वर्ष २०१० कानपुर की...
 
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वर्ष २०१० कानपुर की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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काली स्याह रात! अमावस की पावन रात! पावन भूमि! और रात्रि १ बजे का समय! शमशान में धधकती चिताएं! चिताओं पर चीनी का छिडकाव! जागता शमशान! और शमशान के एक कोने में एक जवान पुरुष की जलती चिता! जलती लकड़ियों की चिरन! निरंतर उठता धुंआ! आनंदित करने वाली ब्रह्म-गंध! पञ्च-तत्व-विलीन-गंध! इस चिता के चारों ओर बैठे शमशानपुजारी! सभी नग्न! चिताग्नि में रखी हुई हंडिया और हंडिया में उबलते चावल! थालियों में सजा मांस! और गिलासों में परोसी हुई शराब! शरीर पर धारण तंत्राभूषण! शरीर पर स्वयं-रक्त से बने विशेष चिन्ह! भस्मिकृत शरीर! चिमटों की खड़कती आवाजें! किसी किसी पुजारी का अलख चिल्लाना! हंसना! झूमना! मदोन्माद में झूमते पुजारी! चिता के सीधे हाथ पर बैठा मै! और चिता-भोग! तभी वहाँ एक २० वर्षीय कन्या लायी गयी! सम्पूर्ण नग्न! हम पाँचों ने एक एक करके उसका श्रृंगार किया! उसको शराब पिलाई सभी ने एक एक गिलास! मांस खिलाया गया एक एक कौर! फिर उसके पाँव पड़े! पाँव इसलिए की उसमे शीघ्र ही कराली-देवी का वास होने वाला था! हमने प्रश्न करने थे, अपनी अपनी बाधाओं, समस्याओं का निदान करना था! उसको स्नान कराया गया शराब से! चिता-भस्म लगाई गयी! उसके बाद उसको अपने सामने बिठा दिया गया! उसमे देवी प्रवेश हेतु उसका शुद्धन-कर्म किया गया! वो भूमि पर अचेत सी लेट गयी! सभी ने एक एक करके उसके पांवों पर अपना मस्तक रखा और फिर वापिस अपने अपने आसन ग्रहण कर लिए!

मंत्रोच्चारण आरम्भ हुआ! बाबा सिद्धेश्वर ने पहले अलख बोली फिर क्रिया आरम्भ हुई! आधे घंटे के बाद उस कन्या में कराली प्रवेश हुआ! वो उठ गयी! जीभ बाहर निकाल कर नृत्य में मग्न हो गयी! आँखें मोटी और चौड़ी हो गयीं! अट्टहास करे! चिता के चारों ओर नृत्य करे! पांवों से अपने साधकों पर मिटटी उछाले! हाथों से चिता की राख अपने साधकों पर बिखेर! और हम! हम दोनों हाथों से नमन करें! डमरू बजाएं! चिमटा खड़ककाएं! शराब का गिलास उठाये मंत्रोच्चार करें और मदमस्त हो जाएँ!

कराली अब बैठ गयी! हाँफते हुए! लेकिन अपनी गर्दन लगातार घुमाते रही! सिद्धेश्वर ने प्रश्न पूछे! उत्तर मिले! सिद्धेश्वर प्रसन्न! एक एक करके सभी ने प्रश्न किये और मैंने भी प्रश्न पूछा!

प्रश्न ये की 'उर्वारुक-कद्रप मुद्रा में कौन सा शक्तिपात अभीष्ट फलदायी है?'

उसने उत्तर दिया और मै भी प्रसन्न! कार्य संपन्न!

उसके बाद कराली को विदा करने की क्रिया आरम्भ हुई! मित्रगण! यहाँ पर हम अघोरी एक ऐसी क्रिया करते हैं, एक ऐसा कर्म करते हैं जो बताया नहीं जा सकता, क्षमा चाहता हूँ!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कराली वापिस हुई! उसको विदा कर दिया! अब उस कन्या की देह को पूर्वदशा में लाने हेतु हम पाँचों ने उसकी देह पर मूत्र-त्याग किया!

उसकी तन्द्रा भंग हुई! वो उठी! और उठ कर वहाँ से चली गयी! हम पाँचों ने एक दूसरे का अभिवादन किया और नमन करने के पश्चात वहाँ से अपने अपने आसन समेट अपने अपने स्थान के लिए चले गए! अपने स्थान का अर्थ यहाँ पर शमशान में अपनी भूमि है! वहाँ जा कर स्नान किया! और फिर भोग में बचा खाना समाप्त किया! वहाँ आये हुए कुत्तों को भी खाना खिलाया! उन्होंने भी अपनी पूंछ हिला हमारा धन्यवाद किया!

मित्रो! ये स्थान गोरखपुर के पास है! मुझे खबर मिली थी कि वहाँ कराली-साधना होने वाली है, इसीलिए मै इस निमंत्रण को ठुकरा न सका और शर्मा जी के साथ यहाँ आ गया!

