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शनि देव (ग्रह)

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श्रीशः उपदंडक
(@1008)
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शनि से भयभीत रहा करते हैं! बिना कारण के ही! शनि मात्र दो भावों में, कुछ बुरा फल दें तो दें, अथवा कभी नहीं देते! ये भाव हैं चतुर्थ और पंचम! चतुर्थ शनि पर, यदि उच्च के सूर्य दृष्टि डालें, तो शनिदेव बुरा फल नहीं देंगे! तीन, छह और ग्यारह में बैठे शनि, योगकारक हुआ करते हैं! अष्टम भाव में हों, तो गुप्त रूप से मदद मिल जाया करती है, अष्टम भाव, शनि का, स्वयं का कारक भाव है! एक बहुत बड़ा रहस्य आपको बताता हूँ, ज्योतिष में, कोई भी तथ्य स्थायी नहीं होता! तात्कालिक मैत्री से, फल बदल जाया करते हैं! शनि से सर्वाधिक बैर, मंगल रखते हैं! वे भी, तात्कालिक रूप से मित्र हो जाया करते हैं! फिर भी शनि यदि कष्टकारी हों, तो ये सरल सा उपाय करें! शत-प्रतिशत लाभ होगा!
किसी भी शनिवार को, किसी अनार के पौधे को, धागा बांधकर, नीला धागा हो, न्यौत आएं, कहें, हे श्रुन्जिका मेरे अतिथि बनें! आप पहले धागा बाँध लें, नहीं तो, अनार के पेड़-पौधे पर, काल-रूढ़ा(काल-सखी) का वास होता है! धागा बाँधने से, वो नहीं स्वीकारेगी आपका निमंत्रण! अब आप नित्य, एक धागा, उस अनार के पेड़ पर बांधते रहे! अगले शनिवार को, उस अनार के पौधे या पेड़ की एक टहनी ले आएं, घर में, सूजी का हलवा हो, खीर हो, मीठा कोई व्यंजन हो, इस टहनी को रख दें, और वहां से हट जाएँ! करीब बीस मिंनट के बाद, अपने ऊपर से वो टहनी, दायें से बाएं, इक्कीस बार उतार लें! वो भोग, किसी श्वान को खिला दें, अब उस टहनी को, बहती हुई नदी या नहर के मध्य में प्रवाहित कर दें! बस एक ही मंत्र बोलना है,
हुम्म हुम्म श्रुन्जिके मम समस्त कष्टं चुरय चुरय हुम्म फट्ट!
अब लौट आएं! शनि-दोष समाप्त!

 

2. कहीं से, हिरन का सींग लाएं, छोटा सा टुकड़ा भी चलेगा, इसको, सात रंग के धागों से बने धागे में पिरो दें और घर में कहीं भी लटका दें, शनि का सारा दुष्प्रभाव उसी क्षण दूर हो जाएगा! हिरण का सींग न मिले, तो चमकदार, वर्णपाती गोमती-चक्र से काम बन जाएगा, परन्तु इस से, लाभ शनैः शनैः होगा! परन्तु होगा अवश्य ही!

 

3. देसी कीकर पर, आप एक बूँद कपिला गाय की, दूध की, चढ़ाएं! शनिदेव, कभी न तंग करेंगे आपको

 

4.नीले रंग के वस्त्र में, एक बकरे की अस्थि रखें, गाँठ लगा दें ग्यारह बार, सीधे से दायें वार लें, और बहती नदी में छोड़ दें! बस, काम हुआ! शनिदेव शांत!


   
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