सर झुकाएं पीछे, काटने की धमकी दें! अब कुछ विकल्प शेष नहीं बचा था मेरे पास! मैंने तब, वो मिट्टी फेंक मारी साँपों पर! हवा में उछल गए वे! बहुत सारे!
और हम भागे अब पीछे! रुके एक जगह, पीछे देखा, तो कुछ नहीं! "इधर है कुछ न कुछ!" कहा मैंने, "हाँ! तभी तो रक्षा कर रहे हैं ये!" बोले शर्मा जी,
आसपास नज़र डाली मैंने, "वो, वहाँ से चलें?" कहा मैंने, "चलो!" बोली कौशकि!
और अब चल पड़े हम दूसरी तरफ! वहां से रास्ता बनाया, और अचानक रुके! सामने सर्प थे! धूप का आनंद ले रहे थे! रास्ता बदला अपना, आगे चले,
एक बड़ा सा गड्ढा दिखा, गड्ढे में पानी खड़ा था काफी! शायद बाढ़ के बाद बन गया हो ये गड्ढा!
और ये बाढ़ का ही पानी हो! "यहां से आओ" कहा मैंने,
और हम चले वहाँ से, एक टीला दिखा, चढ़े उस पर, तो एक जगह, एक गड्ढा दिखा, ये था तो काफी बड़ा, लेकिन सूखा था, "वहाँ चलो" कहा मैंने,
और हम चले वहाँ! कौशुकि मेरे पीछे ही थी! तभी फिर से फुकार की आवाज़ आई! रुके हम! ध्यान दिया! ये दायें से आ रही थी! दायें चले, सम्भल कर, धीरे धीरे!
और जब पहुंचे, तो एक और विशाल सर्प! ये नाग था! कुंडली मारे बैठा था, उसने देख लिया था हमें! मैंने झट से सर्प-भंजिनी विद्या का संधान किया,
और उठा ली मिट्टी! वो सर्प कुंडली खोल ऐसे दौड़ा हमारी तरफ, कि जैसे, उसके शत्रु आ गए हों वहाँ! वो आ रहा था दौड़ा दौड़ा, मैंने मिट्टी छिड़क दी सामने! वो आया, और झट से रुका! एक एक करके सभी को देखे वो! ये एक विशेष सा सर्प था! उसका गौ-चरण, अलग ही था, ऐसा था, जैसे पद्म-नाग में होता है, वलय बना था, एक गोल सा छल्ला था वो चिन्ह! मैंने ऐसा नही देखा था पहले कभी! उसकी आँखें लाल-संतरी थीं, गोल-गोल और चमकदार! जिव्हा ऐसी लम्बी कि जैसे कपड़े की दो कतरनें लटकी हों! मुंह में झाग बन रहा था, टपक रहा था
नीचे! ये विष था उसका! कालकूट! व्यक्ति विष से तो बाद में मरे, पहले उसे देखते ही हृदयाघात से मर जाए! कम से कम बीस फ़ीट का रहा होगा! फुफकार ऐसी कि सनने वाला खड़ा ही न हो सके! गजराज भी भाग छूटें उसको देखते ही! वो हमें देख रहा था, कभी मुझे, कभी कौशुकि को और कभी शर्मा जी को! उसने एक ज़ोरदार फुकार भरी! धमकाया हमें! और हम, वहीं खड़े रहे! कौशुकि को मैंने पीछे कर लिया था, शर्मा जी संग खड़े थे मेरे! अब कोई विकल्प नहीं था हमारे पास! अब वो ही हटता तो कुछ बनता, न वो हट रहा था, न हमें हटने दे रहा था! इसीलिए, मैंने हाथ किया आगे, और विदया से पोषित वो मिट्टी, फेंक मारी उस पर! उसने छलांग मारी मिट्टी पड़ते ही! जा गिरा पीछे, और लपक कर, एक गड्ढे में घुस गया। अब हमारा रास्ता साफ़ हुआ! कौशिक को पकड़, आगे किया, और चले फिर ठीक सामने, वहाँ पर गड्ढे बहुत थे, अब कौन सा गड्ढा मुहाना था, कौन सा नहीं, इसमें समस्या थी! इस बार मैं खूब जांच लेना चाहता था! इसके लिए, मैंने बाबा ऋद्धा की बतायी हुई उरुक्ष-विद्या प्रयोग की! मिट्टी ली, उसको अभिमंत्रित किया, और एक एक चुटकी, उन गड्ढों पर डालता गया,
दो गड्ढों पर, चटक-चटक की आवाज़ हुई! लेकिन वो गड्ढे छोटे थे, कोई चार गुणा चार फ़ीट के, वे मुहाने नहीं हो सकते थे, और जो आवाज़ आती थी चटक-चटक की, वो विद्या के विरोध की आवाज़ आती थी! मुहाना अभी भी दूर था हमसे! अब उसको
ढूंढना ही था! हमने अब और तलाश की, और इस तलाशी में, करीब आधा किलोमीटर दूर तक चले गए थे हम कुछ न मिला! फिर से दिशा बदली, और फिर से तलाश किया, एक जगह, शर्मा जी को कुछ सुनाई दिया! उन्होंने रोका हमें, ये फुकार थी, किसी सर्प की, अब तलाश की, तो देखा, एक नाग था वहां, आम सा सर्प! बात नहीं बन रही थी! अब कुछ करना ही था, मैंने एक जगह एक छोटा सा सूराख़ किया ज़मीन में, उसमे थूक भरा, और सुतक्षा-विद्या का संधान किया! जैसे ही ढका उसको, सर में पीड़ा उठी! उठा, और देखा आसपास, एक जगह मरीचिका दिखी! उस सूराख को पाँव से हटा दिया, तो पीड़ा समाप्त हुई! और हम चल पड़े उधर! वहां पहुंचे, और जब पहंचे! "श्वेत सर्प!" बोली कौशुकि! "हाँ! ये है मुहाना!" कहा मैंने, वे शत सर्प थे! करीब दस दस फ़ीट के, कुल आठ थे। सर पर, लाल निशान बना था, बीच में, लाल सीरेखा थी, और पूंछ लाल थी! ये थे पाताली-सर्प! अब जाकर, पता
चला था उनका! हम जिस जगह थे, वहां पत्थर थे बड़े बड़े, उनके बीच में से रास्ता था उस स्थान का, उन्हीं पत्थरों के बीच में एक जगह एक गड्ढा था, वहाँ, सफेद रंग के कौन्दूल पुष्प लगे थे। इन पुष्पों में, बीच में से एक लम्बी सी फुनगी निकलती है, लाल रंग की, जैसे गुड़हल के फूल में से निकलती है, पत्ते गहरे हरे होते हैं इसके! जंगली फूल है, जंगल में ही मिलता है, घर में लगाया जाए तो फूल का आकार छोटा हो जाता है, शायद नमी के कारण ऐसा होता है! वे बहुत सारे लगे थे वहाँ! आसपास, दूसरे छोटे लाल रंग के फूल लगे थे, गुच्छों में, जैसे पत्थरचट पौधे के होते हैं। स्थान तो बहुत सुंदर था, हल्की हरी दूब घास लगी थी, करीब एक फुट की! ये जगह, दूसरी जगह से अलग ही थी! "कौशकि! यही है वो स्थान!" कहा मैंने, "हाँ, लग गया पता!" बोली वो,
जहां हम थे, वहाँ से हमारे तम्बू करीब आधा किलोमीटर दूर थे, अब वापिस जाना था, बाबा को लेकर आना था, फिर वही बताते कि आगे करना क्या था, मैं तो उसी समय ये सब करना चाहता था, लेकिन कौशुकि ने मना किया था! तो हम वापिस हुए, पहुंचे वहाँ, और बाबा को सब बता दिया! बाबा प्रसन्न हुए, कि सोलह दिनों के बाद, चलो अब पक्का स्थान पता चला! वे हए तैयार, लिया अपना सारा सामान, कौशुकि ने भी अपना सारा सामान ले लिया था, और हम, सब, चले अब उस स्थान के लिए! श्रीचंद वहीं रह गया था अकेला, सामान रखा था वहाँ, जाने से पहले, दोदो कचौरियां खिला दी थीं उसने, उड़द की दाल की!