उसके बाद में वापिस दिल्ली आ गया शर्मा जी के साथ! यहाँ अभी दो दिन रहा तो एक परिचित आ गए मेरे पास, वे कानपुर से आये थे, उनकी एक छोटी बहन यहाँ दिल्ली में ही ब्याही थी, समस्या इसी बहन के साथ थी, मैंने उनकी समस्या सुनने हेतु उनसे कहा, "बताइये नकुल साहब, क्या समस्या है?"

"जी समस्या मेरी छोटी बहन के साथ है" वे बोले,

"कैसी समस्या?" मैंने पूछा,

"समस्या कोई साल भर से है उसके साथ, नाम है दीपा, उसके पति यहाँ अध्यापक हैं, साल भर पहले उसके एक पुत्री हुई थी, उसके दो महीने तक तो दीपा ठीक रही लेकिन उसके बाद उसमे परिवर्तन आता चला गया, कहती है की कोई उसको मार देगा! वो पागल सी हुई रहती है, पूछो तो बताती नहीं कि कौन मार देगा?"

"अच्छा नकुल साहब, लेकिन क्या आपने उसका इलाज करवाया?" मैंने पूछा,

"हाँ, दीपा के पति ने उसका चिकित्सीय इलाज करवाया है, मानसिक इलाज भी करवाया है, परन्तु उसका कोई लाभ नहीं हुआ!" वो बोला,

"अच्छा, एक बात और, कोई ऊपरी इलाज करवाया?" मैंने पूछा,

"हाँ जी, वो भी करवाया, एक तांत्रिक ने बताया कि उस पर ४ प्रेतों का साया है, वो ही इसको तंग करते हैं" नकुल बोला,

"हम्म! तो फिर उस तांत्रिक ने वो प्रेत पकडे नहीं?" मैंने पूछा,

"उसने बताया कि ये प्रेत काफी ताकतवर हैं, वो उन्हें नहीं पकड़ सकता" उसने बताया,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"ठीक है नकुल साहब, मै उस दीपा से मिलना चाहता हूँ, देखना चाहता हूँ तभी पता चलेगा कि उसके ऊपर क्या अला-बल है"मैंने कहा,

"ठीक है, जैसा आप उचित समझें" नकुल ने कहा,

"आप दीपा का पता लिखवा दें, मैं आज शाम वहाँ पहुँच जाऊँगा, आप भी मुझे वहीं मिलें" मैंने कहा,

"ठीक है गुरु जी" नकुल ने कहा,

नकुल ने पता लिखवा दिया और फिर चला गया, शर्मा जी ने पता लिख लिया, उसके बाद मैंने थोडा पूजन किया और शाम की तैयारी में लग गया!

शाम को कोई ६ बजे मै और शर्मा जी वहाँ के लिए निकल पड़े, हम वहाँ करीब आठ बजे पहुंचे, नकुल और दीपा के पति महोदय वहीं मिले! नमस्कार आदि हुई और फिर चाय का प्रबंध किया गया, चाय समाप्त करने के पश्चात मैंने दीपा से मिलने की बात कही, नकुल और दीपा के पति मुझे उसके कमरे में ले गए, दीपा बिस्तर में लेटी हुई थी, उसके पति ने उसको उठाया तो वो बैठ गयी, सर पर पल्लू किया और सर झुका के बैठ गयी! मैं वहाँ एक कुर्सी पर बैठा और मैंने दीपा से कहा, "दीपा? कैसी हो?"

उसने जवाब ही नहीं दिया!

मैंने फिर पूछा, "दीपा? कैसी हो तुम?"

उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया, तब नकुल ने दीपा से बात करने को कहा, तो दीपा ने पहली बार मुझे देखा! उसने मुझे बड़े रहस्यास्पद ढंग से देखा! आँखें मिलाई लेकिन पलक नहीं मारी! अब मैंने उससे पूछा, "दीपा? कैसी हो तुम?"

मैंने ये कह के एक मंत्र जागृत कर लिया, अब वहाँ दीपा के अन्दर जो भी होगा, सामने आ जाएगा!

"ठीक नहीं हूँ" उसने कहा,

"लेकिन मुझे तो ठीक लग रही हो तुम?" मैंने कहा,

अब वो फिर चुप हो गयी और सर नीचे झुका लिया,

"मुझसे बात करो दीपा?" मैंने कहा,

"कर तो रही हूँ" उसने हलके से कहा, "ऐसे नहीं, सही तरह से बात करो मुझसे" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"कर तो रही हूँ" उसने कहा,

"सुनो. एक बात बताओ, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?" मैंने पूछा,

"दो" उसने जवाब दिया!

उसका जवाब सुन कर नकुल और दीपा के पति चौंके, नकुल ने दीपा से कुछ कहना चाहा तो मैंने अपने होठों पर ऊँगली रख कर उसको चुप रहने को कहा,

"दो बच्चे हैं तुम्हारे?" मैंने पूछा,

"हाँ, दो बच्चे हैं मेरे" उसने कहा,

"क्या नाम हैं उनके?" मैंने पूछा,

"रोहन और सोहन" उसने बताया,

अब फिर से नकुल और दीपा के पति चौंके!

