वर्ष २००७ जयपुर राज...
 
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वर्ष २००७ जयपुर राजस्थान की घटना

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श्रीशः उपदंडक
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मौसम में बदलाव आने लगा था, सर्दी की सुगबुगाहट महसूस होने लगी थी, तब में उन दिनों केदारनाथ से शर्मा जी के साथ वापसी कर रहा था, यहाँ आये मुझे कोई ११ दिन हो चुके थे, हमारे सात्विक भाइयों ने हमारा हार्दिक अभिनन्दन और सत्कार किया था! किसी भी प्रकार की कैसी भी कोई कमी नहीं छोड़ी थी, वहाँ एक महंत थे उन्ही के किसी कार्य से मै वहाँ गया था! यहाँ अक्सर भीड़-भाड़ रहती है, दर्शनार्थी लगातार आते रहते हैं! लेकिन महंत साहब काये आश्रम वहाँ से दूर और शांत जगह था, वापिस जाने से दो दिन पहले मुझे महंत साहब का एक सन्देश मिला, उनका कोई भक्त था, वो जयपुर में ज़मीन के खरीद-फरोख्त का काम किया करता था, नाम था उसका अशोक, वो अपने समस्त परिवार के साथ वहां आया हुआ था, उसके परिवार में उसकी पत्नी, माँ, दो लड़कियां आर एक लड़का था, लड़के की कोई समस्या थी और अशोक उसको लेके वहीं आया हुआ था! महंत साहब ने मुझे अशोक से मिलवाया, अशोक ने मुझे अपने लड़के नमन के बारे में बताया, बताया की उनका लड़का दिन में तो सही रहता है, एक सामान्य लड़के की तरह लेकिन रात में चौंक जाता है, डरता है, चिल्लाता है और कभी कभार डर के मारे बेहोश हो जाता है! उसको कई बार डॉक्टर को दिखाना पड़ा है, डॉक्टर उसको दवा दे देते हैं लेकिन उसको कोई फर्क नहीं पड़ रहा और इसी वजह से वो काफी परेशान है और इसी वजह से वो यहाँ आया है, मैंने अशोक से पूछा,

"ऐसा कब से हो रहा है?

"यही कोई ६ महीनों से ऐसा हो रहा है गुरु जी" अशोक ने बताया,

"वो लड़का कहाँ है?" मैंने पूछा, क्यूंकि वो लड़का इस समय अशोक के पास नहीं था, अशोक बोला,

"गुरु जी वो कमरे में ही है, अभी सो रहा है, रात को भी उसने ऐसा किया, रात भर सोता नहीं है, जागता रहता है, कहता है 'वो' आ जायेंगे उसको मारने"

"वो आ जायेंगे? कौन आ जायेंगे? मैंने पूछा,

"पता नहीं गुरु जी, कौन हैं वो? कभी नहीं बताया उसने, कहता है उन्होंने बताने के लिए मना किया था, मै अगर बताऊंगा तो वो सबको मार देंगे" अशोक बोला,

मैंने महंत साहब को देखा और बोला, "महंत साहब! आपने क्या किया इस लड़के का?"


   
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श्रीशः उपदंडक
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"हमने झाड़ा लगा दिया है और हाथ में एक शक्ति-सूत्र बाँध दिया है, आशा है की अब नहीं होगा उसके साथ ऐसा और वो ये धीरे-धीर भूल जाएगा" महंत साहब ने बोला,

"ठीक है फिर" मैंने कहा,

"अशोक जी, वैसे तो अब समस्या होनी नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी समस्या यदि होती है तो आप मेरा नंबर ले लीजिये, मै दिल्ली में ही रहता हूँ, मै स्वयं आ के उस लड़के को देख लूँगा" मैंने कहा,

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद गुरु जी" अशोक ने मेरे और महंत के पाँव छू लिए!

"एक काम करना, मै दो दिन बाद यहाँ से जा रहा हूँ, आप मुझे एक बार उस लड़के से मिलवा देना, मै उसको देख लूँगा" मैंने कहा,

"ठीक है गुरु जी, मै उसको यहाँ ले आऊंगा" ये कह के अशोक उठा और बाहर चला गया...

अगले दिन दोपहर में अशोक अपनी पत्नी और लड़के नमन के साथ आया, मै वहाँ नहीं था, किसी कार्यवश किसी के साथ गया हुआ था, वहाँ शर्मा जी उसको मिले, शर्मा जी ने कहा के गुरु जी तो वहाँ हैं नहीं आप बाद में मिल लीजिये, लेकिन अशोक तभी वहाँ से वापिस जयपुर जाने वाला था, मुलाकात नहीं हो पायी और अशोक अपने परिवार सहित वापिस जयपुर चला गया,

मेरे वहाँ आने पर शर्मा जी ने मुझे अशोक के बारे में बताया, और ये भी की अशोक जयपुर के लिए निकल चुका है,

मै भी वहां उसी दिन वहां ठहरा और अगले दिन दिल्ली के लिए रवाना हो गया,

मै दिल्ली पहुंचा तो दो दिनों के बाद अशोक का फ़ोन आया, अशोक ने बताया की धागे से और झाडे से कोई फर्क नहीं पड़ा बल्कि समस्या और बढ़ गयी थी, अब वो दिन में भी डरने लगा था, बद-हवास सा सारे घर में छिपने की जगह ढूँढा करता था, इस कारण से घर की सुख-शान्ति भंग हो गयी थी, अशोक दो दिनों से काम पर भी नहीं जा रहा था, और एक नयी चीज़ हुई थी, वो हमेशा अपने चेहरे को धोता रहता था! मैंने अशोक को अगले दिन फोन करने को कहा और फोन रख दिया,

मैंने शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी, एक बार चलके देख ही लिया जाए?"

