वर्ष २००७ रोहतासगढ़...
 
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वर्ष २००७ रोहतासगढ़ सासाराम बिहार

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श्रीशः उपदंडक
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मित्रगण! इस संसार में रहस्य भरे पड़े हैं! एक खुलता है दूसरा मिल जाता है! मैंने अपने जीवन में ऐसी ऐसे ना जाने कितने रहस्य देखे हैं! मै आपको एक ऐसे ही रहस्य के बार में बताता हूँ! मै यहाँ २००७ के आखिर में यानि दिसम्बर में गया था, वैसे तो अतृप्त प्रेतात्माएं अक्सर रात को ही विचरण करती हैं परन्तु एक जगह ऐसी है जहां ये प्रेतात्माएं दीं में भी विचरण करती हैं! ये जगह है रोहतासगढ़ का किला, ये सासाराम, बिहार से दो घंटे की दूरी पर पड़ता है! इस किले का रहस्य आज तक नहीं सुलझा, कहते हैं इसमें अकूत धन-दौलत नीचे बने कक्षों में भरी पड़ी है! रोहतासगढ़ के किले का इतिहास काफी समृद्ध रहा है, परन्तु में अन्य राजाओं के बारे में ना कह के, केवल राजा मान सिंह के बारे में ही लिखूगा, राजा मान सिंह शहंशाह अकबर के एक कद्दावर और अहम् दरबारी थे, १५५८ ईसवी में राजा मान सिंह को अकबर ने बंगाल और बिहार का शासक अर्थात गवर्नर नियुक्त किया, तब ये रोहतासगढ़ का किला राजा मन सिंह के हाथों में आ गया! राजा मान सिंह को ये किला अत्यंत पसंद आया! एक तो प्राकृतिक रूप से संरक्षित था, दूसरा किले का स्थान ऊंचा और काफी विशाल था! राज मान सिंह ने इस किले में अपने हिसाब से कुछ परिवर्तन करवाए और एक आद इमारत भी बनवाई, और वहाँ फ़ारसी कला के हिसाब से बाग भी लगवाए!

राजा मान सिंह ने अपनी सबसे प्रिय पत्नी और पत्रानि के लिए यहाँ आइना-महल बनवाया! ये महल बहुत खूबसूरत और देखते ही बनता है! सबसे खूबसूरत और शानदार है राजा मान सिंह का आवसीय स्थल! तख्त-ए-बादशाही, बेहद सुंदर और स्थापत्य कला में बेजोड़! और बारादरी से होके बनाया एक दीवान-ए-खास! बस, अब कहानी यहीं से शुरू होती है मित्रो!

वर्ष २००७ में मै अपने किसी खास जानकार के पास किसी कार्यवश देहरी-ओन-सोन आया हुआ था, वहाँ मुझे इस किले के बारे में पता चला! मुझे इसका समृद्ध इतिहास बताया गया तो मेरे मन में भी यहाँ घूमने और इस किले को देखने की लालसा जागी! मै शर्मा जी और मेरे वो जानकार अशोक एक दीं हम वहाँ के लिए सुबह ही निकल पड़े!हम पहले सासाराम पहुंचे और वहाँ से रोहतास गढ़ के लिए रवाना हुए! हम वहाँ पहुँच गए!

किला वाकई में बेहद खूबसूरत है! ये किला शेर शाह सूरी, राजा मान सिंह, शहजादा खुर्रम आदि का इतिहास समेटे हुए है! शहजादा खुर्रम ने जब अपने पिता जहांगीर से बगावत की थी तो उसने यहीं शरण ली थी! और जब शेरशाह सूरी के हाथ से चुनार का किला निकल गया था हुमायूं के साथ जंग में तो भी उसको यहीं शरण मिली थी! शेरशाह के समय की भी यहाँ काफी इमारतें हैं!


   
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श्रीशः उपदंडक
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खैर, हमे घूमते घूमते काफी समय व्यतीत हो गया था, अतः आराम करने हम एक जगह आके रुके, मै तो वहीं घास में एक चादर बिछा के लेट गया था! और शर्मा जी भी! मेरे जानकार चाय आदि का प्रबंध करने चले गए थे, वहाँ लोगों का आना जाना तो होता है, लेकिन काफी कम, इक्का-दुक्का हमारे जैसे ही बाहरवाले वहां आते हैं घूमने,

