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वर्ष २००८ हिसार हरियाणा की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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शीष्म ऋतु यौवन पर थी तब मई का महिना था, गर्मी ने प्रचंड रूप धारण कर रखा था! मनुष्य तो मनुष्य, जानवर और पक्षी भी बेहाल थे! और दिल्ली की गर्मी तो वैसे ही जानलेवा होती है! मैं भी परेशान था! कई बार नहा लेने के बाद भी गर्मी जस की तस! शाम को शर्मा जी बियर वगैरह ले आते थे, दोनों पीते-पाते तो थोडा चैन पड़ता था!! 

एक दिन की बात है, शर्मा जी के फोन पर एक फोन आया, फ़ोज किस अभिजन का था, उसने बताया की खाड़ी वाले प्रकाश 

जी ने आपका नंबर दिया हैं, इसिलए फोन किया, शर्मा जी ने बातें की, और बात खतम होने के पश्चात मुझे बताया कि मामला हरियाणा का ही हैं, जगह हैं हिसार, वहाँ ही ये रहते हैं अशिनव साहब! 

"क्या कह रहे थे?" मैंने पूछा, 

"बड़ी अजीब सी बात कही उन्होंने" तो बोले, 

"अजीब सी क्या?" मैंने पूछा, 

"कहा कि खेती करते समय, उनके नौकर को एक दिन रात में एक बुढ़िया नज़र आई, नौकर चौंका!" वे बोले, 

"चौंकाः क्यूँ! क्या बज रहा था उस समय?" मैंने पूछा, 

"नौकर के हिसाब से रात बारह से ऊपर का वक्त होगा" वे बोले, 

"फिर? बुढ़िया आई नज़र, तो?" मुझे भी जिज्ञासा हुई, 

"तो लौकर तौँका, वो दरअसल पानी लगा रहा था खेतों में, तभी तो बुढ़िया आई थी वहाँ, उस बुढ़िया ले उसको बुलाया और कहा कि बाबा कि सवारी आने वाली हैं, जगह खाली कर देनहीं तो बिन मौत मारा जाएगा!" वो बोले. 

"मारा जाएगा? तयों?" मैंने पूछा, 

"वो तो नहीं पूछा मैंने" वो बोले, 

"ठीक हैं, उनको और उनके नौकर को यहाँ बुलाइये कल, मैं बात करूँगा उनसे" मैंने कहा, 

शर्मा जी ने तभी वहाँ फोन कर दिया, तो भी तैयार हो गए। 

अगले दिन वो आ गए! अभिनव और उनके जौकरसे नमस्कार आदि हुई तो मैंने उनके नौकर से पूछा, "भाई, क्या नाम है आपका" 

"गुरु जी. मेरा नाम है राजेश. जयपुर के पास एक गाँव का रहने वाला हूँ जी मैं" उस ने बताया, 

"ये जो बात मैंने सुनी, बुढ़िया वाली, ये कब की है।" मैंने जानना चाह, 

"जी कोई एक महीने पहले की" उसने कहा, 

"क्या कहा उस बुढ़िया ने?" मैंने पूछा, 

"गुरुजी, मैं रात को खेत में पानी लगा रहा था, ना जाने कहाँ से एक बुढ़िया आई, बोली कि मैं वहाँ से चला जाऊं, क्यूंकि बाबा आने वाला है, ये उसकी ज़मीज है, उसकी सवारी आएगी,


   
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श्रीशः उपदंडक
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अगर न हटा तो बिन मौत मारा जाएगा तू और तेरा वो मालिक! उसका लड़का भी! समझा जा! अभी समय हैं, तुझे बताने भेजा, सो मैं आ गयी, जा, भाग जा, बता अपने मालिक को! इतना सुन मैं तो डर गया, क्यूंकि उस बुशिया को मैंने कभी वहाँ उससे पहले देखा भी नहीं था, और उसने मालिक और उनके बेटे का नाम भी बता दिया, गुरु जी मैं तो डर गया!" उसने कहा, 

"अच्छा! कैसी थी वो बुढ़िया?" मैंने पूछा, 

"राही कोई नब्बे-सौ साल की होगी उम्र में तो" उसने बताया, 

"और क्या पहना था उसने!" मैंने पूछा, 

"जी कमीजसी शी ऊपर और नीचे एक घायरा सा, युटनों तक का, जीचे पायजेब पहने थी" उसने बताया, 

"हाम! उसके बाद तो आई दुबारा:" मैंने पूछा, 

"नहीं गुरु जी" उसने बताया, 

"अच्छा, तो वो कोई और भी तो हो सकती थी' जैसे मानसिक रूप से परेशान? मैंने पूछा, 

"नहीं गुरु जी!" अब अभिनव ने कहा, 

"वयूँ!" मैंने पूछा, 

"मुझे एक सपना आया, अगली रात, वो बुढ़िया एक घोड़े पर बैठी थी,साथ में चार घुड़सवार औरथे उसके साथ, सारे अपने हाथों में तलवार और कटे औरतों और मर्दो का सर लिए. उन्होंने चौसर एक बार में भरे थे, उसमें मेरा और मेरे इकलौते बेटे का 

भी सरथा!" उसने बताया! 

"क्या?, मुझे अब हैरत हुई!! 

'हाँ गुरुजी, और उसके अगले दिन मेरे बेटे का एक्सीडेंट हुआ, सर फट गया उसका, लेकिन बच गया वो उसने बताया, 

"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा, 

"फिर अगली रात ये सपना, ऐसा ही एक दम, मेरी पत्नी को आया" उसने बताया 

"ओह! फिर?" मैंने कहा, 

"तब से मैं डर गया हूँ गुरु जी, हमें बचाइये" उसने हाथ जोड़े, 

बड़ा भयावह मामला था ये! 

