी!
"आओ? जल्दी?" बोला वो,
"हाँ!" अब होश आया मुझे!
और हम दोनों ही दौड़ लिए उधर के लिए! अलख अभी भी उठी थी! पूरे ज़ोर से चटख रही थी!
"देख लगाओ?" बोला वो,
"हाँ! हाँ! अभी!" कहा मैंने,
और तब, मैंने देख लगाई! ये क्या? ये क्या देख रहा हूँ मैं? वहां? वो योगी? वही योगी? शांत सा? वो है कौन? कौन है? उसका चेहरा, उसके केशों से ढका हुआ था, नहीं दीख रहा था! वो योगी, हवा में, करीब दो फ़ीट, हवा में उठ कर, खड़ा था! ये कौन है? फिर से सवाल!
और वो बाबा? बोड़ा बाबा? वो तपन नाथ? और वो औघड़? कहाँ हैं? बस ये? ये अलख ही? वे सब कहाँ हैं? वो योगी, एक पल में ही मुड़ा वापिस! और फिर से, शून्य में लांघ गया! वो जैसे ही गया, दृश्य फिर से स्पष्ट हो गया! मैंने देखा, बाबा बोड़ा, नेत्र बन्द किया वहीँ अलख के सामने बैठे हैं! उनके सामने अलख और अलख के इस तरफ, वो तपन नाथ! और उसके दाएं, वो औघड़!
तो मैंने क्या देखा? वो योगी? वो कौन? क्या ये सब.....बाबा बोड़ा की कोई महाविद्या, महाक्रिया का भाग है?
मेरे यहां, सहसा ही, कुछ स्वर से गूंजे! बड़े अटपटे से स्वर थे वो! कुछ समझ नहीं आया मुझे! और हैरत की बात ये, कि इस बार ये स्वर, जीवेश ने भी सुने! हम दोनों ने ही, अपनी बायीं तरफ से आते हुए वे अटपटे से स्वर सुने थे! हमारी गर्दन, वहीँ के वहीँ जम के रह गयी थीं! 
स्वर बन्द! कुछ समय हुआ, शायद, दो या तीन मिनट! लगा, शायद हमें ही लगा हो कि कोई है, या कोई परिंदा ही हो, या कोई बनैला पशु ही!
फिर से, स्वर गूंजे!
इस बार स्वर, पता तो नहीं चले, हाँ, ये पक्का हुआ कि ये किसी बालक के अटपटे से स्वर थे! बालक? यहां कैसे?
"कौन?" मैंने हिम्मत जुटा कर कहा!
कोई स्वर नहीं! सब शांत सा था!
"कोई है तो..." बोला जीवेश,
"त्रिशूल..उठाओ..." कहा मैंने,
"हाँ..." बोला वो,
और त्रिशूल थमा दिया मेरे हाथों में! अचानक से जैसे मैं तो वहीँ खड़ा होऊं, मेरे सर के पीछे आँखें लगी हों और मैं, आगे भाग रहा होऊं ऐसा झटका लगा! और मैं थम गया वहीँ! देख अपने आप जुड़ी मेरी!
मैंने देखा, वे तीनों ही, किसी गहन मंत्रोच्चार में लीन थे! भम्म! भम्म का आवाज़ हुई और उनकी वो अलख फट पड़ी! तपन नाथ की देह पर अंगार पड़े! वो उठा और दौड़ पड़ा एक तरफ! और वो औघड़, जो वहां बैठा था, चिल्ला पड़ा! उसने अपने हाथ अपनी आंखों पर रखे थे! जिसका कुछ नहीं बिगड़ा, वो उठे! ये बाबा बोड़ा ही थे!
 

   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

बोड़ा बाबा सब देख रहे थे! सब का सब! ये सम्भवतः दूसरी बार उनकी अलख उड़ा दी गयी थी! बाबा का तो अहित नहीं हुआ लेकिन वे दोनों, पागलों की तरह से चिल्लाने लगे थे! वो औघड़, अपने नेत्र बन्द कर, आंखों पर हाथ रखे, ज़ोर ज़ोर से विलाप किये जा रहा था, वो तपन नाथ, न जाने कौन सी दिशा में शरण लेने भाग चला था! अचानक से प्रकाश की कोई छतरी सी खुली! बाबा ने प्रकाश को सर उठाकर देखा, लेकिन तनिक भी हिले नहीं! वो जो औघड़ था, हां! वो हवा में उठा दिया गया था! उसे आभास नहीं था, बस सम्मुख मृत्यु ही जान पड़ती थी! उसके पांव ऊपर हुए और हाथ नीचे, मुख खुल गया, आँखें, जले हुए गड्ढों सी हो गयीं थीं!
"क्षमा! क्षमा! प्राणदान! प्राणदान!" चिल्लाये जाए वो औघड़, उसकी हवा में लगातार उछाला गया था! जब क्षमा मांगी तो नीचे छोड़ दिया गया! धम्म से नीचे गिरा वो, हाथों से टटोली भूमि और जहाँ रास्ता मिला, दौड़ता हुआ चला गया, उसकी चीखें न टूट रही थीं, लगातार चिल्लाये जा रहा था वो!
अब चीखें गूंजी तपन नाथ की! तपन नाथ को जैसे कोई खींच कर, घसीट कर ला रहा था उस अलख तक! बाबा गम्भीर बने रहे! कोई बचाव नहीं किया उस धृष्ट का! मुझे तो पल भर में लगा कि ये नीच आदमी अभी अपनी हार स्वीकार कर लेगा! बाबा के समक्ष अपने प्राणों का दान मांगेगा! 
ले आया गया उस तपन नाथ को उधर! तपन नाथ की सांसें चढ़ी हुई थीं! किस पल, मृत्यु नाम पूछ ले, कुछ पता नहीं था उसे! वो नीच आदमी, खड़ा हुआ, अपने घुटनों पर उठने की कोशिश की! और बैठ गया! अब नहीं जोड़े उसने हाथ बाबा के! उठा और त्रिशूल उठा लिया अपना!
"मुझे मारना इतना सरल नहीं है!" बोला धीरे से, जैसे अपने आप से ही बोला वो!
बाबा ने उसे देखा, और फिर से एक मन्द सी, मधुर सी मुस्कान हंसे!
"तपन?" बोले वो, मृदु से!
"हां?" बोला वो,
अलख में ईंधन झोंकते हुए!
"उसने क्षमा मांग ली, तू क्यों नहीं?" बोले वो,
"मैं?" बोला वो,
पीछे नहीं देख रहा था, उसका मन अब क्या कर रहा था, वो क्या चाल चल रहा था, कुछ पता नहीं था! हां, जीवन की कुंजी बाबा ने दे दी थी, प्राण-दान अवश्य ही मिल जाते उसे! क्षमा से कोई लघु नहीं हो जाता!
"मुझे भान होता यदि.................तो मैं नहीं हामी भरता....!" बोला वो परम नीच!
"हामी? तपन? स्मरण रख! तू जीवित ही कहां है?'' बोले वो,
क्या बात कही थी उन्होंने! वो सच में ही, जीवित था ही कहां? वो तो उसी पहले द्वन्द में मर गया था जिस द्वन्द में उसने बाबा के पीछे किसी द्वन्द की हामी भरी होगी! मुझे एक झटका सा लगा! ये श्रवण-वाहिनि? कैसे जुड़ी? और तब मैं समझा कि कैसे जुड़ी! ये बाबा बोड़ा ने जोड़ी!
लेकिन वो कमीन आदमी अभी भी खेल खेल रहा था! ये तो बाबा बोड़ा आरम्भ से ही जानते थे! जिस रोज, शिराज्ञ शिथिल हुई थी उसी रोज ही! बाबा उसके लिए क्या करते थे? रक्षण! मात्र रक्षण! स्वयं वार करते थे? शायद नहीं और शायद हां भी! मेरे लिए तो यहां कुआं और यहां खाई!
