ये घटना २२ नवम्बर २०११ कि है, ये मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है! आज भी मै इस घटना को याद करता हूँ!
शर्मा जी के एक अभिन्न मित्र हैं निश्चल जी! इलाहबाद के रहने वाले हैं और अब दिल्ली में ही रहते हैं, कभी-कभार शर्मा जी के साथ मेरे पास आ जाया करते हैं! उनको मांसाहारी खाना बनाने में महारत हासिल है! नए नए किस्म का खाना बनाते रहते हैं! जब भी कभी मेरे पास आते हैं तो साथ में शराब और मांस अवश्य ही लाते हैं! और यही बनाते हैं! कुल मिला के आदमी बेहद मिलनसार, हंसमुख हैं! नॉएडा में प्रॉपर्टी का काम करते हैं लेकिन पैसे की उनको बू भी नहीं है! मुझे ज़मीन से जुड़े व्यक्ति बेहद पसंद आते हैं, गरीबों का मैं सम्मान करता हूँ, आखिर ये'ऊपरवाले' उन्ही की मेहनत का खाते हैं और पीते हैं! ऐसे ही एक बारशर्मा जी और निश्चल जी मेरे पास आये, उन्होंने आने से पहले फोन तो नहीं किया था, लेकिन शर्मा जी को मेरे कार्यावली का अक्सर पता ही होता है! निश्चल अपने साथ हमेशा की तरह वही सब लाये थे, इस बार वो मछली लेकर आये थे! आज काफी खुश थे, वो सामान रखने अन्दर गए तो मैंने शर्मा जी से पूछा, "क्या बात है आज! लगता है निश्चल ने कहीं मोटा हाथ मारा है"
शर्मा जी हँसे और कहने लगे, "हाथ का तो उस्ताद है, कहीं न कहीं मारता ही रहता है, मारा होगा आज भी कहीं! मुझे फ़ोन किया था इसने कि आज गुरु जी के पास जाना है, ये मेरे पास आया तो मै इसको लेके आपके पास आ गया"
"अरेनिश्चल जी आ जाओ अब बाहर" मैंने हंसकर कहा,
"अभी आता हूँ गुरु जी, ज़रा माल को साफ़ करके मेरिनेट कर दूँ, फिर इत्मीनान से बैठूँगा आपके साथ!" निश्चल ने अन्दरसे ही जवाब दिया! जैसा कि मैंने आपको बताया था, कि निश्चल जी को पाक-विद्या में बहुत मज़ा आता है, वो एक बार काम पर लगे तो समझो निबटा के ही फारिग होंगे!
"अरेशर्मा जी, आपने अभी तक जाम नहीं बनाया गुरु जी के लिए! निश्चल जे शर्मा जी से कहा,
"अब तू आएगा तो मै बनाऊंगा न, तूतो आते ही घुस गया रसोई में काम करने!" शर्मा जी ने भी मुस्कुरा के कहा!
"कम से कम इतना काम तो आप कर ही सकते थे" निश्चल ने कहा,
निश्चल ने अपना पिटारा खोला, २ बोतल शराब और मसालेदार पनीर निकाला, और मेज़ पे रखा, और फिर दौड़ लगा दी रसोई में! वहाँ से 3 गिलास, और ठंडा पानी ले आये!
"आज क्या बजा रहे हो निश्चल भाई?" मैंने पूछा,
"गुरु जी मै आज आपको साबुत मच्छी-फ्राई खिलाऊंगा!" निश्चल ने गर्व से कहा!
