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रमेली! वर्ष २०१२, काल-बेला की वो अज्ञात पुजारिन!

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श्रीशः उपदंडक
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"कौन?" पूछा साधू ने,
"जैसे किसी और ने पकड़ा हो, महाराज?" बोली वो,
"हम्म" बोला वो,
कुछ देर, आसपास तांक-झाँक की उसने, कुछ सामान उठा कर, इधर उधर रखा, फिर खड़ा हुआ, हाथ पीछे बाँध लिए अपने ही हाथों में!
"जोगन?" बोला वो,
"हो?" बोली वो,
"ये लड़की ही क्यों?" पूछा उसने,
"मतलब?" बोली वो,
"ये लड़की ही क्यों चुनी?" बोला वो,
"ना पता, महाराज" बोली वो,
"कोई तो कारण है?" बोला वो,
साधू का दिमाग, कुत्ते की तरह से दौड़ रहा था! उछलता-कूदता, रुकता रुकाता! विषय तो सही ही पकड़ा था उसने,
"ये लड़की, क्या दे सके है?" बोला वो,
"नाह पता महाराज?" बोली वो,
"देह इसकी बेकार" बोला वो,
"हाँ" कहा उसने,
"लँगड़ी वैसे" बोला वो,
"हाँ महाराज" बोली वो,
"चेहरा बदसूरत" बोला वो,
"हाँ महाराज" बोली वो,
"तो क्या कारण?" बोला वो,
"नाह पता जी, महाराज" बोली वो,
"सुन?" बोला वो,
"हो?" बोली वो,
"खड़ी हो ज़रा" बोला वो,
"हो" बोली और खड़ी हो गयी वो,
"चल ज़रा?" बोला वो,
"कहाँ, महाराज?" बोली वो,
"उस बगिया में" बोला वो,
"चलो महाराज" बोली वो,
"सामना यहां ही रख दे" बोला वो,
"ठीक महाराज" बोली वो,
और दोनों ही, सोच-विचार में लगे हुए, आगे चल पड़े! चले और आगे आ गए बगिया तक, पीछे देखा उसने, और रुक गया,
"जोगन?" बोला वो,
"हो?" कहा उसने,
"वो जो पेड़ हैं चंपा के, उन पर फूल लदे रहते हैं" बोला वो,
"हो, महाराज" बोली वो,
"और उस लड़की को, यहां लाया गया" बोला वो,
"हो, महाराज" बोली वो,
"अब साफ़ है" बोला वो,
"क्या, महाराज?" बोली वो,
''कोई प्रसन्न है उस लड़की से" बोला वो,
"तब, महाराज?" बोली वो,
"इतनी आसानी से नहीं आएगा हाथ" बोला वो,
"तब, महाराज?" बोली वो,
"देख, कुछ तो करना होगा?" बोला वो,
"जी, महाराज" बोली वो,
"आगे चल?" बोला वो,
और वे आगे गए, जैसे ही गए, उनको कोई लेटा हुआ दिखा वहां! वे दोनों ही दौड़े और जाकर देखा, ये तो बीनू था!
"खा लिया इसे?" बोली जोगन,
"रुक जा?" बोला वो,
अब साधू ने उस बीनू को देखा, जैसे ही हाथ लगाया कि....!
"छौहन बाबा?" बोला बीनू,
"हाँ, तू लेटा क्यों है?" पूछा उस से,
"मैं गिर गया था, बेहोश" बोला वो,
"खड़ा हो?" बोला वो,
बीनू खड़ा हुआ, जैसे ही खड़ा हुआ कि उनको कुछ दिखाई दिया!
"ये क्या है?" बोली जोगन,
"खींच इसे?" बोला साधू,


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब खींची उस जोगन ने, तो पता चला कि ये तो सर्प-केंचुल है! बाहर निकाली तो ढेर सा इकठ्ठा हो गया!
"जोगन?" बोला वो,
"हो?" बोली जोगन,
"ये तो केंचुल है, है न?" बोला वो,
"हो, महाराज!" बोली वो,
"इसको देख लगता है कि यहां कई विशाल से सर्प हैं!" बोला वो,
"लगता है, महाराज!" बोली वो,
"उठ ज़रा?'' बोला वो,
"हो, महाराज!" बोली वो, और खड़ी हो गयी!
"बीनू?" बोला वो,
"हो?" बोला बीनू,
"कुछ दीखा?" पूछा उसने,
"ना महाराज!" बोला बीनू,
"सोचूं हूँ कि ढाढर बाबा को लाऊं या नहीं?" बोला साधू,
"पर न पड़ रही हो, तो बुला ही लो, महाराज?" बोला वो बीनू,
"ठीक है! चल, चलते हैं!" बोला वो,
और वे सब, निकल लिए वहां से, वे, लक्खी से मिले, कुछ समझाया और सामान उठा, निकल लिए थे, रात को आना था उन्हें, कोई ढाढर बाबा के साथ!
अब तो साफ़ था, साधू की चल नहीं रही थी, कहीं कुछ कच्चा न हो जाए, इसीलिए, पक्का करने के लिए, बाबा ढाढर को बुलाना ठीक ही था!
उस दोपहर के बाद....
रमेली, बाहर खड़ी थी, कुँए के पास, कुछ और भी लड़कियां थीं, उधर ही, वे बात तो कर नहीं रही थीं, लेकिन उस रमेली के बदलते रूप को निहार लेती थीं! रमेली का कुब्ब अब बस, थोड़ा ही बचा था, कुब्ब से झुकी गर्दन और कंधे, अब उठने लगे थे, आँखों का खिंचाव भी अब, ठीक होने लगा था, पहली रमेली में और बाद की रमेली में, ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ दीख रहा था! ऐसे ही चलता रहता तो कुछ ही दिनों में, वो बिलकुल ही ठीक हो जाती! वो, जल लेकर जैसे ही चली, कि उसे कुछ दिखाई दिया, सामने, उस बगिया के, दो सर्प बैठे थे! उसने जल अंदर रखा और चल पड़ी उधर के लिए, कोई देख नहीं रहा था, इसीलिए उधर के लिए चल पड़ी!
उस रमेली को आते देख, वे सर्प, अंदर घास में चले गए, पहचान गयी थी वो, वो सुनहरे छल्ले वाला छोटा सर्प ही था! वो अंदर आयी, तो कोई सर्प नहीं, हाँ उसे एक ध्वजा सी दिखी, एक पेड़ की शाख से बंधी हुई, वो वहीँ के लिए चल पड़ी! गयी और रुक गयी, आसपास देखा, कोई नहीं था उधर...
"रमेली!" आयी आवाज़,
रमेली सीधी ही चल पड़ी आवाज़ की तरफ! गयी तो सामने वो मृदा खड़ी थी! जैसे ही रमेली आयी, मृदा ने बाजू खोले और गले से लगा लिया रमेली को!
"रमेली, मेरी बहन, कैसी हो?" पूछा मृदा ने,
"ठीक, तुम?" बोली वो,
"सब कुशल से है!" बोली मृदा,
"वो, साधू....." बोलते बोलते रुकी वो,
"कोई कुछ नहीं कर पायेगा!" बोली मृदा,
"कहीं आपको...." बोली वो,
"नहीं रमेली! हम नाग हैं, ये सब, कुछ भी नहीं" बोली वो,
मुस्कुरा पड़ी, सलामती की सुन कर, रमेली, उनकी!
"रमेली!" बोली मृदा,
"हाँ?" कहा उसने,
"मैं अब, न मिल सकूँगी" बोली मृदा,
हट गयी, आँखें गड़ा दीं उस मृदा पर!
"कहाँ जा रही हो?" पूछा मृदा ने,
"कहीं नहीं" बोली वो,
"फिर?" पूछा उसने,
"कुछ विवशता है" बोली मृदा,
"वो साधू?" बोली वो,
"कुछ नहीं होगा" बोली मृदा,
"वो गलत बात करता है" बोली रमेली,
"अब नहीं करेगा कभी" बोली वो,
"कोई बाबा आएगा" बताया रमेली ने,
"आने दो तो!" बोली वो,
"कुछ न होगा?" बोली रमेली,
"कुछ भी नहीं!" बोली वो,
"जा कहाँ रही हो?" पूछा उसने,
"हमेशा के लिए नहीं, बस कुछ दिन ही" बोली मृदा,
सर हिलाकर, हां, कहा रमेली ने!
"रमेली?' बोली मृदा,
"हाँ?" बोली वो,
"मेरे आने तक तुम कहीं नहीं निकलना" बोली मृदा,
"हाँ" बोली वो,
"कहीं भी नहीं" बोली वो,
"हूँ" बोली रमेली!
"चाहे कोई भी बोले!" बोली मृदा,
"हूँ, नहीं जाऊंगी!" बोली वो,
"और हाँ!" बोली मृदा,
"क्या?" पूछा उसने,
"तुम्हारा मेला भी आने वाला है न? जेठाणे वाला?" बोली वो,
"हाँ!" बोली खुश होते हुए,
"मेरे साथ चलोगी?" पूछा मृदा ने,
"कैसे?" बोली वो,
"बता दूंगी!" कहा मृदा ने,
"हाँ" बोली वो,
और मृदा, उसको लेकर आगे चली, कोई बात नहीं हुई, चले वे दोनों तो एक जगह आ कर रुक गयी मृदा, देखा रमेली को, मुस्कुराते हुए...और!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उधर, वो साधू पहुंचा बाबा ढाढर के पास! बाबा ढाढर के पास, कुछ शक्तियां थीं, उसे ज्ञान था इस विषय में! उसने जब इस विषय में सुना, तो प्रसन्नता के मारे, वो तो जैसे झूमने ही लगा! उसे जैसे, जिस समय का इंतज़ार था, आ पहुंचा था! बाबा ढाढर, आयु में पैंसठ के आसपास का होगा, लेकिन उसमे वाक़ई कुछ योग्यता थी! अब उस साधू और बाबा के बीच क्या बातचात हुई, क्या मसौदा बना, क्या बन्दर-बांट हुई, ये तो वो ही जानें! बाबा ढाढर ने हाँ कर ही दी थी, तो वो उसी समय, कुछ तैयारी कर, निकलने ही वाला था! और इधर...
"रमेली!" बोली मृदा,
रमेली ने, स्नेह से देखा मृदा को!
"हम यहां पर, बहुत समय से हैं, लेकिन किसी से भी सम्पर्क नहीं हुआ, तुम्हें, रमेली, मैंने देखा है शुरू से, मैं अक्सर ही तुम्हें देखा करती थी, मेरे बाबा ने मेरे कहने पर, तुमसे सम्पर्क किया, रमेली, तुम, अवश्य ही ठीक हो जाओगी!" बोली मृदा,
मुस्कुरा पड़ी रमेली!