और हम जा पहुंचे उधर! बाबा ने जगह देखी, और हुए प्रसन्न! मैं और शर्मा जी, एक अलग जगह जाकर बैठ गए थे! बाबा ने कौशुकि को ही अवसर दिया पहले! कौशुकि ने वेदिका सुलगाई! उसने सामग्री डाली और आरम्भ किया पूजन! आधे घंटे में ही, भूमि में से आवाजें आने लगी! जैसे नीचे, खुदाई सी चल रही हो! अब तक पांच बज चके थे! हम टकटकी लगाये वहीं देखते रहे! करीब एक घंटे के बाद, उस स्थान में हलचल आरम्भ हुई! वहाँ के पौधे, हवा में झूम उठे।
हवा तेज हो चली थी बहुत! धूल उड़ने लगी थी, मैं और शर्मा जी, एक बड़े से पत्थर की आड़ ले, बैठ गए थे।
वेदिका का शमन हो चला था, हवा ने टिकने ही न दिया था उसे! तभी! वो ज़मीन, आगे, हमारे सामान्य, फट पड़ी! एक बड़ा सा गड्ढा बन गया था उधर! पीले रंग का धुंआ उठ रहा था उसमे से! एक बात और, चमकीले से पत्थर निकलने लगे थे। गंधक के रंग जैसे पत्थर! चमक रहे थे, जैसे कि हीरा हों सभी! "वो हीरे हैं क्या?" पूछा शर्मा जी ने, "नहीं! गंधक-लवण है!" कहा मैंने, "चमचमा तो ऐसे ही रहे हैं!" बोले वो, "ये कैलसाइट पत्थर है, ऐसा ही चमकता है!" कहा मैंने, एक अजीब सी गंध उठ रही थी वहाँ! "ये खट्टी सी सुगंध क्या है?" पूछा उन्होंने, "फेल्सपार गैस है, अक्सर इसी से पत्थर बनते हैं!" कहा मैंने, "ज़हरीली है?" बोले वो, "हाँ, लेकिन यहां खुला है, उड़ जायेगी!" कहा मैंने, खट्टे तेज़ाब की सी गंध थी वो! खड़ी हुई कौशुकि! बढ़ी आगे उस स्थान तक, और एक अभिमंत्रित तेल डाल दिया उस जगह! तेल गिरा, तो आग लग गयी फौरन ही उसमे! कौशुकि ने मंत्र पढ़े,
और जैसे ही मंत्र समाप्त होते, वो हवा में उठी! हम हए खड़े! हवा मैं उठी और धड़ाम! धड़ाम से नीचे गिरी! बाबा उठ भागे उसको पकड़ने! जैसे ही पहुंचे, उनको जैसे धक्का दिया किसी ने,
गिर पड़े नीचे, कौशुकि को कोई खींच रहा था उस गड्ढे में ले जाने के लिए! वो चिल्ला रही थी, ढूंढ रही थी हमें! मैं भागा उधर, ख्वंच-विद्या का जाप करते हुए! कौशुकि के कपड़े, उसके शरीर से खुलने लगे थे, जांचें नज़र आने लगी थीं, कंधों से वस्त्र हट गए थे, धूल-धक्क्ड़ मची हुई थी!
मैं आया, और उसका हाथ पकड़ा, खींचा उसको अपनी तरफ! लेकिन मैं भी साथ में खींचने लगा उसके! मेरे जूते पकड़ न बनाएं! फिसल जाएँ! आखिर मुझे बैठना पड़ा घुटनों पर, अब उसके कपड़े खिंच गए थे, अंतःवस्त्र ही शेष थे, मैंने तब, एवांग-मंत्र ज़ोर ज़ोर से पढ़ा! जैसे ही पढ़ा, धूल-धक्कड़ बंद हआ! और उसको खींचने वाली शक्ति, जैसे भाग छूटी! मैंने कौशुकि को खड़ा किया, वो डर गयी थी बहुत! कांपने लगी थी, मैंने उसके ऊपरी वस्त्र उठाये, और ढक दिया, "जाओ! उधर जाओ!" कहा मैंने, वो भागी उधर, मैं चला बाबा के पास, बाबा की पसली टूट गयी थी, वो दर्द के मारे कराह रहे थे! सहायक, डर के मारे, वहीं के वहीं जम गए थे! "इधर आओ?" चिल्लाया मैं, वे नहीं आये! हाँ, शर्मा जी दौड़े दौड़े आये, उन्होंने और मैंने, उठाया बाबा को, बाबा को दर्द के मारे बेहोशी आने लगी थी! बार बार गरदन झूल जाती थी उनकी! शर्मा जी ने उन सहायकों को ज़रा भारी-भरकम गालियां दीं,
उनकी जैसे तन्द्रा टूटी! वे आगे भागे भागे!
और बाबा को पकड़, ले चले सहारा देकर! हम आये कौशुकि के पास उस समय,
वो डरी हुई थी! "कौशुकि?" बोला मैं, न बोली कुछ, कंपकंपी के झटके लेने लगी थी! "अब ठीक हो?" पूछा मैंने, सर हिला, हाँ कही! "अब तुम जाओ कौशुकि, वहीं रहो!" बोला मैं, मैंने हाथ पकड़ा उसका, और जाने लगा, न हिली! मना कर दिया जाने से! "जाओ?" कहा मैंने, "नहीं" बोली वो, "अभी देखा न?" बोला मैं, "हाँ, नहीं जाउंगी" बोली वो, "ये कैसी ज़िद?" पूछा मैंने,
"मैं यहीं रहूंगी" बोली वो, "यहां प्राण-संकट है!" कहा मैंने, "कोई बात नहीं" बोली वो, "नहीं कौशुकि, जाना होगा" कहा मैंने, "नहीं!" बोली वो,
और चल पड़ी, उस गड्ढे की तरफ! मैं भागा उसके पीछे, रोका उसे, ज़िद की उसने, छुड़ा लिया हाथ अपना!
और जा खड़ी हुई गड्ढे पर, एक हाथ ऊपर किया,
मंत्र पढ़ा,
और दूसरे ही पल..... ज़िद पर अड़ी थी, नहीं मानी! अभी गड्ढे में खिंचने से बची थी, फिर भी नहीं मानी! मुझे अब गौंच की कम, उसकी ज़्यादा चिंता होने लगी थी! दरअसल, मैं उसकी विद्याओं को जानता भी नहीं था, नहीं तो देख लेता कि कौन सी विद्या उचित है और कौन सी नहीं! वो गड्ढे पर हुई खड़ी, हाथ किया ऊपर, और फिर बैठ गयी नीचे! मिट्टी उठायी, मुट्ठी में बंद की, मंत्र पढ़ा और छोड़ दी मिट्टी वहीं! ज़मीन के नीचे जैसे कोई इंजन सा चला! वो उठी और आई हमारे पास, खड़ी हुई, और देखने लगी गड्ढे को! हम भी देख रहे थे! मिट्टी बाहर निकलने लगी। वहीं गंधक सी बाहर आई, चमकदार पत्थर से बार निकले! और एक ज़ोरदार सा धमाका हुआ, मिट्टी झटके से बाहर निकली! वो गंधक सी, हवा में उछल पड़ी कई मीटर तक! टुकड़े हमारे ऊपर ही आये! हमने सर झुका लिया था अपना तब! कमर पर गिरे वो टुकड़े! गर्म थे, हटाने पड़ते थे! अब तक इस प्रकरण में, पांच लोग घायल हो चुके थे। अब हम तीन और वो दो सहायक शेष था, एक श्रीचंद, खैर, वो तो आता ही नहीं था ऐसी जगह, वो अलग ही रहा करता था! टुकड़े गिरने बंद हुए तो हमने देखा उधर, पीली गंधक बिखरी पड़ी थी हर जगह! ये गंधक जैसी लगती थी, इसीलिए गंधक कह रहा हूँ उसे, पीली थी, चमकदार! अब चली कौशुकि उधर, हम भी चले उसके साथ, उस गड्ढे में एक और नया गड्ढा बन गया था, पूरा गड्ढा ही पीला था!
