ज्ञान बाबू की डायरी...
 
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ज्ञान बाबू की डायरी, वर्ष १९८७....

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श्रीशः उपदंडक
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 ज्ञान बाबू की डायरी...
ये डायरी मुझे ज्ञान बाबू के एक जानकार ने ही दी थी, ज्ञान बाबू का स्वास्थ्य अब वैसा नहीं कि उनसे कोई बातचीत की जा सके, वे, मानसिक रूप से द्रवित एवम किसी मानसिक रोग से पीड़ित लगते हैं... सच कहूँ तो मैंने भी ये डायरी करीब साल भर तक नहीं पढ़ी थी, ये डायरी मैंने सन दो हज़ार चौदह में पढ़ना शुरू किया, शुरू शुरू में मुझे ये डायरी किसी ऐसे लेखक की कृति सी लगी, जिसने विषय को बार बार बदल हो, जैसे वो अटल नहीं रहा हो अपनी ही मान्यताओं पर, कुछ कुछ अनाप-शनाप सी, कुछ फ़िल्मी सी कहानी! लेकिन एक रात, जब मैंने ये डायरी पढ़नी शुरू की, तो सच में, यही कहूंगा कि ऐसी डायरी मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में नहीं पढ़ी! कैसा भारी और वजनदार व्यक्तित्व रहा होगा ज्ञान बाबू का! क्या क्या गुजरी थी उनके साथ! कोई नहीं जान पाया! किसी से कह नहीं पाए! बस, कागजों पर उतारते गए कुछ दिन, कुछ लम्हें और कुछ जज़्बात, खुद उनके! इस डायरी को पढ़ने के बाद मेरे मन में ज्ञान बाबू के लिए न सिर्फ आदर ही बढ़ा बल्कि ऐसा भी इंसान होता है, ये भी जान पाया! ये डायरी, कहीं कहीं बे-सर-पैर वाली सी, कहीं कहीं इस संसार से अलग, कसी अनजान ही दिशा में ले जाने वाली सी लगती है! मैं इसी डायरी को अपने ही शब्दों में पेश करता हूँ आप पाठकों के समक्ष! शेष बातें बाद में!
पेश है, ज्ञान बाबू जी की डायरी!
................................................................
२८ अगस्त, शुक्रवार, १९८७ 
आज मैं, राजेश जी से मिलने गया, मुझे राजेश जी के विषय में, एक बीमा एजेंट नवेद से पता चला था, मैं, दूर गाँव से, यहां, कोलकाता अपनी पढाई के सिलसिले में आया हूँ, मुझे आगे की अपनी पढाई, दर्शनशास्त्र की यहीं से करनी है, जैसे भाग्य ने ही मेरा रास्ता खोल दिया है! मेरा सम्बन्ध एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार से रहा है, पिता जी ने खूब मेहनत कर, हमें पढ़ाया है! उन जैसा पिता सभी को दे ईश्वर! जिसने कभी मुझे माँ की कमी न महसूस होने दी! मेरे से छोटा भाई गाँव में ही रह कर, विद्यालय में पढाई कर रहा है! एक बहन है, सो ब्याह दी गयी है! हां, तो मैं यहां किराए के लिए कमरे की तलाश में आया था! मुझे राजेश जी के पास भेजा गया था, बताया गया था कि राजेश जी, भारतीय डाक विभाग से सेवानिवृत हैं, एक पुत्र है जो सरकारी नौकरी करता है, इसी वर्ष उसका चयन हुआ है! जब मैं पहुंचा तो..दरवाज़ा बन्द था, ये मकान काफी बड़ा, फुलवारियों लगा और खुला-खुला सा था, एक ही नज़र में पसन्द आ गया था! शहर से थोड़ा दूर और शान्ति प्रदान करने वाला!
मैंने दरवाज़ा खटखटाया, 
दरवाज़ा अंदर से खुला और अंदर ही धकेला गया! अंदर, एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था, परिधान से कोई मज़दूर या माली सा लगता था, भारी जिस्म था उसका और कुछ पक्का सा रंग!
"कौन?" पूछा उसने,
"जी, राजेश जी से मिलना है!" बोला मैं,
"कहाँ से आये हो?" पूछा उसने,
"जी, नवेद जी ने भेजा, अभी फिलहाल वहीँ ठहरा हूँ!" बोला मैं,
"अच्छा अच्छा! आइये आइये!" बोला वो,
और वो आदमी मुझे अंदर ले आया, मुझे बिठाया गया, ये ड्राइंग-रूम था उस घर का, दरवाजों पर, सांकलें लगीं थीं! बड़ी बड़ी! भारी भारी! खिड़कियाँ काफी बड़ी बड़ी, हरा रंग लगाया गया था उनके बॉर्डर पर!
"लीजिये, पानी!" बोला वो आदमी,
"शुक्रिया!" बोला मैं,
और प्लेट हटा, पानी पी लिया!
"और?" पूछा उसने,
"हाँ!" बोला मैं,
"लाता हूँ!" बोला वो, और चला गया, आगे, एक सीढ़ी सी नीचे को जाती थी, शायद रसोई थी वहां उस घर की! कुछ हाथ से बनी बढ़िया पेंटिंग लगी हुई थीं, एक सरकारी सा पुरूस्कार भी सजा था एक दीवार पर!
"लीजिये!" बोला वो,
पानी ले आया था, मैंने पानी पिया तो गिलास उसने ले लिया झट से!
"कहीं गए हैं क्या?" पूछा मैंने,
"आते ही होंगे!" बोला वो,
"अच्छा, मुझे पता नहीं था, नहीं तो बाद में चला आता!" बोला मैं,
"कोई बात नहीं, आते ही होंगे!" बोला वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वैसे यहां के तो नहीं लगते?" बोला वो,
"तभी तो मकान ढूंढ रहा हूँ!" हंसते हुए बोला मैं,
"पढाई करते हो या नौकरी?" बोला वो,
"जी अभी पढाई!" बोला मैं,
''अच्छा!" बोला वो,
"घर में और कोई नहीं?" पूछा मैंने,
"सब हैं!" बोला वो,
"नज़र नहीं आया कोई?" पूछा मैंने,
"सभी गए हैं!" बोला वो,
"मैं बाद में आऊं फिर?" पूछा मैंने,
"बैठो, चाय रख दी है!" बोला वो,
"अरे?" कहा मैंने, तक़ल्लुफ़ से!
"पन्द्रह-बीस मिनट में आ जाएंगे सभी!" बोला वो,
"कौन कौन है घर में?" पूछा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"सभी हैं!" बोला वो,
"फिर भी?" पूछा मैंने,
"सबसे पहले राजेश जी, फिर मालकिन सविता, फिर अनीता, उनकी बड़ी लड़की, फिर लड़का है, वो बाहर रहता है, नौकरी इसी साल लगी है, और ये छोटी लड़की, अरुमा! ये है परिवार!" बोला वो, कमर पर खुजलाते हुए,
"और बुरा न मानो तो...आप?" पूछा मैंने,
"बुरा क्या मानना! मुझे नौकर ही समझिये!" बोला वो,
"अच्छा! नाम आपका?'' पूछा मैंने,
"किशन" बोला वो,
"तो किशन जी, ये सभी कहाँ गए हुए हैं?" पूछा मैंने घड़ी पर नज़र डालते हुए!
"ये जो छोटी लड़की है न? वो दरअसल, बीमार है, करीब तीन महीनों से!" बोला वो,
"बीमार? क्या हुआ है?" पूछा मैंने,
"पता नहीं, पूछा नहीं, पर दिमाग में कुछ बिमारी है, यही पता चला!" बोला वो,
"तब तो शहर गए होंगे?" पूछा मैंने,
"हाँ, शहर ही!" बोला वो,
"अक्सर जाते हैं?" पूछा मैंने,
"अक्सर तो नहीं, हफ्ते में कोई एक बार?" बोला वो,
"अच्छा, समझा!" बोला मैं,
"अनीता बेटी तो ब्याहता हैं, पिछले बरस ब्याह हो गया था, उनके पति भी डॉक्टर ही हैं, उन्होंने ही अरुमा को उनके जानकार के यहां ले जाने को कहा था!" कहा उसने,
तभी बाहर खटखटाहट हुई, वो किशन उठ खड़ा हुआ!
"आप बैठो, वे लोग आ गए!" बोला वो,
और दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा, कमर से अंगोछा खोला और कन्धे पर रख लिया था, खोल दिया था दरवाज़ा उसने! अंदर जो आया, वो एक सभ्रांत से पुरुष थे अपनी पत्नी के साथ, कुरता और धोती पहने हुए, वे उनकी पत्नी भी ठीक वैसी ही ही साधारण सी थीं, हाँ, अनीता कुछ सजी-धजी सी लगी थी मुझे! उसी ने सबसे पहले देखा था मुझे, मैं उठ खड़ा हुआ था, तब! और वो अरुमा, उसका सर ढका था, वो थोड़ी छोटे से कद की, गठीली सी लड़की जान पड़ती थी, अनीता उसको लेकर सीधा उसके कमरे में ले गयी थी, माता जी भी संग ही चली गयीं थीं उनके!
"पानी!" बोला किशन राजेश जी से,
वे नीचे बैठे और मुझे भी बैठने को कहा,
"पानी पिया?" पूछा उन्होंने,
"जी, पिया!" बोला मैं,
अब उन्होंने पानी पिया और गिलास रख दिया उल्टा कर के उस प्लेट में!
"नवेद ने भेजा आपको?" पूछा उन्होंने,
"जी!" कहा मैंने,
"ठीक! किशन?" बोले वो,
"जी?'' बोला किशन,
"नाम क्या है आपका?" पूछा उन्होंने,
"जी, ज्ञान!" बोला मैं,
"हाँ, किशन? ज्ञान को ऊपरी मंजिल का, वो कोने वाला कमरा दिखा दो!" बोले वो,
"जी, आइये ज्ञान बाबू!" बोला किशन,
मुझे बड़ी ही हैरत हुई! ठीक है, जान-पहचान सही, लेकिन कम से कम कुछ पूछना तो था ही उन्हें मुझ से! लेकिन कुछ भी न पूछा, बस नाम! खैर, अब हम ऊपर थे, ऊपर की मंजिल पर, कोने वाला कमरा देखा, बढ़िया कमरा था, अंदर ही एक छोटी सी रसोई भी थी! मैंने हर जगह नज़र दौड़ाई! खुली खुली सी जगह! बाहर झांको खिड़की से तो हरियाली ही हरियाली! दूर, एक रेलवे लाइन गुजरती हुई!
"ये रसोई भी साथ ही है!" बोला किशन!
"अच्छा?" मैंने हैरत से पूछा,
"जी!" बोला वो,
"ये तो बढ़िया है!" कहा मैंने,
"सब्जी-भाजी लाता हूँ मैं, आपकी भी ले आया करूँगा!" बोला वो,
"अरे वाह!" कहा मैंने,
"पसन्द आया?" आयी आवाज़ राजेश साहब की!
