अलवर राजस्थान की एक...
 
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अलवर राजस्थान की एक घटना

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श्रीशः उपदंडक
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मित्रो ये एक घटना है अलवर की जो की वर्ष २००८ मार्च २१ को घटी थी, मैंने देखा की लालच में कैसे एक पूरा कुनबा कैसे खतम हुआ!

शर्मा जी के एक अभिन्न मित्र हैं, हाजी साहब, उम्र होगी उनकी यही कोई ५०-७५ साल, आदमी बेहद इमानदार, शालीन और खानदानी हैं, मेरी मुलाक़ात शर्मा जी ने ही उनसे करवाई थी, एकरोज़ ईद का दिन था वो भी बकरीद का, मै अपने विश्रामस्थान पर था, दिन में कोई ११ बने शर्मा जी मेरे पास आये, और बोले, "गुरुजी, कोई काम तो नहीं है आज आपको?

मैंने कहा,"क्या इरादा है, कोई कार्यक्रम है क्या?"

"कार्यक्रम क्या गुरु जी,मेरे एक मित्र हैं, जब मैईराक में था तो तब मेरी उनसे मुलाकात हुई थी, आदमी बेहद इमानदार और हलाल किस्म के हैं, आज दिन है ईद का, आजदावत का बुलावा है उनका, मैंने उनसे कहा था की भाई जान मेरे एक गुरुजी हैं, मै आऊंगा तो उनके साथ ही, तो वो बोले, अरे आपके गुरु जी तो हमारे भी गुरु जी, जब आप उनके पास जाओ तो ज़रा मेरी उनसे बात करा देना, दावतनामा देदूंगा, ये गुरु लोग ऐसे-वैसे नहीं आए और न कहीं जाते, तो मैंने कहा की ठीक है हाजी साहब, मै उनसे आपकी बात करा दूंगा "

इससे पहले की मै कुछ कहता, शर्मा जी नेहाजीसाहब का नंबर मिला दिया, फ़ोन हाजीसाहब ने ही उठाया, शर्मा जी ने कुछ हाजी साहब से कहा और फ़ोन मुझे पकड़ा दिया, मैंने कहा, "हेल्लो" हाजी साहब बोले, "हेल्लो जनाब!, ये शर्मा जी हमारे बड़े खास हैं, इन्होने आज आपका जिक्र किया तो मैंने कहा की भाई ज़रा हमारी भी मुलाकात करवा दो अपने गुरु जी से इसीलिए मैंने ये गुस्ताखी की है जनाब"

उनके बोलने का लहजा बेहद हल्का और बेहद अदब वाला था, मैंने कहा, "अरे हाजीसाहब, आप उम्र में मेरेसे काफी बड़े हैं, लेकिन इस ज़र्रानवाज़ी के लिए आपका बेहद शुक्रिया!"

मेरे शुक्रिया बोलने से पहले ही हाजी साहब ने मेरी बात काटी और बोले, "जनाब आपके दीदार के लये मरे जा रहा हूँ, रहमोकरम कीजिये और शर्मा जी के साथ मेरे गरीबखाने पर तशरीफ़ रखिये"

मै मना नहीं कर सका और मैंने कहा, "ठीक है हाजी साहब, मै आता हूँ शर्मा जी के साथ"

और मैंने फ़ोन शर्मा जी को दे दिया, शर्मा जी ने दो चार बातें और कीं और फ़ोन काट दिया, मै तैयार हुआ और शर्मा जी की गाड़ी में बैठ गया और हम हाजीसाहब के घर की तरफ चल पड़े!


   
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श्रीशः उपदंडक
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हाजी साहब के यहाँ पहुंचे तो हाजी साहब खुद ही नीचे खड़े थे हमें लेने के लिए, नीचे तो जैसे मेला लगा हुआ था! और हाजी साहब जब हमसे नीचे मिले तोशर्मा जी के गले लगे, और मुझे सर झुका के नमस्कार किया,मैंने भी नमस्कार स्वीकार किया, हाजी जी ने शर्मा जी की बाजू पकड़ी और मुझसे बोले, "आइये गुरुजी, आइये!"

मै उनके पीछे चला, वो एक मकान के सामने रुके, मुझे देखा, और अन्दर घुस गए, मै भी उनके पीछे था, मै अन्दर घुसा, आगे ऊपर जाने की एक सीढ़ी थी, वो उस पर ही चढ़ रहे थे, मै भी ऊपर चढ़ा और फिर वो एक कमरे में घुस गए, मै भी वहां गया तो हाजीसाहब और शर्मा जी को अपना इंतज़ार करते पाया, अन्दर कोई ६-७ लोग बैठे थे, हाजीसाहब फरमाए, "साहेबान, ये है हमारे अज़ीज़ शर्मा जी और ये हैं हमारे बेहद अज़ीज़ गुरुजी" हमें देखते ही मसनद पे लेटा हर आदमी खड़ा हो गया था, हम अन्दर आये और अपनी जगह बैठ गए, वहां बैठे लोगों से शर्मा जी ने हाथ मिलाया और मैंने हाथ जोड़कर सबको नमस्कार किया, तभीहाजी जी आये और अपने साथ एक लड़का लाये थे, जिसने कई प्लेटों खाने की चीजें थीं, एक में चिकन-फ्राई, एक में कबाब और ऐसे ही कई चीजें थीं, सारी चीजें उस लड़के ने हमारे सामने रख दी, खाना बेहद लज़ीज़ था, लखनवी जायके वाला! हमने थोडा बहुतखाया तभीहाजी साहब कमरे में दाखिल हुए, और बोले, "जनाब आइये मै अपने घर के लोगों सेमिलवा दूं आपको" हम उठे और उनके पीछे-पीछे चल दिए,