और नीचे एक मार्ग था, एक चौड़ा सा मार्ग! उस मार्ग में, इक्का-दुक्का सर्प कभी-कभार गुजरते थे, वो भी पीले रंग के ही! "क्या यही स्थान है वो?" पूछा शर्मा जी ने, "हाँ!" कहा मैंने, "लेकिन ये तो करीब आठ फ़ीट गहरा होगा?" बोले वो, "हाँ, इतना तो है" बोला मैं, "आप पीछे हटो! कहा कौशुकि ने,
और हम हटे पीछे, उसने अपने थैले में से, कुछ सामग्री निकाली, अभिमंत्रण किया उसका, और फेंक दी गड्ढे में! भक्क की सी आवाज़ हुई! नीचे से फुकार ही फुकार गूंजी!
और तब एक बड़ा, विशाल सा पीले रंग का भुजंग उस गड्ढे के नीचे दिखा! बिलकुल पीला! आँखें काली थीं उसकी! बीच में से लाल रंग की, ये सर्प आम सर्प नहीं था!
ये कोई विशिष्ट सर्प था! वो उठा ऊपर,आया करीब चार फ़ीट तक, जीभ लपलपाई उसने! मुंह खोला अपना, दांतों की कई कतारें दिखाई दे गयीं! जैसे अजगर के मुंह में होती हैं, अंदर मुड़े हुए आरी जैसे दांत! उसकी श्वास-नलिका भी काफी बड़ी थी, करीब छह इंच चौड़ी! देखने में ही तक्षक स्वरुप लगता था वो सर्प उसने वहीं से, छोड़ी फुकार! विष की बूंदें, उठीं उस फुकार में, उस फुकार में बहुत ताप था! वो बूंदें जहां गिरी थीं, वो जगह ही काली पड़ गयी थी! कौशुकि
ने, एक बार और सामग्री ली, और फेंकी उस सर्प पर! आश्चर्य! उसे कुछ न हुआ! वो जस का तस ही रहा! अब ज़रा सकपकाई कौशुकि! लेकिन फिर भी न हटी! एक मनका निकाला उसने, मंत्र पढ़ा और फेंका उस सर्प पर, कोई असर नहीं हुआ! मनका उसके फन से टकराता हुआ, नीचे गिर गया! अब मामला गंभीर था! मैंने तभी सर्प-नाशिनी विद्या का संधान किया, उठायी मिट्टी, और इस से पहले मैं उसको फेंकू, वो सर्प आगे बढ़ा, ऊपर उठा एक झटके से, और आ गया ऊपर, हम तीनों ने झटका खाया, और गिर पड़े नीचे!
मेरे हाथ में मिट्टी थी, मैंने लेटे लेटे ही, वो मिट्टी फेंक दी उसके ऊपर! रक्त बह चला उसके शरीर से! उसने सर लहराया अपना,
और चला नीचे, एक झटके में ही, फन सिकोड़, नीचे चला गया था! अब तक हम उठ चुके थे, कपड़े झाड़े अपने, "यहां ऐसे काम नहीं बनेगा!"कहा मैंने, "फिर?" बोले शर्मा जी, "सर्प-मालिनि क्रिया करनी होगी!" कहा मैंने, "उस से क्या लाभ?" पूछा कौशुकि ने, "ये जहां भी हैं, खिंचे चले आएंगे!" कहा मैंने, "कब करनी है?" बोले वो, "कल सुबह, अब समय हो चला है!" कहा मैंने, "ठीक है" बोली कौशुकि,
और हम तीनों, अब चल पड़े वापिस, वहाँ आए, तो बाबा कराह रहे थे, उस्नको अस्पताल ले जाना ज़रूरी था, अतः, श्रीचंद को कहकर, हम अस्पताल के लिए निकल पड़े, दो घंटे में अस्पताल पहुंचे, बाबा का इलाज करवाया, उनको पट्टियां बाँध दी गयी थीं, दर्द-निवारक औषधि दे दी गयीं थीं, उनको अब नींद आने लगी थी, उनको गाड़ी में लिटाया,
और चले वापिस, उनके स्थान चले, उतारा उनको, और फिर उनके कक्ष में लिटा दिया उन्हें, हम भी अपने कक्ष में ही चले, आराम किया, रणनीति बनाई कल की, तभी कौशुकि आई हमारे पास, "बैठी" कहा मैंने,
वो बैठ गयी, "कुछ पूछना है" बोली वो, "पूछो?" कहा मैंने, "क्या मैं बैठ सकती हूँ क्रिया में?" पूछा उसने, "हाँ, क्यों नहीं?" कहा मैंने, "कोई प्रतिबंध?" पूछा उसने,
"हाँ, तुम कुछ नहीं करोगी" कहा मैंने, "उचित है" बोली वो, "ठीक है" कहा मैंने, "और आपका धन्यवाद, मुझे बचाने के लिए" बोली वो, "इसमें धन्यवाद कैसा?" पूछा मैंने, "आप समझते हैं" बोली वो, "जाने दो!" कहा मैंने, फिर वो उठी, और चली गयी वापिस, "है तो ज़िद्दी!" बोले शर्मा जी, "हाँ!" कहा मैंने, "कहीं गड़बड़ न कर दे?" बोले वो, "नहीं!" कहा मैंने, "खैर, नज़र रखेंगे इस पर" बोले वो, "हाँ!" बोला मैं, शाम हो ही चुकी थी, श्रीचंद ने जुगाड़ कर ही दिया था, अब आराम से अपन कार्यक्रम सम्पन्न किया! रात्रि में भोजन किया, तदोपरांत, सो गए, सुबह, स्नान-ध्यान से निवृत हुए, चाय-नाश्ता किया, दस बजे ही भोजन कर लिया था,
और उसके बाद, हम तीन, दो सहायक और श्रीचंद चल पड़े, वहाँ पहुंचे, तम्बू लगवाये गए, सामान रात में ही इकट्ठा कर लिया था, बस अब देर थी तो क्रिया आरम्भ करने की, मैंने एक जगह चुनी, उसको साफ़ किया, उधर एक घेरा काढ़ा, मन्त्रों से पोषित किया उसको, देह-रक्षण, प्राण-रक्षण से पोषित कर डाला,
और एक अलख का निर्माण किया,
बाबा का त्रिशूल ले आया था मैं, और दो मीटर काला कपड़ा भी! कुछ सामग्री, और शराब भी, उस घेरे में, मैंने सबसे पहले प्रवेश किया, फिर कौशुकि ने,
और फिर शर्मा जी ने, उनको अपने दायें-बाएं बिठा दिया! स्थान-पूजन किया, गुरु-नमन किया,
औघड़ाधीश को नमन किया! नागराज वासुकि का ध्यान किया! उनसे क्षमा-प्रार्थना भी की,
और फिर, एक महानाद करते हुए, अलख उठा दी! अलख ने ज़ोर पकड़ा! ईंधन झोंका मैंने,
और अब आरम्भ की सर्प-मालिनि क्रिया! इस क्रिया से, सर्प जहां भी हों, खिंचे चले आते हैं, विवश होकर!
उनको मंत्रों से बींधा जाता है! इन्हे बाण कहते हैं! मैंने अब, ईंधन झोंकते हुए, महानाद करते हुए, अलख की एक परिक्रमा करते हुए, गाड़ दिया वो त्रिशूल भूमि में!
और अब पढ़े महामंत्र! और अब जैसे जैसे क्रिया बढ़ी, वैसे वैसे माहौल में तनाव आता चला गया! एक घंटे में, वहाँ सर्प एकत्रित होने लगे! भिन्न भिन्न प्रजाति के सर्प! सर्प-मालिनि खींच ला रही थी उन्हें! वे आ रहे थे खिंचे हए। ये क्रिया-प्रभाव था। कौशुकि हैरान थी ये सब देखकर!