सरल हृदय वाली तो थी ही रमेली! मुस्कुराती जब भी, तो उस मृदा में जैसे जान में जान पड़ जाती! मृदा, रमेली को अपनी बड़ी बहन ही कहती थी! कितनी बड़भागिनी थी ये रमेली! सोचता हूँ, कोई और रहा होता, हम जैसा, तो पता नहीं क्या क्या मांगता! कभी धन, कभी मणि, कभी कौशुभ(एक प्रकार का द्रव्य, जिस में कई प्रकार के अवयव होते हैं, जो आयु-स्तम्भन भी करता है, तेज प्रदान करता है) और कभी, नाग-लोक विहार! और फिर सोचता हूँ, कि ऐसा अवसर आता ही नहीं! आता ही क्यों! वे हमारी प्रवृति ही न जान जाते! रमेली और हम में तो, बहुत बड़ा अंतर है! वो कहां और हम कहाँ!
"मैं पुनः तुमसे सम्पर्क करुँगी रमेली!" बोली वो,
कुछ न बोली, बस सर हिलाया,
"फूल आदि की आवश्यकता हो, तो कभी भी ले लेना!" बोली मृदा,
"हूँ!" बोली वो,
"अब जाओ रमेली!" बोली वो,
"हूँ?" बोली वो,
"हाँ, अब जाओ, कोई आने वाला है!" बोली मृदा!
और तब, मृदा ने, उसको, साथ ले, कुछ और भी समझाया, और रमेली को, उसके आवास के क्षेत्र तक छोड़ दिया! रमेली ने कुछ फूल चुगे और चल पड़ी वापिस, अब मृदा, कब आती, कब मिलती उस से, ये तो मृदा ही जानती थी!
उसी शाम.....
"लक्खी?" बोला साधू,
"महाराज?" बोले वो,
"सुन, ढाढर बाबा आने वाले हैं!" बोला साधू,
"भाग हमारे" बोले बाबा,
"कुछ भोजन सामग्री आदि का प्रबन्ध करवा!" बोला वो,
"जी महाराज" बोले वो,
"और हम, उधर बैठे हैं, कोई आये, तो सूचित करना" बोला वो,
"जी, जी महाराज!" बोला वो,
"ठीक" बोला वो चल पड़ा आगे!
"जोगन?" बोला वो,
"हो?" बोली जोगन!
"आज खेल शुरू!" बोला वो,
"जी महाराज!" बोली वो,
"बीनू?" बोला वो,
"हो?" बोला वो,
"आज कि कमी न!" बोला वो,
"हो महाराज!" बोला बीनू!
"जोगन?" बोला साधू,
"महाराज?" बोली वो,
"ये ले, तीन जगह बाँध दे!" बोला वो,
"हाँ, महाराज!" बोली वो,
"सामने का रास्ता छोड़ के!" बोला वो,
"हो" बोली वो,
और अब साधू ने खंगाला अपना सामान! कुछ निकाला, और रखता चला गया एक तरफ! कुछ सामान निकाल कर उसने बीनू को दे दिया, बीनू ने भी उसको अलग रखना शुरू किया!
"बीनू?" बोला साधू,
"हो?" कहा उसने,
"जोगन के संग जा, देख ज़रा!" बोला वो,
"हो, महाराज!" कहा बीनू ने और चलता गया जोगन के पास!


   
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श्रीशः उपदंडक
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जोगन चली, बीनू के पास, और साधू ने, अपना सामान रखा निकाल  कर, इसमें कुछ जंगली औषधियां, बनफूल आदि थे, शायद सर्प को पकड़ने में काम आते! साधू जैसे आज ठान कर ही आया था कि उसे आज तो कुछ न कुछ हाथ में लेना ही है! इसीलिए वो, बाबा ढाढर के पास भी जा पहुंचा था!
उस शाम से पहले कुछ.....
बाबा ढाढर का आगमन हुआ! वो बाबा कम और कोई सपेरा अधिक लगता था, लम्बा-चौड़ा इंसान था वो, हाथों की उँगलियों में, अंगूठियां पहने था, गले में, कई प्रकार के आभूषण से! साधू ने, उस बाबा का सम्मान के साथ स्वागत किया! लक्खी से भी मिलवाया! और उनके लिए कुछ चारपाइयाँ भी बिछवा दीं!
"ये लड़की कहाँ है?" बोला वो बाबा,
"अंदर ही होगी?" बोला वो,
"बुला ले?" बोला वो,
"देखूं" बोला वो,
और उठ कर चला वो! पहुंचा लक्खी के पास, बात की, कुल मिलाकर, रमेली ने मन कर दिया! आ गया खाली हाथ, बाबा के पास वो..
"हाँ?" बोला बाबा,
"नहीं आयी" बोला वो,
"क्यों?" पूछा उसने,
"पता नहीं जी" बोला साधू,
"ह्म्म्म!" बोला बाबा,
"कल भी नहीं आयी थी" बोला साधू,
"मना किया होगा उसे" बोला बाबा,
"हो सकता है" बोला वो,
"कोई बात ना!" बोला बाबा,
"जी" बोला वो,
"बुला लेंगे उसे भी" बोला वो,
"जैसी राजी!" बोला साधू,
"एक काम कर?" बोला वो,
"क्या?" बोला वो,
"लक्खी से, कुछ दूध ला?" बोला वो,
"जी, अभी" बोला साधू,
और चल पड़ा दूध लेने, ये बाबा कुछ तिकड़म लड़ाने वाला था इस दूध के साथ, कई विद्या हैं जो दूध से की जाती हैं, सर्प-विद्या, आशय मेरा!
कुछ ही देर में, एक छोटे से घड़े में दूध ले, लौट आया वो साधू, बाबा के पास!
"ले आया" बोला वो,
"यहां रख?" बोला वो,
"जी" बोला वो,
और रख दिया दूध वहीँ!
"लो जी" बोला वो,
"पीछे हट" बोला वो,
और साधू हट गया पीछे! अब बाबा आया सामने, भूमि से एक मुट्ठी मिट्टी उठायी और कुछ पढ़ा, थोड़ी ही देर बाद, वो मिट्टी फेंक मारी घड़े पर! मिट्टी पड़ते ही, अंदर रखा दूध खौलने लगा! और बह कर बाहर दौड़ने लगा, उसमे धार बनी और उस धार के साथ साथ, बाबा आगे चलता गया! एक जगह जाकर, धार रुकी, घूमी भँवर सी और भूमि के अंदर चली गयी! ये देख, बाबा हंस पड़ा!
"हूँ! ये है" बोला वो,
"क्या जी?" बोला वो,
"यहां है उन नागों का बसेरा!" बोला वो,
"जय हो!" बोला साधू,
"और ये यहां बहुत हैं!" बोला वो,
"जी बाबा!" बोला साधू,
"आज खेल देख मेरा!" बोला वो,
"जय हो!" बोला साधू,
अब तक जोगन और बीनू भी आ गए थे वहाँ, साधू ने, उन दोनों को भी खबर कर दी, वे भी तैयार हो गए दोनों!
"जोगन?" बोला बाबा,
"हो, महाराज?" बोली वो,
"यहां, ये छिड़क!" बोला वो,
"ये? दाने?" बोली वो,
सरसों के दाने थे वो, अक्सर, जांच के लिए सरसों ही प्रयोग हुआ करती है, इसीलिए बाबा ने बोला था! उस जोगन ने, छिड़क दी सरसों उधर! जैसे ही छिड़की, वे सभी के सभी दाने, हवा में तैरते हुए, न जाने कहाँ चले गए! ये देख उन तीनों की तो आँखें फटीं, और बाबा ने दाढ़ी खुजाते हुए, एक हुंकार सी भर दी!
"अब आएगा मजा! हाँ! आएगा मजा!" चीखा साधू!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मित्रगण! इतनी ये घटना सुन कर, हम सोने चले गए थे, मेरे साथ कर्ण साहब थे, वे एक मध्यम दर्ज़े के व्यवसायी हैं, जितना मिले उसी में सन्तोष! और ऐसा होना भी चाहिए! सन्तोष से बड़ा कोई सुख नहीं! मैं और कर्ण साहब, यहां किसी कार्य से आये थे, और तब ये कथा सुनने को मिली थी! मैंने रमेली के विषय में जो जाना वो अत्यंत ही भारी था! उसका अपने जीवन, उसका उस समय का माहौल, उस समय की व्यवस्था आदि, सभी की सभी, कैसी थीं, ये अम्मा जी ने इस कथा से सुना ही दिया था! 
अब इच्छा थी, मुझे उस मन्दिर को देखने की, जहाँ कोई आज भी आता है पूजन करने! वो कौन है? क्या रमेली? या वो मृदा? या कि और ही? उत्तर अभी भविष्य में ही था, हाथ-पाँव मारो, तो भी सटीक नहीं पता लगता! तो साहब, रात में कब आँख लगी पता नहीं, सारा समय तो जैसे उस रमेली के बारे में ही सोचकर बीता! जब जब इतिहास खड़ा होता है, वक़्त की रेत से, जाने, अनजाने किस्से, कहानियां, किवदन्तियां और अन्य विवरण भी निकल ही पड़ते हैं! रमेली भी उनमे से एक ही है!
सुबह हुई, और मैंने फिर से ये कथा सुननी शुरू की, अम्मा ने खूब जोश के साथ वो कथा सुनाई, इसे कौन सी कथा कहूँ, समझ ही नहीं आता! हाँ, अम्मा के अनुसार, वो मन्दिर, आज भी है, बीहड़ में है, सर्प आज भी वहां बसते हैं और काल-बेला, समयांश में कोई आज भी, पूजन करने आता है! मित्रगण, काल-बेला, सूर्योदय से कोई सवा दो घटी पहले ही आती है, उसका समय मान, कभी नहीं मिलता, और गणना की जाए तो, ये समय, साढ़े सोलह मिनट का होता है! अर्थात, जो कोई भी पूजन करने आता है उस मन्दिर में, उसके आने का समय यही है! इसी काल-बेला की एक पुजारिन है! वो कौन है, पता चल जाएगा! जैसे मैं प्रतीक्षारत था, आप भी होंगे! जानता हूँ!
तो उस शाम के बाद...कुछ ही देर बाद...शायद कोई बीस मिनट के आसपास ही, वो साधू हंस हंस कर दहाड़ रहा था! बाबा ढाढर की सरपरस्ती में था, तो भय कैसा उसे!