"कहाँ रहते हैं वो?" मैंने पूछा,

"पता नहीं" उसने कहा,

"पता नहीं? ऐसा कैसे? अपने बच्चों के बारे में नहीं जानती तुम?" मैंने कहा,

"हाँ नहीं जानती, लेकिन वो मुझे मार देगा, तुमको भी मार देगा, नकुल भी मरेगा, ये भी" उसने अपनी बेटी की तरफ इशारा करके कहा,

बेटी नकुल के हाथों में थी, और फिर उसने अपने पति की तरफ देखा और बोली, "सबसे पहले ये मरेगा, मुझे बाँध के रखा है इसने ज़बरदस्ती, और जो वहाँ खड़ा है, वो भी मरेगा" उसने शर्मा जी की तरफ इशारा करके कहा!

"अच्छा! और मारेगा कौन हमको? ये भी बता दो" मैंने कहा,

"नेतराम मारेगा सभी को" उसने कहा,

"कौन नेतराम? मैंने पूछा,

"रोहन और सोहन का बाप" उसने कहा,

"वो तेरा पति है?" मैंने पूछा,

"हाँ, वो मारेगा सभी को" उसने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"तू जिंदा है?" मैंने पूछा, "दिखाई नहीं दे रहा क्या तुझे?" उसने कहा,

"दिखाई तो दे रहा है, लेकिन तुझे नहीं दिख रहा" मैंने कहा,

"क्या नहीं दिख रहा मुझे?" उसने कहा,

"कि तेरे सामने कौन खड़ा है!" मैंने कहा,

"कौन है तू?" उसने कहा,

"अभी बताता हूँ, रुक जा" मैंने कहा,

"हाँ बता अभी, अभी बता, उसने सर से पल्लू हटा लिया और मारने के अंदाज़ में बिस्तर से नीचे उतर गयी! ये देखा नकुल और दीपा के पति वहाँ से भागे! कमरे से बाहर! वो मेरी तरफ आगे बढ़ी और फिर शर्मा जी मेरे पास खड़े हो गए आकर!

"क्या बता रहा है मुझे? बता अब?" उसने कहा,

"ज्यादा मुंह न खोल साली रंडी! तेरी और तेरी माँ ****** हँ अभी" मैंने कहा,

"अबे जा यहाँ से, मेरा नाम नहीं जानता तू!" उसने कहा,

"नाम भी बता दे पहले, फिर तुझे मौका नहीं मिलने वाला!" मैंने कहा,

"नाम जानना चाहता है मेरा?" उसने गुस्से से चीख के कहा,

"हाँ! बता अपना नाम!" मैंने खड़े होते हुए कहा!

"तू सुन! मेरा नाम अल्हेड़ी है" उसने कहा और मुझ पर थूक फेंका! मै वहाँ से हट गया, थूक मेरे जूते पर गिरा!

"हरामजादी! अब मै तुझे बताता हूँ!" मैंने कहा और मैंने अपना एक खबीस प्रकट किया! खबीस बिना देर किये प्रकट हुआ!

खबीस को देख दीपा फ़ौरन अपने बिस्तर पर चढ़ गयी!

"क्यों? क्या हुआ? हगास उठ आई साली कुतिया!" मैंने कहा,

वो बिस्तर पर एकटक खबीस को देखती रही और खबीस उसको!

"क्या नाम बताया था तूने अपना? अल्हड़ी? यही ना? अब क्या हुआ? सांप सूंघ गया तुझे?" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो चुपचाप वहाँ बैठी रही, आँखें फाड़ के मेरे खबीस को देखती रही! मेरे खबीस के पाँव मेरे हाथों से छू रहे थे और वो ऊपर छत तक आ रहा था, इसीलिए वो ऊपर की तरफ घूर रही थी!

"अब सुन कमीन औरत! जैसा मै पूछता है वैसा बता, अगर झूठ बोला या चुप रही तो ये तेरी वो हालत करेगा कि हमेशा याद रखेगी! बता? जवाब देगी सही?

उसने गर्दन हिलाई और मरती सी आवाज़ में बोली, "हाँ"

"ठीक है, ये बता तू इस लाचार औरत में कहाँ से आई?" मैंने पूछा,

"नेतराम ने भेजा" उसने कहा,

"कौन है ये हराम की औलाद ये नेतराम?" मैंने पूछा,

"एक बाबा है। उसने कहा,

"कहाँ रहता है?" मैंने पूछा,

"चुनार में रहता है। उसने बताया,

मैंने खबीस को देखा, उसने भी कहा, "सही"

"क्यूँ भेजा उसने?" मैंने पूछा,

"इसको खा जाने को" उसने कहा,

"क्यों?" मैंने पूछा,

"वो नेतराम ही जानता है मुझे नहीं पता" उसने कहा,

"तू अकेली ही है यहाँ या और भी ही कोई?"मैंने पूछा,

"हाँ, छह है हम, आते जाते रहते हैं" उसने बताया,

"कौन कौन है वो छह?" मैंने पूछा,

"मैं, बबलू, फरीद, भूरा, मटरू और चंदर" उसने बताया,

"कब भेजा था तुझे इसके अन्दर?" मैंने पूछा,

"इसकी शादी से ४ रोज पहले" उसने बताया,

"अच्छा! तो तूने इसके पति के साथ फेरे भी लिए!" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"हाँ, उस समय मै ही थी" उसने कहा,

