मित्रो, मै आपको वो ही घटना बताता हूँ जो मेरे मस्तिष्क में आज भी सुरक्षित है और जिसका कि मै यहाँ वर्णन करता हूँ, ये घटनाएं में क्रम में नहीं लिख रहा हूँ, जो मस्तिष्क में उभरती है, वही लिख देता हूँ यहाँ, इसीलिए समय-सारावली का ध्यान नहीं रख पाता, आपसे विनती है कि इन घटनाओं का क्रम आप स्वयं ही कर लें!
वर्ष २००९, की बात है, गर्मी के दिन थे, अप्रैल महीना ख़तम होने को ही था, मै उन दिनों एक साधना समाप्त करने के पश्चात कोई १० दिन पहले ही गोरखपुर से आया था, यहाँ आते ही मेरे मित्र शर्मा जी मुझे मिलने पहुंचे, कुशल-मंगल की बातें हुई, क्यूंकि मै १ महीने से उनसे नहीं मिला था, मै गोरखपुर में था और वो यहाँ दिल्ली में, शर्मा जी दिल्ली में अक्सर सारे आवश्यक कार्य निबटाते हैं, इसीलिए वो मेरे लिए बहुत महत्व रखते हैं, एक दिन रात्रि समय, कोई १० बजे उनका फोन आया और उन्होंने बताया की वो मुझसे मिलने सुबह मेरे पास आ रहे हैं, और साथ में २ और लोग उनके साथ आ रहे हैं, मामला विचित्र सा हैं, और इसी बारे में कुछ बातें करनी हैं, मैंने कहा की ठीक है कल दिन में सुबह १० बजे आप उनको मेरे पास ले आइये, मै उस रात्रि अलख में बैठा था और सुबह ४ बजे की अलख का समापन करना था, समापन के उपरांत मैंने स्नान किया और कुछ घंटे सोने के लिए चला गया,
और ठीक १० बजे सुबह, मेरे पास शर्मा जी आ गए, उनके साथ में २ और व्यक्ति थे, एक व्यक्ति सभ्रांत परिवार से सम्बंधित लग रहा था और दूसरा व्यक्ति किसान के जैसा लग रहा था, गरीबी की मार उसके कपड़ों से झलक रही थी, लेकिन वो व्यक्ति अत्यंत सौहार्दपूर्ण था, चेहरे पे मुस्कान थी उसके, दूसरा व्यक्ति थोडा तेज़-तर्रार किस्म का और नेता किस्म का लग रहा था, खैर, हमारी बात-चीत शुरू हुई...
शर्मा जी ने सबसे पहले मेरा परिचय उस जेता किस्म के व्यक्ति से करवाया,
"ये श्रीमान कपिल हैं, इनका ग्वालियर में अपना कपडे का काम है, और ग्वालियर में ही रहते हैं"
शर्मा जी के इतना कहने के बाद कपिल ने मुझे हाथ जोड़ के नमस्कार किया,
फिर शर्मा जी ने उस किसान की तरफ इशारा किया और बोले, "ये श्रीमान नन्दलाल हैं, ये दतिया से करीब ४० किलोमीटर दूर के एक गाँव पिफ्रेंडू में रहते हैं, आगे की बात ये स्वयं ही आपको बताएँगे" इतना कहते हुए शर्मा जी ने नन्दलाल को बोलने के लिया कहा,
नन्दलाल ने बोलना शुरू किया, "गुरु जी, हम ३ भाई हैं, मै सबसे बड़ा हूँ, हमारे पास कोई १० बीघे ज़मीन है, ये ज़मीन हमारे बाप-दादाओं के समय से हमारे पास ही है, हम तीनों भाईओं में प्रेम-भाव है और कोई समस्या नहीं है, जो कुछ भी खेती से मिलता है, उसी में हम तीनों भाई आपस में बराबर-बराबर बाँट लेते हैं, आजसे कोई २ महीने पहले की बात है, हमारे खेत के दक्षिण भाग में ४ पीपल के पेड़ हैं, और उनके नीचे एक चबूतरा है, ये चबूतरा किसने बनवाया, ये हमे मालूम नहीं, क्यूंकि ये चबूतरा हम अपने बालपन से देखते आ रहे हैं, आजसे २ महीने पहले मैं और मेरा सबसे छोटा भाई, खेत में पानी लगाने जा रहे थे, मैंने देखा की उस चबूतरे पर एक बड़ासा सांप कुंडली मारेबैठा है, सांप काफी बड़ा होगा, करीब १० फीट का, मै और मेरा छोटा भाई ये देख के घबरा गए, हमने सोचा कि हो सकता है, ये वहीं के कोई देवता होंगे, सो हमने उनको प्रणाम किया और अपने काम पर लग गए, लेकिन उस सांप का ख़याल अभी तक हमारे मन में डर पैदा कर रहा था, एक तो हमारे जानवर वहाँ चरने जाते हैं, और दूसरा ये कि उस चबूतरे के पास ही गाँव में घुसने का एक और रास्ता है, जहाँ से छोटे बच्चे पढ़ाई करने विद्यालय जाते हैं, यदि किसी को इस सांप में डस लिया तो मुसीबत हो जाएगी, ऐसा सोच के हम फिर से उस चबूतरे पर चल दिए, हमने देखा, कि सांप चबूतरे के एक कोने में से चबूतरे के अन्दर घुस रहा है, अब हम और डर गए, क्यूंकि ये चबूतरा हमारे ही खेतों में है"
इतना कहते हुए नन्दलाल थोडा रुका, खांसा, और फिरसे कहना शुरू किया..