"छौहन?" बोला बाबा,
"जी बाबा!" बोला वो,
"दोनों हाथ लूट!" बोला वो,
"आपके कारण बाबा!" बोला वो,
"और हाँ?'' बोला वो,
"क्या बाबा?" पूछा उसने,
"यहां तो खरब धन है!" बोला बाबा,
"वाह! बाबा आपकी माया!" बोला साधू,
"बहुत धन है!" बोला वो,
"अच्छा बाबा!" बोला वो,
"हाथी भर ले, ऊंट भर ले, खच्चर भर ले, बचा रह जाए!" बोला साधू!
"वाह! मतलब ये सब रक्षक हैं?" पूछा साधू ने,
"हाँ, रक्षक ही हैं!" बोला बाबा!
यहां एक बात बताना चाहूंगा, बाबा ने जिस स्थान पर धन होने का उल्लेख किया था, वहां सच में ही अकूत धन-सम्पदा है! यहां स्वर्ण, रत्न एवम, स्वर्ण के पाषाण हैं! अब ये धन किसका है, ये नहीं ज्ञात! किसने उन्हें रक्षण दिया, ये भी नहीं ज्ञात! हाँ, रक्षण आज भी है, सुना है, कई जोगी आये, और खाली हाथ ही लौटे! धन अपना स्थान बदलने लगा है अब, अर्थात, कभी उत्तर में, कभी पूरब में! और जी, जब हमारा नहीं तो क्या लाभ! होगा तो मिलेगा, नहीं होगा तो चाहे इंद्र का वज्र मारो, कुछ न मिले!
"धन बाँट लेंगे जी!" बोला वो,
"हाँ!" बोला बाबा,
"तो आज ही?" बोला साधू,
"ह्म्म्म! आज ही!" बोला बाबा,
"कुछ ज़रूरत?" बोला साधू,
"हाँ!" कहा उसने,
"बताइये?' पूछा उसने,
"एक बकरे का इंतज़ाम करवा!" बोला बाबा,
"हो जाएगा!" बोला वो,
"ठीक, करवा फिर!" बोला वो,
"हाँ बाबा!" बोला साधू, अपना झोला उठाया और चला आगे की तरफ, फिर रुक गया!
"बीनू?" बोला वो,
"हो? महाराज?" बोला बीनू,
"आ संग?" बोला साधू,
"आया महाराज!" बोला वो, और दौड़ पड़ा साधू के पास जाने के लिए, पहुंचा तो साधू से, उसका झोला ले लिए, लटका लिया कंधे से अपने! आज रात, अवश्य ही कुछ होना था! या तो इधर, या फिर उधर!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"बीनू?" बोला वो साधू.
"हो?" कहा उसने,
"जा, लक्खी को बुला?" बोला वो,
"हो!" बोला और चला गया, साधू वहीँ उस कट्ठे के पेड़ के नीचे, जा खड़ा हुआ, कुछ ही देर बाद, लक्खी आया साथ में,
"महाराज?" बोले वो,
"सुन?" बोला साधू,
"जी?" कहा उन्होंने,
"आज रात तू हैयहां?" पूछा साधू ने,
"ना जी" बोले वो,
"कौन रहेगा?" पूछा उसने,
"मेवाराम" बोले वो,
"जा, बुला मेवाराम को?" बोला साधू,
"अभी महाराज" बोले वो, और चल पड़े अंदर के लिए, कुछ ही देर में, एक बुज़ुर्ग सा आदमी आया उधर, साधू को देख, हाथ जोड़, खड़ा हो गया!
"आज रात तू रह्वेगा?" बोला वो साधू उस बूढ़े आदमी से,
"हाँ" बोला वो,
"सुन ले?" बोला साधू,
"जी?" बोला वो बूढ़ा,
"आज रात, यहां, कोई न आवै, जो काम हों, निबटा लें सांझ तक, समझ आयी?" पूछा साधू ने,
"जी" बोला वो,
"सांझ को भोजन दे दीजौ, बस!" बोला साधू,
"जी" बोला बेचारा वो बूढ़ा आदमी,
"जा अब, जो कहा, वो करना" बोला साधू,
वो बेचारा बूढ़ा आदमी, कमर झुकी ही थी, लक्खी के साथ लौटने लगा, लक्खी ने कुछ बातें कीं, समझायीं उस बूढ़े आदमी को, और वे दोनों चले गए अंदर!
"चल बीनू?" बोला वो,
"हो?" कहा उसने,
"बाबा के पास" बोला वो,
"हो" कहा उसने,
और चल दिए! पहुँच गए बाबा के पास, बाबा किसी उलट-पलट में लगा था, हिसाब लगा रहा था कुछ!
"छौहन?" बोला बाबा,
"जी?" बोला वो,
"सुन, ये देख?" बोला झोले से कुछ निकालते हुए,
"हाँ?" बोला साधू,
"इसे, उधर, बीच में, गाड़ आ, अभी!" बोला वो,
"ये कासन है?" पूछा उसने,
"हाँ, सब सिमटते आएंगे, भाग नहीं पाएंगे!" बोला वो,
"वाह!" बोला वो,
"यहां जो हैं, वो बड़े ही लड़ाकू हैं!" बोला बाबा,
"किरपा आपकी" बोला साधू,
"हम भी कम नहीं" बोला बाबा,
"जय हो!" बोला साधू,
"एक काम का, ओ बीनू?" बोला बाबा,
"हो? महाराज?" बोला खड़े होते हुए वो,
"कुछ देर में, उधर चले जाना, इसे गाड़ आना" बोला वो,
"जय हो!" बोला वो,
"और, हाँ, अरे?" बोला बाबा,
"आज्ञा महाराज?" बोला साधू,
"बकरा?" बोला वो,
"आवेगा अभी" बोला वो,
"हम्म! इसे छरिया ले तब?" बोला वो,
और झोले में से, एक बड़ा सा गंडासा निकाल लिया, ये भारी था, बकरे की गर्दन पर एक वार और हुआ काम बस!
"चंडी चलेगी आज!" बोला वो,
और उस हथियार को, ज़रा, हिलाया उसने!
"रेत ले, राख के संग, पाथर ले और जा, घिस दे!" बोला वो,
"हाँ महाराज!" बोला बीनू,
और उठा लिया वो गंडासा, पकड़ा ठीक से, और चल पड़ा एक तरफ, रेत, राख से घिस कर, पत्थर से चमका कर, तैयार करना था ये गंडासा उन्हें!
"सुन?" बोला बाबा,
"हो?" बोला साधू,
"सुराब है?" पूछा उसने,
"है!" बोला साधू!
"ठीक है फिर!" बोला वो,
"बाद में रंधवा लेंगे बकरा!" बोला बाबा,
"ठीक!" कहा साधू ने!
और दोनों ही, हंसते चले गए! ऐसे, कि सब आसान ही हो, बलि चढ़े, माल निकले, ताक़त मिले और फिर दावत हो!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वक़्त बीता! और बजे आठ! साधू महाराज ने, उधर , चार अलाव जलवा लिए थे पहले ही, उनका ही प्रकाश था वहां, दो लालटेन भी थीं, ईंधन-पानी सब तैयार रखा था! भूमि का एक स्थान, साफ़ कर दिया गया था, उधर, कुछ फल, फूल, हल्दी आदि रखे हुए थे! पास ही में, वो बकरा खड़ा था, बकरे का पूजन भी कर लिया गया था, चंडी के नाम पर, बस अभी कुछ ही देर में वो बकरा चढ़ जाना था! सबकुछ सोचे समझे हिसाब से हो रहा था! कोई कमी नहीं थी! किसी तभी तरह की!
तो मित्रगण!
साढ़े आठ बजे करीब, ज़ोर का हुंकारा भर, बाबा ने बकरा चढ़ दिया! उसका रक्त इकठ्ठा कर लिया गया था, अब चूँकि ये अभिमन्त्रित हो गया था, इसका प्रयोग अब कभी भी किया जा सकता था!
"छौहन?" बोला बाबा,
"हो?" बोला वो,
"तैय्यार?" बोला बाबा,
"हो!" बोला वो,
"चल फिर!" बोला वो,
"हो!" बोला साधू,
और हुए तैयार सभी!
"जोगन?" बोला बाबा,
"महाराज?'' बोली वो,
"भगोना उठा ले!" बोला वो,
"हो, महाराज!" बोली वो,
"चल फिर!" बोला वो,
"ओ बीनू?" बोला बाबा,
"महाराज?" बोला वो,
"ठा ले सामान!" बोला बाबा,
"हो महाराज!" बोला वो,
और अब, वे चारों, चल पड़े उस बगिया की तरफ! बाबा ने, सरसों फूंक कर फेंकी इधर-उधर! और अपना गंडासा लिया हाथ में!
"जोगन?" बोला वो,
"महाराज?" बोली वो,
"रख सामान यहां!" बोला वो,
और रख दिया सामान उसने! वो रक्त से भरा हुआ भगोना! बाबा ने अपना गंडासा उसमे डुबोया और मन्त्र पढ़ते हुए, उसकी छींटें छिड़क दीं उधर!
"कौन है?" बोला बाबा,
कोई आवाज़ नहीं!
"सामने आता है या ले आऊं?" बोला वो,
कोई नहीं आया!
"डट जा!" बोला बाबा,
"बीनू?" बोला बाबा,
"हो?" दिया बीनू ने जवाब,
"सामान से, धौंक निकाल?" बोला वो,
"हो, बाबा!" बोला वो,
और बीनू ने, एक गोल सा, रस्सी जैसा गोला निकल लिया, दे दिया बाबा को, बाबा ने उसे, हाथ में पकड़ते हुए, और मन्त्र पढ़ते हुए, नीचे रख दिया!
"जोगन?" बोला वो,
"हो?" बोली जोगन,
"जला इसे?" बोला वो,
"हो, महाराज!" बोली वो,
और अब, दियासिलाई से, उस गोले में आग लगा दी! गोला जला तो चटक-चटक की आवाज़ें हुईं!
"पीछे रहो!" बोला वो,
सब हो गए पीछे! और तभी सामने एक जगह से कुछ धुआं सा उठा, एक जगह से, दूसरी जगह से, फिर तीसरी जगह से और फिर हर तरफ से ही! बाबा हंस पड़ा! ज़ोर ज़ोर से!