"मै भी यही कहने वाला था गुरु जी" शर्मा जी बोले,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"ठीक है, आप अशोक को बोलो की हम आज रात उसके वहाँ पहुँच जायेंगे, आप उसका पता ले लो"

मैंने कहा,

"ठीक है, मै पता ले लेता हूँ" शर्मा जी बोले,

"अशोक को बोलो की हम रात तक वहाँ पहुँच जायेंगे, वो हमे वहीं मिले" मैंने कहा,

"ठीक है, मै कहे देता हूँ ऐसा" शर्मा जी बोले और उन्होंने अशोक को फोन मिला दिया, जैसा मैंने कहा था वैसा ही शर्मा जी ने कह दिया,

मैंने शर्मा जी से तैय्यारी करने को कहा और मै अपने स्थान पर अपनी तैयारी करने चला गया,

मुझे कोई एक घंटा लगा, मै जब बाहर आया तो शर्मा जी फ़ोन पर किसी से बात कर रहे थे, जब फोन रखा तो मुझे शर्मा जी ने बताया, "गुरु जी, अभी अशोक का फोन आया था"

"दुबारा?" मैं पूछा,

"हाँ" वो बोले,

"क्यूँ? क्या हुआ?" मैंने पूछा,

"जब अशोक से हमारी बात ख़तम हुई थी तो उसके लड़के नमन ने अपने बाप अशोक को गाली-गलौज दी और कहा की अब ये लड़का मरके रहेगा!!" शर्मा जी बोले,

"क्या? नमन ने?" मैं हैरत से पूछा,

"हाँ, और फिर वो बेहोश हो गया, अभी तक बेहोश है अशोक ने ये ही फ़ोन पर बताया"

"ठीक है, हम निकलते हैं अब" मैंने कहा,

मैं गाडी में बैठा, शर्मा जी ने गाडी स्टार्ट की और हम लोग जयपुर के लिए निकल गए....

जब हम अशोक के घर पर पहुंचे तो रात धिर चुकी थी, अशोक के घर में २-४ लोग खड़े थे, मै गाडी से उतरा तो वो लोग हमको देखने लगे, शर्मा जी आगे गए और अशोक के बारे में पूछा, अशोक को घर में खबर लगी तो वो दौड़ा-दौड़ा आया, पांवों में गिर पड़ा और बोला, "गुरु जी, बचा लो, मेरे बेटे को बचा लो!"a


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैं समझ गया की समस्या गंभीर हो गयी है, वो हमको अन्दर ले गया, एक कमरे में बिठाया और उसकी बीवी पानी लेके आई, हमने पानी पिया, मैंने पूछा, "क्या हुआ?"

वो रोते रोते बोली, "गुरु जी! आपको तो सब मालूम है, अभी कोई आधे घंटे पहले मेरी बेटी नमन के कमरे से अपनी किताब लेने गयी थी, नमन ने उसका गला पकड़ लिया और चिल्लाया 'साली तेरे को तो नंगा करके नचाऊंगा मैं’ मैं वहाँ भागी तो उसने मुझे लात मारी तब अशोक वहाँ आये तो उन्होंने नमन के हाथ छुड़वाए, हाथ छोड़ के बोला, साले सिपहसलार बुलाएं हैं तूने?, आने दे अब वो भी वापिस नहीं जायेंगे गुरुजी, ये क्या हो रहा है, हमने तो आज तक किसी का बुरा नहीं किया फिर हमारे साथ ही ऐसा क्यूँ?" वो आंसूं पोंछती हुई बोली,

अशोक भी बेचारा सिसकियाँ ले रहा था, शर्मा जी ने कहा, "अरे आप चिंता न कीजिये, कुछ नहीं होगा! आप घबराइये मत!"

"हाँ, अशोक जी आप घबराइये मत" मैंने शर्मा जी का समर्थन किया,

"कहाँ है नमन?" मैंने पूछा,

"जी अपने कमरे में ही है, वहाँ जाने की हमारी हिम्मत नहीं होती, न जाने कब क्या कर दे" अशोक बोला,

"ठीक है, मेरे साथ आइये आप" मैंने कहा और शर्मा जी को अपने साथ लिया, अशोक आगे आगे चला और कमरे तक ले गया लेकिन अन्दर नहीं गया, ठिठक कर वहीँ खड़ा हो गया, मै अन्दर गया, जैसे ही अन्दर गया उसने मुझे देखते ही मेरे ऊपर एक मोटी सी किताब फेंक के मारी! किताब मेरी छाती में लगी, मैंने झुक कर किताब उठायी और एक तरफ रख दी, मैंने उससे कहा,

"बस? इतना ही? मै ये बोल के हंसा!

