बहुत सुंदर दृश्य था वो! नदी किनारे, एक गड्ढा जो कि पानी के तेज बहाव ने बना दिया था, वहां मैं और शर्मा जी खड़े थे, छोटो छोटी मछलियाँ इस संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थीं। पानी की हरी-भरी वनस्पति पानी के उन छोटे छोटे उबालों में, हिल-डुल रहे थे! मैं उन छोटी छोटी मछलियों को देखे जा रहा था, बहुत फुर्तीली थीं वो, भागती थीं एक दूसरे के पीछे, और फिर से एक हो जाती थीं! दूर नदी
में, पानी बहुत तेज बह रहा था, ऐसा कि कोई नाव भी न रुक सके! रुके, तो घूम ही जाये! किनारे से कुछ ही दूर, कुछ किशोर, मछलियाँ पकड़ रहे थे, नदी किनारे ही गड्ढा खोद लिया था उन्होंने, पानी भर दिया था और उसी में पकड़ी गयीं मछलियाँ रखते जा रहे थे। हम उधर ही चले, वे हमें देख सकपकाये। लेकिन जब हम आराम से रहे, तो सहज हो गए!
"कितनी पकड़ ली?" पूछा मैंने, "कोई किलो भर होंगी!" एक बोला, "छोटी छोटी हैं क्या?" पूछा मैंने, "तीन हैं" बोला वो, "बढ़िया है!" कहा मैंने,
और तभी फिर से उसके कांटे में फिर से एक और फंसी! उसने निकाली, ये भी कोई आधा किलो की होगी! रोहू थी! उसने कांटे से निकाली, और गड्ढे में छोड़ दी! "भाई वाह!" शर्मा जी बोले, "आज का काम तो हो गया तुम्हारा!" कहा मैंने, हंसने लगे! और हम वापिस हो लिए वहाँ से!
आये वहीं, और जहां हमारी चारपाइयां पड़ी थीं, वहीं जा बैठे, एक और बैठा था वहां, रघु, सहायक था, "कहाँ डिगर गए थे?" बोला वो, "यहीं थे पास में!" कहा मैंने,
और तभी एक महिला आई वहाँ, चाय ले आई थी, तो चाय दी उसने, हमने चाय पी फिर,
और उसके बाद वापस चले हम डेरे तक, पहुंचे वहाँ और अब आराम किया हमने!
आज शाम को, बाबा श्याम आने वाले थे वहां हरिद्वार से, और हम हरिद्वार से कोई सत्तर किलोमीटर आगे थे, संध्या हुई, लेकिन बाबा नहीं आये, फ़ोन आ गया था उनका, शाम के बजाये, अब कल दोपहर को आना था उन्हें! तो वो शाम भी काटी, और रात भी, मौसम अच्छा था वहाँ, कोई परेशानी नहीं हुई थी हमें, अगली सुबह, चाय-नाश्ता किया हमने,
आज मौसम ज़रा ठंडा था, बादल छाये हुए थे, बारिश हो जाए, कुछ न कहा जा सकता था। और फिर ऐसा भी हुआ, कोई बारह बजे करीब हल्की-फुलकी बूंदाबांदी भी हो
गयी! अब मौसम और ठंडा हो गया था, अब चादर ओढ़ ली थी, वो बूंदाबांदी चलती ही रही, और बाबा भी नहीं आये! अब कल ही आते! शाम के बाद बारिश बंद हुई, और अगले दिन, कोई ग्यारह बजे बाबा का आना हुआ! उनसे मिले, और खूब बातें हुईं। बाबा को कुछ काम था मुझसे, किसी जगह के बारे में पूछ रहे थे, "आप गए हैं वहाँ?" पूछा उन्होंने, "हाँ, ये लखीमपुर खीरी के पास है" कहा मैंने, "हाँ, वहीं है" बोले वो, "आपको क्या काम है?" पूछा मैंने, "वहाँ पर एक तालाब है, उस तालाब के पास, एक सर्प है, ये नाग है, अकेला ही है, जिसने देखा था, बताया कि दिव्य है वो" बोले वो, मेरे तो कान खड़े हुए अब! "देखा किसने था?" पूछा मैंने, "हैं एक बाबा जसवंत, उन्होंने देखा था" बोले वो, "तो बाबा, मुझसे क्या चाहते हैं आप?" कहा मैंने,
"हम जा रहे हैं उधर, चाहता हूँ आप भी चलें" बोले वो, मेरा तो सौभाग्य था वो! दर्शन और वो भी एक दिव्य सर्प के!
और क्या चाहिए! "बताएं?" बोले वो, "अवश्य!" कहा मैंने, "तो आगामी दशमी को, आप पहुंचे वहाँ, वहाँ का पता लिख लो" बोले वो,
और पता लिखवा दिया, शर्मा जी ने लिख लिया पता! दशमी आने में अभी हफ्ता था, उस रात हमने बाबा के साथ ही दावत उड़ाई, और फिर
आराम से सोये! अगले दिन विदा ली उसने, और हए वापिस, आ गए थे हम दिल्ली वापिस, अपने काम निबटाए यहां जो रहते थे! छठे दिन, हम रवाना हुए लखीमपुर के लिए,
और शाम तक जा पहुंचे वहाँ,
पता ढूँढा, मिल गया, एक छोटी सी धर्मशाला ही थी वो, कहिर, हम अंदर गए, बाबा के संदर्भ से बातचीत की, तो मदद हुई फिर, हमें कमरा दे दिया गया, कमरा तो बढ़िया था, हाँ, बिस्तर नीचे लगा था, ये और अच्छी बात थी! नीचे कम से कम, फैल के तो सोया जाता है! भोजन की व्यवस्था भी थी, तो हमने भोजन भी कर लिया, बाबा अभी आये नहीं थे, अब शायद सुबह ही आते, तो हम सो गए! अगले दिन, कोई दस बजे बाबा आये, उनसे मुलाक़ात हुई! चरण-स्पर्श किये उनके,
और उनके संग चले हम, वो धर्मशाला बाबा के बड़े भाई की थी, पता चला! "कब आये थे?" पूछा उन्होंने, "शाम को आ गए थे" कहा मने, "अच्छा, मैं कल ही आ जाता, लेकिन आ न सका" बोले वो, "कोई बात नहीं" मैंने कहा, "अभी थोड़ी देर में, मदन आने वाला है गाड़ी लेकर, चलते हैं फिर" बोले वो, "ठीक है" कहा मैंने,
और हम आ गए वापिस फिर से अपने कमरे में, आधे घंटे में मदन आ गया था गाड़ी लेकर, और उसके साथ एक साध्वी भी आई थी, उसके संग उसकी एक सहायिका थी! उस साध्वी का चेहरा जब मैंने देखा, तो देखता ही रह गया! तेज था चेहरे पर! चेहरा चौड़ा था, लाल हो रखा था स्वस्थता से! कद कोई पांच फ़ीट दस इंच रहा होगा, देह सुगठित और बेहद मज़बूत थी, उसने गले तक, वस्त्र धारण कर रखा था हरे रंग का, माथे पर एक टीका था लाल रंग का! उसकी चाल बड़ी ही प्रभावी थी! मुझे बहुत अच्छी लगी वो पहली ही नज़र में! बाबा के पास चले हम, बैठे वहाँ, प्रणाम हुई उस साध्वी से, नाम पता चला उसका, कौशुकि! बड़ा ही अद्भुत नाम था! कौशुकि अप्सरा है एक, विशिष्ट अप्सरा!
और कौशुकि सच में एक अप्सरा समान ही थी! अब मामला ये था कि हम सभी को जाना था उधर, उस तालाब पर,
पता चला कि कौशुकि सिद्धहस्त थी सर्प-विद्या में! मुझे बड़ी हैरत हुई! बात ही हैरत की थी! मैंने ऐसी साध्वी नहीं देखी थी कभी! उम्र में करीब बत्तीस-तेतीस की होगी, लेकिन उसका आत्म-विश्वास ऐसा था कि, जैसे पूर्ण हो चुकी हो वो इस मार्ग में! उस रात को हम वहीं ठहरे, और अगले दिन, दोपहर बाद, हम उस तालाब के लिए निकल पड़े, रास्ता बहत ही ज़बरदस्त था! पसलियों का एक एक जोड़ चर्रा गया था!