"नहीं आवेगा?" बोला बाबा,
कोई नहीं आया,
"बड़ा हिमति है?" बोला वो,
और बाबा ने एक मन्त्र पढ़, इस बार ये मन्त्र मन में ही पढ़ गया था, पढ़ने के बाद, बाबा ने उस जलते हुए गोले पर अपना गंडासा रख दिया! जैसे ही रखा, वहां पर, सर्र ही सर्र की सी आवाज़ें गूंजने लगीं! वे सभी सर्प ही थे, बिलों में उनके, अग्नि धधक गयी थी, जिसको जो मार्ग मिला, रेंग पड़ा! यही तो चाहता था वो बाबा! सटीक वार किया था उसने!
"सब को मारूँ?" बोला वो,
सामने से एक लकड़ी सी उछलती हुई आयी और बाबा के शरीर से टकरा कर, नीचे गिर गयी! इस लकड़ी ने उसको कुछ चोट नहीं पहुंचाई! बाबा ने अपनी देह को, चोट-रहित मन्त्र से बाँध लिया होगा!
"ये मज़ाल?" चीखा बाबा!
"शकट जलै! हकट जलै! जलै पीर का ठेरा!............................................!!" पढ़ दिया शाक्त मन्त्र बाबा ने!
बाबा ने मन्त्र पढा, और आयी सर्पों की जैसे शामत! भूमि से उछल उछल, दूर उड़ते जाएँ! कोई कहीं से और कोई कहीं से! बाबा ये देख, गाल बजाए!
"कहा था!" बोला वो,
"हो, बाबा!" बोला साधू!
"नहीं माना न?" बोला बाबा, और पीटे जांघें!
"जा! जा! पड़ कुइयां में!" बोला वो बाबा!
अचानक से ही, सब हुआ शांत! फट-फट की सी आवाज़ आने लगी! सभी हुए हैरान तब! उसका प्रहार, काट दिया गया था!
"शह्ह्ह्ह्ह्ह!" बोला बाबा,
ओहो! मरघटिया सन्नाटा छा गया उधर! जिसने ये शकट मन्त्र काटा था, वो अब सामने आने ही वाला था! इसीलिए, प्रत्येक आवाज़ पर, अब बाबा की पकड़ थी! वे तीनों, ऐसे कांपे जैसे किसी अँधेरे वाले कुँए में धकेल दिए गए हों! और अचानक ही..................!!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वहाँ अब सन्नाटा सा छा गया था, बाबा, कान खोल सभी आवाज़ें सुने जा रहा था! कोई झींगुर बोलता तो भी मुस्तैद, कोई पत्ता हिले तो भी मुस्तैद! उसके संगी साथी, जैसे अपने जीवन की लगाम उस बाबा को ही सौंप चले थे! वे सभी, आसपास नज़रें दौड़ा रहे थे कि न जाने कब क्या हो जाए!
"छौहन?' बोला बाबा,
"हाँ?'' बाबा ने कहा,
"हाथ मत बांधना!" बोला वो,
"हाँ, महाराज!" बोला वो,
अब कुछ समय बीता और कुछ न हुआ, न कोई हरकत ही हुई, अब सब शांत हो गया था, न कोई सर्प ही था, न उसकी कोई फुफकार ही!
"बाहर चल ज़रा?' बोला वो,
"हो, महाराज!" बोला वो,
और वे सभी बाहर के लिए लौटने लगे! बाहर आये, तो एक अलाव के पास, जो ज़मीन साफ़ की थी, वहां तक आ गए!
"सुन?" बोला वो बाबा,
"हाँ जी??" कहा साधू ने,
"तू यहां रह, इन दोनों को उधर खड़ा कर दे!" बोला बाबा,
"जी बाबा!" बोला वो,
और ऐसा ही हुआ, वो साधू उन दोनों को, वहां से कुछ दूर ले गया, ताकि नज़र में रहे, उन्हें कुछ समझाया और फिर वापिस, उस बाबा के पास आ गया!
"यहां तो बहुत शक्ति है बड़ी, फैली हुई?" बोला बाबा,
"अब?" बोला वो,
"देखता जा!" बोला वो,
"महाराज की जय!" बोला साधू,
अब बाबा ने उस अलाव में, कुछ सामग्री सी निकाल कर, फेंकी! अलाव की रौशनी एकदम से बढ़ गयी! तब उस बाबा ने अपने झोले से एक डिब्बी सी निकाल ली, उस डिब्बी पर दोनों हाथ से छुआ कर, अपने माथे से छुआ, फिर दो बार हाथ अपने कानों से छुए!
"सर्वनाश कर दूंगा इनका!" बोला वो,
"देख लो महाराज!" बोला साधू,
"हैं बख्शूं!" बोला बाबा,
"जय हो!" बोला साधू,
"चले छह घर, सातवां कूदे.....................................................", बाबा ने चलाये कुछ मन्त्र!
सर हिलाता और ज़मीन से छुआ देता! फिर से चलाता और ज़मीन से सर, छुआ देता!
"सर्प कटै, बीछू कटै.......................................................", फिर से मन्त्र चलाया!
"जय हो जय हो!" बोला साधू!
"बाँध लाव, पकड़ लाव.....................................................", फिर से मन्त्र पढ़ा!
अब तो ये साफ़ था, कि ये बाबा, सच में ही लड़ने वाला था उनसे, ये तो तीसरा मन्त्र था, ये कभी खाली नहीं जाता, ये बीसी-मन्त्र कहते हैं, ये मन्त्र अपना प्रभाव अवश्य ही डालता है! अब देखना था, होता क्या है!
बाबा उठ खड़ा हुआ, और एल जलती लकड़ी निकाल ली, मन्त्र पढ़ा और लकड़ी उस भगोने में घुसा दी जिसमे रक्त था! रक्त जला, गन्ध उडी! और उधर, उस बगिया में. जगह जगह आग जलती, बुझती, जलती, बुझती!
"अभी भी वक़्त है!" बोला बाबा,
"आ जा सामने?" बोला साधू,
"छोडूं न!" बोला बाबा,
"जाने न दूँ!" बोला साधू,
"खेत में, खहार में?" बोला बाबा,
"मंतर की बयार में!" बोला साधू,
"जाने न दूँ!" बोला बाबा,
"जाने न दूँ!" बोला साधू,
और अचानक से ही, सामने, उधर, कोई प्रकट हुआ, ये धूम्र जैसा था! मात्र उन दोनों ने ही देखा, बीसी-मन्त्र चलाया था, इसीलिए!
"आ लिया? आ लिया ना?" बोला बाबा,
"आता कैसे ना?" बोला साधू,
"आया है तो जाए ना!" बोला वो,
भक्क!
भक्क से अलाव बुझा! बाबा के हाथ से, लकड़ी जा निकली! भगोना जा गिरा, लुढ़कता हुआ, रक्त भूमि पर बिखर गया! आ गया बिखर का उन दोनों के पांवों में!
"ठहर?" चीखा बाबा!
"आता हूँ मैं!" बोला साधू,
और दोनों ही चल पड़े आगे के लिए! बाबा ने ले लिया था दंड और साधू, उसके साथ साथ ही रहे! बगिया की तरफ चले और अंदर दाखिल हुए! अंदर आ गए, अंदर, भूमि पर, कई जगह, झाग झाग से पड़े थे!
 

 

लालटेन थीं नहीं, बस, उन अलावों का जो प्रकाश छन कर यहां आ रहा था, उसी का सहारा था, वे दोनों जहां खड़े थे, वहां की भूमि कुछ समतल सी, उजाड़ सी, और सख्त सी थी, कोई करीब आता तो वे देख सकते थे, लेकिन बाबा को तो जैसे अभी तक समझ नहीं आया था कि करना क्या है! बाबा का शकट-मन्त्र कट ही चुका था, अब जो लड़ाया था, बीसा, उसको ही आगे रख दिया था! बीसा मन्त्र या यन्त्र, अपने अंदर अत्यंत ही शक्ति समाहित किये हुए रखता हैं! मात्र एक ही पूर्णिमा को, वर्ष की एक ही पूर्णिमा को, उसका निर्माण किया जा सकता है, ताम्र-पत्र, रजत-पत्र एवम स्वर्ण-पत्र में उकेरे हुए यन्त्र, कदापि फलदायी नहीं होंगे! मात्र मन का ही सन्तोष मान लो! यन्त्र मात्र, केले के पत्र पर, भोज-पत्र पर, गूलर के पत्ते पर या फिर, ताज़ा कपास से बने, वस्त्र पर ही लिखा यन्त्र फलदायी होता है! जिस पूर्णिमा के विषय में बता रहा हूँ, वो बस आने को ही है, और ये है, शरद-पूर्णिमा! इस दिन, सत्व,राजस एवम तमस का अनुपात एक ही हुआ करता है, ऐसा माना जाता है! पन्द्रह का यन्त्र, और बीसे का यन्त्र, वैसे तो एक समान ही हैं, परन्तु, कुछ अन्तर भी है दोनों में! ये फिर कभी!
आपने बीसा-श्वान तो सुना ही होगा, वो जीता-जागता ही बीसे का यन्त्र ही समझो! बीसा श्वान, विशुद्ध देसी नस्ल का, एकदम काला, नीले से रंग की त्वचा की आभा देने वाला. काले मसूड़ों वाला, खड़े कानों वाला, काले ही पंजों वाला, नाभि भी काली ही हो, कहीं भी श्वेत या अन्य रंग की झलक न हो, बीस पंजे हों, जिव्हा उसकी कुछ अधिक ही लम्बी रहती है, ये श्वान, समझो वरदान है! संकर नस्ल वाला, या विदेशी नस्ल वाला श्वान नहीं होना चाहिए, इन हाइब्रिड नस्लों के श्वान में, श्वान की प्राकृतिक नैसर्गिकता कभी नहीं होती, कुछ न कुछ कमी रहती है! जैसे डाल्मेशियन में, घ्राण-इंद्री नहीं विकसित होती, वो अधिक, फर्क नहीं कर सकता, पामेरियन में, अस्थियां खोखली होती हैं, एलसेशियन में, निचली रीढ़ बेहद कमज़ोर होती है, बॉक्सर में, नाभि खुली रहने से, सदैव मूत्र-रोग से ग्रस्त रहता है! अतः, ये हाइब्रिड या संकर नस्ल के श्वान, सिर्फ दिखने में ही श्वान हैं, नैसर्गिकता में नहीं! बंजारे लोग, अक्सर अपने साथ ऐसा ही काला श्वान रखते हैं, खरीदना हो तो एकम दाम चुका कर, ही खरीदना चाहिए, एकम अर्थात, एक रुपया अपनी तरफ से अधिक ही दे कर! जिसके घर का अन्न एक बार ये श्वान खा कर, तृप्त हो जाए, समझो उस घर में, अन्नपूर्णा का वास हुआ! घर में नज़र-टोटका हो, तो उस घर का दूध इस श्वान को पिला दीजिये, नज़र-टोटका वहीँ ख़त्म! जिस घर में ये श्वान पलेगा, वहां के बुज़ुर्गों को कोई कष्ट नहीं होगा!  और फिर, ये श्वान तो स्वयं भैरव जी का वाहन है! आगे कहने की क्या आवश्यकता!
