मैं फिर से, करवट ले, सोने की कोशिश करने लगा...लेकिन अब नींद का जो ज़ोर था, अब वहीँ छूट गया था, मैंने कोशिश तो की सोने की, लेकिन नींद ही न आये! बल्कि, एक सुरूर सा छाये! बैठूं तो और लेटूं तो! घड़ी पर नज़र डाली तो अभी कम से कम तीन घण्टे और लगने थे! अब कैसे कटें ये तीन घण्टे? जान पर बन आयी! खैर, नीचे उतर आया, आते ही जूते पहन लिए, चला दरवाज़े की तरफ और बाहर झांकने लगा! बाहर, खेत दिखाई दिए, पेड़ बड़े बड़े, कुछ छोटी छोटी सी नहरें और नाले भी! उन सभी से पार होते हुए हमारी गाड़ी भागती जा रही थी! कुछ देर वहीँ खड़ा रहा, लोग आते रहे, जाते रहे और मैं खड़ा खड़ा, उनसे पहले ही पहुंचता रहा कोलकाता!
वापिस जा कर, फिर से बैठ गया, मेरे साथ वाले लड़के ने अब वो बर्थ ले लिया था, मैं बैठा रहा चुपचाप! और सफर, गुजरता रहा!
दोस्तों!
मैं करीब चार बजे के बाद उस जगह, उस स्टेशन की झलक लेने के लिए बाहर की तरफ, दरवाज़े तक गया! अब नीचे लाइन में, कैंचियां पड़ने लगी थीं और ये निशानी थी की बस अब कुछ ही दूर रह गयी है मेरी मन्ज़िल!
और फिर...गाड़ी धीरे होनी शुरू हुई, हॉर्न पर हॉर्न मारने लगी! फिर दिखाई देने लगा मुझे प्लेटफॉर्म! बस अब कुछ दूर ही! बस कुछ दूर ही! कहने को मैं उनसे छह या सात घण्टों की दूरी पर ही था, पर लगा जैसे मैं कहीं दूरस्थ स्थान की तरफ यात्रा करने निकला हूँ! गाड़ी धीरे हुई, और धीरे होते होते, रुक गयी! लोग बाहर की तरफ दौड़ने लगे! कुली लोग वहीँ आ डटे! मैंने जगह बनाई और नीचे उतर गया! ओह! कैसे अपनी ही सी जगह लगी वो! मेरा हावड़ा स्टेशन! मेरा ही सबकुछ! वही एक छोटा सा भारत! मैं बाहर की तरफ चला, और निकल आया, सामने जहां मैं खाना खाता था, वहीँ की तरफ चला, खाना तैयार ही था! मैंने हाथ-मुंह धोये, सामान एक जगह टिका कर रख दिया और तब, माछ-भात के लिए कह दिया! कुछ ही देर में, खाना मेरे सामने आ गया था! मैंने तो टूट कर खाया वो खाना! मुझे उस दिन पता चला कि मुझे उस जगह के खाने से ही लगाव हो चला था! मैंने खूब खाया! और बाद में एक गाढ़े दूध की चाय भी पी ली! करीब आधे घण्टे बाद पी थी मैंने ये चाय! आसपास टटोल रहा था मैं, लोगबाग आ जा रहे थे, कोई कैसे और कोई कैसे! आखिर मैंने पैसे चुकाए और अब भाड़े की टैक्सी लेने चल पड़ा! घड़ी में देखा तो पांच से थोड़ा ज़्यादा का वक़्त था! और मैं पहुंचा टैक्सी लेने, बात हुई और मैं बैठ गया उसमे, बात ये भी तय हुई थी कि कुछ और सवारियां मिलेंगी तो उन्हें भी बिठाया जा सकता है! मुझे क्या गरज़ किसी से! मुझे मेरी मन्ज़िल पर उतरना था, बस! किराया चुकाता और नमस्ते!
तो टैक्सी मुड़ गयी, कुछ और सवारियां भी मिल गयीं और हम निकल पड़े वहां से! ये अच्छा था कि मुझे ये अंदर, उसी जगह तक छोड़ कर आती टैक्सी!
करीब चालीस मिनट बीते और हम उस जगह के लिए अंदर आ गए, पहले एक बस्ती पड़ी, वहां दो लोग उतर गए, अब ए ब्लॉक पार हुआ, और फिर बी ब्लॉक आ गया, यहां एक और आदमी उतर गया, उसके पास कुछ सामान था, वो निकाला उसने, और पैसे चुका, वो भी चला गया! और चालक अंदर आ बैठा तब!
"आप?" बोला वो,
"सी ब्लॉक!" कहा मैंने,
"वहां?" बोला वो, बड़ी ही हैरत से,
"हाँ? क्या हुआ?" पूछा मैंने,
"वहां तो कुछ नहीं?" बोला वो,
"मतलब? कुछ नहीं?" पूछा मैंने,
"कहाँ जाओगे उधर?" बोला वो,
"अस्पताल तक?" कहा मैंने,
"रास्ता तो खुदा है उधर?" बोला वो,
"कब खुदा?" पूछा मैंने,
"साल से ज़्यादा हुआ?" बोला वो,
"क्या कहते हो?'' पूछा मैंने,
"आप मकान नम्बर बताओ?" बोला वो,
मैंने बताया उसे नम्बर तब, वो सोच में पड़ा और मुझे देखा,
"चलो, आपको वहीँ छोड़ दूँ!" बोला वो,
और हम चल पड़े आगे के लिए, यहां से अंधेरा जैसे पीछे लग गया, कोई रौशनी नहीं, कोई उजाला नहीं...
टैक्सी बढ़ चली आगे, और गलियों से होती हुई एक जगह आ रुकी! मैंने बाहर झांक कर देखा!
"ये कौन सी जगह है?" पूछा मैंने,
"आओ ज़रा?' बोला वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
और हम दोनों ही उतर आये बाहर, सामान मेरा अंदर ही रखा था भी तो!
"वो देख रहे हो?" बोला वो,
उधर, बाएं की तरफ, इशारा करते हुए, जहां एक बिजली का ट्रांसफार्मर रखा था एक ऊंचे से चबूतरे पर!
"हाँ?" कहा मैंने,
"उस ट्रांसफार्मर के पीछे की तरफ, वो पुराना अस्पताल है, जच्चा-बच्चा केंद्र, जो अब बन्द है!" बोला वो,
"तो इसका मतलब....वो रास्ता कहा न मैंने?" कहा मैंने,
"वो तो कब से बन्द पड़ा है?" बोला वो,
"क्या कह रहे हो यार!" कहा मैंने,
"नहीं करते यक़ीन?" पूछा उसने,
"कैसे कर लूं भला!" कहा मैंने,
"आओ फिर, बैठो!" बोला वो,
और मैं बैठ गया, वो भी बैठ गया, उसने पीछे देखते हुए, गाड़ी मोड़ ली और चल पड़े हम उस चौड़े रास्ते के लिए, जो उसके हिसाब से बन्द था और मेरे हिसाब से खुला हुआ, जिस पर से मैंने सौइयों बार आया और गया था!
तभी टैक्सी रुक गयी! मैंने आसपास देखा!
"वो देखो!" बोला वो,
अब सामने देखा मैंने! यहां एक बड़ा सा नाला खुदा था, हालांकि पानी नहीं था उसमे, लेकिन आसपास कूड़ा-करकट बहुत था, उस नाले के पास एक बोर्ड लगा था, सफेद रंग का, और जो कुछ लिखा था, वो समझ से बाहर था, बदरंग हो गया था समस्य के साथ साथ!
"ये कौन सी जगह है?'' पूछा मैंने,
"वही? वो रहा अस्पताल और सामने सी ब्लॉक! जो अब खाली पड़ा है, कोई नहीं रहता, पुनःआवास के लिए, योजनाएं कार्यरत हैं!" बोला वो,
कमाल था! एक बात हो सकती थी, कि शायद मैं ही गलत जगह पर खड़ा होऊं? या फिर ये टैक्सी वाला ही गलत जगह ले आया हो? समझ का सा फेर लगता है!
''अब बताओ?" बोला वो,
"आप मुझे यहीं छोड़ दो!" कहा मैंने, और अंदर झुकते हुए, मैंने अपना बैग निकाल लिया बाहर!
"सुनो भाई! यहां से अब कुछ देर बाद ही, कोई सवारी, साधन नहीं मिलेगा, बाहर से आये हो, इसीलिए पूछ रहा हूं, अच्छा है कि कोई होटल या धर्मशाला ले लो, बाकी सुबह देख लेना!" बोला वो,
"अरे नहीं भाई! यहां रहता हूं मैं! आप बताओ, कितने पैसे हुए?" पूछा मैंने,
उसने पैसे बताये, एक बार और सोचने को कहा और पैसे ले, चल दिया वो बाहर की तरफ! मैं वहीँ खड़ा रह गया! न यहां कि दुकान न कोई खोमचा, कोई नहीं था मदद करने वाला! खैर साहब! मैंने वो नाला पार किया और आगे बढ़ता चला गया! एक जगह पर, कुछ लिखा था, पढ़ा, बड़ी ही मुश्किल से, और तब आगे चल पड़ा! करीब बीस मिनट आगे जा कर, मुझे कुछ जानी-पहचानी सी सड़क दिखाई दी! ये वही सड़क थी जहां वो अमरुद का पेड़ था! अब मैं खुश हो उठा! अब तो आ गया! वो टैक्सी-ड्राइवर ही नहीं जानता था कुछ भी, पहले ही उतार गया! पैसे बचा लिए उसने अपने!
