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वर्ष २००८ हरिद्वार की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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इस घटना को मित्रगण मै नाम दूंगा एक औघड़ का त्याग! वो औघड़ किशोरी नाथ आज भी मुझे एवं मेरे स्मरण में जीवित है! बाबा किशोरी नाथ! मै आज भी उसके स्थान पर नतमस्तक हो जाने को विवश हो जाता हूँ! ये घटना मेरे लिए अत्यंत स्मरणीय है! ८२ वर्ष का वो लंगड़ा औघड़! मुझे आज तक याद है!

मै उन दिनों उदयपुर राजस्थान में आया हुआ था, अवसर किसी के विवाह का था, मेरे एक परिचित संतोष गुप्ता के पुत्र का विवाह! ये लोग पूर्णतया सात्विक थे, मांस-मदिरा तो दूर, प्याज लहसुन का भी परहेज था लेकिन संतोष ने मेरा और शर्मा जी का ख़ास इंतजाम किया था! किसी भी चीज़ की कमी नहीं छोड़ी थी! संतोष की मैंने काफी प्रशंसा की!

अगले दिन सुबह की बात है, दिल्ली में रहने वाले मेरे एक परिचित जे शर्मा जी को फोन किया और कहा की वो बड़ी मुश्किल में हैं, उनकी दोनों बेटियाँ ऐसी बीमार पड़ी हैं की उनको अब दिखाई भी नहीं दे रहा है, डॉक्टर्स विफल हैं और परीक्षण पर परीक्षण कराये जा रहे हैं, उनके हिसाब से ये मानसिक-पक्षाघात है, और हम दिल्ली आते ही उनसे संपर्क अवश्य ही करें, और भी काफी बातें उन्होंने शर्मा जी को बतायीं, शर्मा जी ने कहा, "गुरु जी प्रधान का फ़ोन था, उसकी बड़ी लड़की आयुषी, आयु २३ वर्ष और छोटी लड़की दिव्या, आयु २१ वर्ष काफी बीमार हैं"

"क्या बताया उन्होंने?" मैंने पूछा,

"डॉक्टर्स कहते हैं की दोनों को मानसिक-पक्षाघात हुआ है" वे बोले,

"दोनों को एक साथ?" मुझे हैरत हुई!

"हाँ गुरु जी" वो बोले,

"कमाल है!" मैंने कहा,

"प्रधान परेशान है अब, सुबह फ़ोन करेगा, क्या बताऊँ उसको?" वो बोले,

"बोलो कि वापिस आने पर बात कर लेंगे" मैंने कहा,

"ठीक है, मै कह दूँगा" वो बोले,

उसके बाद थोडा और मदिरा-पान किया और सोने चले गए!

सुबह उठे तो कोई  ६ बजे फिरसे प्रधान का फोन आया, शर्मा जी से बात हुई, कोई आधा घंटा! बात ख़तम हुई तो शर्मा जी ने कहा, "गुरु जी, बड़ी लड़की आई.सी.यू. में दाखिल करनी पड़ी है, छोटी वाली भी इसी कगार पर है!"


   
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श्रीशः उपदंडक
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"क्या?" मैंने हैरत से कहा,

"हाँ, प्रधान के आंसूं नहीं थम रहे थे गुरु जी" वे बोले,

"ओह! ठीक है, शर्मा जी हम आज ही निकलते हैं, कल पहुँच जायेंगे, आप संतोष से कह दीजिये" मैंने कहा,

"जैसी आज्ञा" उन्होंने कहा, और प्रधान को फोन करके बता दिया!

संतोष थोडा विचलित तो हे परन्तु, किसी के जीवन का दांव उन्होंने नहीं खेला और हमने उनसे विदा ले ली!

हम वहाँ से निकल पड़े और जैसे तैसे, थके-मांदे दिल्ली पहुँच गए, वहाँ जाकर शर्मा जी ने प्रधान को फोन किया, बातें हुई, और शर्मा जी ने कहा, "गुरु जी, बड़ी लड़की कोमा में है और छोटी आई.सी.यू. में"

"ओह, मामला गंभीर है शर्मा जी, आप प्रधान से कहो कि बच्चियां कहाँ दाखिल हैं, हम वहाँ आ रहे हैं" मैंने कहा,

"अभी बोलता हूँ और पूछता हूँ" उन्होंने कहा और बात कर ली,

अगले ही क्षण हम वहाँ के लिए रवाना हो गए!