"वो सांप कैसे रंग का था?" मैंने पूछा,
"जी, काले रंग का नहीं था, कुछ पीला और कुछ काला था" नन्दलाल बोला,
"अच्छा फिर, क्या हुआ?" मैंने सवाल किया,
"गुरु जी, ये बात हमने अपने एक दो लोगों को बतायी, उन्होंने कहा कि देवता हैं, उनकी पूजा, अर्चना करो, उनको दूध पिलाओ, और हमने ऐसा ही क्या, शाम ढलते ही हम एक मिटटी के बर्तन में दूध लेके जाते और चबूतरे के पास रख देते, लेकिन, २ दिन, ४ दिन, हप्ता गुजर गया लिया दूध वैसा का वैसा ही रहता, और कमाल ये कि वहाँ तो अब कोई कुत्ता आदि भी नहीं आता था जो दूध ही पी ले!" नन्दलाल थोडा गंभीर होकर बोला,
"लेकिन हमारा डर हमारे ऊपर हावी रहा, तब एक व्यक्ति ने जो कि गाँव में पढ़ा-लिखा है, रिटायर्ड फौजी है, कहा कि किसी सपेरे आदि को बुलाओ और ये सांप पकड के जंगल में दूर कहीं छुडवा दो, ये सलाह हमको पसंद आई, और इस तरह से मै अपने एक भाई के साथ झांसी निकल पड़ा, झाँसी हमारे यहाँ से ३४ किलोमीटर पड़ता है, वहाँ एक सपेरे से मुलाक़ात हो गयी, उसने कहा कि वो सांप पकड़ लेगा लेकिन १000 रुपये भी लेगा, हमने सोचा कि चलो इतने पैसों में इस समस्या से निजात मिल रही है तो ठीक है, सपेरे ने कहा कि वो आधे पैसे अभी लेगा और आधे पैसे बाद में, हमने उसको पैसे दे दिए, सपेरे ने कल दोपहर में आने का समय दिया, किराए के पैसे लिए सो अलग, वो हमने दे दिए, और हम वापिस अपने गाँव आ गए" नन्दलाल बोला,
"फिर क्या हुआ?" मैंने उत्सुकता से पूछा,
"अगले दिन १ बजे करीब वो सपेरा आ गया, अपने साथ दो और लोगों को लेकर आया था, एक कि उम्र होगी यही कोई ५०-७५ और दूसरा कम उम्र का था, कोई २०-२२ बरस का, उन्होंने अपना सामान निकाला और हमसे चबूतरे तक उनको ले जाने को कहा, हम उठे और उसको उस चबूतरे तक ले गए, उस्सने वहाँ आस-पास देखा और थोड़ी सी लकड़ियाँ इकठी करके चबूतरे के आस पास आग लगा दी, यानी कि चबूतरे के तीन तरफ, उसने बताया कि सांप कहीं भागे नहीं इसीलिए ऐसा कर रहे हैं, उन्होंने एक सब्बल मंगवाया और चबूतरे के ऊपर के पत्थर निकालने लगे, काफी मेहनत वाला काम था वो, आखिर १ घंटे बाद वो पत्थर हटा दिया, नीचे काफी अँधेरा था, मैंने मोबाइल फोन की टोर्च जलाई तो अन्दर देखा तो एक रास्ता सा दिखा, सिर्फ डेढ़ फुट चौड़ा, हमारे तो होश उड़ गए! ये क्या चीज़ है?" नन्दलाल ने आँखें चौड़ी करके कहा..