"जी! जी बाबू जी!" बोला मैं,
"देख लो अच्छी तरह से!" बोले वो,
"जी देख लिया!" कहा मैंने,
"आप तो दर्शन-शास्त्र के विद्यार्थी हो न?" बोले वो,
"जी!" कहा मैंने,
"यहां, एकांत में अच्छा शिक्षण होगा, क्यों?'' बोले वो,
"जी! सही कहा आपने!" बोला मैं,
"सामान कहाँ है?" पूछा उन्होंने,
"अभी खरीदना है!" बोला मैं,
"कोई ज़रूरत नहीं!" बोले वो,
"ज...जी?" मैंने हैरानी से पूछा,
"सब यहीं है! अपने आप को आप यहीं का सदस्य समझो, ठीक?" बोले वो,
मुझे बेहद हैरत हुई! ये क्या हो रहा था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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खैर! लगा कि खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान! मिसाल सुनी बहुत थी, देख आज अपने पर ही ली थी! कहाँ मैं सोच रहा था कि न जाने कैसे कोई ठौर-ठिकाना नसीब होगा वहां, गाँव के एक जानकार थे नवेद, वे बीमा एजेंट थे, उन्होंने मदद न की होती तो शायद ही ये खूबसूरत जगह मुझे नसीब होती! ये जगह शहर से थोड़ा सा दूर और एकांत में पड़ती थी! घर में कितने लोग थे, ये जान लिया था, बात सिर्फ मेरी राजेश साहब और उनकी धर्मपत्नी सविता से ही हुई थी! या फिर ये किशन, जो शुरू से ही काफी मददगार रहा था! गाँव से तो मैं क्या संग लाया था, बस एक गद्दा, कम्बल और एक खेस ही, बाकी कुछ पैसे थे जिससे सामान खरीदा जा सकता था! लेकिन यहां उसकी भी आवश्यकता नहीं पड़ी थी, एक पलँग मिल गया था, पढ़ने की किताबें रखने के लिए एक अलमारी, जो शायद राजेश जी के बेटे की रही होगी! पास में ही, कमरे से बाहर निकलते है, दो क़दम पर रसोई थी, यहां पानी आदि की व्यवस्था थी, गुसलखाना आदि थोड़ा दूर जाकर बने थे, पढ़ने वाले के लिए ये जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं थी, मैं दर्शन-शास्त्र की पढाई करते हुए, कुछ ट्यूशन आदि भी देना चाहता था, ताकि कुछ मदद मिल सके आर्थिक रूप से या फिर कोई छोटी-मोटी सी पार्ट-टाइम नौकरी जिस से मेरा गुजर-बसर हो सके! जगह मिल गयी थी, इसकी सूचना मुझे घर पर और नवेद साहब को भी देनी थी, सो दे ही दी थी!
सितम्बर ४, शुक्रवार, रात्रि-समय, १९८७
.......................................................
आज घर में मैंने एक अजीब सी बात देखी, मैं करीब चार बजे घर पहुँच गया था, घर में, राजेश जी, सविता जी नहीं थे, अनीता और वो अरुमा थी, किशन नीचे बैठा हुआ, शाक-सब्जी साफ़ कर रहा था, घर में वैसे तो शान्ति ही पसरी रहती थी, लेकिन आज ये शान्ति कुछ ज़्यादा ही थी, मैं, अपनी किताबों का भरा बैग लिए ऊपर चला और जब अपने कमरे में जाने लगा तब थोड़ा दूर, उस बारामदे में, जहां से सूर्य अब विदा ले चुके थे, कुर्सी पर टेक लगाए कोई बैठा था! ये कौन हो सकता है भला? मैं आगे चला और चुपके से सामने आया, थोड़ा अँधेरा था वहां, बत्ती का स्विच उस कुर्सी के ही पीछे थे, जो बैठा था, वो एक लड़की ही थी, उसके अंगों ने ये साफ़ कर दिया था, और एक बात, उसका बदन बड़ा ही गठीला और मदमाता था! मुझे ऐसा कहने में कोई शर्म आदि का भाव नहीं है! जो था सो था, हाँ, चेहरा नहीं देखा था मैंने उसका, उसकी कद-काठी से लगता था कि ये वही, छोटी लड़की, अरुमा ही है, हाँ! वो अरुमा ही थी! मैंने गौर किया था और मैं जैसे ही लौटा कि आवाज़ आयी! मुझे रुकना पड़ा!
"ज्ञान?" आवाज़ बेहद ही लचीली सी, गदगद करती सी, हल्की सी कामुकता के अवरोध चढ़ते हुए सी थी!
"जी, ज्ञान ही हूँ, आप बैठे रहें, मैं देखने चला आया था कि कौन है, बस!" बोला मैं,
"लोग बनावट क्यों करते हैं ज्ञान?" बोली वो,
मैं चुप! क्या जवाब दूँ! मैं तो जैसे पकड़ा ही गया था, रंगेहाथ!
"बनावट?" बोला मैं हिचकते हुए,
"हाँ?" बोली वो,
और जब और कुर्सी आगे-पीछ्हे हुई, तब मैं जाना कि वो आराम-कुर्सी है! वो आगे पीछे ढुलक रही थी!
"मुझे जानते हो?" झट से पूछा उसने,
"हाँ? क्यों नहीं?" बोला मैं,
"कौन हूँ?" पूछा उसने,
"अरुमा!" बोला मैं,
"नहीं!" बोली वो,
"नहीं?" मुझे हैरत तो नहीं हुई वैसे पूछते हुए, सो, फिर भी पूछा,
"हाँ, नहीं, अरुमा तो नहीं!" बोली वो,
''अरुमा तो? क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"हाँ तो? अच्छी पकड़ है वैसी तुम्हारी!" बोली वो,
"तो का मतलब समझाइये ज़रा?" पूछा मैंने,
"तो का मतलब, नहीं जानते?" बोली वो,
"नहीं!" कहा मैंने,
"एक बात बताओगे?" बोली वो,
"क्यों नहीं?" बोला मैं,
"मेरे बदन को देख रहे थे ना?" पूछा उसने,
ये सवाल सुन, मैं तो रह गया सन्न! लगा, अब बस कुछ ही घण्टे और इस मकान में, और फिर, बाहर जाने का आदेश! क्या जवाब देता?
"बोलो?" बोली वो,
"सच कहूँ तो हाँ!" कहा मैंने,
"घबराओ नहीं, कोई कुछ नहीं कह सकता यहां!" बोली वो,
चिंता, ख़तम! लेकिन? क्यों नहीं कह सकता कोई कुछ यहां?
"हाँ तो मैं अरुमा नहीं हूँ, ये कहूँ तुमसे तो यक़ीन कैसे करोगे?" पूछा उसने,
"आप अरुमा ही हैं!" कहा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"अरुमा? कहाँ है फिर?" पूछा मैंने,
"सामने ही तो, लेकिन है नहीं!" बोली वो,
"सामने? सामने तो आप हो, अरुमा?" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"तुम भी ज्ञान!" बोली वो,
"क्या तुम भी?" पूछा मैंने,
"दर्शन-शास्त्र की पढाई कर रहे हो न?" बोली वो,
"हाँ, कर रहा हूँ!" बोला मैं,
"स्वयं का चित-दर्शन किया है?" बोली वो,
मुझे इस प्रकार के प्रश्न की तो हरगिज़ कोई उम्मीद न थी! इसका अर्थ क्या हुआ? कैसा चित-दर्शन?
"नहीं" कहा मैंने,
"करना आवश्यक नहीं?" पूछा उसने,
"पता नहीं या फिर, नहीं!" कहा मैंने,
"फिर पता ही नहीं!" बोली वो,
"हो सकता है!" कहा मैंने,
"किसी औरत को छुआ है?" पूछा उसने,
"मुआफ़ कीजियेगा, क्या ये सवाल जाती(पर्सनल) नहीं?" बोला मैं, हालांकि मैं एक अजीब सा ही सुख अनुभूत करने लगा था!
"है! मैंने कब मना किया?'' बोली वो,
"तो इसका जवाब मैं दे दूंगा, आपने कैसे सोचा?" पूछा मैंने,
"जवाब तो दे ही चुके हो!" बोली वो,
"और भला, कैसा जवाब?" पूछा मैंने,
"यही कि किसी भी औरत को नहीं छुआ, हाँ, मन बहुत करता है!" बोली वो,
"ये कैसा अजीब सा लांछन आप मुझ पर लगा रहे हैं?" बोला मैं,
"क्या मुझे बैठे देख आपने देखा नहीं मुझे, कई जगह?" पूछा उसने,
मैं चुप हो गया, मुंह में थूक भी नहीं बचा, क्या जवाब देता!
"सच या झूठ?" बोली वो,
"है, सच!" कहा मैंने,
"तब ये बनावट क्यों?" बोली वो,
"बनावट न हो तो क्या हो?" पूछा मैंने,
"तब सिर्फ सच ही रहे!" बोली वो,
क्या बात कही थी! हाँ, तब तो सिर्फ सच ही जो बचता था!
"क्या मैं खड़ी हो जाऊं?" पूछा उसने,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"आपको कोई काम नहीं?" बोली वो,
"कैसा काम?" पूछा मैंने,
"आज नौकरी मिली आपको?" बोली वो,
और मैं ये सुन हैरान!
"आपको कैसे पता?" पूछा मैंने,
"आपके व्यवहार से!" बोली वो,
"सो कैसे?" पूछा मैंने,
"कुछ कह रहे थे न अपने आप से आते हुए?" बोली वो,
"हाँ, तो?'' पूछा मैंने,
"उसमे क्या दोहरा गए थे आप, नहीं पता शायद!" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
"कोई कमल हैं, शायद, कोई वकील, जहां आप, रात आठ बजे तक काम करोगे!" बोली वो,
अब तो हद ही हो गयी! उसने न केवल मेरे शरीर में ही झाँका था, बल्कि दिमाग को भी छान दिया था!
"ऐसा मैंने कहा?" पूछा मैंने,
"हाँ?" बोली वो,
"आपको कैसे पता?" पूछा मैंने,
"ये डायरी रोज तो नहीं होती आपके पास?" बोली वो,
मैंने वो डायरी अपनी बगल में दबायी फिर!
"आप रोज देखती हैं मुझे?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"तब कैसे जानती हैं?" बोला मैं,
"कभी-कभी ही!" कहा मैंने,
"अच्छा?" बोला मैं,
"इसमें कुछ ख़ास?" बोली वो,
"नहीं! नहीं!" कहा मैंने,
"घर में सब ठीक?" पूछा उसने,
"हाँ जी!" कहा मैंने,
"पानी पिलायेंगे?" पूछा उसने,
"क्यों नहीं!" कहा मैंने,
और मैं रसोईघर की तरफ चला, और एक गिलास में पानी भर लिया, और चला बाहर! आया आराम-कुर्सी पर, वो नहीं थी आराम-कुर्सी पर! आसपास देखा तो बाहर खुलने वाली खिड़की की तरफ देखा, वहीँ टेक लगाए खड़ी थी, बाहर की तरफ देखते हुए! सफेद रंग का सूट, कसा हुआ बदन पर, चिपका हुआ, न चाहते हुए भी मैंने सरसरी निगाह डाल ही ली! और पहुंचा उसके पास!