शर्मा जी अन्दर आये तो वो खड़ा हो गया, और बोला, " क्या करने आये हो यहाँ तुम दोनों?"

"तेरी हाजिरी लेने आया हूँ यहाँ, जमात में कई दिनों से नज़र नहीं आया तू!" मैंने हंस के कहा!

"तेरी हिम्मत की दाद देता हूँ मै ओ (उसने मेरा नाम लिया यहाँ!) जो तू यहाँ तक आ गया, कोई वापस जाने का रास्ता भी बाकी छोड़ा है तूने?" वो बोला,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सुन ओये नमक हराम ज़लील (यहाँ मैंने उसका नाम लिया) बदजात! तेरे को मै सिर्फ एक बार कह रहा हूँ, तू यहाँ से जा, अभी! नहीं तो तेरा वो हाल करूंगा के तेरी रखैल भी तुझे पहचान नहीं पाएगी, समझ में आई तेरे ज़लील!"

"कौन किसे नहीं पहचानेगा ये तो मै बताऊंगा तुझे, रुक!" ऐसा कह के वो आलती-पालती मार के बैठ गया! इसके बाद कमरे में आमद शुरू हुई, २, ४, ६, १०, २०! पूरे बीस साथी उसके वहाँ आ गए! उसके आस-पास खड़े हो गए! सोचा की मै डर जाऊँगा! मैंने शर्मा जी का हाथ पकड़ा, और उनके हाथ पर एक मंत्र पढ़ा और थोडा सा भस्म उनको दिया, उन्होंने वो भस्म अपनी आँखों में लगा ली, अब वो भी ये सब देखने लगे थे! वो थोडा आगे बढे मै भी आगे बढ़ा! मैंने मंत्र पढ़ के अपनी शक्ति का आह्वान किया! मेरी शक्ति भयानक आवाज़ करती हुई वहाँ प्रकट हुई! उसके शरीर से आग की लपटें निकल रही थीं! मेरी शक्ति ज़मीन और छत के बीच में रुकी हुई थी! मै आगे बढ़ा और भस्म फेंक के मारी नमन पर, वो उछला और पीछे जाके गिरा!

उसके साथी भागे वहाँ से! मैंने शर्मा जी को इशारा किया! शर्मा जी आगे बढे और उसको खींच के मेरे सामने ले आये! वो मेरी शक्ति को ही देखे जा रहा था, मैंने अपने जूते से उसके गाल पर एक चोट मारी, उसने फौरन मुझे देखा और फिर मेरे जूते को देखने लगा घूर घूर के! लम्बी लम्बी साँसें लीं उसने! मैंने उससे पूछा, "देख मेरी तेरे से कोई दुश्मनी नहीं, मै तो तेरे को यहाँ से निकालने तेरी जगह छोड़ने आया हूँ"

उसने गर्दन हिलाई की नहीं नहीं! अब मैंने अपनी शक्ति को वापिस कर दिया था, मैंने फिर से नमन से कहा, "एक बात बता, क्या इस लड़के से कोई गलती हुई या इसने कुछ जान बूझकर किया?"

उसने फिर नहीं में गर्दन हिलाई!

"देख अगर तू जवाब नहीं देगा तो तेरी पिटाई शुरू करवा दूंगा, इधर देख ज़रा" मैंने ऐसा कह के अपने १० खबीस वहाँ हाज़िर कर दिए!

वो घबराया! पीछे भागा और बोला, "मै नहीं बता सकता, बड़ी पहाड़ी वाली ने मना किया है"

"बड़ी पहाड़ी? ये क्या है?" मैंने उससे पूछा,

"नहीं बता सकता मै, उसने बिस्तर में दोनों हाथ मारे!

"ज्यादा गुस्सा दिखाएगा तो तेरी टांगें तुडवा दूंगा, अब जल्दी बता बड़ी पहाड़ी क्या है? मैंने


   
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श्रीशः उपदंडक
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खड़े होके कहा,

"मै नहीं बता सकता बड़ी पहाड़ी वाली ने मना किया है!" उसने कहा,

"तेरा तो बाप भी बतायेगा, तेरी इस बुआ बड़ी पहाड़ी वाली का पता!" मैंने कहा

"नहीं बता सकता मै!" वो चिल्लाया,

मेरी बर्दाश्त खतम हो गयी मैंने अपने २ खबीसों को इशारा किया और उन्होंने उसकी पिटाई शुरू कर दी! उन्होंने उसको नमन में से निकाला, एकदम नंगा था वो, मेरे खबीसों ने उसकी जमके पिटाई लगाई! उछाल उछाल के मार उसको!........