विष-हरण क्रिया में भी सर्प-मालिनि का संधान हुआ करता है! जब वहाँ सैंकड़ों सर्प एकत्रित हो गए, तो तब मैंने, उस घेरे से बाहर, अपना त्रिशूल छुआ दिया! हवा की तरह से उड़ चले, कलाबाजी खाते हए! उनको प्रभावहीन कर दिया था, मझे उन सौ से कुछ लेना देना नहीं था! मुझे उन विशिष्ट सर्पो से लेना-देना था! क्रिया आगे बढ़ी,
और इस बार, विशाल देहधारी सर्प खिंचे चले आये थे वहाँ! कोई बीस फ़ीट लम्बा, कोई पच्चीस फीट लम्बा! शल्क ऐसे चमकें उनके जैसे कांच के टुकड़े हों वे! वे करीब बीस सर्प थे! ऐसे ऐसे सर्प कि कोई देख ले तो पत्थर बन जाए! न सांस लेते बने और न
छोड़ते बने! वे आ गए थे रगड़ते रगड़ते हमारे पास तक! फुफकारते हुए! मुंह खोले हुए! उनके दांत, मेरे हाथ के अंगूठों से भी मोटे थे! इंसान को तो उठा ही लें अपने मुंह में! विष तो विष, उनके दांतों के घाव ही आंतें फाड़ देते! कौशुकि उनको देख घबराई, और हुई मेरे पास, सरक आई थी! "नहीं इरो! ये घेरा नहीं तोड़ सकते!" कहा मैंने, वे मारते रहे फुफकार! गुस्से में, मिट्टी में फुकार मार, धूल उड़ाते रहे। वे प्रथम पंक्ति के रक्षक रहे होंगे! इनसे भी लाभ नहीं था, लेकिन उस द्रौंच तक तो संदेसा भिजवाना ही था! तब मैंने, त्रिशूल को अलख पर रखा, गरम किया, एक मंत्र बोला, और घेरे से बाहर छुआ दिया! त्रिशूल के छूते ही, वे हवा में उठ गए!
और जा फिके दूर जाकर! फिर नहीं लौटे!भाग गए थे! मैंने अलख में ईंधन झोंका! अलल-भुजबंधधारी का जपा मंत्र!
और झोंका अलख में ईंधन! कर्तरि-महाविद्या चल पड़ी आगे! और आसपास जैसे मची भगदड़ सी! हमारे चारों तरफ फुकार ही फुकार!
ये पीले सर्प थे। पीले, रक्षक सर्प! ये दवितीय पंक्ति के रक्षक थे! हमें चारों ओर से घेरा था उन्होंने, उनके मुखों से, विष-लार टपक रही थी।
झाग उठ रहे थे। उनका पीला रंग, चमक रहा था! वे घेरे के पास तक चले आये थे! घेरा न होता तो, हमारा तो जीवन वहीं पूर्ण कर दिया होता उन्होंने! दंत-कतार दिख रही थीं। दांत भी चमक
रहे थे सफेद रंग के! अंदर को मुड़े हए दांत! जैसे ही कोई अंदर आने का प्रयास करता, झटका खा, पीछे फिंक जाता! मैंने फिर से त्रिशूल उठाया, अलख पर रखा, मंत्र पढ़ा, और छुआ दिया घेरे से बाहर! ढाप! ढाप! ढाप! उछले और गिरे नीचे! भाग निकले उसके बाद! फिर नहीं लौटे! कौशुकि, उन सो को नहीं, मुझे देख रही थी! मेरी निगाह पड़ी उस पर, देखा तो मुझे आश्चर्य से देख रही थी वो! "ठीक हो?" पूछा मैंने, उसने गरदन हिला कर हाँ कहा, मैंने उसको उसके घुटने से पकड़ कर, और किया अपने पास, "अपना वस्त्र भी घेरे के बाहर न डालना तुम!" कहा मैंने, उसने फिर से गरदन हिला, हाँ कही! "शर्मा जी?" बोला मैं, "हाँ?" बोले वो, "आप ठीक हो?" पूछा मैंने, "हाँ, बिलकुल!" कहा उन्होंने, अब मैं खड़ा हुआ, लिया त्रिशूल, "घेरे में ही रहना, बाहर नहीं निकलना!" बोला मैंने, ताकीद की!
और खुद निकल आया घेरे से बाहर, थोड़ा दूर तक गया! त्रिशूल भूमि से छुआ कर, एक रेखा खींच ली मैंने अपने यहां तक! "ये किसलिए?" पूछा कौशुकि ने! "देखती जाओ!" कहा मैंने, मैंने झोंका अलख में ईंधन! कर्तरि महाविद्या का जाप किया!
अलख की भस्म माथे से लगाई!
और पढ़ा महामंत्र एक! खच-खच सी आवाजें आने लगी भूमि के नीचे से!
और तब, मैंने त्रिशूल को, मंत्र पढ़ते हुए, गाड़ दिया! ठीक सामने से, दो बड़े बड़े सर्प खिंचे चले आ रहे थे! ये वरिष्ठ सर्प थे! बुजुर्ग! मैं कष्ट नहीं देना चाहता था उन्हें, परन्तु विवश था, क्रिया का हिस्सा था ये सब! वे चले आये खिंचे हुए! सफ़ेद दाढ़ी, करीब चार चार फ़ीट लम्बी! भौहें, दाढ़ी में मिल गयी थीं! बदन भारी था उनका,
आधा काला, और आधा लाल! गले पर, वलय बना था पीले रंग का! फन बहुत चौड़े थे उनके! ये रक्षापंक्ति में न थे, ये यूँ कहें कि अधिकारीगण थे उन द्रौंच के! वे अपनी आँखों से, आँखें फैलाकर, मेरी अलख को घूर रहे थे! मैंने जैसे ही ईधन झोंकता, वे डर जाते, सहम जाते, पीछे हटते! मुझे दया आई उन पर, उनकी इस दशा पर! मैं खड़ा हुआ, और दोनों हाथ जोड़ लिए। कौशुकि ने भी और शर्मा जी ने भी जोड़ लिए! मैं घेरे से बाहर चला आया, त्रिशूल भी नहीं पकड़ा था, "हे नाग-वल्ल्भ! क्षमा करें!" कहा मैंने, दोनों ने फन ताने अपने! सर उठाया अपना!
और आगे चले दोनों! कौशुकि चीखी! बुरी तरह से!
बुलाती रही मुझे! मैंने इस कान सुन, उस कान निकाल दिया!
और तभी मेरी भुजा पकड़ी किसी ने! सीधी भुजा, ये कौशुकि थी! एक आगे बढ़ा! और अपना फन, मेरे सर के पास लाया! उसकी जिव्हा मेरे गाल से छू गयी! उसने फुफकार छोड़ी तभी! आँखें बंद हो गयी मेरी और कौशुकि की! "हे नाग-वल्ल्भ ! क्षमा!" कहा मैंने, अब उसने फन बंद किया अपना, और मेरे और कौशुकि के बीच से, गुजरता चला गया! मुड़ा, जैसे हमें कुंडली में जकड़ना चाहता हो वो! "क्षमा! क्षमा हे नाग-वल्ल्भ!" कहा मैंने, वो रुका, आया फिर से ठीक सामने, कौशुकि को देखा, उसके करीब मुंह लाया अपना, उसकी भौंह सर से टकराई कौशुकि के! फिर पीछे हो गया,
और जाने लगा पीछे! कुछ अहित नहीं किया उसने हमारा! हम सर्पहन्ता नहीं थे, न पकड़ कर, कैद ही कर रहे थे। हम तो मात्र गौंच-दर्शन हेतु आये थे! बस यही उद्देश्य था हमारा, और कुछ नहीं! फिर से दोनों पलटे,
और चल पड़े वापिस! अब मैंने कौशुकि को देखा, आँखों में मोटे मोटे आंसू ले आई थी!