अब कोई दूर नहीं! यहां से सामने और फिर उस कोने से सीधे हाथ पर! वो खाली सा प्लॉट और सामने ही अपना घर! तो क़दम तेज हो उठे मेरे! मैं चल ही रहा था कि मैंने कुछ अजीब सा देखा! मैंने देखा, सड़क किनारे बैठे कुत्ते, मुझे देख, दुम दबा, कूंकते हुए, यहां-वहां भागने लगते थे! कुछ भी हो, मुझे बड़ा ही अच्छा लगा! मैं कभी तेज और कभी धीरे धीरे आगे बढ़ता जाता! कौन कौन मिलेगा! कौन कौन क्या क्या पूछेगा! आज रात सोऊंगा भी या नहीं! ये वे ही नहीं सोने देंगे! ये और वो! ऐसा और वैसा!
और मैं आ गया उस अमरुद वाले प्लॉट की तरफ! यही तो है, और जैसे ही मैंने उस टूटी हुई दीवार वाले मकान को देखा....................पलट कर.....
पलट कर...ये.....क्या है? आगे चला मैं दौड़ कर, उस, अपने वाले मकान की चहारदीवारी देखी तो वो काफी ऊंची सी? करीब आठ फ़ीट करीब, ऊपर लोहे के तार लगे थे, उसके साथ साथ चला, तो दीवार में कोई झरोखा भी नहीं? तो अमरुद का पेड़ कैसे देखा था? खैर, अब अंदर जाकर ही देखूं तो पता चले...तो अंदर जाने के लिए मैं उस प्लॉट में दाखिल हुआ, उसके साथ वाले ही, जहां से मुझे किशन ले गया था आगे! अंदर दाखिल हुआ तो एक छोटा सा तालाब दिखाई दिया, ठीक पहले जैसा ही, लेकिन इसमें नील-कुम्भी पड़ी हुई थी! मेरा क्या मतलब?
मैं सीधा चल पड़ा उस टूटी हुई दीवार की तरफ! वहां पहुंचा तो सामने का नज़ारा दिखा! झट से मैंने उस दीवार को पार किया! जैसे ही सामने देखा...तो सिर्फ उस मकान का ढांचा ही बचा था, ऐसा लगा...मुझे यक़ीन ही न हुआ! मैं आगे बढ़ा, आगे बढ़ा तो ज़मीन देखी! ज़मीन पर बड़े बड़े खरपतवार के पौधे, जंगली से पौधे, उबड़-खाबड़ ज़मीन, पत्थर ही पत्थर उन दीवारों के! मैं सकते में आ गया...पीछे देखा तो वही टूटी दीवार? और वो दरवाज़ा?
मैं उन पौधों से बचता हुआ, बह के बड़े दरवाज़े की तरफ चला, जैसे ही चला और पहुंचा उस दरवाज़े तक, कि घर का मुख्य दरवाज़ा दिखा.....न कोई चौखट ही...न कोई लकड़ी के दरवाज़े ही? बस वो, अब टूटी सी दो गोल सी सीढियां ही? बाहर दरवाज़े पर नज़र डाली तो वहां दरवाज़ा तो था, लेकिन टूटा हुआ...उस पर कोई चांद्र-रूपी सांकल नहीं?
कहीं मैं जीते-जागते कोई बुरा सपना तो नहीं देख रहा? एक ही हफ्ते में ऐसे कैसे बदल गयी ये जगह? ये तो ऐसी हो गयी कि कोई बरसों से रह ही न रहा हो इधर?
मैं घर के मुख्य दरवाज़े तक बढ़ा और सीढियां चढ़ अंदर की तरफ चला, अंदर आया तो मेरे होश ही उड़ गए....कोई ऐसी छत नहीं जिसमे बड़े बड़े से छेद न हों! सिर्फ लोहे के सरिये ही दिखाई दें या उन पर चिपका हुआ सीमेंट और रोड़ी के टुकड़े! नीचे देखा, कोई सोफा नहीं? कोई मेज़ नहीं? हर तरफ, हर दीवार पर, बस जलने के ही निशान..और कुछ भी नहीं.....
मेरी बुद्धि को काठ मार गया...
"किशन?" मेरे मुंह से निकला,
मैं, जस का तस वहीँ खड़ा रहा...आसपास देखते हुए ही...
"किशन? ओ किशन?" दी मैंने फिर से आवाज़...
कोई उत्तर नहीं!
मैं पीछे हटा और उस तरफ चला जहां सविता जी और राजेश जी का कमरा होता था, उधर आया तो हर दीवार काली......और न कोई दरवाज़ा, न चौखट, मैं अंदर गया, कुछ नहीं, पपड़ी पड़ीं दीवारें, कोई फर्नीचर नहीं, बाहर की खिड़की, एक चौड़ा सी खुली जगह जैसा....
मैं निकला वहां से, और अरुमा के कमरे की तरफ बढ़ा......रुका..कि जैसे वो अंदर ही हो...उस क्षण....
"अरुमा?" पुकारा मैंने,
कोई उत्तर नहीं, कोई भी उत्तर नहीं!
''अरुमा? कहाँ हो?" पूछा मैंने,
कोई उत्तर नहीं, इस बार भी...
मैं अंदर चला गया उसके कमरे के, कमरे में बस दीवारें, झुलसी हुईं, मैं...और दीवारों पर लगी कुछ कीलें ही...बस..और कुछ नहीं...
"अरुमा?" पुकारा मैंने,
और उस कमरे की खिड़की की तरफ गया मैं, बाहर झांक कर देखा, सूखी सी ज़मीन, कहीं कहीं, बाकी हर जगह वही, हरे और पीले से बेजान पौधे....बेजान? बेजान तो मैं भी हो गया था....ये मैं कहां आ गया? कहीं गलत जगह तो नहीं?
झट से बाहर निकला और सीढियां चढ़ने लगा, एक जगह, एक लोहे की पत्ती से, मेरी पैंट उलझी और चर्र! एक खोंता सा पड़ गया, आधे इंच का! खैर, मैं ऊपर की तरफ चढ़ चला! जैसे ही ऊपर आया तो देखा, वो आराम-कुर्सी, जली हुई, आधी टूटी हुई, दीवार के कोने से टेक लगाए हुए, पड़ी थी! मुझे देख जैसे उसमे जान पड़ी! मैं आगे चला...आगे चलते हुए, अपने उस कमरे में झांक कर देखा, कुछ नहीं, एक एक फ़ीट तक मलबा ही भरा था उसमे, न बिस्तर वाला पलंग....न चादर...न कोई स्टूल ही, छत पर, एक बड़ा सा छेद..उसमे..पंख लटकाने वाला कुंडा ही बस......मैं अंदर गया, जूतों के नीचे मलबा पिसा और मैं, उचकते हुए, नभते हुए, उस खिड़की तक पहुंचा..बाहर देखा.....आसपास....
मैंने बाहर झांक कर देखा खिड़की से, कुछ नहीं, सबकुछ वैसा ही....वही जंगली से पौधे और कुछ नहीं, मैं बाहर निकल आया, चला अपनी रसोई की तरफ, रसोई? कहां थी? कहीं भी नहीं? यहीं तो थी? यहीं तो मैं पानी भर कर रखा करता था, पानी पिया करता था! लेकिन अब कहां है वो सब?
और मेरा गुसलखाना?
मैं दौड़ कर गया उधर..गुसलखाना....कुछ नहीं, सब दीवारें टूटी हुईं...न कोई फर्श ही, न कोई टौंटी ही, न कोई पाइप और न कुछ नहाने-धोने के कपड़े रखने का कोई हैंगर....कहां चला गया सब? कहां?
मैं बाहर आया और तभी मेरी नज़रें बाहर गयीं...बाहर, उसी रेल की पटरी पर, मुझे रौशनी सी आती दिखाई दी! और एक गाड़ी आ कर रुकी, मैं भाग लिया! नीचे! मैं उस गाड़ी को देखना चाहता था! कैसे भी करके! दौड़ा, नीचे आया, अपना सामान वहीँ रख छोड़ा था मैंने...बाहर निकला और दौड़ लिया उस गाड़ी की तरफ! जब आधे में पहुंचा तब देखा मैंने वो गाड़ी, गुजरने लगी! मैं, बदहवास सा चिल्लाने लगा...बदहवास...इस दुनिया से बेखबर हो गया था...गाड़ी गुजर रही थी और मैं, उस गाड़ी को देखने के लिए दौड़ रहा था!
"हे? हे? रुक जाओ?" बोला मैं चिल्लाते हुए....
कोई असर नहीं पड़ा, कौन सुनता?
"हे? रुको? रुको? अरुमा? अरुमा? मैं आ रहा हूं..रुक जाओ...रुक जाओ अरुमा...कहीं नहीं जाओ..कहीं भी नहीं जाओ...." बोला मैं, और मेरे आंसू निकल पड़े..
मैं भागता रहा, थक गया था...लेकिन हिम्मत नहीं टूटी थी मेरी... वो गाड़ी दौड़ते हुए निकल गयी थी, मुझ से करीब अब, दो सौ मीटर दूर से...