और जहां उतरे, तोस्थान ऐसा था जैसे आबादी अभी छोड़ भागी हो वहाँ से! न बत्ती, न कोई रौशनी! हम बस बाबा के पीछे पीछे चलते गए! लाये बाबा हमें एक स्थान पर, यहां कुछ प्रकाश दिखा, कुछ अलाव से जल रहे थे, हंडे जल रहे थे!
बैठे सारे एक जगह,
और पानी आदि लाया गया, पानी पिया, मैं तो वहीं एक चारपाई पर लेट गया था! शर्मा जी भी जा लेटे! हाथ-मुंह धुलवाए उन्होंने,
और फिर कक्ष दिए गए, कक्ष कम, झोंपड़ी ज़्यादा थे वो, एक चारपाई, एक घड़ा, उसपर, लुटिया रखी थी, फूस की छत, तिरपाल डाल रखी थी, एक चार पायी और मंगवाई, चादर हमने अपनी ही बिछार्टी,
और फिर आया भोजन! भोजन किया हमने,
और उसके बाद लम्बी तान ले, सो गए! रात को एक बार भी आँख नहीं खुली! ऐसी बढ़िया नींद! अगली सुबह, हम उठे, निवृत हुए, स्नान किया और फिर आये अपने झोंपड़े में, तब तक चाय आ गयी थी, साथ में, कचौरियां थीं उरद की दाल की, मोटी-मोटी, लेकिन थीं बढ़िया! खा ली हमने! फिर चले बाबा के पास, वहाँ पहुंचे तो बाबा चाय-नाश्ता ही कर रहे थे, उनसे प्रणाम हुई, और फिर उनको नाश्ता करने देने के लिए, हम थोड़ा घूमने चले, उधर ही, पीछे की तरफ चले, यहां उपले पाथे हुए थे, वही रखे थे, वहाँ से निकले तो एक खाली स्थान आया, मिट्टी, ओस के कारण गीली हई पड़ी थी, मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक आ रही थी। कीकर के पेड लगे थे, लम्बी-लम्बी फलियां लगी थीं उस पर, चींटे रेंग रहे थे तने पर, उस में से गोंद का स्राव हो रहा था, कुछ लाल और काले से बरे उस गोंद को खाने के लिए, झुण्ड बनाये उड़ रहे थे, हम वहाँ से भी निकले, और थोड़ा सा आगे चले, यहां खेत थे, लहसुन बोया गया था, एक जगह पर चुकंदर लगे हुए थे, मैंने दो चुकंदर खोद लिए थे, साथ ही एक पानी की नाली से, जो खेती के लिए पानी ले जा रही थी, उस से धो लिए थे, एक शर्मा जी को दिया, उन्होंने भी धोया, उसे, और फिर दांतों से ही छील लिया! फिर खाया, क्या बढ़िया मीठा खोया सा लगा वो, एक तो ताज़ा और ऊपर से मिठास! चीनी बनाई जाती है उस से! वैसी ही मिठास थी! "बड़ा मीठा है!" बोले वो, "ताज़ा है न!" कहा मैंने, "हाँ, यही बात है!" बोले वो, अब खा तो लिया, लेकिन मुंह और जीभ हुए कत्थई! एक जगह पानी की हौदी बनी थी, वहाँ जा, पानी ले, कुल्ला किया! अब कुल्ला किया तो साथ के खेत में ही, खीरे दिखे! जी ललचाया, तो खीरे तोड़ लिए! साफ़ किये, और वो भी खा लिए! अब भला शहर में ताज़ा खीरे मिलते कहाँ हैं! देसी खीरे थे, संकर नहीं आज वाले! देसी का तो स्वाद ही अलग होता है। हाथ-मुंह धोये, और फिर वापिस हए, वापिस होते हए इकार आ गयी! पेट भर गया था जैसे! आये वापिस, तो सीधा बाबा के पास अब बैठे वहाँ,
"कब चलना है बाबा?" पूछा मैंने, "दोपहर तक, वो आ जाएंगे, वो श्रीचंद, उनके साथ चलते हैं!" बोले वो, "अच्छा! कितनी दूर है वो जगह?" पूछा मैंने, "कोई तीस किलोमीटर होगी" बोले वो,
"तीस किलोमीटर? जंगल में?" पूछा मैंने हैरानी से, "सड़क से कोई तीन किलोमीटर अंदर" बोले वो, "अच्छा!" कहा मैंने, "दोपहर, भोजन करने के बाद निकल चलेंगे" बोले वो, "जी" कहा मैंने,
और हम उठे वहाँ से, और चले अपने झोंपड़े की तरफ, तभी सामने से, बायीं तरफ, वो कौशुकि आती दिखी, स्नान करके आ रही थी, केश खुले थे उसके, उसके वस्त्र उसकी सहायिका पकड़े थी, हमारी तरफ से आयी, तो प्रणाम हुई! वो प्रणाम कर चलती बनी, और हम वापिस हो लिए फिर! दोपहर में, भोजन किया, आलू-पूरी और दही के साथ, साथ में मिर्च का अचार, लहसुन-मिर्च की चटनी! मजा आ गया! जम कर खाया! भोजन के बाद थोड़ा आराम किया, कोई एक बजे के बाद, श्रीचंद आ गए, साथ में एक महिला भी आई थी, एक
जीप लाये थे साथ में, शायद ले चलने के लिए थी वो, और इस प्रकार उनसे मुलाक़ात हई, हम तक़रीबन, दो बजे, निकले पड़े थे उस स्थान के लिए, मैं और शर्मा जी, बाबा और वो साध्वी, और एक उसकी सहायिका, कुल पांच हम, और एक श्रीचंद, जो गाड़ी चला रहे थे, कच्चा रास्ता था, गाड़ी ऐसे हिचकोले खाती कि कभी-कभार तो पहिये ही उठ जाते उसके एक तरफ के! सारा खाना खाया हआ, पचने लगा था! पेट में पड़ा पानी, अब आवाज़ करने लगा था! एक जगह रास्ता खराब था, उतरना पड़ा, निकाली गाड़ी आराम से,और फिर चल पड़े
आगे, बैठकर, "रास्ता है या चालक-परीक्षण?" बोले वो, "बड़ा बुरा रास्ता है!" कहा मैंने, "कमानियां खुली ही खुली आज!" बोले वो, "हाँ!" कहा मैंने,
फिर से रास्ता खराब! फिर उतरे! गाड़ी निकली, फिर चढ़े और फिर चले! "और कितना दूर?" पूछा मैंने, "बस कोई सात या आठ किलोमीटर" बोले श्रीचंद, एक एक किलोमीटर, एक एक पसली को चटका रहा था! कभी सर टकराता और कभी कंधे!
और फिर एक जगह आ रुके हम! उतरे! तो लगा जैसे कच्छ का रेगिस्तान पार कर लिया! पाँव के तलवों का पसीना अब सूखा! गाड़ी एक जगह लगा दी गयी, बियाबान था वहाँ! कोई नहीं था, कोई इंसान नहीं! "अब?" पूछा मैंने, "वहाँ से चलना है" कहा श्रीचंद ने,
और हम चल पड़े, पानी पी लिया था, और हम रास्ता बनाते हुए, चलते रहे, जंगल ही जंगल! ऐसी ऐसी आवाजें आएं कि जैसे किसी अभ्यारण्य में चले आये हों! जगह जगह गड्ढे थे वहां! पानी भरा था, कभी नमी थी, तो कहीं सूखा! दो जगह रुके हम, आराम किया,
और फिर चले पड़े आगे! और सामने एक खुला सा स्थान आया! नदी बह रही थी उधर दूर! क्या सुंदर किनारा था वो! नदी बेहद सुंदर लग रही थी! रुके एक जगह, श्रीचंद ने, ज़रा इधर-उधर देखा, नज़र मारी, "उधर जाना है!" बोला वो, "चलो" बोले बाबा,
और हम चल पड़े, कोई बीस मिनट में पहुंचे वहाँ,
अब तक थक चुके थे सभी! श्रीचंद ने अपने बैग से दो चादर निकाल लीं, बिछा दी, और हम बैठ गए वहीं!