"ये लीजिये!" गिलास बढाते हुए कहा मैंने!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो कुछ न बोली, बाहर ही झांकती रही, मैंने भी बाहर ही देखा, कुछ नहीं था, हाँ, दूर, वो रेलवे लाइन थी, जिसके आसपास कुछ खेत से थे, एक केबिन-रूम सा लगता था और एक, थोड़ा सा पहले, बिजली का ट्रांसफार्मर सा रखा था! और तो कुछ नहीं, बस बाहर वो, बिगुल-बेलिया के खिले फूल ही!
"अरुमा?" कहा मैंने,
उसने अब मुझे देखा, लेकिन चेहरे से वो चुन्नी नहीं हटाई थी, आँखें जो देखीं थीं मैंने, जैसे किसी झीने से पर्दे से झांक रही हों, ऐसी लगी थीं! उसका रंग बेहद गोरा था, उसकी गर्दन पर सुनहरे से रोएं थे, जिस्म की खूबसूरती, बेशुमार थी! उसकी देह का गठन, सच में ऐसा था कि एक बार जो देखे, बरबस देखता ही चला जाए! सो मैं भी अलहैदा न रहा! उसका कद छोटा था, कुल पांच फ़ीट भी मुश्किल, बा-मुश्किल ही रहे, लेकिन उसके बदन में जो आग थी, मैं उसका ही परवाना सा बन जाता था, जब भी कभी उसे देखता तो! हालांकि, आज दूसरी बार ही उसे, मैंने देखा था, और अलग तो आज पहली ही बार!
"पानी?" कहा मैंने,
"अभी रख दो!" बोली वो,
"पीना नहीं?" पूछा मैंने,
"पी लूँ क्या?" पूछा उसने,
"इसीलिए लाया था!" कहा मैंने,
"लाओ फिर!" कहा उसने,
और गिलास उठा लिया, सर घुमाया एक तरफ और पानी पी लिया, गिलास वहीँ, उस खिड़की की मुंडेर पर रख दिया!
कुछ पलों की चुप्पी!
मुझ से तोड़ी न जाए, मेरे शब्द, सही शब्द नहीं निकलें मुंह से!
"एक बात पूछूँ?" कहा और पूछा मैंने फिर भी,
"हाँ?" बोली वो,
"बुरा तो नहीं मानोगी?" पूछा मैंने,
"मानती तो अब तक मान चुकी होती!" बोली वो,
"ऐसा क्या कहा या किया मैंने?" पूछा मैंने,
"जानते भी अनजान हो?" बोली वो,
ला पटका दरिया में! कई सवाल, एक ही मौज़, इर्द-गिर्द!
"मुआफ़ कीजिये फिर तो!" कहा मैंने,
"पूछो, ज्ञान?" बोली वो,
"सच में?" बोला मैं,
"हाँ, सच में!" कहा उसने,
"क्या आप मानसिक-रूप से कुछ....कुछ.....क्या.....??'' पूरा नहीं कह सका, लेकिन वो समझदार लड़की थी, समझ गयी होगी!
"नहीं ज्ञान!" बोली वो,
"आप ठीक हैं?" पूछा मैंने,
"क्या लगती हूँ?" बोली वो,
"एकदम ठीक!" कहा मैंने,
"ठीक ही हूँ!" बोली वो,
"हाँ, सही कहा आपने!" कहा मैंने,
तभी मैंने कुछ देखा, देखा, उस गिलास के इर्द-गिर्द कई चींटियां बेचैन सी हो उठी थीं, जैसे, गिलास पर चढ़ना चाहती हों!
"अरुमा?" कहा मैंने,
"क्या हुआ?" बोली वो,
"ये चींटियां?" कहा मैंने,
"नहीं काटेंगी!" बोली वो,
"ये लाल रंग वाली हैं?" कहा मैंने,
"कोई बात नहीं!" बोली वो,
मेरी नज़र चींटियों पर ही थी, वे अभी भी वहीँ थीं, न जाने कहाँ से कहाँ से आ रही थीं, शायद, गिलास से शक्कर चिपकी थी या उसका पानी, कुछ भी सम्भव था!
"ज्ञान?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"वो सामने, क्या है?" पूछा उसने,
"किधर?" पूछा मैंने झुकते हुए, बाहर झांकते हुए,
"वो?" बोली वो,
उसका हाथ देखा, मखमली, एकदम गोरा सा हाथ, लाल रंग की नेल-पोलिश लगी थी!
"वो ज्ञान?" बोली वो,
"वो? वो कोई केबिन है!" कहा मैंने,
"केबिन?" बोली वो,
"हाँ, लाइनमैन का हो शायद!" कहा मैंने,
"हाँ, क्या कोई है उधर?" पूछा उसने,
"नहीं तो?" कहा मैंने,
"देखें?" बोली वो,
"देखें?" मुझे अजीब सा लगा ये सवाल!
"कभी गए नहीं उधर?" पूछा उसने,
"नहीं तो?" कहा मैंने,
"कभी जा कर देखो!" बोली वो,
"आप गयी हो?" मैंने बाहर देखते हुए पूछा, कोई जवाब नहीं आया, मैं उस दूर बने केबिन को देखता रहा कि शायद कोई दिखे, लेकिन कोई नहीं था वहां!
"आप गयी हो?" पूछा मैंने,
और तब पलट कर देखा.....


   
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श्रीशः उपदंडक
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वो न थी वहां! कमाल की बात! मैं उस वक़्त चौंक उठा! गिलास को देखा, कोई चींटी नहीं वहां, गिलास उठा कर देखा, कुछ नहीं, बस पानी की दो चार बूंदें बस! गिलास उठाया मैंने और चला वापिस, अभी ख्याल में ही खोया था कि उस आराम-कुर्सी पर फिर से नज़र पड़ी! वो हिल रही थी, अब अँधेरा गहरा था वहां! पहले गिलास रखा और फिर उस आराम-कुर्सी की तरफ बढ़ा!
"बहुत देर से आये!" बोली अरुमा,
"बहुत देर से?"" मुझे चक्कर सा आने लगा!
"हाँ, बहुत देर से!" बोली वो,
"क्या बत्ती जला दूँ अरुमा?" पूछा मैंने,
"जला दो!" बोली वो,
और मैंने आगे उठ कर उसके पीछे लगे, दीवार में, उस स्विच को दबा दिया, उस बारामदे में रौशनी फ़ैल गयी! मैं पीछे हुए, और तब अरुमा को देखा! उफ्फ्फ! क्या गज़ब की सुंदरता थी उसके चेहरे पर! वो गुलाबी से होंठ! जिनका घेरा, मेरे लिए तो जानलेवा था! उसकी प्यारी सी नाक और उसके थोड़े सँकरे से छिद्र और उन छद्रों के बीच वो ऊपरी होंठों के बीच का कटाव! चित्रकार होता, तो शायद ज़िन्दगी बिता देता उसको देखते हुए! उसकी आँखें! नीला कमल तो देखा होगा? उस नील-कमल के बीच में जो, लकीर आती है फलक से, ठीक वैसी घुमावदार!
"मैं सुंदर हूँ ज्ञान?" बोली वो,
"बहुत ही सुंदर!" बोला मैं,
"कामुक, हूँ या नहीं?" पूछा उसने,
"बेहद!" कहा मैंने,
अब मैं बस में नहीं था! अगर कुछ होता भी तो मलाल नहीं होता, हाथों में बादल आ जाएँ तो भला धुंए से क्या जूझना! समझ सकते हैं आप मेरा आशय!
"मुझे मेरे कमरे तक छोड़ आओ ज्ञान!" बोली वो,
"हाँ, अभी!" कहा मैंने,
और चला उसकी तरफ!
"मैं चप्पल नहीं पहने आयी थी?" बोली वो,
"पता नहीं अरुमा?" कहा मैंने,
"ज़रा देख दोगे?" बोली वो,
''क्यों नहीं!" कहा मैंने,
और मैंने आसपास देखे, तो हवाई-चप्पल मिले मुझे, लेकिन मुझे कुछ अटपटे से लगे वो, काले रंग के, सफेद सी डोरी बंधी थी उन पर और उनका साइज बड़ा था, सामान्य साइज कहो तो नौ रहा हो, यहां, मुझे जूता आठ नम्बर का आता था!
"क्या यही हैं?" पूछा मैंने,
"हाँ, रख दो!" बोली वो,
मैंने रख दिए नीचे, उसने पहने तो उसके पाँव छोटे पड़े! अब अटपटे क्यों लगे थे, समझ में आ गया था!
"ये बड़े नहीं?" पूछा मैंने,
"हैं!" बोली वो,
और पहन लिए!
"आओ!" कहा मैंने,
वो खड़ी रही और फिर पीछे देखा, फिर आगे और फिर, अपना बायां हाथ आगे बढ़ाया! मैं समझ गया! हाथ पकड़ लिया उसके, जैसे ही हाथ पकड़ा कि लगा कहाँ हूँ मैं? इतना मुलायम, स्निग्ध और हल्का सा!
"चलो ज्ञान!" बोली वो,
"हाँ!" कहा मैंने,
और उसको सहारा दे, ले चला उसके कमरे की तरफ! ये नीचे था, लेकिन तीन चार दिनों से वो एक दूसरे कमरे में आराम करती थी, सो मैं वहीँ ले गया उसको, उसके कमरे के अंदर! और उसके बिस्तर पर बैठा दिया!
"चलता हूँ!" कहा मैंने,
"रुको?" बोली वो,
"हाँ, कोई काम और?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली मुस्कुराते हुए वो,
"तब?" पूछा मैंने,
"वो बैग देना?" बोली वो,
"वो, काला?" पूछा मैंने,
"मैरून" बोली वो,
मैंने उस टेबल से, वो बैग उसको दे दिया, उसने खोला उसे और एक किताब सी निकाली, लेकिन वो खाली थी! उसने उसे खोलकर, सिरहाने रख लिया!
"ज्ञान?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"मुझे याद रख सकते हो?" बोली वो,
"याद? मतलब?" पूछा मैंने,
"बैठ जाओ, यहां, यहां!" बोली, उस कुर्सी की तरफ हाथ करते हुए! मैं बैठ गया, जैसे ही बैठा कि करर की सी आवाज़ हुई, शायद कोई निवाड़ टूटी थी उस कुर्सी की!
"बोलो?" बोली वो,
"कैसे याद?" पूछा मैंने,
"बताओ पहले?" बोली वो,
"याद? कैसे भला?" पूछा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"हाँ!" बोली वो,
"कैसी याद, अरुमा?" पूछा मैंने,
"चलो, बता दूंगी!" बोली वो,
"उम्मीद है!" कहा मैंने,
"रखिये!" बोली वो,
"जी!" बोला मैं,
"वक़्त क्या हुआ?" पूछा उसने,
"पांच का है!" बोला मैं उस से,
"अच्छा, चलो, रात को मिलूंगी!" बोली वो,
"ठीक! आराम करो आप अब!" बोला मैं,
और निकल आया कमरे से बाहर, कमरे से बाहर आया तो एक अजीब सी बेचैनी सी हावी थी मुझ पर! समझ में तो आता था! लेकिन वजूहात बेहद ही अजीब थीं! मैं चल पड़ा अपने कमरे की तरफ! जैसे ही आया तो देखा, वहां की बत्ती बन्द थी और वो आराम-कुर्सी घूम गयी थी! दीवार की तरफ पहले उसकी पुश्त थी, अब नहीं! वो जैसे किसी ने घुमा दी हो! शायद किशन आया हो, और हो सकता है, ये रोज ही ऐसे रहती हो, हो सकता है!