"फिर, फिर क्या हुआ? इस बार शर्मा जी ने प्रश्न किया,
"जी, उसके बाद सपेरे ने कहाँ की २-४ बाल्टी पानी लाओ, और उसने १ बाल्टी पानी अन्दर डाला, और जैसे ही उसने दूसरी बाल्टी पानी की डाली, अन्दर से बड़ी भयानक फुफकारने की आवाज़ आई, मै, और वहां खड़े लोग पीछे हट गए, और तब....."
"तब क्या हुआ?" शर्मा जी ने पूछा,
"तब गुरु जी, उस रास्ते से, न जाने कहाँ से हज़ारों, सांप बाहर निकले, काले, सफेद, पीले, मटमैले, छोटे, बड़े, ये देख के हमारी चीख निकल पड़ी, हम फ़ौरन वहाँ से भागे, सपेरा भी अपना सारा सामान वहाँ से छोड़ के भागा, हम पीछे की तरफ दौड़े, और एक ऊंचे से पत्थर पर चढ़ गए, पूरे खेत में सांप ही सांप! बड़ा भयानक दृश्य था गुरुजी वो, और फिर कोई १० मिनट के भीतर वो सारे सांप जैसे आये थे, वैसे वापिस चल भी गए" नंदलाल ने चाय का एक यूंट पीते हुए ये कहा, चाय तब तक आ ही चुकी थी,
मामला सच में ही विचित्र था, मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी, मैंने फिर से नन्दलाल को देखा और कहा,
"उसके बाद तुमने क्या किया?
" उसके बाद तो हमारी हिम्मत ही जवाब दे गयी, क्या करें या न करें, १५ दिन इसी कशमकश में बीते, मै तब जाके इन कपिल से मिला, ये मेरे बचपन का दोस्त है, ये अब ग्वालियर में रहता है और मै अभी भी गाँव में ही" नन्दलाल ने बताया,
"मैंने अब कपिल की तरफ देखा, अब कपिल ने कहना शुरू किया,
"गुरुजी, ये सब सुनने के बाद यकीन न करने का तो कोई सवाल ही नहीं था, मैंने अपने १-२ जानकारों से ये बताया, उन्होंने कहा की वो एक तांत्रिक को जानते हैं, वो उनको लेकर वहां आयेंगे और तब वो बताएँगे की क्या करना है, मै इन लोगों के साथ उस तांत्रिक के पास पहुंचा, उसने सुना और बोला, काम हो जाएगा, अगर सिर्फ सांप भगाने ही हैं तो कुल रकम २५,000 रुपये लगेंगे, ये रकम नन्दलाल के लिए काफी बड़ी थी, सो मैंने दे दिए"
कपिल ने बताना जारी रखा.........
"उस तांत्रिक जे आने वाली अमावस को आने को कहा, अभी अमावस आने में ४ दिन बाकी थे, सो मै ग्वालियर में ही रहा तब तक और फिर अमावस वाले दिन नन्दलाल के गाँव पहुँच गया, करीब २ घंटे के बाद वो तांत्रिक भी वहां आ गया, आते ही उसने कहा की चबूतरे पर चलो, हम चबूतरे के लिए चल पड़े, गुरुजी, ये चबूतरा, ८ गुजा ८ फीट का है, तांत्रिक ने क्रिया आरम्भ की, थोड़ी देर तक कुछ नहीं हुआ, और उसके बाद चबूतरे में से धुआं निकलना शुरू हो गया, हम घबरा गए, हवा में दुर्गन्ध फैल गयी, रुकना मुश्किल हो गया वहाँ!" कपिल बोला,
"लो मैंने सारे सांप, भस्म कर दिए! काम ख़तम!" तांत्रिक ने बोला,
"गुरु जी, हमारी जान में जान आ गयी!, हमने सोचा की चलो समस्या खतम, तांत्रिक ने अपना सामान उठाना शुरू किया ही था कि अचानक, ज़मीन सी हिली, सन्नाटा छा गया, और तभी वो सांप, बड़े वाला बाहर निकला, फुफकारता हुआ, तांत्रिक की तरफ फुफकारा, तांत्रिक भागा, और जब वो भागा तो हम उससे भी तेज़ भागे, तांत्रिक डर गया, सांप वहाँ कुंडली मारके बैठ गया, हमने दूर से उसको देखा, वो ज़मीन में अपना फन पटक रहा था, जैसे कह रहा हो कि अब नहीं आना, नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा"
ये बात अब नन्दलाल ने कही,
"अब तो जान मुसीबत में थी, तांत्रिक ने बताया कि ये कोई बहुत बड़ी बला है, और उसे ११ दिन लगेंगे अपनी पूजा करने में ताकि वो इससे निबट सके, हमारे पास कोई और चारा नहीं था उसका इंतज़ार करने के अलावा, इसी तरह ११ दिन बीत गए, १२ वां भी बीत गया, और आज २७ दिन हो गए, तांत्रिक का कोई अता-पता नहीं है, उसकी जगह गए तो उसके चेले-चपाटों ने बताया कि वो पूजा करने बरेली गए हैं" नन्दलाल जे कहा....