हाजी साहब मुड़े और हम उनके साथ पीछे चल दिए, वो आगेसीढ़ी पर चढ़े तो हम भी चढ़ गए, ऊपर उनकी रिहाइश थी, वोहमे अपने कमरे में ले गए और अपनी बेगम साहिबा कोले आये, उनसे मुलाकात करवाई और अपने दोनों बड़े बेटों और अपने एक बेटी से मुलाकात करवाई, बढ़िया परिवार है उनका, खाते-पीते लोग हैं, दर-असल दिल्ली के काफी पुराने रहने वाले हैं वो लोग, राजनीति में भी सक्रिय हैं और काफी दब-ढबा है उनका,खेती बेहिसाब और कई बाग़ हैं उनके, यही सेसारी कमाई आती है उनकी! उन्होंने तभी अपने एक नौकर को बुलवाया और बेहतरीन खाना लाने को कहा, वो गया और थोड़ी देर बाद खानासजा के ले आया, खाना बड़ी टेबल पर रखा और हमने खाना शुरू कर दिया, हालांकि हम थोडा बहुतनीचे भीखा चुके थे, थोडा बहुत और खाया और फिर उन्होंने एक लड़के से किसी कासिम भाई को बुलवा भेजा, बोले, "गुरु जी, ये कासिम भी मेरे सबसे बड़े साले साहब हैं, अलवर में रहते हैं, काफी अच्छे-खासे रसूख वाले इंसान हैं, कुछ परेशानी में हैं आजकल, जब आप आये हुए हैं ही तो मैंने सोचा की ज़रा मुलाकात करवा दूं" मैंने कहा "कोई बात नहीं, आने दीजिये"

थोड़ी देर बाद एक लम्बे-चौड़े शख्स ने प्रवेश किया, हाजी साहब खड़े हुए और उनका परिचय मुझसे करवाया, ये ही कासिम साहब थे, कासिम साहब से मुलाकात हुई तो हाजी जी ने कासिमसे कहा, मैं आपकी परेशानी वाली बात गुरु जी से कही थी, बेहतर है की आपखुल के बता दीजिये इन्हें, काम आपका तसल्ली के साथ हो जाएगा" ये कहते हुए उन्होंने कासिम के कंधे को आराम से ठोंका!


   
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श्रीशः उपदंडक
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कासिमने बोलना शुरू किया, "गुरु जी हम६भाई हैं, ५ शादी-शुदा हैं लेकिन सबसे छोटे वाला नहीं याकूब नाम है उसका, शादी नहीं की उसने, वो शादी के लिए मना करता है, काफी रिश्ते आये उसके लेकिन उसने वापिस ही लौटा दिए, करीब एक साल से, पागल जैसा हो रखा है, आधी-आधी रात में खेतों में चला जाता हैं, सुबह आता है, हफ्ते-हफ्ते नहाता नहीं, मस्त घूमता रहता है, अगर कोई बोले तो गाली-गौज करता है, हम बड़े परेशान हैं उससे, एक रात की बात है, घर के आँगन में रातको १ बने जोर-जोरसे नाच रहा था, कभी इधर गिरता कशी उधर, हमने उसको पकड़ना चाहा तो बोला, "अपनीखैर चाहता है तो छोड़ दे मुझे छोड़ दे मुझे!" हम तो डर गए, फिर जब वो थक के गिर गया तो बडबडाया "काली आई, काली आई!" हमने पूछा, "कौन काली" तो वो बोला, "वो आसमान वाली काली, आसमान वाली काली!" हमने सोचा की शायद कोई असरात हैं इसपे, हमने उसको पकड़ा तो वो झटकेसे उठा और भाग गया खेतों में" उसके कोई ४ दिनों तक वो नज़र नहीं आया" कासिमने अपनी नेब टटोलते हुए कहा.

कासिमने अपनी नेब से याकूब का फोटो निकला और मेरी तरफ बढ़ा दिया, मैंने फोटो देखा, उम्र होगी कोई 30-39 के आसपास, देखने से तोसामान्य ही दिखाई देता था, इसके बाद मैंने वो फोटो कासिम को वापिस कर दिया, कासिमने दोबारा बोलना शरू किया, "एक बार की बात है, कासिम एक शाम कोखाना खा रहा था, एकदम से बोला, "रज़िया मर जायेगी परसों, रज़िया मर जायेगी परसों" रज़िया मेरी पत्नी का नाम है, मै उठा और उससे बोला, "कौन मारेगा रज़िया को? तू?" उसने कहा, "दिवार गिरेगी रज़िया मर जायेगी परसों", हमने सोचा ये पागल तो है ही, इसका क्या भरोसा करना और बात आई-गयी हो गयी, लेकिन गुरुजी, वही हुआ जो याकूब ने कहा था, वोखेत में थी, एकदमसे आंधी-धक्कड़ आया और और एक पेड़ टूट कर उसके ऊपर गिर पड़ा, वो उसके नीचे दब गयी और मर गयी, हमकोखबर मिली, हम दौड़े-दौड़े वहाँ गए, रज़िया दम तोड़ चुकी थी, तभी वहाँ याकूब आया, और बोला, "मैंने कहा था न, रज़िया मर जायेगी!" हमारे तो होश उड़ गए, ये पागल तो सच में ही सही कह रहा था, फिर याकूब बोला "रज़िया तू अभी तक गयी नहीं यहाँ से? ठहर मै बताता हूँ तुझे" और वो ऐसे ही कह के जंगल की तरफ भाग गया"

"क्या आपने मुल्ला-मौलवी नहीं बुलवाए उसके इलाज के लिए? मैंने हैरतसे कहा,


   
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श्रीशः उपदंडक
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"बुलवाए थे, लेकिन सब बेकार" वो उनको ही भगा देता था, कि क्या करने आये हो यहाँ? जाओ पाने काम पे लग जाओ, दुबारा आये तोटुकड़े करलूंगा, सभी डर के मारे भाग गए"

"अब याकूब कहाँ है? मैंने फिर पूछा,

"पता नहीं, कहाँ गया है, कह रहा था अलीगढ जा रहा हूँ, मेरा एक दोस्त है वहाँ" कासिम ने कहा,

"ये कब कि बात है? मै पूछा,

"ये ही कोई १२-१३ दिन हो गए" कासिम बोला,

"क्या अलीगढ़ में कोई रिश्तेदारी वगैरह है आपकी? मैंने पूछा,

"नहीं हमारी रिश्तेदारी हरियाणा दिल्ली तक ही है, और कहीं नहीं" कासिम बोला,

मामला बेहद रोचक था, मेरी दिलचस्पी और बढ़ गयी..