"बाबा?" बोला वो,
बाबा ने देखा उसे,
"शत्रु के हाथ प्राण तजूं, अच्छा है, स्वतः ही अंत कर लूं!" बोला वो,
फिर से खेला वो दांव!
"जानता हूँ!" बोला वो,
बाबा चुप रहे!
"जानता हूँ, अब कोई उम्मीद नहीं!" बोला वो,
बाबा फिर से मुस्कुराये!
"क्यों मेरे साथ छल कर रहे हो?" बोला वो,
बाबा फिर से चुप!
"बोलो? इसीलिए वचन का मान था? कि मेरी मृत्यु के समय, चाह कर, कुछ भी न करोगे?" बोला वो,
"वचन!" बोले बाबा,
"हां, अब तो याद भी नहीं होगा!" बोला वो,
फिर दोनों ही चुप!
"आगे बढ़ो?" बोले बाबा,
"मैं?" बोला वो,
''हां?" कहा उन्होंने,
"किसलिए?'' बोला वो,
"इसकी चिंता क्यों?" बोले वो,
"अब करनी होगी!" बोला वो, और फट कर हंस पड़ा वो घटिया इंसान!
"तो करो!" बोले वो, और हुए खड़े!
तपन नाथ ने तो ऐसी सोची भी न थी! ये क्या हो गया? झट से पांव पकड़ लिए और बहा दिए घड़ियाली आंसू!
"इस बार! मात्र इस बार! इस बार बाबा! बस इस बार!" बोला हाथ जोड़ते हुए वो!
"क्या?" बोले वो,
"प्राणदान दे दो!" बोला टसुए बहाते हुए!
"प्राणदान? मैं?" बोले वो,
"हां, आप!" बोला वो,
"तू जानता है कुछ?" बोले वो,
"क्या बाबा?" बोला वो, हाथ जोड़े हुए,
"क्या क्या हुआ है?" पूछा उन्होंने,
"नहीं जानता" बोला वो,
"जानना चाहता है?" बोले वो,
"नहीं..बाबा....बस....आज.." बोला वो,
"सामने कौन है तेरे?" बोले वो,
"जानता हूँ" बोला वो,
"नहीं, वो तो है ही नहीं!" बोले वो,
"फिर बाबा?" बोला वो हैरत से!
"तुझे पता है? साक्षात सिद्ध-योगी प्रकट हुआ?" बोले वो,
"क्या?" अब फ़टी आँखें उसकी!
सिद्ध-योगी?
मुझे तो ज्वर सा चढ़ा ये सुन! ये बहुत ही ऊँची, शीर्ष की साधना है! यही, 'सिद्ध-योगी' सत्ता ही, मार्ग प्रशस्त करती है, 'मुख्य' मार्ग का! मैंने बस सुना ही है, जाना नहीं था, अभी तो कहो कि हम, ऊँगली पकड़ कर चलने वाले बालक ही हैं! हम क्या जानें ऐसी सत्ताएं!
"अब......अंत होगा..तपन नाथ! अंत! या
 तो तेरा या फिर...................
वो बोलते कि आगे बढ़े और...........


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

सिद्ध  योगी साधना! ये साधना परमोच्च साधनाओं में से एक है! कुल ऐसी साधनाओं की संख्या कुल आठ है! अधिक विवरण नहीं कर सकता, और करूंगा भी नहीं! न तो इसे सरलता से समझा ही जा सकता है और न ही समझ ही आ सकता है! वो सिद्ध-योगी, अलख के संग नज़र आता है, उसका कद और काठी, पूरी भरी पूरी होती है! कोई पुराने समय का योगी हो, ऐसा प्रतीत होता है! कम से कम आठ या नौ फ़ीट का नज़र आता है वो सिद्ध योगी! बाबा बोड़ा तो पहचान गए थे, वो उस स्तर तक पहुंचे हुए साधक थे! उन्होंने पहचाना था उसे, और इसीलिए उस तपन नाथ से उसी की समझ के अनुसार ही वार्तालाप भी किया था! अब ये तपन नाथ के ऊपर निर्भर करता था, कि वो बाबा की बात मान ले और जीवन दान प्राप्त हो उसे, या फिर, अपने खोखले दम्भ में, काल की अलख का ईंधन बन जाए!
उन्होंने एक बात और कही थी, कि अब अंत होगा, या तो तेरा, तपन नाथ का, या फिर! ये फिर क्या था? कौन था? मैं? समस्त संकेत तो यही कहते थे कि ये लक्ष्य मैं ही था, तपन नाथ के समक्ष तो मैं ही भिड़ा था! यदि ये मैं था, तब तो मेरा सर्वस्व श्री जी के चरणों में ही अर्पित था! अब चाहे लक्ष्य मैं होऊं या नहीं, इस से अब कोई अंतर नहीं दीखता था, कैसी भी स्थिति हो, मुझे इस स्थिति को झेलना ही था! यदि मैं भी इस द्वन्द का ईंधन ही था, तो मुझे ये भी स्वीकार ही था! अब न तो चाहे हो कुछ हो सकता था, न चाहे ही कुछ भी या ही, रोके जा सकता था!
"तपन?" बोले बाबा,
"आदेश!" बोला वो,
"जाओ!" बोले वो,
"जाऊं?" पूछा उसने,
"हाँ, जाओ!" बोले वो,
"आदेश?" बोला वो,
"हाँ, अब ये द्वन्द मेरा हुआ!" बोले बाबा!
एक दोहरे अर्थ वाली मुस्कान तैर गयी उस तपन नाथ के होंठों पर! वो बखूबी जानता था, कि यदि ये द्वन्द, बाबा बोड़ा स्वयं ही, अपना समझ लड़ेंगे तो किसकी क्या बिसात तो उनके आगे ठहरे!
"आदेश!" बोला वो,
और दौड़ लिया! अब वो, अपनी जीत के लिए तैयार हो गया था! अब उसे इसका साथ पता था! वो नाचता तो भी कम ही था! लेकिन इसका भला अर्थ क्या? क्या कि ये द्वन्द अब उनका हुआ? क्या इस से पहले वे नहीं लड़ रहे थे? यदि नहीं तो कौन? और यदि हाँ? तो ऐसा कहा क्यों? बड़ी ही अजीब सी बात थी, या फिर मुझे ही समझ नहीं आयी थी? सम्भव था, मुझे ही समझ नहीं आया हो!
"प्रणाम स्वीकार हो!" बोले बाबा बोड़ा!
और मुस्कुरा पड़े!
अब बाबा बोड़ा आगे बढ़े! अलख थी नहीं! हाँ, छोटे छोटे से अंगार अवश्य ही सुलग रहे थे! मन्त्र पढ़े उन्होंने और फू! फू करते ही वही अलख, बड़ी हो चमकने लगी! भूमि को फाड़ दिया हो, ऐसा लगा! वैसे ऐसे अलख जलाई जा सकती है, दो औघड़ी मन्त्र हैं इस विषय पर, ये एक ही रात्रि या ग्रहण-समय की साधना है, इस में, आग को बांधा जा सकता है, और खोला भी जा सकता है! अर्थात, छोटे से अंगार से बड़ी, विनाशकारी अग्नि को जन्म दिया जा सकता है, उसे बांधा भी जा सकता है! अर्थात वो आपके ही कहे अनुसार कार्य करेगी, गरम, गरम न लगेगा! आज हैं ऐसे साधक बहुत, जो अग्नि को बाँध लेते हैं, उसी कारण से, कड़ाही और देग भी बंध जाती है, और दूसरा, उसको खोलना, उसके लिए भी एक और मन्त्र है!