मै और शर्मा जी वहाँ अस्पताल पहुँच गए, प्रधान जे जैसे ही हमें देखा वो दौड़ कर आया और मेरे और शर्मा जी के पाँव पड़े, चेहरे पर कुछ अप्रत्याशित घटने के भाव मौजूद थे, लडकियां चूंकि आई.सी.यू. में दाखिल थीं अतः देखना संभव न था, वहाँ प्रधान की पत्नी और उनके दो भाई भी मौजूद थे, सभी के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थी, मैंने प्रधान से पूछा, "प्रधान साहब, कब हुआ ऐसा?"

"जी कोई १५ दिनों से ऐसा ही हो रहा है, डॉक्टर्स विफल हैं रोग बताने में" प्रधान ने कहा,

"अच्छा, पहले ठीक थीं?" मैंने कहा,

"हाँ जी" वो बोला,

"ठीक है, आप एक काम कीजिये, अभी अपने घर चलिए, मुझे लड़कियों का कमरा दिखाइये" मैंने कहा,

"जी चलिए!" प्रधान ने कहा और झट से उठा और हम उसकी गाड़ी में बैठ उसके घर चले गए, घर कोई एक-डेढ़ किलोमीटर ही होगा, गाडी रोकी और दरवाज़ा खुलवाया, अन्दर किसी महिला ने दरवाज़ा खोला, हम अन्दर गए, मैंने लड़कियों का कमरा पूछा तो प्रधान ने पहली मंजिल पर ले जाकर हमको वो कमरा दिखा दिया, मै और शर्माजी, प्रधान कमरे में दरवाज़ा खोल कर घुसे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कमरे में घुसते ही मुझे कच्ची हल्दी और झडबेरी के सड़ते बेरों की तीखी गंध आई ये गंध न तो शर्मा जी को आई और न ही प्रधान को, मुझे खटका हुआ की कुछ न कुछ अवश्य ही घट रहा है, कुछ भयानक!

मैंने शर्मा जी और प्रधान को कमरे से बाहर किया और दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिए, मैंने अपने कारिंदे को हाज़िर किया, कारिन्दा हाज़िर हुआ, मैंने उसको भोग के बारे में रात के लिए कह दिया, कारिन्दा मुझसे उद्देश्य जान, वहाँ से रवाना हुआ, और फिर ५ मिनट में वापिस हाज़िर हुआ! उसने बताया,

"बड़ी लड़की आयुषी और छोटी लड़की दिव्या पर झडबेरी-मारण चल रहा है, ये मारण एक लड़के कुलदीप ने अपने दादा औघड़ से करवाया है, कुलदीप का ये औघड़ दादा हरिद्वार के समीप रहता है, झडबेरी का वो पौधा भी वहीं है"

झडबेरी-मारण! ये मरण झडबेरी के एक झाड पर किया जाता है, उस झाड की जड़ में एक कच्ची हल्दी, कछुए का मांस, मछली, चिता-भस्म और मारण करवाने वाले के वीर्य से मिश्रण बना के किया जाता है, यदि ध्येय स्त्री है तो वीर्य और यदि पुरुष है तो रक्त ये मारण १५ से 30 दिनों में अभीष्ट फल देता है,समय रहते काट दिया जाए तो ठीक, अन्यथा पौधे के मरने के साथ-साथ लक्ष्य का भी अंत हो जाता है!

अब चूंकि लडकियां कोमा में थीं, स्पष्ट था मृत्यु की ओर धीमे-धीमे बढ़ रही थीं और समय शेष नहीं था, ये मारण काटा जाना चाहिए था अवश्य ही!

मेरा कारिन्दा वापिस गया और मैं दरवाज़ा खोल कर बाहर आया, और सारी बातों से शर्मा जी और प्रधान को बता दिया, उनके रोंगटे खड़े हो गए! मैंने प्रधान से पूछा, "ये कुलदीप कौन है?"