रात का वक़्त, उसी रात करीब दो बजे..
..................................................
मुझे बड़ी हैरत है आज! मैं, अक्सर ढीला-ढाला सा, कुछ कुछ अलमस्त सा हूँ, जल्दी सो जाने वाला, और नींद आने से पहले, कुछ बने हुए, अपने ही ख़्वाबों में रहने वाला हूँ!
लेकिन आज तो कमाल है! आज नींद तो कोसों दूर है! हालांकि पंखें की ज़रूरत नहीं है, फिर भी ज़रूरत सी महसूस होने लगी है! मैं उठा और रसोईघर चला, बत्ती जलाई और पानी लिया, पानी पिया, और हुआ वापिस! जैसे ही वापिस हुआ, कि उस खिड़की से कुछ रौशनी सी आती दिखाई दी! मैंने गिलास रखा और चला उस खिड़की की तरफ! बाहर झाँका, तो देखा कि सामने रेलवे-लाइन पर कोई गाड़ी आयी हुई है, जो शायद माल-गाड़ी है, धीमे धीमे आगे बढ़ रही है, बढ़ रही है या रुकी है? अब गौर से देखा, रेलवे का इंजन है वो शायद, प्रकाश तो वहीँ से आ रहा है! हाँ, पीछे कोई प्रकाश नहीं, वो गार्ड-कोच सबसे पीछे होगा, जो कहीं छिपा है पेड़ों में! करीब पन्द्रह मिनट के बाद, गाड़ी आगे बढ़ी, उसकी आवाज़ पहुंची अब यहां तक! और फिर उस गार्ड-कोच को भी देखा, जिसमे पीछे एक लालटेन टँगी थी! देखते ही देखते, वो गाड़ी चली गयी वहाँ से! अब फिर से सुनसान और अँधेरा हो उठा!
"कोई गाड़ी गयी है?" आयी आवाज़! 
पलट कर देखा मैंने, ये अरुमा थी, अकेली, खड़ी हुई, एक गुलाबी सी नाइटी में, अँधेरा था, इतना ही देखा, और देखना था मुझे, लेकिन देख नहीं पाया! मैं अंदर से क्या हूँ, ये मैं ही जानूँ बस!
"हाँ!" कहा मैंने,
"दो बजे वाली?" बोली वो,
"शायद!" कहा मैंने,
"वही होगी!" बोली वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"नीचे चलोगे?" बोली वो,
"नीचे? इस वक़्त?" हैरानी से पूछा मैंने,
"कोई नहीं कहेगा कुछ!" बोली वो,
"लेकिन ढाई बजा है अरुमा?" बोला मैं,
"तो?" बोली वो,
"अच्छा लगेगा?" बोला मैं,
"हाँ या ना?" बोली वो,
"हाँ!" कहा दिया मैंने, मैं 'खोना' तो कुछ चाहता ही नहीं!
"आओ!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
और मैं आहिस्ता आहिस्ता, चोर की तरह से, नीचे चल पड़ा उसके साथ! एक बात समझ नहीं आयी, शाम को, उसे सहारा देना पड़ा था, अब नहीं? वो क्यों भला?
"शाम को, मेरे पेट में कुछ दर्द था ज्ञान! इसीलिए सहारा देने को बोला था!" अचानक से बोल पड़ी वो!
मेरा, धुंधला पड़ा सा शीश, जवाब का पानी पड़ते ही, शफ़्फ़ाफ़ हो गया था! उसकी शख़्शियत अब मुझ पर हावी होने लगी थी, हावी भी न कहूँ तो बराबर आने लगी थी! और हम नीचे आ गए! घुप्प अँधेरा तो नहीं था, बाहर जलता हुआ बल्ब उजाले को समेटे हुआ था, अँधेरे ने भी दोस्ती की राह कर ली थी उस बल्ब से, पुराने यार थे शायद दोनों ही, अँधेरा वहां, ज़्यादा नहीं था!
"वहां चलो!" बोली वो,
"किधर?" पूछा मैंने,
"उधर? वो पेड़ है न?" बोली वो,
"वो?" पूछा मैंने,
"हाँ, वही!" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
और हम चल दिए, तभी पीछे कुछ आवाज़ सी हुई, जैसे कोई खिड़की टकराई हो, मैंने रुक कर पीछे देखा, बत्ती बन्द हुई थी अचानक से ही, उस अरुमा के कमरे की! या फिर मुझे ऐसा लगा था!
"आ जाओ, कुछ नहीं है वहां, न कोई और!" बोली वो,
मैं, चला, फिर रुक गया, पीछे देखा, सौ सवाल दिमाग में दौड़े! फिर चला आगे, फिर देखा पीछे, बत्ती जल रही थी! शायद मुझे वहम हुआ था!


   
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श्रीशः उपदंडक
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वहम भी बड़ी अजीब ही चीज़ होती है! बन जाए तो उम्र भर संग लगे, कट जाए तो सिर्फ हंसी ही! लेकिन ये मेरे लिए हंसी न थी! रात के ढाई बजे, इस तरह मैं और अरुमा, बाहर, उस मकान के, कोने में लगे, उस बड़े से पेड़ के पास जाने के लिए निकले हों, ये भला मैं क्या लिख रहा हूँ? चलो, भूलता हूँ उस खिड़की की बन्द बत्ती को!
"ये पुराना पेड़ है बहुत!" बताया उसने, चलते हुए,
"लगता है, काफी बड़ा है!" बोला मैं,
"आठ साल पहले हम यहां आये थे!" बोली वो,
"पूरा परिवार?" पूछा मैंने,
"हाँ!" बताया उसने,
और अब पेड़ आ गया था, मुझे तो डर लगने लगा था उसके नीचे! उसके पीछे एक चहारदीवारी थी, फिर एक बड़ा सा रास्ता, आसपास उस तरफ कहीं कोई बसावट नहीं थी, वो जगह निर्जन ही थी, डर इसी मारे उभर आया था!
"पीछे देखो?" बोली वो,
मैंने पीछे देखा, कमाल था! पूरा घर अँधेरे में नहा गया था, बस एक ही खिड़की से बत्ती बाहर आ रही थी, और वो ही अरुमा का कमरा था!
"क्या देखा?" पूछा उसने,
"वो बत्ती वाला कमरा!" कहा मैंने,
"हाँ, अब कोई वहम?" बोली वो,
"नहीं, कोई नहीं!" कहा मैंने,
"अनीता को देखा है तुमने?" बोली वो,
"हाँ, आपकी बड़ी बहन?" पूछा मैंने,
"हाँ! वो ही!" कहा उसने,
"कैसी है?" पूछा उसने,
"मतलब?" पूछा मैंने,
"बातचीत में?" बोली वो,
"कम बोलने वाली, कुछ कुछ शक्की स्वभाव वाली, जल्द ही विश्वास न करने वाली सी लगती हैं मुझे वो!" कहा मैंने,
"और कोई सेक्सुअल-एप्रोच?" पूछा उसने,
"जी?" मैं इस सवाल के लिए तो क़तई तैयार ही न था! कोई उम्मीद ही न थी!
"बताओ?" बोली वो,
"ठीक-ठाक!" कहा मैंने,
"ह्म्म्म! तभी उसके पति ने छोड़ रखा है उसे!" बोली वो,
लगता था कि दोनों ही बहनों में, आपस में, तना-तनी सी थी, अब किस बात पर, ये नहीं पता था मुझे, ये क्या, कुछ भी नहीं पता था मुझे!
"एक बात बताऊं?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"वो और मैं सगी नहीं!" बोली वो,
आँखें खुलीं मेरी! एकदम अजीब सी हुईं!
"सगी नहीं?" पूछा मैंने,
"हाँ, वो दूसरी औरत से है!" बोली वो,
"मतलब आपके पिता जी की पहली पत्नी से?" पूछा मैंने,
"हाँ, ये ही!" बोली वो,
"लेकिन आपका ख़याल तो रखती हैं!" कहा मैंने,
"ख्याल?" बोली वो,
"हाँ?" बोला मैं,
"नहीं, नज़र!" बोली वो,
"नज़र? क्या मतलब?" पूछा मैंने,
"वो अभी भी नज़र रखे है हम पर!" बोली वो, एक हल्की सी मुस्कुराहट भरते हुए! और मैं! मैं जैसे ज़मीन में धँसता हुआ जाऊं नीचे! जैसे मेरी गर्दन में लगे स्प्रिंग जो देखें चारों दिशाओं में एक साथ! और आँखें, जैसे बनी दूरबीन! लेकिन मुझे तो कुछ दिखे नहीं?
"नज़र रखे हैं?" पूछा मैंने,
"हाँ, अभी भी!" बोली वो,
"कहाँ से?" मैंने झूठी हंसी हंसते हुए पूछा,
"देखोगे?" बोली वो,
डर के सांप ने मारी फुफकार! दिमाग समझाये मुझे बार बार! सही बात है, ये अरुमा, सच में ही दिमाग के रोग से ग्रस्त है! तभी तो ऐसी बे-सर-पैर की बातें! अजीब अजीब सी! न ठौर, न ठिकाना!
"हाँ, देखना चाहूंगा!" कहा मैंने,
"इधर आओ?" बोली वो,
"यहां?" पूछा मैंने,
"हाँ! यहां! खड़े हो जाओ!" बोली वो,
"ठीक!" कहा मैंने, मुंह बाहर दीवार की तरफ रहा, कान नीचे, अरुमा की तरफ लगे रहे!
"यहीं रहना, जब कहूँ देखो, तब देखना बाहर!" बोली वो,
"ठीक है!" मैंने हिम्मत बाँधी! देखें, एक मानसिक रोगी कैसी कैसी उड़ान भरता! ज़रा पता तो चले!
"यहीं रहना!" बोली वो,
"हाँ, यहीं हूँ!" कहा मैंने,
वो चली एक तरफ, दीवार से बाएं, फिर दीवार तक आयी, दीवार में ही, हाथ लगा जैसे बाहर झाँका, जैसे बाई-स्कोप देखा करते हैं लो! और फिर कुछ समय........ऐसे ही रही...


   
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श्रीशः उपदंडक
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करीब पांच मिनट बीत गए! मुझे लगा कि बहती हवा में कोई नमी सी बहने लगी है! सबकुछ शांत था, पर न जाने क्यों मेरी खाल पर, रोएं से खड़े होने लगे थे! ये मस्तिष्क की कोई प्रक्रिया था, या भय की शुरआत या फिर मेरा अनजाना सा डर, जो अब बस कुलांच भरने को ही था!