"इसीलिए तूने कहा कि इसके पति ने ज़बरदस्ती बाँध के रखा है तुझे!" मैंने कहा,

'हाँ!" उसने बताया,

"तेरी और इन पांच की माँ की *****!" मैंने गुस्से से कहा,

तब मैंने अपने खबीस से कह के सभी को उसमे से बाहर खींच लिया! सभी डर के मारे काँप रहे थे! खबीस ने उनको पकड़ा, मार लगाई और उल्टा कर उनको उनके पाँव से पकड़ अपनी बगल में दबा लिए! मैंने खबीस को वापिस भेजा और कहा कि इनको शमशान के कीकर के पेड़ पर चिपका देना!

वे सब निकले तो दीपा गिर पड़ी, बेहोश हो गयी! मैंने नकुल और उसके पति को बता दिया सारा मामला! उनके भी होश उड़ गए!

मैंने उन दोनों को कह दिया कि अब दीपा ठीक है, उसको आराम करने दो, अब अपने आप ही उठेगी वो, फिर मैंने नकुल को बुलाया और पूछा, "नकुल? कभी नाम सुना है कोई नेतराम अपने आसपास?"

"नहीं जी, कहीं कोई नेतराम नही है हमारी जान पहचान में" उसने बताया,

"ठीक है, मै ही पता करता हूँ कि ये नेतराम कौन है" मैंने कहा,

उसके बाद हम वहाँ से वापिस अपने स्थान पर आ गए! अब मुझे रात्रि समय क्रिया करनी थी, अतः सभी आवश्यक वस्तुओं का प्रबंध करने हेतु बाज़ार चले गए!

रात्रि समय मै क्रिया में बैठा, अपना कारिन्दा हाज़िर किया और उसको भेज दिया! कारिन्दा रवाना हो गया! और करीब आधे घंटे के बाद वो वापिस आ गया, पक्की खबर लाया था! खबर ये थी! दरअसल चुनार में रहने वाले एक व्यक्ति संदीप के साथ दीपा का प्रेम-प्रसंग था! वे शादी करना चाहते थे, परन्तु जाति विभिन्न होने से ऐसा नहीं हो पाया, संदीप ने दीपा को कोर्ट मैरिज करने के लिए कहा, दीपा ने मना कर दिया! और उससे मिलना भी छोड़ दिया! जो असंभव था वो संभव नहीं हो पा रहा था अतः दीपा उससे अलग हो गयी! संदीप ने कई बार उससे मिलने की कोशिश भी की लेकिन दीपा ने हमेशा मना कर दिया! संदीप ने उसको बदनाम करने की धमकी भी दी, लेकिन दीपा नहीं मानी आर उसे बाद आनन-फानन में दीपा की शादी यहाँ दिल्ली में रहने वाले एक व्यक्ति से हो गयी! इस बात संदीप चिढ गया! उसने दीपा से बदला लेने की ठानी और फिर अंत में वो एक तांत्रिक नेतराम के पास गया! दीपा की शादी से पहले, कोई ६ दिन पहले नेतराम से वो मिला, नेतराम ने पैसा


   
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श्रीशः उपदंडक
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लिए और दीपा में प्रेत-प्रवेश करा दिया! इसी वजह से दीपा की ये हालत हुई थी! नेतराम उसको धीरे-धीरे मारना चाहता था! ताकि किसी को कोई शक न हो! वो प्रेत भी बदलता रहता था! कभी कोई और कभी कोई!

खबर सटीक थी! कारण सामने था!

मैंने नकुल को अपने पास बुलाया! और नकुल से पूछा, "नकुल? ये संदीप कौन है या था?"

नकुल को जैसे झटकासा लगा! बोला, "हाँ जी था एक, चुनार का रहने वाला था"

"मुझे और अधिक बताओ उसके बारे में?" मैंने कहा,

"दीपा और उसका प्रेम-प्रसंग था शादी से पहले" उसने बताया,

"कितना अर्सा रहा ये प्रेम-प्रसंग?" मैंने पूछा,

"कोई २ साल तक चला था" उसने बताया,

"अच्छा! अब कहाँ है वो संदीप?" मैंने पूछा,

"पता नहीं जी अब कहाँ होगा, कोई वजह?" उसने पूछा,

"हाँ, ये दीपा के साथ जो भी हुआ है ये सब उसी का किया-धरा है, वो ही किसी नेतराम तांत्रिक के पास गया था, उसी ने ये किया है!" मैंने उसको बताया,

ये सुन उसको बड़ी हैरत हुई!