तो अब घटना-स्थल पर चलते हैं!
वाहन, आसपास, भूमि के नीचे से, जैसे झाग फूटे हों, ऐसा लग रहा था, इसका कारण यही था, कि वहाँ के सर्पों को अवश्य ही कष्ट हो रहा होगा, और तभी, उन्हें कोई नज़र आया होगा, इसीलिए वे दोनों यहां आ गए थे! अब फिर से शान्ति पसर गयी थी!
"जो हो, आये?" बोला बाबा,
"जय तनोटी!" बोला साधू!
"नहीं छोडूं!" बोला बाबा,
"हाँ, नहीं छोड़ू!" बोला साधू,
और तभी सामने, कि बैठा सा नज़र आया, झुक कर देखा उन्होंने, लगा तो रहा था कि कोई बैठा है वहां, लेकिन वो आकृति जैसे धुंए की सी बनी थी, जिसका धुंआ आसपास भी बिखर रहा था! अचानक से, मज़मज़(लोहबान जैसी, एक राल जो पानी में गिर, कठोर हो जाती है, जलाने पर, बिन धुंए के सुलगती है और ख़ुशबू बिखेरती है) की महक सी आयी! साधू तो कुछ समझा नहीं, हाँ, वो बाबा समझ गया इसका अर्थ!
"भाग! आगे भाग!" बोला बाबा और दौड़ लिया आगे! उसको भागते देख, साधू भी भाग लिए उसके पीछे! और वो, एक खुली जगह आ कर रुक गए! बाबा ने फौरन ही दण्ड उठाया और, एक मन्त्र के साथ अपने और साधू के चरण ओर एक सुरक्षा-चक्र खींच दिया!
"महाराज?" बोला साधू,
"यहां तो किसी का जंतर चला है!" बोला वो,
"महाराज?" बोला साधू,
"हाँ, कोई जंतर है यहां, बहुत पुराना!" बोला बाबा,
"अब?" बोला वो,
"रुक जा!" बोला बाबा,
"इसे पकड़?" बोला बाबा, वो दंड देते हुए! और बैठ गया नीचे उस घेरे में! कुछ मन्त्र पढ़े, और कुछ मिट्टी उठा, चक्र के चारों ओर छिड़क दी!
"छौहन?" बोला बाबा,
"हाँ?" कहा उसने,
"ऐसे पर न पड़ेगी!" बोला वो,
"तब महाराज?" पूछा साधू ने,
"बताता हूँ!" बोला बाबा,
और हो गया खड़ा!
"छौहन? मेरे पीछे आ, ज़रा भी न चूकना, चूका तो समझ, जलता हुआ भस्म हो जाएगा! चल, आ!" बोला बाबा, 

   
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श्रीशः उपदंडक
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साधू के तो जैसे पाँव ही कटे! जैसे जान ही निकल गयी हो! बाबा ढाढर का ये कहना? समझ नहीं आया साधू को! अब जब मौत सामने हो, तो कैसे कैसे ख़याल आते हैं मन में, ये तो वो स्थिति और भुगतने वाला ही जाने! फ़िलहाल तो ये साधू झेल रहा था वो स्थिति! चूका तो गया! हुआ भस्म! वाह रे लम्पट! डोर चढ़ानी आवे नहीं और फोड़न चला मीन की आँख!
"छौहन?" बोला बाबा,
"हो?" किसी तरह से शब्द निकले!
"आ?' बोला वो,
"हाँ" कहा उसने,
और साधू वो, उस बाबा के कदमों के निशान पर ही पाँव रखता आगे बढ़ता चला गया! बस अब तो कुछ ही दूर की बात थी, फिर तो मैदान अपना और तोप भी अपनी!
तो साहब, ले आया वो बाबा, खुद को और अपने इस लम्पट साथी, साधू छौहन को! जब ले आया, तो जैसे चैन का गुब्बारा फट पड़ा! ऐसे सांस ले, कि जैसे सामने का किला ही जीत लिया हो! किला तो क्या, अभी तो एक बुर्ज भी न गिरी! अभी तो समझो, रसद पर भी छाप पड़ी हो!
"छौहन?" बोला बाबा,.
"हो?" बोला वो,
"बुला, उन्हें बुला?" बोला वो,
"दोनों को?" बोला वो,
"हाँ" कहा उसने,
छौहन तो दौड़े चला गया, और घेर लाया उन्हें! वे भी अब तक, सूख ही चले थे, इतनी देर बाद भी कोई चाल न चल रही थी!
"तुम दोनों?" बोला वो,
"हम?" घबरा कर बोले दोनों ही,
"हाँ, तुम दोनों" बोला बाबा,
"हो?" बोले वो,
"उस लड़की को लाओ, जैसे मर्ज़ी!" बोला वो,
जैसे मर्ज़ी? क्या मतलब?
"कैसे?" बोला बीनू,
"जैसे मर्ज़ी, लाओ?" बोला वो,
दोनों डूबे अब खोह में! क्या करें?
"जाते क्यों नहीं?" बोला साधू,
"न आयी तो महाराज?" बोली जोगन!
"तो खींच ला?" बोला वो,
"और जो न आवे?" बोला बीनू,
"तेरी **न **! सुना या नहीं?" बोला वो,
वे दोनों चले गए, और ऐसे चले, जैसे किसी हाथी को घेर कर लाना हो वहां! शायद वो जानते थे कि लड़की कहेगी क्या! इसीलिए, जान सी निकली पड़ी थी दोनों की!
"लड़की से का होय?" पूछा साधू ने,
"एवज!" बोला वो,
"क्या, महाराज?" बोला साधू,
"काट दूंगा उसे!" बोला बाबा,
साधू ने तो थूक जो गटक, अजीज़ अंगार निगला हो! रीढ़ की हड्डी में तो विद्युत् सी दौड़ गयी!
"बाबा?" बोला वो,
"हाँ?" कहा उसने,
"एक बात कहूँ?" बोला साधू,
"हाँ बोल?" बोला वो,
"लड़की से प्रसन्न हैं ये सब, हैं?" बोला वो,
"हाँ तो?" बोला बाबा,
"कुछ लड़की को हुआ तो? हैं?" बोला वो,
"अरे पागल?" बोला दहाड़ते हुए!
साधू चुप्प!
"यही तो खेल है! खेल! तू रहा **** ही!" बोला बाबा,
"जैसी भली" बोला साधू,
"जा? देख? इतनी देर कैसे?" बोला कड़क कर बाबा!
"हो, बाबा!" बोला वो,
और चल पड़ा, जैसे ही चला कि सामने से वे दोनों ही आ गए! अब तो साफ़ था, लताड़ पड़ी होगी उन्हें!
"क्या हुआ?'' पूछा साधू ने,
"ना आयी!" बोला बीनू,
"लगे तो था ही!" बोला वो,
और तीनों लौट पड़े बाबा के पास, बाबा भी समझ ही गया था कि लड़की ने मना कर दिया होगा, इसीलिए उसे कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा था!
"ना आयी?" बोला बाबा,
"नाह जी" बोला बीनू,
"ह्म्म्म! ठीक! अब देख ज़रा! अब देख तो! जय कालघँट! खींचू तेरा डोरा!" बोला बाबा और हो गया खड़ा! अब होना था असली द्वन्द!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सौगन्ध चंडी की, अब नहीं छोडूंगा! बहुत देख लिया इन्हें! ढाढर नाम है मेरा! कोई नहीं बचा सकता! कोई भी नहीं! चाहे कैलास आये, या फिर, जगभाल!" बोला मुट्ठी भींचते हुए वो!
"जय चंडी!" बोला साधू,
"जय विकराल चंडी!" बोले वो दोनों!
"बीनू?" बोला वो,
"हो, बाबा?" कहा बीनू ने,
"है, सिरी ले आ!" बोला वो,
"अभी! जय हो महाराज!" बोला वो, और चला गया, जो बकरा बलि दिया था, उसका सर लेने! हाँ, उसने कहा था कैलास, कैलास, नाग-देव हैं! इनका क्षेत्र राजस्थान में ही है, कैलास सर्प, अपने भक्तों को अवश्य ही दर्शन दिया करते हैं! स्वभाव से मृदु, दयालु हैं! पुष्कर के सरोवर के निर्माण समय, वाषेषगण ( विश्वकर्मा जी के सहायक) ने, कैलास महानाग से ही आज्ञा मांगी थी, अपने शरीर के अनुपात के अनुरूप ही, भूमि दी गयी थी! ये कुछ गूढ़ रहस्य हैं, जिन्हें कोई नहीं बताता! पता नहीं क्यों! मय-दानव और विश्वकर्मा, दोनों ही, निर्माण-कला में सिद्धहस्त हैं! देवासुर संग्राम के समय, जब नक्षत्रों का गठन हो रहा था, तब तक कुल अट्ठाइस नक्षत्र बनाये जाने थे, सभी, देवताओं ने, अपने सामर्थ्य एवम शक्ति के स्वरूप ही, उनको नाम दिया था! इन अट्ठाइस नक्षत्रों में एक भी नक्षत्र असुरों से पूछ कर नहीं बनाया गया था! तब, असुरराज ताड़कासुर ने, मय-दानव को बुलाया और उसने, एक नक्षत्र पर, पाँव रखे! इसी नक्षत्र में ही, देव-शक्ति समाहित थी, अर्थात, इस नक्षत्र में किया गया प्रत्येक कार्य सिद्ध होना था, इसी का नाम. मय-दानव ने, अभिजीत नक्षत्र रखा गया! ये अट्ठाईसवां नक्षत्र है! इसके बाद, मय-दानव ने और भी उग्र-नक्षत्रों का निर्माण किया, और उन्हें, खगोल में स्थान दिया! भगवान शिव के आशीर्वाद से ही, दैत्यगुरु शुक्राचार्य को, ग्रहों में स्थान दिया गया! देवताओं के अनुसार, उन ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ देवगुरु बृहस्पति ही होने थे! तब, राहू, केतू, बुध(गुप्त रूप से शत्रुता रखते हैं देवों से) को मय-दानव ने ही स्थान दे, विराजित किया! देवगुरु यदि सौ प्रतिशत किसी को सबल बनाते हैं, तो शुक्र, चार सौ प्रतिशत, शुक्र, बृहस्पति से अधिक सामर्थ्यवान ग्रह हैं! अब जो नक्षत्र बने, उनमे से, कइयों के स्वामी नागों को बनाया गया! कैलास उनमे से ही एक हैं! अब जगभाल! जगभाल, चन्द्र देव के अभिन्न मित्र हैं! ये, सर्प, कभी नहीं दीखते, ये दुर्लभ हैं! इनका शयन-काल भी सहस्त्रों वर्ष का हो सकता है! रूप में, पीले, स्वभाव में, अति-मृदु एवम वर देने वाले हैं! कई लोग सोचते हैं कि ये सब, अब कहाँ हैं? उत्तर है, यहीं! सापेक्ष समय में! हम, उस लोक में भ्रमण नहीं कर सकते, सामर्थ्य नहीं! परन्तु, सिद्धि द्वारा ये प्राप्त किया जा सकता है! मित्रगण! जिस शीशम पर फलियां चन्द्राकार आती हों, समझो, उसकी जड़ में, जगभाल सर्प का वास है! मात्र दीख ही जाए तो समझो वरदान मिला! इसके फन पर, एक काले रंग की लकीर सी होती है! यही इसकी पहचान है!