गांव-देहात में आज भी ऐसी लोग मिल जाएंगे जो, ऐसी बांध-खोल विद्याओं के जानकार हैं! मदार-विद्या, फ्फ्फड़-विद्या आदि यही हैं! रास्ते तक बांध दिए जाते हैं! ज़हरीले कीड़े, मकौड़े, सांप, बिच्चछू भी नहीं फटक सकते वहां! खैर, यहां तो मुक़ाबला दो महाप्रबल औघड़ों के मध्य था! कौन सी विद्या बढ़े और कौन सी कटे, ये तो वहीँ जानें!
बाबा ने त्रिशूल उठाया, और ऊपर की तरफ किया इशारा, फाल किया ऊपर उसका और, तभी सामने की तरफ, ढप्प! ढप्प से कुछ गिरा! वे आगे बढ़े, और झुक कर उस गिरी हुआ वस्तु को उठाया! जो उठाया वो एक मेरु-दंड थी! उसे उठाया और अलख के सामने रखा! अलख के सामने रखते ही, जैसे उसमे प्राण डाले जा रहे हों! लेकिन नहीं! वो मेरु-धनद उस अलख में छोड़ दिया गया! चटाक से आवाज़ हुई! वो मेरु-दंड, आकाश की ओर उठने लगा और सीधा, बुझते हुए, ऊपर जा लोप हो गया!
ये क्या था? कौन सी विद्या? क्या प्रकट हुआ? कैसा मेरु-दंड? किसलिए? अब क्या होगा?
"तमाक्षी!" बोले वो,
"तमाक्षी?" मेरे मुंह से निकला..
"आद्योहन्त!" स्वर से गूंजे मेरे यहां! ये स्वर वाचाल के थे! वाचाल की शक्तियां जैसे अब खुल गयी थीं! मुझे घोर आश्चर्य हुआ! घोर आश्चर्य! वाचाल ने जाना और मैंने नहीं? सम्भव था कि मैं न जानूँ!
सहसा ही, मेरे ऊपर, कुछ स्वर से गूंजे, लगा जिसे कई सारे लोग एक साथ मिलकर, आपस में मिल कर, कोई मन्त्र पढ़ रहे हों, या किसी यज्ञ का आयोजन किया जा रहा हो! ऐसे ही स्वर थे उनके! मैं और जीवेश, ऊपर देखने लगे, फ़टी हुई आँखों से!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

ये कैसे स्वर? ये याज्ञीक से स्वर? ये क्या हैं? और ये, किस पक्ष से हैं? क्या माया है कोई? या फिर हमारे पक्ष से हैं या फिर बाबा बोड़ा की कोई क्रिया? बड़ा ही अजीब था वो काल-खण्ड! दुविधा ही दुविधा! अभी हम सोच ही रहे थे, कि वे स्वर, लोप हो गए! अब ये क्या? जैसे हमारी कोई टोह लेने आया हो, ऐसा लगा!
अचानक से ठीक सामने, एक अलख सी दिखी! 
"वो क्या है?" बोला जीवेश,
"शह्ह्ह्ह्ह्ह!" कहा मैंने धीरे से,
वो मेरे पास चला आया तभी, हम नीचे बैठ कर, सामने देखने लगे! अचानक से ठीक वहीँ फिर से स्वर गूंजने लगे! ये शब्द, ऐसे थे कि न तो संस्कृत ही लगते थे, न ही डामरी के ही, और न ही खौंछ! कई बरबटी मन्त्र खौंछ बोली में हैं, ये वो भी नहीं थे! ये शब्द, महाप्राण से लगते थे, बस, अल्पप्राण पर जैसे श्वास बदली जाती थी!
"ये है क्या?" फुसफुसाया जीवेश,
अभी मैंने उत्तर देता, कि उस अलख के पास हमें दो साधू से नज़र आये! लगते तो साधू से ही थे, तन पर कोई वस्त्र नहीं था, कुछ आभूषण से धारण किये हुए थे उन्होंने, पास में, अस्थिदण्ड गड़े हुए थे, वे ही स्वर निकालते थे, शान्त हो जाते थे और फिर अलख में कुछ छोड़ देते थे!
यकायक, उनमे वार्तालाप सा आरम्भ हुआ! कुछ समझ न आये! वे दोनों हंसे, हंसी तो उनकी रीढ़ को छीलती हुई सी चली गयी! अचानक ही शीतल सा वातावरण हो गया! रोएं खड़े होने लगे! और जैसे ही उन दोनों ने, उस अलख में ईंधन झोंका, झोंकते ही काला सा धुंआ उठने लगा! उस धूम्र से आवरित वातावरण में, घुप्पता छाने लगी और देखते ही देखते, ऐसा घोर अन्धकार छा गया कि हाथ को हाथ न सूझे! एक तो अमावस, ऊपर से ये घोर अन्धकार! हम जहां थे, तहां ही खड़े रहे! मैं न जीवेश को देख सकूँ और न वो मुझे देख सके! मैंने कुछ बोलने का प्रयास किया तो जिव्हा न हिले! जिव्हा को शूल लगा गया! तालू से ही चिपक कर रह गयी जिव्हा तो! न अलख की लौ ही दिखे! ये कैसा अन्धकार व्याप्त है? ये है क्या? मन ही मन, मुझे श्री जी के दर्शन हुए! लगा उन्होंने, वहां रखा, कपाल-दिया प्रज्ज्वलित किया है! प्रज्ज्वलित किया और लौ जली! जैसे ही लौ उठी, भक्क से बन्द भी हो गयी! जैसे शून्य ने ग्रास कर लिया हो उसका!
और फिर नज़र आये बाबा बोड़ा! शांत से खड़े हुए! और अपने त्रिशूल को, हवा में उठाये हुए, जैसे कुछ लिख रहे हों! जैसे कुछ रच रहे हों शून्य में! उनके आसपास, अंधेरा ही अंधेरा, बस उस अंधेरे में वही नज़र आएं!
धम्म! धम्म!
मैं भी गिरा और जीवेश भी गिरा! हमने हमारे केशों से पकड़ कर कोई खींच चला! उसकी पकड़ ऐसी मज़बूत की सर की खाल ही न उतर जाए कहीं! खूब चिल्लाएं, हाथ हिलाएं लेकिन, स्वर ही न निकलें! कोई चीख बाहर न आये! और फिर, अचानक से हम रुक गए! अन्धकार पीछे लौटने लगा! जैसे किसी ने खींच लिया हो उसे! अब दिखी अपनी अलख! लेकिन सर में ऐसा भयानक दर्द, ऐसा दर्द कि लगे हमारी खाल ने, सर की खोपड़ी से अपना सम्पर्क ही छोड़ दिया है! अलख दिखी, तो दौड़ लिए! भागे, जान पर बनी हो, तो प्रत्येक तिनका सीढ़ी लगता है! यहां तो अलख दिख रही थी! हम बिन बोले ही दौड़ लिए थे! यहां आये तो सबकुछ छिन्न-भिन्न पड़ा था! किसी ने जैसे खुलकर वो सारा सामान, उठा उठा कर पटका हो!
फिर से स्वर गूंजे और सर में हुआ दर्द! मैंने अपना सर पकड़ लिया! जीवेश को देखने की फुर्सत ही न मिली! सर में ऐसा दर्द जैसे कोई माथे में से सलाख घुसेड़ रहा हो!
तभी, मन्त्र से गूंजे! किसी ने ठुड्डी के नीचे कोई भारी वस्तु लगा कर, सर उठाया हो! अभीष्ट हुआ! दर्द, पल में गायब! अब कोई पीड़ा नहीं, मैं और जीवेश ने सर को छू का कर देखा! सब ठीक!