"ज्ञान?" बोली वो,
"हाँ?" मैंने मन्द से स्वर में कहा,
"सामने देखो?" बोली वो,
मैंने सामने देखा, लगा कि कुछ उछलता सा चला आ रहा है! एक तो अँधेरा, अँधेरे के कुछ गाढ़े से टुकड़े, जैसे उछलते चले आ रहे हों और फिर कुछ आवाज़ें! आवाज़ें पहचानी तो तो लगा कि जैसे कई हज़ार से मेंढक उछलते चले आ रहे हों सामने उस जगह से! वे इस तरह से उछले कि जैसे मुझ पर ही गिर पड़ेंगे! मैंने फौरन ही अपना हाथ अपने माथे पर रख लिया था! अगले ही पल देखा तो कोई मेंढक नहीं, सब शांत सा ही था वहां! हाँ, अभी भी मेरे कानों में उन मेंढकों की टर्र-टर्र से गूंजती रही! क्यों> उस समय तो सोचा ही नहीं!
"ज्ञान?" बोली अरुमा,
"हाँ?" कहा मैंने,
"अपने पीछे देखो?" कहा उसने, हालांकि वो सामने ही दीवार में देख रही थी! मैंने झट से पीछे देखा, उस मकान की खुली खिड़की में बत्ती जली थी, और उस समय, उस बत्ती वाले कमरे की खिड़की से, जैसे कोई औरत, दीवार पर, ऊपर की तरफ पाँव करते हुए, सर नीचे किये हुए, छिपकली की तरह से चलती हुई, छत पर चली गयी! ये क्या था? क्या मेरा वहम? क्या मेरा डर? क्या मेरे मस्तिष्क पर कैसी और का नियंत्रण था? ये क्या देखा था मैंने! दिल ज़ोर से धड़का मेरा! दिल में, दिल से नीचे की तरफ, एक तेज सा दर्द उठा! मैं नीचे बैठ गया! मुझे नीचे बैठे देखा, अरुमा दौड़ी चली आयी उधर!
"ज्ञान?" बोली वो,
अब दर्द था या नहीं? या मुझे ही महसूस हुआ था पल भर को? मैंने दिल से हाथ नहीं हटाया, और मेरी नज़रें फिर से उस खिड़की पर चली गयी! वहां कोई न था, न उस खिड़की की दीवार के ऊपर!
"खड़े होओ!" बोली वो,
"मेरे दिल में......" बोला मैं और रुका!
"दर्द हुआ था? अब नहीं है न? उठो?" बोली वो,
मैं उठ गया, हाथ हटाया दिल से, सच में दिल में दर्द नहीं हुआ था मेरे तब, उसके बाद!
"अरुमा?" मेरी आवाज़ काँपी और मैंने पूछा,
"हाँ?" पूछा उसने,
"वो क्या था?" पूछा मैंने,
"उधर?" बोली वो,
"हाँ?" पूछा मैंने,
"कुछ नहीं!" बोली वो,
"लेकिन मैंने किसी को देखा था?" कहा मैंने,
"वो उस बेल की परछाईं थी!" बोली वो,
"किस बेल की?" पूछा मैंने,
"उधर देखो?" बोली वो,
मैंने गौर से देखा, हाँ, दीवार से चिपकी एक बेल तो थी वहां! अब समझ गया मैं, मेरा डर ही मुझे हांक रहा था, बड़ी आसान सी बात है, अपने दिमाग को, किसी को हांकने मत दो! लगा ली गाँठ!
"तो वो अनीता?" पूछा मैंने,
"देखना ही चाहते हो?" बोली वो,
"हाँ!" मैंने हिम्मत जुटा आकर, और जांचने के लिए अपनी हिम्मत को, पूछा उस से!
''आओ फिर!" बोली वो,
"कहाँ?" पूछा मैंने,
"अब आओ?" बोली वो,
"चलो!" कहा मैंने,
हम चल दिए, सवा तीन बज चुके थे, रात तो काली थी ही, और डर की कूची ने वीभत्स बना कर रख छोड़ा था!
"उधर देखो?" बोली वो,
"वो क्या है?" पूछा मैंने,
"वो एक सर्वेंट-क्वार्टर है!" बोली वो,
"तो अनीता जी यहां?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"आओ पहले!" बोली वो,
पता नहीं! पता ही नहीं मैं क्यों उसकी बातें माने जा रहा था! दीवार में बाई-स्कोप! वो खिड़की से उल्टा चढ़ती औरत! क्या था ये सब? मुझ जैसा, पढ़ा-लिखा आदमी और ये हाल? आखिर किसलिए?
"हाँ, यहां रुको!" बोली वो,
"हाँ, रुक गया, अब?" बोला मैं,
"सुनो! ध्यान से सुनो!" बोली वो,
मैंने ध्यान से सुना, कोई भी आवाज़ नहीं! कुछ भी शोर नहीं! कुछ भी तो नहीं! आसपास देखा, कुछ भी नहीं!
"क्या है?" पूछा मैंने,
"शहहहः!! नीचे!" फुसफुसा के बोली वो,
और मुझे कुछ समझ ही नहीं आया, क्या नीचे, कहाँ? और....तभी....!!


   
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श्रीशः उपदंडक
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नीचे? मतलब?" मैंने इस बार तो हैरानी से पूछा, मैं तो सच में ही अंदर ही अंदर अपनी इस 'पढ़ी-लिखी' मूर्खता पर हंसे जा रहा था! मोटे मोटे शब्दों में, एक पागल संग, पागल से हरकतें!
"नीचे देखो?" बोली वो,
अब देखने को था क्या भला नीचे! सो देखा नीचे!
"कहाँ? क्या है?" पूछा मैंने,
"दीखता नहीं क्या ज्ञान?" बोली वो,
"क्या, सबकुछ..............................!" मैं चुप हुआ!
सबकुछ वैसा नहीं था, जैसा सबकुछ मैंने सोचा था! यहां कुछ अजीब सी घास थी, वो घास थी या कुछ और? देखना तो चाहता था लेकिन देखा नहीं!
"ये क्या है अरुमा?" मैंने, देखते हुए पूछा उस घास को,
"ये बाल हैं!" बोली वो,
बाल? अब तो लगा कि मैं सच्चा ही साथी बनने वाला हूँ इस मानसिक-रोगी लड़की का! मुझ से अच्छा और कौन होता भला! दीवार का बाई-स्कोप! वो खिड़की से चिपकी छिपकली सी कोई औरत, और अब ये बाल!
"मज़ाक?" पूछा मैंने,
"किस बात का ज्ञान?" पूछा उसने,
"ये बाल हैं?" पूछा मैंने,
"छू कर देख लो?" बोली वो,
"हाँ, देखता हूँ!" कहा मैंने,
और मैंने एक लट सो पकड़ ली, और सच में ये बाल ही सी लगी! क्या अजीब बात है? क्या मैं पागल हूँ? हो गया हूँ?
"है न बाल ही?" बोली वो,
"ह....हाँ....लगते हैं..." कहा मैंने,
"कहा न था?" बोली वो,
"ह...हाँ, अब चलें?" पूछा मैंने,
"क्यों?" बोली वो,
"बस अब, सुबह काम भी है, जागना भी तो है?" बोला मैं,
"अनीता को नहीं देखना?" बोली वो,
"बस, फिर कभी!" कहा मैंने,
"जैसी मर्ज़ी!" बोली वो,
और चलने लगी वापिस! मैं उसके पीछे पीछे चल पड़ा! घड़ी पर नज़र डाली तो साढ़े तीन से ऊपर का समय था! हम अंदर आये और मैं ऊपर की टफ चढ़ने लगा, अरुमा अपने कमरे में ही चली गयी! मैं सीधा अपने कमरे में चला आया, जो देखा था, उसको दिमाग से निकाल बाहर किया, अब सुबह हो और नयी शुरुआत हो!
०१ अक्टूबर, गुरुवार, १९८७ 
.......................................
कुछ दिन बीत गए हैं! मुझे रात में, शाम के समय कुछ अजीब अजीब सी आवाज़ें सुनाई देती हैं, जैसे कोई बिल्ली हो, कोई कुत्ता और कभी कभी जैसे खिड़की से कोई औरत आवाज़ दे रही हो! ये मतिभ्रम सा हो चला है मुझे! और उस रात के बाद मैंने अरुमा को भी नहीं देखा है, वो आराम-कुर्सी जस की तस ही रखी है! हाँ, अनीता को दो बार देखा, एक बार बाहर, कपड़े सुखाते हुए और एक बार उसे बाहर से अंदर आते हुए, दोनों बार ही उसने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई! आज, थोड़ी देर पहले मैंने अनीता को करीब से देखा, एक मेज़ उठानी थी, तब बुलाया गया था मुझे, किशन और राजेश जी घर में नहीं थे, अभी अनीता को देखा तो सच कहता हूँ, वो भी मुझे कमाल की ही औरत लगी! वो भी बेहद ही खूबसूरत, कसे जिस्म की मालकिन और भूरी आँखों वाली है! देखा जाए तो अरुमा से कम नहीं, अनीता का कद करीब मेरे बराबर, यानि पांच फ़ीट छह इंच ही होगा, जो मुझे सबसे आकर्षक अंग उसके लगे, वो है उसका वक्ष! सच में, बेहद सुंदर वक्ष है उसका! और अब मुझे पता चलता जा रहा है कि मैं भी कितना कामुक क़िस्म का इंन्सान हूँ! मेरे तार खुले हैं तो जाना है मैंने! खैर, कामुक होना कोई दोष वाली बात नहीं! मेरे दर्शन-शास्त्र में इस विषय में कहीं कहीं लिखा अवश्य ही है!
रात्रि समय, करीब ग्यारह बजे, उसी दिन..
......................................................
मैंने भोजन कर लिया है, आज किशन ने माछ-भात खिलाये, अपने गाँव की याद आ गयी! मैंने ज़रूरत से ज़्यादा ही खा लिया था, खाना बना ही इतना अच्छा था! अभी और माछ मिल जाती, तो शायद दो और खा ही जाता!
मेरे पीछे एक तेज आवाज़ हुई है, जैसे कोई गिरा हो नीचे, मैं आता हूँ और फिर लिखता हूँ!
...................कुछ पलों का विश्राम.............
नहीं, कुछ नहीं हुआ था विशेष! घर में नीचे कुछ लकड़ी का काम होना है, उसका ही एक प्लाई-बोर्ड नीचे खिसक गया था, मैं आया और किशन, हम दोनों ने उसको सही ढंग से रखा!
अब रात के साढ़े ग्यारह बज चुके हैं, नींद का समय है, रात के कपड़े पहन लिए हैं और अब सोने की तैयारी है, मैं लेट गया हूँ!
शुभ-रात्रि..
अगली सुबह, पांच बजे.....
........................................
रात बड़ी ही अजीब सी बात हुई है, पता नहीं लिखूं या नहीं, ये मेरा वहम था या यक़ीन! खैर, लिखूंगा, अभी मेरी बात किशन से हुई थी, किशन यहां आठ सालों से हैं, यहां, उस से पहले से भी वो इसी घर का नौकर रहा है, उसे घर की सारी जानकारी है, सोचा उसी से बात की जाए तो बात की! उसके अनुसार, अरुमा और अनीता, इनमे आपस में नहीं बनती, क्योंकि दोनों ही अलग अलग माँ की औलादें हैं! अनीता के पति, जो कि एक डॉक्टर हैं, अच्छे, भले आदमी हैं, अरुमा की हालात करीब चार सालों से ऐसी ही है, उसे क्या मर्ज है, किसी को पता नहीं चला आज तक! कई ओझे भी आये और कुछ ऐसे ही लोग, लेकिन जितना कर सकते थे, उतना ही कर पाए, परिणाम, कुछ न निकला! हालांकि मुझे इन बातों पर यक़ीन नहीं है, लेकिन प्लेस्बो-मेडिसिन भी कभी कभी काम कर दिया करती है!
