वर्ष २०११ दिल्ली की...
 
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वर्ष २०११ दिल्ली की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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वर्ष २०११.......सर्दी आने की महक आने लगी थी, अक्टूबर के अंत के बात होगी ये, पेड़-पौधे अपने पत्ते गिरा कर ऐसा संकेत देने भी लगे थे! प्रकृति में सुगबुगाहट होने लगी थी, सुबह शाम सर्दी आने लगी थी जायज़ा लेने! गर्मी अब जाने को थी, विश्राम करने, सामान बंधाई होने लगी थी उसकी! कुछ दिन और और पालकी उठने वाली थी उसकी, ऐसी ही एक शाम को मैं शर्मा जी के साथ बैठा चाय का आनंद ले रहा था, तभी उनके फ़ोन पर एक फ़ोन आया, ये किसी महिला ज्योति का था, ज्योति दिल्ली में ही रहा करती थीं और एक विद्यालय में अध्यापक थीं, उनके पति भी अध्यापक थे, ज्योति ने बताया कि उनकी छोटी बहन रश्मि, जिसका कि ब्याह अभी कोई साल भर पहले हुआ है, मानसिक रूप से बीमार है, अनाप-शनाप बकती है, गाली-गलौज करने लगी है, छोटे बड़े की शर्म नहीं करती और ऐसी कई और बातें, इस सिलसिले में शर्मा जी ने उनसे मिलाने की बात कही, और दिन रविवार, दो दिन बाद मिलना निश्चित हो गया,

दिन रविवार का आया,

करीब ग्यारह बजे दोनों पति और पत्नी, ज्योति और उनके पति महोदय अनिल आ गए हमसे मिलने, नमस्कार आदि हुई और फिर आये सीधा काम की बात पर,

"कितनी उम्र होगी?" मैंने पूछा,

"छब्बीस साल" वे बोलीं,

"शादी को एक साल हुआ?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वे बोलीं,

"कोई बाल-बच्चा?" मैंने पूछा,

"नहीं जी" वे बोलीं,

"चिकित्सक क्या कहते हैं?" मैंने पूछा,

"कहते है कि दिमाग में कोई स्ट्रोक पड़ा है, जिसकी वजह से ऐसा हुआ है, और अब दवाई चल रही है, लेकिन कोई असर नहीं, अब वहाँ उसके ससुरालवाले उसको मानसिक रोगी अस्पताल


   
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श्रीशः उपदंडक
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में भर्ती करना चाहते हैं, अर्थात पागलखाने में, इसीलिए मैं आपसे विनती करने आयी हूँ कि एक बार आप भी देख लें, कोई ऊपरी या किया-कराया तो नहीं?"

मैं हालत समझ सकता था उनकी!

"उनके पति महोदय क्या कहते हैं?" मैंने पूछा,

"वो अपने घरवालों से सहमत हैं" वे बोलीं,

"चिंता का विषय है, एक बात बताइये, हम कैसे मिल सकते हैं उससे? कहाँ ब्याही हैं वो?" मैंने पूछा,

"ब्याही तो यहीं दिल्ली में ही हैं, वहाँ जाकर नहीं मिल सकते, मैं यहीं अपने घर ले आउंगी उसको" वे बोलीं,

मेरे दिमाग में खटका आया!

"उनके घर में क्यों नहीं, मिलना ही तो है?" मैंने पूछा,

"जी, वे लोग इस किये-कराये को नहीं मानते, ढोंग कहते हैं, आप समझ सकते हैं" अब उनके पति महोदय ने कहा,

"हम्म, समझ सकता हूँ", मैंने कहा,

"तो ठीक है, मैं आपको कल सूचित करता हूँ, कहता हूँ उनके पति से, कि दो चार दिन हमारे यहाँ रह लेगी रश्मि" वे बोले,

"जी, ठीक है" मैंने कहा,

अब वे उठे, नमस्कार की और विदा ली!