"ठीक है कासिमसाहब, मै मामला समझ गया हूँ, मामला उलझा हुआ है काफी, लेकिन आगे कि बात मैं याकूब से मिलके ही आपको बता सकता हूँ" मैंने कहा,

"अबकी बार जब याकूब घरपे आये तो तुम मुझे फ़ोन कर देना, मै गुरु जी से बात कर लूँगा, गुरु जी की कृपा हुई तो काम निबट जाएगा" इस बार कासिमसे हाजी जी बोले,

"ठीक है, मैहाजी जी को फ़ोन कर दूंगा" कासिम ने कहा,

और फिर हमने हाजी जी को शुक्रिया अदा किया, दो-चार बातें हुई और फिर मै और शर्मा जी वहाँ से नकल पड़े,


   
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श्रीशः उपदंडक
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रास्ते में शर्मा जीसे रहा नहीं गया, और बोले, "गुरुजी, ये काली आई, काली आई का क्या अर्थ हुआ?

"मै भी यही सोच रहा हूँ, कौन काली? मैंने जवाब दिया,

"हैरत-अंगेज़ बात है ये मेरे लिए तो" शर्मा जी ने एकसिगरेट जलाते हुए कहा,

"हाँ, काफी पेचीदा बात है" मैंने कहा,

"गुरुजी? ये रज़िया वाली बात तो बेहद खतरनाक है" शर्मा जी ने कहा,

"हाँ शर्मा जी, बेचारायाकूब!" मैंने कहा,

"बेचारा? कैसे गुरुजी? शर्मा जी ने कहा,

"कोई मुसीबत गलेले बैठा है, मेरा ये मतलब था" मैंने हँसते हुए कहा,

"हाँ मुसीबत तो है ही" शर्मा जी ने भी मेरा समर्थन किया,

"गुरु जी इस अलीगढ वाली बात में भी कहानी छुपी है, मुझे तो लगता है," शर्मा जी ने कहा,

"सारी कहानी वहाँ से शुरू हो रही है शर्मा जी" मैंने कहा,

"वो तो आपको मालूम!"

उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा, मैंने कहा, "कोई बात नहीं शर्मा जी, देखते है की आखिर कहानी है क्या"" मै बोला,

इस तरह ९-१० दिन निकल गए, एकरोज़ शर्मा जी ने मुझे फ़ोन किया और बताया की हाजी जी जा फ़ोन आया था कह रहे थे ही याकूब वापिस आ गया है, मैंने कहा की ठीक है, आप मेरे पास आ जाओ, वो कहने लगे कि वो आज तो नहीं, कल सुबह पहुँच जायेंगे मेरे पास,

अगले दिन सुबह १० बनेवो मेरे पास पहुँच गए, मुझे पूरी बात बतायी, मैंने कहा कि ठीक है हाजी जी से बात करो हम अलवर चलते हैं, शर्मा जी ने तभीहाजी जी से बात की और कोई ५ मिनट बात करने का बाद, उन्होंने फ़ोन काटा, बोले, "हाजी जी कह रहे हैं की वो तैयार है जाने के लिए, बोलो कब गाडी भेजूं?

"उनसे कहना की कलसुबह ८ बने भेज दो, और खुद भी गाड़ी में ही आयें वो, हम यहीं से निकल पड़ेंगे" मैंने कहा,

"ठीक है, मै अभी कहे देता हूँ," उन्होंने कहा और फ़ोन नेब से निकाल कर हाजी जी को कॉल करने लगे, थोड़ी देर बात हुई


   
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श्रीशः उपदंडक
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और हमारा कार्यक्रम कल सुबह का पक्का हो गया, मैंने शर्मा जी को कहा,"शर्मा जी, आजरात आप मेरे साथ अलख पर बैठना, आपको तैयार करना है वहाँ के लिए, मामला ऐसा-वैसा नहीं, बेहद मज़बूत है"

"ठीक है गुरु जी, मै यहीं रुक जाऊँगा आज रात" उन्होंने कहा,

रात करीब २ बने मैंने क्रिया शुरू की और 3 बने करीब शर्मा जी को तैयार किया, उनके लिए तंत्र-आभूषण तैयार किये, ये अत्यंत आवश्यक था,

करीब ४ बने हम दोनों सोने चले गए, २ घंटे सोने के बाद, स्नानादि से निवृत हुए और चाय आदि का प्रबंध किया,

सुबह सवा ७ बनेहाजी जी अपनी गाडीलेके आ गए, गाडी बड़ी थी, आरामसेसोकर जा सकतेथे हम!

हम बैठे और अलवर के लिए रवाना हो गए...

हम धार-हेडा, जूह होते हुए अलवरपहुँच चुके थे, करीब ५ घंटे लग गए थे हमको भीड़-भाड़ बेहद थी, लेकिन मैंने और शर्मा जी ने आराम कर लिया था, नींद लग गयी थी, थकान मिट गयी थी! अलवर पहुंचे तो पता चला की गाँव यहाँ से कोई २२ किलोमीटर अन्दर पड़ता है, अब जब निकल ही आये तो घबराना क्या! मोड़ दी गाडी! और मान लो दोस्तों, ये २२ किलोमीटर कैसे कटे, ये मै ही जानता हूँ! रास्ता ऐसा, की छोटीगाडी हो तोखुल-खुला केपहचानी ही न जाए! कमसे कम २० बार उतरे होंगेदोनों लोग! सड़क से पत्थर हटाने में रास्ता ऐसा था कि हमेये २२ किलोमीटरपार करने में ३घंटे लग गए।

अब यहाँ आये तो पता चला, कि गाँव यहाँ से बही 3 किलोमीटर और दूर है! चलो जब सरदिया ओखले में तो मूसल से क्या डरा चल दिए आगेधीरे-धीरे! करीब ५ बने हम पहुंचे गाँव! लाइट का नामो-निशाँ नहीं लग रहा था १८ वीं शताब्दी केकिसी गाँव में आ गए हैं!