तभी नकुल के  फ़ोन पर फ़ोन आया कि दीपा की हालत फिर से खराब हो गयी है, वो लगातार रोये जा रही है, अपना सर बार बार दीवार पर मार रही है!

उस पर फिर से शय आई थी कोई! संभवतः नेतराम जान गया था अपने वार को असफल होते हए! मैंने तभी निश्चय किया कि हम दीपा के घर जायेंगे अभी उसी वक़्त!

मै, शर्मा जी और नकुल फौरन ही दीपा के घर की ओर निकल पड़े!

घर पहंचे! घर में कोहराम मच था! कई औरतें वहाँ थीं, दो चार पडोसी भी! सभी तमाशबीन! दीपा को उसके हाथों से बाँधा गया था! मैं  वहाँ पहुंचा, और सभी को वहाँ से हटा दिया, और अपना एक कद्दावर खबीस हाज़िर कर लिया! उसने खबीस देखा तो वो शांत हो गयी! मैंने कहा, "तू कौन है?"


   
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श्रीशः उपदंडक
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कोई जवाब उसने नहीं दिया! मैंने नकुल से कहा कि इसके हाथ खोल दो! बाकी मै संभाल लूँगा! हाल खोल दिए गए उसके! उसने कोई विरोध नहीं किया! बस मुझे देखती रही!

मैंने फिर पूछा! "कौन है तू?"

"बिल्सी माई" उसने कहा,

"कौन बिल्सी माई?" मैंने पूछा,

"खरेडा की बिल्सी माई" उसने कहा,

"तुझे भी नेतराम ने भेजा?" मैंने पूछा, "पदम् बाबा ने भेजा!" उसने बताया!

"कौन पदम् बाबा?" मैंने पूछा,

"घाट वाले बाबा!" उसने कहा,

"कौन सा घाट?" मैंने पूछा,

"कानपुर वाला" उसने बताया!

पहले नेतराम! और अब ये पदम् बाबा!

मामला और उलझता जा रहा था! अब इसका निदान आवश्यक था! मैंने फिर से दीपा को देखा और कहा, "बिल्सी माई अगर तू बचना चाहती है तो फौरन खड़ी हो जा इसको छोड़ कर!"

दीपा से निकल कर बिल्सी बाहर आ गयी! खबीस ने उसका झपट्टा मार कर पकड़ लिया और वापिस हो गया!

दीप फिर ठीक हो गयी थी! लेकिन अब इसमें प्रेत-प्रवेश का मार्ग रोकना आवश्यक था! इसीलिए मैंने एक धागा मंगवा कर उसको अवरोध-मंत्र से अभिमंत्रित कर दीपा के गले में बंधवा दिया! अब फिलहाल में तो उसमे कोई प्रवेश नहीं कर सकता था, जब तक कि अवरोध-मंत्र नहीं बींधा जाता!

मैंने दो चार बातें और बतायी उनको और फिर अगले दिन नकुल को अपने पास सुबह आने को कह दिया, उसके बाद मै और शर्मा जी वहाँ से वापिस आ गए!

रात को क्रिया में बैठा, कारिन्दा हाज़िर किया, और उसको इस पदम् का पता लगाने भेजा! कारिन्दा १५ मिनट में आ गया! कारिदे ने बताया कि नेतराम और पदम् वहीं थे! अर्थात


   
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श्रीशः उपदंडक
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कानपुर में! अब हमे कानपुर कूच करना था! तीन लोगों को पाठ पढ़ाना था! नेतराम, पदम् बाबा और संदीप! मैंने क्रिया करके सशक्तिकरण कर लिया! अब मै तैयार था!

अगले दिन सुबह खबर मिली कि दीपा ठीक है बस बुखार है, नकुल आ गया था अपने कहे अनुसार, हमे तभी कानपुर जाने का कार्यक्रम बना लिया!

हम रात १० बजे कानपुर पहुंचे! बहत भीड़-भाड़ मिली थी रास्ते में! थकावट हो गयी थी! नकुल के घर पर ही ठहरे उस रात, खाना आदि खाया और फिर सोने चले गए!

सुबह उठे, नहाए-धोये फिर चाय नाश्ता किया, और मैंने अभय-मंत्र का जाप कर उसको जागृत कर लिया!

मै कमरे में अकेला था अतः मैंने अपना मुखबिर-कारिन्दा हाज़िर किया और उसको इन तीनों का पता लाने को कहा! कारिन्दा रवाना हो गया! बीस मिनट में ही वापिस आ गया! नेतराम वापिस चुनार पहुंचने वाला था, और पदम् बाबा कानपुर देहात में ही था, उसका पता चल गया था! हाँ संदीप भी चुनार में ही था! मैंने कारिंदे को वापिस भेज दिया!

मैंने शर्मा जी को बुलवाया! और कहा, "शर्मा जी, हो जाइये तैयार! इस पदम् बाबा की खटिया खड़ी करनी है!"

"चलिए गुरु जी!" शर्मा जी ने कहा!

फिर हम तीनों वहाँ से उस पदम् बाबा के पते पर जाने के लिए निकल पड़े!