मैं फिर भी दौड़ता रहा, सामने उस केबिन की बत्ती बुझ गयी...मैं दौड़ा और उस पटरी तक आ गया, झुक कर सांस ली और कुछ नियंत्रण में लाया अपने आपको..सामने केबिन था, सीढ़ियां थीं, लोहे की, मैं दौड़ भागा ऊपर केबिन में जाने के लिए! सीढ़ियां चढ़ गया और केबिन में दाखिल हो गया! अंदर आया, तो कुछ नहीं था यहां, न कोई इंसान ही, न कोई जानवर ही...बस...वो ट्रैक बदलने वाले चेंजरस, और कुछ नहीं, न कोई बत्ती, न कोई संयंत्र...कुछ नहीं था यहां,
तभी सामने नज़र गयी मेरी...सामने जहां मकान था, वहां तो आग सी दहक रही थी, और कोई न था वहां...
"आग?" मेरे मुंह से निकला!
और मैं झट से सीढ़ियां उतरने लगा! भाग लिया वापिस!
"घर को आग लग गयी...मेरे घर को आग.....लग गयी..." ये चिल्लाता जाऊं और दौड़े चला जाऊं घर के लिए...
मैं किसी तरह से उधर तक, बड़ी सड़क तक पहुंचा, कि तभी एक चौकीदार सा आदमी नज़र आया...मुझे देख वो चौंक ही पड़ा, भागता चला आया मेरे पास....
"सुनो? सुनो?" बोला मैं,
"हाँ? कहो? बोलो?" बोला वो,
"वो मेरा घर...आग लग गयी......" कहते हुए, मेरी रुलाई फूट पड़ी, मैं पेट पकड़, झुकते हुए, रोने लगा तेज तेज...
"उठो, हे? भाई? उठो?" बोला वो आदमी, मुझे खींचते हुए..
"मेरा घर...वो..आग......आग में.." कराह सी निकली मुंह से मेरे..
"कहाँ है आग?" बोला वो,
"वो, उधर?" कहा मैंने इशारा करते हुए..
"उधर? किधर?" पूछा उसने..
"वो सामने...देखो? वो सामने?" कहा मैंने,
उसने उधर देखा, फिर मुझे देखा, फिर से उधर देखा और फिर से मुझे देखा और इस बार मेरे कन्धे पर हाथ रखा!
"वो तेरा घर है?" पूछा उसने,
"आ......हां..." कहा मैंने, आंसू भरी आंखों को लिए!
"वो घर तो बीयाबान है?" बोला वो,
"नहीं..नहीं....अभी हुआ...अभी हुआ...." कराह के बोला मैं,
"नहीं, ये तो पांच सालों से ऐसा ही पड़ा है, एक रात, कोई आयोजन था यहां, रात को ही आग लग गयी..कारण पता नहीं चल सका..मुझे सब याद है..उस घर में, छह लोग जल मरे थे....मैं उस समय उधर, उस कॉलोनी में रहता था...आज भी रहता हूं...." बोला वो आदमी,
"नहीं...नहीं....आग...देखो तो सही?" बोला वो,
"नहीं है कोई आग?" बोला वो, मुझे झिंझोड़ते हुए!
"नहीं देख रहे?" पूछा मैंने,
"पागल हो गए हो क्या? दिमाग चल गया है?" बोला वो, इस बार गुस्से से कुछ!
"मुझे नहीं पता...मुझे नहीं पता...." बोला मैं,
"कहां से आये हो?" पूछा उसने,
मैंने कोई जवाब नहीं दिया...
"कहां से आये हो?" पूछा उसने,
मैंने अब भी कोई जवाब नहीं दिया...उसने मुझे झिंझोड़ा, एक दो बार...
"होश में आओ?" बोला वो,
अब मुझे आया गुस्सा उस पर, पता नहीं क्यों आया, मैंने उसके हाथ छुड़ाए और चल दिया आगे की तरफ, पीछे मुड़कर, नहीं देखा, उस प्लॉट को पार किया और बड़ी गली में आ गया..वहां से उलटे हाथ पर हुआ, अब तक अंधेरा छा गया था..कोई चिंता नहीं थी मुझे...मुझे बस, उस घर में रहने वाले, लोगों से मिलना था! बस! और कुछ नहीं!
मैं हल्का सा दौड़ा और उस मकान के सामने आ खड़ा हुआ, दरवाज़ा खोला और अंदर चला! जैसे ही अंदर चला..कि कुछ याद आया मुझे!
वो..तहखाना?
मैं पलटा तेजी से और भाग लिया बाहर की तरफ, उलटे हाथ पर आया, कोई दरवाज़ा नहीं था, पौधे लगे हुए थे जंगली, मैं चल पड़ा उधर ही, मैं जब रहता था, तब तक उस तहखाने तक नहीं गया था! मैं आगे गया, अंधेरा था बहुत, और कोई प्रकाश ही नहीं था, यहां अंधेरा ही था, अचानक से याद आया कि मेरे बैग की जेब में एक पेन है, जिसमे पीछे एक बत्ती जलती है, फौरन ही भाग लिया, उस दरवाज़े तक आया और फौरन ही अपना बैग तलाशा, बैग की पिछली जेब से वो पेन निकल आया, मैंने जल लिया वो बल्ब!
मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं क्या कर रहा हूं...जो कर भी रहा हूं वो ठीक है भी या नहीं? मुझे कोई डर भी नहीं था, इस बारे में भी नहीं सोचा था कि यहां हुआ क्या है? पता नहीं, मेरी बुद्धि कैसे एक ही जगह आ कर केंद्रित हो गयी थी...शायद, ये कोई मानसिक-सदमा था, जिसको मैं अभी तक नकार ही रहा था, या जो देख रहा था, सोच रहा था, वो सिर्फ उस सदमे को दूर रखना ही था या, नकार कर ही रखना था! मेरे पास, उस समय और कोई रास्ता ही नहीं था!
मैं दौड़ कर, उस गैलरी में पहुंचा और सामने बत्ती की रौशनी मारी...सामने का कोई भी दरवाज़ा नहीं था, अगर रहा भी होगा तो अब नहीं था..मैं उसके दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ, हां, एक चौखट ही बची थी, दीमक की खायी हुई.....
सामने रौशनी डाली, एक दीवार, दीवार से टकराता बस अंधेरा, नीचे फर्श की तरफ मैंने रौशनी डाली....सिर्फ मिट्टी ही मिट्टी, कुछ कागज़ के सड़े-गले से टुकड़े, कुछ डंडियां सी...और कुछ नहीं....मेरी आंखों से फिर से आंसू निकल आये...अब शायद मैं समझने लगा था...कारण..कुछ कारण और कुछ कारण.....जिनके कारण मैं यहां था..
सांस बैठने लगी मेरी....जी किया, वहीँ गिर जाऊं..मेरा तो जैसे सारा संसार ही अँधेरे में डूब गया था....
"अरुमा...." मेरे मुंह से निकला, टूटा हुआ सा शब्द...आवाज़ कम, और सांस की आवाज़ ज़्यादा....
"अरुमा? मैं लौट आया हूं...मैंने वायदा पूरा किया है....अरुमा? कहां हो? ये सब..क्या है?" मैंने हल्के से पूछा, किस से? पता नहीं, अभी भी, न जाने किस उम्मीद का सिरा, मैंने पकड़ रखा था...क्या ये मेरा पागलपन ही था? या मेरी नितांत मूर्खता? क्या कहूं?
और अचानक से, मेरे मुंह से रुलाई फूट पड़ी...मैं कब तक रोया पता नहीं, मेरे गरम गरम आंसू मुझे गर्मी देने के बजाय, और बर्फ में दफन किये जा रहे थे....
"ये क्या है?" मैंने रोते रोते पूछा...
"ये......................." मैं चुप तब!
"ज्ञान?" आयी आवाज़ मुझे!
''अरुमा? अरुमा?" मैं पागल सा, बदहवास सा, अपने आप में ही खोया हुआ सा, आसपास देखने लगा!
"अरुमा?" बोला मैं, इस बार बहुत तेज!
"ज्ञान?" बोली वो, ये अरुमा ही थी! मेरा मतलब, उसकी आवाज़!
"कहां हो? कहां हो अरुमा? देखो..देखो? मैं लौट आया हूं! वायदा निभाया है मैंने! कहां हो अरुमा? अरुमा?" मैं पागलों की तरह से पूछ रहा था!
लेकिन?
खुश! बहुत खुश! जैसे सूखे में, ताज़ा ठंडी हवा चली हो! ऐसा खुश! और यकायक...?
जल्दबाजी में, मेरे हाथ से मेरी बत्ती भी गिर गयी! अभी तक जल रही थी वो, मुझे ये देख, फिर से प्रसन्नता की बयार ने छू लिया! मैं झुका और वो बत्ती उठा ली! जैसे ही उठायी कि मुझे सामने वही नज़र आयी! अरुमा! मैं दौड़ कर, उसका नाम चिल्लाता हुआ आगे बढ़ा! जैसे ही बढ़ा कि मैं फिर से गिर गया! उधर भी एक सीढ़ी थी! मुझे दिखी नहीं थी! मैं वहीँ खड़ा रहा! लेकिन अरुमा, कहीं नहीं थी वहां!
"अरुमा?" मैंने कहा धीरे से,
कोई उत्तर नहीं मिला मुझे...
"अरुमा? कहां हो?" पूछा मैंने, मैंने आसपास रौशनी डाली, तलाश किया, कुछ तो मिले? कोई नहीं था...