सहसा, लेटे लेटे मेरी नज़र वहाँ उस मान सिंह वाले महल की छत पर पड़ी! राजस्थानी वेश-भूषा में वहाँ एक लड़की, उम्र कोई २०-२२ वर्ष अपने चेहरे को आधा ढके और दीवार से कमर लगाए हमको ही घूर रही थी! मैंने उठ कर बैठ गया! पक्का था कि ये कोई प्रेतात्मा ही है! मैंने आपको बताया ही था, दिखने का निर्णय ये स्वयं करती हैं। किसी दिखना है और किसे नहीं! मै चुपचाप बैठे देखता रहा! तभी वहाँ एक और लड़की आई! वो भी मुझे ही घूरने लगी! मैंने शर्मा जी को हाथ मार के उठाया, वो चेहरे पर रुमाल ढके लेटे हुए थे, वो उठे और बोले, "क्या हुआ गुरु जी?"

"श! वहाँ देखना एक मिनट रुको ज़रा" मैंने उनको इशारे से बताया,

फिर मैंने कलुष मंत्र पढ़ा! और अपने और शर्मा जी के जेत्रों पर प्रयोग कर दिया! नेत्र खोले तो उनको वही दिखाई दिया जो मैंने देखा था! बोले, " ओह ये तो दो हैं, हैं राजस्थानी पक्का, विश्वास के साथ कहता हूँ मै!"

"हाँ! शायद राजा मान सिंह के समय की हैं। मैंने कहा,

"हाँ! ये ही कारण है!" वे बोले,

तभी वहाँ एक और लड़की आ गयी! वो भी देखने लगी हमको!

"एक और आ गयी!" मैंने कहा,

"हाँ!" वे बोले,

"आप यहीं रुकिए, अशोक आयें तो उन्हें यहीं रोक के रखना, मै अभी आता हूँ, देखता हूँ क्या कहना चाह रही हैं ये" मैंने शर्मा जी से कहा और स्वयं सीढियां चढ़ के ऊपर चला गया,

ऊपर आया तो ऊपर कोई नहीं था, मैंने फिर दृष्टि-मंत्र पढ़ा और अभिमंत्रित किये अपने नेत्र, अभी भी कोई नहीं दिखा, मैंने हर तरफ देखा लेकिन कोई नज़र नहीं आया! मैंने आगे पीछे हर जगह देखा, लेकिन कोई नहीं था वहाँ! मैंने वहाँ नज़र डाली जहां शर्मा जी लेटे थे, वहाँ भी कोई नहीं था, अतः मै नीचे उतर आया और अशोक चाय ले आये थे तो हम चाय पीने लग गए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कोई आधा घंटा बीता होगा, शर्मा जी और मेरी निगाह वहीं लगी हुई थी, तभी अचानक वहाँ एक प्रेतात्मा नज़र आई! आधे चेहरे पर यूंघट किये हुए, फिर दूसरी और फिर तीसरी! अबकी मैं ऊपर नहीं गया, बल्कि वहीं बैठा रहा, और वो भी वहीं टिकी रहीं! फिर मैंने ऊपर जाने की सोची, मै उठा और ऊपर गया!

ऊपर आया तो देखा वहाँ केवल एक ही थी वो! बाकी दोनों नदारद थीं! मै उसके पास गया तो वो पीछे हट गयी, मै थोडा और आगे बढ़ा, वो और पीछे हट गयी! मै चुप हो गया, वहीं खड़ा रहा, मैंने उस लड़की को देखा, हाथ में राजस्थानी कंगन पहने हुए, चिबुक में गोदना! गले में हंसली और एक दो और हार आदि मालाएं!

"डरो नहीं" मैंने कहा,

वो कुछ न बोली,

"सुनो, डरो नहीं" मैंने कहा,

मै आगे बढ़ा, वो फिर पीछे हटी!

"खेल मत खेलो, जो पूछता हूँ उसका जवाब दो" मैंने कहा,

मै आगे बढ़ा, अब वो नहीं हटी! मैंने कहा, "कौन हो तुम?"

"शिणी" उसने हलके से कहा,

"शिणी? ये तुम्हारा नाम है?" मैंने पूछा,

उसने कहा कुछ नहीं बस हाँ में गर्दन हिला दी! तो इसका नाम शिणी था! मैंने फिर सवाल किया, "और वो दोनों कहाँ है? जो तुम्हारे साथ थीं?" मैंने पूछा,

उसने कुछ नहीं कहा, हाँ, हाथ से सीढ़ियों की तरफ इशारा कर दिया,

"वो ऊपर हैं?" मैंने पूछा,

उसने फिर से कुछ नहीं कहा और गर्दन हिला के हाँ कह दी! मै वहाँ से ऊपर की ओर चला, ऊपर आया तो देखा वहाँ वे दोनों खड़ी हुई हैं, इन दोनों ने कोई चूंघट नहीं किया हुआ था, साफ़ साफ दिखाई दे रही थीं!