और फिर निश्चल जे तीनों गिलास में मदिरा डाली और सबके गिलास आगे बढ़ा दिए।
मैंने और शर्मा जी न अपने-अपने गिलास उठाये और मसालेदार पनीर के साथ मदिरा-पान करते रहे! इधर-उधर की बातें चलती रहीं, फिर निश्चल ने ज़रा गंभीर होके एक बात कही, "गुरुजी, मेरे पास एक लड़का काम करता है, नाम है चंदर, वो यहीं खुर्जा का रहने वाला है, वो अभी अपने गाँव से लौटा है, उसने मुझे एक अजीब सी बात बतायी, और सच पूछो तो मै उसी सिलसिले में आपके पास यहाँ आया हूँ, चंदर ने कहा कि जब वो गाँव गया हुआ था तो अपने चाचा केसाथ अपने खेतों में रात को पानी लगा रहा था,
तो उसके चाचा खेत के एक दूसरे छोर पे काम कर रहे थे, तभीचंदर को उसके चाचा ने आवाज़ लगाई, तो चंदर चाचा की तरफ चल पड़ा, उसके चाचा ने उसे जल्दी आने को कहा, चंदर ने तेज़ क़दमों से चलना शुरू किया, गाँव में अक्सर सांप-बिच्छूआदि काटते ही रहते हैं, इसीलिए उसने सोचा कि शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा, जब वो अपने चाचा के पास पहुंचा तो उसके चाचा ने अपने दोनों हाथ खेत की मिट्टी में अपनी कोहनी तकधंसा रखे थे! चंदर को मामला समझ नहीं आया, लेकिन वो चाचासे बोला की क्या हुआ है? चाचा ने कहा, की यहाँ एकपीतल का कलश है, इसको बाहर खींचने में मदद कर, अब चंदरऔर वो दोनों उस कलश को खींचने लगे, और बड़ी मेहनत के बाद उन्होंने वो कलश निकाल लिया, कुल वजन होगा ५० किलो, उन्होंने जल्दी-जल्दी वो कलश उठाया और खेत में बने अपने टयूबवेल के पास बने कमरे में ले आये! अब उन्हें नहीं पता था की इसमें है क्या, उन्होंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और गेंती से उस कलश का ढक्कन उखाड़ने लगे, काफी देर बाद उन्होंने वो ढक्कन हटाया, अन्दर हाथ डाला तो उसमेसोने की गिन्नियाँ ही गिन्नियाँ थीं, इतने में ही दरवाज़े पर दस्तक हुई, वो घबरा गए की इतनी रात को कौन आया? सोचा इधर-उधर के खेत वाला कोई होगा, फावड़े वगैरह मांगने आया होगा, उन्होंने वो कलश वहाँ रख कर उस पर चारपाई बिछा दी, दरवाज़ा खोला तोसामने एक औरत खड़ी थी, कोई ३५-४० साल की एक औरत खड़ी थी, कंधे पे एक थैला लटकाए हुए थी, वो घबरा गए! वो बोली डरो मत, सारा सामान रख लो औरये कह के उसने एक लड़के की सरकटी लाश उस झोले में से निकाली और बोली, इसका, मेरे बेटे कासरलाके मुझे देदो, वो वहाँ पड़ा है, उसने जहां से कलश निकाला था वहां की तरफ इशारा किया, इतना सुनते ही वो दोनों सरपट भागे गाँव कीतरफ
सुबह दोनों की नींद खुली देर से जागे, लेकिन गत रात्रि की घटना का जिक्र नहीं किया उन्होंने किसी से भी घर में, सुबह दोनों मिले और और ये तय हुआ किचलोखेत पर चला जाये; दोनों किसी तरह हिम्मत जुटा कर पहुंचे खेत पर, कमरे में गए तो चारपाई वैसे ही पड़ी थी जैसे वो छोड़ के भागे थे, लेकिन कलश नहीं था, पूरा कमरा ढूंढ मारा लेकिन कलश नहीं मिला, दोनों ने एक दूसरे को हैरत से देखा, फिर दोनों पहुंचे उस जगह जहाँ से वो कलश निकाला था, वहाँ गीली मिट्टी में उनके पाँव के निशान तो थे लेकिन खुदाई का कोई निशान नहीं था! अब वो दोनों डर गए, दुबारा खुदाई का ख्याल मन से निकाल दिया और अपने खेत के काम में लग गए, चंदर वहां ६ दिन और रहा और अगले दिन मेरे पास आ गया, मुझसे उसने एक दिन ज़िक़रकिया इस बारे में, सुनके तो मुझे भी हैरत हुई लेकिन वो लड़का कभी झूठ नहीं बोलता इसीलिए मैंने उस पर शक नहीं किया और न ही कर सकता हूँ गुरु जी!" निश्चल ने अपनी बात ख़तम की!
इतना कह कर निश्छल दौड़े रसोई की तरफ अपने काम की तरफ और इधर शर्मा जी ने प्रश्न उछाला; "गुरु जी, किस्सा तो वाकई में दिलचस्प है, और वैसे भी निश्चल आलतू-फ़ालतू बातों पर ध्यान नहीं देता, आप क्या कहते होगुरुजी?"
"जो निश्चल कह रहे है वो बिलकुल सत्य है, ऐसा होता है ये कोई प्रेतात्मा है, कोई दुखी प्रेतात्मा जो अपने लड़के का सर मांग रही है जो की वहाँ कहीं दबा पड़ा है, पूरी कहानी क्या है ये तो मालूम नहीं लेकिन अभी निश्चल को आने दो, फिर बात करते हैं" मैंने अपना पेगख़तम करते हुए कहा,
कोई १०-१५ मिनट बाद निश्चल आये रसोई से बाहर हाथ में प्लेट लिए, बोले," ये लीजिये गुरु जी! खाइए और बताइये कैसीबनी है?" और इतना कह के वो फिरसे रसोई में दौड़ पड़े,
मैंने एक टुकड़ा उठाया औरखाया, वास्तव में बेहद लज़ीज़ बनाया था निश्चल ने!