"किशन?" मैं चिल्लाया,
नहीं आया किशन! मेरी एक आवाज़ पर दौड़ कर आ जाने वाला किशन, नहीं आया उस समय...
"राजेश जी?" कहा मैंने,
कोई नहीं!
"सविता जी?" मैं बदहवास सा चिल्लाये जाऊं...
"अनीता जी?" मैं फिर से नाम पुकारूं उनके, एक एक करके! लेकिन, कोई नहीं आया वहां!
"क्या हुआ? मुझ से क्या गलती हुई? मुझे क्यों? क्यों नहीं पहचान रहे आप? कहाँ हो?" मैं पागल सा हो गया था....बे-चैन और बे-सुध....कुछ समझ नहीं आ रहा था मुझे...
"अरुमा? कम से कम...तुम तो आ जाओ?" कहा मैंने,
कोई नहीं आया और मैं, वहीँ बैठ गया, वो बत्ती, वहां बिखरे पत्तों की बीच गिर, रौशनी देती रही...और फिर वो वक़्त आया, जब मैं कुछ होश की कगार पर पहुंचने लगा...मैं खड़ा हुआ...
"अरुमा?" कहा मैंने,
और पीछे की तरफ हुआ,
"सिर्फ एक बार....एक बार मिल लो...फिर नहीं आऊंगा मैं....ये भी वायदा किया मैंने अरुमा...फिर नहीं आऊंगा..." कहा मैंने, और एक तेज सी सांस मेरे नथुनों से निकली...
कुछ पल बीते..खामोशी के....
"ज्ञान बाबू?" आयी आवाज़,
सर उठाया मैंने, धोखा...ये भी एक धोखा ही था....शायद...मैं टूट चुका था, पता नहीं क्या खेल खेला जा रहा था मेरे साथ? पता नहीं...
"ज्ञान बाबू?" आयी फिर से आवाज़,
मैंने पीछे की तरफ देखा, कोई नहीं था....मुझे हंसी आ गयी! अपने आप पर ही! मैं खूब ही हंसा!
"ज्ञान बाबू? मैं ...मैं किशन?" बोला वो,
"किशन?" मैं चौंक पड़ा! झट से वो बत्ती उठा ली! और भागने लगा बाहर!
"किशन? किशन?" मैं चिल्लाते हुए बाहर आ गया! लेकिन यहां कोई नहीं! मैंने हर तरफ देखा! हर तरफ देखा! कोई नहीं!
"कहां हो किशन?" मैं चिल्लाया,
'आओ बाबू! बाहर आओ!" कहा मैंने,
"आ रहा हूँ किशन मैं! रुके रहना! रुको बस!" कहा मैंने,
और भाग कर, वहां चला, जहां से आवाज़ आयी थी उसकी! मैं दौड़ा और तब, सामने देखा, सफेद सी रौशनी में नहाया हुआ था किशन! मैं दौड़ कर उसके पास पहुंचा! वो मुझे देख, बेहद प्रसन्न हुआ!
"कहां हैं सारे किशन?" पूछा मैंने,
"यहीं हैं!" बोला वो,
"नहीं मिले मुझे?" कहा मैंने,
"कौन?" पूछा उसने,
"तुम सभी तो?" कहा मैंने,
"हम कहां मिलते हैं ज्ञान बाबू!" बोला वो,
"नहीं? ऐसा नहीं बोलो?" कहा मैंने,
"ज्ञान बाबू?" बोला वो,
"हां किशन?" कहा मैंने,
"आओ मेरे साथ!" बोला वो,
"चलो किशन!" कहा मैंने,
मेरी आंखों पर पर्दा पड़ा था? शायद हां! शायद, बुद्धि पर भी! शायद, विवेक पर भी! पर कोई बात नहीं! वे सब मेरे अपने ही तो हैं?
"कहां हैं सारे?" पूछा मैंने,
"यहीं!" बोला वो,
"मिलवाओ?" कहा मैंने,
"हां बाबू!" बोला वो,
और हम बात करते हुए, उस मकान के पीछे चले आये! जहां मुझे उंगलियों पर, कालिख लग गयी थी...मैं..बहुत खुश था लेकिन!
किशन, वहां ले आया था मुझे, लेकिन, वहां तो कोई नहीं था? सब कहां गए? मुझे क्यों लाया था किशन यहां! मैं तो बेचैन हो उठा था!
"किशन? किशन?" कहा मैंने, बड़े ही कचकचा कर,
"हां, ज्ञान बाबू?" बोला वो,
"सब कहां हैं?" पूछा मैंने,
"सब यहां हैं!" बोला वो,
"मुझे मिलवाओ? मैं तो हार गया हूँ किशन..कोई नहीं आ रहा...कोई भी नहीं?" बोला मैं रुआंसा सा होते हुए!
"वो देखो न?" बोला वो,
और मैंने, फौरन ही अपने दाएं देखा! जैसे ही देखा मैं दौड़ पड़ा! उसकी तरफ! शायद किशन जानता था कि मेरा झुकाव अरुमा की तरफ ज़्यादा है!
मैं भागता हुआ गया और उस अरुमा से चिपक गया! मुझे क्या सुकून आया? मुझे क्या मिला? मैं किसके लिए तरसा? मैंने वायदा निभाया, किसके लिए?
''अरुमा!" और मैं बेतहाशा उसको चूमने लगा! कभी उसके हाथ, कभी गला, कभी चेहरा और कभी बाल उसके...
"अरुमा? अरुमा?" बोला मैं,
"ज्ञान बाबू?" बोली वो,
"हां?" कहा मैंने,
"मैं जानती थी आप आओगे!" बोली वो,
"एक मिनट? अरुमा? तुमने मुझे बाबू कहा?" कहा मैंने उस से अलग होते हुए,
"हां ज्ञान बाबू?" बोली वो,
"क्या?" कहा मैंने,
"ज्ञान! ज्ञान? ज्ञान?" बोली वो और रो पड़ी!
मैंने उसको चुप कराने की कोशिश की, लेकिन वो, मुझ से चिपक गयी थी..न सुने मेरी कोई भी बात!
"ज्ञान?" आयी आवाज़,
मैंने देखा, ये राजेश बाबू जी थे! मैं लपक लिया उनकी तरफ ही! वे मुस्कुरा रहे थे मुझे देख कर!
"लौट आये?" बोले वो,
"हां राजेश जी!" कहा मैंने,
"इतनी देर से?" बोले वो,
"देर?" कहा मैंने,
"हां! देर बेटे!" बोले वो,
"मैं नहीं समझा?" कहा मैंने,
"हां! बहुत देर हो गयी!" बोले वो,
"नहीं नहीं! मैं समय पर, कहे पर, अपने बताये पर ही तो आया?" कहा मैंने,
"मानता हूं ज्ञान!" बोले वो,
"आया मैं सही समय पर?" बताया मैंने,
"हां, आये!" बोले वो,
"फिर देर कैसे?" पूछा मैंने,
"अब कुछ नहीं बचा ज्ञान!" बोले वो,
"नहीं समझा मैं?" कहा मैंने,
"हां ज्ञान!" बोले वो,
और तब, पीछे से, अनीता जी, सविता जी, वो डॉक्टर साहब भी आ गए, जैसे अंधेरे से निकल आये हों, एकदम!
"नमस्ते! नमस्ते! नमस्ते सर!" मैं खुश होते हुए!
"ओ ज्ञान!" कहते हुए, वो डॉक्टर साहब, चले आये और मुझे गले से लगा लिया अपने! मैंने भी भर लिया उन्हें बाहों में! वे फफक फफक कर रोये....बहुत रोये! मुझे अंदाजा हुआ, कि मेरे आने से ऐसा हुआ होगा!
"ज्ञान?" बोले वो,
''जी सर?" कहा मैंने,
"हम सब, अब इस दुनिया के नहीं हैं ज्ञान!" बोले वो,
मुझे नहीं आया कुछ भी समझ!
"जी?" कहा मैंने,
"हां ज्ञान! हमारा सिलसिला, ख़तम हो गया..." बोले वो,
"सिल...सिला?" कहा मैंने,
"हां, अब कोई धड़कन नहीं!" बोले वो,
"क्या? कैसी धड़कन?" पूछा मैंने,
उन्होंने अपना हाथ मेरे सीने पर रखा, मेरा दिल, धक-धक करता जा रहा था! मेरी रगों का खून, सब मेरे दिल की तरफ दौड़ रहा था!
और तब...
तब डॉक्टर साहब ने मेरा हाथ उठाया, और अपने सीने पर रखा...रखा, और छोड़ दिया, मेरा हाथ वहीँ, उनके सीने पर ही रखा रहा और....
मैंने हाथ दबाकर देखा, एक बार, दो बार, फिर हाथ बदला और फिर से वही किया...कोई धड़कन नहीं....कोई भी नहीं..बदन, एकदम ठंडा, बर्फीला सा..मेरी नज़रें मिलीं उनसे, वे मुस्कुराये!
"समझे ज्ञान?" बोले वो,
"समझे ज्ञान?" ये अनीता थी, पास आते हुए बोली वो,
"समझे ज्ञान?" ये सविता जी थीं, वहीँ से तेज तेज कहते हुए...
"समझे ज्ञान? बोले राजेश जी,
"समझे ज्ञान बाबू?" बोला किशन...