"जी हमारे यहाँ तो कोई नहीं है, न मोहल्ले में ही, और न कोई मेरी जानकारी में" उसने कहा,

"इसका मतलब ये बाहर का ही आदमी है कोई" मैंने शक जाहिर किया,

"ये आपकी बड़ी लड़की आयुषी क्या करती है?" शर्मा जी ने पूछा,

"जी वो नौकरी करती है एक जगह, एक्सपोर्ट का कोई काम है, वहाँ जाती है" प्रधान ने कहा,

"और छोटी वाली?" शर्मा जी जे पूछा,

"वो अभी पढाई कर रही है, बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाती है, घर पर ही" उसने बताया,

"उनके घर पर या अपने घर पर? शर्मा जी जे पूछा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"जी अपने घर पर" वो बोले,

"ठीक है, चलने की तैयारी कीजिये, हमको अभी हरिद्वार जाना है, आज अभी, इसी समय" मैंने कहा,

वे लोग उठे और हम लोग गाड़ी में बैठ हरिद्वार के लिए निकल पड़े!

कुलदीप को हम बाद में भी ढूंढ सकते थे, सबसे पहला काम था इन लड़कियों को बचाना, अतः हमने बिना समय गंवाए हरिद्वार के लिए दौड़ पड़े थे! ७-८ घंटे के बाद हम हरिद्वार पहुंचे, मै वहाँ अपने परिचित के आश्रम गया और उसने मिला, उनसे क्रिया स्थल तत्पर करने को कहा, इसकी आवश्यकता पड़ने वाली थी, मै नहा धोकर क्रिया स्थल में पहुंचा, सामग्री आदि आ चुकी थी, मैंने तब अपने एक खबीस को प्रकट किया, उसको उसका उद्देश्य बताया और उसको हमे वहाँ तक ले जाने के लिए कहा, खबीस तैयार हो गया, मै वहाँ से उठा और हम तीनों वहाँ से चल पड़े,खबीस को मैंने एक डिबिया में रख लिया था, अगर उड़ता रहता तो कोई भी औघड़ उसको पकड़ सकता था, व्यर्थ का विवाद होता और समय नष्ट!

खबीस को मै बीच बीच में निकालकर पूछ लेता था, अभी तक हरिद्वार से हम 39 किलोमीटर आ चुके थे, तभी खबीस ने हमको रुकवाया और ऊँगली से एक तरफ इशारा किया, ये जगह एक सूखी, बियाबान और पहाड़ी पर थी, गाडी वहाँ जाना संभव न था, अत: हम पैदल ही ऊपर चलने लगे, गाडी नीचे खड़ी कर दी, हाँ एक छोटा सब्बल अवश्य ले ल्या था हाथ में डिबिया मेरे पास ही थी!

हमने करीब आधा किलोमीटर रास्ता तय किया, तभी सामने वहाँ कई झडबेरी के पौधे देखे, यहाँ तो ये ५० से भी अधिक थे! दूर दूर तक फैले हुए! अब फिर मैंने खबीस की मदद ली, वो आगे चला और हम पीछे, फिर अचानक से वो रुक और उसने इशारा कर दिया एक झाडी की तरफ! ये झाडी करीब ४ फीट की रही होगी, अब मुरझाने लगी थी, ऊपर की पत्तियाँ सूख चुकी थीं यही वो स्थान था!

मैंने उस स्थान को देखा गौर से, वहाँ एक जगह मिट्टी उठायी दी, मैंने वहाँ खोदा! करीब दो फुट नीचे एक गुलाबी रंग का अंगोछा दिखाई पड़ा, मैंने उसको सब्बल की सहायता से ऊपर उठाया, बदबू के भडाके फूट पड़े! हम तीनों से थूके बिना रहा नहीं गया! बाहर आते ही उस पर मक्खियाँ टूट के पड़ी!