मैंने वहाँ से कहा, "निश्चल जी, मजा आ गया!"
वो रसोई में से ही बोले, "थैंकयू! थेंकयू!"
मै फिर जोरसे बोला, "अरे निश्वल जी अब आ भी जाओ!"
"बस गुरु जी अभी आया मै" निश्चल वहीं से बोले,
और फिर थोड़ी देर बाद निश्चल रसोई से आये बाहर एक और प्लेट लिए!
"लीजिये गुरु जी!" वो बोले,
"अरे अब बैठ भी जा" शर्मा जी निश्चल की कमीज़ पकड़ के बोले.
"हाँ, गुरुजी, कुछ सोचा आपने, ये मसला आखिर है क्या?" निश्चल बैठते हुए बोले,
"हाँ, मसला तो है, लेकिन उससे पहले चंदरसे मुलाक़ात ज़रूरी है" मैंने कहा,
"चंदर को मै कल ले आता हूँ गुरु जी, अगर आप कहें तो" निश्चल ने कहा,
"हाँ कल ले आइये उसको, मै उससे बात करना चाहता हूँ पहले"
"ठीक है गुरु जी" निश्चल ने कहा
और फिर हमारा खाने-पीने का दौर चलता रहा, कार्यक्रम निर्धारित हो चुका था कल का, सो आराम से खाया और पिया, और फिर देर रात मै सोने चला गया!
सुबह १० बजे मेरे पास फोन आया, फ़ोन निश्चल का था, निश्चल ने बताया की वोचंदर को लेकर २ बजे तक आ जाएगा, मैंने भी कहा ठीक है, आ जाइए, इतने में ही मेरे पास दो औरतें आयीं, वो मेरी परिचित थीं उनमेसे एक की छोटी बहिन की शादी थी,वो निमंत्रण देने आयीं थीं, खैर, २ बजे निश्चल, शर्मा जी और चंदर आ गए, चंदर की उम्र यही लगती थी कोई २७-२८ बरस, चंदर ने सबसे पहले नमस्कार किया! आगे बढ़ा, और चरण-स्पर्श हेतु आगे बाधा, मैंने अपने पाँव पीछे खींचे और उसको उसके बाजुओं से पकड़ कर उठाया, फिर हम वहां कुर्सियों पर बैठ गए, निश्चल बोले, "गुरु जी, ये है चंदर, इसीके बार में मैंने आपको बताया था, अब आप इससे जो पूछना चाहें पूछ लें" ।
मैंने चंदर की ओर देखा और बोला, "चंदर, मुझे निश्चल जी ने जो बताया वो तो मैं सुन चुका हूँ मै तुमसे कुछ सवाल पूछंगा, तुम उसके जवाब देना, ठीक है?" "जी ठीक है" चंदर ने कहा,
मैंने सवाल पूछना शुरू किये,
"चंदर, जब तुमखेत में पानी लगा रहे थे, और तुम्हारे चाचा ने तुमको आवाज़ लगायी तुमचाचा के पास गए और कलश निकाला, उस वक़्तसमय क्या हुआ होगा?"
"जी यही कोई सवा ४ या साढ़े४ बजे होंगेसुबह के, क्यूंकि चाचा मेरे पास जब आये थे जगाने तो मैंने घडीदेखि थी, कोई तीन बज कर १० मिनट हुए थे, खेत ज्यादा दूर नहीं हैं गाँव से, कोई पंद्रह मिनट में हम कुदाल, फावड़े लेके वहाँ पहुँच गए थे, जाकेटयूबवेल चालू किया, मै पूर्वी छोर पर था और चाचा दक्षिणी छोर पर, कोई १०-१५ मिनट बाद मुझे चाचा की आवाज़ आई थी, और कोई उसके १५-२० मिनट बाद वो औरत आई थी" चंदरने बिना रुके ये बात बतायी,
"अच्छा, एक बात और बताओ, कलश कैसा था? मैंने पूछा?