और वे, सब के सब, एक एक करते हुए, अंधेरे में प्रवेश करते हुए चले गए...अब मैं समझ गया था कुछ कुछ! एक झटके से पीछे देखा! यहां अरुमा थी अभी! मैं भाग लिया! और जा पहुंचा उसके पास!
"अरुमा!" कहा मैंने,
वो पत्थर सी खड़ी रही!
"अरुमा?" मैंने फिर से कहा,
"समझे ज्ञान?" बोली वो, लेकिन कुछ हल्के लहजे में ही....
"नहीं! कुछ नहीं समझा मैं!" कहा मैंने,
"ज्ञान? समझ गए न?" बोली वो,
"नहीं अरुमा!" कहा मैंने,
और वो चली दूर, बिन पलटे, ही पीछे हटते हुए! मुझे कुछ समझ में आ पाता, वो दूर हो गयी....मैं दौड़ चला उसकी तरफ.....और अंधेरे में आ गया....अब हांफने लगा था मैं!
"अरुमा? अरुमा? अरुमा?" चीखा मैं,
"समझे ज्ञान? समझे ज्ञान? समझे...................." बस......फिर शांति...मैं उस क्षण को बर्दाश्त न कर सका, और धम्म से नीचे गिर गया......
दोस्तों.....उस दिन के बाद...मैंने न अरुमा को, न डॉक्टर साहब को, न किसी अन्य को ही कभी देखा....क्या मैं गया उधर? हां! कई बार! कई कई बार!
सुबह हुई...
करीब आठ बजे मेरी नींद खुली, या मैं उस बेहोशी से बाहर आया...रात जो हुआ था..अब सब समझ गया था, मैं सब समझ गया था....मेरा दिल बेहद भारी था...जिस्म के कई हिस्से जैसे कट कर गिर गए थे और मैं, लंगड़ाता हुआ आगे बढ़ता चला जा रहा था....
खैर, मैं उठा, उस मकान के अंदर गया, एक बार फिर से, एक एक जगह देखी, अपना बैग उठाया और निकल गया उस मकान से! अब आंसू न थे....एक बार भी मैंने पीछे मुड़कर, नहीं देखा था....मैं चलता चला गया....आज कोई टैक्सी भी नहीं थी, नहीं परवाह! पैदल ही चलता रहा, और पैदल पैदल चलते चलते मैं, आ गया हावड़ा....यहां आकर, मैंने हाथ-मुंह धोये और तब कुछ सोचा...हां नवेद साहब! उनसे मिला जाए! एक टैक्सी ली, और उनके दफ्तर पहुंचा, उस समय लंच हो चुका था, तो अंदर आ गया, अंदर आ कर, किसी से पूछा, उसने कन्धे उचका दिए...फिर आगे गया, एक पार्क सा आया, वहां बैठ गया...
"सुनिये?" कहा मैंने,
वो एक माली था, वहां का, सीधा सा..
"जी?" बोला वो,
"क्या नवेद साहब यहीं हैं?" पूछा मैंने,
"वो **** वाले?" पूछा उसने,
"हां वही!" कहा मैंने और खड़ा हो गया!
"आपको कुछ पता नहीं?" बोला वो,
"जी नहीं?" कहा मैंने,
"कहीं दूर से आये हो?" पूछा उसने,
"जी" कहा मैंने,
"नवेद साहब एक हादसे में हलाक़ हो गए थे" बोला वो,
एक और झटका मुझे!
"कब?" पूछा मैंने,
"करीब तीन महीने हुए?" बोला वो,
"ओह..." कहा मैंने,
"शायद कोई हादसा हुआ था, एक्सीडेंट हुआ था" बोला वो,
"एक्सीडेंट?" पूछा मैंने,
"जी हां, घर का पता है उनका?" बोला वो,
"हां है" कहा मैंने,
"आप वहां चले जाओ, कोई काम हो तो" बोला वो,
"हां है काम" कहा मैंने,
"तो चले जाओ" बोला वो,
और चल पड़ा आगे के लिए...
अगर तीन महीने पहले नवेद साहब का एक्सीडेंट हो गया था, तब उसको पता किसने दिया था? किसने कहा था कि राजेश जी के पास चले जाओ, कमरा शर्तिया मिल जाएगा? आखिर, वो कौन था फिर?
मैं चल पड़ा नवेद साहब के घर की तरफ, पौने घण्टे में वहां जा पहुंचा, घर की घण्टी बजायी, मैं पहले भी यहां आया था, ऊपर की मंजिल पर नवेद साहब रहते थे, नीचे कोई गुजराती परिवार रहा करता था...
दरवाज़ा खुला...
"क्या नवेद साहब हैं?" पूछा मैंने,
वो आदमी मुझे देखता ही रह गया, जैसे मैंने कोई विचित्र सी बात कही हो उस से!
"आप?" पूछा उसने,
"मैं कहीं दूर गांव से आया हूं, मुझे काम है कुछ उनसे" कहा मैंने,
"आप अंदर आइये" बोला वो,
"जी, धन्यवाद" कहा मैंने,
और मैं अंदर चला गया, उन्होंने बिठाया मुझे वहीँ कुर्सी पर, एक आदमी, पानी ले आया मेरे लिए, मैंने पानी पिया और गिलास वापिस कर दिया!
"जी?" कहा मैंने,
"नवेद साहब यहां रहते थे, परिवार सहित" बोले वो,
''जी, मैं मिला था उनसे" कहा मैंने,
"कब?" पूछा उन्होंने,
"करीब तीन महीने पहले ही?" कहा मैंने,
"इस ** तारीख के आसपास?" बोले वो,
"जी याद नहीं, दरअसल, ढाई महीना ही हुआ होगा" कहा मैंने,
"ओह..तभी" बोले वो,
"जी?" कहा मैंने,
"आप कब आये थे? मेरा मतलब, कितने बजे?' पूछा उन्होंने,
"करीब शाम को?" कहा मैंने,
अब उस आदमी ने, पानी लाने वाले आदमी को, दो तीन बार देखा!
"क्या बात है?" पूछा मैंने,
"आप, कोई छठे इंसान होंगे, जिनको वे मिले" बोले वो,
"मुझे उनके दफ्तर में बता दिया था कि कोई हादसा हुआ था उनके संग?" पूछा मैंने,
"हां, हुआ था" बोले वो,
और मुझे तारिख बता दी! मुझे बड़ी हैरत हुई कि ये वही तारीख थी, जिस रोज मैं उनसे आ कर मिला था! हां, मुलाक़ात छोटी सी ही थी, उन्होंने सुना था और मुझे वो पता लिखवा दिया था! लेकिन एक बात मुझे समझ नहीं आयी? मुझे नवेद साहब ने वहीँ क्यों भेजा? उनमें और इनमे, बहुत सालों का अंतर था, फिर?
"क्या कोई और है उनका जो यहां रहता हो?" पूछा मैंने,
"हां, उनकी बेवा हैं यहां, पता देता हूं आपको, ठहरो!" कहा उन्होंने,
ये तो मेरे लिए ठीक ही हुआ था, उनकी बेवा से मिलकर, काफी जानकारी मिल जाती मुझे!
"दरअसल, नवेद साहब ने, अपनी मौत से पूर्व एक मकान खरीद लिया था!" बोले वो,
"मकान?" पूछा मैंने,
"जी हां, बता रहे थे, कि वहां काम होना था बस, कोई साल भर में वो जगह, बसावट वाली हो जाती तो सबकुछ ठीक ही रहता...लेकिन अफ़सोस..." बोलते बोलते रुके वो,
"सो तो है" कहा मैंने,
"ये रहा उनका पता, आप ये कागज़ ही रख लो, मेरे पास दूसरा है!" बोले वो,
मैं उठ खड़ा हुआ, और उनका धन्यवाद कर, वो कागज़ ले, मैं चल पड़ा बाहर के लिए, अब मुझे नवेद साहब की बेवा से मिलना था!
करीब पौने एक बजे मैं वहां पहुंचा, ये इलाका काफी भरा-भरा सा था, हर तबके के लोग रहते थे शायद यहां, मुझे पता ढूंढने में देर न लगी और मैं उनके घर तक पहुंच गया, मुझे पता चला कि वो घर, मरहूम नवेद साहब के जीजा जी का था, अभी फिलहाल, उनकी बेवा यहां रह रही थीं!
मैंने दरवाज़ा खटखटाया उस घर का..दरवाज़ा लकड़ी का था, भर्र सा खुला, अंदर से कोई लड़की आयी, वो करीब बारह या चौदह बरस की रही होगी..
"क्या श्रीमति गुलनाज़ यहीं हैं?" पूछा मैंने,
"जी, आप आइये?" बोली वो,
"आप बुला लीजिये" कहा मैंने,
"आती हूं" बोली वो,
और कुछ ही देर में एक औरत वहां चली आयी, और वो लड़की, जग में पानी भर लायी, मुझे एक गिलास में पानी दे दिया, मैंने पहले पानी पिया और फिर कुछ इधर-उधर की, नवेद साहब से सम्बन्धित बातें कीं..और मैं फिर मुद्दे पर आ गया...