छाया थी पेड़ों की, और वैसे भी गर्मी नहीं थी, कोई घंटा भर आराम किया हमने
और फिर चले श्रीचंद के साथ, गड्ढे पार कर, हम चलते रहे उसके पास, एक जगह, एक पेड़ों के झुण्ड के पास, एक गड्ढा मिला, पानी था उसमे, पत्ते पड़े थे, एक आद छिपकली भीरेंग रही थीं, शिकार की तलाश में, हमें देख, भाग लीं वो वहाँ से! "आगे ज़रा" बोला वो,
और हम आगे चले, आगे पहुंचे, तो बड़ा ही अजीब सा नज़ारा देखा! रेत वहाँ सफ़ेद रंग का था! एक गड्ढा बना हुआ था, कोई दस गुणा दस का, सूखा था वो गड्ढा, आसपास नदी की सीपियाँ पड़ी थीं, घोंघों के खोल पड़े थे, पेड़-पौधा कुछ नहीं, कोई घास-फूस भी नहीं! बस वो अकेला गड्ढा ही था वहाँ! मैंने गड्ढे में झाँक कर देखा, तो तले में भी रेत ही था, कोई गड्ढा नहीं, सभी ने देखा, कुछ न था, हाँ! कौशुकि ने नहीं देखा, वो कहीं और ही देख रही थी, उस गड्ढे से पार!
और चलीअकेली उधर! कुछ दूर! हम भी चल पड़े पीछे उसके!
वो एक जगह रुकी, और घूम घूम कर, मुआयना करती रही,
और फिर एक जगह रुक गए, पाँव से ज़रा सी मिटटी खोदी, ज़रा सा रेत! बैठी, और उठाया वो रेत, ऊपर किया हाथ, और फेंकी वो चुटकी! घूमी, और चली बायीं तरफ, वहां रुकी, और एक लकड़ी उठायी उसने, वहाँ खोंस दी, इस तरफ कुल पांच लकड़ियाँ खोंस दी उसने! "ये क्या है?" पूछा शर्मा जी ने, "कोई विधि है" कहा मैंने, "अजीब सी विधि है?" बोले वो, "हाँ, अजीब तो है!" कहा मैंने, अब कौशुकि ने, अपनी गरदन से लपेटा वो कपड़ा उतारा, ज़मीन पर बिछाया,
और बैठ गयी! आँखें की बंद उसे, मिटटी उठायी एक चुटकी!
और पढ़ने लगी कुछ! मैं तो उसे हैरानी से देखे जाऊ! करीब पांच मिनट बाद आँखें खोली उसने, उठी, कपड़ा उठाया, झाड़ा,
और आई वापिस हमारे पास, उसने सभी को देखा एक एक करके! "यहां द्रौंच है!" बोली वो, मेरे कान हुए खड़े! पहली बार किसी द्रौंच के विषय में सुना था! पढ़ा तो था, लेकिन कभी ऐसा भी होगा, ये नहीं सोचा था! द्रौंच! आज जैसे सपना साकार हो उठा था! मित्रगण! ये नागों की सर्वोच्च प्रजाति है! नाग-वंशियों की! इसमें एक नागराज होते हैं, अपनी दो पत्नियों के साथ! ऐसे द्रौंच भारत, नेपाल, चीन, मंगोलिया, अफ़ग़ानिस्तान, आगे किरगिस्तान तक हैं।
म्यांमार, थाईलैंड आदि देशों में भी इनका वर्णन मिलता है! वहां ऐसी कई रचनाएँ भी हैं इनके बारे में! ये परम राजसिक और क्रोधी प्रवृति के होते हैं! पृथ्वी में, सुतल लोक
को इनका वास माना जाता है! हिमालय ऐसी ही कई किवदंतियों का घर है! कई रहस्य छिपाए हैं! हिमालय का मुश्किल से पंद्रह प्रतिशत ही आज का मानव जान पाया है। लेकिन! कौशुकि ने कैसे जाना? ये तो मैं भी नहीं जान सकता था? ऐसी कौन सी विद्या उसने लगाई थी? कहाँ से सीखी थी? कौन से गुरु श्री थे उसके? मझे तो उस पल, द्रौंच से अधिक, ये प्रश्न सफेदे के पेड़ से लम्बे लगे! वो साध्वी, अपनी सहायिका संग, चली गयी थी एक तरफ!
और हम, मुंह ताक रहे थे एक दूसरे का! "द्रौंच!" बोले बाबा! "हाँ!" बोला श्रीचंद, मुंह पोंछते हुए! "भाग खुल गए!" बोले बाबा! भाग खुल गए? वो कैसे? "कैसे बाबा?" पूछा मैंने, "द्रौंच क्रोधी होते हैं, परन्तु प्रसन्न हो जाए तो जीव-रहस्य ज्ञान देते हैं!" बोले वो, "कैसा जीव-रहस्य?" पूछा मैंने, "परम विद्याएँ! समूल ज्ञान!" बोले वो, परम विद्याएँ! समूल ज्ञान! अब कौन न लेना
चाहेगा? कुछ अंश ही मिल जाए तो, जीवन धन्य हो जाए! बाबा और श्रीचंद जुगत भिड़ा रहे थे,
और मैं, उस विश्राम करती साध्वी को देख रहा था! और अचानक ही, उसकी तरफ चल पड़ा मैं,
पहुंचा वहाँ, उसने देखा मुझे, अपनी गरदन पोंछ रही थी कपड़े से, "आइये" बोली वो, "धन्यवाद" कहा मैंने, "बैठिये" बोली वो, मैं बैठ गया, जूते खोल दिए थे अपने मैंने, "कहिये" बोली हल्की सी मुस्कुराहट लिए हुए, "आपने तो कमाल कर दिया!" कहा मैंने, "कैसे?" बोली वो, "आपने ये कैसे जान लिया कि यहां द्रौंच हैं?" पूछा मैंने, मुस्कुराई वो हल्का सा, "सभी का अपना उर्ध्व-मंडल होता है!" बोली वो, "हाँ?" कहा मैंने, "बस, वही जाना!" बोली वो, "कौन सी विदया से?" पूछा मैंने, "आप जानना चाहते हैं?" पूछा उसने, उसकी साध्वी ने उसको पानी दिया, उसने पानी लिया,और बोतल ऊपर कर, पानी पीने लगी, मैंने उसको देखता रहा उस समय, पानी पी लिया था उसने, बोतल पकड़ा दी वापिस, "हाँ, जानना चाहता हूँ" कहा मैंने, "ताक्षिकी-विद्या!" बोली वो,
क्या ? मैंने तो नाम भी नहीं सुना? ये कौन सी विद्या है? मेरे माथे पर, सिलवटें पड़ी तब! कनपटियों में खारिश सी हुई। असमंजस की! कौतुहल की! उत्सुकता की! "आप कहाँ से हैं?" उसने पूछा,
मैंने बता दिया सबकुछ उसको, उसने गौर से सुना, और हाथ पर, खुजाते हुए, मुझे देखा, "आप कहाँ से हैं?" पूछा मैंने, "मैं? मैं हिमाचल के एक छोटे से गाँव से!" बोली वो, "और आपका डेरा?" पूछा मैंने, उसने बता दिया कि उसके गुरु श्री हैं, जनमेय नाथ जी! "तो उन्होंने ही पारंगत किया आपको?" पूछा मैंने, "हाँ, उनकी पत्नी, मेरी गुरु माँ श्री ने!" बोली वो, "क्या नाम है उन देवी का?" पूछा मैंने, "वारुणी श्री!" बोली वो, मैंने प्रणाम किया उसके गुरु श्री और गुरु माँ श्री को! थोड़ी देर शान्ति रही, "पानी देंगी आप?" कहा मैंने, "हाँ, अवश्य" बोली वो,
और पानी की बोतल दे दी मुझे, मैंने ओख से पानी पिया, पानी में हल्का सा मीठापन था, "ये शहद है!" बोली वो, "अच्छा! अच्छा!" कहा मैंने, "वैसे कुछ पूछ सकता हूँ?" कहा मैंने, "हाँ अवश्य!" बोली वो, "अब यहां प्रयोजन क्या है?" पूछा मैंने, वो मुस्कुराई! "हम, उनसे मांगेंगे कुछ!" बोली वो,
मांगेंगे? लेकिन क्या? इतनी उच्च-विद्या है उसके पास पहले से ही, तो अब क्या शेष? "क्या मांगेगे?" पूछा मैंने, "जो शेष है।" बोली वो,