किसी तरह से हम कासिम के घर पहुंचे! आखिर पहुँच ही गए! कासिम ने दौड़ लगाई, एक बाल्टी पानी ले आया, हाथ-मुंह धुलवाए, और अन्दर एक कमरे कि तरफ ले गया! कमरा भी कोई १०० साल पुराना होगा, कमसे कम १८-२० फीट ऊंची होगी छत! खालिस पत्थर और लोहे की कड़ियाँ!

थोड़ी देर बाद कासिम गरम-गरम दूध ले आया, दूध पीया, घर का बना हुआ खोवा खाया! मजा आ गया! कासिमने देसी मुर्गे के मांस भी बनवाया था हमारे लिए! कासिम ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी! कासिमने अपने परिवार के सभी लोगो से मुलाकात करवाई, लेकिन याकूब नहीं आया, मैंने कासिमसे पूछा, "कासिम भाई, याकूब कहाँ है?"


   
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श्रीशः उपदंडक
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"वो तो गुरु जी रात के वक़्त ही आएगा, पागल हुआ पड़ा है, सर पे चोट माररखी है, पूछो तो वो ही उलटे-सीधे जवाब!" कासिम ने बताया,

थोड़ी देर बाद कासिम ने खाना लगवा दिया, सच कहता हूँ दोस्तों, खाना क्या लाजवाब था, आपको ऐसाखाना कहीं भी नहीं मिलेगा! देसी घी में पका हुआ, घर का मक्खन, मोटी-मोटी चूल्हे की रोटी! मैंने और शर्मा जी तो टूट पड़े!

खाना खा पी के हाजी जी ने कहा, "गुरुजी, मूड बनाना हो तो बता देना, शर्माना मत, घरहै ये आपका, और हमारा तो भाग है जो आप यहाँ आये हो"

शर्मा जी ने कहा, " हाजी जी, अशी तो कोई ज़रूरत है नहीं, हाँ अगर जरूरत पड़ी तो मै बता दूंगा, वैसे बोतल मेरे बैग में पड़ी है"

"अजी, यहाँ ऐसा कोई चक्कर न, आप मेहमान हो, यहाँ सब हमारा होगा, आपकी बोतल यहीं मिलेगी" हाजीजी बोले,

"अरे, कासिम?????????? ओ कासिम?? हाजी खड़े होके बोले,

कासिम दौड़ा-दौड़ा आया, बोला, "हां जी"

"कासिम मैंने बोली न ही तुमसे की गुरु जी और शर्मा जी पिया करें कामसु पहले"

"हाँ जी बोली ही" कासिम बोला, ये उनकी स्थानीय भाषा थी!

"तो किंगे है माल?" हाजी जी बोले,

कासिम भगा और र बोतल ले आया, हमारे हाथ में पकडायीं, ये आर्मी की रम थी, मैंने पूछा, "कासिम भाई, कहाँ से इंतजाम किया इसका?"

"गुरु जी, यहाँ मेरा एक पंडित यार है, एयर-फोर्स से रिटायर है, मैंने उससे कहा कि मेरे मेहमान आ रहे हैं, उसने ही लाके दी ये!"

शर्मा जी बोले, " बेहद बढ़िया माल है ये कासिम भाई!"

"जनाब, हम तो कशी ईद-आदपै, दिवालीपै अपने यार-दोस्तन के साथ लगा लेते हैं, वैसे कोई शौक़न है!" कासिम बोला,

"गुरु जी, खाने में क्या लाऊं ये बताओ आप?"

मैंने कहा, "मुर्गा है अभी क्या बचा हुआ?"

"आपने बड़ी फिक्र करी गुरु जी! मै अभी आया!" कासिम बोला,

कोई २५-30 मिनट के बाद कासिम आया, और एक बड़ी सी प्लेट में मुर्गा लाया! मैंने कहा, "एक और जिबह कर दिया! लगता

"एक बात बताओ, आप कोई रोज़-रोज़ आओ हो यहाँ? वो तो हमारे भाग जाग गए आज, जो आप आये यहाँ!" वो एक डोंगे में वो रखते हुए बोला!

खुशबू ऐसी कि पूछो मत...

उस रात हमखाना वगैरह खा के सोने चले गए, उस रातयाकूब नहीं आया,काफी इंतज़ार लिया लेकिन याकूब का कुछ पता नहीं चला, रात गुजरी और सुबह आई हम नहा-धो के अन्दर बैठे हुए थे, कासिम ने लज़ीज़ नाश्ता करा दिया था, मैंने शर्मा जी से कहा की ज़रा बाहर घूमा जाए, शर्मा जी उठे और हाजी साहब से बातें करने लगे, हाजीनेकासिमसे बातें की और कासिमने शर्मा जी को बताया की आप उनके खेतों पर घूम आयें वो वहीं पास में हैं, हम उठे औरखेतों तक चले गए,


