वर्ष २०१० कानपुर की...
 
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वर्ष २०१० कानपुर की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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हाथ की एक ऊँगली टूट गयी थी! वो नीचे झूल गयी थी! मै संदीप के पास गया और संदीप से बोला, " हरामजादे! अब पता चला कौन जाएगा और कौन नहीं?"

उसे मानो सांप सूंघ गया! कंपकंपी छूट गयी उसकी! मैंने कहा, "तुझे याद आया? तूने उस लड़की को मरवाने के लिए इस सारे हरामी के जंवाई से मदद ली? आया याद?"

अब शर्मा जी आगे बढे! और एक लात जम के मारी संदीप की छाती में अपने फौजी जूतों से! उसके मुंह से कराह निकली!

फिर बोला, माफ़ कर दीजिये, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी, माफ कर दीजिये" उसने दर्द से कराहते हुए कहा!

"माफ नहीं करना तुझे, साले कुत्ते तेरा वो हाल करूँगा मै कि ज़िन्दगी भर एक मक्खी मारने से भी लाचार हो जाएगा तू!" मैंने कहा,

तब मैंने क्रंद-मंत्र पढ़ा! जागृत किया और अपना थूक संदीप के ऊपर फेंक दिया! उसके शरीर में वक्र पड़ा गया! पीठ में रीढ़ की हड्डी मुड़ गयी! वो दर्द से छटपटाता रहा! अपने किये की माफी मांगता रहा, रोता रहा, गुहार लगाता रहा! जब बेहोश हो गया तो मैंने फिर उसे ठीक कर दिया! हाँ उसके शरीर में फालिज डाल दी!

अब हम वहाँ से निकले! अपनी गाड़ी में बैठे! मैंने अपना खबीस वापिस कर दिया!

तीनों को उनके किये का दंड जितना मै दे सकता था, दे दिया था!

अगले दिन हम वापिस दिल्ली आ गए!

आज दीपा बिलकुल ठीक है!

हां, बाद में संदीप के परिवार वाले आये नकुल के यहाँ, मेरी बात भी हुई उनसे फोन पर, लेकिन मैंने संदीप को ठीक करने से मना कर दिया!

------------------------------------------साधुवाद!----------------------------

 


   
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