"तुमसे मना किया था न मैंने?" कहा मैंने, "वो अहित करते तो?" बोली वो,
आंसू पोछते हुए! "नहीं करते! अब किया क्या?" पूछा मैंने, अब चुप! देखे जाए! "अब चलो,और अब नहीं करना ऐसा!" कहा मैंने, वो चली,
और जैसे ही चली, मैंने रोक लिया उसको, "एक मिनट?" बोला मैं, वो रुक गयी, उसके दायें कान के पास के केश, सफेद हो गए थे! शायद, उस सर्प की लार लगी थी उधर, "क्या हुआ?" पूछा उसने, "ये देखो" कहा मैंने, उसको केश दिखाए, तो सफेद! "ये कैसे हए?" बोली हैरत से, "उस सर्प की लार लगी होगी!" कहा मैंने, वो टटोल टटोल कर देखने लगी अपने केश! "बस यहीं हैं। इनको काट लेना!" कहा मैंने,
और ले आया उसको घेरे में, वहाँ शर्मा जी ने मुझे ही झाड़ पिला दी! कौशुकि को भी! कि क्यों गया मैं बाहर? कुछ हो जाता तो? तब मैंने बताया कि कुछ नहीं होता, मैं संधान कर लेता विद्या का! तब शांत हए! हम फिर से बैठ गए थे उस घेरे में, और मैंने तब अलख में ईंधन झोंकना शुरू किया!
द्वितीय पंक्ति का हास हो गया था, और तीसरी पंक्ति का भी हास करना था, तदोपरांत असुत आने थे, ये विद्या आदि जानते हैं। द्रौंच की ये रक्षा-प्रणाली है! मैंने फिर से सर्प-मालिनि की कंडिका का जाप किया! करीब पांच मिनट के बाद ही, हिस्स हिस्स सुनाई देने लगी! उन गड्ढों में से, सफ़ेद काले वलयों वाले मोटे मोटे सर्प बाहर
आने लगे! ये सर्प, बीच में से छपते होते हैं, जैसे कि पेट में कुछ ठूस रखा हो उन्होंने विष ऐसा, कि उस अंग को ही जला दे जहां दंश मारा होगा उसने! कुछ ही क्षणों में,
अस्थियों से मांस छूटने लगेगा! इसे कहते हैं जीते जी मरना! इन सो को छेतक कहा जाता है। लम्बाई में करीब चार मीटर तक होते हाँ, फन नहीं होता, सर तिकोना होता है! वजन में भारी और देह से भी भारी होते हैं, अंदर का मुंह पीले रंग का होता है! वे ही
अब खिंचे चले आये थे! सर्प-मालिनि नहीं छोड़ा करती किसी भी सर्प को! खींच ही लाया करती है बाहर! तो अब ये छेतक बाहर आ गए थे! ये तृतीय रक्षण-पंक्ति थी! शेष दो में, असुत आने थे! मैं हुआ खड़ा, और उन बिलबिलाते हुए सर्पो को देखा, पूंछ पटक रहे थे अपनी! उखाड़ा त्रिशुल, पढ़ा मंत्र और छआ दिया घेरे से बाहर! वे हवा में उठे! एक झटके से, पीला द्रव्य उनके मुंह से निकल, भूमि पर गिर पड़ा उसी क्षण! फिर फेंक दिए गए! अब वे भागे! मैं फिर बैठ गया! झोंका ईंधन! "आप यहीं रहना! दोनों! अब असुत आएंगे! ये सबसे अधिक खतरनाक हैं!" चेताया
मैंने.
मैंने आगे जाकर, भूमि पर एक चिन्ह बना दिया था! असुत विष फेंकने में माहिर होते हैं, तेज़ाब का सा काम करता ही इनका विष! इसी कारण से वे वहीं तक रुकें, मैंने ये चिन्ह बना दिया था,
इसको आभेक्ष कहा जाता है! किसी कुँए में सर्प हों, तो आभेक्ष चिन्ह बनाया जाता है, वे बाहर नहीं आते तब! मैंने चिन्ह बना दिया था, और अब वापिस हुआ, अलख में ईंधन झोंका, और पढ़े मंत्र! उन गड्ढों की मिट्टी उछलने लगी! कंकड़ पत्थर उछलने लगे।
और उसके बाद, बड़े, विषैले, भूरे और नील आभा लिए हुए, वे विचित्र से सर्प निकलने लगे! लम्बे, मोटे और चमकदार! वे करीब दस होंगे,आप उनको चेवाट कह सकते हैं! ये चतुर्थ-पंक्ति में होते हैं।
इनका पेट सफेद रंग का होता है, जल में ये सफेद रंग, प्रकाश छोड़ने लगता है! इनके फन नहीं होता, लेकिन गले का भाग बहुत चौड़ा होता हैं! ये भोजन भी नहीं करते! ये दिव्य कहे जा सकते हैं। वे घेरे के चारों ओर फुकार मार रहे थे! आभेक्ष को भेद डाला था उन्होंने! बड़ी ही हैरत की बात थी! पूँछ पटक रहे थे अपनी! एक दूसरे के संग मिल, हमें जैसे ललकार रहे थे! मैं खड़ा हुआ, उन्होंने भरी फुकार! उठाया त्रिशूल मैंने, और वो सब दौड़े मेरी तरफ! अभिमंत्रण किया त्रिशूल को, लगाया माथे से, और छुआ दिया नीचे! झम्म से लोप हए वे सब के सब! कौशुकि, खड़ी हो, उन्हें ढूंढने लगी! "क्या हुआ कौशुकि?" पूछा मैंने, "वे? वे कहाँ गए?" पूछा उसने हैरानी से, मैं मुस्कुराया! उसको बिठाया नीचे,
और स्वयं भी बैठा! ये असुत मायावी होते हैं। इनमे दो प्रकार हैं, जो अभी लोप हुए, वे नषासुत थे, ये अत्यंत ही विषैले होते हैं!
और जो अब आएंगे, वो अघासुत होंगे! ये अघासुत, राजसिक हैं! प्रबल मायावी हैं। ये आखिरी पंक्ति है, उसके बाद, यद्योधर तक सूचना जायेगी! उस से, पुण्याभद्रिका तक! मैंने उसको बताया! वो हैरत से सुनती रही! "आप इतना कैसे जानते हैं?" पूछा उसने, "मेरे गुरु श्री ने सिखाया है ये!" कहा मैंने, मुस्कुराते हुए! "कहाँ हैं आपके गुरु श्री?" पूछा उसने, "मेरे हृदय में!" कहा मैंने, वो समझ गयी थी तब!
अब तक संध्या का धुंधलका होने लगा था, मैं चाहता था कि सबकुछ, दिन ढले तक निबट जाए! इसीलिए मैंने फिर से अलख में इंधन झोंका! पढ़ा सर्प-मालिनि का महामंत्र! घूर्ण! ऐसी आवाज़ हुई भूमि में!
जैसे भूमि हिली! पक्षी जो बैठे थे पेड़ों पर,
अचानक से उड़ चले! "शांत ही बैठे रहना!" कहा मैंने,
और मैं खड़ा हुआ, घेरा पार किया, और फिर से अट्कूप-चिन्ह बनाया! यहां से आगे नहीं बढ़ सकते थे वो, आभेक्ष को तो भेद ही डाला था उन्होंने! दरअसल गलती मेरी ही थी, मैंने उन असुतों को, भौतिक-सर्प समझ लिया था! इसीलिए अबकी बार मैंने अट्कूप-चिन्ह बनाया था!
और आ गया वापिस घेरे में! जैसे ही बैठा मैं, भयानक सा शोर सुनाई दिया! जैसे कहीं मारकाट मच रही हो! ये शोर मात्र मुझे ही सुनाई दिया! और किसी को भी नहीं! अब इसका क्या अर्थ? कोई चेतावनी? मुझे भयभीत कर रहे हैं? मैंने मिट्टी उठायी,
और लगाई माथे से, सभी के! और फिर से अलल-भुजबन्धधारी का महामंत्र पढ़ा! और ठीक तभी सामने से,
चार अघासुत निकले! सुनहरे रंग के! दैविक सर्प! चमक ऐसी कि एक एक शल्क स्पष्ट दिखे! सुनहरे रंग में,सफ़ेद और लाल रंग के चमकदार छल्ले बने थे! नेत्र, किसी गेंद जैसे! पीले, ज्वालरूपी! वे चारों आगे बढ़े! बहुत तीव्रता से!