   
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श्रीशः उपदंडक
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करीब 300 मीटर दूर ही उनके खेत होंगे, हम वहाँ चल दिए, बड़ा खूबसूरत नज़ारा था, खेत ऐसी जगह थे के मानो किसी ने ज़मीज को चीर दिया हो बीच में से और कोई नदी बहती हो बीच में से, हमने नीचे झाँका तो नीचे खेत थे, बड़े-बड़े पेड़ और बड़े-बड़े मिटटी केटीले, ऊपर खुला आसमान, लगता था कि किसी अनजान जगह आ गए हैं, हम एक दरार से नीचे उतरे और खेतों में चल दिए, हम आगे गए तो एक बरगद के पेड़ के नीचे हमको कुछ इंसानों का बनाया एकचबूतरा सा मिला, हम वहाँ तक गए, पेड़ तकरीबन ४ फीट इसी चबूतरे में धंसा हुआ था, अब पेड़ ने चबूतरे को फाड़ के जगह बना ली थी, मै चबूतरे पर चढ़ा तो महसूस हुआ कि नीचे कोई खाली जगह है, बड़ा अजीब सा चबूतरा था वो, पत्थरों का बना हुआ और मजबूती से ज़मीन में धंसा हुआ, हमने वहाँ से एक कीकर के पेड़ कि डंडी तोड़ी, और एक दातुन बना ली और लगेचबाने, देसी कीकर की दातुन बेहद फायदेमंद हआ करती है, भले ही रोज़ रोज़ न मिले लेकिन उस दिन का हमने लाभ उठा लिया था, हम और आगे चले,खेतों में सरसों लगी थी, ये सरसों काफी लम्बी और ऊंची थी, मेरा क़द वैसे६ फीट है लेकिन येसरसों तो मुझसे भी लम्बी थी! हम एक मेढ़ पर चल दिए, काफी आगे आ गए थे, एक जगह मुझे सेंध कि बेल दिखाई थी, मैंने वो उठाई और उसके साथ साथ चल दिया, उसमेपकी हुई सेंध लगी थीं,मैंने २ तोड़ ली और बाकी छोड़ दी, पास की एक पानी की नाली में उनको धोया और एक शर्मा जी को दी, छिलकेसमेत ही हमने वोखायीं! काफी मीठी और स्वादिष्ट थीं वो! हम आगेचले, एक जगह मुझे साँपों की बाम्बी दिखी, काफी पुरानी जो की कोई४० मीटर में फैली थी और साँपों केरेंगने के ताजेनिशाँ अभी तक थे वहां, निशान देख के पता चलता था की ये सांप भी काफी बड़े होंगे!

बाम्बी को देख के हम आगे बढ़ गए, आगे खेतदूरों तक गए थे, खेत में ८-१० पेड़ थे बेर के, हम वहाँ गए, पेड़ बेरों से लदे पड़े थे, हम एक तोड़ते, और खाते, और दूसरा खाने लग जाते, बड़े मीठे और बड़े-बड़े थे ये बेर! हमने काफी खाए! ११ बज चुके थे, सोचा वापिस चला जाए, फिरभी थोड़ी देर हम वहाँ रुके रहे और उससुन्दर जगह को निहारते रहे, इतने में ही शर्मा जी का फोन बजा और हाजी साहब लाइन पर थे, उन्होंने बताया की याकूब आ गया है और खाना खा रहा है, हमनेतशी दौड़ लगाई!


   
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श्रीशः उपदंडक
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थोड़ी देर में कासिम के पास पहुंचे, कासिमने कहा की याकूब अन्दर है, खाना खा रहा है, मैंने कहा की कोई बात नहीं उसको पहलेखाना खाने दो, कह के हम अन्दर बैठक में बैठ गए, २०-२५ मिनट के बाद कासिमयाकूब कोले आया, इससे पहले की कासिम कुछ कहता, याकूब ने हमे नमस्कार किया, हमने भी नमस्कार किया, याकूब बोला,

"ये तो मुझे मालूम था की कल घर में कोई आलिम आया है"

"तुम्हे कैसे पता की मै आलिम हूँ? मैंने पूछा,

"मै जानता हूँ, आप आलिम हो, पहुंचे हुए आलिम" उसने हाथ जोड़ के कहा,

और वो वहीं बैठ गया नीचे, मैंने कहा की "ऊपर बैठो याकूब"

"नहीं जी, मै यहीं बैठूँगा नहीं तो काली मारेगी" वो बोला,

"कौन काली, मुझे बताओ ज़रा?" मैंने कहा,

"वो पहाड़ी पर रहती है, उस पहाड़ी पर, उसने इशारा करके कहा, वहाँ एक पहाड़ी थी, काफी ऊंची नहीं लेकिन थी पहाड़ी ही,

"कैसी है तुम्हारी काली? मैंने कहा,

"काले कपडे में रहती है, लोहे का घंटा पहनती है गले में, वो अपने आप मुझे बुलाती है, मै कभी भी कहीं भी होऊं तो" उसनेकहा,

"तुम्हे कैसे मिली ये काली, कब मिली?" मैंने पूछा,

"मै एकदिन वहां गया था पहाड़ी पर, वहाँ मैंने पेशाब किया, वो तभी आ गयी और मुझे मेरे बालों से पकड़ कर मारने लगी"

उसने अपने बाल पकड़ के ये कहा,

"क्यूँ मारा उसने" मैंने पूछा,

वो बोला, "काली ने कहा, मै यहाँ अपना बिस्तरा साफ़ कर रही थी और तूने पेशाब कर दिया, इसीलिए मुझे मारा"

"तूने कहा नहीं की इसमें मेरी क्या गलती, मुझे दिखाई नहीं दिए तेरा बिस्तर, मुझे क्या मालूम?"मैंने कहा,

इतने में ही याकूब खड़ा हुआ और नाचने लगा, बोला, "ओये, ओये, मेरा पीछा न करना, वापिस नहीं जाने दूंगी तुझको!" उसने मुझे ऊँगली दिखा के कहा..


   
bhardwaj85 reacted
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श्रीशः उपदंडक
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मै झटकेसेखड़ा हुआ और नाचतेयाकूब को एक कस कर दिया झापड़! वो ठिठक गया और बिना कुछ कहे मेरी तरफ देखता रहा! मैंने कहा, " सा**, तेरी जैसी मेरे मूत में बह जाती हैं, तेरी तो औकात क्या! अपना नाम बदल के आ रही है यहाँ, हिम्मत है तो नाम बता अपना"

"तू क्या मेरा बाप लगता है जो नाम बताऊँ अपना? याकूब बोला

"तू ऐसे नहीं मानेगी तेरा काम करना पड़ेगा मुझे, रुक जा" मैंने कहा,

मैंने मंत्र पढने शुरू किये, शक्तियों का आह्वान किया और मेरी शक्तियां प्रकट हो गयीं

अब तक वहाँ घरके और बाहर ले लोग इकट्ठे हो गए थे, मैंने कासिमसे कहा की पर्दा डाल दो, मैंने याकूब कीखाल उतारनी है अब! कासिमने फौरन ही पर्दा डाल दिया!