अब पहली बार, पहली बार मुझे, कुछ अहंकार सा टपकता दिखा उसकी जुबान से! मैं तो जैसे दुविधा में था! "और कैसे मांगेंगे?" पूछा मैंने, "मांग कर!" बोली वो, "और जो न माने तो?" पूछा मैंने, "तो विकल्प बहुत हैं!" बोली वो, "प्रताड़ित कर?" मैंने ही कह दिया! "क्या कुछ खेद की बात?" बोली वो, "नहीं नहीं!" कहा मैंने, "फिर?" पूछा मैंने, "जो चाहते हैं, वो मिल जाए!" बोली वो, "साम-दाम-दंड-भेद!" कहा मैंने, अब हंस पड़ी वो! मैं नहीं हंसा! मुझे तो ये सरासर
मूर्खता ही लगी! "जब ऐसा हो, तो आप देख लेना!" बोली वो, अपने हाथ से अंगठी निकाल ली थी उसने, मेचनि-मुद्रिका थी, ज़हर-मोहरा जैसी! "जी!" कहा मैंने,
और प्रणाम कर, वापिस चला, शर्मा जी, बीड़ी के लुत्फ़ ले रहे थे आनंद से! पहुंचा वहाँ तक! "क्या रहा?" पूछा उन्होंने, "यहां तो जुद्ध होगा अब!" कहा मैंने, "कैसा जुद्ध?" पूछा उन्होंने, अब बताया मैंने उन्हें सब कुछ! "ये तो मुझे पहले दिन से ही सांपन लग रही थी!" बोले वो, मुझे हंसी आ गयी! "अब बाबा बजायेंगे बीन! और फिर इन सबकी बजेगी बीन!" बोले वो,
फिर से हंसा मैं! "लेकिन साधिका में दम है, बल है!" कहा मैंने, "ऐसा बल किस काम का?"बोले वो, "देखते हैं!" कहा मैंने,
और तब बाबा ने बुलाया मुझे! मैं चला उनके पास, पहुंचा, "अब चलना होगा, कल प्रातः आना है" बोले वो, "जैसी आज्ञा!" कहा मैंने,
और हम फिर वापिस चल पड़े! फिर वही रास्ता! ऐसा रास्ता कि, वहाँ तक पहुँचते पहुँचते, पूरे शरीर पर, केंचुली चढ़ जाए!
और उतरते ही, बस धड़ाम! तो हम आ गए थे वापिस, वापिस आये तो आराम किया हमने, थोड़ी बातें हुईं उस साधिका के विषय में, उसके अपन आप पर बहुत आत्मविश्वास था, होना भी चाहिए, लेकिन, ये आत्मविश्वास कहीं अहंकार का रूप न ले ले, इसको भी छीलते रहना आवश्यक है! वो जिस प्रकार से बात करती थी, उस से, उस लहजे से तो यही लगता था कि उसको अहंकार है अपनी विद्याओं पर! चलो, चल जाता पता उसको इसका भी, भला करो, भला पाओ, बुरा करो, बुरा ही मिलेगा, मैं तो यही जानता हूँ, दो टूक बात! संध्या का समय हो चला था, बाबा ने सामान भिजवा दिया था, तो हमें फिर अपनी हुड़क मिटाई, और फिर भोजन किया, भोजन पश्चात, आराम से, लम्बी चादर तान, सो गए थे, अब तो बस, प्रातःकाल ही जाना था, हम तो मात्र दर्शक ही थे, कर्ता-धर्ता तो बाबा और वो साध्वी ही थे! प्रातःकाल कोई छह बजे, बाबा ने जगवा दिया था हमें, आनन-फानन में नहाये धोये और चाय-नाश्ता किया, उसके बाद फिर से चल पड़े, आज कौशुकि ने, कुछ कर दिखाना था! तो हम बड़े उत्सुक थे, वो रास्ता फिर से आरम्भ हआ, पसलियां हिली,
पेट में भूचाल आया, कंधा बचाते, सर बचाते, चलते रहे!
और किसी तरह हम जा पहुंचे वहाँ! आज तो कौशुकि कुछ सामग्री आदि लायी थी, और बाबा भी कुछ सामान ले आये थे, शायद कोई क्रिया आदि करनी थी उन्हें! हम पैदल चले और जा पहुंचे उधर ही, उस गड्ढे के पास, एक जगह चादर बिछा दी गयी थी, एक जगह हमने भी अपनी चादर बिछा ली थी, हम वहीं जा बैठे थे, पानी पिया हमने और मैं तो वहाँ लेट गया था, शर्मा जी बैठे हुए, वहीं उन्हें देखे जा रहे थे! "एक मिनट, देखो तो सही?" बोले वो, मैंने लेटे लेटे ही देखा उधर! कौशुकि ने, उस गड्ढे के चारों ओर कुछ सफेद सी लकड़ियाँ गाड़ दी थीं, और उन लकड़ियों पर, सफेद धागा बाँध, एक घेरा सा बना लिया था! "ये तो बंधन लगता है!" कहा मैंने, "कैसा बंधन?" बोले वो, "लगता है वे, इस गड्ढे को बाँध रहे हैं" मैंने कहा, "किसलिए?" बोले वो, "शायद वो उन्हें आने को विवश करे!" कहा मैंने, "अच्छा !" बोले वो,
और तब बाबा हट गए वहां से, दूर जा बैठे, बस कौशुकि ही रह गयी वहाँ अकेली! "अब क्रिया आरम्भ की है!" कहा मैंने, "अच्छा !" बोले वो,
और हम उठ खड़े हुए तब, गौर से उधर ही देखते रहे, कौशुकि ने, कुछ फूल उस गड्ढे पर छिड़के, कुछ मंत्र पढ़े, और कुछ जल डाला उधर, तदोपरांत, वहाँ से हट गयी वो, और चली अपनी सहायिका की तरफ, कोई आधा घंटा बीता, कुछ न हुआ वहाँ! फिर कोई एक घंटा, तब भी कुछ न हुआ।
फिर उठी वो, और चली गड्ढे की तरफ, पहुंची, और झाँका उसने, अब मैं भी चला, पहुंचा, और झाँका अंदर, फूल पड़े थे गैंदे के वहाँ,
और तो कुछ न था वहाँ! कौशुकि कुछ चिंतित सी लगी, उसने मिट्टी उठायी एक चुटकी,
और अभिमंत्रित कर, फेंक दी नीचे, गड्ढे में, तब भी कुछ न हुआ! वो वहीं कपड़ा बिछा बैठ गयी, मैं ज़रा दूर से, देखता रहा ये सारा माजरा! कोई आधा घंटा वो वहीं बैठी रही, लेकिन हुआ कुछ नहीं! मैं तो वापिस आ बैठा था अपनी जगह, लेकिन देख वहीं रहा था! कौशुकि फिर से खड़ी हुई,
और चली सहायिका के पास अपनी, पानी पिया उसने उधर, और चेहरा पौंछा अपना, अब मैं उठा, वो जा पहुंचा उसके पास, उसने बैठने का इशारा किया तो मैं बैठ गया, अब तक दो घंटे का समय गुजर चुका था, और, रेत का एक कण भी न हिला था! "अभी कितना समय?" पूछा मैंने, "कह नहीं सकती" बोली वो, "वैसे वो द्रौंच यहीं हैं?" पूछा मैंने, "हाँ, यहीं हैं!" बोली वो, "आप उन्हें बुला रही हैं?" पूछा मैंने, "हाँ" बोली वो, "तो निवेदन स्वीकार नहीं किया उन्होंने?" पूछा मैंने, "अभी तक तो नहीं" बोली वो,
"तो प्रत्यक्ष मंत्र प्रयोग करते?" कहा मैंने, "कोई आवश्यकता नहीं" बोली वो, "इसी से आ जाएंगे?" पूछा मैंने, "आना ही होगा!" बोली वो, "अच्छा!" कहा उसने, मैंने फिर से पानी माँगा, और पानी मिला, पानी पिया, आज भी मीठा ही था पानी, "अभी कितना समय और?" पूछा मैंने, "कोई एक घंटा" बोली वो, मैं फिर उठा वहां से, अब धूप तेज हो चली थी, इसीलिए, हम अपनी चादर दूसरी जगह ले गए, एक दूसरे स्थान पर, वहां बिछा दी,
और लेट गए, घंटा भर था अभी,
आराम कर लेते तो ठीक था! हमने अपने सामान का बनाया तकिया,
और लेट गए, नदी किनारे की ठंडी हवा चल रही थी, पेड़ों के पत्तों से धूप छन रही थी, माहौल ही ऐसा था की स्वतःही नींद आ जाए!