मैंने उसपे बंधे धागों को हटाया, और फिर अंगोछा खोला! उसमे सिन्दूर की डिब्बी, काजल, बिंदियाँ, हड्डियां आदि के टुकड़े थे! मैंने वहाँ से उन दोनों को हटाया और भंजन-मंत्र पढ़कर उस पर मूत्र-त्याग कर दिया! मारण समाप्त हो गया था! हम वहाँ से हटे तो प्रतीक्षा में बैठे नेवले वगैरह वहाँ टूट पड़े! हम वापिस हो लिए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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हम अपने आश्रम आ गए, मैंने प्रधान से अस्पताल में फोन करने को कहा और उन लड़कियों के बारे में पूछने को कहा, प्रधान ने फ़ोन किया और उसके चेहरे की खुभी ने बता दिया की लड़कियों को होश आ गया है! कोमा से बाहर आ गयीं हैं!

प्रधान ने इतना सुना और बुका फाड़ के रो पड़ा मैंने उसको रोका नहीं क्यूंकि ये खुभी के आंसूं थे एक बाप के! जिसकी लडकियां मृत्यु-द्वार से वापिस लौट आई थीं!

"गुरु जी, वो औघड़ हरिद्वार में ही रहता है, उसको मालूम पड़ेगा, वो फिर कोई काम करेगा!" शर्मा जी ने कहा,

"हाँ, अवश्य करेगा, लेकिन अब हमारे पास समय है, मै उससे निबट लूँगा!"

"अब क्या करना है गुरु जी?" प्रधान ने कहा,

"यही मै सोच रहा हूँ, मुझे दंड तो कुलदीप को भी देना है, इस औघड़ ने प्रेमवश ऐसा काम किया होगा, ये तो निश्चित है" मैंने कहा,

"जैसा आप उचित समझो गुरु जी" प्रधान ने कहा,

"ठीक है, अभी हमारे पास समय है, मै आज कुलदीप के बारे में पता लगाता हूँ, की वो साला है कहाँ?" मैंने कहा,

"ठीक है गुरु जी" शर्मा जी ने कहा

और प्रधान से एक बार फिर से अपनी पत्नी से बात करने के लिए फोन लगा दिया!

मै उसी रात क्रिया में बैठा और अपना एक खास खबीस बुलाया! ये खबीस काफी मज़बूत और कैसा भी काम करने वाला होता है! इसको इबु-खबीस कहा जाता है! मैंने उसको उसका काम बताया और कहा की वो इस कुलदीप को उठाकर ज़रा एक-दो पटकी मार दे! चाहे वो कहीं भी हो, और किसी का अहित न हो, भले ही कुलदीप को कुछ भी हो! खबीस ने सर पर हाथ रखा और अपने भोग का थाल उठाकर भोग खाया और चला गया!

इबु-खबीस कोई आधे घंटे के बाद आया! उसने कुलदीप को अपनी बीवी के सोते हुए बिस्तर से उठाया और दो बार पटकी मारी! दूसरी बार खबीस ने उसको उसकी बीवी के ऊपर फेंक के मार था! बाद में वो अपने एक जानने वाले खबीस के पास अलवर गया था, इसीलिए देर हो गयी!

इसके बाद मैंने खबीस से खुश होकर उसको वापिस भेज दिया!

वहाँ कुलदीप किसी अनजाने भय से सिहर गया! रात भर न तो वो और न ही उसकी बीवी ही सोये! कुलदीप की बीवी की एक एक्सपोर्ट फैक्ट्री थी दिल्ली में, और ये कुलदीप


   
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श्रीशः उपदंडक
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मेनेजर के तौर पर वहाँ काम-काज देखता था, आयुषी यहीं पर कंप्यूटर डिजाइनिंग का काम करती थी! कुलदीप ऐय्याश आदमी था! किसी भी वहाँ काम करने वाली लड़की को उसने अपनी हवस का शिकार अवश्य ही बनाया था, आयुषी को देख वो कामासक्त हो गया! उसने कई बार कोशिश की लेकिन असफल हो गया! एक बार आयुषी को वहाँ से कुलदीप और उसके साथ दो लड़कियों के आपत्तिजनक तस्वीरें मिल गयी. उसने वो रख ली, आयुषी की बहन भी कभी कभी उसके ऑफिस आया करती थी, आयुषी को कुछ काम की वस्तुएं आदि देने, कुलदीप को भनक लगी की आयुषी और दिव्या उसके बारे में सब जान गयीं हैं, इसीलिए वो चुपचाप उनसे बदला लेने का मन बना रहा था! लेकिन कोई तरकीब काम न आई! एक शाम कुलदीप जे आयुषी को अपने केबिन में बुलाया और साफ़ साफ़ बात कर ली आयुषी ने न केवल उसको डांटा, धमकी दी, बल्कि वो नौकरी भी छोड़ दी! बस नौकरी छोड़ने ने आग में घी का काम किया! उसने अपने दादा से ये कहा की २ लडकियां उसको मारना चाहती हैं, उनकी क्रिया कर दो, वो दादा था उसका, वृद्ध, उसने अविवेकी से कार्य कर दिया, क्रिया करवा दी!