याकूबने बंद परदे को देखा और मुझसे बोला, " ओ आलिम, तेरे जैसे कई आये मुझे पकड़ने लेकिन मैंने ३ को मार दिया और २ भाग गए"

"वो मेरे जैसे नहीं थे कुतिया" मैंने कहा

याकूब के होश उड़ गए! वो वहाँ से भागने लगा, कासिम और हाजी ने बड़ी मुश्किल से उसको पकड़ा!

"कहाँ भागती है ओ हरामन, हिम्मत है तो यहीं रुक" मैंने एक और झापड़ दिया उसको!

"मेरे से मतभीड़ तू तू नहीं जानता मै क्या हूँ" याकूब ने कहा,

"तू जो कोई भी है, सुन ले अब तू मेरे आश्रम की झाडू-बुहारी करेगी" मैंने याकूब का गिरेबान पकड़ के बोला,

"ठीक है, कौन क्या है, ये तुझे अब पता चलेगा, आजा आजरातपहाड़ी पर, मै तेरा स्वागत करूंगी" वो गुस्से से बोला!

अब याकूब नीचे गिरा और वो जो कोई भी थी वहाँ से भाग गयी! उसने न तो नाम बताया, न ही कुछ और बस पहाड़ी पे आने को कह गयी, मै आज रात जाऊँगा पहाड़ी पे! ये जो कोई भी है, मेरे 'काम' की है! बहुत काम आएगी मेरे! मैंने मन में ही कहा!

याकूब उठा और चुपके से बाहर खिसक लिया, उसका पीछा किसी ने नहीं किया, हाँ वहाँ खड़े लोगडर गए और उसका रास्ता साफ हो गया!

मैंने करीब ८ बजे शक्ति-आह्वान किया, और अपने लिए तैयार कर लिया, एक बात थी जो मै जानता था, अगर कोई औरत-रूह किसी मर्द पेसवार हो, तो इसके २ ही कारण हैं,

या तो वो घर की ही कोई औरत है या फिर सिद्धि में की गयी गलती, यहाँ ये घर की कोई औरत नहीं थी, अब एक ही कारण शेष था, वो था सिद्धि में की गयी गलती, मैंने फिर भी काफी बढ़िया तैयारी की थी, मै रात १० बने का इंतज़ार कर रहा था, टोर्च वगैरह ली और अपने साथ शर्मा जी और कासिम और कासिम के बड़े लड़के महबूब कोसाथ ले जाना था, वो सिर्फ हमे पहाड़ी का रास्ता बताने के लिए, उनको मैंने वहीं छोड़ देना था, और शर्मा जी के साथ आगे बढ़ना था,


   
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श्रीशः उपदंडक
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रात के दस बजते ही मै उठा, तैयारी की, शर्मा जी को अभिमंत्रित माला दी और उनको प्राण-रक्षा मंत्र से बाँधा, अब उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था,

कासिम और महबूब आगे-आगे चले, मै और शर्मा जी, पीछे-पीछे, पहाड़ी काफी दूर थी, कोई रौशनी नहीं, घुप्प अँधेरा, मंझीरों की आवाज़ इतनी तेज़ थी के जैसे कंधे पे बैठ के ही बोल रहे हों!

रास्ता बड़ा ही तकलीफदेह था, मोटे-छोटे पत्थरों से अटा पड़ा था, ऐसी जगह रात कोसांप-बिच्छू अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं! सांप ठन्डे रक्त का प्राणी है, दिन भर धूप सेंकता है और रात में शिकार के लिए बाहर निकलता है, ऐसी ही बिच्छू ये भी रात को ही क्रियाशील होते हैं! उनसे भी बचना था!

आगे जाके महबूब और कासिम ठहर गए और हमको टोर्च पकड़ा दी, उन्होंने एक संकरी सी जगह दिखाई और बताया की ये ही पगडण्डी पहाड़ी तक जाती है, मैंने उनको वापिस जाने के लिए कह दिया, लेकिन वो बोले कि वो वहाँ इंतज़ार कर लेंगे लेकिन हमारे बिना वापिस नहीं जायेंगे!

तब मैंने और शर्मा जी ने पहाड़ी को देखा, काफी दूर थी वो पहाड़ी, कासिम ने हमको रास्ता तो दिखा ही दिया था, शर्मा जी ने कासिमसे उसकी बड़ी टोर्च ली और हम आगे बढ़ गए, चल दिए ऊपर की तरफ, रास्ता पथरीला और झाड़ियों भरा था, हम आगे बढ़ते गए, कोई आधा किलोमीटर चलने के बाद, मुझे कई साँपों की फुफकार सुनाई दी हमारे आस-पास बड़े-बड़े सांप थे! छोटे-बड़े सभी किस्म के! मैंने एक सांप पकड़ा और उस्सको मंत्र से फूंका, और उसको उन साँपों के ऊपर फेंक दिया, एक ज़ोरदारचमक उठी और इसके साथ ही वोसांप गायब हो गए!


   
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श्रीशः उपदंडक
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हम फिर आगे बढे, हमारा विरोध तो शुरू हो ही गया था, मैंने तब स्वयं को और शर्मा जी को मंत्र-कवच में ढक लिया!

अब शुरू हुई पत्थरों की बरसात! लेकिन वोपत्थर हमारे पास आकर ग़ायब हो जातेथे! मैंने शिरा-मंत्र पढ़ के वो माया ख़तम कर दी!

दूसरा विरोध भी उसका बेकार हो गया था, मैंने घडी में देखा १० बजकर४५ मिनट हुए थे, हम फिर आगे बढे तो सामने पत्थर का एक छोटा सा कमरा दिखा, वहाँ से एकदम आवाज़ आई, "ठहर जा, ठहर जा! यहाँ तक तो आ गया तू जिंदा रहना है तो यहीं से वापिस चले जा"

मैंने ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ गया कमरे की तरफ!

फिर आवाज़ आई, "देख ३तो मैंने यही मारके दफन कर दिए आज तुझे भी मार के यहीं गाड़ दूंगी!"