"जी, कलश, पीतल का था, लेकिन मिट्टी लगी हुई थी उस पर" चंदर बोला,
"तुमने गेंती से उसका ढक्कन खोला, ढक्कन कैसे लगा हुआ था?" मैंने पूछा,
"ढक्कन जैसे चिपका हुआ था उस पर,लेकिन जैसे वेल्डिंग होती है बिलकुल वैसा ही था" चंदर ने हाथ के इशारे से बताया,
"अच्छा, तुमने हाथ अन्दर डाला" मेरी बात काटते हुए चंदर बोला, "नहीं, मैंने ढक्कन खोला था, लेकिन हाथ चाचा ने डाला था, हाथ जब बाहर निकाला था तो सोने की गिन्नियाँ थीं और तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी"
"दरवाज़ा किसने खोला? मैंने पूछा, " मैंने खोला था, लेकिन चाचा ने उस कलश के अन्दर वापिस वोगिन्नियाँडालदीं और कलश के ऊपर चारपाई डाल दी थी" चंदर ने कहा,
"जब तुमने दरवाजा खोला तो वो औरत वहाँ खड़ी थी, लेकिन ये बताओ उसने किस से कहा कि मालसारा रख लो लेकिन मेरे बेटे का सरला दो" मैंने पूछा,
"जी उसका चेहरा चाचा की तरफ था, उसने चाचासे ही पूछा था और उनको ही वोसरकटी लाश दिखाई थी" चंदर ने आँखें खोलते हुए कहा,
"तुम कमरे के अन्दर थे, और वो औरत कमरे के बाहर, तोतुम वहाँ से भागे कैसे? मैंने सवाल दागा,
"जी जब उसने इशारा किया कि वो सर वहां दबा पड़ा है तो हमको मौका मिल गया था, हमने तो पीछे मुड के भी नहीं देखा और सीधे गाँव में आके ही रुके!" चंदर ने कहा,
"अच्छा, जब तुम अगले दिन वहां गए और खेत पे काम किया क्या उस दिन या जितने दिन वहां काम किया, क्या तुमने वो औरत देखी?
"नहीं गुरु जी, नहीं देखी" चंदर में कहा,
मैथोडा सोच में डूबा और इधर शर्मा जी ने सवाल किया चंदर से
"तुम दिन में भी तो वहाँ खोद सकते थे?
"नहीं गुरु जी, हमने सोचा कि ऐसा न हो कि हम वो कलश निकाल लें और वो औरत हमारे घरपे ही न आ जाये, हम तो बुरी तरह डर गए थे गुरु जी" चंदर ने कहा
"अच्छा चंदर? एक बात और बताओ? मैंने सवाल किया,
"जी, पूछिए गुरु जी" चंदर ने कहा,
"ज़रा मुझे उस औरत के बारे में बताओ, जैसे कैसी थी, कितनी उम्र होगी, क्या पहना था, झोला कैसा था उसका, लम्बाईकैसी थी उसकी, चेहरा कैसा था?
"गुरु जी औरत कमसे कम इतनी थी" चंदरखड़ा होके बोला, मै समझ गया, उसकी लम्बाई औसतही रही होगी, यही कि साढ़े ५ फीट,
"उम्र कितनी होगी? मैंने पूछा,
"यही कोई ३८-४० के आस-पास तो होगी ही" चंदर ने कहा,
"क्या पहना था उसने?" मैंने पोछा,
"जी उसने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी, लेकिन थी मैली-कुचैली" चंदर ने कहा,
"झोला कैसा था उसका?" मैंने पूछा,
"गुरुजीवो झोला नहीं था, जिसमे उसने वो लाश लपेट रखी थी, वो कोई सफेद चादर लग रही थी, या साफा होगा, था सफेद"
चंदर ने कहा,
"अच्छा, उसका चेहरा कैसा था?" मैंने पूछा,
"जी चेहरा तो सही ही था, बिंदी लगा रखी थी, साड़ी उसके सर पर भी थी, जैसे की आधा चूंघट" चंदर ने कहा,
"तुमने वोसरकटी लाश देखी थी? मैंने पूछा,
"हाँ जी, उसनेवो उस चादर में से निकाली थी, मैंने देखी थी, उसका सर नहीं था" चंदरजेथोडा अटक के ये कहा,
"लाश के कपडे कैसे थे? तुमने देखे थे? मैंने पूछा,
"जी लाश पर एक चुस्त कुरता पाजामा था, सफेद रंग का" चंदर बोला,
"और कोई चीज़?" मैंने पूछा,
"हाँ जी, उस लाश के हाथ में एक बांसुरी जैसी कोई चीज़ थी, कोई १० इंच की " चंदर ने कहा,
"वो बांसुरी लाश के हाथ में थी, खुद पकड़ रखी थी? मैंने सवाल किया, मेरे इस सवाल से निश्चल और शर्मा जी एकदमसे आगे आ गए!