अब बाबा ने कहा कि अब कोई भी आये! कोई भी! इसका अर्थ था कि उसको अभी भी विश्वास था अपने सामर्थ्य पर! उसने कालघँट का डोरा खींचने का कहा था, कालघँट एक महावीर हैं! इनकी साधना हुआ करती है, ये धन-दायक होते हैं! परन्तु अनुचित रूप से नहीं, चोरी-चकारी, लूट-खसोट से तो कदापि नहीं! झांसी के किले में, ऐसी ही एक जगह, एक डोरा खिंचा है! वहां, गत सत्रह वर्षों से, एक व्यक्ति, रोज ही एक स्वर्ण-अशरफी प्राप्त करता है! ये कहाँ से आती है, कौन देता है, कुछ नहीं पता, कहते हैं कि यदि इसका रहस्य उसने किसी को बता दिया तो उसको वो धन नहीं मिलेगा, इस अशरफी का कुल वजन, पौने छह ग्राम बैठता है! दान-पुण्य करने वाला व्यक्ति है वो! कुछ उडी उडी सी खबर कान में लगी तो पता चला, कि कोई पीर बाबा हैं, जो उस डोरे के अंदर से, वो अशरफी दिया करते हैं उस व्यक्ति को! अब असलियत क्या हैं, पता नहीं! वो डोरा कहाँ है, पता नहीं! और फिर पीर-फ़क़ीर से भिड़ना, लड़ना, ये तो महापाप है! वे बुज़ुर्ग हैं! अपने मान-सम्मान के लिए ही किसी से भी प्रसन्न हो जाते हैं! ऐसे ही एक पीर हैं, दिल्ली के पास ही, कुछ निर्जन से क्षत्र में! आलम नाम है उनका! उन्हें, सर झुका कर सलाम करता हूँ, जब भी गुजरता हूँ वहां से! करीब सौ वर्ष के होंगे, संग एक ख़ादिम है उनके, वो बकरी चराता रहता है! ये पीर साहब, बेहद ही शरीफ, खुद ही हटने वाले और रोजी बांटने वाले हैं!
"महाराज? लो!" बोला बीनू,
"रख दे!" बोला बाबा,
बीनू ने रख दिया वो सर नीचे, बाबा अब नीचे बैठा, झोले में हाथ डाला, और लालटेन आगे रख ली!
"बीनू?" बोला वो,
"हो?" बोला बीनू,
"जोगन को हटा यहां से?" बोला वो,
"हो!" बोला बीनू,
और कह दिया उस जोगन को, जोगन को जैसे क़ैद से मुक्ति मिली हो! भाग ली वहां से! काल की गन्ध आ गयी थी उसे जैसे!
"छौहन?" बोला बाबा,
"हो, बाबा?" बोला वो,
"आ, सिंदूर निकाल ज़रा!" बोला बाबा,
"हो! महाराज!" बोला और बैठ गया संग ही! टटोलने लगा अपना झोला, और निकाल ली सिंदूर की एक डिब्बी बाहर!


   
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श्रीशः उपदंडक
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अब बाबा ने, उठाया सर बकरे का, और उठायी एक डिब्बी, आगे चला, अपना गंडासा उठाया, पानी का बर्तन लिया, एक जगह दोनों ही लालटेन रखीं, और, उस डिब्बी से निकाल कर, एक सफेद सी भस्म, एक चतुर्भुज बना दिया! फिर बीच में रखा वो सर, और कुछ छींटे दिए पानी के, अब आया समझ! ये कालघँट का डोरा खींचना था! आशय आ गया समझ! बाबा उस चतुर्भुज में बैठ कर, अपने आपको, कालघँट के सरंक्षण में रख, प्रहार करता! विवश करता वो सर्पों को!
"जा, पीछे देख?" बोला वो साधू से,
"हो, बाबा!" बोला वो,
"अब उतार दूंगा खाल इनकी!" बोला दम्भ से वो बाबा!
"बीनू?" बोला बाबा,
"हो? महाराज?" बोला वो,
"तू यहां बैठ!" बोला वो,
"हो, जी महाराज!" बोला वो,
उठाया गंडासा उसने, और बकरे के सर पर, तीन बार घुमाया! फिर, हाथ जोड़ कर, खड़ा हुआ! उस बगिया की तरफ देखा!
"मौका देता हूँ!" बोला बाबा,
कोई संकेत ही नहीं!
"नहीं?" बोला वो,
कोई संकेत नहीं!
अब बैठा नीचे, और उस बकरे का सर उठाया, पढ़ा मन्त्र उसने, और बकरे का मुंह खोला, मेहनत सी लगी, बकरे का मुंह, सिल सा जाता है, अकड़ सा जाता है कटने के बाद! इसीलिए ज़ोर लगाया उसने! पढ़ा एक कालघँट मन्त्र और उस बकरे की जिव्हा खींची, खींचते ही, एक ही वार में जिव्हा काट दी! काट कर, अपने मुख में रखी, मुख बन्द किया, गाढ़ा जमा खून, होंठों पर फ़ैल गया! मन्त्र पड़ता जाए अंदर ही अंदर, और सर हिलाता जाए! और एकदम, निकाली जिव्हा उसने और फेंक दी उस बगिया की तरफ! भयानक सी आवाज़ हुई! जैसे ज़मीन फट गयी हो! अब मारा ठहाका! और हो गया खड़ा!
"बीनू?" बोला वो,
"महाराज?" बोला वो,
"ज़रा वो दंड दे?" बोला वो,
"पिंड चले, पाताल चले, चले जोगी का.................................................!" बोला वो,
और जैसे ही मन्त्र हुआ ख़तम, उस बकरे का सर उछला और उड़ चला! उड़कर, जा गिरा उस बगिया की तरफ!
"कैसे बचेगा?" बोला बाबा,
साधू आँखें फाड़, उस बगिया को देखे!
अचानक ही! अचानक ही उस बगिया में हो उठा प्रकाश! जैसे ज़मीन से फूट पड़ा हो! बाबा के अलावा, उन दोनों की हुई सिट्टी-पिट्टी गुम! ये क्या है? कौन है? ये क्या देखा उन्होंने!
"आ गया?" बोला बाबा,
साधू हैरान!
"आ गया ना?" बोला वो,
हंसने लगा! दहाड़ मार मार के!
"ढाढर नाम है मेरा! ढाढर! तेरे जैसे छका दिए मैंने! तू क्या है? क्या? ढाढर का सामना करेगा?" चीखा बाबा, उपहास सा उड़ा कर!
और हुआ कमाल!
बाबा उठा हवा में! निकली चीख और जा पड़ा दूर जाकर! ये देख, भगदड़ मची! साधू को कुछ समझ ही ना आये! काठ मार गया उसे जैसे! और बीनू! थरथर कांपे! उधर, बाबा उठ कर खड़ा हो गया था! गोबर के ढेर पर गिरा था, इसीलिए बच गया था, लेकिन होश उड़ ही गए थे!
साधू और बीनू को आया जैसे होश! भागे दौड़े दौड़े और जा पहुंचे बाबा के पास! कोई कुछ न बोले! किसी तरह बाबा को आया होश! और बाबा भाग चला उस घेरे की तरफ! कूद पड़ा उस चतुर्भुज में!
साधू, और बीनू, दोनों भी लपके, और वो भी कूद पड़े उस चतुर्भुज में ही!
"बाबा जी?" बोला साधू,
"देखता हूँ अभी!" बोला बाबा!
बीनू, बीनू जैसे उड़ते हुए चमगादड़ गिने!
"बाबा?" बोला साधू,
"हाँ?" बोला वो,
"बाद में देखें?" साधू ने डर कर पूछा!
"हट?" बोला वो,
"बाबा, कल?" बोला साधू!
"हट? तू देख अब?" बोला वो,
और ली एक लम्बी सी सांस उसने! उठाया पाना गंडासा, गोबर में सना बाबा, अब जैसे अपने होश ही खो बैठा था!
बाबा ने पढ़ा मन्त्र! और उठायी मिट्टी! चिल्लाया वो, और चल पड़ा उस बगिया की तरफ!
बीनू और साधू, बस अब बेहोश और अब बेहोश! वो ना निकले उस घेरे से, बस देखते रहे उस बाबा को जाते हुए!
बाबा जा पहुंचा उस बगिया में, और दौड़ पड़ा चिल्लाते हुए! ढूंढने लगा प्रकाश का स्रोत! और जैसे ही मिला, भाग चला उधर की तरफ!
"न छोडूं!" चिल्लाया वो!
और भागे आगे!
"न छोडूं!" बोला वो,
और मिट्टी जो, हाथ में थी, फेंक दी उधर! प्रकाश लोप हो गया! ज़मीन में फटाव आ गया! आसपास से, चरड़-चरड़ आवाज़ें आने लगीं!
"जा! लौट जा! न आना वापिस!" आयी आवाज़!
"तू? तू कौन?" हुआ बावला सा वो और बोला!
"जा! चला जा!! नहीं लौटना! जा!" आयी आवाज़!
"ऐसे नहीं जाऊँगा! नहीं!! नहीं जाऊँगा ऐसे!" चिल्लाया वो और बढ़ आगे, और अचानक से ही......................!!!


   
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श्रीशः उपदंडक
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बाबा ने तो पकड़ ली ज़िद! और पागल सा हो, अजीब अजीब से हरकत करे! कभी ललकारे कभी हंसे ही!