"अच्छा, और कुछ?" मैंने पूछा, 

"हाँ जी, जब से तो बुढ़िया तहाँ आई हैं, तबसे बड़ा भयानक माहौल हैं तहाँ, रात को कुते रोते हैं वहाँ, और तो और जहां मर्जी से 

सांप आ रहे हैं! भागना पड़ता है" अब राजेश ने कहा, 

"अक्छा! बड़ी अजीब सी बात है, मेरे जीवन में ऐसा आजतक नहीं हुआ, न ही सुना मैंने आज तक" मैंने बताया, 

"गुरु जी, हमे बचाओ, किसी अनजाने डरने मार रखा है हमे, वो तो शुक्र है कि प्रकाश जी से मैं जिक्र कर बैठा और आप तक 


   
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श्रीशः उपदंडक
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पहुँच गया" अभिनव जे कहा, 

"देखि, मैं इस विषय में और जांच करना चाहता हुँ, निश्चित रहिये, जो मैं कर सकता हुँ, अवश्य ही करूँगा" मैंने कहा, 

उसके बाद ते वहाँ से उठे और विदा ले कर चले गए! मेरे माथे पर अब शिकन आना लाजमी ही था, ये कैसा मामला है? एक बुढ़िया आई, कुत्ते रोये, सांप निकले, वो सपना, फिर उनकी बीवी का सपना? ये क्या है? मैं उलझ गया था, सच में, 

"क्या हुआ गुरु जी!" शर्मा जी बोले, 

"कुछ नहीं शर्मा जी, ये मामला बड़ा विचित्र है" मैंने कहा, 

"क्यों" उन्होंने कहा, 

"सबसे बड़ी बात सपना आना" मैंने बताया, 

"अर्थात?" वे बोले, 

"अपना तभी आएगा जब को सिद्ध होगा सामजे मैंने बताया, 

"सिद्धः तो क्या यहाँ भी कोई सिद्ध है?" उन्होंने पूछा, 

"पता नहीं, लेकिन अगर सिद्ध होते तो, सांप न आते. कुते नरोते" मैंने कहा, 

"तो फिर क्या हो सकता है वहाँ" शर्मा जी ने पूछा, 

"कुछ न कुछ तो रहस्य है ही वहां" मैंने कहा, 

"कैसा रहस्य?" वे बोले, 

"ये तो मैं भी नहीं जानता!" मैंने कहा, 

"ऐसा नहीं हैं गुरु जी! आपने बड़े बड़े औघड़ों की छाती फाड़ दी, ऐसा क्या है वहाँ" उन्होंने कहा, 

"शर्मा जी, ये तो जाने से ही पता चलेगा वहाँ!" मैंने बताया! 

"तो आप बताओ, कब चलना है।" वो बोले, 

"आप कल ही चलो" मैंने कहा, 

"ठीक है, कल चलते हैं। वो बोले, 

और फिर हमारा कार्यक्रम तय हो गया! 

अगले दिन हगने अभिनत को फोन कर बता दिया कि हम वहाँ आ रहे हैं! तो बड़ा खुश हुआ! 

हम अगले दिन निकल पड़े! रास्ते में थोडा मदिरापान कर लिया! हाँ, हिसार में मेरा कोई परिचित शमशान नहीं था, अतः मैंने 

पेहवा में पहले ही बात कर ली थी! 

शर्मा जी ने रास्ते में पूछा, " गुरु जी, एक बात बताइये?" 

"पूछिए" मैंने कहा, 

"ये बुढ़िया जब नब्बे-सौ साल की है, तो उसका गुरु! मेरा मतलब वो बाबा!" उन्होंने पूछा, 

"है कोई कलाकारही!" मैंने कहा, 

"हाँ!" वो बोले, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सपने में कटेसर देखे अभिनव ने. इसका मतलब ये कड़ी चेतावनी ही है उसको" मैंने कहा, 

"हाँ, सही बात है!" वो बोले, 

"अब देखते हैं, क्या ओर-छोर हैं इसका!" मैंने बताया, 

"ठीक है, ये कहानी अजब है अभी तक सबसे गुरु जी" उन्होंने कहा, 

"कोई बात नहीं!" मैंने कहा, 

फिर हम चलते रहे, कोई चार बजे वहाँ जा पहुंचे! 

हम वहाँ पहुँच गए थे, अभिनव को खबर पहुंचा दी गयी थी, इसीलिए वो हमको वहीं मोड़ पर मिले गए राजेश के साथ, हम उनके घर ही आये थे सीधा, इसीलिए पहले घर पहुंचे, उनके परिवार से मिले, उनकी पत्नी ने भी वहीं सपना दोहरा दिया जो अभिनव ने बताया था, बड़ा रहस्य थे इसमें हमने चाय पी और फिर उसके बाद मैंने अभिनव से उसके खेतों पर चलने को कहा, खेत वहाँ से कोई पांच सात किलोमीटर दूर थे, हम गाडी में बैठे और खेतों की तरफ चल पड़े, 

हम खेत पहुंचे, खेत काफी लम्बे चौड़े थे! दूर दूर तक! वहाँ कई पेड़ों के बीच छोटे छोटे चबूतरे बने हुए थे, पत्थरों के, पूछने पर बताया गया कि ये चबूतरे न जाने कब से यहाँ हैं, और आज तक इनके साथ की कोई छेडछाड नहीं की गयी, ना ही कशी हटाया गया, आगे चलते चलते हम वहाँ तक आ गए जहां राजेश खेतों में बने कमरों में अन्य नौकरों के साथ रहता था, कोई सात या आठ कमरे होंगे, वहाँ, मैंने राजेश से उस जगह ले जाने को कहा जहां वो बुढ़िया उसको मिली थी, राजेश हमें वहाँ ले गया, बता दिया कि वो बुढ़िया कहाँ से आई थी और कहाँ को चली गयी थी! 

ये जगह कुछ अलग थी, यहाँ एक साथ आठ चबूतरे थे, पीपल के पेड़ों के बीच, वहाँ कुछ तोरई और सीताफल की बेलें लगी थीं, बुढ़िया यहीं से आई थी! 

मैंने अभिनव से पूछा, "एक बात बताइये, ये खेत आपके पास कबसे हैं।" 

"जी तो सामने जहां बाड़ लगी हैं, वहाँ तक तो पुश्तैनी हैं लेकिन ये वाले मैंने तीन साल पहले ही खरीदे हैं। उसने बताया 

"अच्छा, यहाँ जो पहले खेती करता या करवाता था, उसके साथ ऐसी कोई घटना हुई कशी?" मैंने पूछा, 

"नहीं गुरु जी, अगर होती तो बताता ज़रूर" उसने कहा, 

"ठीक है। मैंने कहा और वहाँ चला गया जहां से वो बुढ़िया आई थी, आपने साथ शर्मा जी को लिया और उन दोनों को नहीं रोक दिया, अब मैंने कलुष-मंत्र का जाप किया और फिर अपने और शर्मा जी के नेत्र इस से पोषित किये! नेत्र खोले तो सामने का 

दृश्य स्पष्ट हो गया! 