"क्या उन्होंने कोई मकान खरीदा था, कुछ महीनों पहले?" पूछा मैंने,
"जी हां" बोली वो,
"वो कहां? बुरा न मानें तो?" कहा मैंने,
और मेरे शरीर में दौड़ा करंट! जैसे ही उसने मुझे वो कॉलोनी और पता बताया! ये वही जगह थी, जहां मैंने ढाई महीने से ज़्यादा बिताये थे! मैं गिर पड़ता तभी....सम्भाला अपने आपको मैंने, और टूटे हुए पांवों से वापिस चल पड़ा, पीछे वो दोनों ही, हैरान सी मुझे देखती रहीं, मैं कब मुख्य-मार्ग पर आ गया...मुझे नहीं मालूम...
अब मैं टूट चुका था, एक ऐसा परिंदा, जो चारा लेने गया हो, जब लौट हो, तो घोंसला, तितर-बितर हो गया हो! वाह रे ज्ञान! क्या तेरा नसीब! तू तो अनोखा समझे था खुद को! ले! समझ ले! मैं हंस पड़ा अपनी हालत पर! मेरे आसपास से लोग गुजर रहे थे, कुछ देखते थे और कुछ बच निकलते थे!
मैं अब अकेला, इस बड़े शहर में, बिना घर बार के, सड़कों को नाप रहा था! अब मेरा कोई जानकार भी नहीं था कि जिसकी मैं मदद लूं और किराए का मकान मिल जाए! कौन देता है! कौन रखता है! मैंने एक सवारी पकड़ ली, अभी अब मुझे अनजान से, सवाल जवाब से करने वाले, मुझे किसी न किसी रूप से डराने वाले ही लग रहे थे! एक आर को, अपनी इस हालत पर, मुझे तरस आ रहा था! मैं कभी गमगीन होता और कभी हंसमुख! करुं तो क्या करुं? जाऊं तो कहां जाऊं?
मैं हावड़ा आ गया, यहां आकर, मैंने कुछ खाया सबसे पहले, मैं भूखा था रात से, इसीलिए मैंने कुछ खाया पिया और फिर सामने के एक पार्क सी जगह में जा बैठा! अब क्या करुं?
घर लौट नहीं सकता, उनको बताऊं तो क्या बताऊं? कहां जाऊं?
तभी मुझे जूली का ख़याल आया! मैंने अपने हाथ की घड़ी देखी, अभी समय था, वो अपने दफ्तर में मिल सकती थी मुझे! मैं खड़ा हुआ और निकल पड़ा उसके दफ्तर के लिए! वहीँ इस समय मेरी मदद कर्ज सकती थी!
मैं जा पहुंचा उधर, जूली से मिला मैं, लेकिन उसे बताया कुछ नहीं, बस इतना ही कहा कि मुझे यहां रहने के लिए कोई जगह चाहिए, यदि मुझे मिल जाए तो मैं उसका ये एहसान ज़िन्दगी भर नहीं चुका सकता था! जूली, बेहद मददगार साबित हुई थी...
दोस्तों......
मुझे चार दिन एक होटल में रहना पड़ा...ये होटल कम और पेइंग-गेस्ट हाउस ज़्यादा था, खैर, मुझे बहुत राहत हुई...पांचवें दिन मुझे एक कमरा मिल गया, एक अच्छे से क्षेत्र में! मेरी ज़िन्दगी फिर से राह पर आ गयी थी...लेकिन...मैं टूट गया था...चाह कर भी मैं उन्हें, अरुमा को न भूल सका मैं......
यही मेरी इस डायरी का यूं कहो कि अंत से पहले का एक लम्ब-विराम है....यदि कभी सामान्य हुआ..तो अवश्य ही इस डायरी को आगे बढाऊंगा....आपका...ज्ञान!
और इतना पढ़ मैंने ये डायरी बन्द कर दी, इसके बाद कुछ नहीं लिखा गया था, मैंने बहुत दिनों बाद ये डायरी पढ़ी थी, अब इसका मर्म जाना तो सच में मैं भी द्रवित हो उठा...
"ये वही हैं?" बोले शहरयार,
"हाँ, वही!" कहा मैंने,
"प्रोफेसर साहब?'' बोले वो,
"हाँ, वही!" कहा मैंने,
"बड़ी ही दुखभरी सी कहानी है इनकी..." बोले वो,
"हाँ, अब जान पाया हूं!" कहा मैंने,
"कुछ पूछ सकता हूं?" बोले वो,
"क्यों नहीं?' पूछा मैंने,
"क्या वे सभी प्रेतात्माएं अभी भी वहीँ होंगी?" पूछा उन्होंने,
"नहीं जानता!" कहा मैंने,
"कैसे जान सकते हैं?' बोले वो,
"वहाँ जाकर ही..." कहा मैंने,
"सम्भव होगा?" बोले वो,
"क्यों नहीं?" कहा मैंने,
"क्या मिला जाए ज्ञान बाबू जी से?" पूछा उन्होंने,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"पहले, कुणाल से मिलें?" बोले वो,
''यही करना होगा!" कहा मैंने,
"कब बात करुं?" पूछा उन्होंने,
"जब समय हो?'' कहा मैंने,
"कल का रख लूं?" बोले वो,
"हां, इतवार भी है!" कहा मैंने,
"ठीक है!" कहा उन्होंने,
"तब जल्दी करवा लूं?" बोले वो,
"बात हो जाए तो!" कहा मैंने,
"हो जायेगी!" कहा उन्होंने,
"वे मानसिक रूप से पीड़ित हैं!" कहा मैंने,
"वजह मालूम है!" बोले वो,
"है, समझ गया!" कहा मैंने,
"ठीक है फिर!" बोले वो,
"ठीक, कल मिलतें हैं अब!" कहा मैंने,
चौवन-पचपन में ही, प्रोफेसर साहब, सेवा-निवृति ले, शिक्षण-कार्य से निवृत हो चुके थे, उन्हें देख कर, लगता था, वो एक टूटा हुआ, मानसिक-रोगी, बीमार, बूढ़ा और बेसुध सा इंसान रहा हो..मैंने जब देखा तो मेरी दिल से हूक सी उठ गयी..हे ईश्वर किसी को इतना मृदु-हृदय न दे कि वो कुछ समझ ही न पाए, और जब समझे तब, लौटने का समय न हो!
उस दिन, मैंने एक घर की घण्टी बजायी, घर, पुराने ज़माने का ही, लेकिन काफी लम्बा-चौड़ा सा था, दरवाज़ा खुल गया, और एक चौकीदार बाहर आया, हमें देखा, मैं उस समय बाहर, अपनी गाड़ी लगाकर ही खड़ा था..
"कौन?" पूछा उसने,
"कुणाल साहब से बात हुई थी?'' कहा मैंने,
"हां! आ जाइये!" बोला वो,
और हम, अंदर चले गए..ये जगह दिल्ली के पास ही पड़ती है, ढाई घण्टे की दूरी पर, कुणाल ही उन प्रोफेसर साहब, ज्ञान के छोटे भाई हैं! मुझे बेहद ही प्रसन्नता हुई कि छोटे भाई ने, अपने बड़े भाई का बड़ा ख़याल रखा था! हमेशा साथ ही लगे रहते थे, हालांकि वे स्वयं, विद्युत्-विभाग में अभियंता थे, यदि स्वयं न होते, तो अवश्य ही किसी दूसरे का प्रबन्ध कर देते थे! जहां हम गए थे, वो सरकारी आवास ही था उनका!
हम अंदर आ गए..हमें बाहर के ड्राइंग-रूम में बिठा दिया गया और पानी मंगवाया गया, हमने पीया और बैठे रहे! कुछ ही देर में, एक मध्यम कद के, अधेड़ से, चश्मा लगाए एक सज्जन आये! ये मुह से एक बार भी नहीं, लेकिन शहरयार जी से दो या तीन बार मिल चुके थे, उन्हीं के हाथों वो डायरी मेरे हाथों में आयी थी! वे बैठ गए!
"पानी लिया आपने?" पूछा उन्होंने,
"हां, अभी बस!" कहा मैंने,
वे पीछे कमर लगा कर बैठ गए पीछे, हाथों से हाथ रगड़े अपने फिर, अपने चेहरे पर मल लिए!
"तो आपने वो डायरी पढ़ ली!" बोले वो, मुझसे!
"जी हां!" कहा मैंने,
"मुझे पता था कि आप एक न एक बार तो ज़रूर फल करेंगे ज्ञान बाबू से मिलने की!" बोले वो,
"हां, दरअसल समय ही अब मिल पाया मुझे वो डायरी पढ़ने का!" कहा मैंने,
"समय होता है जी सभी का! हर चीज़ का, आप तो बेहतर जानते हैं!" बोले वो,
"जी, होता है समय!" कहा मैंने,
"आप मिलना चाहेंगे ज्ञान बाबू से?" पूछा उन्होंने,
मेरा सारा शरीर उमेठ दिया इस सवाल ने! मेरे सामने एक इतिहास ही आ खड़ा होने को हो, ऐसा लगने लगा!
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
"आइये फिर!" बोले वो,
और सीढियां चढ़ ऊपर चढ़ने लगे, हम पीछे पीछे चले, जैसे ही उस मन्ज़िल में पहुंचे कि फिनाइल की गन्ध आने लगी, एक काम वाली, पोंछा मार रही थी फर्श पर, हमें देखते ही, अपने वस्त्र ठीक कर लिए और जगह दे दी निकलने की, हम निकल गए वहां से, आ गए एक कमरे के सामने...