"लौट जा!" आयी आवाज़,
"सामने आ?'' बोला वो,
"अवसर है!" आयी आवाज़,
"अवसर? तेरा काल आया है!" बोला वो,
"मूर्ख न बन!" आयी आवाज़,
"मूर्ख? कौन है मूर्ख? मैं या तू?" बोला वो,
और बाबा ने फिर से एक मन्त्र पढ़ा! उठायी मिट्टी और फेंक मारी सामने! आवाज़ हुई बड़ी तेज! और उधर, फिर से, फटाव हुआ भूमि के! आसपास भूमि में अंगार से दौड़ गए! बाबा के महामन्त्र ने अपना काम किया था, लेकिन, कुछ नहीं हुआ था! वहां के रहने वाले सर्प तो कभी के नीचे, गहरे ज़मीन में जा उतरे थे! यहां देखा जाए, तो लड़ाई मात्र शक्ति की ही थी, दबदबे की! हैरत ये, की बाबा ने कुछ सीख कर हांसिल किया था, और दूसरे प्रतिद्वंदी के रक्त में ही शक्ति वास करती थी, उसकी नैसर्गिकता में! बाबा आगे बढ़, उस स्थान का पुनः अवलोकन किया!
"सामने आ!" बोला वो ललकार कर!
"ढाढर, समय है!" बोला वो,
"तू कौन होता है समय देने वाला?" बोला बाबा,
"मैं गौणक हूँ!" आयी आवाज़,
"सामने आ फिर!" चीखा वो!
गौणक सम्मुख नहीं आ रहा था, वो जानता था, कि बाबा की बुद्धि, विवेक तो सट्ठ हो चुके हैं, कुकुरमुत्ते की तरह से, बड़े तो हैं परन्तु खोखले हैं! और दूसरा कारण ये, कि बाबा द्वारा प्रयोग किये मन्त्रों का आदर भी उन्हें करना ही था! ये अब एक अलग बात है, कि उस टोनक-मन्त्र को काट दिया जाएगा! इस से मन्त्र का अपमान नहीं होगा, मन्त्र के ईष्ट का मान भी रह जाएगा! क्योंकि, जो मन्त्र प्रयोग किया जाता है, उसके ईष्ट द्वारा ही, उसकी काट भी रखी जाती है! बस, बाबा यही नहीं समझ रहा था! यही समझ लेता वो अगर, तो अवश्य ही कुछ नहीं होता!
गौणक, ये, एक रक्षक है! अक्सर, धन पर, स्थान पर, पूजा कर, बिठाया जाता है! मध्य प्रदेश में, दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, गौण बाबा भी कहते हैं इसे! ये कभी किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाते, भले ही किसी मार्ग के बीचोंबीच बिठाये गए हों, अथवा किसी खेत-खलिहान में! इनका मात्र एक ही उद्देश्य होता है, कि जिस कार्य हेतु उनको बिठाया गया, उसे वो पूर्ण करें!
ग्वालिया के आसपास के जंगलों में, ऐसे मैंने कई स्थान देखे हैं, वहां, अकूत धन-सम्पदा दबी है, रक्षक यही हैं, न जाने कब से वे उस धन की रक्षा में बैठे हैं! दक्षिण भारत के एक मन्दिर से जो धन-सम्पदा प्राप्त हुई, उसमे एक तीसरा कक्ष भी है, जिसके कपाट पर दो नाग बने हैं, जैसे रक्षण में ही बैठे हों! और असल में, वे बैठे ही हैं, यहां गौण बाबा और वशिम्भ नाग सरंक्षक हैं! ये द्वार किसी भी प्रकार से खोला नहीं जा सका है! आगे की भगवान जाने!
"अवसर न गंवा?" आयी आवाज़,
"तू सम्मुख क्यों नहीं आता है?" गरज कर बोला बाबा,
"ढाढर, मान जा!" आयी आवाज़,
"ढाढर ने आज तक अपनी ही चलाई है!" बोला बाबा,
"मान जा!" आयी आवाज़,
"तू नहीं मानेगा?" बोला बाबा,
और अपने हतः में लिए उस दंड को ऊपर किया, मन्त्र पढ़ा, घूमा एक बार और वो दंड, भूमि से छुआ दिया! ज़मीन तो जैसे हिल ही पड़ी! लेकिन उसके बाद में, न कोई सर्प ही दिखा, न कोई सर्प आहत ही हुआ!
बाबा फिर से आगे बढ़ा, दंड हाथ में लिया, आसपास देखा उसने, दूर दूर तक अँधेरा था अब, अब कोई प्रकाश नहीं था! बाबा बड़े जीवट वाला था! वो जानता ही था कि क्या करना है!
अब बाबा ने एक बार, उल्लव-विद्या ही प्रयोग करनी चाही, इस विद्या से, भूमि के अंदर तक देखा जा सकता है! और कुछ दूरी का भी अंतर स्पष्ट किया जा सकता है! जिस वस्तु का ध्यान करना हो, यदि वो वहां है तो दिखा जायेगी, अन्यथा नहीं! ये विद्या अक्सर ही सपेरों के पास हुआ करती है! वे इसका प्रयोग किया करते हैं, परन्तु, मैंने तो अभी तक ऐसा कोई नहीं देखा, जो इस विद्या का जानकार हो! अगर होगा भी, तो वो दफनी-धन में प्रयोग कर रहा होगा, ऐसे कुछ कारीगरों के विषय में अवश्य ही सुना है मैंने!
बाबा ने उस विद्या का सन्धान किया, नेत्र खोले तो चमचमा गए नेत्र! नीचे तो अथाह धन गड़ा था! परन्तु, ऐसे धन का लाभ क्या जो मृत्यु समान हो! वही बात कि ऐसा सोना किस काम का जो कान काटे!
बाबा हंस पड़ा! पता नहीं, वो धन सत्य में था भी या नहीं, या फिर मात्र माया ही थी! कुछ भी सम्भव था होना! ये अब बाबा पर ही निर्भर करता था कि वो करे क्या? क्या धन के लिए प्राण गंवाए? या फिर...लौट जाए...समझकर...वापिस!


   
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श्रीशः उपदंडक
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बाबा पर न सिर्फ लालच का भूत चढ़ा था बल्कि, अपनी शक्ति का मद भी अब सर चढ़ कर बोल रहा था! कोई समझदार रहा होता, तो सम्भवतः कुछ प्राप्त कर भी लेता आशीष स्वरूप, या फिर, धन भी मिल सकता है कुछ! लेकिन बाबा को तो अपार धन चाहिए था!
उस स्थान पर, अब अँधेरा था, कुछ प्रकाश था तो बस चाँद की चांदनी का! इतना भी प्रकाश नहीं था कि सामने खड़ा कोई दीख ही जाए! लेकिन बाबा को तो जैसे सब दिखा रहा था! वो अकूत धन! वो सम्पदा!
"लौट जा!" फिर से आवाज़ गूंजी!
"सामने तो आ?" बोला वो,
"अब और अवसर नहीं!" गूंजी आवाज़!
"तू होता कौन है?" बोला वो, अकड़ कर!
"मैं इसी स्थान का प्रहरी हूँ!" आयी आवाज़,
"प्रहरी?" बोला वो, और हंसने लगा!
"ये अकूत धन, अब मेरा है!" बोला वो,
"भूल न कर!" आयी आवाज़!
"नहीं मानेगा ऐसे?'' बोला वो,
"जो सम्भव हो!" आयी आवाज़!
"तो देख फिर?" बोला बाबा, और बैठ गया वहीँ!
"छौहन?" चिल्लाया वो!
न सुनी शायद साधू ने!
"छौहन?" चिल्लाया फिर से,
"हाँ जी? बाबा?" आयी आवाज़,
"आ इधर?" बोला वो,
"अंदर?'' पूछा साधू ने,
"हाँ, सामान ले आ मेरा!" बोला वो,
और तब, बीनू को भी संग ले आया साधू! मारे भय के पाँव कांपे जा रहे थे दोनों के!
"लो बाबा!" बोला बीनू!
"सुन?" बोला बाबा, अपना सामान टटोलते हुए!
"हो?" बोला बीनू!
"जिसको प्रान का डर हो? भाग जाए!" बोला वो,
अब साधू ने देखा बीनू को, और बीनू ने देखा साधू को! भाग जाएँ तो प्राण बचें! और बाबा के संग रहें, तो धन भी मिले! दोनों की बुद्धि की ओखली में, विवेक का चूरा पड़ा, और लालच के मूसल ने, कूटना शुरू किया!
"बाबा?'' बोला साधू,
"बोल?" बोला वो,
"हम संग ही हैं!" बोला साधू!
"शाबास!" बोला बाबा,
"आप पर तो पूरा भरोसा है!" बोला साधू!
"न टूटे भरोसा!" बोला बाबा,
"जय हो महाराज!" बोला बीनू!
"छौहन?" बोला बाबा,
"जी?" बोला वो,
"पुतली निकाल?" बोला वो,
"अभी जी!" बोला साधू,
टटोला अपना सामान और निकाल दी पुतली बाहर! पुतली के काले कपड़ों में, सितारों की से चमक वाले कांच लगे थे!
"जो है सम्भल जा!" बोला बाबा,
और पुतली को रखा गोदमें अपनी! और पढ़ने लगा मन्त्र! पुतली को जैसे क्रोध चढ़ा था, हर तरफ, शक्ति का ताप बढाती गयी!
"भाग गए क्या?" बोला साधू,
"ना!" बोला बाबा,
"फेर?" पूछा साधू ने,
"कील रहा हूँ!" बोला वो,
और खड़ा हुआ! पुतली के बाजू से हर तरफ की दिशा को बांधना शुरू किया! ये पुतली, ऐसा करने में समर्थ है!
"जो है, वो रहेगा!" बोला बाबा,
मट्ठ बुद्धियों को कुछ न आयी समझ!
"जी बाहर, वो न आएगा!" बोला वो,
उसका अर्थ था, कि यहां इस स्थल पर, अब कोई बाहरी नहीं आएगा, यहां उस गौणक और इस बाबा के बीच ही लड़ाई रहे! ये था उद्देश्य!
"चाल?" बोला बाबा,
और चल पड़ा आगे, चलता, क़दम रखता और जैसे किसी कीड़े को मार रहा हो, ऐसे पंजा रखता अपने पाँव का!