सामने चबूतरे दिखाई दे रहे थे! बहुत सारे, ऐसा लगता था जैसे किसी जंग के मैदान में हर लाश के ऊपर ये चबूतरे बनवाये गए हो! जो चबूतरे बाहर सामान्य रूप से दिखाई दे रहे थे, वो बाड़ में बनवाये गए होंगे, हम आगे बढ़े, तो सामने एक चबूतरे पर एक बड़ा सा काला सांप बैठा


   
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श्रीशः उपदंडक
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दिखाई दिया! हम आगे बढे उसी कि तरफ, तो कुंडली मारे बैठा था! हम और आगे बढे, सांप ने फुफकारा! हम नहीं रुके हम आगे बढ़े और एक जगह रुक गए! सांप की कुंडली में करीब दर्जन भर छोटे छोटे सपोले थे, अर्थात ये माता सांप शा. एक नागिन! उस नागिन से एक जोर से मार मारी! तशी झाड़ियों में से असंख्य सांप बाहर आये! काले, पीले, मटमैले! सभी उस नागिन को पैर में लेके हमारा मुकाबला करने के लिए सजग हो गए! हमने नाभिन से कोई बैर नहीं लेना था, बस हम वहाँ की जांच करना चाहते थे! हम वहाँ से हट गए, उसकी बाजू में से होकर आगे चल पड़े, सभी साँपों और उस नागिन जे हमको मुड़ के देखा! सामने फिर एक चबूतरा पड़ा, वहाँ भी उस चबूतरे पर कुछ हिल-डुल रहा था! हम आगे बढे! चबूतरे के पास! वहाँ जो चीज़ हिल-डुल रही थी वो एक बड़ी सी गोह थी! चमकीली पीले रंग की मोह! और उसके पास शी कोई दर्जन भर उसके बच्चे थे! वो अपनी दो-मुँही जीभ निकाल कर हमारी उपस्थिति के बारे में जान रही थी! इस से बड़ी गोह तो मैंने कभी देखी भी नहीं थीं! गोह उठ कर साड़ी हुई! उसकी गर्दन पर जीवे लटकी खाल एक बड़ा सा थैला सा प्रतीत हो रहा था! गोह अब उठी और हमारी तरफ बढ़ी! मैंने तभी, अज्ज्वात्र-मंत्र पढ़ लिया! गोह वहीं ठहर गयी! इसके बाद उसने अपनी पूंछ जोर जोर से हिलाई! आसपास से और भी कई बड़ी बड़ी गोह वहाँ आ गयीं! असंख्य गोह! 

अब हम पीछे हटे! गोह वहीं की तहीं खड़ी थी! लेकिन देत हमें ही रही थीं! बड़ा विचित्र मामला था! 

तभी शर्मा जी की निगाह आगे एक जगह पड़ी! वहाँ दूर से कोई हमें देख रहा था! हम वहीं चल पड़े, ज्यों ज्यों पास आये तो वो 

जो हमे देख रहा था, एक स्त्री जान पड़ी! वैसी ही बूढी स्त्री जैसा राजेश ने बताया था, हम आगे बढ़े! 

"शर्मा जी, लगता है यही वो बुढ़िया है!" मैंने कहा, 

"हाँ, वैसी ही वेश-भाषा है इसकी!" वो बोले, 

हम और आगे बढ़े. अब वो बुढ़िया हमसे कोई पंद्रह पीट की दूरी पर थी! उसने अपनी लाठी उठायी और हमको इशारा किया कि हम जहां है वहीं ठहर जाएँ। लेकिन हम नहीं रुके, आगे बढ़े! 

हग करीब आठ फीट पर आकै रुक गाए! बुढ़िया ले फिर गुस्से से लाठी उठायी और बोली, "थम जा! आगे न बढ़!" 

हम वहीं रुके हुए थे! मैंने कहा, "हम तो जानने आये हैं यहाँ क्या हो रहा है।" 

"कौन हो तुम?" हमारी ज़मीन पर पाँच कैसे धरै!" उसजे गुस्से से कहा, 

"तुम्हारी ज़मीना नहीं ये तुम्हारी ज़मीन नहीं हैं" मैंने कहा, 

"तो तू बतायेगा कि ज़मीन किसकी है।" उसने गुस्से से कहा और आगे आई! 

बुढ़िया काफी लम्बी-चौड़ी कद काठी वाली थी! करीब छह फीट की तो होगी ही! पांव में चमड़े की जूतियाँ पहजे! पायजेब और दूसरे चांदी के भारी भारी आभूषण! 

"हो! यही तो बता रहा हूँ, किये जमीन तुम्हारी नहीं!!" मैंने कहा, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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"नहीं ये ज़मीन हमारी है. अभी बालक सोरहे हैं, भाग जा, काट डालेंगे तुझे और इसे, जा भाग जा यहाँ से" उसने आँखें लाल करके कहा, 

"तो आने दे बालकों को भी, उनसे भी मिल लेंगे हम!" मैंने कहा, 

"क्यों मौत ने दावत देश है तू?" उसने कहा, 

"गौत?? किसकी मौत?" मैंने पूछा, 

"तेरी और इसकी मौत, अब भाग जा यहाँ से" उसने कहा और पीछे मुड़ गयीं, 

पीछे मुड़के एक चबूतरे पर बैठी और गायब हो गयी! 

बड़ा विचित्र था ये सब! हम वापिस लौटे! एक और आश्चर्य हुआ! अब वहाँ न मोह थी और न ही वो साप! सब गायब हो गए थे! 

"शर्मा जी! हो न हो ये सारा खेल इन चबूतरों का ही हैं!" मैंने संशय जताया! 

"हाँ! वो बुढ़िया वहीं उस चबूतरे पर बैठ के गायब हो गयी! इसका मतलब वो चबूतरा उसका ही है!" वो बोले, 

"इसका अर्थ समझो आप?" मैंने पूछा, 

"नहीं गुरुजी?" वे बोले, विस्मय से! 

"इसका अर्थ ये सारे चबूतरे जागृत होने वाले हैं अब! इनका कीलन या तो समाप्त हो रहा है या सीमन-समय पूर्ण होने वाला है!" मैंने बताया, 

"ओह! इसका मतलब ये तो सारी सेना के सेना हैं!" उन्होंने चबूतरों को देखते हुए कहा! 