"हाँ जी, वो उसके हाथ जे ही पकड़ रखी थी" चंदर ने बताया,
"गुरुजी, लाश के हाथ में बांसुरी? ये कैसे हो सकता है? निश्चल ने कहा,
"संभव है, संभव है" मैंने निश्चल से कहा,
अब तक चाय आ चुकी थी, हमने अपने-अपने कप उठाये और चाय पीने लगे.....
चाय पीने के बाद निश्चल और चंदर ने विदा ली, उनको नॉएडा अपने दफ्तर जाना था, वो चले गए, शर्मा जी मेरे पास ही थे, शर्मा जी अपने आँख खुजलाते हुए बोले,
"गुरुजी ये मामला क्या है? पहले कलश, फिर वोसरकटी लाश, लाश के हाथ में बांसुरी?"
"हाँ शर्मा जी, ये कोई रहस्य है, कोई बड़ा रहस्य" मैंने अंगडाई लेते हुए कहा,
"लेकिन एक बात तो तय है, वो कोई बुरी प्रेतात्मा नहीं है, अगर बुरी होती तो न तो कलश ही निकालने देती और न उनको मारे बिना रहती" मैंने का,
"वो कैसे?" शर्मा जी बोले,
"उसेधन का कोई लोभ नहीं, उसने कहा कीसारा माल रख लो, लेकिन उसके बेटे कासर ला दो वो वहाँ दबा पड़ा है" मैंने समझाया
"हाँ, ये तो है" शर्मा जी बोले,
"अब कहानी ये है की उसके चाचा को ये कैसे पता चला की वहां कोई कलश दबा हुआ है?" मैंने पूछा,
"हाँ, उसको कैसे पता चला? शर्मा जी ने हैरतसे कहा!
"ये तो हमे उसके चाचा से ही पता चलेगा, और इसके लिए हमे वहां जाना पड़ेगा, आप एक काम करो निश्चल से बात करो और जल्दी ही वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाओ" मैंने शर्मा जी से कहा,
"ठीक है, मै आज ही बात करूंगा, जल्दी का ही कार्यक्रम बनाता हूँ"
इसके बाद शर्मा जी उठे और विदा ली, उनको अपने किसी कार्य से कहीं जाना था, मैंने कहा,
"ठीक है, आप निश्चल से बात करके मुझे फ़ोन कीजिये, मै अभी से तैयारी करता हूँ"
"ठीक है मै आपको बात होते ही फोन करता हूँ" शर्मा जी ने कहा और वहां से चल दिए....
रात्रि समय शर्मा जी का फोन आया, कार्यक्रम बन गया था परसों निकलना था, निश्चल सुबह मेरे पास आयेंगेशर्मा जी और चंदर केसाथ, तब तकचंदर अपने गाँव में खबर भी कर देगा, मैंने स्वीकृति दी और परसों के लिए आवश्यक तैयारी में लग गया!
आज वो दिन आ गया था, मेरे पास शर्मा जी का फोन आ गया था, वोआधे घंटे में मेरे पास आने वाले थे, मै भी तैयार था, वो लोग आये और मै उनके साथ बैठा और चल दिए खुर्जा की ओराखुर्जा दिल्ली से पूर्व दिशा में ९०-९१ किलोमीटर पड़ता है, चंदर ने बताया की हमकोखुर्जा से थोडा आगे, जेवर रोड पर कोई १५ किलोमीटरचलना है, वहीं गाँव है उसका, और हम सिकंदराबाद होते हएखुर्जा जा पहुंचे, कोई दो घंटे का समय लग गया था, और खुर्जा में थोडा चाय-पानी पीने के बाद हम चंदर के गाँव की तरफ चल पड़े, अभी साढ़े ११ ही हुए थे, और हमचंदर के गाँव पहुँच गए, गाँव प्रथमदृष्टया काफी पुराना और समूद्ध जान पड़ा, मैंने चंदर से पूछा की ये कितना पुराना गाँव है, उसने बताया कि कम से कम 300 साल पुराना तो है ही!
और थोड़ी देर में ही हम चंदर के घर पहुँच गए, उनकोखबर दे दी गयी थी तो उन्होंने भीखाना बना के रखा था! सबसे पहले गरम-गरम दूध मिला पीने को! आत्मा तृप्त हो गयी चूल्हे पे ओटे दूध से! थोड़ी देर बाद खाना आ गया! गाँव के खाने की बात ही अलग होती है! वो स्वाद शहरों में नहीं मिलता! पेट भर के खाया, दही, लस्सी सब एक साथ!