और फिर हम सो गए! कुछ होता तो जाग ही जाते! मेरी नींद खुली, कोई सवा घंटे बाद, मैं उठा, और देखा उधर, कौशकि, बाबा और श्रीचंद, वहीं उस गड्ढे को घेरे खड़े थे, इसका मतलब, कुछ न हुआ था अभी तक! शर्मा जी को जगाया मैंने,
वे जागे,और उनींदा से बैठ गए! "हूँ?" बोले वो, "कुछ नहीं हुआ शायद" कहा मैंने, "अच्छा" बोले वो, "आओ, देखते हैं" कहा मैंने, "चलो" बोले वो,
और हम चल पड़े उधर, पहुंचे गड्ढे तक, अंदर झाँका, गड्ढा जस का तस! बाबा और श्रीचंद बातें कर रहे थे आपस में, किसी और स्थान की बातें कर रहे थे,
और कौशुकि, नज़रें गड़ाए उसी गड्ढे को देख रही थी, मैं ज़रा चला उसके पास,
और खड़ा हुआ, अंदर झाँका, "कुछ नहीं हुआ?" पूछा मैंने, उसने तो उत्तर ही नहीं दिया! मैंने फिर से पूछा वही सवाल, "नहीं, अभी तो कुछ नहीं" बोली वो, तो इस तरह एक घंटे से ज़्यादा और बीत गया!
और कुछ न हुआ, वे तीनों एक साथ बैठे कुछ मंत्रणा सी कर रहे थे! और यहां मैं और शर्मा जी, अपनी अपनी अटकलें लगा रहे थे। करीब आधे घंटे के बाद, बाबा उठे, कुछ सामान निकाला, और चले गड्ढे के पास, वहां पहुंचे, और गड्ढे में कुछ तांत्रिक-सामग्री डाल दे,
और हुए वापिस, हमें आवाज़ दी, हमे गए वहाँ तक, अपनी चादर उठाये हुए, "जी?" कहा मैंने, "चलो अब" बोले वो,
"लेकिन हुआ क्या?" पूछा मैंने, "अभी तो कुछ नहीं" बोले वो, "कुछ भी नहीं?" बोला मैंने, "नहीं" बोले वो, "अब?" पूछा मैंने, "अब क्या? आज तैयारी करते हैं, कल आते हैं" बोले वो. "ठीक है बाबा!" कहा मैंने,
और हम फिर वहां से से चल पड़े वापिस, सड़क से लड़ते-लड़ाते हम चल रहे थे वापिस, की एक जगह रुके, एक और जीप मिली थी रास्ते में, बाबा उतर गए थे जीप से, शायद कोई जानकार था उनका वो, उनके बीच में काफी बातें हुईं, करीब आधा घंटा, फिर एक महिला उस दूसरी जीप से उतरी, आई हमारी गाड़ी की तरफ, अंदर झाँका, और उस साध्वी को देख प्रणाम किया! शायद वो महिला जानकार थी उस साध्वी की, अब साध्वी भी उतर गयी नीचे,
और उस महिला संग बातें करने लगी, हम कभी बाबा को देखें, कभी उस साध्वी को, "शर्मा जी?" बोला मैं, "हाँ जी?" कहा उन्होंने, "आओ यार, लघु-शंका त्याग कर आएं?" बोला मैं, "आओ फिर" बोले वो,
और हम चल पड़े एक तरफ, एक जगह लघु-शंका त्याग की, और फिर आये वापिस, बाबा तो बैठ चुके थे गाड़ी में, और वो साध्वी, अब बैठने की तैयारी में थी, हम भी जा बैठे फिर, गाड़ी चली, चूं-चर्र की आवाजें निकालते हुए।
और इस तरह, हम पहुँच गए वहाँ, ऐसा सुकून मिला कि जैसे तीर्थाटन कर लौटे हों! हाथ-मुंह धोये, और चले अपने झोंपड़े में!
जा बैठे, पानी पिया, और लेट गए! "आज भी कुछ नहीं हुआ" बोले वो, "हाँ" कहा मैंने, "कल देखो, क्या होता है" बोले वो, "हाँ जी!" कहा मैंने, तभी एक स्त्री आई, भोजन लायी थी, भोजन रखा उसने, और हमने भोजन किया फिर, घीया बनाया था उस दिन, ऐसा ताज़ा घीया कि खोया सा लगे! बहुत लज़ीज़ बना था, देसी महक, देसी दही और देसी घी से चिपड़ी रोटियां! साथ में मिर्च का अचार! सीतापुरी मिर्च! हर छेद से हॉर्न निकले! ऐसी मिर्चे! घीया, जानते हैं मित्रगण इसके उपाय? कुछ सरल में बताता हूँ! हाथ-पाँव में अक्सर पसीने आते हों, तो घीये का
छिलका, बारीक पीस लें, उसकी लुगदी को, पाँव के तलवों पर, और हाथों पर लगाएं, हफ्ते भर में, ये सब समाप्त हो जाएगा,
लू लगी हो, तो घीया घिस कर, लुगदी बनाएं, पांवों की एड़ियों पर लगा दें,लू का प्रभाव खत्म! शीघ्रपतन होता हो, तो घीया उबाल लें, कोई पचास ग्राम, अब इसमें, दो ग्राम पीसी काली मिर्च, और कोई पांच ग्राम, पिसा जायफल मिलाएं, इसको संसर्ग से आधे घंटे पहले खा ले, पंद्रह बार ऐसा करें, शीघ्रपतन, जीवन भर न होगा! यदि स्त्री में ठंडापन हो, काम से बचती हो, शरीर में कोई कष्ट न हो, और कामेच्छा न जागे तो, ये प्रयोग करें, पचास ग्राम घीये के बीज लावें,
रात भर, नमक डाले पानी में डुबो दें, दोपहर समय, छील लें उन्हें, अब, लाल मिर्च के डंठल ले लें, छह, बस छह,
और इसमें, चार छोटी इलायची के बीज डाल दें, पीस लें, इलायची दो हों, अब उस स्त्री को ये लुगदी, दिन में एक बार, शहद में मिला छटा दें, या भोजन की सब्जी या दाल में मिला दें, दस दिन करें, और परिणाम देखें!