हम कोई एक घंटे में वहाँ पहुंचे! ये कोई नयी सी कॉलोनी थी, मकान नए ही बन रहे थे वहाँ, मुझे वहाँ एक साथ लगे दो पीपल के पेड़ ढूँढने थे, देखने पर मिल गए! बस यहीं था ये पदम् बाबा! हम आगे बढ़े!

ये एक मंदिर जैसी जगह लग रही थी, लेकिन मंदिर था नहीं, हाँ, अन्दर औरतें, आदमी नज़र आ रहे थे, एक आदमी से पदम् बाबा के बारे में पूछा तो उसने एक तरफ बने कमरे की तरफ इशारा कर दिया, हम वहीं चले गए! अन्दर धूनी चल रही थी, तीन आदमी वहाँ बैठे थे, मै अन्दर गया और पूछा, "पदम् बाबा कौन है?"

"आप कौन है? कहाँ से आये हैं? और ये जूते अन्दर न लाइए आप" उनमे से एक ने कहा,

"अबे खजूर! ये बता पदम् बाबा कौन है यहाँ?" शर्मा जी को ताव आया!

"ये क्या बदतमीजी है? कौन हो आप?" अब कि दूसरा बोला,


   
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"साले उठा के इसी धूनी में घुसेड दूंगा तुझे? जल्दी बता कौन है ये साला कुत्ता पदम् बाबा?" तीनों हैरान रह गए! शब्द ही नहीं निकले मुंह से उनके! तीनों खड़े हो गए!

तभी कमरे में एक बूढा आदमी आया, बोला," ये कैसा शोर मच रहे हो? कौन हो तुम?"

"तू बता, तू कौन है?" शर्मा जी ने कहा,

"मै बाबा पदम् हूँ" उसने कहा,

इतना सुनना था कि शर्मा जी ने उसके गले में पड़े अंगोछे से उसको खीचा और एक तरफ खड़ा कर दिया! वो डर गया!

"तो तू ही है वो!" शर्मा जी बोले,

"क...कौन वो?" अब वो घबराया!

"बिल्सी माई! याद आई?" शर्मा जी हँसे!

इतना सुनके पदम् बाबा को चक्कर सा आने लगा! वहीं एक जगह बैठने की जगह ढूँढने लगा! लेकिन शर्मा जी ने उसको बैठने नहीं दिया!

पदम् बाबा के होश जवाब दे गए! थूक गटकने लगा! शर्मा जी ने उसको उसके अंगोछे से हिलाया और बोले, "साले तेरे जैसे इंसानों को तो काट कर तेज़ाब में डाल देना चाहिए, कमीन इंसान, चंद पैसों के लिए किसी की जिंदगी का सौदा करते हो तुम लोग? बुला साले अपने भूत-प्रेत, जिनात को, उनसे पूछ की वो रोकेंगे हमे वो करने से जो अब तेरे साथ होने वाला है?"

"माफ कर दीजिये साहब" वो रोया अब

"माफ़? और तुझे? साले ना जाने कितनी जिंदगियां तूने खराब की होंगी" शर्मा जी ने कहा और एक जोर का झापड़ उसके कान पर रख दिया!

झापड़ की आवाज़ सुन कर उसके चेले भी ठिठक गए! कमरे के बाहर कई औरतें इकट्ठी हो गयीं थीं!

"कब किया तूने ये काम साले हरामजादे?" वे बोले,

"मेरे पास नेतराम आया था, कह रहा था उसकी सारी चीजें किसी ने पकड़ ली हैं, और मैं उसकी मदद करूँ, इसी लिए मैंने उसके कहने पर बिल्सी माई को भेजा" वो बोला,

"उसकी तो खैर माँ ही है हमे, अब बता क्या करूँ मै तेरे साथ?" वे बोले,


   
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"छोड़ दीजिये साहब, आज के बाद ऐसा न होगा" वो बोला,

"छोडूंगा तो खैर तुझे नहीं मै हराम की औलाद!" उन्होंने कहा और एक लात उसके पेट पर मारी दबा कर! वो पेट पकड़ के नीचे बैठ गया! शर्मा जी ने एक और लात उसके सर पर मारी! वो नीचे गिरा! फिर से शर्मा जी ने एक लात उसके चेहरे पर मारी! होंठ फट गया उसका! खून बहने लगा!

अब मैंने शर्मा जी को रोका! कहीं जान से ही न मार दें! वो लेटा लेटा रोता रहा!

मैंने तामूल-मंत्र पढ़ा! और मंत्र पढके उसके ऊपर थूक दिया! वो कराह उठा! उसकी एक एक चीज़ उड़ गयी! उसके भूत-प्रेत उसीको गालियाँ देने लगे! मैंने सभी को वहाँ से भगा दिया!उसके कलेजे में छेद हो गया! मुंह से खून बहने लगा! उसने माफी मांगी! पाँव पकड़ लिए! खून और लार लगातार रिसने लगे! तब मैंने उसके कलेजे को सिल दिया! और भविष्य में ऐसा कभी न करे ऐसा कह के, उसके कमर पर एक लात कस के जमाई! उसके चेले थरथर काँप रहे थे! प्रबल तामसिक रूप तो । उन्होंने अब देखा था! सारे हाथ जोड़ कर खड़े हो गए! हम कमरे से बाहर आ गए! सभी ने हमारा रास्ता छोड़ दिया! उसको उसके कर्मों की सजा दे दी गयी थी! वो खाली हो गया था!