और अट्कूप चिन्ह के करीब आ रुके! उनको भान हो गया था उसका! वे फुफकार रहे थे!
गुस्से में थे।
उस्नका बस चलता, तो भस्म ही कर देते हमें! मैं उठा, और लिया त्रिशूल!
और चला घेरे से बाहर! कौशुकि फिर से चीखी! मैंने नहीं सुना! मैं अट्कूप चिन्ह के समीप आ खड़ा हुआ, रखा त्रिशूल कंधे पर,
और प्रणाम किया उन्हें! वे तभी पीछे हटे!
और तेजी से फिर आगे आये मैं वैसे ही खड़ा रहा उधर! उन्होंने मारी फंकार! मिट्टी उठी, मेरे कपड़ों पर जम गयी! मैंने चेहरे से साफ़ की, आँखों में घुस गयी थी! वे नहीं जा रहे थे वापिस, मैं नहीं चाहता था उनको कष्ट पहुंचाना!
अब विवश था! अतः,माने मंत्र पढ़ते हए, त्रिशूल को छुआ दिया भूमि से, हवा का झोंका उठा!
और वे लोपहुए! कपड़े झाड़े, और चला वापिस! मेरे कपड़े झाड़े कौशुकि ने, शर्मा जी ने, रुमाल से मुंह पोंछा अपना, शर्मा जी के पास पानी था, चेहरा धोया, और पानी पिया, अलख मैं ईंधन झौंका! "कौशुकि?" कहा मैंने, "जी?" बोली वो, "अब तुम जा सकती हो!" कहा मैंने, "क्या? कहाँ?" पूछा आँखें फाड़कर! "वहाँ, उस तम्बू में!" कहा मैंने, "किसलिए?" पूछा उसने, "क्योंकि अब, जो कुछ होगा, वो तुम्हें नज़र नहीं आएगा!" कहा मैंने, "मैं नहीं समझी?"बोली वो, अब मैंने उसको बता दिया कि कलुष-मंत्र नहीं साध सकती! उसने शर्मा जी के विषय में पूछा, मैंने उनके विषय में बता दिया, कि मेरे साथ चौदह रात्रि कलुष साधा है उन्होंने! खूब समझाया उसे! नहीं समझी! उसने हमारे साथ ही रहने की जिद पकड़ ली! तो वो अब ज़िद पर अटक गयी थी! नहीं मान रही थी! उसको मैंने धन और ऋण सब समझा दिया था, लेकिन नहीं, उसकी सुईं अटक गयी थी अब! बहुत समझाया कि ऐसा भी हो सकता है, वैसा भी हो सकता है। लेकिन माने नहीं वो! आखिर में अब उसको संग कहना ही पड़ा! एक बार को तो आंसू ही बहाने लगी थी! उसके जहां जिज्ञासा थी, वहीं वो सबकुछ जैसे देखना भी चाहती थी। परन्तु, अब उसके देखने
लायक कुछ शेष नहीं था! यदि द्रौंच माने तो वे दर्शन देते उसको! अन्यथा नहीं! बीस पच्चीस मिनट बीत चुके थे, अब अँधेरा भी गहराता जा रहा था, बीच में एक बार श्रीचंद अवश्य ही आया था, हमें कुशलपूर्वक देख, चला गया था फिर! "शर्मा जी!" कहा मैंने, "हाँ?" बोले वो, "पानी दो ज़रा" कहा मैंने, पानी दिया मुझे, और मैंने पानी पिया, कौशुकि को दिया, तो उसने भी पिया, बोतल पकड़ा दी शर्मा जी को, "आप आगे आओ शर्मा जी" बोला मैं, वे आ गए आगे, बैठ गए, "कौशुकि, अब तुम पीछे बैठो' कहा मैंने, बदहवास सी हो गयी थी वो! जब मैने कहा था कि पीछे जा बैठो! मैं क्या करता, कलुष वो साध नहीं सकती थी, प्रयास करती, तो नेत्रों की ज्योति और खो बैठती! अब मैंने लड़ाया कलुष!
और अपने नेत्र पौषित किये, फिर शर्मा जी के भी, मुंह में कसैलापन भर आया, नेत्र खोले, और कलुष जागृत हुआ! कौशुकि हमें देखती रही, टकटकी लगाये! "कुछ विशेष दिख रहा है?" पूछा उसने, "हाँ, नीचे सुरंग हैं!" कहा मैंने, "मैं नहीं देख सकती?" पूछा उसने, "नहीं कौशुकि!" कहा मैंने, "कोई तो विकल्प होगा?" बोली वो, "नहीं है!" कहा मैंने, मन मसोस के रह गयी, रहना भी पड़ता!
और तब मैंने दिया अलख में ईंधन! और कुरंग-विद्या का किया संधान!
कहर मचा देती कुरंग नीचे! आना ही पड़ता सभी को ऊपर! ये अशरीरी के लिए ऐसा ही है, जैसे जीते जी किसी को धुंए भरे कमरे में बंद कर दिया जाए! करीब आधा घंटा मैं जाप करता रहा, कोई सर्प नहीं आया था तब तक! अब मैं उठा, एक जलती लकड़ी उठायी,
और चला गड्ढे की तरफ, पढ़ा मंत्र और छोड़ दी लकड़ी उसमे! धुआं ही धुआं निकल पड़ा वहाँ के गड्ढों से! भाग कर आया मैं घेरे के अंदर, आ बैठा, "अब देखो आप!" कहा मैंने,
और तभी प्रकाश फूट पड़ा, एक गड्ढे के ऊपर! अब उनकी दिव्यता का खेल शुरू हो गया था! धंआ पल भर में ही गायब हो चला था!
और जैसे ही प्रकाश मंद हुआ, एक चांदी के रंग का सर्प था वहाँ! यही यदयोधर था। उसको आना ही था! नीचे आवाजें आने लगी थीं! यद्योधर को आने के लिए, विवश कर दिया था कुरंग ने! यद्योधर क्रोध में नहीं था! वो शांत था! आगे बढ़ा!
और भूमि से सर छुआ उसने! उसने कुरंग को भेद दिया था! आवाजें बंद हो गयी थीं! धुंआ तो पहले ही बंद हो गया था! उसने फन तनाया अपना! आगे बढ़ा! आँखें चमकी उसकी!
और फिर एक फुकार छोड़ी! ऐसी तेज की अलख की आंच भी मेरे घुटने से छू गयी! "प्रणाम!" कहा मैंने और प्रणाम किया! शर्मा जी ने भी, खड़े होकर, कौशुकि को कुछ दिख नहीं रहा था, इसीलिए बैठी रही थी! उसने फिर से फुकार छोड़ी!
और अगले ही पल! सामने की भूमि में हलचल हुई।
मिट्टी ऊपर उठी!
और एक बड़ा सा बर्तन बाहर आया, भूमि को मथता हआ! उसके मथने से, कंकड़ छिटकने लगे थे! वो बर्तन घूम रहा था धीरे धीरे, फिर बंद हुआ! उसके स्वर्णाभूषण भरे पड़े थे! स्वर्ण ही स्वर्ण! वो बर्तन, वो भी दिखा था कौशुकि को! न ही वो फ़टी हुई भूमि! उसकी दृष्टि को, रोक दिया गया था, ये यद्योधर के कारण था! उसने भरी फुकार! ऊपर मुंह कर!
आशय स्पष्ट था! कि मैं वो धन ले लूँ,
और चला जाऊं यहां से, कभी लौट के न आऊँ! शर्मा जी ने मुझे देखा,
और मैंने उन्हें! धन इतना था, कि कभी खत्म ही न हो! प्रसन्न हो, ऐसा धन सदैव जब दिया जाता है, किसी दिव्य द्वारा,
तो वो अक्षत होता है, उसका क्षय नहीं होता! ये करीब ढाई सौ किलो तो था ही! बर्तन भी काफी बड़ा था, जीप की छत पर ही आता!