आपको भी वीर्यवर्धक वटी की आवश्यकता पड़ जायेगी! यदि, पेट में समस्या रहती हो, दर्द बना रहता हो, कब्ज़ रहती हो, पेट में प्रदाह सा महसूस हो, वायु प्रताड़ना रहती हो, तो निम्न प्रयोग करें, पचास ग्राम घीये के बीज, पांच ग्राम हींग, पांच ग्राम भुनी हुई अजवाइन,
और दस या बीस ग्राम गुड, इन सभी को मिला कर पीस लें,
और ये एक गाढ़ा सा चूर्ण बन जाएगा, हो सके, तो गोलियां बना लीं, रात्रि समय, भोजन पश्चात, एक गोली का सेवन करें, ग्यारह दिन करें, समस्या समाप्त! यदि बवासीर हो गयी हो, दर्द रहता हो, रक्त बहता हो, तो निम्न प्रयोग करें, अचूक लाभ होगा!
सौ ग्राम, घीये के बीज, बीस ग्राम शुद्ध देसी घी, दस ग्राम, भुना जीरा, दस ग्राम, शुद्ध खोया, दस ग्राम, मगज़(खरबूजे के बीज), पांच ग्राम, त्रिफला चूर्ण, पांच ग्राम सूखे आंवले का चूर्ण, इनको पीस लें, चूर्ण बना लें, गाढ़ा बने, तो गोलियां बना लें, भोजन करे जब, तो पानी पीने से पहले, एक गोली, या चूर्ण हो तो एक चुटकी, फंकी लगा लें, एक पखवाड़ा प्रयोग करें, समस्या मूल से ही काट जायेगी! अब एक छोटा सा इसका तांत्रिक प्रयोग बताता हूँ, ढाक का पत्ता लाइए, तोड़कर, पेड़ से, बिना छिद्ग वाला, इस पर, तीन तरह के तेल का आवरण मलें, सरसों, नारियल और अन्य कोई भी, जैसे मूंगफली, सोया या सूरजमुखी, कोई भी, उस पत्ते को तब, आठ जगह मोड़ें, सफ़ेद और पीले धागे से बाँध लें, गंडे की तरह, अब इसको, नौ दिन, कमर से बांधे रहें, दसवें दिन से, समस्या समाप्त! परहेज,स्त्री-संसर्ग से दूर रहे, मीठा और खट्टा, इनसे बचें, तेज मसाला न खाएं, समस्या नहीं रहेगी! दोपहर बाद कुछ नहीं किया, बस खटिया ही तोड़ी, मट्ठा पीया था नमकीन, उस से और आलस आ गया था, मढे से ऐसा ही होता है, मैं शुद्ध की बात कर रहा हूँ, सपरेटा वाला नहीं। तो उस दिन बस खटिया और हम, हम और खटिया। शाम को बाबा ने फिर से
जुगाड़ करवा दिया था, साथ में खाने को बढ़िया मसालेदार माल भिजवाया था! तो हमने आराम से खाया पिया, भोजन किया और लम्बे पाँव पसारे! हई सुबह! निवृत हए, और चले ज़रा घूमने, आज वहाँ नहीं जा रहे थे जहां कल गए थे, आज जगह दूसरी थी, तो हम चल दिए, पेड़ लगे थे बड़े बड़े! पीपल के पत्ते जब खड़. खड़ करते, तो अपनी साधनों के प्रारम्भिक दिन याद आने लगे! कैसे वो मेरा प्यार पीपल का पेड़, साथ दिया करता था! मेरा सरंक्षण किया करता था, एक पिता की तरह, माता की तरह एक दादा श्री की तरह! वो भी खड़-खड़ करता था ऐसे ही हवा चलने पर! ठीक ऐसा ही था वो भी! मैं उसको सुबह, शाम प्रणाम किया करता था। उसी की याद आ गयी! मैंने उस पेड़ को प्रणाम किया और उसका तना चूम लिया! खड़-खड़ हुई! मुझे बहुत अच्छा लगा! बड़ा, फैला हुआ, घना पेड़! मेरा वो पेड़, जिसे मैं अपना कह रहा हूँ, आज भी है! आज भी मैं उसको प्रणाम किया करता हूँ! तो हम वहां से आगे निकले, अब खेत शुरू हए, बारी के खेत थे,सब्जियां आदि लगी थीं, हरी मिर्चे, भिंडियां, टमाटर आदि, खीरे लगे थे, सो दो तोड़ लिए, साथ ही, पानी की एक नाली से साफ़ कर लिए, उनको बीच में से तोड़ा, और खाने लगे! मक्खन सा स्वाद था उनका! "ये हैं खीरे!" बोले वो, "हाँ!" कहा मैंने, "एक शहर में मिलते हैं, सूखे-सुखाये, रंगदार!" बोले वो, "वहाँ का तो यही हाल है!" कहा मैंने,
आगे तक खेत ही खेत थे, सो हम वापिस लौटे, जैसे ही लौटे, एक बड़ी सी पटरा-गोह दिखी! मगरमच्छ जैसी!
"ये क्या है?" बोले वो, "पटरा-गोह!" कहा मैंने, "ये काट ले तो? हाथ या पाँव ही काट ले!" बोले वो, "ये नहीं काटती, ये सीधी होती है! गाँव वाले इसको हाथों से उठाकर, दूसरे खेत में रख देते हैं!" कहा मैंने, "अच्छा? और खाती क्या है?" पूछा उन्होंने, "ये सर्वभक्षी है, शिकार नहीं कर पाती, भागा नहीं जाता!" बोले वो, "मगरमच्छ सी लग रही है।" बोले वो,
"हाँ, वजन में साठ से नब्बे किलो तक हो जाती है कोई कोई तो!" कहा मैंने, "खेती नहीं खराब करती?" बोले वो, "नहीं, बस इतना कि कभी-कभार टमाटर या भिन्डी को खाती है तो, उनके पौधे ही उखड़ जाते हैं!" कहा मैंने, उसने जीभ निकाली बाहर, और थोड़ा सा आगे बढ़ी! "देखो!" कहा मैंने,
और मैं उसके पास चला गया, बैठा और उसके सर पर, श्वान की तरह से हाथ फेर दिया, कुछ न कहा उसने, इंसानों से कोई भय नहीं उन्हें! "आओ?" कहा मैंने, वे आये, खड़े रहे, "छु कर देखो?" कहा मैंने, वे बैठे, और उसके सर को छुआ उन्होंने! "ये देखो इसके पंजे!" कहा मैंने, पंजे पकड़ते हुए! "बड़े ही भयानक है!" बोले वो, "हाँ, कभी-कभार नर से बचने के लिए प्रयोग करती है!" कहा मैंने, "अच्छा! और ये क्या है नर या मादा?" पूछा उन्होंने, "बताता हूँ!" कहा मैंने,
और उसको पलटा, देखा, फिर सीधा कर दिया, "ये मादा है!" कहा मैंने, "क्या खूब निजाम हैं कुदरत के भी!" बोले वो, "हाँ!" बोला मैं,
और हम खड़े हुए, वो गोह, हमें सर उठाकर देखे, "आओ, चलें!" कहा मैंने, "चलो" बोले वो,
और हम चल दिए वापिस! वापिस आये तो हाथ-मुंह धोये, और फिर चाय-नाश्ता किया, आज उबले और जीरे में छौंके हुए चने आये थे, उसमे उबले हुए अण्डों के टुकड़े थे!