पटकी लगने के बाद कुलदीप ने हरिद्वार जाने का और उसके साथ घटे वाकए को अपने दादा किशोरी नाथ को बताने की योजना बनायी! वो अगले दिन हरिद्वार के लिए रवाना हुआ!

बस! मुझे इसका ही इंतज़ार था!

अगले दिन कुलदीप आया हरिद्वार! सारी बातें उसने अपने दादा को बतायीं! दादा को ये आभास भी न था की उसका पर्दाफाश हो जाएगा! उसको क्रोध आया, भड़का और जहां मारण किया था, वहाँ कुलदीप को ले गया! मरण तो छिन्न-भिन्न हो ही गया था, अत: उसने पता लगाना शुरू किया की ये किसका काम हैं!

"शर्मा जी, आ गया ऊँट पहाड़ के नीचे!" मैंने कहा,

"आ गया न कुलदीप साला यहाँ! जब अपने पर पड़ी तो दादा याद आया, साला हरामी कहीं का! आने दो मेरे सामने, इतने जूत लगाऊंगा की याद भी रखना मुश्किल हो जाएगा!"

"अभी मुझे ये देखने दो की ये औघड़ कौन सी औघड़ी-शाखा से है, उसी के अनुसार मै तैरयारियाँ करूंगा!"

"ठीक है आप देख लीजिये, दीजिये इसे भी सबक!" वो बोले!

"अवश्य दूंगा!" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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उस दिन औघड़ ने ये जांचना शुरू किया की आखिर वो कौन है जिसने उसका मारण-भंजन किया है! उसने अपने खबीस भेजे, मैंने कोई विरोध नहीं किया! मै चाहता ही नहीं था विरोध करना, मै उससे बात करना चाहता था!

उस औघड़ किशोरी नाथ को पता चला गया की मै फलां डेरे का पढ़ा हूँ! उसने भी तैय्यारियाँ आरम्भ कर दी!

और यहाँ मैंने भी!

जिस स्थान से में उससे लड़ना चाहता था वो उसके स्थान से करीब १२ किलोमीटर दक्षिण में नदी किनारे स्थित था, वो जहाँ से लड़ना चाह रहा था वो नदी का खुला क्षेत्र था! ये भी एक ऊंची जगह थी, आसपास आबादी नगण्य ही थी, आज का मै नहीं कह सकता, मैंने सबसे पहले रात्रि-समय क्रिया में दो खबीस तैनात किये दोनों लड़कियों की सुरक्षा हेतु! ये आवश्यक भी था, वो मेरा ध्यान बंटाकर मेरा या उनका अहित कर सकता था! अतः मै तत्पर था!

वो औघड़ रात्रि ७ बजे से कुछ पहले ही क्रिया में बैठ गया, अपना चिमटा खड़खड़ाया और कुलदीप को एक दूसरे स्थान पर बने एक झोंपड़े में बिठा दिया! उसने अपने साथ एक सांप की टोकरी भी रखी हुई थी! मै अब इस औघड़ की शाखा को पहचान गया! ये अत्यंत पुरातन शाखा है!

उसने वहाँ अलख उठायी और मैंने यहाँ! उसको मेरे बारे में पता लग गया था! वो औघड़ अपने अनुभव से लड़ना चाहता था और मै केवल बचाव मुद्रा में!