और धन कहाँ रखते? फेंकना ही पड़ता नदी में! "नहीं वल्लभ! मैं ये नहीं स्वीकार सकता! कहा मैंने, मैंने न किया,
और वो बर्तन, फिर से घूमता हुआ, नीचे चला गया! उसने फिर से कुंकार भरी! आगे आया, आँखें बड़ी हुईं उसकी! हम नहीं घबराये! बिलकुल भी नहीं। और तत्क्षण ही, लोप हो गया वो! और जब लोप हुआ, तब बिखरी मिट्टी देख,
कौशुकि के होश उड़े! "वहां क्या हुआ था?" पूछा उसने, "धन था वहाँ!" कहा मैंने, "धन?" बोली वो, चौंक कर, "हाँ! अकूत धन!" कहा मैंने, "कहाँ गया?" पूछा उसने, "भूमि में समा गया!" बोला मैं, उसे ये कोई परी-कथा समान प्रतीत हुआ! जैसे उसको यक़ीन ही न हुआ हो! "वो मिट्टी लाइए तनिक?" बोली वो, मैं चला उधर, उठायी मिट्टी, और ले आया, दी उसे, उसने उसको सूंघा, "इसमें सुगंध है!" बोली वो, मैंने भी सूंघा, शर्मा जी ने भी! "हाँ, जैसे चंदन की सी सुगंध है!" कहा मैंने, उसने घेरे के बाहर फेंक दी मिट्टी, "कोई प्रकट हुआ था?" पूछा उसने, "हाँ, मेरा वार्तालाप तो सुना होगा तुमने?" पूछा मैंने, "हाँ! तभी पूछा!" बोली वो, "यद्योधर प्रकट हुए थे!" कहा मैंने, "और अब?" पूछा उसने, "अब! अब पुण्याभद्रिका प्रकट होंगी!" कहा मैंने, "मैं कैसे देख सकती हूँ?" बोली वो,
मरे से स्वर में, "नहीं देख सकती!" कहा मैंने, "सम्भव कैसे होगा?" पूछा उसने, "अपने गुरु श्री से कहो?" कहा मैंने, "होता तो क्या नहीं सिखाते?" बोली वो, "देखो कौशुकि! मेरा मार्ग अलग है, मैं वो जानता हूँ, बता दिया है। तुम्हारे.....
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कहा मैंने, मेरी बात काट दी बीच में ही उसने, "कैसे सम्भव है?" पूछा उसने, "आशय क्या है तुम्हारा?" पूछा मैंने, "मुझे ये मंत्र सिद्ध करना है!" बोली वो, "नहीं कर सकती!" कहा मैंने, "क्यों नहीं?" बोली वो, "बात में बताऊंगा!" कहा मैंने,
और भूमि में हुई हलचल! जैसे पत्थर टूटे हों! जैसे भूकम्प आया हो बहुत तेज वो कम्पन्न ऐसी तेज थी कि कौशुकि गिर ही पड़ी थी, शर्मा जी ने कंधा पकड़ लिया था उसका!
और मैं हुआ खड़ा! शर्मा जी भी! मैंने अपने तंत्राभूषण माथे से लगाये! उठाया त्रिशूल! और हुआ मुस्तैद! प्रकाश बढ़ा चला आ रहा था हमारी तरफ की! चकाचौंध सी कौंध रही थी, सामने के पत्थरों के पीछे!
और फिर.........! वो हरा-सफेद सा प्रकाश था, झिलमिलाता हुआ हमारी तरफ बढ़ रहा था! आँखें झिलमिला रही थीं हमारी तो! ये प्रकाश ऐसा था कि आसपास की वनस्पति वो पत्थरों की भी परछाईं बना रहा था! और फिर एक चकाचौंध सी बड़ी सी रेखा आ पहुंची वहां! यही पुण्याभद्रिका की थी! उसका प्रकाश मंद पड़ा थोड़ा अब, और उसने मारी कुंडली ठीक सामने! वैसे पुण्याभद्रिका के संग अन्य सर्प भी आया करते हैं, वे नहीं थे इस समय! "प्रणाम मातेष!" कहा मैंने, हाथ जोड़कर कहा था, उसका आदर करना सर्वोपरि था! उसने मारी जोरदार फुकार!
मिट्टी उड़ पड़ी! कंकड़ उड़ पड़े!
आँखें बंद कर ली थीं हमने! फिर से आँखें खोली, चेहरा साफ़ किया, होंठों पर मिट्टी जम गयी थी हमारे! उसने फिर से कुंकार भरी! और फिर से मिट्टी उडी! वो अपनी पूंछ को फटकार रही थी! बार बार! ये हमला करने का संकेत था! गुस्सैल तो हुआ ही करती है, इसीलिए मैंने त्रिशूल उखाड़ लिया था! वो आगे बढी, मैंने त्रिशूल आगे किया! वो रुकी, मैंने त्रिशूल खींचा! "मातेष! हम किसी का अहित नहीं करने आये! हमें नागराज के दर्शन करने हैं! तदोपरांत हम चले जाएंगे! वचन देता हूँ!" कहा मैंने, वो तब बढ़ी आगे! आई ठीक सामने! मारी फुकार! उस फुकार से वस्त्र भी हिल गए हमारे! वो करीब हमसे दो मीटर दूर थी, उसकी पीठ पर बनी एक सफेद रेखा से, वो प्रकाश झिलमिला रहा था! उसकी पीली बड़ी बढ़ी आँखें दहक रही थी! इस रक्षा-पंक्ति में, वो अंतिम थी, अतः क्रोध करना या दिखाना, लाजमी ही था! उसने उठाया सर अपना, आई हमारे कंधों तक! लहराने लगी! पूंछ फटकारने लगी! मुझे आशंका हुई तब! शर्मा जी को पीछे किया मैंने,
और स्वयं आगे खड़ा हो गया! उठाया त्रिशूल, लोम-मुद्रा में पकड़ लिया!
और पढ़ा मैंने तब सर्प-विनाशिनी मंत्र ज़ोर ज़ोर से! वो हटी वो पीछे! यदि अब वो हमला करती, तो त्रिशुल से छोटे ही लोप हो जाना था उसने प्रहार सा लगता उसको! फिर से दूर खड़ी हो गयी! कम से कम पांच मिनट ऐसे ही खड़ी रही,
और हम भी, उसी प्रकार से खड़े रहे! उसके बाद, वो पीछे हटी, और वापिस चली गयी! जान में जान आ गयी! मैंने नहीं चाहता था कि उस पर वार करूँ! आये हम थे उनके स्थान पर, वो नहीं! घुसपैठिये तो हम थे, वो सब नहीं! इसलिए! मैं बैठा अलख पर, दिया अलख में भोग! अलख चटकी! ज़ोर से दहकी! अब अलख का ही प्रकाश था वहाँ! "अब कौन प्रकट हुआ था?" पूछा कौशुकि ने! "पुण्याभद्रिका!" कहा मैंने, "कैसा स्वरूप था?" पूछा उसने, "खौफनाक!" कहा मैंने, "सर्प नहीं थी?" पूछा फिर से, "सर्प थी, परन्तु दिव्य सर्प!" कहा मैंने, "क्या अंतर होता है?" पूछा उसने, "बाद में बताऊंगा!" कहा मैंने, "अब किसकी प्रतीक्षा है?" पूछा उसने, "अब नहीं जानता!" कहा मैंने,
और अलख में ईंधन झोंक मारा! करीब आधा घंटा बीत गया! हम टकटकी लगाये वहीं देखते रहे! कोई नहीं आया था उसके बाद! जैसे सब शांत हो गया था! अब? अब क्या किया जाए?
तब निर्णय लिया! खड़ा हुआ, घेरे से बाहर चला, जैसे ही चला, मैं जैसे किसी ठंडे से स्थान में आ पहुंचा था!
ओस पड़ रही थी! बेहद ठंड थी बाहर तो! वस्त्र भी गीले होने लगे थे! इसका अर्थ क्या था?