"तुम कौन हो? शिणी ने तो मुझे बता दिया?" मैंने कहा,

उनमे से एक आगे आई और धीरे से बोली, "कनिया"


   
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श्रीशः उपदंडक
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"कनिया है तुम्हारा नाम?" मैंने कहा,

"हाँ कनिया!" उसने कहा,

अब मैंने तीसरी को देखा, वो भी आगे आई, बोली, "रीजा"

"अच्छा रीजा नाम है तुम्हारा" मैंने कहा,

अब वे तीनों इकट्ठे खड़ी हो गयीं! मैंने उनको देखा और बोला, "क्या चाहते हो मुझसे? मेरे सामने क्यूँ आये तुम?" मैंने पूछा,

वो तीनों पलटी और एक झरोखे से एक खंडहर की ओर इशारा किया! तीनों ने एक साथ हाथ उठा के इशारा किया था!

"वहाँ क्या है?" मैंने पूछा,

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया बस वहीं की तरफ इशारा कर दिया! मैंने वो जगह देखी अबकी बार गौर से, ये कोई पुराना सा खंडहरनुमा मंदिर सा था, मैंने पूछा, "वहाँ क्या है?"

शिणी ने कहा, "वहाँ जाइये, वहाँ जाइये, वहाँ जाइये, वहाँ जाइये" ४ बार! एक ही बात!

"ठीक है, लेकिन वहाँ है क्या? ये तो बताओ?" मैंने पूछा,

"वहाँ जाइये" तीनों ने एक साथ बोला!

"ठीक है मै जाता हूँ वहाँ, देखता हूँ क्या है?" मैंने कहा,

मै पीछे मुड़ा और नीचे उतर गया, अब वो मंदिर बड़ी दूर था वहाँ से, पहले ही थक चुके थे हम!

काहिर, मैंने शर्मा जी को साथ लिया, सारी बातें बतायीं और हम दोनों मंदिर की तरफ चले गए! पीछे देखा तो वे तीनों टकटकी लगाए हमे ही देख रही थीं!

बड़ी मुश्किल से धीरे धीरे हम दोनों वहाँ पहुंचे, खंडहर मंदिर! किसी समय ये जगमगाता होगा लेकिन आज केवल अपना अस्तित्व कायम किये खड़ा है! लेकिन, ऐसा यहाँ क्या है जो वो तीनों हमे यहाँ भेज रही हैं? यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं था, न कोई कक्ष न कोई कोठरी न कन, न मज़ार और न ही कोई अन्य खंडहर, हाँ आसपास बड़े बड़े पत्थर अवश्य पड़े थे, समय के मूक गवाह!

बड़ी मुश्किल थी, क्या किया जाए? आखिरकार फिर से क्रिया का सहारा ही लेना पड़ा! मैंने त्रि-आयाम-मंत्र पढ़ा, सामने का दृश्य स्पष्ट हो गया! भूमि के अन्दर के भी पत्थर दिखाई देने


   
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श्रीशः उपदंडक
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लगे! फिर मैंने मंदिर को देखा, मंदिर के पीछे कुछ और भी दिखाई दिया मुझे, एक धूल-धामृत इमारत! अब केवल बुनियाद के पत्थर ही दिखाई दे रहे थे वहाँ! तभी मुझे वहाँ लोहे ही सांकलें, बेड़ियाँ, घुडबंध, लोहे के मोटे मोटे घन दिखाई दिए!

और फिर कुछ कोठरियां, जो कि अब टूट-फूट चुकी थीं, ज़मींदोज़ हो चुकी थीं! लेकिन ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसका कोई समबन्ध उन तीनों प्रेतात्माओं से हो! ज़मीन में दबी चीजें दिखाई दे रही थीं, पेड़ों की जड़ें, शहतीर, बड़े बड़े किवाड़ लेकिन काम का कुछ भी नहीं! मैंने वहाँ से वापिस जाना तय किया! मैंने मंत्र वापिस ले लिया!

मै वापिस आया और सीधा ऊपर गया, वो तीनों वहीं मिलीं खड़ी हुई! मैंने कहा, "मुझे वहाँ कुछ नहीं मिला, क्या है वहाँ?"