"हाँ! सारी सेना! तभी तो उस बुढ़िया ने कहा, बालक सो रहे हैं अभी!!" मैंने कहा, 

"अरे हाँ! उसने यही कहा था!" उनको आश्चर्य हुआ! 

"लेकिन अभी भी बहुत रहस्य छिपा है यहाँ, इसका खुलासा करना पड़ेगा, तभी पता चलेगा!" मैंने कहा, 

"हाँ, ये तो हैं!" तो बोले, 

बातें करते करते हम वापिस अभिनव और राजेश के पास आ गये, दोनों ही उत्सुकशे जानने के लिए! अभिनव ने कहा, "गुरु 

जी, कुछ पता चला!" 

"हाँ, पता चला, लेकिन पूरा नहीं" मैंने कहा, 

"ओह! वैसे क्या कहानी है?" उसने पूछा, 

"कहानी बहुत पुरानी लग रही है मुझे, अभी जांच कर रहा हूँ" मैंने कहा, 

"अच्छा गुरु जी" उसने कहा, 

"राजेश? मुझे वो बुढ़िया मिल गयी!" मैंने जैसे ही ये कहा, राजेश और अभिनव को एक झटका लगा! 

"गिल गयी गुरु जी क्या अब भी वो यहीं हैं?" राजेश जे घबरा के पछा, 

"हाँ! यहीं है, ये सारे चबूतरे इसी कहानी में हैं" मैंने चबूतरों को देखते हुए और उनकी तरफ इशारा करते हुए कहा, 


   
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तभी खेत में बैठे कुते एक ही दिशा में मुंह उठा के रोने लगे! एक साथ! मैंने वहीं देखा! कुछ दिखाई दिया! मैंने शर्मा जी को अपने साथ लिया और उसी तरफ चल पड़ा! हम तेजी से आगे बढ़े! 

आगे गए तो देखा दो यामीण से व्यक्ति आपस में बातें कर रहे हैं। और हाथ के इशारे से एक दुसरे को कुछ समझा रहे थे हम दोनों आगे बढ़ते रहे, जब उनके करीब गए तो वो दोनों चुप हो गए और दोनों यूरके हमको ही देखने लगे! 

"कौन हो तुम" मैंने पूछा, 

"तुम कौन हो?" उन दोनों जे मुझसे ही सवाल किया! 

"मैं बता दूंगा तुम्है, लेकिन तुम बताओ तुम कौन हो?" मैंने कहा, 

"नहीं तुम बताओ पहले, तुम कौन हो, यहाँ पया कर रहे हो हमारी जमीन पर!" उनमे से एक बोला! 

"सुनो तुम दोनों, ये ज़मीन तुम्हारी नहीं है, और अब सीधे सीधे मुझे बता दो, कि तुम दोनों हो कौन" मैंने धमकाया, 

"धमकी देता है! तेरी ये हिम्मत?" उसने कहा, 

"अबकी बार धमकी नहीं दूंगा, पकड़ लूँगा तुम दोनों को!" मैंने कहा, 

"चला जा यहाँ से अभी, दफा हो जा, जानता नहीं हम कौन है?" दोनों एक साथ बोले, 

तब मैंजे तितंग्शल-मंत्र पढ़ा! दोनों पीछे हटे! वहीं ठिठक कर खड़े हो गए! 

"मुझे कोई ऐश-गैस न समझना तुम दोनों, जहां खड़े हो वहीं राख बना दूंगा अभी!" मैंने धमकाया! वे डरे! 

"सुनो, आप जाओ यहाँ से, क्यूँ लड़ाई में पड़ते हो? हमारा पैसा भी बहुत नुकसान हो गया है, हम और नहीं लड़ना चाहते" उसने कहा, 

"नुक्सान' कैसा नुक्सान?" मैंने पूछा, 

"ये ज़मीन छीन ली हमसे उसने" उनमे से एक ने कहा, 

"किसने किसने छीन ली ये ज़मीन!" मैंने पूछा, 

"उदाली के आदमियों ने" वो बोला, 

"कौन उदाली" मैंने पूछा, 

"उदाली को नहीं जानते!" वो बोला और फिर उन्होंने एक दूसरे को देता 

इससे पहले कि उनसे मैं कुछ और बोलता या पूछता वो पीछे हटे और गायब हो गए! उनको पकड़ने का मौका भी नहीं मिला! कुत्तों का रोना बंद हो गया! 

"गुरु जी, ये तो और रहस्य गहरा गया" शर्मा जी ने कहा, 

"हाँ, लेकिन ये उदाली कौन हैं।" मैंने कहा, 

"कैसे मालूम करोगे गुरु जी आप?" उन्होंने पूछा, 

"एक काम करते हैं, फिलहाल यहाँ से चलते हैं, रात्रि समय यहाँ आयेंगे" मैंने कहा, 


   
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"यहीं राजेश के यहाँ रुक जाते हैं हम लोग, अभिनव और राजेश भी यहीं रुक जाएँगे, मैं कह दूंगा" उन्होंने सुझाव दिया, सुझाव अच्छा था, सो हम वहीं रुक गए, अभिनव और राजेश भी वहीं रुक गए, 

पहले वो बुढ़िया, फिर ये दो आदमी और अब ये उदाली! ये उदाली औरत है या मर्द ये भी नहीं पता! अब मेरे पास एक ही रास्ता 

था, अपना कोई कारिन्दा भेजूंवहाँ और मालूमात करूं! तब मैंने अभिनव और राजेश से कह ले सामान मंगवा लिया, और फिर रात ११ बजे मैंने उस सामान में से एक थाल निकाला, उसमे मांस रखा, शराब से छोटे दे दिए, और अपना सुजान कारिन्दा हाजिर कर लिया! कारिन्दा हाज़िर हुआ! मैंने उसको उसका काम बताया और भेजा! कारिंदे ने अपना भोग लिया और रवाना हो गया! 

७ मिनट बाद ही कारिन्दा वापिस आ गया! कारिन्दा सफल नहीं हुआ था! किसी का अचूक कीलन वहाँ काम कर रहा था! मैंने कारिदे को वापिस भेज दिया! अब गुत्थी और उलझ गयीशी! 

अब एक ही रास्ता था! सीधा सीधा मुवाबला किया जाए उनसे! ताकि कहानी का पता चले! 