निश्चल ने चंदर से कहा की अपने चाचा को बुलाओ, चंदर बाहर गया और थोड़ी देर में एक दरम्याने कद के आदमी कोले आया, उसने सबको नमस्ते की और चारपाई पर बैठ गया, परिचय आदि हुआ, उसना नाम किशन था, मैंने किशन से पूछा,
"किशन जी, उस रात जो हुआ आपके साथ वो मुझे चंदर ने बता दिया, सारी बातें बता दी, मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ"
"हाँ गुरु जी, पूछिए" उसने गंभीर होके कहा
"किशन जी, ये बताओसबसे पहले कि आपको ये किसने बताया कि खेत में उस जगह कलश दबा हुआ है? मैंने सीधे ही पूछा
"गुरु जी जहां वो कलश दबा हुआ है, वो एक तिगड्डा है, वहाँ खेती नहीं होती, लेकिन वहाँ पानी इकठ्ठा करते हैं और अपने
खेतों में काट देते हैं, उस रात भी मै वहां पानी काटने ही गया था, मै अपने दूसरे खेत में पानी काट रहा था तो मेरा फावड़ा किसी पत्थर से टकराया, मैंने सोचा कि कोई बड़ा पत्थर है तो मैंने कुदाल ले ली, कोई १ फुट पर वो पत्थर था, मैंने पत्थर के आस-पास की जगह काटी और पत्थर बाहर निकाल लिया, पत्थर हटाया तो नीचे मुझे एक कलश दिखाई दिया, मै उसको निकालने लगा, लेकिन वहाँ पानी घुसने लगा था, वो मेरे से खिंच नहीं सका, तब मैंने चंदरको आवाज़ दी, तब चंदर आया
और हमने वो कलश बाहर निकाल लिया और उसको वहाँ बजे एक कमरे में ले गए, आगे की बात आपको चंदर ने बता ही दी होगी" ये बोल के किशन चुप हो गया...
मैंने किशन से पूछा, "किशन जी वो पत्थर कैसा था?
"जी पत्थर लाल रंग का था, जैसे की किले में लगते हैं और आकार में चौकोर २२ फुट का होगा " वो बोला,
"अब वो पत्थर कहाँ है? मैंने फिर पूछा,
"वो खेत में ही पड़ा है" वो बोला,
"चलो मुझे वो पत्थर दिखाओ" मै उठते हुए बोला,
"अभी दिखाता हूँ गुरुजी, चलिए" वो बोला
हम सभी उठे और खेतों की तरफ चल पड़े, खेत जाते वक़्त मैंने वहां एक पुराना कुआँ, कुछ टूटे-फूटे चबूतरेसे देखे, कुआँ अब प्रयोग नहीं होता था, आस-पास झाड-झंखाड़ उगे हुए थे, लेकिन कुँए की दीवार देख के पता लग रहा था की कुआँ काफी पुराना था, हम आगे चलते रहे, उनके खेत में उतर गए, आगे बढे और किशन जेवो पत्थर मुझे दिखाया, पत्थर पर एक चन्द्रमा, एक सूरज, एकस्वास्तिक और विक्रमी-संवत १९६८ खुदा हुआ था, ये मुझे उस पत्थर पर पानी डालकर मिट्टी छुड़ाने से ये दिखा था, विक्रमी संवत १९६८ का अर्थ हुआसन १९१२-१३यानि के ये पत्थरसन १९१२-१३ में यहाँ गाड़ा गया था! चन्द्रमा की कलाएं कुछ रेखाओं में बंटी थी, मैंने हिसाब लगाया, इसका अर्थ निकला की जहाँ चंद्रोदय हो रहे हैं वो है अष्टमी, स्वस्तिक केसीधी तरफ सूर्य थे, अर्थात, सूर्य दक्षिणायन, और स्वास्तिक, अर्थात कार्तिक मास की अष्टमी, यानि की दिवाली से ७ दिन पहले, ये तो बीजक था, बंजारों का बीजक! अब मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था! मैंने चंदर से पूछा की यहाँ और कोई ऐसा बीजक है क्या? उसने मना कर दिया!
मैंने वो पत्थर अन्दर कमरे में रखवा दिया, और किशन से पूछा की वो पत्थर जिस जगह से निकला था, वो जगह दिखाए, वोहमे वहाँ ले गया, मैंने देखा वो एक तिगड्डा था, कीचड हुई पड़ी थी वहां!
मैंने उनसे कहा की ठीक है, आजरात को हम निकालेंगेये कलश यहाँ से!