अब शर्मा जी ने पूछा,"कैसा अजीब सा मामला है"

"कैसे अजीब?" मैंने पूछा,

"अरे जब इंसान फंसता है तो निकलने के लिए साम, दाम, दंड भेद, सब इस्तेमाल करता है, वो वो सिरे से ही खारिज़ कर रहे हैं, अरे एक बार दिखवा ही लो कहीं!" वे बोले,

"अब वो नहीं चाहते!" मैंने कहा,

"हाँ जी" वे बोले,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"चलो जब यहाँ आएगी अनिल के घर तो देख लेंगे" मैंने कहा,

"और किया भी क्या जा सकता है" वे बोले,

तभी एक सहायक आया और कुछ मुंह चलाने को ले आया, हमने चबाना आरंभ किया, ये सलाद थी!

"क्या नाम बताया था? रश्मि?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वे बोले,

"हम्म, छब्बीस साल" मैंने कहा,

उसके बाद शर्मा जी को जाना था, वे चले गए और मैं अपने कारों में व्यस्त हो गया,

अगले दिन सूचना आ गयी अनिल की तरफ से,

रश्मि को भेजने के लिए तैयार थे वे लोग और कल अनिल उनको लाने वाले थे!

और वे अगले दिन ले आये,

हमारे पास सूचना आ गयी!

और हम सुबह करीब दस बजे निकल पड़े मिलने या देखने रश्मि को!

 

हम उनके घर पहुँच गए, सभी घर पर ही मिले, रश्मि उस समय लेटी हुई थी, उसे अपनी कोई सुध-बुध नहीं थी, मैंने जाकर उसके मुख से चादर हटवाई, और चादर हटाते ही मुझे पता चल गया कि वो लपेटे में है! कोई उसको मार रहा है दिन बा दिन, क़तरा क़तरा करके!

मैंने उसको जगाने को कहा,

उसको झकझोरा गया तो वो उठ गयी, बैठ गयी, फिर मुझे देखा, फिर शर्मा जी को, फिर मुझसे बोली,"फेंक दी थी"

"क्या फेंक दी थी, रश्मि?" मैंने पूछा,

"रश्मि नहीं, कांता" उसने कहा,

"ऐसी ऐसी बातें करती है ये, हम परेशान हो गए हैं, न जाने क्या हो गया है इसे?" ज्योति ने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"रुक जाइये, वो क्या कह रही है ध्यान दीजिये" मैंने कहा,

"कौन कांता?" मैंने पूछा,

"वो रणजीत नगर है न, वहाँ की" उसने कहा,

"शादीपुर के पास वाला?" मैंने पूछा,

"हाँ!" उसने कहा,

अब फिर से उकडू बैठ गयी!

"मसाला नहीं पिसा अभी तक" उसने कहा,

ऐसा करके जैसे सिल पर मसाला पीस रही हो बट्टे से!

"तू कब आयी यहाँ?" मैंने पूछा,

"पता नहीं, मत्था न खराब कर" उसने कहा,

"क्यों? मुक्कू बाँधा है किसी ने? मना किया है बताने को?" मैंने कहा,

"क्यों बताऊँ तुझे?" उसने घूर कर कहा मुझे!

उसने हाथ ऐसे किये जैसे चाक़ू पकड़ा हो हाथ में!

"क्यूँ नहीं बताएगी?" मैंने पूछा,

अब वो आयी गुस्से में!

,मैंने सभी को हटाया वहाँ से,

उनकी हालत खराब! रह गए केवल शर्मा जी!

"फेंक दी, सुना तूने?" उसने कहा,

"क्या फेंक दी?" मैंने पूछा,

"फेंक दी बस" उसने कहा,

मैं चुप हुआ!

और अब कहा, "तू सीधी तरह से बताती है या मै बकवाऊं?" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब घबराई वो!