अब मैंने अभय-मंत्र जागृत किया, कलुष एवं त्राम-मंत्र जागृत किये! और रात्रि समय का इंतज़ार करने लगा. ञाम केवल मध्य रात्रि में ही कार्य करता है, वैसे कभी नहीं, बाम-मंत्र से शत्रु आप पर आक्रमण करने से पहले सौ बार सोवेगा, उस तार यदि मैं सह गया तो वही वार उसको वापिस सहना होगा! 

अब मैंने गदिशभोग एवं मीनभोग किया! शर्मा जी ने भी किया! मैंने सभी तंत्राभूषण धारण किये, शर्मा जी को भी धारण करवाए और एक संजर भी अभिमंत्रित कर अपने पास रख लिया! अब हम तैयार थे, 

मध्य-राभि हम बाहर निकले! वहीं जाना था जहां हमने उस बुढ़िया को देखा था. रास्ते में सांप और मोह अन्यत्र घूम रहे थे! लेकिन त्राम-मंत्र की गंध से वो घबरा के पीछे हट जाते थे! 

हम उस चबूतरे पर आये, वहाँ वो बुढ़िया नहीं थी, 

"शर्मा जी, आप यहीं खड़े रहना , जरा सा भी हिलना नहीं, ना ही पीछे मुड के देखना" मैंने कहा, 

"जैसा आप कहें" वो बोले, 

"मैं उस तबूतरे पर चढ़ गया, तबूतरा आधे से अधिक भूमि में गढ़ा हुआ था, मैंने मंत्रोच्चार आशभ किया! खेत में कुत्ते फिर से रोने लगे! अर्थात कोई आने वाला है। मैंने और मंत्रोच्चार किया! अचानक ही खड्ड की आवाज हुई! किसी ने मुझे पीछे से छुआ, ऐसा लगा! मेरे सामने यो बुढ़िया साड़ी थी! गुस्से में! बोली, "उतर! उतर यहाँ से!" 

मैं नहीं उतरा, वहीं खड़ा रहा! हिला भी नहीं! 

"उतर जा! माज जा! बालक सो रहे हैं अभी, जाम गाए तो टुकड़े कर देंगे ते!" उसने धमका के कहा! 


   
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"सुनो! मुझे ये बताओ ये उदाली कौन है?" मैंने पूछा, 

उसने जैसे ही उदाली का नाम सुना, वो डर गयी! घबरा गयी! लेकिन बोली कुछ नहीं! 

"मुझो बताओ ये उदाली कौन हैं!" मैंने फिर से सवाल दोहराया, 

"वो.............खड़ी हैं। उसने बताया, 

"कौन खेड़ी?" मैंने पूछा, 

"सोटा वाली खेडी, जागौर वाली उसने फिर कहा, 

अब एक बात तो सही पता लगी, ये सोड़ी एक औरत है! 

"मुझे और बताओ इसके बारे में" मैंने कहा, 

"१० मरद वाली खेडी" उसने कहा, 

"१० मस्द!" मैंने पूछा, 

"१० मरद है उसके, उदाली के" उसने कहा, 

"अच्छा, तो तुम्हारा क्या लेना देजा उस उदाली से!" मैंने पूछा, 

"उसके एक मस्ट दिम्मावाडूने जमीन छीन ली हमसे" 

"छीन ली कौन सी ज़मीन?" मैंने पूछा, 

"ये वाली ज़मीन" उसने अपनी लाठी ज़मीन पर मारते हुए कहा, 

"अच्छा, अब अपना नाम बताओ. कौन हो तुम?" मैंने पूछा, 

"कड़िया" उसने बताया, 

"तुगने कहा, बालक सो रहे हैं, ये कौन बालक हैं!" 

"हमारे ठेडे के लड़के" वो बोली, 

"तुमने वहाँ के नौकर को कहा कि बाबा जागने वाला है, एक महीने का समय उसे दिया, मुझे बताओ इस बारे में?" मैंने चबूतरे पर खड़े खड़े ही पूछा, 

"बाबा सिद्धा. ये उसी के ठेडा हैं, वो जागने वाला हैं कोई उन्नीस दिन बचे हैं" उसने बताया, 

"फिर! फिर क्या होगा?" मैंने पूछा, 

"बदला" उसने कहा, 

"बदला' किस से बदला!" मैंने पूछा, 

"दिम्मावाडू से बदला, कूतडा दिम्मा" उसने बताया, 

"और वो जो दो और हैं जो मुझे मिले थे,चौ कौन हैं?" मैंने पूछा, 

"सिद्धा के बेटा हैं वो" उसने बताया, 

"और तू कौंन है सिद्धा की" मैंने पूछा, 

"माँ है सिद्धा की" उसने बताया, 

उसने बताया और फिर गायब हो गयी! अब मैंने उसको अधिक छेड़ना उचित नहीं समझा! 

कुछ जानकारी तो मिल गयी थी, लेकिन पूरी जानकारी नहीं मिली थी, बड़ा ही अजब सा मामला था, सुबह के तीन बजने को थे! अब हमने वापिस चलने की सोची और वापिस आ गए! 


   
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मैंने अभिनव और राजेश से कुछ नहीं कहा, सामान वापिस उतारा और बैग में रख कर सो गया! 

अगली सुबह उठा, तो थोडा और आगे जाने की सोची, मैं और शर्मा जी थोडा और आगे चले गए, आगे भी खेत ही थे और यहाँ यहाँ छोटे बड़े चबूतरे बने हुए थे, बुढ़िया के चबूतरे से भी आ गए चले गए। तभी पेड़ क एक झुरमट में एक बड़ा सा, चबूतरा दिखाई दिया, ये चबूतरा सबसे अलग था, और बड़ा भी! ये चबूतरा अवश्य ही बाबा सिद्धा का होगा मुझे लगा! 