मैं कमरे में घुसा, कमरे में याकूब बैठा था! वो उठा और झपट के मेरे पास आया, वो मुझे मारने की फिराकसे आया था, मैंने उसको एक लात मारी उसके पेट पर वो नीचे गिरा और फिरखड़ा हो गया! अब की बार वो शर्मा जी पर झपटा, मैंने एक हाथ उसकी गुही पे दिया, वो गिरा नीचे और दूर भाग गया!

शर्मा जी ने टोर्च की रौशनी वहाँ डाली जहावो गया था, वो एक कोने में नीचे बैठा हुए था घुटने के बल, अपने घुटनों में अपना सर टिकाये, मैंने आवाज़ दी, "याकूब?" याकूब?"

लेकिन वो नहीं बोला कुछ, बस इधर-उधर हिलता रहा, मैंने एक मंत्र पढ़ा और अपने हाथ पर फूंक दिया, मै बढ़ा याकूब कीतरफ, याकूब उठ के खड़ा हो गया, कहता, "क्या चाहिए तुझे, क्यूँ आया है यहाँ?" मैंने कहा, "ओ काली तुझे अपने शमशान में झाडू लगाने के काम पर रखूँगामै" मै हंसा!

"मेरा नाम काली नहीं कुआली है, मैजूह की रहने वाली हूँ," वो बोला,

"तो यहाँ कैसे आई तू? मैंने पूछा,

"ये मेरी ससुराल है," वो बोला,

"इसको क्यूँ पकड़ा तूने? मैंने पूछा,

"ये मेरे बिस्तर पर पेशाब कर रहा था, मुझे गुस्सा आया और मै इसपे सवार हो गयी" उसने बताया,

"तेरी उम्र क्या है? कुआली" मैंने पूछा,

"पता नहीं, जब मैकुँए में गिरी थी तो मेरे चारों बड़े लड़कों का ब्याह हो चुका था 3 अभी कुंवारे ही थे" वो बोली,

"तू कैसे कुँए में गिरी, खुद गिरी, या किसी ने गिरा दिया?" मैंने पूछा,

"मैं खुद ही गिर गयी थी, कुआँ गहरा था, मेरी आवाज़ किसी ने भी न सुनी, और जब तक लोग आये मै मर चुकी थी" वो बोला,

"तू इस पहाड़ी पर कैसे आ गयी?" मैंने पूछा,

"एक बाबा ने मुझे १०० सालों तक कैद किया था, फिर यहाँ छोड़ दिया, १०० साल बीत गए, अब मै आज़ाद हूँ" उसने बताया,

"अब तू इसको छोड़ेगी या नहीं? मैंने पूछा,

"अगर ये खुद कह देगा तो छोड़ दूंगी" वो हंसा!


   
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श्रीशः उपदंडक
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"ये कैसे बोलेगा? इस पर तो तू सवार रहती है?" मैंने कहा,

"इसे नहीं छोडूंगीमै, खाना खाने को मिलता है मुझे" वो बोली,

"और अगर मै तुझे कहूँ तो? तब क्या करेगी? मै गरजा,

"मुकाबला करूंगी मै" उसने कहा

और उसके इतना कहते ही वहां काफी सारी रूहें आ गयीं! ये कुआलीने ही पकड़ी थीं

मैंने कहा, "कुआली, देख अब मै तुझसे आखिरी बार कह रहा हूँ, तू इसको छोड़ेगी या नहीं, नहीं तो मै तेरे साथ इन सब को भी ले जाऊँगा बाँध कर!"

याकूब तेजी से उठा और बाहर भागा, मैंने और शर्मा जी ने उसको पकड़ लिया, कुआली गायब हो गयी थी उस पर से!

अब कुआली को हाज़िर करना ज़रूरी था, याकूब डर के मारे काँप रहा था!

मैंने याकूब से कहा कीनेक अन्दर बैठ, वो उठा और अन्दर चला गया, मैंने अपनी शक्तियों से कहा की कुआली को पकड़ कर लाओ! १ मिनट में ही कुआलीयाकूब में पेश हो गयी! मैंने कहा, "अब तू भाग नहीं सकती यहाँ से, अब मै जो कहता हूँ वोसुन"

मैंने कहा, "सुन तू इसको अभी छोड़, कभी वापिस नहीं आना, नहीं तो तेरा पक्का इंतजाम कर लूंगा मै"

"इसको नहीं छोडूंगीमै" वो बोला,

"क्यूँ?" ये मेरे बेटे जैसा लगता है मुझे,

"तभी तू बेटे के पेशाब से गुस्सा हो गयी थी?" मैंने कहा

"नहीं मै इसके साथ ही रहूंगी अब" वो बोला,

"तू नहीं रहेगी" मैंने कहा,

ये कह के मैंने उसकी कमर पर एक ज़ोरदार लात लगाई, वो मुंह के बल नीचे गिरा, बोला,"एक काम करो, एक काम करो, मुझे मत मारो, न ही कैद करो, मै दुखियारी हूँ, मुझपे रहम करो, इसको मेरे से अलग न करो" वो हाथ जोड़ के बोला,

मैंने कहा ठीक है, नहीं हटा रहा तुझको, अब तूइसको इसके घरले चल, एक बार भी आनाकानी की तो ज़मीन में गाड़ दूंगा, ये कह के मैंने उसे बाहर धक्का दिया...