अभी उसकी पिटाई लग ही रही थी और नमन का शरीर निढाल पड़ा था, तभी नमन के बदन में हरकत हुई, वो उठ के बैठ गया, मेरे खबीस एक झटके में गायब हो गए! उन्होंने उस जिन्न को छोड़ दिया था, अब वो हंस रहा था, उसने नमन को देखा

और वो बोला, "शेख साहब! (उसने झुक कर सजदा किया) शेख साहब मुझे बहुत मारा इस इंसान ने! आप इसको सबक सिखा दो अब, देर न करो! बड़ी पहाड़ी का पता मांग रहा था ये"

ये शेख साहब काफी उम्र के और आलिम जिन्न होते हैं, ये भी इल्मात के जानकार होते हैं! और जैसे दो इंसानी तांत्रिक आपस में लड़ा करते हैं वैसे ये भी अपने इल्म से दूसरे का इल्म काटते हैं!

मैं सारी तैयारी करके आया था, मै घबराया नहीं, हाँ अब मै मैदान नहीं छोड़ सकता था! तभी नमन उठ के खड़ा हुआ, उसके पाँव ज़मीन से ऊपर थे, ये आलिम जिन्न ज़मीन पर अपने पाँव जहीं रखते! शेख साहब ने मुझे देखा और बोला, "क्या ये आदिल सही कह रहा है ओ इंसान?"

"हाँ! सही कह रहा है ये!" मैंने कहा,

"तुझे पता नहीं ये कौन है?" शेख गरजा!

"मै यही तो इससे पूछ रहा था!" मैंने कहा,

"तेरी इतनी हिम्मत के तू इसको हाथ लगाए?" वो बोला!

"तो तू लगा ले! तू आ तो गया है यहाँ! तू लगा के देख ले!" मैंने हंस के कहा!

"तेरी जुबां खींच लूँगा मै" वो बोला और कोई अमल पढने लगा! मैंने भी कात्री-मंत्र पढ़ा अपने पर ठोका और शर्मा जी के सर को भी ठोका! अब मै उस आलिम जिन्न का सामना करने को तैयार था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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शेख ने इल्म ख़तम किया और मुझ पर मारा! मेरे कात्री-मंत्र से वो बीच में ही रुका और ख़तम हो गया!

शेख की आँखें फटी रह गयीं! आदिल डर के मारे शेख की आड़ लेके पीछे खड़ा हो गया!

शेख ने दुबारा इल्म किया, पढ़ा और मुझे पर फेंका, भयानक शोर हुआ जैसे की कोई सैलाब आया हो! मैंने तत्काल ही, अभयसार-मंत्र पढ़ा और उसके इल्म को उस से छीन लिया! शेख हैरत में पड़ गया!

शेख ने तब एक और इल्म किया! पढ़ा और मुझ पर फेंका, असहनीय दुर्गन्ध उठी! जैसे की किसी सड़े मांस में आग लगा दी गयी हो! मैंने तभी कौलिक-मंत्र पढ़ा! और उसको शेख पर मारा! दुर्गन्ध समाप्त हुई और शेख के सफेद कपडे काले हो गए राख बिखर गयी उसके कपड़ों पर!

शेख ने हैरत से देखा! उसने अपने कपड़ों को देखा और इल्म से फिर से हाथ फेर कर कपडे साफ़ कर लिए! शेख ने मुझे घूरा! उसने फिर से इल्म पढ़ा और फिर से मेरी तरफ इशारा किया, मेरे अभयसार मंत्र से वो अप्रभावी हो गया! मैंने शेख से कहा, "सुन बे ओ शेख! तू मेरे सामने नहीं टिक सकता! तुझे अगर किसी मदद इमदाद की ज़रूरत हो तो चला जा, और ले आ! मैं यहीं बैठूँगा, हाँ उसकी एवज में ये आदिल तुझे रखना पड़ेगा मेरे साथ"

शेख चिढ़ा और फिर उसने एक और इल्म पढ़ा! अब की उसने अपनी ताक़त काफी लगाई! और फिर फेंक के मेरे ऊपर फेंका! मै और शर्मा जी भवानी-पाश से सरंक्षित थे, उसका वो इल्म हम तक आया और नीचे गिरते ही मरा हुआ सांप बन गया!

शेख को काटो तो खून नहीं! उसने मुझे से पूछा, "तू हाड़ा के कुनबे से है क्या?"

"नहीं वहाँ से नहीं हूँ" मैंने कहा,

"धनात्री कुनबे से है क्या? उसने पूछा,

"नहीं वहां से भी नहीं!" मैंने जवाब दिया!

"शेख तू सुन, मेरी बात सुन, इस लड़के को छोड़, इसने तेरा क्या बिगाड़ा है?" मैंने पूछा,

"इसने चोरी की है चोरी!" शेख बोला!