"एक मिनट!" बोले वो,
और अंदर चले गए, हम वहीँ खड़े रहे! फिर वे पर्दा हटा कर आये,
"आइये!" कहा उन्होंने,
और हम अंदर चले तब! सामने, उस खिड़की के पास, एक, हल्की सी, बनी हुई सफेद दाढ़ी और सफेद ही बालों वाला एक व्यक्ति बैठा था, सेहत, ठीक-ठाक ही थी, वो बाहर झांक रहा था! यही थे ज्ञान बाबू! यही था वो लड़का! जो उस मकान में ढाई महीने ठहरा था! यही था वो दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी! यही था वो, जो उनसे रु-ब-रु हुआ था!
"भाई साहब?" बोले कुणाल,
कोई असर ही नहीं हुआ बोलने का!
"भाई साहब?" कहा उन्होंने,
और जब इस बार भी नहीं हुआ तब, उनके कन्धे पर हाथ रखा उन्होंने, झट से, उन्होंने देखा उधर, उधर देखते ही, मुझे देखा, शहरयार जी को देखा और दोनों हाथ जोड़, नमस्कार की, मुस्कुराते हुए!
''आपसे मिलने आये हैं!" बोले वो,
मुस्कुराते हुए हां बोले वो!
"ज्ञान बाबू!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
"कैसे हैं आप?" पूछा मैंने,
"अच्छा हूं!" बोले वो,
"अच्छा लगा आपसे मिलकर!" कहा मैंने,
"सच में?" पूछा उन्होंने,
"हां, सच में!" कहा मैंने,
"अब इन बातों के मायने बचे हैं क्या?" बोले वो,
दर्शन की अभिव्यक्ति से ओतप्रोत सा प्रश्न था उनका ये!
"क्यों नहीं ज्ञान बाबू!" कहा मैंने,
"मैं नहीं मानता!" बोले वो,
"आपके न मानने से सूर्य चन्द्र नहीं हो जायेगा ज्ञान बाबू!" कहा मैंने,
जानबूझ कर, कुछ कड़वा सा उत्तर दिया था मैंने उन्हें, और जैसा मैं चाहता था, वैसे ही भाव आ चले थे उनके चेहरे पर!
"तब क्या मानें?" बोले वो,
''धूप धूप ही रहती है! हैं न ज्ञान बाबू!" कहा मैंने,
"हां, सो तो है!" बोले वो,
"धूप हटे तो छाया आये या यूं कहें कि छाया हटे तो धूप आये? क्यों ज्ञान बाबू?'' पूछा मैंने,
"बाउट ही तेज-तरीन सी बात कही आपने!" बोले वो,
"आप तो बदल गए!" कहा मैंने,
"बदल गया? मैं?" अचरज से पूछा उन्होंने,
"हां, बदल ही तो गए!" कहा मैंने,
तभी चाय आ गयी, साथ में कुछ पकौड़े और कुछ नमकपारे भी थे, चाय रख दी गयी और हमारा इंतज़ार करने लगी!
"मैं क्या बदला साहब?" बोले वो,
"आपकी डायरी के हिसाब से तो!" कहा मैंने,
"आपने पढ़ी?" पूछा उन्होंने,
"हां, कल ही ख़त्म की!" कहा मैंने,
"तो समझ सकता हूं!" बोले वो,
"तो मैं सही मानूं अपने आप को!" कहा मैंने,
"वो क्या?" बोले वो,
"आप कमज़ोर हो!" कहा मैंने,
वो हंस पड़े! बहुत ही अच्छी हंसी वे हंसे!
"ये बात मुझे तब किसी ने कही होती, तो मैं मान नहीं सकता था, हां! अब मानता हूं! इंसानी सोच और जज़्बात पर आपकी पकड़, सच में मुफीद ही कहूंगा मैं!" बोले वो,
"मुफीद ही या फिर साफ़ ही?" पूछा मैंने,
''ये भी खूब!" बोले वो,
"साफ़ होकर ही गुफ्त-गु आगे बढ़ाई जाए?" पूछा मैंने,
"हां, बिलकुल! क्यों नहीं!" बोले वो,
''अरुमा! याद है?" पूछा मैंने,
अब चुप वो, संजीदा हो गए, कुल पांच-सात मिनट तक, न जाने किस से बातें करते रहे, शायद अपने आप से ही, इतने सालों में खुद के अंदर ही अंदर, एक अंदरूनी ज्ञान और खड़ा कर लिया था उन्होंने! उनके नज़रिये से देखें, तो ये भी सही ही रहा, नहीं तो कहीं अब तक ख़तम ही न हो जाते!
"हां याद है! लेकिन एक बात कहूंगा, इस से पहले आप कुछ और कहो!" बोले वो,
"ज़रूर, मैं सुनना चाहूंगा!" कहा मैंने,
"अब आप दोबारा उसका नाम अपने मुंह से नहीं लेना! ठीक?" बोले वो,
"जी ठीक!" कहा मैंने,
"दूसरा ये, कि मैं आज भी उसे इंतहा प्यार करता हूं और जीते जी, आखिरी दम तक करता ही रहूंगा! ठीक?" बोले वो,
"समझ सकता हूं ज्ञान बाबू! आपका शादी न करना, इसका सबसे बड़ा गवाह है! आपकी इस मुहब्बत की क़द्र न की होती तो शायद मैं, ये डायरी पढ़, कहीं किसी और काम में मसरूफ़ हो गया होता!" कहा मैंने,
"आप बेहद ही अच्छे इंसान हैं!" बोले वो,
"शुक्रगुज़ार हूं आपका!" कहा मैंने,
"पूछो, क्या पूछना है?" बोले वो,
"क्या आप वहां, कभी बाद में गए थे?" पूछा मैंने,
"हां, कई बार!" बोले वो,
"मुलाक़ात हुई?" पूछा मैंने,
"अंदर नहीं गया" बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"डर लगता था!" बोले वो,
"किस से?" पूछा मैंने,
"खुद से!" बोले वो,
"वो क्यों?" पूछा मैंने,
"आप जैसा और खुद से डर?" पूछा मैंने,
"हां, सही कहा आपने! मुझ जैसा और खुद से डर?" बोले वो,
"कैसे मानूं?" कहा मैंने,
''डर!" बोले वो,
"कैसा?" पूछा मैंने,
"कमाल है!" बोले वो,
"बताइये तो!" कहा मैंने,
''अंदाज़ा नहीं?" बोले वो,
पल भर में ही उनका आशय समझ आ गया मुझे! उफ़! ये तो मेरे बस से बाहर की बात थी सोचने के लिए! ऐसा अथाह प्रेम!
"हां, समझ गया!" कहा मैंने,
"इसीलिए, नहीं गया अंदर!" बोले वो,
"या फिर, यूं कहूं कि मिले नहीं!" कहा मैंने,
"हां, ये ही बात है!" बोले वो,
"चूंकि आप तब होश सम्भाल चुके थे!" कहा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"एक बार नहीं, दो बार भी नहीं, आप जब तीसरी बार गए, तब तक होश सम्भाल चुके थे! है न ज्ञान बाबू?" पूछा मैंने,
"एकदम ठीक, सटीक!" बोले वो,
"सब आपकी डायरी में लिखा है, बस, अदृश्य रूप में, या यूं कहा जाए कि कूट-भाषा में या फिर, पढ़ने वाला ही हो कोई!" कहा मैंने,
"तभी आप यहां हैं!" बोले वो,
"बिलकुल!" कहा मैंने,
"मैं नहीं भुला पाया!" बोले वो,
''भुला भी नहीं सकते!" कहा मैंने,
"मेरे लिए मुश्किल था!" बोले वो,
"नहीं, आसान था! बहुत आसान! बस आपने खुद से चोरी की, उसकी नहीं सुनी और मर्ज़ी भी नहीं की, बस, उस ज्ञान को सदा, वहीँ पाया आपने, यही न?" कहा मैंने,
"हां! वहीँ! आज भी!" कहा उन्होंने,
"अब जाओगे?" पूछा मैंने,
"वहां?" बोले वो,
"हां?" कहा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"डर?" कहा मैंने,
"हां, डर!" बोले वो,
"अब कोई नहीं वहां?" पूछा मैंने,
"नहीं कह सकता!" बोले वो,
"कह सकते हो! आपने तो पढ़ भी इस बारे में?" कहा मैंने,
"बहुत कुछ जानते हो?" बोली वो,
"अंदाज़ा बस!" कहा मैंने,
अब वे चुप! फिर से!
"हावड़ा जाओ!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"***पुर के लिए टैक्सी लेना!" बोले वो,
"फिर?" कहा मैंने,
"पहले ए ब्लॉक! फिर बी!" बोले वो, आंखें बन्द करते हुए!
"फिर वो अस्पताल!" बोले वो,
"जच्चा-बच्चा केंद्र?" पूछा मैंने,
"हां!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"स्ट्रीट नम्बर एक, ** **७५, दायीं तरफ!" बोले वो,
"जी! फिर?" कहा मैंने,
"एहसान!" बोले वो,
"मैं नहीं मानता!" कहा मैंने,
"मेरे लिए!" बोले वो,
"आऊंगा!" कहा मैंने,
"उम्मीद रखूं?" बोले वो,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
"कुन्नू?'' बोले वो,
"हैं भाई साहब?" बोले वो,
"दूसरी चाय बनवा दो!" बोले वो,
और फिर से टेक लगा ली कुर्सी से!