अरे हाँ! एक बात तो ज़रूर लिखूंगा! मैं जहाँ पार्ट-टाइम नौकरी करता हूँ, वहां एक क्रिस्चियन लड़की आती है, उसका नाम जूली है! आजकल पता नहीं मुझे क्या हो गया हेम हर औरत में मुझे कुछ न कुछ आग सी दिखाई देने लगी है! ये कमाल ही है, गाँव के दिनों में मुझे लड़कियां, भाई ही कहा करती थी! और अब देखो! हाँ तो ये जो जूली है, बहुत ही आकर्षक है! उसका साथ मुझे बेहद पसन्द है! खुला मिज़ाज़, खुला अंदाज़! मदमाता जिस्म और उसकी चमचमाती सी छुअन! सच पूछो तो यही मेरी तनख़्वाह है! और कुछ कहाँ चाहिए! कभी कभी ऐसा लिखते हुए अजीब भी लगता है कि मैं किस दर्ज़े का, अव्वल दर्ज़े का ही मानो, हुस्न का आशिक़ बन गया हूँ! और कहने में शर्म क्या भला! मेरी डायरी, मेरी ही तो है!


   
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नवम्बर ०१, इतवार, १९८७
........................................
आज मेरी छुट्टी थी, सो मैं आज निकल गया था सुबह ही घर से, कल शाम से राजेश बाबू जी की भी तबीयत खराब थी, उनसे कुछ बातें हुई थीं, लेकिन इन बातों का दायरा, केवल घर से बाहर का ही था, उसमे घर का कोई सदस्य शामिल न था! आज मैंने जूली के साथ घूमने का मन बनाया था, खुश था बहुत, हाँ, मेरी पढ़ाई में अब ज़रूर ही कुछ दिक्कत आने लगी थी! लेकिन, कुछ अधिक मेहनत से ये दिक्कत दूर की जा सकती थी! इसीलिए चिंता नहीं थी! लेकिन, जूली नहीं आयी उस रोज! घण्टे भर इंतज़ार किया मैंने, विक्टोरिया-मेमोरियल आया था, अब अकेला ही घूमा और फिर वापिस हुआ! घर आया तो दो बज चुके थे, खाना खाने की इच्छा अभी नहीं थी! सो, हाथ-मुंह धोये और अपने कमरे में चला गया! आँखें बन्द कर लीं, सोचा कल जूली से हिसाब बराबर कर के ही रहूंगा और चेहरा पर एक कुटिल सी मुस्कान फ़ैल गयी! चेहरे पर, होंठों से निकल कर! मेरी आँख लग गयी थी....
"ज्ञान?"
"ज्ञान?"
मेरे दिमाग में ये आवाज़ गूंजी, लेकिन आँखें नहीं खुलीं मेरी! सपने तो मैं देखता ही था, अब पता नहीं कौन आवाज़ दे रही थी, वो अरुमा या फिर अनीता!
"ज्ञान?"
"ज्ञान?" 
आवाज़ फिर से आयी! और इस बार आँखें खुल गयीं! कुछ पल, लेटा ही रहा, अब सपने देखने वाला आदमी ज़रा संशय में ही रहता है, कि ये असलियत ही है या फिर कोई सपना ही! सो हिला नहीं, ऐसे ही रहा! घड़ी पर ज़रूर, सामने रखी थी, स्टूल पर ही, नज़र डाली, तीन बजकर, छब्बीस मिनट हुए थे! एक जम्हाई आ गयी! सो खींच के ली! ऐसी खींच के कि आँखों में पानी ही आ गया!
"ज्ञान?"
"ज्ञान?"
आवाज़, फिर से वही, आसपास देखा, घर से तो कोई आवाज़ नहीं, झट से उठ खड़ा हुआ! बाहर तो धूप खिली थी, लेकिन तेज भले ही न हो, कोई रुकता तो नहीं! सो उठ खड़ा हुआ, रसोई तक आया, अंदर गया, पानी लेने के लिए गिलास लिया, गिलास पकड़ना चाहा तो ऊँगली लग, नीचे गिर गया, खनाक की सी तेज आयाज़ हुई, नीचे झुका और गिलास उठाया, और पानी डाला! जब पीने लगा, तो दो बाल से नज़र आये उसमे, बाल निकाले, तो लम्बे बाल, ये किसी औरत के ही थे, लेकिन, यहां कैसे? शायद, पहले के रहे हों, मेरे आने से पहले के, पानी उड़ेला, गिलास साफ़ किया, फिर से पानी भरा और गिलास में डाला, पानी का एक घूंट भरा...
"ज्ञान?" आवाज़ आयी,
बाहर चला, बाहर खिड़की खुली थी, वहीँ आया, मेरे या तो कान बज रहे थे, या मैं अभी भी नींद के आग़ोश में ही था!
खिड़की से बाहर झाँका, कि दूसरा घूंट पिया पानी का, और बाहर देखने लगा, बाहर के परिदृश्य में कुछ जाने अनजाने से चित्रण से दिखे, चित्रण, हाँ, चित्रण ही कहूंगा, अक्सर सफेद से, गुबार वाले बादलों में अनजाने सी, लेकिन कोई तस्वीर सी जन्म ले लेती है, वही कहा मैंने चित्रण! तो बाहर ज़मीन पर भी कुछ ऐसा ही था! ग्वार-पाठे के पौधे, केतकी के पौधे और कुछ कुछ सदाबहार के नीले, सफेद से फूल! और वो बड़ा सा पेड़, अब देखा मैंने गौर से, वो कटहल का पेड़ था!
"ज्ञान?" आयी फिर से आवाज़,
आवाज़ की दिशा तो सामने से ही आयी थी, सो सामने देखा! कुछ नहीं! लगता था, अभी तक उनींदा ही हूँ मैं!
"यहां, इधर?" आयी आवाज़,
अब सामने फिर से, गौर से देखा, और एकदम जाकर, मेरी नज़र ठहर गयी! वो दूर रेलवे-लाइन! और उस लाइन के पास, एक टूटे शहतीर पर बैठी कोई औरत, बाल लम्बे थे, इसीलिए औरत कहा उसे! उसने ही हाथ हिलाया था! मेरी साँसों में बवाल सा आ गया! मैंने सामने फिर से देखा, तो दाएं से, एक सवारी गाड़ी आती दिखाई दी! उसके इंजन से निकला धुंआ, पीछे के पूरे आकाश को ही काला किये जा रहा था! उस इंजन ने सीटी मारी! और वो औरत, जस की तस बैठी रही! जस की तस!
इंजन धड़धड़ाते हुए निकल गया! लेकिन मेरे कान? मेरे कानों में उस इंजन की आवाज़ कैसे पहुंची? उसकी कैंची की आवाज़? वो झक्क-झक्क और इंजन की सीटी? वो तो बहुत दूर था? डिब्बे भी कितने थे? पांच ही! मेरी आँखें उस शोर से बन्द हो गयी थीं! अभी तक उस इंजन की कैंची की आवाज़, मेरे कानों में चलती जा रही थी!
"ज्ञान?"
"ज्ञान?"
फिर से आवाज़!
सामने देखा, तो बस वो गाड़ी ही नहीं, शेष सब, वैसा ही! टूटा शहतीर और उस पर बैठी वो ही औरत!
"कौन हो तुम?" मैंने मन ही मन, सवाल किया!
"पहचाना नहीं?" आयी आवाज़,
मैं तो खो गया सुध-बुध! सोचा, सब असलियत ही है, और न भी हो तो भी क्या!
"किसको नहीं पहचाना?" सवाल किया मैंने,
"मैं? अनीता!" बोली वो,
"अ...अनीता?" बोला मैं मन ही मन,
"हाँ!" बोली वो,
"हाँ? बोलो?" किया मैंने सवाल,
"यहां आ जाओ!" बोली वो,
"वहाँ?" बोला मैं,
"हाँ, यहां!" बोली वो,
"किसलिए?" पूछा मैंने,
"आओ?" बोली वो,
"कैसे?" पूछा मैंने,
"अरुमा से बच कर!" कहा उसने,
"ब...बच..कर?" मैंने पूछा,
"हाँ, बच कर उस से!" बोली वो,
"क्या कहती हो आप?" पूछा मैंने,
"सच कहती हूँ!" बोली वो,
"न मानूँ तो?" बोला मैं,
"फिर न ही मानो!" बोली वो,
"नहीं मानूँगा!" बोला मैं,
"कब तक?" बोली वो, 
और मैं, काँप गया! खड़े खड़े! हाथ से गिलास नीचे जा गिरा! खनाक की तेज आवाज़ हुई!


   
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श्रीशः उपदंडक
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मैं, बर्फ की तरह से जम कर रह गया था! एक से लेकर हज़ार तक सवाल ही सवाल खड़े हो चुके थे, मेरी अपनी सभी मान्यताएं, हवा की तरह से नदारद हो चुकी थीं! मुझे, मेरी कमर पर किसी ने छुआ था, पलट आकर देखा तो ये अनीता थी! अनीता? लेकिन वो यहां कैसे? ये सब क्या हो रहा था? चोरों की तरह से मैंने नज़रें चुरायीं और सामने उस, रेलवे-लाइन पर देखा! सबकुछ था वहां, जस का तस, लेकिन उस शहतीर पर अब कोई औरत न थी, जो औरत, पल भर पहले वहां थी, वो अब मेरे पीछे खड़ी थी! मैं अंदर ही अंदर काँप रहा था, किसी से कुछ बोल नहीं सकता था, किस से बोलता? दिल से तो कई बार झूठ बोल चुका था, दिमाग की चलने नहीं दी थी मैंने! फिर किस से कहता, खुद से कहता तो मानो दुनिया से कहता, क्योंकि मैं सच्चा नहीं हूँ!
"नहीं मानोगे ज्ञान?" उसने मुझे मेरे कन्धे पर थपकी देते हुए पूछा,
"क....क्या?" मैंने कँपकँपी दबायी अपनी और सब भूल गया था मैं तो! अब तक जो हुआ था, सब जैसे भूले बैठ गया था, या फिर...याद नहीं करना चाहता था!
"ज्ञान?" बोली वो,
हाँ, वही आवाज़! वही आवाज़ थी, सच...सच में शहतीर पर बैठी वो औरत, यही अनीता थी, मेरे दिमाग ने फौरन ही उस चित्रण को ज़िंदा कर दिया था!
"जानते हो ज्ञान?" बोली वो,
"क्या?" पूछा मैंने,
और तब घूम गया उसकी तरफ! लाल रंग की साड़ी में, दहकती हुई नीली आंच सी क़ैद थी जैसे! लेकिन मैं ज़्यादा नहीं देख पा रहा था, अब शर्म का भाव था मेरे चेहरे पर!