अब उस नेतराम की बारी थी!

ये काम करके हम वापिस नकुल के घर आ गए! नकुल के पास उसके जीजा का फोन आया कि अब दीपा ठीक है! ये खुशी की बात थी! हम वापिस आ गए थे तो खाना आदि खाया और थोडा आराम किया!

दोपहर बाद हमने नेतराम की कहानी निबटाने का कार्यक्रम बनाया! और हम चुनार के लिए चल पड़े! गाडी बढ़िया चलाई नकुल ने! चार घंटे में ही चुनार पहुंचा दिया! रास्ते में रुक कर मदिरा भोग किया! और मैंने फिर अपना कारिन्दा हाज़िर कर लिया! कारिंदे को खोज के लिए भेजा! कारिन्दा गया और ५ मिनट में ही आ गया! वहाँ का पता तो नहीं था, हाँ कुछ निशानियाँ बता दी थी कारिंदे ने और जगह का नाम भी! ये जगह चुनार-जंक्शन के पास थी, हम वहाँ पहुंचे, फिर एक निशानी ढूंढी, नहीं मिल सकी, फिर से कारिन्दा हाज़िर किया! अबकी कारिंदे को साथ साथ उड़ाया! कारिन्दा कोई ८ किलोमीटर आगे ले गया! कोई पुरानी सी बस्ती में! फिर उसी की मदद से हम वहाँ तक जा पहुंचे! हालांकि मुकम्मल तौर पर नहीं पता लगा था! लेकिन ये नेतराम यहीं कहीं आसपास ही था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वहाँ एक आद आदमी से पूछा तो उन्होंने बता दिया नेतराम भगत! तो ये नेतराम भगताई करता है! साला कमीना कहीं का! मेरे मुंह से निकला! उस आदमी के बताये अनुसार अभी भी हमको कोई १ किलोमीटर अन्दर जाना था हम चलते गए।

फिर एक दूकान वाले से पूछा तो अब पक्का पता चल गया! उसने उसका घर भी बता दिया! पुराना-धुराना घर! और घर में बैठे कई चेले-चपाटे! खुद मूढ़े पर बैठा था! शर्मा जी ने दरवाजा खटखटाया और बोले, "अरे नेतराम भगत जी?"

"कौन है भाई आप? कहाँ से आये हैं?" नेतराम ने कहा,

"आप ही भगत हो जी?" शर्मा जी बोले,

"हाँ जी मैं ही हूँ नेतराम भगत" उसने हँसते हुए कहा,

"हाँ! भगत जी आपके लिए ही तो आये हैं हम इतनी दूर से!" शर्मा जी ने कहा,

"मेरे पास तो लोग आते ही रहते हैं दूर दूर से!" उसने हंस के कहा!

"आज के बाद कोई नहीं आएगा!" शर्मा जी ने कहा!

"क्या मतलब?" नेतराम बोला,

"अभी बताता हँ भगत जी!" शर्मा जी ने कहा और आगे बढ़ गए नेतराम की तरफ!

शर्मा जी आगे बढे और नेतराम तक पहुंचे, वहाँ भी नेतराम के चार मरियल और दुबले चार चेले बैठे हुए थे! नेतराम भी स्वयं पतला-दुबला व्यक्ति था! ५ फीट ही लम्बाई होगी उसकी! शर्मा जी ने कहा, "सुन नेतराम! आज से तेरी भगताई खतम!"

"क्या कह रहे हैं आप, मै समझा नहीं?" उसने बताया

"मै समझाता हूँ भगत जी! समझाने के लिए तो आये हैं हम यहाँ!" वे बोले!

"आपकी अल्हैड़ी कहाँ है अपने पांच खसमों के साथ?" वे बोले,

अब भगत जी की आँखें चौड़ी हुई! थूक गटका तेज तेज! साँसें तेज हो गयीं उसकी!

"क्या हुआ? कहाँ हैं वो?" शर्मा जी बोले,

"आ....आ....आप कौन हैं जी?" उसने डर के मारे कहा!

इतनी बात सुनते ही शर्मा जी ने एक झापड़ रसीद किया उसके गाल पर! वो उछला और जाके पीछे गिरा!


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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चेले घबराए! लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कुछ कहने की! चुपचाप खड़े अपने गुरु को अपना गाल सहलाते हुए देखते रहे।

शर्मा जी ने नेतराम को उठाया और बोले, " तेरी माँ के ***** में आग दूं साले! क्यूँ भेजीं तूने अपने वो चीजें वहाँ?"