वे तीनों फिर से उस झरोखे तक गयीं और मंदिर की तरफ इशारा किया!

मैंने फिर से मंदिर देखा और फिर वहाँ कुछ नहीं दिखा, मैंने बताया उन्हें कि वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है! लेकिन वे नहीं मानीं वे लगातार वहीं इशारा करती रहीं! मुझे कुछ नहीं समझ आया! मैंने कहा, "कनिया, वहाँ है क्या? मुझे बताओ तो ज़रा?"

"वहाँ" उसने फिर से इशारा किया,

अब मेरा दिमाग भ्रमित होने लगा, न तो वहाँ कुछ है, न ये मुझे कुछ बता ही रही हैं? क्या अजीब सी बात थी? खबीस बुलाता तो मुसीबत तय, कारिन्दा बुलाऊं तो उद्देश्य क्या बताऊँ? बड़ी विकट स्थिति थी!

"सुनो तुम तीनों, अब मुझे ये बताओ वहाँ है क्या??" मैंने खीझ कर कहा,

"वो तीनों दौड़ी और फिर झरोखे से वहाँ इशारा कर दिया! मेरा दिमाग खराब होने लगा! धुआं उड़ने लगा दिमाग में!

मैंने गुस्से से कहा, "वहाँ है क्या? तुम चलो मेरे साथ वहाँ?" मैंने कहा, "नहीं, नहीं जा सकते, खून है यहाँ, यहाँ रीजा ने कहा,

"कहाँ कहाँ है खून?" मैंने कहा,

"यहाँ' उसने फर्श को देखते हुए कहा,

"यहाँ" उसने दीवार को देख के कहा,

"यहाँ" उसने दरवाजे को देखकर कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब तो और रहस्य उलझ गया था! किला बंद होने का सरकारी समय भी होने वाला था, मै उलझ गया था अब बुरी तरह!

मैंने निर्णय किया कि अब कल फिर आया जाए यहाँ, मैंने उन तीनों को समझा दिया कि मै कल आऊंगा, देखता हूँ, क्या किया जा सकता है, जहां तक मदद का सवाल है मै यथासंभव प्रयास करूंगा! वे थोड़ी संयत हुई! और फिर तीनों आपस में सर भिड़ा कर वहाँ मंदिर की ओर देखने लगीं!

मामला जैसा मैंने सोचा था वैसा कतई भी नहीं था! अभी तो  शुरुआत ही मालूम नहीं थी! खैर, हम वापिस आये,

रास्ते में थोडा सामान खरीदा, रात को क्रिया की आवश्यकता थी, इसीलिए सामान आवश्यक था!

"कुछ पता चला गुरु जी?" शर्मा जी ने पूछा,

शर्मा जी, मामला संगीन है काफी!" मैंने बताया

"ओह! क्या हो सकेगा?" वे बोले,

"हाँ, देखता हूँ शर्मा जी, क्या मामला है वहाँ, आज पता करता हूँ!"

फिर हम वापिस देहरी ओन सोन के लिए रवाना हो गए!

हम देहरी ओन सोन पहुँच गए, खाना वगैरह खाया और फिर मै वहाँ एक अलग जगह पर बैठ गया, एक अलग कमरे में, एक स्थिति बेहद खराब थी, एक तो मै वहाँ खबीस भेज नहीं सकता था, न इबु-खबीस को ही, वो वहाँ जा के मार-धाड़ करते, उस से कोई फायदा नहीं था, कारिंदे के लिए उद्देश्य नहीं था! अब एक ही काम हो सकता था, वाचाल-प्रेत को भेजना! ये महा-प्रेत होता है। कोई भी रूप धर सकता है, कुत्ते का, उल्लू का, सांप का, सांड का, मक्खी का, इंसान का आदि आदि! ज़रूरत पड़ने पर स्थति के अनुसार ही रूप बदल लेता है! मैंने उसका आह्वान किया! वो हाज़िर हुआ! कानों में लोहे के कड़े डाले! मैंने उसको उसका पञ्च-महाप्रसाद दे दिया! मदिरा पी उन्मत्त हो गया! मैंने उसको सारी बात बता कर रवाना कर दिया! वाचाल प्रेत उड़ चला!

एक घंटे के बाद आया! लेकिन कुछ काम की बात न बताई उसने! बस इतना की वहाँ बहुत भीड़ है! बस चला गया वो फिर! भीड़ तो है, ये तो मै भी जानता था, लेकिन काम की कोई बात मालूम न पड़ी मुझे!