"अरुमा!" बोली वो,
"क्या अरुमा?" पूछा मैंने,
"उस से दूर ही रहो!" बोली वो,
"वो क्यों?" पूछा मैंने,
अरुमा से मुझे कुछ अपनापन सा था, अब क्यों था, ये मैं जानूँ.....या आप भी जान लें...अगर मेरी तरह ही 'फितरत' हो आपकी या हो गयी हो!
"ज्ञान?" बोली वो,
"हम्म?" कहा मैंने,
"वो, उस रात, उसके संग, तुम ही थे?" बोली वो,
"किस रात?" पूछा मैंने,
"उस रात, अब बनो मत?" बोली वो,
"बताओ तो?" कहा मैंने,
"वो, उस पेड़ के पास?" बोली वो,
"हाँ, मैं ही था!" कहा मैंने,
"किसलिए?" बोली वो,
"उसने बुलाया था!" बताया मैंने,
"और तुम गए?" कहा उसने,
"क्यों नहीं जाता?" पूछा मैंने,
"समझ सकती हूँ!" बोली वो,
"क्या?'' पूछा मैंने,
"तुम वैसे हो नहीं जैसे दिखाना चाहते हो?" बोली वो,
"कैसा?" पूछा मैंने,
"विद्यार्थी!" बोली वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"वही!" कहा उसने,
"क्या?" पूछा मैंने,
"जूली के संग!" बोली वो,
इस से पहले कि मैं कुछ कहता, मेरे हाथों ने, फौरन ही उसकी बाजुएं पकड़ लीं! उसकी और मेरी नज़रें मिलीं, नज़रें उछलीं, कभी इधर, कभी उधर! कभी आँखों के बीच, कभी आँखों के कोने!
"आप कैसे जानती हैं जूली को?" मेरा अगला सवाल था!
"मैं सब जानती हूँ ज्ञान!" बोली गम्भीर सी!
"कैसे?" पूछा मैंने,
"तुमने ही तो बताया?" बोली वो,
"मैंने?" पूछा मैंने,
"हाँ!" कहा उसने,
"कब?" पूछा मैंने,
"उस किताब पर!" बोली वो,
मैंने उस किताब पर नज़र डाली, किताब दूर रखी थी, किताब थी, यही दिख रहा था, लिखा हुआ, ऊपर का, बिलकुल नहीं!
"क्या लिखा है?" पूछा मैंने,
"मुझे छोड़ो तो?" बोली वो,
"ह....हाँ...ओह.....मुआफ़ कीजियेगा...." निकला मेरे मुंह से!
और छोड़ दीं उसकी बाजुएं! वो चली और उस किताब को उठाया, लायी किताब और पहला सफा पलटा, बड़ा सा, चित्र सा, कैलीग्राफी सा, जूली शब्द लिखा था! मैं हैरान था! मैंने नहीं लिखा था ये! किताब लेनी चाही, तो नहीं दी उसने! मुस्कुरा दी!
"मेरी किताब?" कहा मैंने,
"तुम्हारी नहीं है!" बोली वो,
"दो तो सही?" कहा मैंने,
"क्यों?" बोली वो,
"देखूं तो?" कहा मैंने,
"क्या?" पूछा उसने,
"लाओ?" कहा मैंने,
"न दूँ तो?" बोली वो,
"क्यों न दोगी?"
"हाथ पकड़ लोगे फिर क्या?" पूछा उसने, हंसते हुए, किताब को, अपने छाती से बांधते हुए!
"लाओ अनीता!" कहा मैंने,
"ले लो!" बोली वो,
"मज़ाक़ नहीं!" कहा मैंने,
"ना ना!" बोली वो,
"लाओ!" कहा मैंने,
"ना!" बोली वो,
और चलने लगी पीछे, लौटने लगी, मुझे देखते हुए ही! मैं भी चल पड़ा उसके पीछे, नज़रें बांधे हुए!
"रुको अनीता!" कहा मैंने,


   
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श्रीशः उपदंडक
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अनीता नहीं रुकी, मेरा कमरा भी पार कर लिया था उसने, और फिर रुक गयी! किताब को, उसी दीवार के पास रखी टेबल पर रख दिया! मैं उसी किताब के पास आ कर रुक गया! लेकिन नज़र न हटी मेरी उस से! एक अजीब सी खिंचन थी उसकी निगाहों में! वो रुक गयी थी, उसकी नाभि पर मेरी नज़र पड़ी, कौड़ी की शक्ल से, सँकरी सी लम्बवत नाभि में मैं जैसे खो गया था! क्या हो जो अगर..........!
"अनीता!" कहा मैंने,
''आओ!" बोली वो, फुसफुसाई ज़्यादा!
"कहाँ?" मैं भी फुसफुसाया!
"जहां मैं कहूँ!" बोली वो,
"हाँ, चलो!" बोला मैं,
और चल पड़ा उसके साथ, कोई हांक रहा था मुझे, बादलों में चल रहा था मैं, मेरा सर बेहद ही खाली सा था! वो एक कमरे में जा मुड़ी और मैं भी अंदर कमरे में चला गया, उसके साथ ही साथ!
"खट्ट!" चिटकनी बन्द की उसने कमरे की!
और मैं, उसमे डूबा हुआ, तैरता हुआ, उसके ही इशारों पर नाचने वाला कोई बन्दर सा लगने लगा था! बन्दर तो फिर भी आँख पीट लेता
 लेकिन मैं तो कल्पना मात्र से ही ढीला हो गया था!
"बैठो ज्ञान!" बोली वो,
और मैं, झम्म से उस बड़े से सोफे में धँस गया!
"पानी?" पूछा उसने, कांच का गिलास उठाते हुए और अपने सुर्ख-रु से होंठों को, उसमे से झाँकने देते हुए!
"हाँ!" बिना उखड़ी सांस के मैंने हाँ कह दी!
"अभी लो ज्ञान!" बोली वो,
और कांच के गिलास में उस कांच के जग से पानी निकालना शुरू किया, उस जग पर दो मछलियां बनी हुई थीं, घटते हुए पानी के साथ उनका रंग भी बदले जा रहा था! फिर उसका उस ख़ास तरीके में खड़ा होना, उसकी उभरी हुई जाघों को देख, मेरे मन में, न जाने क्या क्या उभर आया था!
पानी डाल लिया गया था, बड़ी वो मेरी तरफ, पास में ही आ बैठी गिलास लिए हुए, स्प्रिंग लगी हुई गर्दन मेरी झट से उस तरफ मुड़ गयी!
"ज्ञान चटर्जी!" बोली वो,
"हाँ अनीता!" बोला मैं,
"उ हूँ! अनीता उपाध्याय!" बोली वो,
मैं चुप, क्या फ़र्क़ पड़ता था, कोई भी 'आय' हो, मुझे क्या!
"ज़्यादा प्यास लगी?" पूछा उसने,
दरअसल, मेरे टेंटुए की हड्डी अंदर और बाहर, जली जल्दी हुई थी, इस से मेरी जीभ ने होठों पर लसिका लगाने की कोशिश की थी, यही वो भांप गयी थी!
"हाँ अनीता!" कहा मैंने,
"लो, पानी पियो!" बोली वो,
और मैंने मुंह खोला, जैसे ही खोला कि उसने अपनी तर्जनी ऊँगली मेरे मुंह में डाल दी, मुझे आभास हुआ, लेकिन मेरी जीभ गीली नहीं थी, मेरे पपड़ीदार होंठों ने उसकी ऊँगली को बता दिया था ये!
"लो?" बोली वो,
और गिलास मेरे होंठों से लगा दिया! सच कहता हूँ! शराब क्या नशा देगी जो उस पानी ने दिया! पल भर को लगा कि मैं ही शायद दुनिया का वो सबसे भाग्यशाली इंसान हूँ जिस से सभी दूसरे पुरुष चिढ़ा करते हैं! मैं गटागट पानी पी लिया! गिलास हटा लिया उसने! मेरी नज़र उसके उभरे हुए वक्ष पर पड़ी, एक सफेद सोने से बनी कली उसके वक्ष के बीच में पड़े चीर में फंसी थी! वो फंसी थी, कली या मैं, समूचा का समूचा! क्या कहूँ!
"ज्ञान?" बोली वो,
"हाँ!" बे-रोक-टोक मैंने झट से जवाब दिया!
"मेरे बारे में कुछ बताया?" पूछा उसने,
अब नज़र उस चीर से हटे तो कुछ बोलूं भी! वो भांप गयी और, और ज़्यादा करीब हो गयी! मेरी पढ़ाई तो गिरी जैसे गड्ढे में! ये कौन सी पढ़ाई? कैसी पढ़ाई! लेकिन छोड़िये! बेहद ज़रूरी थी मेरे लिए तो! जिसने अंजुल भर भी पानी न पिया हो, उसकी प्यास पूछिये किसी कटोरे में भरे पानी को देख कर! सो ही मेरा हाल!
ओफ़्फ़्फ़! वो भांप गयी, जिसका डर था, सो हुआ, आँचल से ढक लिया अपना वक्ष! मुस्कुराते हुए, पूछा उसने, दो तीन बार टुकड़ों में!
"क्या बताया ज्ञान?" बोली वो,
"कुछ विशेष नहीं?" कहा मैंने,
"यही कि शादी से खुश नहीं मेरे पति?" बोली वो,
"हाँ, ये भी!" कहा मैंने,
"क्यों नहीं ये नहीं?" पूछा उसने,
"जी नहीं, ये तो नहीं?" बोला मैं,
"मैं दूसरी माँ की हूँ?" बोली वो,
"हाँ, ये भी!" कहा मैंने,
"वो नहीं?" बोली वो,
"जी नहीं, ये तो नहीं?" कहा मैंने,
"ज्ञान?" बोली वो,
"हाँ?" कहा मैंने,
"ज़रा पानी देना?" बोली वो,
"अभी!" बोला मैं,
और एक दूसरे गिलास में पानी डाला और दे दिया उसे! उसने लिया, आधा गिलास पिया और बाकी रख दिया!
"क्या कर रहे हो आज रात?" पूछा उसने,
"जी?" मैंने अचरज से पूछा,
"हाँ, आज रात?" पूछा उसने,
"कब?" बोला मैं,
"रात दो बजे!" बोली वो,
"दो बजे?" मैंने चकित हो कर पूछा,
"क्यों?" बोली वो,
"क्या कहूँ?" कहा मैंने,
"तो हाँ मानूँ?" बोली वो,
"क्या कहूँ?" बोला मैं,
"हाँ कहो?" बोली वो,
और रखा मेरे कन्धे पर हाथ उसने!


   
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श्रीशः उपदंडक
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उसने हाथ क्या रखा, मुझ में ईंधन सा सुलग उठा! न चाहता मैं तो मैं क्या फ़र्क़ पड़ता था और चाहता तो भी क्या फ़र्क़? नहीं नहीं! तब तो फ़र्क़ पड़ता था, मेरा दिल, जो सच में ही एक चोर था, प्रबल चाटुकार भी था, अब पता चला था! मुझ जैसे ही होते होंगे वो इंसान जो..........ऐसा किया करते होंगे! तो, मैंने मन की बात मानी और दो बजे के लिए हाँ कर दी!