"कैसी चोरी?" मैंने पूछा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"मुझे नहीं मालूम, मुझे हुक्म मिला आदिल को बचाने का और मै यहाँ आ गया!" शेख ने कहा,

"अब तू भी फँस गया शेख यहाँ! अब तू कैसे निकलेगा?" मैंने कहा,

"बड़ी पहाड़ी वाली निकालेगी, मै तो उसका एक अदना सा नौकर हूँ!" वो बोला,

"ये बड़ी पहाड़ी कहाँ है? मैंने पूछा,

"मुझे नहीं मालूम" उसने कहा,

"ठीक है तो फिर मुझे तुम दोनों को कैद करना पड़ेगा अपने शमशान वाले कीकर के पेड़ पर बिठाऊंगा तुम दोनों को! वहां कितने आये कितने गए मुझे रोज बताना, तुम्हारा काम यही होगा वहां गिनती करने का!" मैंने कहा!

अब वो घबराए! मैंने शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी, ज़रा वो डिबिया देना, इसमें इनको आने दो और आप इनका बिस्तर लगा दो वहाँ ज़रा! बिस्तर का अर्थ है की वहाँ थूक दाल दो और एक आद बूंद पेशाब की!

"अभी करता हूँ गुरु जी, अभी लगाता हूँ इनका आरामदेह बिस्तर! गद्दा तो नहीं लगाना? शर्मा जी ने पूछा,

'गहा मतलब विष्ठा! मैंने कहा की नहीं शेख साहब दरी पर ही सो जायेंगे!

शेख साहब की फूंक सरक गयी डिबिया देख के! मैंने कहा," लीजिये शेख साहब! बिस्तरा तैयार है! आ जाइए! आपकी खातिरदारी होगी काफी!"

शेख डर गया! बोला, " नहीं नहीं!"

"आते हो या लगवाऊं लात?" मैंने कहा,

"नहीं, मै बताता हूँ, बताता हूँ, रुको, इसको अलग रखो" शेख बोला

"अजमेर जाओ, वहाँ पता करो, बड़ी पहाड़ी के बारे में" शेख ने कहा,

"ठीक है हम अजमेर जायेंगे, ये आदिल मेरे पास ही रहेगा, और हाँ अब इस लड़के पर कोई समस्या न आने पाए, जाके अपनी बुआ को बोल देना ये, बड़ी पहाड़ी वाली को!" मैंने ये कहा और शेख गायब हो गया! रह गया आदिल! मैंने आदिल को कैद करवा लिया! अब नमन ठीक था, मैंने एक मंत्र से उसके अन्दर चेतना फूंक दी! वो ऐसा उठा जैसे नींद से जागा हो! उठते ही चिल्लाया, 'डैडी, मम्मी, प्रिया,रीति' मैंने उसको शांत करवाया और वहीं 


   
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श्रीशः उपदंडक
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बैठने को कहा, मै उठा शर्मा जी को साथ लिया और हाथ-मुंह धोने चला गया! मैंने अशोक से कहा, "जाओ मिल लो नमन से, वो अब ठीक है" मैंने ऐसा कहा और सब भागे कमरे में रोना शुरू हो गया! मै और शर्मा जी हाथ-मुंह धोने चले गए।

जब उनका मिलना जुलना हो गया तो मैंने अशोक को बुलवाया अशोक आया और मैंने उससे कहा,

"ये आपका लड़का कभी  अजमेर गया था?

"जी गया तो था, किसी शादी में, किसकी शादी थी ये मुझे तो मालूम नहीं? अशोक ने कहा,

"ठीक है नमन को बुलाओ" मैंने अशोक से कहा,

अशोक उठा और अपने साथ नमन को ले आया, मैंने नमन से पूछा, "नमन? क्या कभी तुम अजमेर गए थे जल्दी में?

"हाँ जी गया था मै, मै अपने एक दोस्त के साथ गया था अजमेर" उसने कहा,

"किसलिए गए थे अजमेर? मैंने पूछा,

"जी मेरे दोस्त के बड़े भाई की शादी थी, इसीलिए वहाँ गया था" उसने बताया

"कहीं और भी गए थे वहाँ?" मैंने पूछा,

उसने जवाब नहीं दिया, मै समझ गया की वो अपने पिता के सामने नहीं बता रहा, मैंने अशोक को वहाँ से भेज दिया और फिर नमन से पूछा" अब बताओ मुझे"

"हाँ जी मै गया था वहाँ एक जगह और"

"कौन सी जगह?" मैंने पूछा,

"जी ये एक खाली जगह थी, वहाँ कोई नहीं था, मै वहीँ गया था" उसने बताया,

"तुम वहाँ क्यूँ गए थे?" मैंने पूछा,

"जी, बात ये है की मेरे दोस्त के भाई की बारात रात को जानी थी, मेरा एक और दोस्त है जो वहां आया हुआ था, अनिल नाम है उसका, वो मेरे पास आया और मुझे मोटरसाइकिल पे बैठने को कहा, मै बैठ गया, वो काफी आगे तक ले गया, शहर की आबादी कम होने लगी थी, मैंने उससे पूछा की कहाँ ले जा रहा है वो? तो उसने बताया की बियर पीके आते हैं और वो वहीं ले जा रहा था, उसने एक जगह मोटरसाइकिल खड़ी की और अनिल बियर लेने चला गया, ये ठेका काफी अलग-थलग जगह पर बना हुआ था, वो चार बियर लेके आया,