स्वादिष्ट बने थे! चना भारी होता है, आराम करवाता है, तो चाय-नाश्ता करने के बाद, आराम किया हमने! कोई आधे घंटे के बाद बाबा का सहायक आया, उस से बात हुई, हमें ग्यारह बजे दिन में निकलना था, अभी नौ बजे थे, उसको कह दिया कि ग्यारह बजे हम मिल जाएंगे जाते हए! और फिर किया आराम! कोई साढ़े दस बजे ही, भोजन भी कर लिया था! दाल-रोटी और दही-अचार! ठीक ग्यारह बजे, श्रीचंद गाड़ी ले आया था, आज उसके संग एक और सफेद दाढ़ी वाले बाबा आये थे! वे भी जाने वाले थे हमारे संग! और हम अब निकल गए, आज सामान काफी भरा था उन्होंने, लगता था जैसे ऑटो तो रात भर का कार्यक्रम था उधर! करीब एक घंटे में, अपनी हड्डियां और पसलियां संभालते हुए, हम वहाँ पहुंचे, सहायकों ने सारा सामान ले लिया था, और अब पैदल-यात्रा थी! चलते रहे जी हम! जा पहुंचे उधर! टांगों की हालत खराब हो गयी थी! जूते मिट्टी से सन गए थे पूरे, चादर बिछाई,और जूते उतारे, फूस से साफ़ किये,
और बैठ गए अब, पानी पिया, और मैं तो लेट गया! शर्मा जी भी लेट गए! और वे सब अपने अपने कामों में लग गए! सो सहायकों ने तो, तिरपाल से वहां पर झोपड़ी सी बना दी थी! उसमे ही बैठी थी वो साधिका, अपनी सहायिका के संग! "वैसे ये क्या उन्हें बुला रहे हैं?" पूछा शर्मा जी ने, "हाँ, जैसे मान लो आह्वान!" कहा मैंने, "और वे न आएं तो?"बोले वो, "तब तो मुश्किल हो जायेगी!" कहा मैंने, "आपका मतलब लड़ाई?" बोले वो, "हाँ!" कहा मैंने, "तो ये कहाँ जीतेंगे?" बोले वो, "कहा नहीं जा सकता कुछ भी!" कहा मैंने, "ऐसा बल है इसमें?" पूछा उन्होंने,
"मुझे तो लगता है!" कहा मैंने, "फिर तो कमाल है!" बोले वो, "मैं यही देखने तो आया हूँ!" बताया मैंने, "समझ गया" बोले वो, उधर, वो दाढ़ी वाले बाबा कुछ पढ़ रहे थे मंत्रादि, साथ में दूसरे बाबा भी खड़े थे, हाथों में, सामग्री लिए हुए! कुछ ही देर बाद, बाबा ने दाढ़ी वाले बाबा को दिया कुछ! उन्होंने थैली में से कुछ निकाला,
और उस गड्ढे के चारों ओर बिखैर दिया उसको, और हट चले वहां से, अब मैं हुआ खड़ा, शर्मा जी भी खड़े हुए,
और अब, चले हम गड्ढे की तरफ, "उस रेखा को न छूना!" चिल्लाये बाबा! "नहीं छू रहे!" कहा मैंने,
और हम पहुंचे गड्ढे तक, बाबा ने जैसे रक्त-चंदन प्रयोग किया था रेखा बनाने में! "ये क्या है?" पूछा उन्होंने, "पता नहीं, शायद रक्त-चंदन?" कहा मैंने, "वो किसलिए?"बोले वो, "होगी कोई क्रिया!" कहा मैंने, "ये बाबा मांत्रिक हैं क्या?" पूछा उन्होंने, "लगता तो यही है!" कहा मैंने, "और वो साधिका?" बोले वो, "वो शायद सात्विक ही है" कहा मैंने, "अच्छा !" बोले वो, "अब हटियै यहां से" आवाज़ आई एक,
ये साधिका थी, हाथ में कुछ सामान लायी थी अपने, हम हट लिए, थोड़ा सा दूर हो लिए, उस साधिका ने, निकाले कुछ फूल,
और डाले गड्ढे में, लोटे में रखे जल से स्पर्श कर, और फेंकती रही वो फूल नीचे गड्ढे में! अब हम पीछे हट गए थे, कौशुकि, वहीं एक कपड़ा बिछा बैठ गयी थी, पद्मासन में बैठ, शायद
मंत्रोच्चारण कर रही थी! हम वापिस लौट चले, कहीं कोई व्यवधान न पैदा कर दें हम, इसलिए, और आ गए अपनी जगह, वहीं जा बैठे, "आज तो दढ़ियल बाबा भी आये हैं!" बोले वो, "हाँ, देखते हैं!" कहा मैंने, "हाँ! मेरा ये प्रथम दृश्य है, किसी सात्विक को ऐसा करते देखना!" बोले वो, "हाँ! मेरा भी!" कहा मैंने, कौशकि वहाँ करीब बीस मिनट तक ठहरी, फिर उठी, और चल दी वापिस! "ये तो उठ गयी?" बोले वो, "हाँ, देखा मैंने" कहा मैंने,
और तब दाढ़ी वाले बाबा चले आगे, गड्ढे तक पहुंचे, फूल डाले, और कुछ जल भी, कुछ सामग्री, सूर्य देव को दिखाई,
और डाल दी गड्ढे के अंदर! और वस्त्र बिछा बैठ गए वहीं! "ये भी लग गए मंत्रोच्चार में!" बोले वो, "हाँ!" कहा मैंने, बाबा मंत्र पढ़े जाएँ, सामग्री फेंके जाएँ, बीच बीच में, हाथ जोड़े जाएँ! ऐसा आधा घंटा किया उन्होंने, फिर अपने घुटनों पर हाथ रख,
खड़े हुए, कपड़ा उठाया और लौटे वापिस! अब कौशुकि आ गयी उधर, उसने भी ऐसा ही किया,
आधे घंटे के बाद, वो भी उठ गयी! वापिस चली, फिर वो बाबा आ गए, वे बैठ गए! "ये क्या हो रहा है?" पुछा उन्होंने, "मंत्र-संख्या लब्धिकरण!" बोला मैं, "अर्थात?" बोले वो, "अर्थात, एक निश्चित संख्या में जप करना किसी मंत्र का!" बताया मैंने, फिर बाबा उठे और फिर वापिस चले, फिर से वो साधिका आई,और वो फिर वापिस चली! फिर से बाबा आये, बैठे, और फिर चले! पांच बजा दिए ऐसे ही उन्होंने, लेकिन हमें तो कुछ नज़र नहीं आया!
जब बाबा वहां गड्ढे पर बैठे थे, मैं कौशुकि के पास चला, आज्ञा ली और चला अंदर, जूते बाहर छोड़ दिए थे मैंने, "अब क्या चल रहा है?" पूछा मैंने, "जैसे आप आह्वान करते हैं वैसा" बोली वो, "किसी शक्ति का?" पूछा मैंने, "नहीं" बोली वो, "फिर?" पूछा मैंने, "स्थान-कीलन समझ लें आप" बोली वो, "स्थान-कीलन?" पूछा मैंने, "जी हाँ!" बोली वो, "वो किसलिए?" पूछा मैंने, "ताकि द्रोच आएं सामने!" बोली वो, "वो तो प्रत्यक्ष-मंत्र से भी आ जाएंगे?" बोला मैं, "अच्छा?" बोली वो, जैसे मैंने कोई चुटकुला सुनाया हो! "उस से क्या होगा?" बोली वो, "वो सामने आ जायंगे" कहा मैंने, "क्षमा कीजिये, ऐसा नहीं हो सकता" बोली वो, "आपकी इच्छा" कहा मैंने, उसने फिर से कुछ फूल उठाये, थैले में से,
"वैसे कितना समय और?" पूछा मैंने, "पता नहीं" बिना देखे उत्तर दिया उसने, इशारा था, कि मैं अब उठ लूँ वहाँ से!