"शर्मा जी, अभिनव और राजेश से कह कर कुछ आदमी बुलवाओं और इस चबूतरे की खुदाई करवाओ. आज दिन में ही" मैंने कहा, 

"ठीक है, मैं बोल दूंगा" वे बोले, 

"मुझे लगता है कि सारा राज यहीं दफ़न है" मैंने कहा, 

"यदि ऐसा है तो आज ही खुदवा देते हैं इसको, देखते हैं क्या मिलता है!" शर्मा जी ने कहा, 

और फिर हम वहाँ से वापिस आ गए! अभिनव ने आदमी बुलवा लिए. मैंने उस चबूतरेका कीलन कर दिया, ताकि किसी भी प्रकार से कोई भी आदमी घायल अथवा परेशान न हो, 

सुबह १० बजे खुदाई शुरू हुई, पहले ऊपर की लौरी ईटै हटाई गयीं! उसके नीचे एक पत्थर की पटिया आ गयी! पटिया भी हटवा दी गयी! लाल रंग की गिट्टी आई, करीब तीन फीट पर, उसके बाद और खुदाई शुरू हुई! वहाँ से पुराने चांदी के कड़े से मिले, दो तीन हाथी-दांत की बनी डिब्बियां भी मिली, फिर टूटे-फूटे बर्तन, घड़े और सकार जैसे, बस और कुछ नहीं मिला, मैंने वो डिब्बियां खोली, डिब्बियां किसी तार से बाँध कर बंद कि गयीं थीं, मैंने उनको काटा, डिब्बियां ज्यादा बड़ी नहीं थीं, बस तीन इंव बौंड़ी और चार इंच लम्बी होंगी! 

आदमी वापिस भेज दिए गए, मैं डिब्बियां खोलने में उलझा हुआ था! किसी तरह से एक डिब्बी खुल गयी! डिब्बी के अन्दर बालों का एक गुच्छा था, बस! और बाल भी किसी औरत के ही थे! लम्बे लम्बे बाल! 

अब दूसरी डिब्बी खोली! उसमे भी बाल ही थे. लेकिन एकदम सफेद बाल! बाल मोटे थे, मर्दाना दाढ़ी के बाल जैसे! मुत्थी उलझाती ही जा रही थी जितना सुलझाओ उतना उलझाती जा रही थी! 

खिन्जता भर जा रही थी मन में! मैंजे जीता समझा था ये उस से भी अधिक मुश्किल काम लग रहा था! 

"शर्मा जी ये गुत्थी तो उलझती ही जा रही हैं!" मैंने कहा, 

"हाँ! कोई और-छोर नज़र नहीं आ रहा अभी तक!" उन्होंने ने भी मेरा समर्थन किया! 

"अब लगता है, क्रिया पर बैठना ही पड़ेगा, और कोई रास्ता शेष नहीं है" मैंने कहा, 

"ठीक हैं, जैसा आप उचित समझे वे बोले, 

"ये कडिया, सिद्धा और उसके र लड़के! और सोटा वाली खेड़ी! बस यही मालूम चला है अभी तक!" मैंने कहा, 

"इनका कोई न कोई सम्बन्ध तो है पक्का!" वे बोले, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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"हाँ कोई सम्बन्ध तो है ही!" मैंने भी कहा, 

"तो बताइये, कहाँ चलना है? पेहोवा?" उन्होंने पूछा, 

"हाँ, जाना ही पड़ेगा, लगता है, वहाँ कौणिक मलंग से बात कर लो फोज पर, आज रात वहाँ पहुँच जाते हैं!" मैंने कहा, 

"ठीक है, मैं फोन करके आपने आने की इत्तला दे देता हैं उसको!" उन्होंने कहा! 

हम उसी रात पेहोवा पहुँच गए! मलंग से मुलाकात हो गयी, मलंग को सारी बात बताई और उस से एक रात के लिए भूमि ले ली, इसी शमशान में मलंग अपना क्रिया-कर्म किया करता था, सामान आदि के पैसे उसको दे दिए थे, रात के लिए भूमि का प्रयोग करना था अतः साफ सफाई करवा दी. मैंले रात्रि ११ बजे अलख पर बैठ कर जानना था सारा माजरा, ये था सारा कार्यक्रम 

साड़ी सामशी अपने सामने रख कर, भस्म-स्नान से फारिग होकर मैंने अलख उठा दी! और भोग भी दे दिया! अपना निशुल्मंत्र पढ़कर वहीं गाड़ दिया! 

मैंने मांस को पांच जगह पांच हंडियायों में रखा फिर उस पर अभिमन्त्रण कर गहरी साधना में तल्लीन हो गया! 

मैंने कर्ण-पिशाचिनी का आह्वान किया! मदिरा पी और पीकर अशिमन्नण किया! फिर अलखके चक्कर लगाए! कर्ण पिशाचिनी प्रकट हो गयी! कर्ण पिशाचिनी साधको कान में प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देती हैं। मैंने उसको उसका भोग दिया! 

और पहला प्रश्न पूछा, 

"रो खेन्डी कौन हैं?" 

उसने मुझे इसका उत्तर दे दिया! 

"दिम्मावाडू कौन है" 

उसने मुझे इसका उत्तर दे दिया! 

"सिद्धा बाबा कौन हैं?" 

उसने मुझे इसका भी उत्तर दे दिया, 

"कडिया कौन है?" 

मुझे इसका भी उत्तर मिल गया! 

उसके बाद कर्ण-पिशाचिनी ने सारा का सारा भेद खोल दिया! रहस्य उजागर हो गया! सारा रहस्य ये था! 

खेड़ी आज से ढाई सौ साल पहले लागौर जिले के किसी गाँत सोटा में रहने वाली एक्त रूपतान और तांत्रिक-जोगन हुआ करती थी! उरकबाप उस समय ६४ बंजारों के कबीलों का सरदार था! नाम था जस्लोन! उसने दूसरे लोगों का भी सामान 

खूब लूटा! हाँ, ये सोडी बड़ी अछित तांत्रिक-जोगन थी, वो जिस भी डेरे के तांभिक को हराती थी, उस से ब्याह कर लेती थी! इसी तरह से खेड़ी ने ये दस मर्दहशए थे! आखिरी वाला मर्द ये दिम्मावाडू ही था, ये पश्चिमी राजस्थान का एक कुख्यात बंजारा था और तांत्रिक भी 


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब रहा सिद्धा! सिद्धा भी एक तांत्रिक था और अपना डेरा अलग ही रखता था, उसके डेरे में १२१ लोग थे, उसके ९ बीतियां थीं ये सिद्धा कमी खेड़ी के हाथ नहीं आया था! माल काफी था और इसीलिए खेडी ने दिम्माखाडू को सीधा के परेडेरेको खतम करने को कहा! उसने साजिश रची और इस साजिश के तहत एक रात उसने सिद्धा के डेरे पर धावा बोला और वहाँ जितने भी थे सभी का कत्ल-ए-आम कर दिया! हाँ इस में सिद्धा के रबेटे जगाल और कंडाल, और सिद्धा की माँ कडिया, बच 