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैंने उसको कहा की चलो कहीं अलग जगह जाके पीते हैं, तो हम दोनों ऊपर एक छोटी सी पहाड़ी थी, वहीं चल पड़े, वहाँ एक कच्चा रास्ता भी था, मेरे दोस्त ने सोचा की वो मोटरसाइकिल वही ले आये तो बढ़िया रहेगा, वो मोटरसाइकिल लेने नीचे चला गया, मैंने अपनी बियर खोल ली थी, तो मै पीता रहा, करीब ५ मिनट के बाद मैंने वहाँ देखा की एक बुढ़िया अपने सर पे एक टोकरा लेके जा रही है, और कुछ बच्चे उसके पीछे-पीछे लगे हैं, मैंने सोचा शायद अमरुद बेचने वाली होगी! मै भी उसी बुढ़िया की तरफ चल पड़ा, सोचा अगर बियर के साथ में थोडा अमरूद या फल हो जाये तो अच्छा रहेगा, मैंने बुढ़िया को अम्मा कहके रोका तो वो रुक गयी, टोकरा नीचे रखा, उसमे कोई अमरूद नहीं थे बल्कि छोटी-छोटी बर्फियां थीं! मैंने अम्मा को मना कर दिया लेने से, तो अम्मा ने अपना टोकरा उठा लिया और बच्चे उसके पीछे पीछे चल पड़े, कोई २ मिनट के बाद वो बच्चे अपने हाथों में सेब, संतरे, अमरुद ला रहे थे! मुझे हैरत हुई! मैंने एक बच्चे को रोका, पूछा की वो ये कहाँ से लाये हैं? तो उन्होंने बताया की वो जो अम्मा अभी गयीं थीं उन्होंने ने ही दिए हैं! कमाल था, मैंने तो उसके टोकरे में छोटी-छोटी बर्फियां देखी थीं! हो सकता है, बर्फियों के नीचे कहीं फल हों? मैंने एक ५ का सिक्का निकाला और उस बच्चे से उसका सेब माँगा, लेकिन उस बच्चे ने मना कर दिया! उसके पास कोई ३-४ सेब थे, जब उसने मना किया तो वो भागने लगा, मैंने पीछा किया और उसका एक सेब छीन लिया! वो बच्चा उन सब बच्चों के उलट उसी तरफ भागा जहां वो अम्मा गयी थी, मैंने सोचा की चलो वहाँ से वो एक और सेब ले लेगा! इतने में मेरा दोस्त आ गया! मैंने उसको सेब वाली कहानी बता दी! मेरा दोस्त अपने लिए नमकीन ले आया था तो  सेब मैंने ही खाया! हमने अपनी बियर ख़तम की और वापिस शादी वाली जगह पर आ गए!"

"अच्छा! वो जगह तुम पहचान लोगे अगर तुमको वहाँ ले जाया जाए तो" मैंने पूछा,

"हाँ मै पहचान लूँगा" उसने कहा

तब मैंने शर्मा जी से कहा, " शर्मा जी, कल सुबह होते ही हम लोग अजमेर निकलेंगे, आप अशोक को ये बता दो"

"ठीक है मै अभी बताता हूँ" वो बोले,

"नमन, तुम भी तैयार हो जाना सुबह, हमे तड़के ही निकलना है वहाँ" मैंने नमन से कहा,

"जी ठीक है, मै तैयार हो जाऊँगा" नमन बोला,

उसके बाद मै वहाँ से उठा और नहाने चला गया! रात को खाना खा कर हम सोने चले गये!


   
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अगली सुबह उठे, नित्य-कर्मों से फारिग हुए, जहाए-धोये तब तक अशोक की पत्नी ने नाश्ता बना दिया था, हमने नाश्ता किया और अजमेर जाने के लिए तैयार हो गए,

गाडी अशोक ने अपनी ली थी, वो ही ड्राइव कर रहा था, हम करीब १० बजे वहाँ पहुँच गए, अब मैंने नमन से रास्ता पूछा, नमन ने कहा की पहले उसको वहां ले जाएँ जहां उसके दोस्त का घर है, वहाँ से वो रास्ता बता देगा, हम उसको वहीं ले गए, वहाँ से उसने रास्ता पहचान किये और हमको बताता रहा, और हम चलते रहे! एक जगह जाके नमन ने गाडी रुकवा ली, सामने सड़क किनारे एक ठेका था, वो वहां गया और उसने वहाँ से खड़े हो कर वो जगह बता दी जहां वो अपने दोस्त के साथ गया था! हम ऊपर चढ़े, काफी ऊपर आने के बाद नमन ने वो जगह दिखाई जहां उसने उस बुढ़िया को देखा था, और वो जगह भी जहां उसने वो सेब उस बच्चे से छीना था!

मैंने नमन से कहा, "नमन वो बुढ़िया किस दिशा में गयी थी?"