"जी....वो....वो...... उस औरत के प्रेमी ने करवाया था ये मुझे" उसने धीरे धीरे कहा अपनी आँखें नीचे करते हुए।

"क्यूँ करवाया था?" उन्होंने पूछा,

"उस लड़की ने धोखा दिया था उसको, ऐसा उस लड़के ने बताया था" वो बोला,

इसी बात पर शर्मा जी ने एक और झापड़ दिया उसकी गुद्दी पर! वो फिर नीचे गिरा!

"तो तू मजिसट्रेट लगा है, तू करेगा इसका फैसला! साले हरामजादे!" शर्मा जी ने उसको उठाते हुए कहा!

"गलती हो गयी साहब, माफ कर दीजिये, माफ़ कर दीजिये" उसने हाथ जोड़ के कहा,

"तेरी गलती माफ करने लायक नहीं है! तेरे तो साले हड्ड काटके पेड़ पर लटका देना चाहिए!" शर्मा जी ने कहा! और एक और झापड़ रसीद कर दिया उसके गाल पर!

"मर गया साहब! मर गया साहब! दया कीजिये, दया कीजिये!" अब वो रोया!

"शर्मा जी, इस साले को नंगा कर दो, फाड़ दो साले हरामी के कपडे!" मैंने कहा,

"अरे मै मर जाऊँगा, माफ कर दो साहब!" वो रोते रोते बोला!

शर्मा जी ने उसके कपडे फाड़ दिए! उसकी मालाएं आदि सब तोड़ फेंकी! उसकी फटी हुई कमीज़ नीचे पाजामे तक लटकी थी!

अब मै आगे बढ़ा! मैंने उसको एक करारा झापड़ दिया! वो फिर नीचे गिर पड़ा! मैंने एक दो लातें और मारी! फिर उसको उठाया! अब मैंने तामूल-मंत्र पढ़ा! और उसके ऊपर थूक दिया! उसके बदन में भयानक पीड़ा उठी! वो बुक्का फाड़ के रोया! फिर मैंने उसके कलेजे में मंत्र से छेद कर दिया! मुंह से खून का फव्वारा छूटा! खून के वेग के कारण वो कुछ बोल भी नहीं पा रहा था, बस खून निकाले जा रहा था अपने नाक और मुंह से! वो नीचे गिर पड़ा! मैंने छेद ठीक कर दिया! खून बंद हो गया! उसकी रही सही चीजें भी उड़ा दीं! वो बिलकुल खाली हो गया!!


   
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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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अब वो थोडा संयत हुआ! मैंने उसको अपने जूते से मार के उठाया और कहा, "हरामजादे! तू अब भूत तो क्या कुत्ता भी नहीं पकड़ेगा!"

"माफ़ कर दो, माफ कर दो!" उसने कहा,

"शर्मा जी, इससे कहो की ये साला उस हरामी संदीप को फ़ोन करे और उसको यहाँ बुलाये अभी!" मैंने कहा,

"शर्मा जी ने उसका मोबाइल उसको दे दिया, मोबाइल वहीं एक स्टूल पर रखा हुआ था, भरती आवाज़ में, खून से सने हाथों और मुंह से, उसने संदीप को वहाँ आने को कह दिया!

"आने दे साले इसको भी! इसकी माँ भी देख ऐसे ही ****** हैं हम आज!" शर्मा जी बोले,

"चलो बे? उठाओ इसको? और वहाँ बिठा दो!" शर्मा जी ने उसके चेलों से कहा!

चेले कुत्ते की तरह से उठे और उसको उठा कर एक तरफ बिठा दिया!

पौने घंटे में संदीप भी वहीं आ गया! उसने जब नेतराम का हाल देखा और नकुल को वहाँ खड़े देखा तो सहम गया! उसने नेतराम से पूछा कि क्या हुआ है तो उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप सुनता रहा!

"तेरा नाम संदीप है?" मैंने पूछा,

"हाँ जी! मैं ही संदीप हूँ" उसने आराम से कहा,

"तो हरामजादे तूने ही करवाया उस लड़की दीपा के ऊपर ये सारा खेल!" मैंने कहा!

"ओ सुनो गाली देके बात नहीं करना, तुम जानते नहीं हो मुझे?" उसने कहा,

"जानता हूँ, एक कायर साला कुत्ता कमीना इंसान है तू!" मैंने कहा,

"ज्यादा मत दिखा, यहाँ से निकल भी नहीं पायेगा समझा?" वो बोला,

"कौन निकलेगा और कौन नहीं ये तो तुझे अभी पता लग जाएगा!" मैंने कहा, और तभी अपना एक खबीस हाज़िर कर लिया!

संदीप अपना मोबाइल निकाल कर कहीं फ़ोन करने लगा, तभी मैंने अपने खबीस से उसको तोड़ने को कह दिया! खबीस ने उसको उसके बालों से पकड़ के और उठाके दीवार पर दे मारा कोई ८ फीट दूर! मैंने फिर खबीस को रोका, और संदीप के पास गया! उसके होश उड़ गए थे! उसे समझ ही नहीं आया था कि क्या हुआ! इस उठाकर फेंकने में उसकी उलटे


   
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