मैंने गौर से सारी कहानी सुनी, कपिल से भी और नन्दलाल से भी, अब ये दोनों मेरे पास किसी उम्मीद से आये थे, तो ये मेरा कर्तव्य था की उनकी भरसक मदद करूँ, मैंने उनको एक-दो दिन में फ़ोन करने की बात कही, वो तब तक दिल्ली में ही सरिता विहार में ठहरे हुए थे, उन्होंने कहा की ठीक है फ़ोन आने के बाद वो दुबारा आ जायेंगे, औरये कह केवे दोनों वहाँ से चले गए!
शर्मा जी ने उत्सुकता से मुझसे पूछा, "गुरु जी, ये क्या माजरा हो सकता है? समझ में नहीं आ रहा मुझे तो?"
मैंने कहा," शर्मा जी, इसकी दो ही कारण हो सकते हैं, पहला ये की उस चबूतरे के नीचे कोई रहस्य दबा हुआ है, और दूसरा ये कि ये सांप वास्तव में कोई स्थानीय देवता हो भी सकता है, लेकिन ये तो हमको वहाँ जाने से, देखने से ही पता चलेगा, आप एक काम करो, इनको कल फ़ोन करो कि हम इस इतवार को दतिया आ रहे हैं, और ये हमे वहीँ मिलें, वहाँ से हम आगे के लिए चलेंगे"
"ठीक है, मै फ़ोन कर दूंगा, और बता दूँगा कि इस इतवार को हम दतिया आ रहे हैं", शर्मा जी ने कहा,
"ठीक है, आप ऐसा ही करें" ये कह के मै अपने कमरे में चला गया और शर्मा जी अपने काम से चले गए,
मै अपने कमरे में आके लेटा और आगे की योजना बनाने लगा, कुछ सोचा-विचारा और आराम करने लगा!
दतिया, अपने समय की रियासत रहा है, मध्य प्रदेश में स्थित ये जगह दिल्ली से ३२० किलोमीटर दक्षिण में पड़ती है, यानि की ग्वालियर और झांसी के बीच में, झांसी से ३०-३५ किलोमीटर पहले ही पड़ता है, भूमि अधिकाँश पथरीली ही है!
कार्यक्रम कुछ ऐसा बना की कपिल ने इतवार को एक गाडी बुक करा ली, वो नियत समय पर इतवार को सुबह ७ बजे नन्दलाल के साथ पहुँच गया, मै और शर्मा जी पहले से ही तैयार थे, सो उनके आते ही गाडी में बैठ गए और दतिया के लिए रवाना हो गए.....
हम करीब ३ बजे दतिया पहुंचे मगर आगे गाँव तक जाने में २ घंटे और लग गए, रास्ता इंतना खराब की कही कहीं तो सड़क ही नहीं थी, बस ऊबड़-खाबड़ रास्ता और मोटे-मोटे पत्थर!