"क्या पूछेगा?" उसने झेंपते हुए पूछा,

"क्या फेंक दी?" मैंने पूछा,

"मुझे फेंक दिया" उसने अब आंसू लाते हुए कहा,

मैं अवाक!

"कब फेंका?" मैंने पूछा,

तो तारीख आयी २२ अगस्त सन पिच्चासी!

उसको उसकी ससुरालवालों ने चौथी मजिल से फेंक दिया था!

रहने वाली कापसहेड़ा की थी!

भटकती आत्मा, अब किसी की गुलाम!

लेकिन किसकी?

ये नहीं! बताया उसने!

"खाना खिला दे भूख लगी है" उसने कहा,

"कोई खाना नहीं" मैंने कहा,

"खिला दे?" उसने कहा,

"नहीं है खाना" मैंने कहा,

अब वो चुप!

अब मुझे जानना था उसके ससुराल के बारे में, उसके सम्बन्ध और उसके पहचान वालों को!

ये चपेट में थी!

कोई बहुत कुशलता से उसको मार रहा था!

लेकिन कौन?

प्रश्न!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैं यदि चाहता तो इस काँटा को खींच सकता था, लेकिन मुझे कुछ संदेह था, अतः अब मैंने प्रत्यक्ष-मंत्र पढ़ा और शर्मा जी से तत्पर रहने को कह दिया, वो या अन्य कोई मार-पीट पर आ सकता था, या कोई और अन्य हिंसात्मक कार्य कर सकता था! जैसे ही मैंने प्रत्यक्ष-मंत्र चलाया वो अकड़ के बैठ गयी!

खेलने लगी!

"कौन?" मैंने पूछा,

"बिंदु" उसने कहा,

""कौन बिंदु?" मैंने सख्ती से पूछा,

"बिंदु बंगालन" उसने कहा,

"यहाँ क्या कर रही है?" मैंने पूछा,

"हरामज़ादे मैं नहीं बताउंगी" उसने कहा,

मुझे ऐसा क्रोध की कस के एक लात जमा दूँ उसके चेहरे पर!

"जवाब दे भांजण, किसलिए आयी यहाँ?" मैंने बाल पकड़ते हुए पूछा,

उसने दोनों हाथ चलाये, तब शर्मा जी ने उसके हाथ पीछे से पकड़ लिए!

"अब बता?" मैंने कहा,

अब उसने टांगें चलायीं!

मैंने टांगें पकड़ लीं!

"अब बता?" मैंने कहा,

"तू क्या हाक़िम लगा है?" उसने मुझ से पूछा,

"बताता हूँ" मैंने कहा,

और ज्वाल-मंत्र पढ़कर मैंने अपने हाथ के अंगूठे को पोषित किया और उसके सर पर रख दिया!

"मर गयी! जल गयी! छोड़ दे! छोड़ दे!" वो चिल्लाई अब!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसकी चीख सुनकर वे दंपत्ति वहाँ भागे भागे चले आये और आते ही कंक्रीट जैसे जैम गए! उन्होंने ऐसा पहले नहीं देखा था, आज पहली बार साबका पड़ा था! शर्मा जी ने उनको इशारे से बैठने को कह दिया!

वे शांत!

"अब बता?" मैंने कहा,

"नहीं!" उसने कहा,

मैंने फिर से मंत्र पढ़ा!

और उसको माथे पर छुआ!

"मर गयी! मुझे बचाओ! बचाओ मुझे!" चिल्लाये वो!

"बता? अब तभी छोडूंगा तुझे" मैंने कहा,

"फक्कड़ बाबा ने भेजा! फक्कड़ बाबा ने भेजा!" इतना कहा और झम्म से सवारी साफ़!

फक्कड़ बाबा! यही है वो खिलाड़ी! पता चल गया!

अब आगे का काम इबु का था!

मैं उठने ही वाला था कि तभी रश्मि में से एक वृद्ध औरत की आवाज़ आयी! मैं पुनः नीचे बैठ गया!