और ठीक सामने, वो जलती सी अलख दिखी! बिना आवाज़ के अलख फट सी पड़ी! कोई भागा वहां से जैसे! एक ही था वहां! वो ही दिखा, वो भाग रहा था, हवा में उठा और ऐसा झिंझोड़ा गया कि उसके माल, मालाएं केश आदि सब अस्त-व्यस्त हो गए! पल भर में ही वो लोप हो गया! कुछ समझ आया और कुछ नहीं! आंखें फटी की फ़टी रह गयीं! कुछ समझ आता कि श्वानों के कूंआने की सी आवाज़ें हर तरफ से आने लगीं! जैसे, सभी भयभीत हो गए हों! हर तरफ से, हर कोने से! मैंने चारों तरफ देखा, था तो कोई नहीं वहां, कोई भी श्वान!
"हम वहीँ हैं?" पूछा जीवेश ने,
"हाँ, लगता है..." कहा मैंने,
"परन्तु?" बोला वो और हाथ आगे किया!
"क्या?'' पूछा मैंने,
"वो मुझे ही दिख रहा है या कुछ है?" बोला वो,
मैंने सामने देखा, कुछ नहीं था, अंधेरा ही था, कुछ पेड़ से थे, कुछ झाड़ियां और तो कुछ नहीं!
"क्या दिख रहा है?" पूछा मैंने,
"वो वहां कोई है?" बोला वो,
"कोई नहीं है?" कहा मैंने फिर से देखा,
"नहीं! कोई है!" बोला वो,
"नहीं है कोई!" कहा मैंने,
"आंखें खोल?" चीख वो,
खोल? क्या बोला वो? खोल? आंखें खोल? अब गौर से देखा मैंने उसे! वो पीछे हुआ, मुझे देखते ही!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

"जीवेश?" कहा मैंने,
"हा?" और हंसने लगा वो!
"जीवेश?" मैंने फिर से कहा,
"जीवेश?? हम्म?" बोला वो,
"हां?" कहा मैंने,
"कौन जीवेश?" बोला वो,
अचानक से दिमाग में कुछ डोला मेरे! ये आवाज़? ये आवाज़ जीवेश की तो नहीं? सुनी सुनी सी तो है? लेकिन किसकी है?
"कौन जीवेश?" बोला वो,
"तुम कौन हो?" पूछा मैंने,
"मैं?" बोला वो,
और उसने, पास खड़ा त्रिशूल पकड़ लिया, मैं भांप गया कि कुछ तो गड़बड़ है यहां! कोई परकाया-प्रवेश है, लेकिन? इस आन लगी, भूमि पर, किसी हिम्मत? किसमे इतना साहस? कौन ऐसा बांकुरा जो भेद दे इसे?
और उसने त्रिशूल उखाड़ लिया!
"पहचान ले!" बोला वो,
हां! पहचान गया मैं! ये आवाज़ तो तपन नाथ की थी! ये कौन सी अभेद्य-माया थी? अभी कुछ देर पहले ही तो मैं विप्र-माया से बाहर निकला था? अब ये क्या है? ऐसी प्रबल माया? ये कौन सी माया है?
"पहचाना?" बोला वो,
अब तक मैंने भी अपना त्रिशूल उखाड़ लिया था! लेकिन मुझे करना क्या था? यदि इसने वार किया तो? बचना तो होगा ही? और अगर मैंने वार कर दिया और इसके लग गयी तो? और फिर????
हज़ार सवाल! उत्तर एक भी नहीं!
"मुझसे द्वन्द?" बोला वो,
अब क्या करता मैं! उत्तर तो देना ही था! यही आवश्यक भी था, कम से कम कुछ समय तो मिल जाता, इस प्रबल, महाविकट महामाया से कुछ वक़्त तो मिल जाता?
"हां! तुझ से द्वन्द!" कहा मैंने,
"मुझे जानता है?" चीखा वो,
"हां जानता हूँ!" कहा मैंने,
"कौन हूँ मैं? हां? कौन? बता कौन?" बोला सर आगे करते हुए!
"तू? नीच तपन नाथ!" कहा मैंने,
उसने मैंने नीच पुकारा! और जैसे ही पुकारा, बुक्का सा फाड़कर हंसा वो! त्रिशूल आगे करते हुए! हंसता, लड़खड़ाता सा!
"क्या सोचता है? तू बच जाएगा?" बोला वो,
"अवश्य ही तपन!" कहा मैंने,
"मैंने इन्हीं हाथों से छूट दी बहुतों को!" बोला वो, और फिर से बुक्का फाड़ कर हंसा! और त्रिशूल ले, दौड़ पड़ा मेरी तरफ! मैं हटा वहां से, उसने फिर से वार किया! आमने सामने, हम भिड़ गए थे! मैं उस समय बड़ी ही भयानक दुविधा में पड़ा था! इसे मारुं? छोडूं? क्या करूँ?
और उसने दौड़ कर, एक वार किया मेरे ऊपर, मैं हटा, लेकिन मेरी गर्दन पर, ज़रा सा छू गया उसका त्रिशूल! जैसे ही छुआ कि उसको बीच में से, लंगोट से पकड़ कर, उठाया हवा में किसी ने! जैसे ही वो चिल्लाया, हवा में बूंदें सी छिटकीं! और इन्हीं बूंदों के साथ वो धम्म से नीचे गिरा!
मैं दौड़ा उसके पास! वो हक्क-बक्क सा इधर-उधर देखने लगा था, उसके भाव देख कर, मैं समझ गया था कि वो अब ठीक है!
"जीवेश?" मैं ज़ोर से चीखा!
"ह...हां?" बोला वो,
"उठो?" कहा मैंने,
वो झट से उठा, अपने शरीर से, उस द्रव्य को हटाने लगा जो, बूंदों की शक्ल में उस पर छितराया गया था!
"क्या हुआ था?'' पूछा मैंने,
"मुझे नहीं पता!" बोला वो,
"तुम! तुम वहां बैठो? अभी? जल्दी?" कहा मैंने,
वो लपक कर वहां चला, अलख के पास और जा बैठा! मैं लपक कर आया अलख तक, अलख में ईंधन झोंका और देख अपने आप जुड़ गयी मेरी! वहां देखा मैंने! बाबा बोड़ा अकेले ही थे! गम्भीर सी मुद्रा में! मेरी श्रवण-वाहिनि कटी हुई थी! लगता था, उनका किसी से वार्तालाप चल रहा हो! वो बार बार, अपने सीधे हाथ की तर्जनी ऊँगली को, आगे करते थे, जैसे किसी को इशारा कर, कुछ दिखा रहे हों! या, कोई आदेश कर रहे हों! वे अचानक से ही खड़े हुए, और अलख को नमन किया! पीछ पलट गए, और ज़ोर से नाम लिया तपन नाथ का!
तपन नाथ, दौड़ा दौड़ा चला आया उधर, आते ही, हाथ जोड़े और पांवों में पड़ गया उनके! उन्होंने उसको उठाया, कन्धे से पकड़, अलख तक ले आये!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

तपन नाथ से कुछ वार्तालाप किया उन्होंने! तपन नाथ हाथ जोड़े जोड़े ही सब सुनता रहा! क्या बताया गया था, मैं सुन नहीं सका था, श्रवण-वाहिनि नहीं जुड़ी हुई थी! देख और श्रवण, एक साथ, अपने आप कभी जुड़ जातीं और कभी कुछ भी नहीं, कभी मैं वहां का वार्तालाप सुन लेता और कभी देख भी नहीं पाता था!
तपन नाथ ने सुना उन्हें और लौट चला पीछे, अब जिस तरह से वो गया था, अवश्य ही कुछ सामान या सामग्री लेने गया होगा, वो चला गया था, बाबा ने अलख में ईंधन झोंका और कुछ मन्त्र बुदबुदाए! फिर नेत्र बन्द कर लिए, कभी नेत्र खोल देते और कभी नेत्र बन्द कर लेते! वे कुछ बोलते भी थे, जो बोलते थे, बस वो ही नहीं सुन पा रहा था मैं!