   
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श्रीशः उपदंडक
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फिर मुसीबत जस की तस! अब क्या किया जाए। तभी एक युक्ति आई दिमाग में! इस से काम बन जाएगा!

मैंने शाह साहब भिश्ती वाले के पास अर्जी लगाई! काजल लिया और अपने बाएं हाथ के नाखून पर लगाया, और इल्मात शुरू किया! १५ मिनट बाद मैंने कहा, "सलाम आलेकुम हुजूर!" उनके अर्दली ने सवाल पूछा तो मैंने सारी विडंबना बता दी! अब चलचित्र की तरह सारा दृश्य स्पष्ट हो गया! मैंने सजदा कर उनका शुक्रिया किया! वे चले गए!

बड़ा वीभत्स दृश्य था वहाँ! ये कहानी है राजा मान सिंह के करीब १४२-४३साल बाद की! उस किले में और आसपास की रिहाइश में राजस्थानी लोगों की अच्छी संख्या मौजूद थी, कई तो वहाँ मुकम्मल तौर पर बस गए थे! और कुछ अभी भी व्यापार आदि से गुजारा करते थे! कुछ सैनिक थे वहाँ! और ये तीनों प्रेतात्माएं ऐसे ही किन्ही सैनिकों की पत्नियां थीं! जिनके पतियों को रात में खींच कर लाया गया बाहर और मंदिर के पास बने फाँसी घर में फांसी दे दी गयी! ये कहानी है १७६३ ईसवी की, जब उधवा-नाला की जंग लड़ी गयी थी, बिहार और बंगाल का तब गवर्नर मीर कासिम हुआ करता था! ये सैनिक इसी मीर कासिम के थे, मीर कासिम के इन सैनिकों ने अंग्रेजों से हारने के बाद यहाँ इस किले में शरण ली थी, लेकिन अफसोस, अंग्रेज कैप्टेन गोडार्ड ने सभी मीर कासिम के सैनिकों को फांसी पर लटका दिया था। बाद में मीर कासिम भी मारा गया, उसको रोहतासगढ़ के तत्कालीन दीवान शाहमल ने अंग्रेजों को सौंप दिया था! अंग्रेज सनिकों ने मीर कासिम के सभी सैनिकों, उनके बच्चों और औरतों का क़त्ल-ए-आम कर दिया!

अब मै हकीक़त जान गया था! बड़ा ही मार्मिक था ये सब!

मैंने शर्मा जी को ये सब बता दिया! इतिहास फिर जिंदा हो गया था! वहाँ का मंजर आँखों में उभर आया!

"शर्मा जी, ना जाने और क्या क्या है इस संसार में!" मैंने कहा,

"हाँ गुरु जी, ये एक मनुष्य जीवन बहुत कम है ये सब जानने के लिए!" वे बोले,

"चलिए, कल चलते है वहाँ, अब मै समझा कि वे बेचारी तीनों क्यूँ वहाँ मंदिर की तरफ इशारा कर रही थीं! उफ्फ्फ!"

"गुरु जी, कोई वक़्त मुकर था यहाँ आने का, सो आ गए" ते बोले, "हाँ, इस से ज्यादा और कोई खुलासा नहीं सटीक जान पड़ता" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"ठीक है गुरु जी, इनको भी मुक्त कीजिये आप" वे बोले, "हाँ, मै करूँगा मुक्त इन्हें, करता हूँ पूरा यत्न!" मैंने कहा,

उसके बाद मैंने एक और क्रिया की, इसकी कल आवश्यकता थी!

"गुरु जी? यहाँ तो और भी होंगे ऐसे?" उन्होंने पूछा,

"हाँ, लेकिन हमारे समक्ष ये तीनों ही है फिलहाल तो" मैंने उनसे कहा,

"देखिये, अगर कोई और मिले तो, मुक्त कर दीजिये, पता नहीं हम कभी यहाँ आयें न आयें" उन्होंने कहा,

"हाँ, मै देखूगा, कोई अन्य हुआ तो वहाँ मैंने बताया,

"ठीक है गुरु जी, पुण्य-लाभ का अवसर है ये" वे बोले! अगले दिन हम फिर से किले पहुंचे, वहीं पहुंचे, मैंने शर्मा जी, अशोक को वहीं रोका, मै अन्दर गया, वहाँ कोई नहीं था! मैंने आवाजें दिन उनके नाम से,लेकिन तब भी वहाँ कोई नहीं आया, मैंने प्रत्यक्ष-मंत्र जागृत किया, लेकिन तो भी कोई नहीं आया, लगा वे तीनों यहाँ से स्थान छोड़ जा चुके हैं, ये नयी समस्या आन पड़ी थी! अब क्या हो?