 

   
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श्रीशः उपदंडक
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वाह! बाबा की हिम्मत के क्या कहने! साथ खड़ी मौत से ही गले लगने को तैयार! और ऐसा कैसे? इसलिए कि अभी बाबा के पास, सम्भवतः कुछ और भी था! ये जो बाबा कर रहा था, के पुतली-घाड़क हुआ करता है! अक्सर इस से, तंत्र भी किया जाता है, मोहन भी, उच्चाटन भी और मारण भी! इसके कई प्रयोग हैं! ये उन्हीं में से एक था!
"चाल री!" बोला वो,
और उस पुतली को, दोनों हाथ
  से पकड़, आगे चलता रहा! वे दोनों महामूढ़ देखते रहे कि क्या कर रहा है ये ढाढर!
"री चाल?" बोला वो,
शायद, पुतली रुक गयी थी, या फिर, रोक दी गयी थी!
"चाल री?" बोला वो,
और हिलने लगा तेज तेज!
"चाल? कैसे?" बोला वो,
आगे नहीं बढ़ा वो और वहीँ हिलता-डुलता रहा, अवश्य ही किसी शक्ति ने रोक दिया था उसको!
"मेरी जोरू? चाल?" बोला वो,
नहीं बढ़ सका आगे! ज़रा सा भी, बस ऐसे करे जैसे दोनों पाँव उचका उचका कर, हिल रहा हो, नाच रहा हो!
"रात बुलाऊंगा!" बोला वो,
और हंस पड़ा!
"चाल अब?' बोला वो,
और अब फिर से आगे बढ़ने लगा वो! 
"थम जा! थम जा री रा** मेरी!" बोला वो,
और रुक गया बाबा इतना बोल! धम्म से नीचे बैठ गया! गोद में बिठा लिया उस पुतली को, सर पर हाथ फेरा उसके!
"हो! भाजण मेरी!" बोला वो,
और उस पुतली के स्तनों पर हाथ रखा उसने, किया चेहरा उस पुतली का अपनी तरफ!
"खसम हूँ!" बोला वो,
वे दोनों, कब नीचे गिर पड़ते, कुछ नहीं पता था, ये देख!
"सुहागण रेनी है?" बोला बाबा,
हंस और उस पुतली पर पूरा हाथ फेरा उसने!
"जा, बता दे! बता दे! खा जा! जो मिले, खा जा!" बोला वो,
और पुतली को, ज़मीन पर बिठाया! अब जैसे  ही बिठाया कि ज़मीन हुई भड़भड़! जैसे छान दी गयी हो ज़मीन! और, ज़मीन में से, निकलने लगे कुछ जेवर! कुछ घूमते से कलश, कुछ सिल्लियां चांदी और सोने की, कुछ छड़ें! कुछ पर्दे सोने के! ये देख, बाबा फट सा पड़ा हंसने में!
"वाह वाह री!" बोला वो,
और बुक्का फाड़ हंसने लगा!
"छौहन?" बोला वो, ज़ोर से चिल्ला कर!
"हो महाराज!" बोलते हुए भाग आया वो! वो आया तो बीनू भी भाग आया! अब जो सोने की चमक देखी, मात्रा देखी, बेहोश ही होने को होयें वो!
"देखा?" बोला ढाढर,
"महाराज!" बोला वो,
"देखा? ज़ोर?" बोला वो,
"हाँ महाराज!" बोला साधू!
अभी बाबा खड़ा होने को ही था, कि पुतली में लगी आग! सभी के होश उड़े! पुतली जलने लगी! आग, बड़ी ही ऊँची!
"नहीं! नहीं!" चीखा बाबा!
हुआ बदहवास सा, बुझाने ;लगा आग, जहां से पकड़ता, वहीँ आग दौड़े चली आती!
"भाग! भाजण! भाग!" चीखा वो!
और पुतली की कमर मुड़ी! फट! फट से टूट गयी पुतली! दो हिस्सों में! फिर दोनों हाथ, फिर पाँव और फिर धड़, जलते हुए, सर के साथ ज़मीन में उतरने लगा! बाबा पाँव मारे! पागल सा हो! और वे दोनों?: हाथ में हाथ धरे. जीभ बाहर लटकाए उस पुतली को अंदर घुसते हुए देखें! जैसे जैसे पुतली का हिस्सा अंदर जाए, वैसे वैसे वो निकला धन, अंदर को धँसता जाए!
और..धँस गया!
अब बाबा का चेहरा तमतमा उठा! दीदी आँखों के बाहर आने लगे! सर कांपने लगा! जबड़ा, भिंचने लगा! मारे क्रोध के, जैसे अभी बस, आग ही लगे, कुछ ही पलों में!
"गौणक?" चीख कर बोला वो,
वे दोनों, उसे देख काँप उठे!
"गौणक? तेरी ये मज़ाल? तो बाबा का अपमान करे? नहीं जानता मुझे? नहीं जानता न? अब जान जाएगा! अब जान जाएगा!" बोला वो, चिल्लाते हुए,
"हट?" बोला उन दोनों से, झटका देते हुए!
अब साफ़ था, वो अब अपने आप से बाहर था, अब चाहे वो मरे या जिये, जैसे उसको कुछ भान ही न रहा था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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चिल्लाते हुए, भरते हुए, गुस्से में भुनभुनाते हुए, वो चला जा रहा था! बाहर गया, और उस चतुर्भुज के पास आया! घूर के देखा चतुर्भुज को! एक लालटेन की रौशनी फड़क रही थी, कभी भी बुझ सकती थी! अब बुझे या जले, बाबा को होश नहीं था! वो गया चतुर्भुज में, और जा बैठा! हाथ हवा में घुमाए! उठाया अपना गंडासा और फेरा अंगूठा उसने उस गंडासे की धार से! खून की बूंदें छलकीं! खून इकठ्ठा किया उसने अपने दूसरे हाथ में, और ऊँगली डुबो, पांच जगह छींटे छिड़क दिए!
"गौणक?" गुस्से से बोला वो,
और हुआ खड़ा!
"गौणक? तूने मुझे कम आँका है! भस्म कर दूंगा तुझे भी! सुना? भस्म कर दूंगा! तेरी ये हिम्मत? मैंने डार(महाप्रेत भयानक) तोड़ डाले! उनसे हाथ जुड़वाँ दिए! तू? तेरी तो औकात क्या?" चीख कर बोला वो,!
एक लालटेन मन्द पड़ गयी थी, दूसरी खूब तेज जल रही थी, उसके शीशे पर, बड़े बड़े झींगुर, पतंगे, भृंग आ आकर, टकरा रहे थे! एक अजीब सी खनक की आवाज़ आती थी, शीशे से टकराते हुए वो पतंगे, अपने पाँव उठा, ज़मीन पर गिर जाते थे! उस जलते हुए कांच की दहन से, उनका ये हाल होता था!
हाल तो इस समय इस बाबा का भी था! उसने ऊपर देखा, एक मेहँदी का पौधा था, शांत, खड़ा हुआ, उसकी डालों में ततैया आदि ने, छोटे छोटे से चाहते बनाये हुए थे! वो बेचारा मेहँदी का पौधा, बन गया था गवाह इस सारे किस्से का! बेचारा वो पौधा, अगर पाँव रखता, तो भाग लिया होता वहाँ से!
दूर, एक जगह कुछ मवेशी बैठे थे, बकरियां, बैठे बैठे, जुगाली करते हुए, उधर ही देख रही थीं! बेहद ही मामूली सी रौशनी फैली थी वहां, परन्तु, इस बाबा को, सबकुछ दीख रहा था!
बाबा ने निबटाया कुछ काज, और हुआ खड़ा, ले चला अपना गंडासा हाथ में, और चल पड़ा बगिया की और! घुसने से पहले, चारों तरफ नज़र दौड़ाई! वहां, पास ही, आम के पेड़ खड़े थे! उन आम के पेड़ों में कुछ पेड़, चंपा, चमेली, गैंदे आदि के भी थे, अभी तो उनकी महक बरकरार थी! वो अंदर चला गया! और फिर से रुका! आँखें बन्द कर, कुछ पढ़ा और गंडासा अपनी गर्दन पर रख, थूक दिया ज़मीन पर!
और चल पड़ा आगे! जा पहुंचा उन दोनों के पास, घूर के देखा उन्हें, उसकी नज़रें देख, वे दोनों तो अंदर तक ही चिर के रह गए!
"छौहन?" बोला बाबा,
"ज......जी?" मारे डर के बोला साधू,
"अब ये मान का मामला है" बोला वो,
"जी...महाराज" बोला साधू,
"तूने जाना हो तो जा?" बोला वो,
"न.....न बाबा" बोला साधू,
"आये बीनू?" बोला बाबा,
"ह...ज.....जी??" बोला कांपते हुए,
"क्या बिचार है?" पूछा उसने,
"ज...जी?" पूछा बीनू ने,
"रुकेगा या लौटेगा?" बोला वो बाबा,
अब फंसा वो बेचारा बीनू! हाँ कहे, तो जान से जाए, न कहे, तो? सभी से जाए! क्या कहे?
"मह...महाराज आप बताओ?" बोला साधू से वो,
"चोप्प?" बोला बाबा,
और काँप उठा बीनू!
"चल? कायर? भाग यहां से?" बोला चीख कर बाबा!
"ब.....बा...बाबा जी..." दांत किटकिटा गए उसके!
"रुकना है?" बोला साधू,
"जैसी...मर्ज़ी" बोला बीनू!
"अब आग लगा दूंगा!" बोला वो,
"महाराज कि जय!" बोला साधू!
"आओ इधर?" बोला वो बाबा,
ले चला एक जगह, रुक गया वहां!
"गौणक?" चीखा बाबा,
और एक अट्टहास सा हुआ! बीनू की आँखें बन्द! साधू के पेट में मरोड़ उठी! और बाबा? बाबा हंस पड़ा!
"गौणक? सुन? आज या तो तू नहीं? या मैं नहीं!" गरज उठा वो बाबा,
अट्टहास मन्द हुआ, और ठीक सामने, कोई दिखा! पीले से रंग का!
"गौणक?" बोला बाबा,
और चल पड़ा सामने की तरफ! गंडासा हाथ में उठाये हुए, और वे दोनों? रेलगाड़ी के डब्बों की तरह से, पीछे चल पड़े उस बाबा के!
"क्या समझता है? ढाढर टूट गया? मर गया ढाढर? अरे! ढाढर अगर मरेगा, तो जानता है क्या होगा? जानता है?" चीख कर बोला बाबा,
साधू और बीनू उस प्रकाश को देखें!
"ढाढर मरा! तो मरेगी वो कुबड़ी भी! समझा?" इतना बोल हंसने लगा बाबा! बेहिसाब सा हंसा! गंडासा हिलाते हुए हंसा!


   
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