और हम सभी लोग वहां से वापिस चंदर के घर आ गए! आके थोडा आराम किया, शाम हुई, निश्चल ही अपना पिटारा खोजे बैठ गए! शराब निकाली, पानी मंगवाया, और साथ में थोडा सलाद और हम शुरू हो गए! खानाखा के हम सोने चले गए, रात्रि ३ बजे हम सभी उठ गए, मैंने अपनी तैयारी शुरू की, तंत्र-आभूषण धारण किये और शर्मा जी, चंदर और निश्चल को प्राण-रक्षा मंत्र से बाँधा, किशन ने कल ही मना कर दिया था साथ आने को, लेकिन चंदरहिम्मतवाला आदमी था! वो तैयार हो गया था चलने को! और हम लोगचल पड़े उनके खेत के तरफ!
खेत पर पहुंचे, कमरे में लगा बल्ब जलाया, चंदर ने कुदाल उठायी और शर्मा जी, और मै, निश्चल भाई चल पड़े कलश निकालने! चंदर ने खुदाई शुरू की, कोई २० मिनट के बाद कलश दिखाई दे गया, फिर उसको बड़ी मुश्किल से निकाला, और लेकर आ गए कमरे में, ढक्कन फिर से लगा हुआ था, ये मामला मायावी था, मै समझ गया! हमने दरवाज़ा बंद कर दिया, हमने ढक्कन नहीं खोला था उसका, १० मिनट तक कोई दस्तक नहीं हुई, मैंने तब चंदर को कुदाल से ढक्कन खोलने को कहा! चंदरजे ढक्कन खोला, वैसे ही जैसे पहलेखोला था, मैंने उसको रोक दिया, लेकिन अभी भी १० मिनट तक कोई दस्तक नहीं हुई! अब मैंने हाथ डाला कलश के अन्दर हाथ डाला! सोने की गिन्नियाँ ही गिन्नियाँ थी उसमे! और तभी!! तभी दरवाज़े पे दस्तक हुई, मैंने सब को हाथ से चुप रहने को कहा और खुद आगे बढ़ा, मैंने जैसे ही दरवाज़ा खोला, वो मेरे सामने खड़ी थी! लकिनवो बोली कुछ नहीं और पीछे हट गयी, अन्दर झाँकने लग गयी! मैंने शर्मा जी को आवाज़ दी वो बाहर आये, आते ही ठिठक गए, शर्मा जी के सामने आके बोली, "सारा माल ले लो, लेकिन मेरे बेटे का सरला के दे दो, वो वहाँगड़ा हुआ है" उसने वहाँ इशारा किया उसी तरफ जहां से हमने कलश निकाला था, इतना कहते ही उसने अपनी चादर में से एक सरकटी लाश निकाली और दिखाने लगी! मैंने लाश देखी, उसके हाथ में बांसुरी नहीं एक पुराना भोथराखंजर था, किशन और चंदर ने वो जल्दबाजी में और गलत कोण से देखा था!
मैंने उससे कहा, "तेरा नाम क्या है?"
"वो, वहाँ, वहाँ" वो बिना मुझे देखे हाथ उठाये उसी जगह की तरफ इशारा करती रही,
"सुन, तेरे बेटे कासर मिल जाएगा, मेरी बात सुन, मै इसीलिए यहाँ आया हूँ" मैंने तेज़ कहा,
उसने मुझे ऊपर से नीचे तकदेखा फिर अपने बेटे की लाश मेरी तरफ कर दी, मैंने कहा,
"चिंता न कर, मिल जाएगा इसका सर" मैंने कहा
उसने लाश फिरसेकपडे में ढकली,
मैंने फिर पूछा, "नाम क्या है तेरा?"
"पार्वती" वो बोली,
"ये कौन है, जिसकी ये देह है?" मैंने पूछा,
"मेरा लड़का" वो बोली,
"सर कैसा कटा इसका, किसने कटा? मैंने पूछा,
"बाबा ने काटा" वो बोली,
""कौन बाबा?" मैंने पूछा,
"खैडल बाबा ने काटा" वो बोली,
"क्यूँ काटा?" मैंने पूछा,
अब वो रोना शुरू हो गयी, हालांकि, इनके आंसूं नहीं होते, मैंने कहा "रोमत मुझे बता क्यूँ काटा?"
"बलि चढ़ा दिया खैडल ने" वो उसको अपने से चिपका के बोली,
मैंने कहा, "सारी बात बता, तू कौन है, कहाँ रहती थी?"