आखिरकार शाम ५ बजे हम गाँव पहुँच गए, धूल-धक्कड़ बहुत थी तो अब नहाना ज़रूरी था, तो मै और शर्मा जी नहाए और उसके बाद क्रिया करने की तैयारी आरम्भ कर दी, क्रिया हेतु हमको एक छोटा सा कमरा दिया गया था, मैंने उनसे कहा कि ७.३० बजे शाम को वो मुझे चबूतरे पर ले जाएँ, वो राजी हो गए, हमने ७ बजे तक क्रिया समाप्त कर ली, तैयार हुए, मालाएं, और अन्य वस्तुएं धारण कि और चबूतरे कितरफ बढ़ चले, दिन अभी पूरी तरह ढला नहीं था, ये अच्छा था हमारे लिए, चबूतरा दीखते ही मैंने बाकी लोगों को वहाँ रोक दिया और शर्मा जी के साथ वहां चल पड़ा, चबूतरा कोई ८ गुना ८ फीट का होगा, पत्थरों से बना हुआ, एकदम मजबूत, बनाने वालों ने काफी मेहनत से बनाया होगा, चूंकि ये काफी पुराना था, इसीलिए कई जगह से टूट-फूट चुका था, उसके आस-पास कि ज़मीन भी पथरीली थी, मैंने अपने को और शर्मा जो को प्राण-रक्षा मंत्र से बाँधा और जहां से पत्थर हटा हुआ था, वहां चल दिए, कोई हरकत नहीं हुई, टोर्च हम साथ लाये थे, मैंने टोर्च जलाई तो अन्दर एक रास्ता दिखा, डेढ़ फीट चौड़ा और उसकी एक एक सीढ़ी कोई १ फुट कि होगी, अन्दर कोई हरकत नहीं हो रही थी, मै और शर्मा जी वहाँ खड़े रहे, मैंने मंत्रोचारण आरम्भ किये और पढ़ी हुई लोग अन्दर फेंकी, एकदम हरकत हुई, कोई ऊपर आ रहा था, मै तैयार था, ये वो ही सांप था जिसका कि जिक्र नन्दलाल और कपिल ने किया था, वो सांप ऊपर आया और हमको देखते ही मुड़ा और अन्दर भाग गया, मेरा एक संदेह तो ख़तम हो गया, ये कोई स्थानीय देवता नहीं है, ये यहाँ पर कैद है, किसी ने कैद किया हुआ है इसको....
मैंने सांप को देख लिया था, लेकिन एक चीज़ और मैंने देखी थी, वो सीढियां कोई १० फीट की होंगी, ऊपर आने तक उसको उतना वक़्त नहीं लगना चाहिए था जितना की उसने लगाया था, इसका मतलब अन्दर सीढ़ियों के पास दूरी काफी है वहाँ की जहां ये रह रहा है!
मै और शर्मा जी वापिस आ गए, नन्दलाल और कपिल को कहा की हम ये काम अब कल सुबह करेंगे, फिर रात्री समय खाना खाया, मदिरा पी और सो गए,
सुबह कोई बजे हम फिर से तैयार होके वहाँ चल दिये, वहां जब पहुंचे तो वहाँ काफी पानी पड़ा हुआ था, न जाने क्या बात थी, न तो बारिश ही हुई थी और न ही कोई यहाँ आके पानी डाल सकता था, काहिर, मैंने जन्दलाल को कहा की ४ आदमी लाये और जहां मै कहता हूँ वहाँ खोदे, आदमी हिम्मत वाले थे, फ़ौरन तैयार हो गए और खोदना शुरू कर दिया, आधे घंटे बाद चबूतरे का एक बड़ा सा पत्थर अन्दर धंस गया, , और हम उसको, उसकी आँखें अंगारों की तरह दहक रही थीं, वो रेंग के, फन उठा के नीचे उतरा, मैंने अब शक्ति प्रयोग किया, सांप मेरी शक्ति से ऊपर उठा और धडाम से नीचे गिरा, ऐसा उसके साथ ४ बार हुआ, अब वो अपने आकार से छोटा हो गया, उसका फुफकारना बंद हो गया, वो पीछे मुड़ा और हम उसके पीछे चले, वो हमको एक हौदी के पास लाया और हौदी में घुस गया, मैंने हौदी को देखा, ये हौदी ४ गुना ६ की होगी, मैंने हौदी में झाँका वहाँ कई तरह के सांप रेंग रहे थे, लेकिन सभी मायावी सांप! मैंने मंत्र-प्रहारसे वो ग़ायब कर दिए! अब सिर्फ वो ही एक सांप बचा! सांप नीचे गया,
शायद नीचे और भी कोई जगह होगी, और बाहर आया और फन फैला के बैठ गया! मैंने देखा वो जहां बैठा है वहां एक छोटासा मटका पड़ा है, मैंने वो मटका उठाया, बिलकुल सांप की गर्दन के पास में से
वो मटका, एक मिट्टी के तश्तरी से बंद था, मैंने उसको तोड़ा, और अन्दर हाथ डाला, अन्दर कुछ धातु के गोल-गोल टुकड़े से मालूम पड़े, खैर मैंने वो मटका शर्मा जी को दे दिया और हौदी में उतर गया, हौदी कोई ढाई फीट गहरी होगी, सांप अब कुछ नहीं कह रहा था, हार मान चुका था अब तक, मैंने जैसे ही हौदी में छलांग लगाई, हौदी के एक दो पत्थर अन्दर धसके, मै घबरा गया, मैंजे टोर्च ली और अन्दर की तरफ रौशनी की, जिस हौदी पे मैं खड़ा था, उसके नीचे भी एक बड़ा सा हॉलनुमा कमरा था! मेरी आँखें फटी की फटी रह गयीं! वहाँ करीब ५०० बड़े-बड़े मटके पड़े होंगे! अब मै समझ गया था सारा माजरा!