"अब तू कौन?" मैंने पूछा,

"सुखिया" उसने कहा,

"कौन सुखिया?" मैंने पूछा,

"सुखिया?? तू नहीं जानता?" उसने पूछा,

"नहीं!" मैंने कहा,

"इस से पूछ?" उसने कहा,

"किस से?" मैंने पूछा,

"इस लौंडिया से?" उसने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"कौन लौंडिया?" मैंने पूछा,

"अरे ये? ये जो बैठी है?" उसने कहा और उसने जो हाथ का इशारा किया था वो ज्योति की तरफ था!

मैं सन्न!

ज्योति तो जैसे बेहोश होते होते गिरी!

"कौन है सुखिया?" मैंने अब ज्योति से पूछा,

उसने गर्दन हिलायी न में!

"झूठ मत बोल?" याद कर?" रश्मि ने डांटा ज्योति को!

"याद करो, कोई हो?" मैंने पूछा,

उसने दिमाग दौड़ाया, और फिर..............

 

सहसा!

सहसा चौंक पड़ी ज्योति!

अपना चेहरा दोनों हाथों में रख मुंह खुला रह गया!

"क्या हुआ आपको, कुछ याद आया?" मैंने पूछा,

अब अनिल भी अवाक!

कुछ था ऐसा अवश्य जो अनिल को भी नहीं पता था!

"बताइये?" मैंने पूछा,

"अ...हाँ...हाँ. मैं....मैं...." अटकी कहते कहते!

"क्या?" मैंने फिर पूछा,

इतने में रश्मि रोई!

बहुत तेज!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"मेरा बेटा! हाय मेरा बेटा!" बोली रश्मि!

और धम्म से बायीं तरफ गिर गयी, खोपड़ी की आवाज़ गूँज गयी फर्श पर टकराने से!

चली गयी सुखिया!

"अब बताओ, देर नहीं करो, यहाँ इसकी जान पर बनी है" मैंने कहा,

"सुखिया हमारे पड़ोस में रहती थी, अमरोहा की रहने वाली थी, उसका आदमी डाक-खाने में काम करता था, बच्चे ज़यादा थे सो घर में कमी रहती थी पैसे की, मेरी माँ से कुछ उधार लिया करती थी वो कभी कभार, ये बात कोई आज से बीस-बाइस बरस पहले की होगी, मुझे सुखिया का आना जाना पसंद नहीं था, लेकिन मेरे पिता जी और माता जी उसका साथ दे दिया करते थे" वो बोल के चुप हुई,

"फिर?" अनिल ने जिज्ञासा दिखायी अब!

"एक रात की बात है, उसका आदमी रात भर घर नहीं आया, सुबह थाने गए मेरे पिता जी, महीना बीता, कोई खबर नहीं मिली, फिर महीने और बीते कोई खबर नहीं आयी, मेरे माता-पिता उसको पैसे देते रहे, मदद करते रहे, एक बार की बात है, मेरे माता-पिता जी किसी कारणवश गाँव गए, उस शाम सुखिया आयी, कुछ पैसे लेने, कहा कि उसके बेटे की तबियत खराब है, पैसे मेरे माता-पिता जी दे गए थे मुझे, पचास, सौ रपये ही मांगती थी, खैर, मैंने पैसे नहीं दिए उसको, मना कर दिया, वो चली गयी वापिस, दुसरे दिन खबर आयी कि उसके बेटे की मौत हो गयी" अब आंसू छलके उसके ये कहते कहते!

दुःख मुझे भी बहुत हुआ!

बेचारी सुखिया!

"फिर?" मैंने पूछा,

"मेरे माता-पिता जी ने मुझसे पूछा था कि क्या वो पैसे मांगने आयी थी, मैंने मना कर दिया, उसके बाद सुखिया हमारे पास कभी नहीं आयी, किराए पर परिवार रहता था, किराया भरा नहीं गया और फिर मुझे पता नहीं कहाँ गयी सुखिया" अब रोई तेज ज्योति!