उसने जो बताया मै आपको बताता हूँ--
उसका नाम पार्वती था, ग्राम दनकौर में उसका मैका था, वो यहाँ ब्याह के आई थी, पति उसका राजगिरी करता था, उसका एकही लड़का था, एक बार जब वो अपनी ससुराल से अपने मैके जा रही थी तो उसका लड़का बाहर खेल रहा था, काफी देर तक जब वो अन्दर नहीं आया तो वो उसको ढूँढने गयी, लड़का कहीं नहीं मिला, उसके पति ने भी बहत ढूँढा लेकिन नहीं मिला, उसके पति ने सारा दोष पार्वती पे डाल दिया, क्यूंकि लड़का इकलौता था, और इसी बातपे उसके पति ने उसकी जमकर पिटाई कर दी, इसी पिटाई में उसकेसरपे लाठी का एक वार लगा और उसका सर फट गया, वोवहीँ ढेर हो गयी, उसके पति ने उसी दिन उसको गाँव के ही शिवाने में जला दिया, और लड़के के बारे में--- वो लड़का जब खेल रहा था कोई बंजारा उसको बहला-फुसला के अपने ठिकाने पेलाया, ये बंजारेलूट का माल ज़मीन में ही गाड़ा करते थे, नरबली देकर, ताकि उसकी आत्मा उस धन की रक्षा करते थे, और वहां एक बीजकगाड़ देते थे, इसी बीजकसे वो ज़रूरत पड़ने पर अपना माल निकाल लिया करते थे, खैडल उनका तांत्रिक था, उसने उस लड़के को नरबली का शिकार बना दिया, सर एक घड़े में डाल केवहीँ गाड़ दिया, जहांये कलश निकला था, और धड एकनहर में फेंक दिया, पार्वती की आत्मा भटक रही थी, वो इसधड को लेके १०० सालों तक भटकती रही कि कोई आये ये धन निकाले और उसके लड़के कासर मिले और वो मुक्त होजाएँ.......
तो आज वोघडी आई थी! मैंने उससे कहा कि "इस लाश को ज़मीन पर रख दे, मै तुझे अभी सरदेता हूँ रुक"
उसने वो लाश नीचे रख दी, मैंने चंदर को बुलाया और कहा कि एक कलश और है नीचे उसको भी निकाल दो, चंदरने कुदाल उठायी और वो कलश बाहर निकाल दिया, मैंने वो कलश वहाँ खुलवाया, अन्दर एकनरमुंड था, एक जालीदार कपडे में, मैंने वोकपडा हटाया, और वो जर मुंड उसको दे दिया, उसने वोनर मुंड उठाया और अपने बेटे के सर की जगह लगा दिया, उसने फिरसे लाश उठायी और उसने मुझे देखा, हाथ उठाया जैसे कि आशीर्वाद दे रही हो, उस माँ और उसके बेटे का मिलन हो गया था! मुझे बेहद खुशी हुई। वो औरत सौ सालों से अपने बेटे के लिए भटक रही थी और आज मुक्ति के कगार पे थी, मैंने मंत्रोचारण किया, और उनको हमेशा के लिए मुक्त कर दिया! वो वहाँ लोप हो गए!
मै कमरे में आया, कमरे में कलश था, मैंने दुबारा हाथ डाला, सारी गिन्नियाँ उसी में थीं, लेकिन कुछ गिन्नियां आपस में चिपक गयीं थीं, मतलब कि बाबा खडैल का तिलिस्म अभी भी काम कर रहा था, ये जानलेवा सिद्ध हो सकता था, मैंने वो कलश उठवाया और फिर से उसी गड्ढे में गड़वा दिया, और ऊपर से वो पत्थर ढकवा दिया, लेकिन अबकी बार पत्थर मैंने उल्टा रखवाया था,
आज भी वो कलश वहां रखा है, अभी तक उसको लाने कि ज़रूरत नहीं पड़ी, लेकिन कभी पड़ेगी तो देखा जाएगा! हाँ, इसके बाद जब हम वापिस आये दिल्ली तो चंदर वहीं रह गया था, उसने अगले दिन फोन करके बताया कि जहाँ कमरे में वो कलश रखा था वहाँ २३ गिन्नियाँ पड़ी हुई थीं, वो उसने अपने पास रख ली हैं, मैंने उसको कहा कि आधे मोल का दान करना बाकी वोरखले, उन पर उसी का हक था क्यूंकिवो खेतचंदर के पिताजी के थे जो २ साल पहले स्वर्ग सिधार चुके थे! और उसी ज़मीन कि वजह से वो आत्माएं मुक्त हुई थीं ये उन आत्माओं का प्रसाद था जो चंदर को मिला था!