तब मैं, निकल आया उसके कमरे से बाहर! मुझे ताज़ा हवा सी लगी! तो बदन में भी ताज़गी सी आयी! बदन में ताज़गी आयी, तो एक इम्तिहान भी याद आया! अब आप पूछेंगे कि कौन सा इम्तिहान! तो जी, इम्तिहान अपना ही! अब क्या लिखूं! आप समझदार होंगे, और दर्शनशास्त्री भी तो अवश्य ही समझ ही जाएंगे!
खैर, मैं अपने कमरे में आया, आया तो बैठा, बैठा तो लगा कि जाँघों में पसीना सा आ गया है, सोचा, नहा ही लूँ! कपड़े उतारे, और अंदरूनी कपड़े पहन चला गुसलखाने! बाल्टी में पानी रखा था, तो नहाया मैं! बड़ा ही मजा सा आया नहाने में उस दिन तो! मन में तो लड्डू फूट फूट, पहाड़ बने जा रहा था! आज तो ये और आज तो वो! आह! बस आह! यही निकले!
रात एक बजे, मेरी नींद खुल गयी! सच पूछो तो, नींद आयी ही कहाँ थी! कभी दस मिनट, कभी बीस मिनट, एक झपकी और फि से बालों को सँवारना!
लेकिन! ठीक डेढ़ बजे, बत्ती चली गयी! मोमबत्ती जलाई तो कुछ उजाला हुआ, नीचे, सीढ़ियों से, दीखा उजाला, शायद किशन ने मोमबत्ती जलाई हो या फिर लैंप! खैर, मैं बाहर का जायज़ लेने के लिए उस खिड़की तक चला! बाहर झाँका, बाहर झाँका तो नितांत अँधेरा! ऐसे में कैसे बने बात अब? कहीं लड्डू-पहाड़ बिखर ही न जावे! अरे आ जा! बत्ती जी, आ जाओ!
रात करीब पौने दो बजे....
बत्ती नहीं आयी, अँधेरा ही अँधेरा, अब क्या हो? क्या करूँ? नीचे चलूं? हाँ, चलो, नीचे ही चलूं! तो जी नीचे की तरफ चला! ये अनजान सी चाह, एक मिनट, अनजान? नहीं नहीं नहीं! ये अनजान नहीं, जानी हुई सी, अब जानी भी क्या, खुद की ही बनाई और फिर जानी सी चाह, कहीं का न रहने दे किसी को! बस चाह उभरे ऐसी! तो नीचे चला, नीचे हल्का सा उजाला था, कोने में, लटक रहा था जलता हुआ लैंप! लेकिन आसपास देखा, किशन कहाँ है? वो नहीं है, उसका बिस्तर तो वो पड़ा? कहाँ गया वो?
"किशन?" बोला मैं,
कोई भी नहीं!
"किशन?" फिर से आवाज़ दी मैंने,
कोई उत्तर भी नहीं!
"किशन?" कहा मैंने,
किशन नहीं था वहां, सो मैं उधर ही कुर्सी पर बैठ गया! आसपास देखा, सभी दरवाज़े बन्द थे! अचानक से ही, एक चिटखनी खुली, मैं खड़ा हुआ, तो देखा, राजेश साहब, लँगड़ाते हुए मेरी तरफ ही आ रहे थे! वे आये, अपनी छड़ी लिए और एक सीढ़ी सी उतरे, धोती ठीक की, और मुझ से नज़र मिली!
"ज्ञान?" बोले वो,
"जी बाबू जी!" बोला मैं,
"इतनी रात?" पूछा उन्होंने,
"बत्ती है नहीं पौन घण्टे से!" कहा मैंने,
"हाँ, आज ही गयी है!" बोले वो,
"किशन भी नहीं है?" कहा मैंने,
"वो कहाँ गया?" बोले वो,
"मैंने नहीं देखा!" बोला मैं,
"किशन?" चिल्लाये वो!
लेकिन कोई आवाज़ नहीं!
"कहाँ चला गया?" बोले वो,
"पता नहीं जी!" बोला मैं,
तभी अचानक से सामने वाला दरवाज़ा खुला! उसमे किशन आ खड़ा हुआ! हाथ में एक पोटली लिए हुए!
"किशन?" बोले वो,
"हाँ बाबू जी?" बोला वो,
"कहाँ गया था?" पूछा उन्होंने,
"कुत्ता आ गया था!" बोले वो,
"इस पोटली में?" पूछा मैंने,
"अरे नहीं!" बोला वो,
"तो?" पूछा मैंने,
"कपड़े हैं!" कहा उसने,
"लेने गया था?" बोले राजेश जी,
"हाँ जी!" बोला वो, और अंदर आ गया, रख दिए एक जगह वो कपड़े! मैंने घड़ी पर नज़र डाली, सवा दो बज गए थे!
"पानी पिला?" बोले राजेश जी,
"हाँ!" बोला वो,
और भरने लगा पानी एक घड़े से! और ले आया वो पानी! दे दिया राजेश बाबू जी को, उन्होंने पिया और वापिस किया गिलास!
"किशन?" बोले वो,
"हाँ जी?" बोला वो,
"कोई तार तो नहीं हिल गया?" पूछा उन्होंने,
"नहीं, सारी गयी हैं!" बोला वो,
"अच्छा, कोई फाल्ट है!" बोले वो,
"जी" कहा मैंने,
''और तुम सुनाओ?" बोले मुझ से वो,
"जी सब बढ़िया!" कहा मैंने,
"पढ़ाई?" बोले वो,
"जी बढ़िया!" बताया मैंने,
"नौकरी?" पूछा उन्होंने,
"वो भी!" कहा मैंने,
"गर्मी हो गयी?" बोले वो,
"नहीं तो?" कहा मैंने,
"मुझे लग रही है!" बोले वो,
"गोली खायी होंगी?" बोला किशन,
"हाँ, क्या करें!" बोले वो,
"राजेश जी?" कहा मैंने,
"हाँ?" बोले वो,
और मैंने फिर कुछ पूछना शुरू किया उनसे.........


   
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श्रीशः उपदंडक
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"राजेश जी?" बोला मैं,
"हाँ, कहिये?'' बोले वो,
"अरुमा की तबीयत, आखिर, क्या मर्ज़ है उन्हें?" पूछा मैंने,
"मर्ज?" बोले वो,
"जी, कोई मर्ज़?" पूछा मैंने,
"दिमागी रूप से कोई चोट है उसे!" बोले वो,
"चोट?" मैंने पूछा,
"हाँ, कोई चोट!" बोले वो,
"घर में कुल कितने सदस्य हैं? गिने-चुने ही, अब भला कैसी चोट?" मैंने ये पूछते हुए, अपने दूसरे सवाल का रास्ता साफ़ किया था!
"घर में तो कोई नहीं!" बोले वो,
"ओह..फिर कैसी चोट?" पूछा मैंने,
"कुछ ख़ास नहीं, लेकिन डॉक्टर कहते हैं की अरुमा का हृदय बड़ा ही कोमल है, छोटे से छोटे वाक़यात को भी जिगर से बाँध लेती है!" बोले वो,
"ओह, मतलब कि जज़्बात!" कहा मैंने,
"हाँ, यही बात है!" बताया उन्होंने,
बाहर से, अचानक, फिर से एक कुत्ते की भौंकने की आवाज़ आयी! किशन उठ गया, उसने एक बार गहरी नज़र से राजेश जी को देखा!
"तू तो कह रहा था, भगा दिया इसे?'' बोले वो,
"भगा तो दिया ही था?" बोला वो,
"जा, फिर?" बोले वो,
"अभी आया!" बोला वो,
और चला गया, इस बार दरवाज़े के पीछे से एक लट्ठ ले लिया था!
"आसपास का ही होगा कुत्ता? आवारा?" पूछा मैंने,
"नहीं!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"वो रेलवे-लाइन है न?" बोले वो,
क्या? वो ही रेलवे-लाइन? एक बार को याद आ गयी वो लाइन मुझे, वो धड़धड़ाता हुआ इंजन! वो कैंची की आवाज़ उसकी और वो तेज गर्राटेदार सीटी!
"है, वो सामने वाली?" बोला मैं,
"हाँ, कम से कम एक किलोमीटर पड़ती है वो!" बोले वो,
"अच्छा!" कहा मैंने,
"वहाँ कोई गड्ढा है या कोई स्टोर-रूम या कोई बूचड़खाना, वहीँ से आते हैं ये कुत्ते!" बोले वो,
"बूचड़खाना?" पूछा मैंने,
"हाँ, काफी बड़ा है!" बोले वो,
"लेकिन कोई दुर्गन्ध तो आती नहीं?" पूछा मैंने,
"हवा नहीं चले तब!" बोले वो,
"वैसे आती है?" पूछा मैंने,
"हाँ, बहुत!" बोले वो,
"शिक़ायत नहीं की?" पूछा मैंने,
"कई बार!" बोले वो,
"फिर?" पूछा मैंने,
"कोई आता ही नहीं!" बोले वो,
"तो सब नहीं मिले क्या? मेरा मतलब, यहां के सारे अड़ोसी-पड़ोसी? सभी जाते, म्युनिसिपल-बिल्डिंग?" बोला मैं,
"अड़ोसी-पड़ोसी?" बोले वो,
"हाँ? पास पड़ोस में?" बोला मैं,
"हैं ही कितने?" बोले वो,
"क्यों?" पूछा मैंने,
"अभी तो बन ही रही है ये कॉलोनी!" बोले वो,
"लेकिन ये मकान तो नया नहीं लगता?" पूछा मैंने,
"हाँ, दस-बारह साल पहले लिया था मैंने!" बोले वो,
"तब से ऐसा ही पड़ा है?" पूछा मैंने,
"हाँ, बस दो-चार घर ही बने हैं!" बोले वो,
तभी किशन अंदर आ गया, लट्ठ रखा उसने दरवाज़े के साथ और अपना पसीना सा पोंछा, अंगोछे से!
"भाग गए?'' पूछा मैंने ही अब,
"हाँ, तीन थे!" बोला वो,
और अंदर चला आया, अंदर आते ही गुसलखाने गया, फिर वहां से पानी की आवाज़ आयी, हाथ-मुंह साफ़ किये उसने! और फिर वापिस आया!
"आज तो बिजली लम्बी गयी?" बोला मैं,
"आज ही गयी है!" बोले राजेश बाबू!
"अच्छा, हाँ, देखा मैंने!" कहा मैंने,
किशन अचानक उठा, और चला दरवाज़े की तरफ! फिर से लट्ठ उठा लिया, इस से पहले कुछ समझता मैं, कि गुर्राने की आवाज़ आयी!
"कुत्ते हैं क्या?" पूछा मैंने, उठते हुए,
"बैठो! बैठो! बैठ जाओ!" एकदम तेजी से बोले राजेश बाबू! जैसे वे कुत्ते न हों, कोई चीता हों!
"हाँ, तीन हैं!" बोला किशन,
"भगा इन्हें फिर?" बोले राजेश बाबू!

   
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