उसने अपना त्रिशूल उठाया और नाद किया! फिर अलख में भोग दिया! मैंने यहाँ अलख में भोग दिया! और अब आरम्भ हुआ वार-प्रतिवार! वो मुझ पे वार करता मै स्वयं को बचाता! वो मुझे जांचता और मै उसे! २ घंटे बीत गए! न वो हारा और न मै!

वो खड़ा हुआ उसने दो बार ज़मीन पर अपना चिमटा मारा! भेदन-मंत्र पढ़ा और एक तेजस्वी-शक्ति वहाँ से लड़कियों की तरफ भेज दी! मेरे खबीस उनको देख भागे वहाँ से! मेरे पास आये! मैंने नैरत्या-कुमारी का आह्वान किया! और उसको लड़कियों की सुरक्षा हेतु भेजा!

उसकी शक्ति बीच मार्ग में रोकी गयी और मेरी शक्ति उहेश्य समाप्त होते ही मेरे समक्ष लोप हो गयी!

उसका मेरा द्वन्द पहुँच गया अब नियति तक! वो मुझ पर वार करता और मै अपना बचाव! अब मैंने वार करने की सोची! मैंने एक भयानक शक्ति का आह्वान किया! ये अस्थिमालिनी होती है! मैंने उसको नमन किया और उस औघड़ के पास भेज दिया! मेरी शक्ति को उसने रोका, मैंने आगे बढ़ाया! रस्सा-कशी हो गयी! करीब १० मिनट के बाद


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो औघड़ और मै अपने अपने स्थान पर ५-५ फीट दूर गिरे! मेरी अलख के अंगार फैल गए, लेकिन मैंने फिर भी अलख को बुझने नहीं दिया!

वो औघड़ भी कमाल का औघड़ था! अब तक डटा हुआ था! लेकिन उसने भी मेरा लोहा मान लिया था!

अब उसने एक भयानक निर्णय लिया! उसने मल-मूत्र से गुंदी हुई मिट्टी की एक गेंद बनायी और जाप किया! ये महा-औघड़ी क्रिया थी! कोई भी औघड़ अपने प्राण-रक्षण करने हेतु इस क्रिया का प्रयोग करता है! फिर उसने इस गेंद की और छोटी छोटी गेंदें बनायी, अपनी पिटारी खोली और एक विषधर को बाहर निकाला! उसने वो अभिमंत्रित छोटी गेंद इस विषधर के मुंह में डाल दीं! और उसको उसकी पूंछ से पकड़ कर 3 बार मंत्र पढ़ते हुए झटके दिए! फिर उसने अपना चिमटा भूमि पर मारा! तुरंत प्रभाव हुआ! मेरी जेत्र-ज्योति लोप हो गयी! अँधेरा छा गया मेरे सम्मुख! भयानक पीड़ा हुई! उल्टियां लग गयीं! लगा जैसे, मेरा कलेजा मुंह से बाहर आने को है!

मैंने अभय-मंत्र पढ़ा, लेकिन कुछ न हुआ! मैंने अपने हाथों से भूमि को टटोला, कपाल ढूँढा और मंत्रोच्चारण किया! कपाल को तीन-तीन बार नैत्रों से छुआ, नैत्र-ज्योति वापिस आ गयी! उल्टियां बंद हो गयीं! मृत्यु से बच गया मै! ।

मुझे क्रोध आ गया अब! मैंने महा-औघड़ी क्रिया उसको भी दिखानी थी! अतः मैंने अपने मूत्र को हाथ में लिया! इसमें थूका और फिर मदिरा मिला, भूमि पर गिरा दिया! उससे मैंने एक आकृति बनायी और मंत्र पढ़ते हुए उसको अपने चिमटे की नोंक से बींध दिया! अभीष्ट फल प्राप्त हुआ!

वो औघड़ किशोरी नाथ अचेत हो गया और निढाल हो भूमि पर गिर गया!

मैंने स्वयं को संभाला और वस्त्र धारण कर भागा शर्मा जी और प्रधान के पास! मैंने उनको जल्दी से जल्दी उस स्थान पर चलने को कहा जहां वो औघड़ अचेत पड़ा है! प्रधान से गाडी शर्मा जी ने ले ली और दौड़ा दी! जहां वो स्थान था, वहाँ पर पैदल जाना था, हम वहाँ चले, खुला नदी का किनारा और दूर भड़कती एक अलख! यहीं था वो औघड़!