तपन नाथ आ रहा था, उसके साथ दो और लोग आ रहे थे, उनके पास कुछ सामान था, ये उन्होंने सर पर उठाया हुआ था, वे चुपचाप से, आगे बढ़ते जा रहे थे, आगे चलते हुए, उस अलख तक पहुंचे और खड़े हो ये, बाबा ने तपन नाथ से कुछ कहा और तपन नाथ ने उन दोनों से, वे दोनों थोड़ा आगे जाते हुए, उस सामान को रख आये, आते ही, बाबा को प्रणाम किया, ये भी औघड़ ही लगते थे, कोई सहायक हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता था!
मेरे यहां, न वाचाल के स्वर गूंज रहे थे और न ही उस कर्ण-पिशाचिनि के ही! इन्हें तो जब चाहे जैसे, शूल लगा दिया जाता था उनकी वाणी में, उनकी वाणी जैसे स्तम्भित कर दी जाती थी! मैंने इस से पहले कभी इस प्रकार का द्वन्द नहीं देखा था! द्वन्द ऐसा भी हो सकता है, न देखा था कभी, हां सुना अवश्य ही था, कि कैसे कोई महाप्रबल साधिक, प्रकाश के कणों को भी मन्त्रों द्वारा आवेशित करने में समर्थ होता है, कैसे, उगट में प्रकट सत्ताएं झूठी हो सकती हैं या कौन सी परछाईं सच्ची हो सकती है! न यहां समय का मान ही चल रहा था, न उसका कोई खण्ड ही, मुझे तो यही लगता था कि जैसे मैं किसी और ही संसार में प्रवेश कर गया होऊं! जहां जो दीखता है वो होता नहीं और जो होता है वो भविष्य में! यहां, न सोच ही कायम रहती थी, न कोई विचार और परिभाषाएँ? उनका कोई स्थान नहीं था यहां!
उधर, सामान रखा गया था, बाबा ने एक बड़ी सी गठरी को खोलने का आदेश किया, तपन नाथ ने स्वयं ही वो गठरी खोली, जैसे ही खोली उन्होंने, रक्त के दाग़ लगे वस्त्र से निकले, और निकला एक स्त्री का कपाल! हैरत की बात ये थी, कि ये कपाल नहीं कहलाया जाना चाहिए, ये तो कोई कटा हुआ सर था! उसे हाल-फिलहाल में ही काटा गया होगा, तभी रक्त से सने वस्त्र थे उधर! बाबा ने उन कपड़ों को एक तरफ हटाने को कहा, कपड़े हटा दिए गए, जो आदेश हुआ, तपन नाथ ने वो सर, उठा लिया केशों से! और बाबा के अनुसार ही, वो सर उस अलख के सामने रख दिया गया! और कुछ कहा उन्होंने, झट से ही, वे दोनों औघड़, पीछे चले गए और खड़े हो गए! तपन नाथ को बुलाया और तपन नाथ, अलख की दूसरी तरफ जा कर बैठ गया!
"सुनो?" बोला जीवेश,
"हां?" कहा मैंने,
"क्या हो रहा है?" पूछा उसने,
"कोई पूजन है!" कहा मैंने,
"कैसा?'' पूछा उसने,
"कटा सर लाया गया है" कहा मैंने,
"किसने मंगवाया?" पूछा मैंने,
अजीब सा सवाल, मैंने नीचे देखते हुए जीवेश को देखा, जैसे ही देखा, वो सिहर सा गया! अभी भी कुछ गड़बड़ थी उसके साथ, अभी भी कुछ न कुछ चल रहा था, यदि ऐसा था, तो मुझे सतर्क ही रहना था!
"तपन नाथ ने!" कहा मैंने,
मैंने उल्टा ही उत्तर दिया!
"अब?" बोला वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"क्या हो रहा है?" पूछा उसने,
"जीवेश?" कहा मैंने,
"हां?" बोला डरा डरा सा वो!
"तुम ठीक हो?" पूछा मैंने,
"हां?" बोला वो,
"ठीक हो न?" पूछा मैंने,
"हां, ठीक हूँ!" बोला वो,
"अब बैठे रहो!" कहा मैंने,
"मैं खड़ा हो जाऊं?" पूछा उसने,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"हो जाऊं?" बोला वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"अब क्या हुआ?" बोला वो,
"कुछ नहीं!" कहा मैंने,
और मैं चला ज़रा अपने त्रिशूल की तरफ, उठायी मदिरा, छिड़की त्रिशूल पर, और त्रिशूल अपने कन्धे पर रख लिया! बड़ी ही हैरत के साथ, जीवेश मुझे ही देखता रहा, वो मेरे त्रिशूल से नज़र न हटाता था, एक पल को भी नहीं!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

जीवेश भय में जकड़ा हुआ था, अब नहीं अकड़ दिखा रहा था, पाँव बांधे, हाथों में घेरे, धीरे धीरे हिलता जा रहा था, कभी कभी मुझे भी देख लेता था, और वैसे सामने नदी की तरफ, नज़रें गड़ा लेता था! उधर, बाबा ने, एक लकड़ी में उस सर को टांग दिया था, इसका मतलब, उसकी कटी हुई गर्दन में, कोई लकड़ी घुसेड़ दी गयी थी, इस से उस सर का मुंह खुल गया था! जीभ बाहर झाँकने लगी थी, उस सर की जीभ सफेद रंग की थी, इसका क्या मतलब था?
खैर, उस तपन नाथ ने एक थाल सजाया था, उसमे भोग रखा गया था, अचानक से मेरी श्रवण-वाहिनि भी जुड़ गयी! ये बड़ी ही अजीब सी बात थी! मुझे बेहद हैरत थी कि ये श्रवण-वाहिनि जैसे मेरे बस में न थी! मुझे, श्रवण-वाहिनि के जुड़ते ही, वहां का वार्तालाप सुनाई देने लगा! अब भला ये किसकी तरफ से जुड़ी थी? क्या बाबा बोड़ा के? या फिर बाबा बोड़ा ने स्तम्भित किया हो और फिर उसकी काट श्री जी द्वारा हुई हो? कुछ भी पता नहीं चल रहा था! कुल मिलाकर, मैं अंधेरे में ही था, कोई जानकारी मुझे नहीं मिल रही थी! हां, ठीक इसी समय, एक पहलवान सा औघड़ चला आया उधर, उसने आते ही बाबा बोड़ा को प्रणाम किया और उनकी जटाओं को छू, माथे से लगा लिया! आज्ञा ली, आज्ञा मिली और वो वहीँ बैठ गया! इस औघड़ ने, एक कपाल को छेद कर, एक घड़ा सा बना रखा था, जो कि उस औघड़ की गर्दन में पड़ा था! ऐसे औघड़ को, शिवाल कहा जाता है! ये भोजन, जल, मदिरा, अन्य भोग इसी कपाल में रखते हैं और उसमे ही खाते हैं! तो ये औघड़, यही था! एक शिवाल-औघड़!
"अलख!" आया स्वर उस तपन नाथ का!
"निरंजन!" बोला वो औघड़,
और उस अलख में ईंधन डाला उन्होंने! बाबा शांत थे, एकटक, उस सर को देखते हुए! उन्हें कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था उस औघड़ और उस तपन के नादों का!
बाबा एकदम से खड़े हुए! वे खड़े हुए, तो वे दोनों भी खड़े हो गए! अब बाबा ने एक आसन लगाया! वे एक पांव पर बैठे और दूसरा पांव अपनी जंघा पर रख लिया! नेत्र खोले और कुछ बुदबुदाए! नेत्र खोले, एक मुस्कान होंठों पर दौड़ी उनके! उन्होंने लिया त्रिशूल अपना, और उस लकड़ी पर टंगे हुए उस सर के माथे से छुआया! अचानक ही वो कटा सर, अपनी आंखें खोल बैठा! उसने, बाएं देखा, फिर दाएं और फिर बाबा से नेत्र भिड़ा दिए! ये देख, वे दोनों सर झुका कर, वहीँ बैठ गए, उकड़ू ही!