उसने उत्तर दिशा की ओर इशारा किया और ऊँगली के इशारे से बता दिया, तब मैंने दोनों बाप-बेटे को वापिस भेज दिया गाडी में! मैंने शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी, सामान निकालिए!"

उन्होंने एक हाफ शराब का निकल लिया, मै और शर्मा जी उसको आधा-आधा पी गए! मैंने शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी अब आप मेरे पीछे रहें और हाँ, आप भूल कर भी मेरे बाएं नहीं आना"

"ठीक है गुरु जी, जैसा आप कहें!" शर्मा जी ने कहा,

मैंने अपनी शक्ति का आह्वान किया! शक्ति प्रकट हुई, मैं आदिल को वहां हाज़िर किया! आदिल हाज़िर हुआ! मैंने आदिल से कहा, "सुन भी आदिल, अब हम आ गए हैं बड़ी पहाड़ी पर, बता वो तेरी बुआ है कहाँ?

आदिल ने एक और दूसरी पहाड़ी की तरफ इशारा किया, मैं देखा वो पहाड़ी काफी ऊंची और बियाबान थी! मेरे मुंह से निकला 'तो ये है बड़ी पहाड़ी!'

अब आदिल आगे आगे और हम पीछे पीछे! करीब ५ किलोमीटर चले हम उस बंजर और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर! जब हम आगे गए तो मुझे वहाँ एक तालाब दिखाई दिया! मैंने शर्मा जी को एक अंजन दिया लगाने को! उन्होंने अपनी आँख में वो लगाया! उनको भी अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! मैंने तब शर्मा जी को कहा, "शर्मा जी, आपका जिन्नात के गाँव में स्वागत होने वाला है!"


   
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श्रीशः उपदंडक
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शर्मा जी मुस्कुराए! मैंने कहा "आज यहीं दावत उड़ायेंगे हम!"

आगे पहुंचे तो एक संकरा रास्ता मिला, दो बड़ी चट्टानों के बीच में से गया था ये रास्ता, हम वहाँ से आगे बढे!

आगे आये तो एक किले के फाटक पर नज़र पड़ी, वहाँ कुछ जिन्नात खड़े हुए थे, उन्होंने हमको देखा और हमने उनको, आदिल की सिट्टी-पिट्टी गुम थी! आदिल ने फाटक खुलवाया! फाटक खुलते ही हम अन्दर गए! वहां जिन्नात ही जिन्नात! मैंने वहाँ बैठे हुए बुजुर्गों को सलाम कहा उन्होंने भी सलाम का जवाब दिया! आदिल ने एक आवाज़ लगायी "अजमत?"

एक लम्बा-चौड़ा जिन्न वहाँ आया! उसने मुझे और फिर शर्मा जी को देखा, और फिर हाथ से उसके पीछे आने का इशारा किया!

अब हम इस अजमत के पीछे हो लिए! अज़मत हमको एक बड़ी सी हवेली का पास ले गया! हवेली का दरवाज़ा खुला! हम अन्दर घुसे! अन्दर कोई नहीं था, हाँ एक चक्की चलने की आवाज़ आ रही थी, जैसे की कोई अनाज पीस रहा हो!

अजमत एक गलियारे में ले गया, और उस गलियारे में आखिर में एक बड़ा सा कमरा था, उसकी चौखट कोई 30 फीट की होगी! हमने अन्दर प्रवेश किया! अन्दर मसनद लगे थे! इत्र की बौछार हो रही थी! फूलों से हर चीज़ सजी थी! ताजे ताजे गुलाब के फूल! वो भी सुल्तान गुलाब!

अजमत ने हमको वहां बिछे गद्दे पर बिठाया और खुद बाहर चला गया! आदिल बाहर ही खड़ा था! थोड़ी देर में अजमत के साथ एक बुजुर्गवार आये! एकदम सफ़ेद दाढ़ी! हाथ में स्फटिक की माला, चमचमाती सफ़ेद शेरवानी! मजमुआ इत्र की भीनी-भीनी खुशबू हमने उनको सलाम किया! उन्होंने भी हमको सलाम कहा! बोले, "बैठिये!"

हम बैठ गए! तभी वहां दो सुंदर सी, सच कहता हूँ इंसानों में ऐसी सुन्दरता और जलाल नहीं होता!, कनीज़ आयीं! गुलाबी सलवारों में! ऊपर नीले रंग का ओढना! चेहरे नकाब से ढंके हुए! दोनों ने अपने हाथों से एक थाल पकड़ा हुआ था! ये थाल भी सोने का था और उसमे रखे दोनों गिलास भी सोने केथे! दोनों गिलास इतने बड़े थे की एक एक गिलास में २-२ लीटर शरबत भरा हुआ था!

मैंने और शर्मा जी ने अपने अपने गिलास उठाये! शरबत पिया! शरबत इतना गाढ़ा था जैसे शहद में मिश्रण डाला गया हो! जितना पी सकते थे उतना पिया बाकी वहीं रख दिया! 


   
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श्रीशः उपदंडक
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शरबत के बाद वो बुजुर्गवार बोले, "जी फरमाएं, आप जिस सिलसिले में आये हैं उससे मै बखूबी वाकिफ हूँ!"