वो उठा और चुपचाप चल पड़ा अपने घर की तरफ, मैंने समय देखा रात के १२ ४० हुए थे, हम अपने सामने उसको धक्का देते हुए नीचे लारहे थे, वो धीमा होता तो मै लात मारता उसको, और फिर हम उसके घर पहुँच गए, मैंने कुआली को उसीमे कैद कर दिया था, घर लाके मैंने कासिमसे कहा, एक मुझे एक लोहे कासब्बल दो ज़रा, इसको पाठ पढ़ाना है! याकूब ने हाथ जोड़े, 'मारियोमत, मारियोमत" कहता रहा,

मैंने उसको एक जगह एक खम्बे से बाँध दिया, मैंने कहा, "अब बोल कुआली, तूयहाँ भी लोगों को काली कह कह भरमा रही थी, आज तेरी वो हालत करूंगा की तू उसके बाद अपनी मौत ही मांगेगी" ये कहके मैंने सब्बल का एक वार उसकी टांगोंपे किया, घर में हर कोई जाग गया था, कासिम के सारे भाई, उनकी बीवियाँ, उनके बच्चे, और एक दो घेर की दीवार फांद कर अन्दर आ गए थे,


   
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श्रीशः उपदंडक
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करीब दो घंटे के बाद भी कुआली नहीं मानी, अनाप-शनाप बकती रही, और बोली, "देख तूने मुझे मारा मै किसे मारूंगी, देख"

याकूब ने आँखें चढ़ायीं और उसमेसे एक औरत की आवाज़ आई, ये आवाज़ रज़िया की थी, रज़िया ने अपने बच्चों को बुलाया उनका नाम लेकर, कासिम को बुलाया, लेकिन मैंने मना कर दिया, अब मुझे रज़िया को भी उसकी कैद से आज़ाद करना था! मैंने कासिम को कहा की एक कमरा दो मुझे अभी, मै अब इसका इलाज करता हूँ, कासिम ने फौरन महबूब को बोला और मै और शर्मा जी याकूब को लेके अन्दर कमरे में आ गए,

याकूब को अपने सामने बिठाया और मैंने मंत्र पढने शुरू किये.

आखिर मैंने रज़िया को उसकी कैद से आज़ाद कर दिया, लेकिन एक वादे पर वो आज़ाद हुई, की मैकुआली को६ महीने और रहने दूंगा, इन ६ महीनों में वो उनकी मदद करेगी, किसी को तंग नहीं करेगी, कभी किसी के सामने नहीं आएगी और ऐसा करने के बाद मैंने एक काला मज़बूत धागा उसके गले में बाँध दिया, याकूब ठीक हो गया, ये सारी बातें मैंने हाजी और कासिम को बता दीं, मैंनेकासिम को कहा की अब याकूब किसी को तंग नहीं करेगा, और हाँ६ महीनों के बाद उसकेगलेसे वो काला धागा काट देना और जला देना, समस्या समाप्त हो गयी थी, मैंने याकूब को बुलाया, "याकूब?"

"जी आया मै" याकूब बोला,

"एक बात बता तू अलीगढ क्या करने गया था? मैंने पूछा,

"मेरे एक दोस्त की बारात थी, वो पड़ोस के गाँव में रहता है" वो बोला,

"अच्छा! और फिर इतने दिन कहाँ रहा? मैंने पूछा,

"मुझे याद नहीं की मै कहाँ रहा?" याकूब बोला,

सुबह हो गयी थी, कासिम और उसके भाई खेत जाने के लिए तैयार थे, आज याकूब भी जा रहा था!

मै और शर्मा जी काफी थक गए थे, सोचा थोडासो लिया जाए! सोये तो दिन में ११ बनेनींद खुली, हाजी साहब आये और खाने की कह गए, हम उठे और नहाने-धोने चले गए,

१२ बजे करीब खाना खाया, याकूब खेत से आया और उसके भाई भी, खाना खाने के लिए, हम सभी ने खाना खाया, इसी बीच मैंने शर्मा जी से वापिस दिल्ली जाने की बात कही, और शर्मा जी ने हाजी जी से, शाम का कार्यक्रम बन गया, शाम को जाते समय, कासिम आया और मेरे हाथ में १०,००० रुपये रख दिए, मैंने हाजी जी को देखा, हाजी जी ने कहा रख लो आप! मैंने पैसे लिए और कासिम की बड़ी लड़की अफशां को बुलाया और उसको वो पैसे दे दिए। उन्होंने बड़ी ज-जुकुरकी लेकिन मैंने पैसे नहीं लिए, मैंने कहा की जब अफशां का ब्याह करोगे तो बुलावा भिजवा देना! और हम तीनों वहाँ से दिल्ली की ओर चल पड़े.............

उसके बाद.......................वो हुआ जो की मैंने कभी सोचा भी नहीं था...


   
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श्रीशः उपदंडक
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हाजीसाहब से मुलाकात हो ही जाती थी महीने में एक-आठ बार, ये सिलसिला चलता रहा, करीबन साल से ज्यादा वक़्त हो गया, एक रोज़ शर्मा जी ने मुझे बताया की कासिम और उसके सारे भाइयों की मौत एक साल में ही हो गयी! मैं हैरत में पड़ गया!

और जब मैंने 'मालूम' किया तो पता चला, कुआली हर शुक्रवार को सिक्के देती थी याकूब को सोने के, याकूब उनको बराबर बाँट देता था और अपना सिक्का भी कासिम को दे देता था रखने के लिए, ये सिलसिला ६ महीनों तक चला, उन्होंने लालच में याकूब का काला धागा नहीं काटा, वो बांधे रहने दिया, जब याकूब ने कहा की उसके सिक्के उसे दे दो, वो अब अपना मकान बनाएगा और कहीं शादी करेगा, भाइयों ने सोचा की अगरयाकूब नहीं रहा तो कमाई बंद हो जायेगी, उन्होंने उसको सिक्कों के लिए मना कर दिया, उसको गुस्सा आया तो उसने एकदरांती से कासिम के सरपे वार कर दिया, कासिम केसर में वो दरांती धंस गयी, कासिम को मौत हो गयी, पुलिस ने याकूब को पकड़ा और उसको जेल भेज दिया, जेल में उसकी मौत हो गयी, जिंदा बचे भाइयों ने कासिम के और याकूब के सिक्कों पर अपना हक जताया और वो भी इसी कलेश में इंतकाल फरमा गए, ये कुआली ने नहीं करवाया था, कुआली तो६महीनों के बाद अपने वादे के अनुसार चली गयी थी! मैंने तभीहाजी को फ़ोन मिलवाया, पता चला हाजी साहब कहीं बाहर गए हुए हैं और ७ महीनों से वहाँ पर हैं, हालांकि उनको ये कहानी मालूम चल गयी थी, लालच ने एक कुनबा ख़तम कर दिया!


   
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