अब बाबा खड़े हुए! और चले उस सर के पास! सर ने आंखें ऊपर करते हुए उन्हें देखा! उस सर के सामने आ, वे रुक गए! हर तरफ देखा एक बार!
"जा!" बोले वो,
उनका कहना था और वो सर, हवा में उड़ चला! कहां गया पता ही नहीं! हां, मेरे यहां पर, एक अजीब सी गन्ध फ़ैल गयी उस सर के उड़ते ही! अचानक ही ऊपर देखा मैंने! जलती हुई पतंग की तरह से सर के ऊपर से, काफी ऊपर से कुछ गुजरा! एक बार! दो बार! तीन बार! लेकिन वो रुका नहीं! लगातार चलता आता था, गुजरता था और चला जाता था!
"वो?" बोला जीवेश!
मैंने सामने देखा,
"क्या है?'' पूछा मैंने,
"देखो?" बोला वो,
मैंने बैठ कर, ध्यान से देखा, ये तो कोई स्त्री थी! मेरी तरफ ही चलती आ रही थी! वो सर उड़ता आता और लौट जाता! वो सर ही था, मैं जान गया था! वो कम से कम दो सौ फ़ीट के आसपास ऊपर उड़ रहा था!
वो स्त्री चले आ रही थी, अब जब, अलख की रौशनी में आयी, तो रुक गयी! वो अधेड़ उम्र की औरत थी! उसने धोती पहनी थी, पूरी देह उसकी उसी धोती में लिपटी हुई थी, उसकी गोद में एक शिशु था! और एक हाथ में, एक बड़ी सी माला! ये माला, जैसे शंखों की सी बनी थी, शंख से ही लगते थे वो!
वो औरत, उधर ही बैठ गयी! और उस शिशु को स्तन निकाल, दूध पिलाने लगी! वो सर ऊपर से गुजरा, इस बार जैसे ही गुजरा कि उसके परखच्चे उड़ गए! जलते हुए अंगार से हर तरफ बिखर गए! वो स्त्री, वहीँ देख रही थी! जब वो सर फट गया तब खिसक कर, थोड़ा पीछे हुई! ये सब मैंने पहली बार ही देखा था! वो कौन थी, पता नहीं! कौन सी महाविद्या थी, कुछ नहीं पता!
सहसा ही, उस स्त्री ने, अपने शिशु को हटाया स्तन से, और भूमि पर खड़ा कर दिया, शिशु का रूप देखा मैंने! शिशु का रूप किसी सामान्य शिशु की तरह से ही था! उसने भूमि पर उसके क़दम टिकाये!
"इह?" बोली वो,
जैसे शिशु ने कुछ संकेत समझा, और वो चलने लगा, डगमगाता हुआ! बार बार लगता वो कहीं गिर न जाए! वो शिशु चलता रहा, उसने इस तरह से, हमारे उस स्थान का एक चक्कर लगा लिया था, अब वापिस उस स्त्री के पास चले जा रहा था!
मैं आंखें फाड़ फाड़ सब देख रहा था! ये जो कुछ भी हो रहा था, मुझे कोई आभास नहीं था! मैं माया में पड़ा था या माया मुझ में पड़ी थी, कुछ नहीं पता! और, एक हाथ का सहारा ले, वो स्त्री उठी, शिशु को उठाया उसने, स्तन से लगाया, शिशु, दुग्ध-पान करने लगा, वो स्त्री घूमी और लौट चली, मैं देखता ही रह गया! वो जैसे अंधेरे में आयी थी, ठीक वैसे ही, चली भी गयी थी!
अचानक से ही, मैंने मह्सुश किया, मेरे कन्धे पर किसी ने हाथ रखा था! झट से पीछे देखा मैंने उसी क्षण! और.......................!!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

किसी ने हाथ रखा तो मैं चौंक गया! झट से पलट कर देखा तो ये जीवेश ही था! अब पूरी तरह से ठीक लग रहा था वो! जैसे उसकी बाधाएं उस शिशु ने हर ली थीं! वो थी तो कोई महाविद्या ही, परन्तु इस महाविद्या के बारे में मैंने भले ही कभी सुना हो, अब याद नहीं था! आज तो सम्मुख ही देखा था, ये रक्षण की कोई महाविद्या रही होगी!
"जीवेश?" कहा मैंने,
"हाँ? आदेश?" बोला वो,
"अब ठीक हो?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बोला वो,
"कुछ याद है?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोला वो,
"बताऊंगा!" कहा मैंने,
"जानता हूँ!" बोला मुस्कुराते हुए!
"तुम भी आवेशित हो गए थे!" कहा मैंने,
"सम्भव है!" बोला वो,
"क्या चल रहा है?" पूछा उसने,
"अभी देख नहीं जुड़ी!" कहा मैंने,
"जोड़ो!" बोला वो,
"प्रयास करता हूँ!" कहा मैंने,
और प्रयास, पहली बार में ही सफल हो गया! देख जुड़ गयी! श्रवण-वाहिनि भी जुड़ गयी थी! मैंने देखा, लकड़ी में गड़ा वो सर तो वहीँ था? तो क्यों आया था? सम्भवतः उसका कोई प्रतिरूप ही!
बाबा ने फिर से उस सर से कुछ वार्तालाप किया और जैसे ही पीछे हटे वो, वो सर अचानक ही लोप हो गया! ये देख बाबा तो भाग के पड़े वहां! आसपास देखा! और फिर ऊपर देखा! वो लकड़ी ही शेष थी बस! सर कहां गया? ये तो मैं भी नहीं जानता था की वो सर आखिर गया कहां?
इस बार बाबा को पहली बार क्रोध में देखा मैंने! मारे क्रोध के उनका जबड़ा भिंच गया था! कांपने सा लगा था! उन्होंने, फौरन ही उस शिवाल औघड़ और उस तपन नाथ को वहां से हटने को कहा! वे एकदम से हट गए! अब अलख पर जा बैठे वो! त्रिशूल अपने दाएं गाड़ दिया और अस्थिदंड अपने कंधे से टिका लिया! और करने लगे वो मंत्रोच्चार! वो हाथ आगे बढाते तो जैसे, ईंधन अपने आप उनके हाथ में आता! अलख में झोंकते हुए वो ईंधन, सर हिलाते और मन्त्र पढ़ते चले जाते! श्रवण-वाहिनि अचानक से कटी! देख भरभराई, धुंधली सी पड़ी और छवि लोप हो गयी! मैं बैठ गया तभी! अब नहीं पता था कि क्या होगा उधर! जीवेश भी सतर्क ही खड़ा था, मैं उस पर नज़र रखे थे, पता नहीं कब क्या हो जाए उसे! हालांकि वो पहले कि तरह से ही चुस्त-दुरुस्त और मुस्तैद हो गया था!
अचानक से वाचाल के भीषण से स्वर गूंजे! कर्ण-पिशाचिनि के स्वर भी गूंजे! वाचाल पीड़ित हो ऐसा मुझे लगा एक पल तो, स्वर गूंजे और लोप हो गए! कर्ण-पिशाचिनि के स्वर चलते रहे!
वाचाल के जो स्वर गूंजे थे, वे अस्पष्ट से थे, शूल आया था समझ मुझे, कर्ण-पिशाचिनि भी तभी शांत हो गयी थी! इसका अर्थ था कोई अतिभीषण विद्या का महाप्रयोग होने को था!