बहुत दुःख भरी दास्ताँ थी इस सुखिया की! क्या हुआ उसका, क्या क्या झेल उसने, क्या हुआ उसके बच्चों का, कुछ नहीं मालूम, और मालूम करने से कलेजे पर और जोर पड़ता!

लेकिन सुखिया यहाँ कैसे आयी?


   
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श्रीशः उपदंडक
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क्या फक्कड़ जानता है ज्योति के परिवार को?

या कोई अन्य चक्कर?

क्या है रहस्य?

अब ऐसे बात नहीं बनेगी!

मुझे सच्चाई जाननी ही होगी!

किसी भी सूरत में!

उस दिन हिम दुबारा कहने की बात कर वापिस आ गए!

दो-चार नहीं बल्कि प्रश्नों का पुलिंदा था मेरे पास!

हम आ गए वापिस!

अपने स्थान पर!

 

मैं वहाँ से वापिस आ गया अपने स्थान पर शर्मा जी के साथ, अब मुझे जांच करनी थी इस फक्कड़ बाबा की, ये क्या चाहता था रश्मि से, वो बिंदु बंगालन, कांता और सुखिया ये क्या चाहती हैं रश्मि से?

कुछ ऐसे ही सवाल थे दिमाग में जो कुलबुला रहे थे! मैं तभी स्नान किया और क्रिया स्थल में पहुंचा, वहाँ भोग सजाया और अलख उठायी और अब इबु का रुक्का पढ़ा, शाही रुक्का!

इबु धड़धडाता हुआ हाज़िर हुआ!

मैंने उसको उद्देश्य बताया और रश्मि के बारे में सारी जानकारियां जुटाने को कहा, फुर्र हो चला वीर सिपाही! अब मैं बैठ गया उसके इंतज़ार में वहाँ! करीब पन्द्र मिनट के बाद इबु की वापसी हुई! मैंने भोग दिया और शुक्रिया कहा! इबु वापिस हो गया!

उसने जो बताया वो बेहद पुरानी रंजिश का मामला था! और ये फक्कड़ बाबा रहने वाला था कोसीकलां का!

और ये रंजिश न तो ज्योति से थी और न ही रश्मि से, न उनके परिवार से ही! ये रंजिश थी रश्मि के पति दिलीप से, उसके परिवार से! बस मोहरा रश्मि को बनाया गया था! बिंदु और कांता भटकती हुई रूह थीं, गुलाम बाबा फक्कड़ की, और सुखिया वहाँ ही आयी थी केवल,


   
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श्रीशः उपदंडक
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ज्योति के घर! सुखिया की रूह का बाबा फक्कड़ से कोई लेना देना नहीं था, वो तो भटक रही थी, छाज खुला देख फटकारने आ गयी थी अपने दुखों का अन्न! बाबा फक्कड़ ने उसकी देह को मैदान बना दिया था, जहां कोई भी खेल सकता था! कोई भी आये जाए! और ये खतरनाक स्थिति थी!

अब सबसे पहले जो करना था वो ये कि रश्मि की देह को मुक्त कराया जाये और मैदान समाप्त किया जाए!

तो अगले दिन का कार्यक्रम हमने तय कर लिया, ज्योति और अनिल को कहा गया कि वो रश्मि को हमारे स्थान पर ले आयें कैसे भी करके, वे मान गए! मरता क्या नहीं करता वाली बात थी!

और फिर नियत समय पर अनिल और ज्योति ले आये रश्मि को, रास्ते भर सर झुकाये बैठी रही रश्मि, कोई विरोध नहीं किया उसने!

मैं सीधा उसको ले गया क्रिया-स्थल में और उसके हाथ पाँव बांध दिए, कि कम से कम वो खुद अपनी ही देह को नुक्सान न पहुंचा सके!