मैंने शर्मा जी से कहा, "शर्मा जी, हमे फिरसे इस सांप को पहले जैसा बनाना पड़ेगा, ये यहाँ नीचे रखे धन की रक्षा कर रहा है, इसको करने दो, जब तक इस धन का असली वारिस यहाँ नहीं आता ये रक्षा करता रहेगा, हम ये धन नहीं ले सकते, इस पर हमारा हक नहीं है, इसने हमको ये मटकी दी है, और हो न हो इसमें भी सोना ही है"
मैंने फिर से शक्ति का आहवान किया और उसे उस सांप पर डाल दिया, सांप फिर से पहले जैसा हो गया, हमने सांप से क्षमा मांगी और बाहर की तरफ चल दिए, सांप वहीं बैठा रहा!
वो मटकी शर्मा जी ने अपने पास रखी और हम वापिस नन्दलाल के पास आ गए, वो बेचैनी से वहाँ इंतज़ार कर रहे थे, मैंने कहा अब सब ठीक है, समस्या का अंत हो गया,
रात्रि समय, मै और शर्मा जी अकेले ही थे तब, खाना खा चुके थे, मैंने शर्मा जी को कहा कि वो मटकी लायें और देखें कि उसमे क्या है? शर्मा जी मटकी लाये, और चारपाई पर तौलिया बिछा कर मटकी खाली कर दी, उसमे से सोने के १८७ सिक्के निकले, कुल वजन २५० ग्राम तो होगा ही! सिक्के काफी पुराने, हाथ के ढले जैसे लगते थे, मैंने कहा कि शर्मा जी जैसा सुबह मै कहूँ वैसा करना, मै अभी आपको बताऊंगा कि क्या करना है, मैंने उनको बताया और ये कह के मै सो गया!
सुबह नन्दलाल और कपिल को बुलाया शर्मा जी ने कहा,
"सुनो यहाँ एक मंदिर है पुराना, ज़मीन के नीचे, शायद पहले कभी भूकंप में धसक गया होगा, अब आपने एक काम करना है, इस चबूतरे पर ही एक मंदिर बनाना है, अब वो सांप नहीं आएगा, वो उस मंदिर का रक्षक है"
"ठीक है साहब हम मंदिर बनवा देंगे, लेकिन वक़्त लगेगा, मै जानता था 'वक़्त कि वजह! मैंने कपिल और नन्दलाल को शुक्रवार को दिल्ली बुलाया और हम वापिस दिल्ली कि ओर रवाना हो गए!
मंदिर बनते ही वहाँ कोई खुदाई करने कि सोचेगा भी नहीं! ऐसा मैंने सोचा!
तब तक शर्मा जी ने उन सिक्कों में से कुछ सिक्के बेच दिए थे, ३.५ लाख रुपये मिले थे, शुक्रवार को शर्मा जी ने वो पैसे लिए और कपिल और नन्दलाल के साथ मंदिर कि नींव रखवाने दतिया रवाना हो गए!
आपको धन्य हो गुरुजी, हम जैसा कोई साधारण मनुष्य तो लालच, लोभ आदि का पुतला मात्र होता है, आप मानव श्रेष्ठ, आप धन्य हो 🌹🙏🏻🌹