सहसा, सामने से कुछ घन्टियां बजने की से आवाज़ आयीं! ये ऐसी थीं कि जैसे कोई मण्डली आ रही हो, घन्टियां बजाते हुए! ये मैंने और जीवेश, दोनों ने ही सुनी थीं! घन्टियां ही बज रही थीं, गायन नहीं हो रहा था! मैं तो पल पल हैरान था कि ये क्या है? सरंक्षण यही होता है! इसीलिए, कोई भी समर्थ गुरु, क्यों प्रत्येक को शिष्य ग्रहण नहीं करता! भले ही वो चौबीसों घण्टे उनके पांव धोता रहे! क्यों कोई समर्थ गुरु अपने ही पुत्र को योग्य नहीं मानता शिष्यत्व हेतु! और क्यों कोई एक ही शिष्यत्व ग्रहण कर पता है! शिष्य से गुरु किस प्रकार बंध जाता है, यहां दो उदाहरण थे, एक मैं और एक तपन नाथ! तपन नाथ का साथ ये महान औघड़, बोड़ा बाबा दे रहे थे, वचनवश और मुझे सरंक्षण मिला था, रक्षण हेतु!
वो घन्टियां सी बजाते हुए, चार पुरुष थे, जो उधर ही चले आ रहे थे, कुछ दूर तक आये और रुक गए! वे चारों वहीं बैठ गए, आलती-पालती मार ली उन्होंने! एक बात और, ये जो मण्डली सी आयी थी, घन्टियां ये नहीं बजा रहे थे, वे चलते थे तो घन्टियां सी बजती थीं! वे बैठ गए! मेरी आंखें, जीवेश कि आँखें, फट के रह गयीं! ये चारों कौन हैं?
आयु में चारों करीब तीस तीस के से रहे होंगे, दो लम्बी देह के, और दो नाटे से, सभी ने सर पर, पीला साफा बांधा हुआ था, पीले रंग की धोती और पीले ही रंग का कुरता सा! वे बैठे उधर और आपस में ही खुसर-फुसर करने लगे! हमसे करीब पच्चीस फ़ीट दूर! फिर एक नाटा सा आदमी उठा, और दूर चला गया! वहां जाकर, पीठ दिखाता हुआ बैठ गया! फिर दूसरा चला, वो ठीक उत्तर की तरफ चल पड़ा और वहां बैठ गया!
दो रह गए उधर!
"हंहो!" बोला वो उत्तर कि तरफ बैठा हुआ!
"हंहो!" अब वो बोला जो पहले चला गया था, दक्षिण की तरफ!
बड़ी ही अजीब सी स्थिति थी ये तो! सच पूछो तो ये कौन हैं, पता ही नहीं! ये तो सुना था, कि जैसे, बूढ़ा मसान तब बोले जब गांव बस जा! अर्थात, बूढ़ा मसान तभी कुछ करता है जब सबकुछ सजा दिया जाए, उसका स्थान और उसकी प्रजा भी! तब वो बोलता है कुछ! ठीक ऐसा ही यहां हो रहा था, ये मण्डली तो आयी थी, ऐसी ही थी!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

वाचाल के जो स्वर गूंजे थे, उसमे 'यषज' एक शब्द था, यषज शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है, ये तो पता नहीं, परन्तु जो मुझे बोली में कभी-कभार मिला था उसके अनुसार यषज का अर्थ होता है रक्षक जो अंधेरे में रक्षा करता है! ये जो मण्डली अभी आयी थी, क्या ये रक्षक थी? यदि ये रक्षक ही थी तो अवश्य ही ये साधना भी श्री जी के सामर्थ्य द्वारा ही उत्पन्न की गयी होगी! और किसी में तो ऐसा सामर्थ्य था नहीं, न मुझ में ही, न तपन नाथ में ही, हां, बाबा बोड़ा में ये सामर्थ्य अवश्य ही होगा परन्तु वे इस समय रक्षण में नहीं, मेरे लिए तो, संहार में खड़े थे! कुछ समझ पाता आगे मैं कि वो जो दो बैठे थे, एक साथ, खड़े हुए, और एक दिशा में देखने लगे! ये एक लम्बी देह का था और एक छोटे से कद का! अच्छा, अस्त्र या शस्त्र या अन्य कोई हथियार उनके पास नहीं था, वे ठेठ गवैय्ये जैसे ही लगते थे! उनको देख नहीं लगता था कि वे कुछ क्रूर या किसी महाविद्या के किरदार रहे हों!
अचानक से वहां एक भयंकर सी गर्जना हुई! आया तो कोई नहीं था, न ही कोई प्रकाश ही कौंधा था! वो गर्जना भी वहीँ कहीं से हुई थी! हमने तो सुनी थी, और सम्भवतः उन्होंने भी सुनी ही होगी, वे दो तो उठ गए थे लेकिन, वे जो दक्षिण और उत्तर में जा कर बैठे थे, वे अभी भी बैठे थे!
जानते हैं मित्रगण! ये सब कैसा था? ऐसा कि जैसे आप किसी वाहन में तेजी से जा रहे हों, न मार्ग ही आपको मालूम है, न भू-दृश्य न भू-गोल ही! आप अपने आसपास देखते हैं, कोई सहयात्री भी नहीं, और सबसे बड़ी और हैरतअंगेज़ बात ये कि न कोई चालक ही हो उसमे! बस! आप ही आप! वो वाहन आपको द्रुत-गति से ले जा रहा हो! सबकुछ वैसा ही था!
वे दोनों, को अलग अलग जा कर बैठे थे, अब उठ खड़े हुए! वे वापिस हुए और उन दोनों की तरफ चल दिए, वे सब मिले और एक एक करके, चारों ही अलग अलग दिशा में चले गए! बिलकुल ही लोप हो गए! अँधेरे में जा छिपे, या कहीं जा कर मुस्तैद हो गए! हृदय के स्पंदन एक बार जो बढ़े थे, फिर घटे ही नहीं! उनमे इज़ाफ़ा ही होता था, कम नहीं होते थे! मैं और जीवेश उन्हें देख रहे थे, जब वे लोप हुए तब हमने एक दूसरे की तरफ देखा!
"ये क्या था?" उसने पूछा,
"पता नहीं!" कहा मैंने,
"देख लड़ाओ?" बोला वो,
"हां, अभी!" कहा मैंने,
और मैंने देख लड़ाई, देख जा पकड़ी गयी! पल भर में देख की जद में सब आ गए! अबकी बार तो सब कुछ ही बदला हुआ था जैसे! इस बार कमान उस तपन नाथ ने पकड़ी हो जैसे! बाबा बोड़ा नहीं थे वहां, वे कहां थे? पता नहीं, वहां तो न थे!
"बाबा कहां हैं?" मेरे मुंह से निकला!
"कौन से?" पूछा जीवेश ने,
"बोड़ा बाबा?" कहा मैंने,
"वहां नहीं हैं?" पूछा उसने,
"नहीं हैं!" कहा मैंने,
"कहां गए?" पूछा उसने,
"नहीं हैं?" बोला मैं,
कमाल की बात! बोड़ा बाबा वहां नहीं थे, तब तपन नाथ? वो इतना विश्वास से कैसे भरा था? उसे अब तक तो मालूम चल ही गया था कि उसकी एक न चलेगी इधर? फिर भी कमान साध ली थी?
तभी शिवाल औघड़ खड़ा हुआ, और चला एक तरफ! और फिर, वापिस हो लिया! ये सब क्या हो रहा था उधर?
इधर, मेरे स्थल पर, वो मण्डली, फिर से एकत्रित हो गयी थी! वे सभी निकल आये थे अन्धकार से बाहर! एक बार भी हमको नहीं देखा और चारों ही, नदी की दिशा में चलते से दिखाई दिए, और कुछ ही दूर पर, जाकर, वे भी अन्धकार में लोप हो गए! किसलिए आये और किसलिए गए, कुछ पता नहीं चला!