अर्थ ये, कि अभी भी उनकी सत्ता बनी हुई थी! कुछ न कुछ होने को था अवश्य ही! मैं झट से अंदर आ गया तभी! "अरे?" कौशुकि के मुंह से निकला! पानी टपक रहा था मेरे कानों से! बालों से होकर! "ये क्या?" बोली वो,
और दिया अपना अंगोछा मुझे, मैंने पोंछा पानी! "बाहर ओस पड़ रही है, वर्षा जैसी!" कहा मैंने,
कौशुकि उठी, उस घेरे की रेखा तक गयी!
और निकाला हाथ बाहर! झट से गीला हो गया हाथ उसका! "ऐसा मैंने कभी नहीं देखा!" बोली वो, "तुम नाग-स्थल पर हो कौशुकि!" कहा मैंने, "अद्भुत!" बोली वो, अंगोछा दिया उसको, उसने जैसे ही पकड़ा, भूमि में झटके लगे! गिर पड़ी मेरे ऊपर ही! उसको संभाला,और बिठाल दिया नीचे! लग रहा था जिसे अभी ज़मीन पलट जायेगी! जैसे पल में ही खेड़ा-पलट होगा! फिर शांत हुई वो आवाजें! वो झटके!
और हमारे घेरे के बाहर, सामने, करीब चार मीटर पर, मिट्टी उठने लगी! बहुत तेज! मैंने उठाया त्रिशूल अपना!
और हुआ खड़ा, शर्मा जी भी खड़े हुए, उनकी बिठा दिया! उस गड्ढे में से, सर्प निकले! पीले रंग के।
चमकदार! सफेद चकत्ते बने थे उनके शरीर पर! अजगर जैसे मोटे मोटे! चारों, फन फैला खड़े हो गए! भूमि में दरार पड़ने लगी तभी! उन दरारों में से आग निकलने लगी! जैसे नीचे से ईंधन मिल रहा हो उन्हें! वे दरारे घेरे से टकराती, और लौट जाती! लेकिन एक बात! वे दरारें चौड़ी हुए जा रही थीं! यही चिंता का कारण था मेरा! मैंने तब, माँ मंसा कौकृतरांग-मंत्र पढ़ा!
और छुआ दिया भूमि से त्रिशूल! छुआते ही, आग बंद! दरारें बंद!
और वे सर्प, हवा में उछल पड़े। फिर नीचे गिरे! फिर से खड़े हुए वो! फैलाये फिर से फन अपने!
और मारा सर भूमि में अपना! वे हवा में उठने लगे! अब मुझे हुई घबराहट! कहीं ऐसे ही वार किया, तब ये घेरा काम नहीं करेगा! मैंने अलख की एक लकड़ी उठायी,
माँ मंसा का ही जाँत्रिका-खंजल खींच दिया, घेरे के अंदर!
वे आगे बढ़े, और जैसे ही टकराये उस घेरे की रेखा से, भन्न से फेंक दिए गए! गिरे, और लोप हुए! "ये उड़ने वाले कौन से सर्प थे?" बोले वो, "ये कौराणि-सर्प हैं!" कहा मैंने, "कितने भयावह सर्प थे!" बोले वो, "हाँ, सच में!" कहा मैंने, "सुनिए?" बोली कौशुकि, "बोलो?" पूछा मैंने, "मैं कैसे सीखूगी?" पूछा उसने! मैं मुस्कुराया! ललक लग गयी थी उसको! "बता दूंगा!" कहा मैंने, "कब?" पूछा उसने, "अभी तो नहीं!" कहा मैंने, "बताइये? फिर कब?" पूछा उसने, फिर से सईं अटकी उसकी, हुई गरारी फेल! "यहां से निबट लें, उसके बाद!" कहा मैंने, "अब और कितना समय?" पूछा उसने! मुझे कुछ याद आया! मुस्कुराया मैं! "महीना भी लग सकता है!" कहा मैंने,
वो समझ गयी! लरज सी गयी, नज़रें फेर लीं, शर्मा जी की हंसी छूट गयी! और फिर मेरी भी! "मेरा उपहास उड़ा रहे हो आप?" बोली वो, "अरे नहीं!" कहा मैंने, "मैं चली जाउंगी बाहर! मर जाउंगी, देख लेना!" बोली वो, अब ये तो ज़बरदस्ती हो गयी! अवसर ऐसा नहीं था, गरम दिमाग था, कहीं चली ही न जाए बाहर। "अरे नहीं कौशुकि! किसमें हिम्मत जो तुम्हारा अहित करे?" कहा मैंने, मिन्नतें करनी पड़ी।
खुद ही झुकना पड़ा!
और तभी हमारे पीछे, मिट्टी उडी! मैंने पलट के देखा उधर! खड़ा हुआ, देखा, टोर्च मारी उधर, कुछ नहीं था, शायद हवा ही थी! मैं फिर से बैठ गया! "क्या था?" पूछा उसने, "को नहीं" कहा मैंने, तभी शर्मा जी ने मेरे घुटने पर हाथ मारा, सामने एक बड़ा सा सर्प था! पत्थरों के ऊपर से होकर चला आ रहा था! उसका फन इतना विशाल! इतना विशाल, कि हाथी का भी मस्तक ढक ले! भक्क काला! चमक रहा था वो! उस अलख की आंच से! उसकी आँखें सफेद थीं, उसने मारी फिर कुंडली! "ये द्वार-प्रहरी है!" कहा मैंने, मैं खड़ा हआ! और थोड़ा सा आगे चला! उसने मारी फुकार! झाग से उड़े! मैं झुक गया फौरन ही! वो झाग सर के ऊपर से निकल गए! जहां गिरे, वहाँधुआं उठने लगा! ऐसा हलाहल था उस सर्प का! इसको वापिस भेजना ही होगा! यही निर्णय लिया मैंने उसीक्षण!
मैंने अलख की भस्म उठायी!
वो दौड़ के रेंगता हुआ, आया घेरे के पास! अत्यंत भयावह रूप था उसका, काले रंग की दाढ़ी थी, ठुड्डी के नीचे! जैसे किसी घोड़े की पूँछ हुआ करती है! भस्म को अभिमंत्रित किया! उसने पुंकार भरी! लेकिन इस बार झाग नहीं निकले! वो भेद नहीं पा रहा था उस घेरे को! मैंने सीधे हाथ की मुठी को, उलटे हाथ की कलाई पर तीन बार मारा! पढ़ा अलल-हूरण का एक मंत्र!
और फेंक मारी वो मुट्ठी उस सर्प पर! वो उड़ा हवा में, तड़पा भूमि पर गिर! फैन को सिकोड़े, उधर उधर सर मारे अपना! पूंछ कांपे उसकी! फुकार ही फुकार!
और झम्म से हुआ लोप! हाँ, उसकी पूंछ के प्रहार ने, पत्थर चटका दिए थे वहां के! ऐसा भीषण सर्प था वो! उसको वापिस भेजना आवश्यक था, करना पड़ा ऐसा! "ये भी कौराणि था?" पूछा उन्होंने, "हाँ!" कहा मैंने, "ये था भीषण बहुत!" बोले वो, कौशुकि हई खड़ी! हमारी बातें सुन, कान लगा देती थी, एक एक शब्द जैसे दिमाग में भरे जा रही थी! "कौन आया था?" पूछा उसने, "था एक रक्षक!" बोला में, वो बैठ गयी फिर नीचे।
तभी शोर सा हुआ! जैसे पेड़ टूट कर गिरे हों! कड़ाक-कड़ाक की आवाजें आने लगी वहाँ दूर से! "ये क्या हो रहा है?" बोले वो, "पता नहीं!" कहा मैंने, "ये आवाजें?" बोले वो, "रुको!" कहा मैंने,
और टोर्च उठा, चला बाहर! मैं चला, तो शर्मा जी भी चले, वो चले तो कौशुकि भी चली! "आप दोनों यहीं रुको?" कहा मैंने, "क्यों?" बोले वो, "मैं देखता हूँ!" कहा मैंने, "तो मैं भी चलता हूँ?" बोले वो, "नहीं!" कहा मैंने, "तो आप भी यहीं रुको!" बोले वो, तभी ज़ोर से हवा चली! कपड़े तक उड़ने लगे हमारे तो! भीग और गए थे ओंस में! "ठीक है" कहा मैंने, फिर से पेड़ टूटने की