गए थे! डेरा खतम होने पर ये तीनों एक दूसरे डेरे पर चले गए थे, लेकिन दिम्माखाडू को मालूम होने पर उनसे छिपा 

खजाना ज़ब्त करने के लिए उनको खेड़ी के कहने पर दूसरे डेरे वालों ने इन तीनों को दिम्माखाडू को सौंप दिए थे! खजाने का पता जानने के बाद दिम्माखाडूने उन तीनों का भी कत्ल करवा दिया! उस समय सिद्धा का डेरा डोलन-डेश नाम से मशहूर हुआ करता था! बाद में खेड़ी ने अपनी विद्या से इन सभी रूहों को ढाई सौ सालों तक बाँध दिया अथवा सुला दिया! उन तीनों को बाद में कमल किया गया था, अतः वो पहले उठ गए! अब ये तीनों ही सिद्धा बाबा के जागने का इंतज़ार 

कर रहे थे! सोढ़ी ने ये जगह दिम्माखाडू को दे दी, दिम्मावाडू ने ही यहाँ ये चबूतरे बन्याए थे। बाद में कोई १५ सालों के बाद दिम्मारवाडू का भी काल हो गया, ये काल उसके ही किसी विश्वस्त आदमी तलोमा ने किया था! तलोमा ने ये जगह वहाँ के उस समय के सूबेदार को दे दी और वापिस नागौर आ गया! खेडी भी कालान्तर में काल का ग्रास बन गयी! 

रोथा असली रहस्य! जिसने मुझे उलझा के रखा था! 

अब मैने कर्ण-पिशाचिनी का नमन किया और पुनः भोग दिया! वो लोप हो गयी! मैं वहीं देर हो गया! 

मैं करीब तीन घटे बाद वहाँ से निकला! शर्मा जी को सारी बातें बता दी। उन्हें भी बहुत हैरत हुई! 

अब हमने वहाँ थोडा आराम विन्या! मलंग ने खाने का प्रबंध के दिया था सो हमने खाना खाया वहाँ और फिर उसके कोई एक घंटे के बाद अभिनव के पास चलने को तैयार हो गए! 

"गुरु जी! क्या रहस्य है!" शर्मा जी ने पूछा, 

"हाँ! रहस्य अति-गढ़ था ये! चलो सुलझा ही गया!" मैंने कहा, 

"हाँ! लेकिन अब ये सिद्धा!" वो बोले, 

"उस से बात करेंगे हम!" मैंने कहा, 

"हाँ, जैसा आप उचित समझो!" 

उसके बाद हम अभिनव के शहर की सीमा में प्रवेश कर गए! 

हम अभिनव के पास पहुंच गए. उनको भी ऐसा ही बता दिया, अभी कोई उन्नीस दिन बाकीशे, अत: हम वहाँ से वापिस हो गए, मै यहाँ पर १८वें दिन आना चाहता था, अत: दिल्ली पहुँच कर तैयारियों में लग गया! बहुत बड़ा रहस्य उजागर हुआ था! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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और फिर १८वा दिन आ गए! मैं शर्मा जी के साथ वहाँ पहुँच गया था, सीधे खेतों पर ही, अभिनव और राजेश वहीं मिल गए थे! घबराहट उनके चेहरों पर साफ झलक रही थी! 

मैंने वहाँ जाते ही वहाँ का मुआयना शुरू किया, अभी तक तो सबकुछ ठीक ठाक था! कोई हरकत नहीं हो रही थी! 

उसी रात को, मैं फिर से बाहर निकला शर्गा जी के साथ, मैंने कलुष, अभय और त्राम-गंत्र जागृत कर लिए थे! मैंने अपने 

हिसाब से तैयार था! मैं अब आगे बढ़ा! पहले चबूतरे पर सांप ही सांप बैठे हुए थे! बड़े बड़े सांप! सभी फुफकारते हुए! हम नाम 

मंत्र की सहायता से उनके बीच से निकल गए थे! फिर गोह आयीं, हम वहाँ से भी निकल गए! बुढ़िया के चबूतरे पर पहुंचे! बुढ़िया के चबूतरे पर चढ़ कर मैं उसको जगाना चाहा! मंत्रोच्चार आरम्भ किया और बुढ़िया उनींदा से मेरे सामने प्रकट हो गयी! मैंने उसको देखा और उसने मुझे देखा! 

"तू फिर आ गया'" उसने कहा, 

"हाँ, मैं फिर आ गया!"मैंने कहा, 

"तू चला जा यहाँ से, यहाँ कोहराम होने वाला है, सिद्ध जागने वाला है। उसने कहा, 

"मैं सिद्ध से मिलने ही आया है कड़िया" मैंने कहा, 

"तो तुझे काट देगा" वो बोली, 

"कोई बात नहीं, मैं देख लूँगा" मैंने कहा, 

"जैसी तेरी मर्जी" उसने झंझलाकर कहा! 

"एक बात बता कड़िया?" मैंने पूछा, 

"पूछ?" उसने कहा, 

"सिद्धा कब जागेगा?" मैंने पूछा, 

"कल बौदस है, कल जागेगा, रात तीसरे प्रहर" उसने बता दिया, 

"ठीक है, मैं कल तीसरे प्रहर आऊगा यहाँ तेरे पास सिद्धा से मिलने" मैंने कहा, 

"तेरी मर्जी" उसने कहा, और फिर वो लोप हो गयी, 

अब मुझे जो जानना था, वो जान चुका था! 

अब मैं वहाँ से वापिस हुआ! खेड़ी का मायाजाल कल रात तीसरे प्रहर कटनेवाला था! मुझे भी बेहद जिज्ञासा हुई! अब मैं वहाँ से वापिस हुआ! रास्ते में शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी, कल का ही तो दिज हैं जब सिद्धा जागेगा, ना जाने कैसे मिजाज का होगा!" मैंने कहा. 

"तो बदले की आग में झुलस रहा होगा, उठते ही वार करेगा दिम्माखाडू को ढूँढेंगा!" तो बोले, 

"हाँ ये बात तो तय है!!" मैंने कहा, 

"आप कैसे संभालोगे ये सब!" उन्होंने जिज्ञासा से कहा, 

"पहले उसी से बातें करेंगे, देखते हैं क्या कहता है, गयासुनता है" मैंने कहा, 

"वो अपना चबूतरा देखेगा, खुद हुआ!" वो बोले, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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"कोई बात नहीं, मेरे पास वो दो डिब्बियां हैं, देखते हैं वो उसके किस काम की हैं।" मैंने बताया, 

"हाँ हाँ! वो डिब्बियां अवश्य ही काम की होंगी. ये तो मैं भूल ही गया था!!" उन्होंने कहा! 