चाय, वो वाली ले जाई गयी वापिस, पकौड़े हम खा ही रहे थे, ज्ञान बाबू, अभी तक सन सत्तासी में ही जी रहे थे! कुछ देर बाद चाय आ गयी, हमने चाय पी और बातें करने लगे!
"ज्ञान साहब?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"अब तो सब बदल गया होगा?" पूछा मैंने,
"शहहह! कोई आवाज़ सुनाई देती है आपको? मेरे पास?" पूछा उन्होंने,
"कैसी आवाज़?" पूछा मैंने,
"कुछ अलग सी?" बोले वो,
"हां, इस पंखे की!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"इधर आओ?" बोले वो,
मैं उठ कर सामने चला, उनके पास! उनको देखा, वो हाथों में हाथ बांधे सामने, खिड़की से बाहर झांक रहे थे, अचानक, हाथ उठाया अपना, हाथ कांप रहा था, उंगलियां खोलीं उन्होंने और सामने की तरफ की!
"वो कुछ दीखता है?" बोले वो,
सामने तो कुछ नहीं था, कुछ भी नहीं, हां, एक जगह एक बोर्ड था, किसी धार्मिक-संस्था का, और कुछ नहीं, सिर्फ खाली सी ही ज़मीन थी वो!
"हां!" कहा मैंने,
"क्या?'' पूछा उन्होंने,
मैं उनके मनोभाव पहचान गया था! इसीलिए उनके अंदर के ज्ञान से अब मुख़ातिब हो गया था!
"वो एक, केबिन सा है शायद?" कहा मैंने,
"हां! हां! वो, एक केबिन है!" बोले वो,
"उधर की रेलवे लाइन?' बोले वो,
"कहां?'' पूछा मैंने,
"उन झुरमुटों के पास ही तो!" बोले वो,
"अरे हां! देखा!" कहा मैंने,
"लेकिन.....वहां कोई गाड़ी नहीं आती...बहुत दिनों से देख रहा हूं....कोई नहीं आयी..." बोले वो,
एक पल को, मेरे आंसू मेरी आंखों से ही छलक जाते...कितना भोलापन था, कितना विश्वास उन्हें अपने पर!
"गाड़ी क्यों नहीं आती?" बोले वो,
"शायद अब सर्विस बन्द हो?" कहा मैंने,
"वो क्यों?" पूछा उन्होंने,
"शायद, कोई दूसरी लाइन बनी हो?" कहा मैंने,
"हां, हो सकता है..." बोले वो,
"ऐसा ही होगा" कहा मैंने,
"अरे कुन्नू?" बोले वो,
"जी भाई साहब?" बोले वो,
"वो ज़रा लेकर आओ?" बोले वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"मेरी बत्ती?" बोले वो,
"कौन सी?" पूछा मैंने,
"यहीं गिर गयी थी न?" बोले वो ढूंढते हुए उसे!
"क्या करोगे उसका?" पूछा मैंने,
"आपको दूंगा!" बोले वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"रात के लिए! वहां कोई बत्ती नहीं है!" बोले वो,
"तब तो है बत्ती मेरे पास!" कहा मैंने,
"है? तो कोई बात नहीं!" बोले वो,
"हां, कोई बात ही नहीं!" कहा मैंने,
"आप आधे घण्टे में पहुंच जाओगे हावड़ा!" बोले वो,
वो अभी तक, कोलकाता में ही थे! ज़माना बीत गया था! लेकिन उनके लिए, ये सन सत्तासी ही था!
"तब पता है न?" बोले वो,
"हां, पता है!" कहा मैंने,
"मुझे खबर दोगे न आप?" बोले वो, मुझे न देखते हुए!
"हां ज्ञान बाबू! क्यों नहीं दूंगा खबर! क्यों नहीं!" कहा मैंने,
और मैं वापिस अपनी कुर्सी पर आ बैठा.........
कुछ देर बैठे हम और फिर खड़े हो गए! तभी देखा मैंने कि एक लड़की उनके लिए जूस ले आयी थी! उस जूस को देखा तो बरबस मेरे होंठों पर मुस्कान खिंच आयी! उनको जूस दे दिया गया, ये जूस कांच के गिलास में था सो देखा सका मैं! ये सन्तरे का जूस था! मैं रुक गया, उन्होंने जूस लेकर एक छोटे से स्टूल पर रख दिया!
"ज्ञान साहब?" कहा मैंने,
"जी?" बोले वो,
"वो डॉक्टर साहब कभी कॉलेज आये दोबारा?" पूछा मैंने,
वे मुस्कुराये! और जूस उठाया अपना, एक घूंट भर, फिर रुमाल से रुमाल पोंछा अपना, और जूस रख दिया स्टूल पर!
"ये जूस की आदत, मुझे डॉक्टर साहब ने ही लगाई! आज तक नहीं छोड़ पाया मैं! मुझे वो अपने साथ ही नज़र आते हैं, ऐसा लगता है! जहां तक बात की अपने उनके दोबारा आने की, तो मैं, रोज ही इंतज़ार किया करता था, बार बार जाकर, देखा भी करता था, कोई दूसरा वैसा होता, तो जांचा भी करता था...लेकिन यही कहूंगा, कि नहीं उस दिन के बाद से कोई मुलाक़ात नहीं हुई मेरी!" बोले, बेहद ही जोश से भरे हुए!
"शुक्रिया ज्ञान साहब! एक बात कहूंगा मैं, मैंने इस दुनिया में, अपनी निगाहों से, नज़रों से, पता नहीं कितने इंसान देखे, लेकिन आप, ज्ञान साहब, आप सबसे अलग ही हैं!" कहा मैंने,
"उन्होंने मुझे ऐसा बनाया, मेरा कोई लेना-देना नहीं!" बोले वो,
"यही एक वजह है!" कहा मैंने,
"समझता हूँ मैं आपका मतलब!" बोले जूस उठाते हुए वो, घूंट भरा और देखा मुझे उन्होंने,
"आप नहीं लेंगे जूस?" पूछा उन्होंने,
"वापिस आऊंगा, तब!" कहा मैंने,
"जी!" बोले वो,
और सर आगे की तरफ झुका लिया उन्होंने,
"अब चलता हूं ज्ञान साहब!" बोला मैं,
"इंतज़ार में हूं!" बोले वो,
"ज़रूर!" कहा मैंने,
कुणाल साहब के साथ हम बाहर आगये, उनसे विदा लेने से पहले चन्द बातें ज़रूर हुईं! वे कोई स्थानीय मदद हमारे लिए उपलब्ध करवा देते, रहने और ठहरने का इंतज़ाम भी हो जाता! खैर, मुझे तो वहां सिर्फ एक बार ही जाना था, उसी में मैं जान लेता हाल वहां का, उम्मीद कर था कि ज़रूर कुछ मिले, जिस से मैं कम से कम ज्ञान बाबू को कुछ हंसी या सुकून दे सकूं!
और फिर हम निकल गए वहां से...दो रोज बाद की सियालदाह राजधानी के टिकेट आ गए, बस हो गए सवार, रास्ते में कुणाल साहब से बातें होती रहीं थीं तो हमें उनके वो जानकार लेने आने वाले थे! और जब हम पहुंचे तब वे हमें मिल गए! बेहद ही भीड़ भरा सा क्षेत्र है ये! मेरे तो हर विज़िट पर, नया सा ही, बदला बदला सा लगता है! पुराना शहर है बहुत! इतिहास समेटे हुए बड़ा ही लम्बा चौड़ा अपने अंदर!
तो हम उस जगह चले गए, वहां आराम किया, और फिर वहां जाने के लिए, कल का समय निश्चित कर लिया! शाम को, थोड़ा बहुत घूमे-घामे एयर रात को खाना खाया! हमने बातचीत में पता चला कि जिस जगह ज्ञान बाबू रहा करते थे, आज तो समृद्ध क्षेत्र है! तमाम नए रूप से बना हुआ! अब हर जगह के लिए सर्विस है वहां से! और अब तो एक बड़ी जनसंख्या वहां निवास करती है! कॉलेज आदि भी खुल गए हैं एक बड़ी यूनिवर्सिटी भी है! लेकिन मुझे तो सन सत्तासी की वो जगह देखनी थी, जो ज्ञान बाबू ने देखी थी!
अगली सुबह, चाय-नाश्ता कर, हम निकल गए, हमने टैक्सी ही ली थी, अपनी गाड़ी नहीं, मैं उस प्रकार से जाना चाहता था जिस प्रकार से ज्ञान बाबू जाया करते थे!
"हां भाई! बी ब्लॉक के खत्म होने पर!" बताया मैंने उस चालक को,
"अच्छा जी!" बोला वो,
"अब तो सी ब्लॉक नया बन गया होगा?" पूछा मैंने,
"हां साहब!" बोला वो,
"कब से?" पूछा मैंने,
"बीसों साल हुए साहब!" बोला वो,
"अच्छा, आप कब से हो यहां?" पूछा मैंने,
"मुझे तो आठ साल हुए!" बोला वो,
"कहां के रहने वाले हो?" पूछा शहरयार जी ने,
"जी पटना का!" बोला वो,
मेरे चेहरे पर, हंसी के से भाव उठे! ये सब, क्या ताना-बाना है वक़्त का! कभी कुछ और कभी कुछ!
"बस आ गए!" बोला वो,
मेरे दिल धक् से रह गया उसके ये शब्द सुनकर!