अब मैंने प्रेत-विद्या आरम्भ की!

पढ़ी हुई काली मिर्च मैंने रश्मि के ऊपर फेंकी! कसमसाई वो बुरी तरह से, ऐसे जैसे उसका दम घुट रहा हो, ऐसी आवाज़ें जैसे किसी बहुत गरम वस्तु को छू लिया हो उसने!

अब उसमे मौजूद प्रेतात्माओं को निकालने का समय था!

मैंने प्रत्यक्ष-मंत्र लड़ाया!

अब उसने चीखें मारनी आरम्भ की! और फिर एक दम से शांत हो कर ढुलक गयी!

"कौन है?", मैंने पूछा,

"शोभा" उसने कहा,

"कौन शोभा?" मैंने गुस्से से पूछा,

एक और भटकती हुई आत्मा! ये दिल्ली की ही थी! चार बरस पहले गुजरी थी एक सड़क हादसे में!

"चल निकल बाहर!" मैंने कहा,

अब चुप!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"नहीं निकलेगी?" मैंने कहा,

"नहीं" उसने कहा,

अब मैंने अपना त्रिशूल लिया और मन्त्र पढ़ते हुए उसको छुआ दिया! भयानक आवाज़ की उसने और रश्मि ने मुंह फाड़ा! शोभा भागी वहाँ से!

फिर से ढुलक गयी वो!

"कौन?" मैंने कहा,

"सीमा" उसने कहा,

"कौन सीमा?" मैंने पूछा,

उसने बता दिया, आत्महत्या की थी इसने, रहने वाली मथुरा की थी!

"चल, भाग यहाँ से?" मैंने कहा,

और वो फुर्र!

कोई विरोध नहीं किया उसने!

अब फिर से ढुलकी वो!

मुंह से खांसने की आवाज़ करते हुए!

"कौन?" मैंने पूछा,

"तेरा बाप" वो बोली,

"तेरी ये मजाल?" मैंने धमकाया और त्रिशूल छुआ दिया!

"अरे मार डाला! मार डाला! बचा ले मुझे, अरे मैं जल गया!" वो बोली,

"कौन है बद्तमीज़ तू?" मैंने पूछा,

"धनी राम, अरे मर गया मैं!" वो कराहा!

"कहाँ से आया?" मैंने पूछा,

"आया नहीं भेजा गया" उसने कुबूला!


   
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"किसने भेजा?" मैंने पूछा,

"बाबा नौबत ने" उसने कहा,

"बाबा नौबत?" मैंने पूछा,

"हाँ" वो बोला,

"हरामज़ादे झूठ बोलता है, सच बता?" मैंने कहा, धमका कर!

"सच बोल रहा हूँ" उसने कहा,

"कौन है ये नौबत बाबा?" मैंने पूछा,

चुप!

हंसने लगी रश्मि!

मैंने फिर से त्रिशूल छुआ दिया उसको!

"अरे जल गया मैं! मुझे बचाओ!" वो चिल्लाया!

"जल्दी बता?" मैंने पूछा,

अब वो कुबूले ही नहीं!

"तू ऐसे नहीं मानेगा! रुक जा!" मैंने कहा,

"कुछ भी कर ले बेटा!" उसने कहा,

बड़ा ही हठी!

"अच्छा, और कितने हो यहाँ?" मैंने पूछा,

"क्यों बताऊँ?" उसने कहा!

"देख धनी राम, ऐसी मार पड़ेगी, कि साले छिपने की जगह भी नहीं मिलेगी!" मैंने कहा,

"क्या करेगा?" उसने कहा,

अब बहुत हुआ!

मैंने अब रुक्का पढ़ दिया इबु का!


   
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और इबु हाज़िर वहाँ!