मै बाहर आ गया, वापिस वहीं जा बैठे जहां हम कल आये थे, ऊपर देखा, तो कोई नहीं था, मैंने इंतज़ार करना उचित समझा, इंतज़ार किया, करीब २ घंटे लेकिन कोई नहीं आया! मैंने फिर कलुष-मंत्र पढ़ा, जागृत किया और नेत्र अभिमंत्रित किये और आसपास दृष्टिपात किया, लेकिन कोई भी नज़र नहीं आया!

बड़ी खिन्नता हुई, जिस कारणवश हम यहाँ आये थे अब उसका कोई औचित्य नहीं था, मैंने फिर भी एक बार ऊपर जाने की सोची, गया, देखा, आसपास टटोला, लेकिन कोई नहीं मिला, मै वहाँ से वापिस आया नीचे, शर्मा जी को बताया, उन्हें भी हैरत हुई, फिर हम वापिस आ गए वहाँ से,

बड़ी निराशा हुई, सारी मेहनत व्यर्थ गयी!

अशोक जी से विदा लेके हम दिल्ली वापिस आ गए, लेकिन मेरे मन में ये बात घर किये बैठी थी कि आखिर उनका हुआ क्या?

मैंने उसी रात खूब जान-समझकर अपने इबु-खबीस को हाज़िर किया और उसको उन तीनों का नाम बता कर उनको पकड़ने के लिए भेज दिया! इबु-खबीस उड़ा और चल दिया,


   
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श्रीशः उपदंडक
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आधे घंटे के बाद आया और बताया कि वहाँ ऐसा कोई भी नहीं! मैंने इबु-खबीस को उसका भोग देकर वापिस भेज दिया!

उनका क्या हुआ? इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत गूढ़ है! उन सूक्ष्म-तत्व वाली प्रेतात्माओं के स्मृति-पटल पर अंतिम क्षण विद्यमान थे, संभव है!, रहे होंगे! यदि ऐसा है तो मुझे वे वहाँ मिलनी चाहिए थीं, लेकिन नहीं मिलीं! क्यूँ? सूक्ष्म-तत्व में दो कण होते हैं, एक सुप्त और एक जागृत! उनके जागृत तत्त्व से ही उनसे वार्तालाप होता है, सुप्त तत्व होने पर वे लोप होते हैं! अब इस सुप्तकण में भी दो प्रकार हैं, एक एकल और एक युग्म, जब एकल-तत्व होता है तो वे अकेले विचरण करते हैं, युग्म-तत्व में वे सभी अपने जैसों के साथ विचरण करते हैं! एकल-कण में मुक्ति-भाव नहीं होता, युग्म-कण में होता है! मेरा उस मंदिर से वापिस आना खाली हाथ, ये बताना कि वहाँ कोई नहीं है, ये युग्म-कण में उनका विवरण रहा होगा, हमारे जाने के बाद एकल-कण जागृत स्वतः ही हुआ होगा, कारण पता लगा होगा, वे लोप हुए होंगे, ऐसे कई किस्से-कहानियाँ हैं जहां कुछ समय पश्चात प्रेतात्माएं दिखनी बंद हो जाती हैं, और कभी-कभार प्रकट पुनः हो जाती हैं, समय-अंतराल उनके लिए है ही नहीं!

यही इनके साथ हुआ होगा! वे मुक्त हुई या नहीं, मै नहीं कह सकता, जिन साधनों से मै जान सकता था जान लिया था, कि अब वहाँ शिणी, कनिया और रीजा नाम का कोई शेष नहीं है!

मै वहाँ कभी दुबारा नहीं गया, कभी गया तो फिर से अवश्य ही देलूंगा!

परन्तु मै आज तक उन तीनों को भूल नहीं सका हूँ! रहस्य और गहरा गया है! तभी तो कहा गया है, मनुष्य नित्य ही शिक्षा ग्रहण करता रहता है, अंतिम सांस तक!

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ।।

एक एक क्षण गवाये बिना विद्या ग्रहण करनी चाहिए; और एक एक कण बचा करकेधन ईकट्ठा करना चाहिए। क्षण गवानेवाले को विद्या कहाँ, और कण को क्षुद्र समझनेवाले को धन कहाँ ?

------------------------------------------साधुवाद!-----------------------------


   
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