साथ ही वहाँ एक झोंपड़ा था, मैं सीधा वहीं गया, वहाँ कुलदीप बैठा था एक और व्यक्ति के साथ! हमे देख पहचान न सका! शर्मा जी जे दो-चार कस के लगाए और प्रधान ने भी! साथ में बैठा आदमी चुपचाप देखता रहा, वो कोई सहायक होगा वहाँ!

शर्मा जी ने कुलदीप के बाल पकड़ कर बाहर खींचा! और मै उस औघड़ के पास गया! औघड़ अचेत पड़ा था! मैंने उसको देखा, सफेद दाढ़ी, वृद्ध व्यक्ति, अशक्त व्यक्ति, एक


   
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श्रीशः उपदंडक
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टांग खराब थी उसकी, शायद बाद में किसी दुर्घटना में हो गयी हो, परन्तु अनुचित कार्य को करने वाला औघड़!

मैंने उसके मुंह पर अभीमंत्रित जल के छींटे मारी उसको होश आया! उसको होश आ गया! होश में आते ही वो संयत हुआ और मुझे गाली गलौज करने लगा! मैंने उसको समझाया लेकिन वो नहीं समझा! और बोला, "मेरे पोते को मारने वाली थीं वो लडकियां, मैं सालियों को सडा-सडा के मारूंगा!"

"कौन मारने वाली थीं, कौन लडकियां?" मैंने उससे पूछा,

"तू नहीं बचेगा कुत्ते! तूने ही खेल बिगाड़ा है मेरा! कल का बच्चा मुझे सिखाएगा, क्या करना है और क्या नहीं?" वो चिल्लाया!

"सच कहता हूँ, तुम्हारी उम्र का लिहाज है, नहीं तो तुम्हारी ये जुबान हलक से अलग कर देता और सर काट के कपाल बना लेता, लेकिन तुमने गलत का साथ दिया!" मैंने कहा,

"कौन गलत? मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया, मैंने हमेशा सही का साथ दिया है, कौन है गलत?" उसने पूछा,

"तुम्हारा पोता! ये कुलदीप! जानते हो इसने क्या किया?" मैंने कहा,

"क्या किया इसने?" उसने पूछा,

तब प्रधान ने सारी बातें औघड़ को बता दी! औघड़ ने ध्यान से सुना और फिर कुलदीप से इसकी पुष्टि की!

उसकी आँखों में आंसूं आ गए! उसने प्रधान, मुझसे और शर्मा जी से क्षमा मांग ली! और अपने पोते को कभी भी अपनी सूरत न दिखाने को कह के वहाँ से भगा दिया!

मुझे खुशी हुई की इस औधड़ से एक पाप होते होते बच गया! वो भी उम्र के अंतिम पड़ाव में!

तभी औघड़ पीछे हटा, हटता गया, और पीछे, और पीछे! अँधेरे में ओझल हुआ और फिर एक 'छपाक की आवाज़ आई! हम वहाँ भागे, वहाँ घुप्प अँधेरा था और नीचे गहरी नदी का पानी! उस औघड़ ने नीचे कूद कर छलांग लगा ली थी, अपनी इह-लीला समाप्त कर ली!

उसका गुनाह इतना था की उसने पोते के मोहवश ऐसा अनुचित काम किया था! काश उसने पहले कुलदीप की कहानी की सच्चाई का पता लगा लिया होता!

अगले दिन हम वहाँ आये, औघड़ का सामान वहीं पड़ा था, वो व्यक्ति गायब था, नीचे नदी स्वछन्द गति से बह रही थी जैसे गत-रात्रि कुछ न हुआ हो!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मुझे वो औघड़ किशोरी नाथ आज तक याद है!

और मै उसको कभी भूल भी नहीं सकता!

किशोरी नाथ औघड़ मेरी यादों में आज भी जीवित है!

------------------------------------------साधुवाद!--------------------------------------------


   
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