"जी हाँ, मै उसी सिलसिले में यहाँ आया हूँ!" मैंने कहा,

"क्या चाहते हैं आप?" वो बोले,

"यही की वो लड़का ठीक हो जाए! और कुछ नहीं!" मैंने कहा,

"हम्म! क्या आप जानते हैं की उसने क्या किया?" वो बोले,

"जी नहीं" मैं जवाब दिया,

"उस आदमजात ने हमारे एक पोते का सेब छीन लिया!" वो बोले,

"हाँ, ये बात उसने मुझे बतायी थी" मैंने कहा,

"जिस बच्चे का वो सेब छीना गया उस बच्चे का नाम है मौमिन, इस बच्चे की माँ आजकल भोपाल में कैद है किसी के पास और इसका बाप बालूचिस्तान में कैद है और अब इसकी देखभाल इसकी दादी करती है, दादी का प्यारा लाडला है ये!"

"अफ़सोस की बात है ये" मैंने कहा,

"जब इस बच्चे का सेब छीना गया तो ये बहुत रोया, परेशान हुआ, और आसमान सरपर उठा लिया, बहुत समझाया लेकिन समझा नहीं, तब इसकी दादी ने आदिल को भेजा था उसको सजा देने के लिए!" वो बोले

"जी मै समझ गया आपकी बात, लेकिन हम आदमजात है, हर एक को बराबर नज़रों से देखते हैं, उस लड़के को अगर ये पता होता तो वो ऐसा हरगिज़ नहीं करता, अब उसको बहुत सजा मिल गयी, अब उसको छुडवा दीजिये" मैंने कहा,

"देखिये इस मुत्तालिक आपको इसकी दादी से ही राय-मशविरा करना होगा, अभी तो वो यहाँ है नहीं, शाम तक आ जायेगी, आप तब तक हमारे मेहमान हैं!" उन्होंने कहा,

"लेकिन आप हमारी मदद कर सकते हैं, आप उनसे खुद ही बात कर लीजियेगा! हम शाम तक यहाँ नहीं रुक सकते" मैंने कहा,

"ठीक है बरखुरदार, मै बात कर लूँगा, आप एक काम कीजियेगा, उस लड़के से बोलिए की ताज़े सेब एक मन रात को १ बजे उस जगह रखवा दीजिये जहां उसने वो सेब छीना था!"

"ठीक है, मै आज ही रखवा दूंगा!" मैंने कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"और हाँ, आपने शेख की जो शामत की भाई मै उससे आपका मुरीद हो गया! मज़बूत इल्म वाले हो आप!" वो बोले

"जी शुक्रिया! मैंने कहा,

"आपसे एक इल्तजा है, अगर सुनो तो मै बताऊँ?" उन्होंने कहा,

"जी फरमाइए?" मैंने कहा,

"मै चाहता हूँ की इस बच्चे मौमिन को उसकी माँ और बाप मिल जाएँ, तो इसकी दादी बेहद खुश होगी!

"ठीक है, मै करवा दूंगा, आप मुझे उनका नाम बता दीजिये" मैंने कहा,

"माँ का नाम है शाइस्ता और बाप का नाम है फ़िरोज़" वो बोले,

"मै आज़ाद करवा दूंगा, आप बेफिक्र रहिये!" मैंने कहा, और इतने में ही एक बच्चा वहाँ आया और उनकी गोद में बैठ गया!

वो बोले, "ये ही है वो लड़का, जिसका सेब छीना गया था!"

"अच्छा अच्छा" मैंने कहा,

"और ये मेरा पोता है, फ़िरोज़ मेरा बेटा!"

"ओह!" मेरे मुंह से निकला!

"ठीक है उस लड़के को माफ़ किया गया, आप मुतमईन हो जाइए!" वो बोले

"ठीक है! आपका बेहद शुक्रिया! मै २ रोज़ बाद उनको आजाद करवा दूंगा!" मैंने कहा और खड़ा हो गया! जाते जाते वो बोले, "सुनिए ये एक कड़ा है रख लीजिये, फिर कभी मन करे तो आ जाइएगा! आपके लिए ये गरीब खाना हमेशा खुला है! मैंने वो कड़ा अपनी जेब में रख लिया और वापिस हो गए!

मैंने उसी रात अपने वायदे के अनुसार एक मन सेब वहाँ रखवा दिए और वापिस जयपुर रवाना हो गए।

वो कड़ा आज भी मेरे पास है, लेकिन उसको पहनने की और वहाँ 'बड़ी पहाड़ी' गाँव में जाने का आज तक अवसर नहीं मिला!


   
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श्रीशः उपदंडक
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हाँ! दो दिनों के बाद मैंने शाइस्ता और फ़िरोज़ को आज़ाद करा दिया! वो दोनों मुझे शुक्रिया फरमाने मेरे सामने हाज़िर हुए खुद अपनी मर्जी से अपने बच्चे के साथ!

-------------------------------------साधुवाद!--------------------------------------------

 


   
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