सो उठ लिया, जूते पहने, और चला शर्मा जी के पास, "क्या कहा उसने?" पूछा उन्होंने, "कुछ सटीक उत्तर नहीं दिया!" कहा मैंने, "जब खुद को ही नहीं पता तो क्या उत्तर देगी?" बोले वो, "यही बात है" कहा मैंने, "बस कभी ये, कभी वो!" बोले वो, "आओ ज़रा!" कहा मैंने, "कहाँ?" पूछा उन्होंने, "आओ तो?" बोला मैं, "चलो" कहा उन्होंने,
और हम अब चले उधर से, गड्ढे को पार किया, कौशुकि, आँखें बंद कर, मंत्रोच्चार कर रही थी! हम निकले वहाँ से,
और चले आगे, आगे पहुंचे तो ऐसे ही गड्ढे थे! प्राकृतिक! "ये तो सारे उस जैसे हैं!" बोले वो, "हाँ!" कहा मैंने, एक गड्ढा छोटा था उधर, मैं वहीं बैठ गए, शर्मा जी को भी बिठा लिया, मैंने जैसे ही गड्ढे में हाथ डाला, बहुत ताप था उसके अंदर! मैंने किसी तरह से उसके तले में ऊँगली डालने की कोशिश की,
लेकिन नहीं डाल सका! बहुत गर्म था वो! "ये इतना गर्म कैसे?" पूछा उन्होंने, "पता नहीं!" कहा मैंने,
और खड़ा हुआ, वो भी खड़े हुए, और तब, तब मैंने कलुष लड़ाया, मित्र पौषित किये अपने और शर्मा जी के,
नेत्र खोले, और जो देखा वो अकल्पनीय था! वहाँ हर तरफ, ज़मीन के नीचे, सुरंग बनी पड़ी थीं! सब एक दूसरे से कहीं न कहीं जुड़ती थीं! अद्भुत नज़ारा था वो! एक जगह कुछ गड़ा था, एक पोटली थी जो दिख रही थी, एक कलश में बंद! "एक लकड़ी लाओ!" कहा मैंने, "लाता हूँ!" बोले वो, ले आये लकड़ी, अब खोदना शुरू किया उसे मैंने, करीब दो फीट खोदने के बाद, मैंने वो कलश देखा, रेत था, आराम से खुद गया था,
और जो कलश था, वो ताम्बे का था, छोटा सा, अधिक बड़ा नहीं था, एक लोटे के बराबर, निकाल लिया था मैंने, ढक्कन भी ताम्बे का ही था, वो हटाने की कोशिश की तो, खुला नहीं, लगता था जैसे, रांगे से बंद किया गया हो! "ये तो खुल ही नहीं रहा?" बोले वो, "कोशिश करो?" बोले वो, "आप कर लो!" कहा मैंने, उन्होंने लिया उसे, देखा, कोशिश की खोलने की, लेकिन न खला! उसको बजा के देखा, तो कोई आवाज़ नहीं! "रख लो इसको!" कहा मैंने,
और हम हुए खड़े,
रख लिया कलश, छिपा लिया,
और चल पड़े वापिस हम, जाकर, बैठ गए वहीं, वहाँ अब बाबा बैठे थे, कौशुकि हट गयी थी, शाम के सात बज गए! नतीजा वही सिफर का सिफर! कुछ नतीजा हाथ न लगा! हम भी परेशान हो गए थे बैठे बैठे! नागराज तो क्या, एक संपोला भी नज़र नहीं आया था!
और इस तरह बजे गए आठ! अंधेरा छा चुका था! गड्ढे पर दीप लगा दिए गए थे, हमारे पास कोई बत्ती नहीं थी, बस दूर एक हण्डा जल रहा था, उस से ही प्रकाश आ रहा था! शर्मा जी तो सो चुके थे, दोपहर से लेकर रात हो गयी थी! एक पत्ता भी न हिला था, बैठे बैठे ही थकावट हो चली थी! लेकिन वो बाबा और कौशुकि, न थके थे! वे बारी-बारी से मंत्रोच्चार करने जाते थे वहां! आठ घंटे यही चलता रहा, और करीब साढ़े दस बजे, बाबा आये हमारे पास, कि अब वापिस चलना है, चलो! उठे,और रोजाना की तरह,अब वापिस चले! रास्ते में को किसी से भी न बोला, शायद मायूसी छायी हई थी! मुझे तो यही लगा! आ गए वापिस, में सीधा बाबा के साथ ही चला, चला उनके साथ अंदर, बड़े बाबा बाहर ही थे, उस साधिका के संग! बिठाया उन्होंने अंदर मुझे, मैं बैठा, एक सहायक ने पानी पिलाया, पानी पिया, बाबा ने मुंह धोया अपने बाहर जाकर, और फिर हाथ-मुंह पोंछते हुए आये अंदर! बैठे! "बाबा?" पूछा मैंने, "हाँ, बोलो?" बोले वो, "ये चल क्या रहा है?" पूछा मैंने, "आप जो देख रहे हो!" बोले वो, "आप कोशिश क्यों
नहीं करते?" पछा मैंने, "बाबा जसवंत ने ही भेजा है इनको!" बोले वो, "अच्छा! इन बाबा का नाम क्या है?" पूछा मैंने, "गोपाल श्री, मथुरा के हैं" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने, "कर देंगे ये काम! मुझे बताया था बाबा जसवंत ने!"बोले वो, "कितना समय और?" पूछा मैंने, "कल कुछ न कुछ होगा ही!" बोले वो, "बाबा गोपाल ने कहा?" पूछा मैंने, "हाँ" बोले वो, "हो जाए बस!" कहा मैंने,
और मैं उठ आया वहां से, हाथ-मुंह धोये, फिर हमने भोजन किया! उसके पश्चात, हम सो गए फिर! यही दिनचर्या थी हमारी!
अगला दिन आया, निवृत हए, दोपहर में भोजन किया, और फिर निकल पड़े! मैंने वो कलश और अपना खंजर रख लिया था अपने साथ,
आज तो और भी सामान लाद लिया था, आज तो रैन-बसेरा वहीं बनना था शायद! पहुंचे वहाँ, तिरपाल से एक झोपड़ी बनाई गयी! हमारे लिए भी, हमारी झोंपड़ी, मोमजामे से बनाई गयी थी, नीले रंग के मोमजामे से!
खैर, समय बिताने के लिए तो बढ़िया ही थी! हम बैठ गए उसी में, और देखने लगे सामने का सारा क्रिया-कलाप! बाबा गोपाल, कौशुकि वहीं बैठ गए थे, और गहन मंत्रोच्चार में लीन हुए! एक घंटा ऐसे ही बीता! फिर एक वेदिका बनाई गयी!
और तब, सामग्री ही सामग्री डाली गयीं उसमे! गुग्गल की सुगंध फैल गयी! सामग्री की सुगंध फैल गयी!
और वे लगे रहे दोनों अपने अपने क्रिया-कलाप में! हम तो लेट गए थे! बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना! मित्रगण! फिर से बज गए सात!
और कुछ न हुआ, उबासियों के कारण हालत पतली होने लगी! अब सोएं भी तो कितना! तब बजे, आठ!
कुछ न हुआ! वही ढाक के तीन पात! "मार दिए भाई!" बोले वो, "क्या हुआ?" पूछा मैंने, "बैठे बैठे घुटने टूट गए!" बोले वो, अचानक से वो कलश याद आया मुझे! "अरे शर्मा जी?" बोला मैं, "हाँ?" बोले वो, "कलश निकालो?" कहा मैंने, "अरे हाँ!" बोले वो, निकाला और दिया मुझे, मैंने लिया, खंजर खोला
और की कोशिशखोलने की उसे! ढक्कन में हुई दरार!
और अब खोला वो कलश! अंदर से निकली एक पोटली! काले रंग की!
और कुछ नहीं था उसमे! अब पोटली खोली, नौ कौड़ियां, और भस्म निकली उसमे से! "ये क्या है?" कहा मैंने, "भस्म लगती है" बोले वो, "किसी की चिता-राख है!" कहा मैंने, "अच्छा !" बोले वो, "आओ, प्रवाहित कर दें!" कहा मैंने,
और हम, नदी तक गए, और आदर सहित, प्रवाहित कर दिया उसे, बहता चला गया वो आगे, और ओझल हुआ! वापिस पलटे, आये वहीं, अब गड्ढे पर मात्र कौशुकि ही थी, बाबा नहीं, "आओ" कहा मैंने,
"चलो" बोले वो,