पीछे से कुछ शोर सा आया, हम दोनों ही घूम गए! पीछे देखा तो कोई भी नहीं? पीछे देखा तो आगे शोर! आगे देखा तो पीछे! लेकिन था कोई नहीं! ये सम्भवतः आवागमन था! सम्भवतः शक्तियों का! या कुछ उच्च प्रकार की सत्ताओं का! अचानक से मेरी देख को जैसे किसी ने पकड़ कर उधर लगाया! मैंने फौरन ही उधर देखा! अब यहां बाबा बोड़ा थे, तपन नाथ था, वो शिवाल औघड़ था! अलख ज़ोर से उठी हुई थी! बाबा ने उठाया अपना त्रिशूल और लहराया हवा में! ठीक उनके सामने ही, कुछ ही दूरी पर, एक अलख सी और प्रकट हो गयी! जैसे उधर कोई बड़ा सा शीशा लगा दिया गया हो! वो त्रिशूल की भंगिमाएं बदलते जाते और अलख बन्द होतीं, कहीं और रक्त होती, कभी आकाश में, कभी कहीं और कभी कहीं! वे मन्त्र बुदबुदाए जा रहे थे और अचानक से एक अलख ऐसी उठी जो कि लगा उनके त्रिशूल में या उनके अंदर ही समा गयी हो जैसे! ये तो भयानक सी महाक्रिया थी! अलख जिस समय उनसे टकरा रही थी, उस समय पूरे स्थल पर, सुनहरा सा प्रकाश फ़ैल गया था! अंगार ही अंगार उड़े थे सैंकड़ों!


   
ReplyQuote
श्रीशः उपदंडक
(@1008)
Member Admin
Joined: 2 years ago
Posts: 9491
Topic starter  

वही सुनहरा सा प्रकाश, जैसे बाबा में त्रिशूल के रास्ते प्रवेश कर गया था! और तभी बाबा ने ली एक मुद्रा! इस मुद्रा को हन्तक-मुद्रा कहा जाता है! शैव-मुद्रा के एक सौ ग्यारह रूप बताये गए हैं! कुल नब्बे इनमे से, हन्तक अथवा तांडवी अथवा संहारक मुद्रा हैं! शिव संहारक हैं! प्रत्येक संहार में इनकी अमोघ-शक्ति ही कार्य किया करती है! तो बाबा ने हन्तक-मुद्रा ली, और ज़ोर से चीखे! नेत्र कुपित से हुए! देह लाल रक्तिम सी हो गयी! अंदर का रक्त जैसे सिंदूरी रंग का सा चमकने लगा! और अगले ही पल, उन्होंने अपना त्रिशूल, पारुणी-मुद्रा में लाते ही सम्मुख फेंक दिया!
चटाख की सी भीषण आवाज़ हुई और उनका त्रिशूल, भूमि में गड़ने से पहले ही, बीच में से टूट गया! किसी महाशक्ति ने उनके त्रिशूल का मार्ग बदल दिया था! इसी मार्ग के बदलने पर, त्रिशूल उसी महाशक्ति की अभेद्य दीवार से टकराया होगा और टूट गया होगा! वहां त्रिशूल टूटा और यहां तो जैसे प्रलय सी आ गयी! वायु का वेग ऐसा प्रबल हो उठा के हम नीचे ही गिर गए! बर्तन, कपाल, आसन, त्रिशूल, सामान आदि सब बह चले उसकी चपेट में! और पल भर में ही, वो वेग भी रुक गया! कोई दौड़ता हुआ आया, ये उसी मण्डली का एक नाटा सा सदस्य था! वो भागा भागा आया था, आते ही, उसने अपना साफा खोला और जैसे सुखा रहा हो उसे, फटकारने लगा!
फिर से देख भिड़ी! और वहां का दृश्य स्पष्ट हुआ! जो दृश्य वहां था, वो मैंने सोचा भी न था! बाबा बोड़ा, उस अलख से थोड़ा दूर आ कर, नीचे गिरे हुए थे! उनके पास तपन नाथ और वो शिवाल औघड़ खड़ा था! दोनों के होश उड़े हुए थे! वे बाबा के पास बैठे, उन्हें, उठाने का प्रयास कर रहा थे! अचानक से बाबा उठे! अपने हाथों से उन दोनों को हटाया, और मुख सामने किये! रक्त से नहाया हुआ था उनका चेहरा पूरा! तपन नाथ तो बुक्का फाड़ रो पड़ा! शिवाल औघड़ ने बाबा को उठाना चाहा तो फटकार दिया उसे उन्होंने! वे स्वयं उठे! उस शिवाल औघड़ को, भगा दिया उन्होंने! बाबा जैसे ही उठे, झुक गए! अचानक से घण्टियाँ बजने लगीं वहां!
उन्होंने दाएं देखा, ये वही तीन थे, जो यहां थे पहले! वे तीनों ही, वहां खड़े थे! बुला रहे थे बाबा बोड़ा को अपने पास! बाबा बोड़ा में जैसे एक चिंगारी सी चमकी! वे आगे बढ़े और उन्हें प्रणाम किया! खम्भर-डामरी में उनका वार्तालाप हुआ! इसका अनुवाद, कुछ इस प्रकार से होगा!
"बोड़ा नटरंग का प्रणाम स्वीकार हो!" बोले वो,
"अवश्य ही!" बोले वे तीनों!
कमाल थे, तीनों की एक सी ही आवाज़, एक सही ही भाव-भंगिमा और एक से ही भाव!
"आदेश! भल्लकौटिक! सर्वस्व आपका!" बोले बाबा बोड़ा!
भल्लकौटिक? ये क्या है? और क्या सर्वस्व? अपना साधना-फल? अपना तप-बल? या अपना सिद्धि-बल?
"यथेच्छ!" बोले वे तीनों!
"आदेश सर्वोपरि!" बोले वो,
इतना सुनना था कि वे तीनों, पलट गए और चलते चलते ही लोप हो गए अंधेरे! क्या वार्तालाप हुआ, क्या अर्थ हुआ? क्या निष्कर्ष निकला? ये समझ ही नहीं आया, या आ सका!
बाबा ने प्रणाम किया उधर, और लौट पड़े! आये अलख तक! तभी मेरे यहां वो नाटा सा आदमी उछला हवा में, और फिर नज़र नहीं आया! वो भी लोप हो गया!
"प्रणाम!" कहा मैंने,
"प्रणाम!" बोला जीवेश भी!
बाबा बैठ गए अलख पर! गम्भीर से होकर! अपना अस्थिदंड उठा लिया और अस्थिदंड, झुक लिया, मूठ नीचे कर ली! आशय स्पष्ट हो गया! बाबा तटस्थ हो गए! न अब उसकी तरफ और न मेरी तरफ ही!
"तपन?" बोले वो,
"आदेश!" बोला भय का मारा तपन नाथ!
"तैयार हो जाओ!" बोले वो,
"तैयार?" पूछ लिया आँखें फाड़ कर उसने!
"हां! तैयार!" बोले वो,
"किसलिए बाबा?" बोला वो,
"द्वन्द का ये अंतिम चरण है!" बोले वो,
"तो आरम्भ करो?" बोला वो,
"आरम्भ तूने ही किया था!" बोले बाबा!
"क्या अर्थ हुआ इसका?" बोला वो,
"नहीं समझा?" बोले वो,
"नहीं?" बोला वो,
"मैंने द्वन्द से हटने का निर्णय ले लिया है!" बोले बाबा,
ज़मीन निकल गयी! हवा से हल्का हो गया तपन नाथ तो ये सुन कर! चेहरा सफेद पड़ गया! सारा खून देह का दिल के पास जाने के लिए रवाना हो गया! कानों में पिघलता हुआ सा सीसा घुसने लगा!


   
ReplyQuote
Page 7 / 8
Share:
error: Content is protected !!
Scroll to Top