अब हम अभिनव के पास पहुंच गए, वो डर के मारे बेहोश होने को ही था, जब मैंने उसको कल के बारे में बताया! 

"पता नहीं, कैसी गति मारी गयी थी, जो ये जागील ले ली मैंने" उसने कहा, 

"कोई बात नहीं अभिनव जी! अब ये समस्या सुलझ जायेगी! बस कुछ घंटे और!" मैंने हिम्मत बंधाई, 

"बस गुरुजी, आपका ही सहारा है अब तो!" उसने हाथ जोड़कर कहा, 

"घबराओ मत, मैं सब देख लूँगा" मैंने कहा, 

तब मैंने अभिनव को सामान की एक सूची बना के दे दी, इसमें सभी ज़रुरत की वस्तुएं थीं, किसी भी समय काम पड़ सकता था, मैंने एक जगह अलख की जगह भी बना ली थी! 

"अभिनव जी, कल यहाँ रात्रि दस बजे के बाद कोई न ठहरे, न आप, न राजेश और न कोई तीसरा, कहीं कोई समस्या ज हो 

जाए" मैंने कहा, 

अशिनव ने हामी भरली, 

"हाँ एक बात और, अपने घर के सभी सदस्यों को कल घर से बाहर नहीं निकलने देना" मैंने कहा, 

उसने फिर से हामी भर ली, 

फिर अभिनव और राजेश वो सामाज लेने चले गए। 

और मैं कल रात के लिए रणनीति बनाने लगा! 

अगले दिन मेरे पास सारा सामान आ गया था, मैंने एक जगह अलख भी उठा ली थी, शक्ति-आह्वान हेतु सारे प्रबंध चाक-चौबंद कर लिए थे! मैंने तंत्राभूषण बाहर निकाले, उनको अभिमंत्रित किया और हाह, पाँव, गले और कमर में बाँध लिए और शर्मा जी को भी धारण करवा दिए! अब मैं इस सिद्धा और उसके साथियों का मुकाबला करने के लिए तैयार था! मैंने अपने त्रिशूल को महा-डोम मंत्र से अभिमंत्रित कर लिया था! इस से छोने पर कोई भी प्रेतात्मा स्वाक हो जाती मैंने रात्रि के दूसरे प्रहर में मंत्रोच्चारण आरम्भ किया था! 

अब तीसरा प्रहर आने को था! मात्र पांच मिनट शेष थे. मैं अलस्त से उठ गया, शराब के तीन गिलास खींचे और वहाँ से शर्मा जी को लेकर खड़ा हो गया! मैंने कहा, "शर्मा जी,चाहे कुछ भी हो जाए, अपने गले से ये आभूषण उतरने नहीं देना, जब तक ये आप धारण किये रहोगे, तब तक कोई आप पर प्रहार नहीं करेगा!" 

"जैसा आप कहें गुरु जी!" उन्होंने कहा, 

"चलिए अब" मैंने कहा, 

"चलिए" वो बोले, 


   
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श्रीशः उपदंडक
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हम वहाँ से उठकर अब चबूतरों की तरफ चले! वहाँ तो भीड़ लग गयी थी! सभी ने पलटके हमारी तरफ देखा, जगाल, कंडाल 

और कड़िया वहीं खड़े थे, कड़िया ने एक लम्बे-चौड़े आदमी को हमारे बारे में बताया! ऊंची कद-काठी का आदमी, गले में मालाएं और हंशलियाँ सी पहने, लम्बे केश और लीवे धोती धारण किये हाए, जूतियाँ पहने हुए. वो आदगी वहाँ से उठा और 

आपनी तलवार लेकर हमारी तरफ चला! 

मैंने अपना निशूल अपने सामने किया! वो वहीं रुक गया! उसको महा-डोम मंत्रने रोका था! 

"कौंज हो तुम दोनों!" उसने चिल्ला के बोला, 

"कड़िया से पूछ ले हमारे बारे में सिद्धा!" मैंने कहा, 

"मुझे कैसे जानते ही तुम?" उसने हैरान होकर पूछा, 

"मैं सब जान गया हूँ सिद्धा! तेरा ढाई सौ साल सोना! खेडी! दिग्माखाड़! सब जानता हूँ मैं!" मैंने कहा, 

"तुम खेव्डी को जानते हो!" उसने पूछा, 

"हाँ!" मैंने कहा, 

"कहाँ हैं तो उसने अपनी तलवार उठाकर कहा, 

"वो पूरी हो गयी सिद्धा!" मैंने कहा, 

"पूरी हो गयी? क्या कह रहे हो?" उसने कहा, 

"हाँ पूरी हो गयी!" मैंने बताया, 

"और वो दिम्माखाडू?" उसने पूछा, 

"वो भी पूरा हो गया!" मैंने बताया, 

"नहीं, मैं नहीं जानता, मैं बदला लँगा उस खेड़ी और उसके खसम दिमाखाडु से, आज ही!" वो बोला और उसने फिर से तलवार लहराई! 

"सुन! तेरा डैश डोलन था, तेरे आदमी और तेरा दिल करा दिया खोड़ी ने, इस बाट तेरे दोनों बेटों का और तेरी इस माँ का, 

जो तेरे साथ खड़ी है!" मैंने उसको बताया! 

"ऐसा नहीं हो सकता, हम आज ही जागे हैं" उसने हैरान हो कर कहा, 

"खेन्डी का मायाजाल था ये, ताकि तू उस से बदला न ले सके.तेरेको तेरे डेरे के साथ पूरे ढाई सौ सालों तक बंद दिया उसने, तेरी ही नटी-विद्या से!" मैंने उसको बताया! 

"नहीं तू झूठ बोलता है!" उसको यकीन नहीं आया! तब मैंने उसको वो डिब्बियां दिखार्थी! उसने वो डिब्बियां ली और खोली 

उसने सबसे पहले औरत के बाल वाली डिब्बी खोली! उसमे से बाल निकाले और बोला, "ये तो उस कूतड़ी खेडी के बाल हैं! 

फिर उसने दसरी डिब्बी खोली, उसमें से सफेद बाल निकाले, और बोला, "ये खेड़ी के बाप के बाल हैं" उसने ऐसा कहते हाए 


   
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