 

अब इबु के हाथ में मैंने बागडोर सौंपी! इबु के नथुने फड़के! और उसके गुस्से और ताक़त के दबाव एक एक करके सारे प्रेत वहाँ आ खड़े हुए! कुल सात थे! पांच भंवरी थे, अर्थात घुमक्क्ड़ और दो बाबा फक्कड़ के थे! धनी राम जो झूठ बोल रहा था बाबा नौबत के बारे में अब मारे भय के, सिरे से सारी बात बकने लगा था! मैंने इबु को शुक्रिया कहा और वो वापिस हुआ!

"हाँ रे धनी राम?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वो बोला,

"कहाँ का है तू?" मैंने पूछा,

"मादीपुर" उसने कहा,

"कबसे है तू इस पर?" मैंने पूछा,

"साल भर से" उसने बताया,

"फक्कड़ के कहने पे?" मैंने पूछा,

"हाँ जी मालिक के कहने पर" वो बोला,

"किसलिए?" मैंने पूछा,

"इसका आदमी है न? वो बहुत कमीन इंसान है" वो बोला,

"ज़मीन का काम करता है न, उसने फक्कड़ की ज़मीन छीन ली" वो बोला,

"फक्कड़ की ज़मीन?" मैंने पूछा,

"हाँ जी, मालिक की ज़मीन" वो बोला,

"कैसे?" मैंने पूछा,

"फक्कड़ की ज़मीन थी, उसने हथिया ली" वो बोला,

"अच्छा! तो फक्कड़ ने उस से बदला लेने के लिए इस मासूम को चुना! एक बात तो बता?

उसने दिलीप को क्यों नहीं चुना?" मैंने पूछा,


   
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"वो नहीं पता" उसने कहा,

"ठीक है, चल अब, जा और जा के बता फक्कड़ को कि वो पकड़ा गया है और मैं आ रहा हूँ उसके पास" मैंने कहा,

"जी, कह दूंगा" उसने कहा और अपने दूसरे साथी जिसकी घिग्गी बंधी हुई थी, उको भी सात ले गया!

अब बात समझ में आ गयी! लेकिन फक्कड़ ने दिलीप को क्यों छोड़ा? इस बेचारी को क्यों तंग किया, इसका कुसूर तो क़तई नहीं था? फिर? अब इसका एक ही आदमी जवाब दे सकता था और वो था खुद फक्कड़!

बेहोश हो गयी थी रश्मि!

मैंने उसके हाथ-पाँव खोले और उसको वहीँ लिटा दिया! अब पहुंचा अनिल और ज्योति के पास, उनको सारी बात बतायी, उनके भी होश उड़े!

"इसको अपने घर ही रखना, जब तक मैं न कहौं, हाँ, ठीक ये आज से ही होने लगेगी" मैंने कहा,

"जी ज़रूर" ज्योति ने कहा,

"अनिल जी, अब आप मदद कीजिये मेरी, देखिये, रश्मि को तो मैंने बचा लिया, लेकिन अन ये बाबा फक्कड़ सीधा वार करेगा दिलीप पर, और कुछ भी हो सकता है, आप मिलये उनसे और मुझे भी मिलवाइए" मैंने कहा,

अब परिस्थिति बदल गयी थी, अनिल साहब ने पूरा आश्वासन दिया कि वो भरसक प्रयत्न करेंगे दिलीप को मुझसे मिलवाने का!

अब वे रश्मि को लेकर चले गए, और अब रह गए मैं और शर्मा जी वहाँ, तभी शर्मा जी ने मुझसे पूछा, मैं सारी बात से अवगत करा चुका था उन्हें,

"क्या चाहता है फक्कड़?" उन्होंने पूछा,

"पता नहीं, बड़ा अजीब सा आदमी लगता है, बदला जिस से लेना है उससे सीधा टकराया नहीं, बल्कि उसकी मासूम पत्नी को शिकार बनाया, पता नहीं क्या चाहता है?'' मैंने भी कहा,

"हाँ, अजीब सी बात है" वे बोले,

"हाँ है तो पक्का" मैंने कहा,


   
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